पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Jemsbond
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पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Postby Jemsbond » 18 Dec 2016 17:49

पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )


तीन सौ साल पुरानी वो तस्वीर आज भी हमारे घर में मौजूद है , इसका रंग रोगन , कागज और लकड़ी का वो बेश क़ीमती फ्रेम भी वैसा ही है जैसे तीन सो साल पहले था .. इतना अरसा गुज़रने के बावजूद तस्वीर को कुछ नही हुआ था ..


ऐसे मालूम होता है जैसे पेंटर ने अभी थोड़ी डर पहले बनाया हो, और अगर हमारे पास क़ड़ीं कागजात ना होते तो ये साबित करना मुश्किल हो जाता कि ये तस्वीर मुगल शहंशाह शाह जहाँ के ज़माने के पेंटर बिलाल शम्स ने बनाई है ..


में जिस तस्वीर का जिकर कर रहा हूँ वो बिलाल शम्स की आखरी तस्वीर थी इस तस्वीर के बाद उसने पैंटिंग छोड़ दी .. कहते है इस तस्वीर को बनाने के बाद उसने अपने तमाम ब्रश , क़लम और रंग ओ रोगन ज़ायाः कर दिए और मरते दम तक कोई तस्वीर ना बनाने की क़सम खा ली थी ..


इसके दोस्तों और क़दरदानों ने बोह्त कोशिश की बिलाल शम्स अपनी क़सम तोड़ने पर रज़ामंद हो जाए , इसके लिए वो इसे हर वो चीज़ देने के लिए तय्यार थे जो बिलाल शम्स इन से तलब कर सकता था लेकिन बे सूद …


दुनिया की बड़ी से बड़ी क़ीमती चीज़ , ज़र ओ जवाहिर और हर एरेयिश इस के नज़दीक कोई क़ीमत नही रखती थी , इसने कहा कि वो बिलाल शम्स जो तस्वीर बनाया करता था वो मर चुका है ..


इसका दिल ठंडी राख बन चुकी है जिस में हरारत की एक चिंगारी भी नही है ,
बिलाल शम्स ने पैंटिंग क्यू छोड़ी इसके पीछे एक दर्दनाक दास्तान फेली हुई है .. ऐसी दास्तान जो अभी तक सीनो मे दफ़न थी , लेकिन अब तीन सदिया गुज़रने के बाद में इसे सुनाने की कोशिश कर रहा हूँ ..


ये कहानी मेरे पर दादा के पर दादा को बिलाल शम्स ने खुद सुनाई थी और ये तस्वीर भी खुद उन्हें अता की थी , सर सरी तौर पर देखा जाए तो इसमे कोई ख़ास बात नज़र नही आती मगर ज्यो ज्यो नज़र गहरी होती है , तब तब तस्वीर के ख्याल ओ खत उभरते है , आहिस्ता आहिस्ता तस्वीर का महॉल जानदार होने लगता है ..


लकीर , दायरे , ज़ावीए और रंग भी साँस लेते महसूस होते है और तमाशायी खुद इस जीते जागते महॉल का एक हिस्सा समझने पर मजबूर होता है और यही इस तस्वीर की खूबी है ..

इस तस्वीर मे एक आलीशान हवेली का सजाया कमरा , फर्श पर क़ालीन बिछा हुआ , और दरवाज़ों और खिड़कियों पर रेशमी पर्दे , छत के बीच इंतिहाई क़ीमती फानुश लटका हुआ .. दाए बाए दीवारो पर फनूस , और कमरे के एक साइड पे एक परी सी शकल वाली लड़की सर से पाओं तक सफेद कपड़े पहने खड़ी है .. इसकी उमर 19 20 साल हो गी .. इस पर हया और मासूमियत के साथ साथ घबराहट के आसार नुमाया हैं..

दिल फरेब चेहरे पर एक जाली की नक़ाब है जिस मे से इसका चेहरा नज़र आता है .. हसीन लबों पर पेंटर ने बोह्त अच्छे से कपकपाहट का वो जज़्बा भी हमेशा के लिए क़ैद कर दिया है जिसे देखने के लिए बारीक नज़र की ज़रूरत होती है इस हसीन लड़की के हाथ मे छोटा सा नाज़ुक सा चिराग है और इसकी रोशनी सीधी इस के चेहरे पे पड़ रही है कुछ फ़ासले पर एक लंबे क़द का बूढ़ा और अजीब शकल का आदमी काले कपड़े पहने मौजूद है .

. इसकी आँखें इंतिहाई चमकदार , होन्ट कबूतर के खून की तरह लाल और नाक तोते की चोंच की तरह मूडी हुई है सर पर छोटी सी सियाह पगड़ी है जिस के बीच मे एक हीरा लगा हुआ है .. इस हैबत नाक शख्स के डाए पहलू मे तलवार लटकी है और इस के हाथ तलवार के दस्ते पर है और इसके अंदर से साफ पता चलता है कि वो तलवार खींच के बाहर निकालना चाहता है और गौर से देखा जाए तो तलवार किसी क़दर खींची हुई भी नज़र आती है इस शख्स के गले मे मोतियों और हीरो के कयि हार भी पड़े है .. ऐसा मालूम होता है जैसे ये शख्स कोई बोह्त बड़ा बादशाह है .. देखने वाला पहली नज़र में ही फ़ैसला दे दे कि ये एक ऐसे शख्स का चेहरा है जो दरिंदगी और बे रहमी मे अपनी मिसाल आप है ...

ये भी उन बादशाहों की तरह लगता है जो अपनी जीत की यादगार के तौर पर लोगों की खोपड़ियों से महेल की मीनार बनाया करते थे और जिन के दिल मे रेहेम , हमदर्दी , शफक़त और मुहब्बत के अल्फ़ाज़ कभी शामिल नही रहे ¡* पेंटर ने अपने पूरे आर्ट को इस शख्स की तस्वीर बनाने मे वक़्फ़ किया है जिसकी वजह से ऐसा लगता है जैसे ये शख्स सामने ही खड़ा हो .. कितनी हैरत की बात है कि इस हसीन लड़की को देख कर देखने वाले के ज़ह्न मे जो पाकीज़ा और अच्छे जज़्बात पेदा होते है, इस दूसरे शख्स की तस्वीर पर नज़र डालते ही हवा हो जाते है और इन की जगह नफ़रत के जज़्बात उभरने लगते है ..

कोई भी शख्स इस तस्वीर पर ज़ियादा देर नज़र जमाए नही रह पाता .. और ये हसीन लड़की फ़ातिमा थी , तबरेज़ी ख़ान पेंटर की हक़ीक़ी भांजी , जिसे उस ने बाप और माँ बन कर पाला था .. जिस ज़माने मे क़हेथ साली हुई और लोग रोटियों को तरसने लगे तब तबरेज़ी ख़ान का सारा खानदान इस मर्ज़ का शिकार हो गया और एक एक कर के सब रुखसत कर गये .. भरे पड़े घर में सिर्फ़ दो लोग ही रह गये , फ़ातिमा और तबरेज़ी ख़ान फ़ातिमा उन दिनो बोह्त छोटी थी , तबरेज़ी दिल ओ जान से अपनी इस नन्ही भांजी को चाहता था .. इस ने बड़े नाज़ से इसकी परवरिश की और तालीम ओ तर्बियत भी दी ..

फ़ातिमा जवान हुई तो जैसे क़यामत अपने साथ ले कर आई ¡* बड़े बड़े जागीरदार , और नवाब इस को पाने के ख्वाब देखने लगे .. यहा तक कि शाही खानदान के शहज़ादों ने भी फ़ातिमा का जिकर सुना और दरबारी परींटेरॉं ने इस की खूबसूरत से खूबसूरत तस्वीर बना कर महेल मे पहुँचाई .. लेकिन तबरेज़ी भी कोई आम आदमी ना था उस ज़माने के सब से बड़े और इज़्ज़त दार पेंटर थे और सब से बड़ी बात उस ज़माने के बादशाह के साथ उठना बैठना होता था उसका ..

