पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Jemsbond
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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Postby Jemsbond » 08 Jan 2017 21:36

तबरेज़ी :- मुझे तो लगता है ये शख्स सनकी है .. यही जलाल आबाद का सूबेदार … लेकिन इसमे कोई शक नही कि आदमी दौलत मंद और खानदानी है … में हैरान हूँ कि इसने फ़ातिमा को कैसे देखा ? वाक़ई 4 माह पहले मे हज़रत ख्वाजा मुईन उद्दीन के रोज़े की ज़ियारत के लिए गया था और फ़ातिमा मेरे साथ थी .. मुझे याद नही आ रहा कि जलालाबाद नाम की कोई जागीर भी आई थी , लेकिन वो तो यहाँ से ख़ासी दूर है .. क्या ख़याल है तुम्हारा बिलाल … फ़ातिमा की शादी ऐसे आदमी से ठीक रहेगी ..

काश ! काश ! आका ए तबरेज़ी को इन दोनो की मुहब्बत के बारे मे पता होता , तब वो ये सवाल बिलाल शम्स से ना करते .. नौजवान ने बड़ी मुश्किल से अपने आँसू रोक रखे थे , लेकिन इस बर्दाश्त के बावजूद इस के दिल दिल की गहराइयों से एक सर्द आह निकल ही गयी …वो लड़खड़ाया और अगर तबरेज़ी आगे बढ़ कर इसे ना संभालते तो वो औंधे मूँह फर्श पर गिर जाते ..

तबरेज़ी और भी परेशान हो गये और पूछे

तबरेज़ी :- तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना ?? तुम ने आज खाना भी नही खाया ..

बिलाल शम्स ने खुद को संभाल कर कहा

बिलाल शम्स :- मुझे आज भूक लगी ही नही जनाब .. बस वैसे ही एक चक्कर आ गया था .. अब आप अपने महल मे तशरीफ़ ले जाए और मुझे इजाज़त दें .. एक ज़रूरी काम से मुझे बाहर जाना है मे रात को शायद वापस ना आ सकूँगा .. बाबा अफ़ज़ल बैग से कह दीजिएगा मेरा इंतज़ार ना करें …

वो डरता था कहीं इस की और फ़ातिमा की मुहब्बत का राज़ फ़ाश ना हो जाए .. यक़ीनन जज़्बात के हाथों मजबूर हो कर वो कोई ऐसी हरकत कर बैठेगा जिस से ये राज़ खुल सकता था .. लिहाज़ा हवेली से चले जाना ही मुनासिब था …

तबरेज़ी हीरों और जवाहीरों से भरा वो डिब्बा साथ लिए और फ़ातिमा के सोने के कमरे मे गया .. इसे पूरा भरोसा था कि फ़ातिमा इसकी बात नही टालेगी .. तबरेज़ी ने फ़ातिमा से कहा

तबरेज़ी :- फ़ातिमा बेटी कैसी हो ??? तबीयत खराब लग रही है तुम्हारी ..

फ़ातिमा :- अब तो ठीक हूँ मामू जान .. आप कल अपने उस तबीब ( डॉक्टर ) दोस्त को बुलवा लीजिए जिसने पहले भी मेरा इलाज किया था .. कल से मेरा जी घबरा रहा है और कलेजा बैठा जाता है .. सर मे चक्कर आते हैं और अजीब तरह के डरावने खवाब नज़र आने लगे हैं ..