अगर उसने किसी की शिकायत बादशाह से कर दी तो बादशाह उस शख्स को कभी ज़िंदा नही छोड़ेगा ,इस डर से लोग चुप बैठे थे .. तबरेज़ी जानता था अभी फ़ातिमा मासूम है , इस दुनिया की ऊँच नीच अच्छे बुरे की तमीज़ नही हुई उसे .. थोड़ी बड़ी हो जाए तब इसकी शादी कर दी जाएगी , यही सोच थी तबरेज़ी की , लेकिन उसे क्या खबर थी कि फ़ातिमा का दिल तो कब का घायल हो चुका और तबरेज़ी ख़ान के नोजवान शागिर्द बिलाल शम्स को वो रूह की गहराइयों से ज़्यादा चाहने लगी है कुछ यही केफियत बिलाल शम्स की भी थी .. इसने बोह्त कोशिश की कि वो फ़ातिमा की तरफ अट्रॅक्ट नाहो , इस की तस्वीर , इसके ख़याल अपने ज़हन से निकाल दे पर नामुमकिन था ये सब , इसकी हर कोशिश बुरी तरह नाकाम हो चुकी थी ..



Teen so saal purani wo tasweer aaj bhi humare ghar mein maujood hai , iska rang roghan , kaaghaz aur lakdi ka wo besh qeemti frame bhi waisa hi hai jaise teen so saal pehle tha .. itna arsa guzarne k bawjood tasweer ko kuch nahi hua tha ..


Aise maaloom hota hai jaise painter ne abhi thodi dair pehle banaya ho, aur agar humare pas qadeem kaghzat na hote to ye sabit karna mushkil ho jata k ye tasweer mughal shahinshah shah jahan k zamane k painter Bilal Shams ne banaya hai ..


Mein jis tasweer ka zikar kar raha hu wo Bilal Shams ki akhri tasweer thi is tasweer k baad usne painting chodh di .. kehte hai is tasweer ko banana k bad usne apne tamam brush , qalam aur rang o roghan zayah kar diye aur marte dum tak koi tasweer na banane ki qasam kha lit hi ..


Iske doston aur qadardaanon ne boht koshish ki Bilal Shams apni qasam torhne per razamand ho jaye , iske liye wo isey har wo cheez dene k liye tayyar the jjo Bilal Shams in se talab kar sakta tha lekin be sood …


Dunya ki badi se badi qeemti cheez , zar o jawahir aur har Aarayish is ke nazdeek koi qeemat nahi rakhti thi , isne kaha k wo Bilal Shams jo tasweer banaya karta tha wo mar chukka hai ..


Iska dil thandi raakh ban chuki hai jis mein hararat ki ek chinkari bhi nahi hai ,
Bilal Shams ne painting kyu chodhi iske peeche ek dardnaak daastaan pheli hui hai .. aisi daastaan jo abhi tak seeno me dafan thi , lekin ab teen sadiyan guzarne k baad mein isey sunane ki koshish kar raha hu ..


Ye kahani mere par dada k par dada ko Bilal Shams ne khud sunayi thi aur ye tasweer bhi khud unhein ata kit hi , sar sari taur par dekha jjaye to isme koi khaas baat nazar nahi ati magar joo joo nazar gehri hoti hai , tab tab tasweer k khaal o khat ubharte hai , aahista aahista tasweer ka mahol jandar hone lagta hai ..


Lakeer , daayire , zaaviye aur rang bhi saans lete mehsoos hote hai aur tamashayi khud is jeete jagte mahol ka ek hissa samajhne par majboor hota hai aur yehi is tasweer ki khoobi hai ..
Is tasweer me ek aalishan haweli ka sajaya kamra , farsh par qaleen bicha hua , aur darwazon aur khidkiyon par reshmi pardey , chhat k beech intihayi qeemti jhhaarh latka hua .. daaye baaye dewaaron par fanoos , aur kamre k ek side pe ek pari si shakal ladki sar se paaon tak safed kapde pehne khadi hai .. iski umar 19 20 saal ho gi .. is par haya aur maasumiyat k sath sath ghabraahat k aasar numayan hain..

Dil fareb chehre par ek jaali ki naqab hai jis me se iska chehra nazar ata hai .. haseen labon par painter ne boht ache se kapkapahat ka wo jazba bhi hamesha k liye qaid kar diya hai jisey dekhne k liye bareek nazar ki zaroorat hoti hai is haseen ladki k hath me chotasa nazuk sa chiragh hai aur iski roshni sidhi is k chehre pe padh rahi hai kuch faasle par ek lambe qad ka burha aur ajeeb shakal ka adami kale kapde pehne maujood hai .

. iski aankhein intihayi chamakdar , hont kabootar k khoon ki tarah laal aur naak tote k choonch ki tarah murhi hui hai Sar par choti si siyah pagdi hai jis ke beech me ek heera laga hua hai .. is haibat naak shakhs k daye pehloo me talwar latki hai aur is k hath talwar k daste par hai aur iske andar se saf pata chalta hai k wo talwar kheench k baahar nikalna chahta hai aur ghor se dekha jaye to talwar kis qadar khinchi hui bhi nazar ati hai Is shakhs k gale me motiyon aur heron k kayi haar bhi pade hai .. aisa maaloom hota hai jaise ye shakhs koi boht bada badshah hai .. dekhne wala pehli nazar mein hi faisla de de k ye aek aise shakhs ka chehra hai jo darindagi aur be rehmi me apni misaal aap hai ...

ye bhi un badshahon ki tarah lagte hai jo apne jeet k yadgar k taur par logon k khopdiyon se mehel k meenar banaya karte the aur jin ke dil me rehem , hamdardi , shafqat aur muhabbat k alfaz kabbhi shamil nahi rahe ¡* Painter ne apne pure art ko is shakhs k tasweer banane me waqf kiya hai jiski wajah se aisa lagta hai jaise ye shakhs samne hi khada ho .. kitni hairat ki baat hai k is haseen ladki ko dekh kar dekhne wale k zehn me jo pakeeza aur ache jazbaat peda hote hai, is doosre shakhs ki tasweer par nazar dalte hi hawa ho jate hai aur in ki jagah nafrat k jazbaat ubharne lagte hai ..

koi bhi shakhs is tasweer par ziada dair nazar jamaye nahi reh pata .. Aur ye haseen ladki Fatima thi , Tabrezi khan painter ki haqeeqi bhaanji , jisey us ne baap aur maa ban kar pala tha .. jis zamane me qeheth saali hui aur log rotiyon ko tarasne lage tab tabrezi khan ka sara khandan is marz ka shikar ho gaya aur ek ek kar k sab rukhsat kar gaye .. Bhare pade ghar mein sirf do log hi reh gaye , Fatima aur tabrezi khan Fatima un dino boht choti thi , tabrezi dil o jan se apne is nanhi bhaanji ko chahta tha .. is ne bade naaz se iski parwarish ki aur taaleem o tarbiyat bhi di ..

Fatima jawan hui to jaise qayamat apne sath le kar ayi ¡* Bade bade jaagirdar , aur nawab is ko pane ki khwaab dekhne lage .. yaha tak k shahi khandan k shahzadon ne bhi fatimaa ka zikar suna aur darbari parinter on ne is ki khubsurat se khubsurat tasweer bana kar mehel me pahunchayi .. Lekin tabrezi bhi koi aam aadmi na tha us zamane k sab se bade aur izzat dar painter the aur sab se badi baat us zamane k badshah k sath uthna baithna hota tha uska ..

agar usne kisi ki shikayat badshah se kr di to badshah us shakhs ko kabhi zinda nahi chodhega ,is dar se log chup baithte the .. Tabrezi janta tha abhi Fatima maasoom hai , is dunya ki oonch neech ache bure ki tameez nahi hui usey .. thodi badi ho jaye tab iski shadi kar di jayegi , yehi soch thi tabrezi ki , lekin usey kya khabar thi k fatima ka dil to kab ka ghayal ho chukka aur tabrezi khan k nojawan shagird Bilal Shams ko wo rooh ki gehrayion se ziyada chahne lagi hai kuch yehi kefiyat bilal shams ki bhi thi .. isne boht koshish kiya k wo Fatima ki taraf attract naho , is ki tasweer , iske khayal apne zehn se nikal de par namumkin tha ye sab , iski har koshish buri tarah nakam ho chuki thi ..
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Postby Jemsbond » 18 Dec 2016 17:50

वो खूब जानता था कि तबरेज़ी ख़ान अपनी भांजी की शादी किसी ऐसे शख्स से कर दे गा जिस की कोई हैसियत हो .. इस हसीन लड़की के लिए ऊँचे मालदार घरानों के अच्छे से अच्छे नोजवानों की कमी ना थी , फिर ये कैसे मुमकिन है कि तबरेजी ख़ान फ़ातिमा का हाथ बिलाल शम्स के हाथों मे दे दे , जिसके पास ना खाने को कुछ था , ना पहनने को और वो अपनी ज़रूरत के लिए हर तरह से अपने उस्ताद का मुहताज था .. हां ये अलग बात है कि खुद बिलाल शम्स मर्दाना हुस्न का बेहतरीन नमूना था , खुश एख़लाक़ और अच्छे पेंटर भी थे , हां अगर वो ग़रीब ना होते तो वो बे शक फ़ातिमा के लिए बेहतरीन शोहार साबित हो सकता था , लेकिन दौलत मंद बनने और नाम पैदा करने के लिए भी बड़ी मेहनत की ज़रूरत थी ..

वो अपने काम मे खो जाता ¡* दिन रात तस्वीर बनाता .. कई और शागिर्द भी तबरेज़ी से पैंटिंग सीखने इसके आलीशान मकान पर आते लेकिन जितने अदब और इज़्ज़त से बिलाल शम्स अपने उस्ताद से पेश आता , इनमे से कोई भी शागिर्द ऐसे पेश ना आता .. यही वजह थी कि बोह्त जल्द ही तबरेज़ी ख़ान इस पर भरोसा करने लगा ..इसे मालूम हो गया कि बिलाल शम्स शरीफ नोजवान है , इस पर भरोसा किया जा सकता है और इसे कम सीखने का भी शौक़ है , इसलिए इस ने बिलाल शम्स को अपनी हवेली का एक कमरा दिया और इस की तमाम ज़रोरियत इस को देने लगा

फिर वो दिन भी आ गया जब बिलाल और फ़ातिमा की आँखें चार हुई .. एक ना बुझने वाली आग थी जिसमे वो दोनो जलने लगे .. मुलाक़ातें बढ़ने लगी और हमेशा साथ जीने और मरने के क़स्मे खाने लगे .. सब कुछ जानने और समझने के बावजूद एक दूसरे से मुहब्बत किए चले जा रहे थे और इन की मुहब्बत का इल्म खुदा के सिवा किसी को ना था …


दिन तेज़ी से गुज़र रहे थे .. फ़ातिमा और बिलाल का इश्क़ उरोज पर आया , लेकिन इस मे किसी क़िस्म का जिस्मानी तालूक़ ना था वो घंटो एकदुसरे के सामने बैठ के बातें करते रहते ..


बिलाल शम्स उस शाम अकेले अपने तस्वीर खाने मे मौजूद था और एक तस्वीर बनाने मे ऐसे खो गया था कि उसे दुनिया की कोई खबर ना थी .. वो दरअसल एक मुगल शहज़ादी की तस्वीर कयि दिनों से बना रहा था और अजीब ये थी कि हमेशा तस्वीर में कहीं ना कही ऐसी ग़लती हो जाती कि पूरी तस्वीर खराब हो जाती और नयी बनानी पड़ती ..


अब तक 4 5 बार तस्वीर खराब हो चुकी थी और 6वी बार तस्वीर बनाने मे लगा हुआ था .. बोह्त देर बाद उसे पता चला कि दर असल वो ग़लती कहाँ कर रहा है ..होता ये था कि वो जब भी तस्वीर के आँख , पेशानी और होन्ट बनाता तो शहज़ादी की शकल बिल्कुल फ़ातिमा से मिलती तो वो डर कर क़लम फेंक देता …


इसकी समझ मे नही आता था कि हर बार फ़ातिमा की तस्वीर क्यू बन रही है जबकि इसके पास ही उस मुगल शहज़ादी की तस्वीर पड़ी हुई थी जिसे किसी और पेंटर ने बनाया था , लेकिन ये तस्वीर शहज़ादी को पसंद ना आई और शहंशाह ने तबरेज़ी ख़ान को हुकुम दिया था कि वो इस की प्यारी बेटी की नयी तस्वीर बनाए …


तबरेज़ी ख़ान ने ये कम बिलाल शम्स के ज़िम्मे कर दिया था और जितनी मुहलत इसे दी गयी थी , वो बस ख़तम ही होने वाली थी ,लिहाज़ा बिलाल शम्स अपना पूरा तवज्जुह से तस्वीर बनाने लगा , फ़ातिमा का ख़याल दिलसे निकल कर ..


इसे खबर तक ना हुई कि कब तबरेज़ी ख़ान के दूसरे शागिर्द रुखसत हो गये और कब शाम हो गयी और कब हवेली का वो बूढ़ा मुलाज़िम चिराग रोशन कर के वहाँ रख कर चला गया .. इस दौरान एक बार भी फ़ातिमा का ख़याल बिलाल शम्स के ज़हन मे ना आया था


आख़िर कार शहज़ादी की तस्वीर तैयार हो चुकी थी और शहज़ादी की शकल फ़ातिमा से भी नही मिल रही थी , ये शहज़ादी थी तो बहुत खूबसूरत मगर फ़ातिमा जितनी नही थी ..


बिलाल शम्स ने क़लम नीचे रखा और एक पीयाली और छोटी सी ब्रश उठाया .. इस पीयाली मे गुलाबी रंग था और अब तस्वीर मे रंग भरने का आगाज़ करने वाला था .. अभी इसने 3 4 बार ब्रश चलाया ही था कि पीछे से किसी के आने की आहट हुई ,वो चोन्का और जल्दी से पीछे मूड के देखा ..


बिलाल का ख़याल था कि ये दबे पावं कमरे में आने वाली हरकत फ़ातिमा के सिवा कोई और नही कर सकता है ,, अक्सर ऐसा होता था कि शाम को सूरज के छुपने के बाद चन्द लम्हों के लिए फ़ातिमा बिलाल के कमरे मे आती थी और वो भी उस वक़्त जब तबरेज़ी हवेली मे ना हो …


अपने मामू की मौजूदगी मे उसकी मज़ाल ना थी कि वो हवेली के मर्दाने हिस्से मे बगैर इजाज़त के क़दम भी रख सके ,ये और बात थी कि तबरेज़ी ख़ान ने इसे कभी बिलाल शम्स से परदा करने का हुकुम ना दिया था … अक्सर ऐसा भी होता कि तबरेज़ी ख़ान बिलाल शम्स को घर के अंदर बुलाया करता और तीनो रात को खाना एक ही दस्तरख़्वाँ पर बैठ कर खाते तबरेज़ी ख़ान को अपने नौजवान शागिर्द पर कुछ ऐसा ही भरोसा था …


बिलाल शम्स ने ज्यों ही मूड कर देखा .. उसका बदन जैसे पत्थर का हो गया हो .. फ़ातिमा की बजाए इसके सामने एक ओल्ड एज का बदशकल सा शख्स सर से पाओं तक काला कोट पहने खड़ा था ..इसकी आँखें बे हद चमकदार , मोटे मोटे होन्ट सुर्ख और गालों की हड्डियाँ उभरी हुई थी .. इसके सर पर सियाह पगड़ी थी जिस के बीच मे बेश क़ीमती हीरा लगा हुआ था जो जगमगा रहा था …


दाए पहलू मे तलवार लटका हुआ था , ये अजनबी कॉन है ? और ये इस कमरे में कैसे आया ? ये थे वो सवाल जो बिलाल शम्स के ज़हन मे उस वक़्त आ रहे थे उस शख्स को देख कर , इसकी शकल और लिबास से पता चल रहा था कि कोई मुगल सरदार या कोई बड़ा ओहदे दार है ..


उस अजनबी से निगाह दो चार होने के बाद बिलाल शम्स को यू महसूस हुआ जैसे इस के बदन का सारा खून उसकी खोपड़ी मे जमा हो गया है .. दहशत की एक इंतिहाई सर्द ल़हेर उसकी रीढ़ की हड्डी मे उतरती चली गयी ..


अजीब बात ये थी कि हवेली का मैन दरवाज़ा और बाक़ी छोटे दरवाज़े ,खिड़कियाँ हमेशा अंदर से बंद रहती है और कोई परिंदा भी पर नही मार सकता .. फिर ये शख्स कहाँ से आया ???


बिलाल शम्स ने घबरा कर मूँह फेर लिया .. इस मे मज़ीद आँखें चार करने की हिम्मत ना थी ,, वो शख्स वैसे ही अपनी जगह पे खड़ा रहा बगैर हीले ..बिलाल शम्स वापिस अपने काम मे मशगूल हुआ अब उस शख्स की नज़र उस तस्वीर पे पड़ी जिस मे बिलाल शम्स रंग भर रहा था ..


“ जनाब क्या आप आका तबरेज़ी से मिलने आए है ??” बिलाल शम्स ने बड़े अदब से पूछा ..