तबरेज़ी ने उसके सर पे हाथ फेरते हुए कहा

तबरेज़ी :- अच्छा ! किसी ने मुझसे ज़िक्र नही किया इस बारे मे … खेर तबीब (डॉक्टर) भी कल आ जाएगा .. अब तुम एक खुशख़बरी सुनो … बेटी तुम्हे पता है ना तुम मुझे दुनिया की हर चीज़ से ज़ियादा अज़ीज़ और प्यारी हो … में ने तुम्हारे लिए एक ऐसा आदमी चुना है जो तुम्हे पसंद करता है और मुझे यक़ीन है वो तुम्हे हमेशा खुश रखेगा .. इसके पास माल ओ दौलत की भी कोई कमी नही … आज वो मेरे पास आया था … ये देखो … तुम्हारे लिए वो कितने क़ीमती हीरे और कैसे उम्दा ज़ेवर लाया है … वो जलाल आबाद का सूबेदार है बेटी …मे उसकी शख्सियत से बहुत मुतसिर हुआ हूँ …

ये कह कर उस ने वो डिब्बा खोल कर हीरे दिखाने लगा , मगर फ़ातिमा ने नज़र उठा कर एक मर्तबा भी इस डब्बे की तरफ ना देखा , बल्कि एक दम इसने दोनो हाथों से अपना चेहरा ढांप लिया और बुरी तरह रोने लगी … ये तो इस ने कभी सोचा भी ना था कि इस तरह इस के जज़्बात कुचल दिए जाएँगे और यू दौलत के बदले उसके जिस्म ओ जान का सौदा होगा. तबरेज़ी ने ये देख कर कहा …

तबरेज़ी :- में ने ये सब कुछ तुम्हारे शानदार मुस्ताक़बिल के लिए किया है बेटी …कही ना कही आख़िर तुम्हारी शादी तो करनी ही थी और मे समझता हूँ ऐसा शौहर तुम्हे ना मिलता … वो तुम्हे बहुत पसंद करता है और मे ने इस भरोसे पर कि तुम अपने मामू तबरेज़ी को ज़लील होते देखना ना चाहोगी , हां कर दी … अब वो कल शाम 9 बजे आएगा , इसी वक़्त तुम्हारा निकाह होगा और फिर तुम रुखसत हो जाओगी …

फ़ातिमा ने कोई जवाब ना दिया .. जवाब देने का मौक़ा था भी कहाँ .. सब कुछ तो तबरेज़ी ने कह दिया था .. उसके हसीन ख्वाब चिकना चूर हो चुके थे … बिलाल शम्स से जो इसकी शादी नही हो रही थी .. वो ग़रीब था जो शायद एक नया जोड़ा भी फ़ातिमा को खरीद कर नही दे सकता था … मगर फ़ातिमा को तो कुछ नही चाहिए उसके प्यार के सिवा … और फ़ातिमा को ना ज़ेवर … हीरे … जवाहिरात और किसी सूबेदार मे दिल चस्पी थी … तबरेज़ी ने इसकी आरज़ुओं , उम्मीदों और ख्वाहिशों का ग़लत अंदाज़ा किया था ..

अगले रोज़ भी तबरेज़ी ने वक़्त का बड़ा हिस्सा फ़ातिमा को समझाने और मुस्ताक़बिल की रोशन तस्वीर दिखाने मे लगाया .. फ़ातिमा ने इस दौरान एक लफ्ज़ भी मुँह से ना निकाला और ना कुछ खाया पिया था .. एक दिन मे उस के चेहरे का रंग रूप सब गायब हो गया था …

दोपहर को बिलाल शम्स हवेली मे दाखिल हुआ … उसे देख कर लग रहा था कि वो बहुत रोया है सारी रात और सोया भी नही है उसके चेहरे पे आँसुओं के निशान बन गये थे .. बाल बिखरे हुए थे और कपड़े भी मेले और गंदे … ये देख कर तबरेज़ी को बड़ा झटका लगा और आगे बढ़ कर उसने बिलाल शम्स का हाथ पकड़ा .. तो उसे पता चला कि बिलाल शम्स का बदन आग की तरह गरम है .. तबरेज़ी ने चिल्ला कर कहा

तबरेज़ी :- तुम्हे तो बहुत तेज़ बुखार है बिलाल .. मे अभी तबीब (डॉक्टर) को बुलाता हूँ .. दो दिन से फ़ातिमा की भी तबीयत ठीक नही है कहती है सर चकराता है ..