“ हां इसी लिए आया था “ अजनबी ने भारी आवाज़ मे कहा “ लेकिन इस वक़्त वो यहाँ हवेली मे नही है क्या तुम उसे मेरा पेगाम दे सकते हो “


“ इरशाद फरमाइए .. आपका पेगाम में उन तक पहुँचा दूँगा “ बिलाल शम्स ने गर्दन झुका कर कहा “आप मुझ पर पूरा भरोसा कर सकते है .. में अक़ा ए तबरेज़ी का ख़ास शागिर्द बिलाल शम्स हूँ “


“हूँ ??” उस शख्स ने बड़े गुरूर और तक्कब्बुरि के साथ एक बार बिलाल शम्स को देखा फिर उसी तकबबूराना लहजे में कहा “ कह देना उसे सूबेदार जलाल आबाद तशरीफ़ लाए थे और कल इसी वक़्त वो अपनी हवेली मे हाज़िर रहे मे दुबारा आउन्गा .. एक एहम मामले मे तबरेज़ी से बात करना चाहते हैं “




Wo khoob janta tha k tabrezi khan apne bhaanji ki shadi kisi aise shakhs se kar de ga jis ki koi haisiyat ho .. is haseen ladki k liye oonche maldaar gharanon k ache se ache nojawanon ki kami na thi , phir ye kaise mumin hai k tabrei khan fatima ka hath bilal shams k hathon me de de , jiske pas na khane ko kuch tha , na pehenne ko aur wo apni zaroorat k liye har tarah se apne ustaad ka muhtaaj tha .. Haan ye alag baat hai k khud bilal shams mardana husn ka behtareen namuna tha , khush ekhlaaq aur ache painter bhi the , haan agar wo ghareeb na hote to wo be shak Fatima k liye behtareen shohar sabit ho sakta tha , lekin daulat mand banne aur naam paida karne k liye bhi badi mehnat ki zaroorat thi ..

woh apne kaam me kho jata ¡* din raat tasweer banata .. Kayi aur shagird bhi tabrezi se painting sikhne iske aalishan makan par ate lekin jitney adab aur izzat se bilal shams apne ustaad se pesh ata , inme se koi bhi shagird aise pesh na ata .. yehi wajah thi k boht jald hi tabrezi khan is par bharosa karne laga ..isey maaloom ho gaya k bilal shams shareef nojawan hai , Is par bharosa kiya ja sakta hai aur isey kam sikhne ka bhi shauq hai , isliye is ne bilal shams ko apni haweli ka ek kamra diya aur is ki tamam zaroriyat is ko dene laga
Phir wo din bhi aa gaya jab bilal aur Fatima ki aankhein chaar hui .. ek na bujhne wali aag thi jisme wo dono jalne lage .. mulaqatein barhne lagi aur hamesha sath jeene aur marne k qasme khane lage .. sab kuch janne aur samajhne k bawjood ek doosre se muhabbat kiye chale ja rahe the aur in ki muhabbat ka ilm khuda k siwa kisi ko na tha …


Din tezi se guzar rahe the .. Fatima aur bilal ka ishq urooj par aya , lekin is me kisi qism ka jismani taaluq na tha wo ghanto ekdusre k samne baith k baatein karte rehte ..


Bilal shams us sham akele apne tasweer khane me maujood tha aur ek tasweer banana me aise kho gaya tha k usey dunya ki koi khabar na thi .. wo darasal ek mughal shahzadi ki tasweer kayi dinon se bana raha tha aur ajeeb ye thi k hamesha tasweer mein kahi na kahi aisi ghalti ho jati k puri tasweer kharab ho jati aur nayi banana padhti ..


Ab tak 4 5 bar tasweer kharab ho chuki thi aur 6wi bar tasweer banana me laga hua tha .. boht der baad usey pata chala k dar asal wo ghalti kaha kar raha hai ..hota ye tha k wo jab bhi tasweer k aankh , peshani aur hont banata to shahzadi ki shakal bilkul Fatima se millti to wo dar k qalam phenk deta …


Iski samajh me nahi ata tha k har baar Fatima ki tasweer kyu ban rahi jabke iske pas hi us mughal shahzadi ki tasweer padi hui thi jisey kisi aur painter ne banaya tha , lekin ye tasweer shahzadi ko pasand na ayi aur shahanshah ne tabrezi khan ko hokum diya tha k wo is ki piyari beti ki nayi tasweer banaye …


Tabrezi khan ne ye kam bilal shams k zimme kar diya tha aur jitni muhlat isey di gayi thi , wo bs khatam hi hone wali thi ,lihaza bilal shams apna pura tawajjuh se tasweer banane laga , Fatima ka khayal dilse nikal k ..


Isey khabar tak na hui k kab tabrezi khan k dusre shagird rukhsat ho gaye aur kab suraj ghuroob ho gayi aur kab haveli ka wo burha mulazim chiraagh roshan kar ke waha rakh kar chal gaya .. is dauran ek bar bhi Fatima ka khayal bilal shams k zehn me na aya tah


Akhir kar shahzadi ki tasweer tayar ho chuki thi aur shahzadi ki shakal Fatima se bhi nahi mil rahi thi , ye shahzadi thi to boht khubsoorat magar Fatima jitni nahi thi ..


Bilal shams ne qalam neeche rakha aur ek piyali aur choti si brush uthaya .. is piyali me gulaabi rang tha aura b tasweer me rang bharne ka aghaaz karne wala tha .. abhi isne 3 4 bar brush chalaya hi tha k peeche se kisi k ane ki aahat hui ,wo chonka aur jaldi se peeche murh k dekha ..


Bilal ka khayal tha k ye dabe paon kamre mein ane wali harkat Fatima k siwa koi aur nahi kar sakta hai ,, aksar aisa hota tha k sham ko suraj k chupne k baad chand lamhon k liye Fatima bilal k kamre me ati thi aur wo bhi us waqt jab tabrezi haveli me na ho …


Apne maamu k maujoodgi me uski majal na thi k wo haveli k mardane hisse me bagher ijazat k qadam bhi rakh sake ,ye aur baat thi k tabrezi khan ne isey kabhi bilal shams se parda karne ka hokum na diya tha … aksar aisa bhi hota k tabrezi khan bilal shams ko ghar k andar bulaya karta aur teeno raat ko khana ek hi dastarkhwaan par baith kar khate tabrezi khan ko apne naujawana shagird par kuch aisa hi bharosa tha …


Bilal shams ne joon hi murh kar dekha .. uska badan jaise pathar ka ho gaya ho .. Fatima k bajaye iske saamne ek old age ka badshakal sa shakhs sar se paaon tak kala kot pehne khada tha ..iske aankhein be had chamakdaar , mote mote hont surkh aur gaalon k haddiyan ubhri hui thi .. iske sar par siyah pagdi thi jis ke beech me besh qeemti heera laga hua tha jo jagmaga raha tha …


Daye pehloo me talwar latka hua tha , ye ajnabi kon hai ? aur ye is kamre mein kaise aya ? ye the wo sawal jo bilal shams k zehn me us waqt aa rahe the us shakhs ko dekh kar , iske shakal aur libaas se pata chal raha tha k koi mughal sardar ya koi bada uhde daar hai ..


Us ajnabi se nigaah do chaar hone k baad bilal shams ko yu mehsoos hua jaise is ke badan ka sara khoon uske khopdi me jamah ho gaya hai .. dehshat ki ek intihayi sard leher uske redh ki haddi me utarti chali gayi ..


Ajeeb baat ye thi k haveli ka main darwaza aur baqi chote darwaze ,khidkiyan hamesha andar se band rehti hai aur koi parinda bhi par nahi maar sakta .. phir ye shakhs kaha se aya ???


Bilal Shams ne ghabra kar moon pher liya .. is me mazeed aankhein chaar karne ki himmat na thi ,, wo shakhs waise hi apne jagah pe khada raha bagher hile ..bilal shams wapis apne kaam me mashghool hua ab us shakhs ki nazar us tasweer pe padi jis me bilal shams rang bhar raha tha ..


“ janab kya aap aaqa tabrezi se milne aye hai ??” bilal shams ne bade adab se poocha ..


“ haan isi liye aya tha “ ajnabi ne bhari awaz me kaha “ lekin is waqt wo yaha haveli me nahi hai kyat um usey mera pegham de sakte ho “


“ Irshad farmayie .. apka pegham mein un tak pahuncha dunga “ bilal shams ne gerdan jhuka kar kaha “aap mujh par pura bharosa kar sakte hai .. mein aqaa e tabrezi ka khaas shagird bilal shams hu “


“hoon ??” us shakhs ne bade ghuroor aur takkabburi k sath ek baar bilal shams ko dekha phir usi takabburana lehje mein kaha “ keh dena usey subedar jalal abad tashreef laye the aur kal isi waqt wo apne havelo ma hazir rahe me dubara aunga .. ek ehm muamle me tabrezi se baat karna chaahte hain “

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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Postby Jemsbond » 21 Dec 2016 22:30



ये बोलने के बाद वो मुड़ा और कमरे से बाहर चला गया .. एक निराली बात ये थी कि जाते हुए उसके क़दमों की आवाज़ की आहट बिल्कुल पैदा नही हुई.. कुछ देर तक बिलाल शम्स ऐसे ही बुत बने खड़ा रहा .. ऐसे पूर इसरार आदमी , जैसे ये जलाल आबाद का सूबेदार था , पहले कभी ना देखा था बिलाल शम्स ने .. उसने जल्दी से हवेली के लॉन मे खुलने वाली खिड़की खोला और झाँकने लगा .. यहाँ से मैं दरवाज़ा ब खूबी नज़र आता था .. बिलाल शम्स का ख़याल था के वो उस शख्स को जाते हुए देखेगा , लेकिन पूरा लॉन वीरान पड़ा था …


मैं दरवाज़ा भी बंद था और इसे खोलना एक आदमी के बस की बात भी ना थी , फिर वो सूबेदार जलाल आबाद गया कहाँ से .. बिलाल शम्स ने जल्दी से दूसरी खिड़की खोली जो हवेली से बाहर की तरफ थी वहाँ से बाहर का पूरा गली नज़र आता था मगर मज़े की बात ये थी कि पूरा गली वीरान पड़ा था , दूर दूर तक किसी का कोई पता ना था ..


खुदा ही बेहतर जानता है उसे आसमान खा गयी या ज़मीन निगल गयी ?? वो खुद से कहने लगा .. किसी भी सूरत वो मेरे नज़र से बच के बाहर नही जा सकता , फिर कहाँ गया ?? इस सवाल ने बिलाल शम्स को हैरान ओ परेशान कर दिया था .. मुमकिन है हवेली मे कोई ख़ुफ़िया रास्ता हो जहाँ से सूबेदार जलाल आबाद गया हो .. उस ने सोचा , हां ऐसा ही होगा वरना वो कहाँ जा सकता है ..


ऐसे पुराने और अज़ीम उष्हान हवेलियो मे अक्सर तह खाने और सुरंगे बनाए जाते है ता कि नाज़ुक वक़्त मे वहाँ से भाग सके या पनाह लिया जा सके और सूबेदार जलाल आबाद यक़ीनन ऐसे ही किसी ख़ुफ़िया रास्ते से ज़रूर आगाह था ये कितनी गैर मुनासिब बात है कि कोई शख्स यू छुप छुपाते हवेली मे दाखिल हो …

वो अपने तस्वीर खाने से बाहर आया .. उस ने दरवाज़ा बंद कर के लोहे का भारी ताला दरवाज़े पे लगाया और चाबियाँ अपने लंबे कोट की जेब मे रखा , फिर हवेली के लॉन का बगौर मुआईना करने लगा .. उसने हर दीवार को हाथ लगा कर देखा कि कही कोई ख़ुफ़िया रास्ता तो नही है मगर बे सूद उसे कही ऐसा कोई ख़ुफ़िया रास्ता ना मिला .. वो मेन दरवाज़े को देखने लगा जो बहुत ऊँचा और स्टील से बनाया गया था पुराने मुगल बादशाहों के दौर का और बहुत भारी भी था 3 4 लोग मिल कर उसे खोल सकते थे इसलिए अक्सर ये मेन दरवाज़ा बंद रहता था और लोगों के आने जाने के लिए छोटे दरवाजे होते थे ..


तभी अफ़ज़ल बैग हवेली के ज़नाना हिस्से से निकल कर मर्दाना हिस्से मे आया .. इस ने बिलाल शम्स को मेन दरवाज़े के सामने खड़े देख कर क़रीब आया और पूछा ..


अफ़ज़ल बैग : क्या बात है बर्खुरदार , कुछ परेशान से नज़र आते हो .. खेर तो है ??


बिलाल शम्स : कुछ नही बाबा मे देख रहा हूँ इस हवेली मे इन दरवाज़ो के इलावा आने जाने का कोई और रास्ता भी है या नही ..


अफ़ज़ल बैग ने घूर कर बिलाल शम्स को देखा .. उसकी बूढ़ी वफ़ादार आँखों मेशक ओ शुबहे के आसार नज़र आने लगे


अफ़ज़ल बैग : कोई और रास्ता ?? .. क्या कहते हो बिलाल शम्स ?? .. आख़िर तुम्हे इस वक़्त ये सूझी क्या है ??


बिलाल शम्स ने बात को टालते हुए कहा


बिलाल शम्स : ऊह कुछ नही कुछ नही .. बस यूँही


इसने सोचा कि जलाल आबाद के पूर इसरार सूबेदार का क़िस्सा आका ए तबरेज़ी के इलावा किसी और को कहना मुनासिब नही , इसलिए उसने कहा


बिलाल शम्स : ये बताओ बाबा जान कि आका हवेली तशरीफ़ लाए कि नही ??


अफ़ज़ल बैग : वो आज ज़रा देर से आएँगे .. किसी अमीर के यहाँ उनकी दावत है , कह गये थे कि दस्तरख़्वाँ पर इनका इंतज़ार ना किया जाए .. फ़ातिमा की तबीयत भी कुछ खराब हो गयी है , उसने कह दिया कि वो खाना नही खाएगी , आप खाना अंदर खाएँगे या बाहर ??


बिलाल शम्स परेशान हो गया फ़ातिमा की तबीयत का सुन के , उसने पूछा


बिलाल शम्स : क्या ?? फ़ातिमा की तबीयत खराब है ?? और कब से ??


अफ़ज़ल बैग : अभी कुछ आधा घंटा पहले से खराब है .. वो बैठ के कोई किताब पढ़ रही थी तभी इस पर कप कपि तारी हो गयी और कहने लगी , बाबा मुझे कंबल ऊढा दो .. मे ने उसे कंबल ऊढा दिया .. कप कपि फिर भी ना गयी तब मे ने एक और कंबल उस पर डाल दिया , उसका रंग पीला पड़ चुका था और बार बार कह रही थी , कि बाबा मुझे क्या हो रहा है , मेरा दिल बैठा जा रहा है ..मे वहाँ से आ कर तुम्हे बताना चाहता था , लेकिन फ़ातिमा ने मुझे अपने पास से हिलने भी ना दिया फिर वो अपने आप से बडबडाने लगी .. बाबा खुदा के लिए मुझे अकेला मत छोड़ो .. अगर तुम चले गये तो वो यहाँ आ जाएगा .. इस वक़्त वो हवेली मे मौजूद है .. वो बहुत खौफनाक है बाबा .. मुझे उससे बहुत डर लगता है .. मुझे तन्हा मत छोड़ो .. फ़ातिमा की ये हालत देख कर मैं बेहद ख़ौफ़ जदा हो गया .. उसके अंदर से कोई और ही आवाज़ आ रही थी .. और फिर वो पूर सुकून हो गयी और कप कपि जाती गयी और फिर उसने कंबल हटाकर परे फेंकी , फिर थोड़ी देर मे ठीक होने के बाद नाराज़ होते हुए कहा कि ये दहेकती कंबलें कॉन लाया है यहाँ इन्हें जल्दी से हटाओ यहाँ से .. में ने उसके हुकुम की तामील की अब वो बेसूध सो रही है ..


बिलाल शम्स बुत बने ये कहानी सुनता रहा .. बूढ़े अफ़ज़ल बैग के हर जुमले के साथ इसे अपने दिल धड़कन बंद होती हुई महसूस हुई .. कोई इसके दिल के गहराइयों से पुकार रहा था .. फ़ातिमा …. फ़ातिमा …. फ़ातिमा ….


अफ़ज़ल बैग के साथ वो पहली बार फ़ातिमा के कमरे मे दाखिल हुआ , तो उसका तमाम बदन मारे हैबत के पसीने मे तर हो गया .. एक चादर ओढ़ के पलंग पर उसकी महबूबा सो रही थी और उसके चेहरे पे सुकून थी और किसी ख़ुशगवार ख्वाब के ज़ेर असर उसके लब मुस्कुरा रहे थे … बिलाल शम्स मुतमइन हो कर दबे पाओं अपने कमरे मे लौट आया

“ सूबेदार जलाल आबाद “ आका ए तबरेज़ी ने बिलाल शम्स के कमरे मे टहलते हुए 10 बार ये नाम दुहरा चुका था फिर कहा


तबरेज़ी : सूबेदार जलाल आबाद ?? लेकिन मे किसी ऐसे सूबेदार को नही जानता … क्या हुलिया बताया बिलाल तुमने ?? …. मुझे याद नही पड़ता कि में कभी ऐसे शख्स से मिला हूँ … बिल्कुल याद नही आ रहा … इसने बताया नही कि आख़िर किस मक़सद से वो मुझसे मिलना चाहता था … खेर में उसका यही इंतज़ार करता हूँ ..