नौजवान ने रुक रुक कर और निहायत अदब से इल्तिजा (रिक्वेस्ट) किया ..

बिलाल शम्स :- आप बराह ए करम मेरे लिए तबीब को बुलाने की ज़हमत ना करें.. में इस क़िस्म की बीमारियों का आदि हूँ , अलबत्ता आप से ये दरख़्वास्त कर सकता हूँ कि फिलहाल आप फ़ातिमा के लिए भी तबीब को ना बुलाए … आप सूबेदार के साथ किए हुए वादे की तैयारी करें … अगर तबीब की वजह से इसमे ज़ियादा वक़्त लगा तो सूबेदार नाराज़ हो जाएगा …

तबरेज़ी ने खुश होते हुए कहा

तबरेज़ी :- सच कहते हो .. सच कहते हो .. अभी तुम अपनी निगरानी मे हवेली की सफाई वाघेरा करवा दो , नौकर आते ही होंगे .. इसके बाद बड़े कमरे में मुअज़्ज़ाज़ मेहमानों के बैठने का इंतज़ाम करो … रात के खाने पर तुम भी हमारे साथ शिरकत करोगे … बाहर से किसी को बुलाने का मेरा कोई इरादा नही है …

नौजवान ने अपने उस्ताद के हुकुम पर प्युरे हवेली को आईने की तरह चमका दिया और बड़े कमरे मे नया क़ालीन बिछा दिया गया और एक तरफ शानदार सोफा दूल्हे के लिए बनाया गया .. शाही रकब्दारों ( शेफ़ ) से कयि खाने पकवाए गये और इन्हें मुअज़्ज़ाज़ मेहमान के आने से पहले ही रुखसत कर दिया गया …

9 बजने मे अभी चन्द ही मिनट्स बाक़ी थे … हवेली मे इस वक़्त निकाह करने वाला क़ाज़ी , इसके दो शागिर्द , तबरेज़ी , बाबा अफ़ज़ल बैग और बिलाल शम्स के सिवा कोई ना था .. क़ाज़ी से तय क्या जा चुका था कि निकाह का रसम होते ही वो तशरीफ़ ले जा सकते हैं ..

जैसे ही 9 बज गये तो हवेली पर एक हैबत नाक सुकूत तरी हुआ .. हवेली मे मौजूद हर एक शख्स के दिल मे ख़ौफ़ छा गया था .. तभी बेरूनी दरवाज़े के खुलने की आवाज़ आई और दोनो भारी दरवाज़े गड़गड़ाहट के साथ अलग होने की आवाज़ आई और फिर सहेन मे क़दमों की आवाज़ आई … फिर कमरे मे सूबेदार जलालाबाद अपनी सारी आन बान लिए दाखिल हुआ … हस्ब ए मामूल उसका लिबास सर से लेकर पाओं तक काला , हाथों पर चढ़े हुए दस्ताने , जूते और जुर्राबे भी काली .. जो छड़ी इसके दाए हाथ मे थी वो भी काली …

तबरेज़ी लपक कर इसके इस्तिक़्बाल को आगे बढ़ा और उसको उसकी जगह पर बिठाया .. सूबेदार ने जूते उतारने तक की भी ज़हमत ना की .. हिकारत की नज़र से इधर उधर देखा और भारी आवाज़ मे कहा

सूबेदार :- तबरेज़ी मेरे पास ज़ियादा वक़्त नही है फ़ौरन निकाह की रसम अदा होनी चाहिए …

तबरेज़ी :- बहुत बेहतर जनाब .. सब लोग हाज़िर है …

उस ने बिलाल शम्स को इशारा किया … वो दूसरे कमरे से निकाह ख्वान और उसके दो शागीर्दों को बुला लाया.. इन्हों ने आते ही मुअज़्ज़ाज़ मेहमान को सलाम किया .. क़ाज़ी ने निकाह का रसम शुरू किया , एक लाख अशरफ़ी महर के बदले फ़ातिमा का निकाह सूबेदार के साथ हो गया ..इस तमाम अरसे मे एक बार भी सूबेदार ने पलक नही झपकाई .. ऐसा लग रहा था जैसे इसकी पलकें मसनुई ( फेक ) है और इनमे झपकने की हिस्स नही है ..