बिलाल शम्स : जनाब मुझे ये समझ नही आ रहा कि वो क्यू मिलना चाहते है आप से


तबरेज़ी : शायद वो अपने या अपने किसी अज़ीज़ की तस्वीर बनवाना चाहते हो .. यही बात होगी , इससे ज़ियादा अहम बात वो मुझसे क्या करेंगे ?? में वज़ीर ना अमीर , ना कोई बड़ा ओहदे दार एक आम सा पेंटर और कोई काम तो हो नही सकता …


बिलाल शम्स ने दोनो खिड़कियाँ खुली छोड़ी थी एक वो जो गली मे खुलती है और दूसरी जो हवेली के लॉन मे खुलती है , वो बारी बारी दोनो खिड़कियों से झाँक रहा था कि सूबेदार जलाल आबाद आए तो उसे पता चले और फ़ौरन अपने उस्ताद को खबर करे .. लेकिन हर बार निगाहें नाकाम लौटती .. आख़िर कर शाम क 7 बज गये और सूबेदार जलाल आबाद ने भी 7 बजे आने का कहा था .. मगर सूबेदार जलाल आबाद का कहीं अता पता ना था .. तबरेज़ी ने थक हार कर कहा


तबरेज़ी : भाई वो शख्स आएगा भी कि नही ?? क्या तुम ने देखा नही कि 7 बज चुके है ??
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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Postby Jemsbond » 21 Dec 2016 22:44

वो दुबारा खड़ा हुआ और कमरे मे टहलता हुआ बिलाल शम्स की बनाई हुई तस्वीरों को देखते हुए कहा


तबरेज़ी : जलाल आबाद का सूबेदार ! कॉन शख्स है ये … हैरत है मे खुद कभी जलाल आबाद नही गया फिर वो मुझे कैसे जानता है … उसने अपना कोई नाम नही बताया क्या ..


बिलाल शम्स :- नही में उससे और कुछ पूछता उससे पहले ही वो तशरीफ़ ले जा चुके थे , वो अपने चाल ढाल , लिबास और गुफ़्तुगू से वाक़ई मुअज़्ज़ाज़ और अच्छी हैसियत के नज़र आते थे .. उनकी पगड़ी मे जो हीरा था , में ने आज तक इतना बड़ा और क़ीमती हीरा नही देखा .. मेरा ख़याल है जनाब इस हीरा का ….


बिलाल बोल ही रहा था कि तभी उसके कमरे का दरवाज़ा बगैर आवाज़ के खुला और जलाल आबाद का सूबेदार अंदर दाखिल हुआ .. मगर अजीब बात ये थी कि वो ना बाहर के गली से आया था और ना लॉन से आते हुए बिलाल को नज़र आया था .. बिलाल ने जल्दी से दोनो का तार्रुफ करते हुए कहा


बिलाल शम्स :- जनाब मुअज़्ज़ाज़ मुलाक़ाती तशरीफ़ ले आए हैं ( सूबेदार से ) ये हैं मुहतरम आका ए तबरेज़ी जिन से आप मुलाक़ात करना चाहते थे


दोनो ने एक दूसरे की तरफ देखा .. तबरेज़ी अपनी जगह बुत बने खड़ा था .. इस ने हाथ मिलाने के लिए हाथ भी आगे नही किया था इतना भी जुर्रत नही हुआ उसे .. सूबेदार ने दहक्ती हुई आँखें तबरेज़ी पर डाली .. बिलाल शम्स ने देखा कि इन आँखों से चिंगारियाँ सी फूट रही हैं .. चन्द लम्हें कमरे मे भयानक खामोशी छाइ रही , ऐसी खामोशी जिसमे उस्ताद और शागिर्द , दोनो एक दूसरे के दिल की धड़कनें बखूबी सुन रहे थे


सूबेदार जलालाबाद ने भारी और रोब दार आवाज़ मे कहा


सूबेदार जलालाबाद :- तबरेज़ी मुझे तुमसे एक ज़रूरी बात करनी है


तबरेज़ी ने बड़े इज़्ज़त और डरे हुए लहजे मे कहा


तबरेज़ी :- फरमाइए जनाब मे सुन रहा हूँ , मगर क्या ये अच्छा नही होगा कि हम दूसरे कमरे मे बैठे जहाँ आप के लिए अच्छा इंतज़ाम किया गया है


सूबेदार जलालाबाद :- नही वो बात यही होगी और बैठने के लिए मेरे पास वक़्त नही … मुझे फ़ौरन वापिस जाना है .. समझे ???


तबरेज़ी ने थर थर काँपते हुए कहा


तबरेज़ी :- समझ गया जनाब … फरमाइए मे हर हुकुम की तकमील के लिए तय्यार हूँ ..


चन्द ही लम्हे मे इसकी हालत खराब हो चुकी थी .. अब वो सूबेदार के सामने एक गुलाम की तरह हाथ बाँधे खड़ा था , हालाँकि आका ए तबरेज़ी वो शख्स था जो शहेन्शाह के इलावा किसी के सामने झुकना जानता ही नही था .. बड़े बड़े आदमियों को अपने दरवाज़े से ये कह कर भेज देता था कि मुलाक़ात का टाइम नही है .. वैसे भी अपने ज़माने का अवाल नंबर पेंटर था , मगर अब वोही तबरेज़ी एक मामूली सूबेदार के सामने पालतू कुत्ते की तरह दुम हिला रहा था ..

तबरेज़ी ने गेर्दन झुका कर कहा
तबरेज़ी :- हुज़ूर क्या पहले भी आप से मुलाक़ात हुई है मेरी ??


सूबेदार ने मुस्कुरा कर कहा


सूबेदार :- नही ये पहला मौक़ा है कि तुम हम से मिल रहे हो .. हम चाहते तो तुम्हें भी अपने इलाक़े मे बुला सकते थे मगर फिर सोचा कि हम ही मिल ले तुमसे ..


सूबेदार का अंदाज़ ऐसा था जैसे वो अपने खरीदे हुए गुलाम से बात कर रहा हो , तबरेज़ी ने कहा


तबरेज़ी :- मेरी ख़ुशनसीबी है जनाब कि आप मेरे ग़रीब खाने मे तशरीफ़ लाए .. बे तकलीफ़ इरशाद फरमाइए मे आप की खिदमत मे क्या कर सकता हूँ ..


सूबेदार ने बिलाल शम्स की तरफ देखा जो डर के मारे अपने उस्ताद के पीछे खड़ा था , सूबेदार ने दहेकती हुई आँखों से उसे देखा और कहा


सूबेदार :- तबरेज़ी क्या ये लड़का क़ाबिल ए ऐत्माद है ..


तबरेज़ी :- बे शक सरकार , ये मेरा निहायत होनहार शागिर्द बिलाल शम्स है और हर तरह से भरोसे के क़ाबिल है ..


सूबेदार ने अपने जेब मे हाथ डाल कर एक मीडियम साइज़ का डब्बा जो हाथी दाँत से बना हुआ था निकाला और बिलाल शम्स को देते हुए कहा


सूबेदार :- बहुत खूब .. इसमे कुछ जवाहर और ज़ेवर है .. इस नौजवान को हुकुम दो कि अभी ये डिब्बा किसी अच्छे ज़ोहरी के पास ले जाए और इन तमाम ज़र ओ जवाहर की माल्लियत का अंदाज़ा करवा कर वापिस लाए .. जितनी क़ीमत होगी वो कगाज़ पे लिख के साथ लाए



बिलाल शम्स ने वो डब्बा बगैर खोले ही अपने कोट की जेब मे रखा और गर्दन खम कर के दरवाज़े से बाहर निकल गया .. इसके हाथ ,पेर काँप रहे थे ..इस केफियत पर क़ाबू पाने की हर कोशिश नाकाम हो रही थी .. ऐसा लगता था जैसे कोई बदरूह इसके ताक़ुब मे हो … हवेली से बाहर निकल के इसके होश ओ हवास इसके क़ाबू मे आए और ज़हेन काम करने के क़ाबिल हुआ … वो हैरान था कि सूबे दार जलाल आबाद क्या ऐसी अहम बात के लिए तबरेज़ी के पास आया है ? आख़िर अपने इस ज़रो जवाहर की क़ीमत खुद भी किसी ज़ोहरी से लगा सकता था .. फिर इसने आका तबरेज़ी को इस काम के लिए मुन्तखिब क्यू किया ? बिलाल शम्स जितना इस सवाल पर सोचता , इतना ही परेशान होने लगता .. ये ऐसा मामला था जो इस के लिए ना क़ाबिल ए फेहम साबित हो रहा था …
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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Postby Jemsbond » 21 Dec 2016 23:00