एक पुर इसरार सी हैबत तमाम हाज़िरीन पर छाइ हुई थी .. निकाह की रसम ख़तम होते ही सूबेदार ने अपनी जेब मे हाथ डाला और कुछ अशरफियाँ निकाल के क़ाज़ी की तरफ फेंक दी .. एक बार फिर एख़लाक़ और अदब के मर्हले तय हुए और क़ाज़ी साहब अपने शागीर्दों को ले कर रुखसत हो गया… सूबेदार ने कहा

सूबेदार :- तबरेज़ी दुल्हन रुखसती के लिए तैयार है ???

तबरेज़ी :- जी आली जां … लेकिन आप खाना तो खा लीजिए ..

सूबेदार :- नही … हमें बहुत जल्दी हैं .. तुम जानते हो जलालाबाद यहाँ से ख़ासी दूर है और रास्ते मे डाकुओं , लुटेरों का ख़तरा भी है , इसलिए हम ज़्यादा देर पसंद नही करेंगे .. हवेली से बाहर हमारी घोड़ा गाड़ी है … फ़ौरन दुल्हन को हमारे साथ कर दो ..


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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Postby Jemsbond » 08 Jan 2017 22:30

अब यहाँ से शुरू होता है इस दास्तान का वो हिस्सा है जो बिलाल शम्स ने खुद मेरे दादा को सुनाया था कि कैसे वो अपनी मुहब्बत को वापिस हासिल करने के लिए गया …

फ़ातिमा और सूबेदार की शादी से बिलाल शम्स की दुनिया वीरान हो गयी , आफ्रीन है इसके सबर पर कि इसने एक लफ्ज़ भी मुँह से शिकायत का ना निकाला …तबरेज़ी फिर भी अपने रोज़ मर्राह की मसरूफ़ियत मे गुम हो गया … इसे अहसास ना था कि बिलाल शम्स के दिल ओ दिमाग़ पर क्या बीत रही है .. और वो एक ऐसी आग मे जल रहा है जो इस की मौत के साथ ही ठंडी हो सकेगी ……

बिलाल शम्स ने अपने आप को मुस्सवीरी ( पैंटिंग ) के फन मे डुबो देने की कोशिश की .. वो 16 16 और 20 20 घंटे अपने तस्वीर खाने मे मसरूफ़ रहने लगा .. इसकी हालत रोज़ बार रोज बिगड़ती जा रही थी मगर इसे होश तक ना था .. हवेली का बूढ़ा चोकीदार अफ़ज़ल बैग इसे कभी कबार समझाता बुझाता , लेकिन बे फ़ायदा .. बिलाल शम्स पर अब किसी नसीहत का असर नही हो रहा था .. इसकी जान चिराग की तरह आहिस्ता आहिस्ता बुझती जा रही थी ..

वक़्त अपनी रफ़्तार से गुज़रने लगा … एक महीना … दो महीने .. तीन महीने … इस तमाम अरसे मे फ़ातिमा की कोई खबर तक ना आई और ना ही इसके शौहर ने तबरेज़ी के नाम कोई खत भेजा ..तबरेज़ी ने बहुत खत भेजे मगर कोई जवाब ना आया ..

आख़िरकार तबरेज़ी ने सोचा कि जलालाबाद जा के उससे मिल लिया जाए और फिर बिलाल शम्स को ले के जलालाबाद की तरफ रवाना हुआ , लोगों से पूछ पूछ कर तबरेज़ी और बिलाल शम्स जलालाबाद के नॉवा ( सरहदी इलाक़ा ) पहुँचे मगर इस वक़्त रात हो चुकी थी वो एक घर के बाहर खड़े थे …

क़रीब ही शानदार नसल के दो घोड़े बँधे हुए थे.. और थोड़ी दूर घोड़ा गाड़ी की बघि खड़ी थी .. जिसे देख कर तबरेज़ी फ़ौरन पहचान गया कि ये वोही घोड़े और गाड़ी है जो जलालाबाद का वो पुरीसरार सूबेदार रात के 9 बजे अपने साथ लाया था और इसी मे वो फ़ातिमा को बिठा कर ले गया था ..

दोनो ने अपनी अपनी तलवारें निकाली .. इनका ख़याल था कि शायद यहाँ सूबेदार क आदमी हो और कोई फितना फेसाद बरपा करें .. मगर चन्द लम्हे बाद 70या 80 साल का एक बूढ़ा मकान के अंदर से बाहर आया और इन्हें देख कर कहने लगा

बूढ़ा :- आप कॉन है और क्या चाहते है ??

तबरेज़ी :- मुझे सूबेदार जलालाबाद से मिलना है … बड़े मियाँ क्या आप इन का पता बता सकते है ??

बूढ़ा :- सूबेदार जलालाबाद …?? में नही जानता वो कॉन है और कहाँ रहता है

ये सुन कर तबरेज़ी को गुस्सा आया और उसने चिल्ला कर कहा

तबरेज़ी :- तुम झूठ बोल रहे हो …क्या ये घोड़े और गाड़ी उसी की नही है ??

बूढ़ा :- जनाब ! आप इतमीनान से मेरी बात सुनें , तो अर्ज़ करू … बारह ए करम अपनी ये तलवारें मियान मे डालें मेरा कोई इरादा आप के साथ जंग करने का नही है .. आइए कमरे मे तशरीफ़ लाइए ..

वो इन्हें एक सॉफ कमरे मे ले गया , जहाँ एक तरफ बिस्तर पड़े हुए थे और एक तरफ कुर्सियाँ रखी हुई थी , उसने बिस्तर पर बैठते हुए कहा

बूढ़ा :- इन घोड़ों और बग्घी की दास्तान भी अजीब है जनाब ..

तबरेज़ी और बिलाल शम्स भी कुर्सियों पर बैठ गये , बूढ़े ने आगे बोलना शुरू किया

तबरेज़ी और बिलाल शम्स भी कुर्सियों पर बैठ गये , बूढ़े ने आगे बोलना शुरू किया

बूढ़ा :- मेरा नाम ज़ेघाम है और मे इस इलाक़े मे 50 साल से आबाद हूँ .. ऐसा अजीब ओ ग़रीब वाकिया मुझे पहले कभी पेश नही आया .. ये कोई एक साल पहले की बात है .. सूरज घुरूब हो चुका था .. मेरे बेटे और पोते एक तक़रीब मे गये हुए थे और मे यहाँ तन्हा था ..इस इलाक़े मे सूरज घुरूब होने का मंज़र बहुत हसीन होता है और मे इसे बड़े शौक़ से देखने का आदि रहा हूँ , तो मे टहलते टहलते अपने मकान से ज़रा दूर इस सड़क पर निकल आया जो सीधा जलालाबाद की आबादियों की तरफ जाता है …

अभी मे सूरज को डूबते हुए देखने मे खोया ही था कि मुझे इस रास्ते से आते हुए एक शानदार घोड़ों की गाड़ी दिखी .. देखते देखते गाड़ी मेरे क़रीब आ कर रुकी .. घोड़े पसीने से नहा रहे थे पता चल रहा था कि बहुत दूर से आ रहे है .. और घोड़ा गाड़ी मे काला लिबास पहने , हाथों मे लंबा सा चाबुक थामे एक मज़बूत जिस्म का आदमी था …वो छलान्ग लगा कर नीचे उतरा .. पहले उसने दोनो घोड़ों की गर्दनों पर हाथ फेरा .. में ने देखा घोड़े ना मालूम दहशत से काँप रहे थे .. और फिर इस आदमी ने हाथ गाड़ी के अंदर बढ़ाया और एक हसीन ओ जमील लड़की को सहारा देकर बाहर निकाला … में ने ऐसी खूबसूरत औरत ज़िंदगी मे पहले कभी नही देखी .. वो शादी के कपड़ों मे थी , लेकिन ये देख कर मुझे बहुत हैरानी हुई कि वो ज़ार ओ क़तर रो रही थी