दो तीन बाज़ारों से निकल कर वो एक छोटी सी गली मे दाखिल हुआ जहाँ फानूसों और मशालो की रोशनी में गोया दिन निकला हुआ था .. शहेर का सराफ़ा बाज़ार था और नामी गिरामी ज़ोहरियों की दुकान यही थी .. इन मे से काई ज़ोहरी इसे अच्छी तरह से जानते पहचानते थे .. क्यू की वो इनकी तस्वीरें बना चुका था .. अपने जानने वाले एक ज़ोहरी की दुकान पर पहुँच गया और वो डब्बा निकाल के इसके सामने रखा.. ज़ोहरी ने इस डब्बे को देखा और कहा

ज़ोहरी :- आओ मियाँ कैसे आना हुआ ?इस डब्बे में क्या लाए हो ?

बिलाल शम्स ने फूला साँस को दुरुस्त करते हुए कहा

बिलाल शम्स :- मुझे कोई खबर नही इसमे क्या है ? . आका ए तबरेज़ी के पास एक मुअज़ाज़ मेहमान तशरीफ़ लाए है ये डब्बा उनका ही है और वो फरमाते है कि इसके अंदर जो कुछ भी है इसकी मालियत एक कागज पर लिखवा कर लाए ..

ज़ोहरी ने एहतियात से डब्बे का ढक्कन खोला और हैरत से इसके आखें फेल गयी .. डब्बा उपर तक सोने और जवाहिर से भरा था .. तेज़ रोशनी इन जवाहिर पर पड़ी तो ये चमकने लगे ..

ज़ोहरी :- खुदा की पनाह .. इन की क़ीमत का में क्या अंदाज़ा लगाऊ .. मेरा ख़याल है कि हज़रत शहेंशाह के जवाहर खाने मे भी ऐसे नादिर और नायाब पत्थर ना होंगे बहर हाल इनकी क़ीमत का सरसरी अंदाज़ा कयि लाख रुपये के लग भग होगा ..

ये डब्बा बजाये खुद ख़ासी क़ीमत का है और में देखता हूँ बे हद पुराना भी , ताहम इसे बादू हिफ़ाज़त से अब तक रखा गया है ..

ज़ोहरी एक एक हीरा उठाता और दीवाना वर उछालता और इसकी तारीफ़ करता , ज़ोहरी को इसतरह नाचता देख कर बिलाल शम्स ने धीरे से कहा

बिलाल शम्स :- मुझे वापिस भी जाना है क्या आप इनकी मालियत तहरीर कर के देंगे
ज़ोहरी :- क्यू नही अभी देता हूँ

ज़ोहरी ने अपनी तिजोरी खोल कर उसमे से खास कगाज़ निकाला और ज़रा सी देर मे हिसाब किताब कर के बिलाल शम्स के हवाले किया ..

बिलाल शम्स ने बड़े अहतियात से सारे ज़र ओ जवाहिर वापिस उस डब्बे मे डाला और उसे अपने कोट की जेब मे रखा और सलाम कर के रुखसत होने लगा तो ज़ोहरी ने कहा ..

ज़ोह्रि :- देखो मियाँ अगर इस माल को बेचने का इरादा हो , तो सीधे यहाँ आना , इनका दम थोड़ा बढ़ सकता है , में तुम्हे दूसरो से ज़ियादा दाम दूँगा इन का ..

बिलाल शम्स :- जनाब अभी तक इसके बारे में सोचा नही है क्यू कि इनका मालिक वो मेहमान है सो अब मे चलता हूँ शुक्रिया..

बिलाल शम्स वहाँ से रुखसत होने के बाद वापिस हवेली मे आया तो देखा कि तबरेज़ी और सूबेदार उसके कमरे मे बैठे कुछ बात कर रहे है ..वो वहाँ गया और बड़े अदब से वो डब्बा सूबेदार को दिया और फिर वो कगाज़ भी दिया जिसपे इनकी मालियत लिखी थी .. सूबेदार ने बे परवाही से वो डब्बा एक तरफ रखा.. फिर कगाज़ की तरफ निगाह डाली और वो कगाज़ तबरेज़ी की तरफ बढ़ाया .. तबरेज़ी ने इसे पढ़ा , इसके चेहरे पर ख़ौफ़ के फेले हुए आसार के साथ साथ अब हैरत के आसार भी शामिल हो गये …

बिलाल शम्स ने वहाँ से रुखसत लेना चाहा मगर तबरेज़ी ने उसे वही रुकने का हुकुम दिया , ज़ाहिर है इस ब ऐत्माद नौजवान से कोई बात च्छुपाई नही जा सकती थी , वो एक जानिब जा के खड़ा हो गया ..

तबरेज़ी :- जनाब ए वाला आप ने अभी तक ये नही बताया कि आप इस खादिम ( नौकर ) के ग़रीब खाने तक आने की असल वजह क्या है .. ज़ाहिर है ज़र ओ जवाहर का दाम मालूम करवाने तो नही आएँगे आप ..

सूबेदार :- बेशक मेरे आने की एक खास वजह है ..

बिलाल शम्स उसे देख रहा था कि वो बगैर पलकें झपकाए तबरेज़ी से बात कर रहा था और उस मे अजीब ताक़त थी .. बिलाल शम्स को ऐसा लग रहा था कि उसको देखने की वजह से वो कमज़ोर पड़ रहा है , तबरेज़ी ने कहा
तबरेज़ी :- बयान फरमाइए मे सुन रहा हूँ ..

सूबेदार :- सुनो ! कोई चार माह पहले का जिकर है तुम हमारे जागीर जलालाबाद के क़रीब से गुज़रे थे … पता नही तुम हमारे क़स्बे के अंदर दाखिल नही हुए वरना हमारे आदमी तुम्हे फ़ौरन हम से मिला देते … हम ने तुम्हारी तारीफ सुनी है तुम बहुत अच्छे मुस्सववर ( पेंटर ) हो .. खेर तुम्हारा क़ाफला क़स्बे के बाहर ही रुक गया था.. एक ख़ास वजह के बाइस हम तुमसे मिलने आ ना सके .. तुम नमाज़ पढ़ने के लिए वही पे एक वीरान पड़े मस्जिद मे गये थे .. में ने वही तुम्हे देखा था और तुम्हारी भांजी फ़ातिमा .. हम ने फ़ातिमा को देखा और पसंद कर लिया .. वो हुस्न ओ जमाल मे यकता है और इस क़ाबिल है कि किसी बड़े घर मे बियाही जाए , अगरचे हम बड़े जागीरदार नही लेकिन तुम देखते हो कि हमारे पास बादशाहो से कही गुना ज़ियादा माल ओ दौलत है , अगर तुम फ़ातिमा को हमारे निकाह मे दे दो तो वो हर तरह से खुस रहेगी .. फ़ातिमा का निकाह तुम कब तक मेरे साथ कर सकोगे … मे पुख़्ता वादा चाहता हूँ और इस सिलसिले मे कोई ताकीर या टाल मटोल पसंद नही करूँगा ..

आका ए तबरेज़ी पर इस तक़रीर और बे जा मुतबल पर जो गुज़री सो गुज़री , नौजवान मुस्सवर ( पेंटर ) बिलाल शम्स का मारे गुस्से के बुरा हाल हो गया .. इस का बस चलता तो वो उस खबीस और बदसूरत बूढ़े सूबेदार का सर पाश पाश कर देता .. क्या वो पत्थर के चन्द चमकदार टुकड़ों के बदले फ़ातिमा को खरीदना चाहता है ऐसा कभी नही हो सकता .. हर गिज़ नही हो सकता .. इस का चेहरा लाल हो गया था जैसे बदन का सारा खून खींच कर चेहरे और आँखों मे सिमट आया हो ..
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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Postby Jemsbond » 08 Jan 2017 21:10

वो समझ रहा था कि अब अक़ा ए तबरेज़ी के सबर की इंतिहा हो चुकी होगी.. जलालाबाद के इस एहमाक़ सूबेदार को इसकी मौत ही यहाँ खींच लाई है .. किस गुस्ताख़ी और बे बाकी से फ़ातिमा का सौदा कर रहा है … कोई भी गैरत मन्द आदमी इसे बर्दाश्त नही कर सकता .. लेकिन इस ने देखा कि आका ए तबरेज़ी इसी तरह बे हिज़ ओ हरकत बैठा रहा .. इसके मूँह से मुख़ालफ़त या इनकार का एक भी अल्फ़ाज़ ना निकल सका .. अलबत्ता इस के चेहरे पेर फेली हुई हैरत के आसार अब और भी गहरे हो गये थे .. खुद इसे भी सूबेदार जलालबद से इस क़िस्म के मुतबल की तवक्को ना थी

अलबत्ता इस के चेहरे पेर फेली हुई हैरत के आसार अब और भी गहरे हो गये थे .. खुद इसे भी सूबेदार जलालबद से इस क़िस्म के मुतबल की तव्क़्क़ो ना थी .. आख़िर इस ने हद ओ दरजाह निदमत और इन्किसार अमीज़ लहजे मे कहना शुरू किया

तबरेज़ी :- आली जां मे ने आप का इरशाद सुन लिया .. मेरी ये खुश क़िस्मती है कि आप का इंतिखाब मेरी भांजी फ़ातिमा है .. यक़ीनन इसे आप से बेहतर शौहर नही मिल सकता अफार मेरे एख्तियार मे हों तो मे अभी इसी वक़्त हां कर देता , लेकिन आप जानते है कि मे ने आज तक फ़ातिमा पर अपनी राय या मर्ज़ी मुसल्लत नही की , हमेशा इसे अपने मामलात मे आज़ादी से सोचने और अमल करने की इजाज़द दी है और ये तो इसकी ज़िंदगी का सब से अहम मामला है इस से मशवरा किए बघेर मे कोई वादा कैसे कर सकता हूँ ..

ये सुन कर सूबेदार को बहुत गुस्सा आया , आँखें गुस्से की वजह से और भी लाल हो गयी , इसने गर्राया तो इसकी आवाज़ हवेली की देवारों से टकरा टकरा कर गूँज रही थी जैसे सैकड़ों बद रूहें चिल्ला रही हो

सूबेदार :-बहाने बनाने की कोशिश मत कर तबरेज़ी .. मे सब समझता हूँ तुम्हारी इन चाल बाज़ियों को .. तुम ही उसके सरपरस्त हो .. बोलो क्या मे ग़लत कह रहा हूँ .. अगर तुम चाहो तो सब कुछ मुमकिन है .. फ़ातिमा को तुम्हारे हुकुम ना मानने की मज़ाल ही नही है और मुझे फ़ातिमा पसंद आ गयी है तो मे उसे हासिल कर के रहूँगा ..

तबरेज़ी :- मुझे इस रिश्ते से कोई इनकार नही है .. मे तो इस मौके मे सिर्फ़ फ़ातिमा की रज़ा मंदी हासिल करने की कर रहा था .. आप दौलत के ज़रिए फ़ातिमा को सारी खुशियों देंगे लेकिन रिश्ते नाते करने मे सिर्फ़ दौलत ही तो नही देखी जाती , हस्ब नस्ब भी कोई चीज़ है और हम इस मामले मे काफ़ी सख़्त है .. मुझे अभी तक आप के हस्ब नस्ब के बारे मे कुछ भी जानने का मौक़ा नही मिला ..

सूबेदार मुस्कुराया और अपने सियाह लबादे ( लोंग कोट ) के अंदर हाथ डाल कर पुराने कगाज़ निकाले और तबरेज़ी की तरफ फेंक कर कहा

सूबेदार :- मुझे पता था तुम यही सवाल करोगे , इसलिए अपने शजरे ( फॅमिली बॅकग्राउंड ) के कागजात साथ ही ले आया..

तबरेज़ी ने झुक कर वो कागज उठाए और एक नज़र देखने लगा और कुछ सोचने लगा उसे इतमीनान हो गया और वो कागज वापिस देते हुए कहा

तबरेज़ी :- मुझे इतमीनान हो गया है आली जहाँ कि आप बहुत आला हस्ब नस्ब के मालिक है ..

तबरेज़ी आगे कुछ बोलने ही वाला था कि सूबेदार ने कहा

सूबेदार :- बस तो फिर ताकीर ना करो

और अपने लबादे ( लोंग कोट ) की जेब से एक और कगाज़ निकाला और तबरेज़ी को दिया और कहा

सूबेदार :-ये हमारे और तुम्हारे दरमियाँ एक मुआहिदा ( डील) है जिस के तेहेत मे अपना ज़र ओ जवाहर से भरा हुआ ये डब्बा तुम्हारे पास छोड़ के जा रहा हूँ .. इसकी उसूली की रसीद मुझे दो और कागज पे लिखो कि फ़ातिमा की शादी मुझसे कर दो गे .. मे ज़्यादा धूम धड़ाका पसंद नही करता … ये काम बिल्कुल खामोशी से होना चाहिए … अब फ़ौरन इस पर दस्तख़त कर के मेरे हवाले करो ..

तबरेज़ी :- मगर .. हुज़ूर .. इतनी जल्दी .. मुझे कुछ गौर करने का मौक़ा तो दीजिए ..

सूबेदार ने ये सुन कर क़हक़हा लगा कर कहा

शूबेदर :- मौक़ा ! में ने हर तरह तुम्हारी तस्सली कर दी है और तुम हो कि बराबर बहाने बना रहे हो .. जल्द दस्तख़त करो .. मेरा ख़याल है एक दिन की मुहलत काफ़ी होगी ..

उसने फिर अपने लबादे ( लोंग कोट ) मे हाथ डाल कर क़लम निकाला और कहा

सूबेदार :- अगर तुम्हारे पास क़लम नही है तो ये लो मेरे पास है ..

तबरेज़ी ने क़लम सियाही मे डाला और काँपते हाथों से दस्तख़त किया …

सूबेदार :- इधर आओ नौजवान तुम भी बतौर ए गवाह दस्तख़त करो..

एक खरीदे हुए गुलाम की तरह बिलाल शम्स ने भी उस कागज पर दस्तख़त किए जिसके तहत सिर्फ़ एक दिन बाद जलालाबाद का सूबेदार हमेशा के लिए फ़ातिमा का मालिक बन जाने का हक़ रखता था ..दस्तख़त होते ही इस ने मुअहिदे का कागज लप्पेट कर अपने लबादे (लोंग कोट) की जेब मे रख लिया और दरवाज़े के क़रीब जाते ही बोला

सूबेदार :- तबरेज़ी मे कल रात ठीक 9 बजे तुम्हारे मकान पर पहुँच जाउन्गा और ये कहने की ज़रूरत नही कि हमारे दरमियाँ जो तहरीरी मुआहिदा हुआ है , तुम हर तरह इसकी पाबंदी करोगे ..

ये कहते ही रुखसती सलाम और मूसहफ़ा ( हाथ मिलाना ) के बगैर वो दरवाज़े से बाहर निकल गया .. बिलाल शम्स लपक कर गली की जानिब खुलने वाली खिड़की मे जा खड़ा हुआ .. गली सुनसान पड़ी थी और इसे पूरा यक़ीन था कि अब वो उस सूबेदार को इस रास्ते से जाते हुए ज़रूर देखेगा मगर वक़्त गुज़रने लगा सूबेदार गली मे दाखिल ही नही हुआ .. ना वो हवेली के मेन दरवाज़े से बाहर गया .. बल्कि वो तो हवेली के किसी दरवाज़े से बाहर जाते हुए नही दिखे ..

गली सुनसान पड़ी थी और इसे पूरा यक़ीन था कि अब वो उस सूबेदार को इस रास्ते से जाते हुए ज़रूर देखेगा मगर वक़्त गुज़रने लगा सूबेदार गली मे दाखिल ही ना हुआ .. ना वो हवेली के मेन दरवाज़े से बाहर गया .. बल्कि वो तो हवेली के किसी दरवाज़े से बाहर जाते हुए नही दिखे ..

ये एक ऐसी दहशत अंगेज़ दर्याफ़्त थी , जिस ने नौजवान मुसावार ( पेंटर ) को हिला के रख दिया था .. वो सोचने लगा ये सूबेदार कॉन है ? कही इंसान की शकल मे कोई भूत , प्रेत या कोई जिन तो नही ? फिर उसने अपने आका को देखा जो गुम सूम अपनी जगह खड़े थे .. बिलाल शम्स को वापिस आते देख कर उसने ठंडी सांस भर कर कहा
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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