तबरेज़ी की आँखों से आँसू गिरने लगे और उसकी ज़बान से ये अल्फ़ाज़ निकले

तबरेज़ी :- फ़ातिमा … मेरी फ़ातिमा … मुझे मुआफ़ करना फ़ातिमा में ने तुम पर बहुत बड़ा ज़ुल्म किया

बूढ़े ज़ेघाम ने पूछा

ज़ेघाम :- क्या वो लड़की तुम्हारी कोई अज़ीज़ा या बेटी थी ??

तबरेज़ी ने गम से निढाल होते हुए कहा

तबरेज़ी :- हां वो मेरी हक़ीक़ी भांजी है .. में उसी की तलाश मे मारा मारा फिर रहा हूँ .. जिसको तुम ने उसके साथ देखा वो खुद को जलालाबाद का सूबेदार बता रहा था और मे ने अपनी भांजी की शादी उसके साथ करदी … खेर तुम आगे सूनाओ ..
ज़ेघाम :- लड़की उसके पंजे से आज़ाद होने के लिए हाथ पाओं मार रही थी और उसके रोने की आवाज़ मज़ीद बुलंद हो गयी .. मुझसे रहा ना गया .. मे ने आवाज़ दे कर कहा .. “ कॉन हो तुम और इस बेचारी से ऐसा सुलूक क्यू कर रहे हो “ जवाब मे उस शख्स ने इस ज़ोर से थप्पढ़ मारा कि मे ज़मीन पर गिरा और फिर मुझे अपने तन बदन का कुछ होश ना रहा … आँखें खुली तो मे अभी तक उसी जगह पड़ा था .. आसमान पर तारे झिलमिला रहे थे .. मे ने गेर्दन उठा कर दाए बाए देखा .. आप मेरी हैरत का अंदाज़ा नही लगा सकते जब मे ने घोड़ा गाड़ी को उसी जगह खड़ा पाया … खुदा जाने वो पुरीसरार शख्स उस लड़की को लेकर कहाँ गायब हो गया था .. उसके थप्पढ़ से मेरे गर्दन और जबड़े बुरी तरह से दुख रहे थे .. क़िस्सा मुख्तसर मे उठ कर गाड़ी के पास गया और अंदर देखा तो पाया अंदर कोई ना था ..फिर मे घोड़ा गाड़ी को लेकर अपने मकान के पास लाया .. मेरे बेटे और पोते के आने पे में ने सारा क़िस्सा उन्हें बताया तो उन्होने महीनों तक खंडहर और जलालाबाद छान मारा , ना वो पुरीसरार शख्स कही मिला और ना ही वो लड़की ..


इस दास्तान ने तबरेज़ी और बिलाल शम्स दोनो पर अजीब असर डाला .. एक की आँखें तर थी और एक की खुश्क .. एक फ़ातिमा का सब कुछ था और एक कुछ भी नही .. एक का गम ज़हिरी था और एक का अन्द्रुनि .. जब वो वापिस आली शान हवेली मे पहुँचे तो मुर्दों से भी बदतर थे ,,, इस सफ़र मे तबरेज़ी पर ये हक़ीक़त भी ज़ाहिर हुई थी कि बिलाल शम्स के तसवुरात और ख़यालात पर किस की हुक्मरानी है …

केयी महीने गुज़र गये .. तबरेज़ी अपनी भांजी और इस के पूर इसरार शोहर की तलाश आए दिन मारा मारा फिरता , लेकिन कहीं से कोई सुराग ना मिलता … तलाश की हर ऐसी मुहिम ( प्लॅनिंग ) मे बिलाल शम्स इसके साथ होता .. सर्दियों के दिन थे , उस्ताद और शागिर्द दोनो रात के खाने से फारिघ् हो कर आतिश दान के क़रीब गर्दन झुकाए बैठे थे .. तभी सदर ( मेन ) दरवाज़े की जानिब से मुसलसल दस्तक की आवाज़ें सुनाई देने लगी .. वो दोनो चोंक कर एक दूसरे की तरफ तकने लगे .. बूढ़ा चोकीदार जल्दी से दरवाज़े की तरफ दौड़ा .. ये दोनो अभी कमरे से निकल कर हवेली के सहेन मे आ गये ..

दस्तकें बराबर दी जा रही थी .. ज्यों ही छोटा दरवाज़ा खुला , कोई अंदर आया … तबरेज़ी और बिलाल शम्स दोनो की निगाहें एक ही वक़्त मे आने वाले पर पड़ी .. और इन के बदन मे खून की गर्दिश तेज़ हो गयी .. ये फ़ातिमा थी .. इसका लिबास फटा हुआ और चिथड़े से लटका हुआ था .. फूल सा चेहरा कमला गया था , आँखें जर्द और अंदर को धँसी हुई … वो धडाम से फर्श पर गिरी और बेहोश हो गयी …

तबरेज़ी और बिलाल शम्स दोनो बे अख्तियार उसको उठाने के लिए लपके .. इन्हों ने उसे कमरे मे ला कर आतिश दान के पास लिटाया .. फ़ातिमा का जिस्म यख ( ठंडा ) हो रहा था और होंठ नीले पड़ चुके थे .. चन्द लम्हों बाद इस ने होश मे आकर आँखें खोली और कांपति हुई आवाज़ मे बोली …

फ़ातिमा :- पानी .. पानी .. खुदा के लिए मुझे पानी पिलाओ.. प्यास से जान निकली जा रही है ..

उन्हों ने जल्दी से उसे पानी पिलाया .. साँस लिए बगैर ही पूरा प्याला पी गयी .. पता नही कब की प्यासी थी ..

फ़ातिमा :- अब मुझे कुछ खाने को दे दो .. फ़ौरन .. वरना मे मर जाउन्गी …

किचन से इसी वक़्त भुने हुए गोश्त का एक बड़ा सा टुकड़ा लाया गया .. बिलाल शम्स ने इसे काट कर फ़ातिमा को खिलाना चाहा , लेकिन इसमे सबर की इतनी भी ताब ना थी , इसने नवजन के हाथ से झपट कर गोश्त का टुकड़ा छीना और दाँतों से काट काट कर चबाए बगैर निगलने लगी , फिर वो अपने हवास मे आई और इसने पहली बार अपने मामू तबरेज़ी और अपने महबूब बिलाल शम्स का पहचाना , फिर शरम से चेहरा हाथों मे ढांप कर रोने लगी … तबरेज़ी ने कहा ….

तबरेज़ी :- फ़ातिमा बेटी ये क्या हाल है ? और वो तुम्हारा शोहर कहाँ है ?

फ़ातिमा :- वो … वो .. मामू जान .. खुदा के लिए उसका ज़िक्र ना कीजिए .. में बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर आई हूँ .. वो तो नज़ाने कॉन है …

तबरेज़ी :- इस वक़्त वो कहाँ हैं ? में उसे तुम्हे तंग करने का मज़ा चखाउन्गा ..

फ़ातिमा :- आह .. मामू जान देर ना कीजिए .. जल्दी किसी को भेजिए .. यहाँ शहर मे कोई अच्छा सा आमिल ज़रूर होगा .. उसे बुलवा लीजिए , वरना वो मुझे कभी नही छोड़ेगा …

तबरेज़ी :- आमिल का यहाँ क्या काम फ़ातिमा बेटी .. में उस बदमाश से निपटने के लिए अकेला ही बहुत हूँ .. अगर वो ज़ियादा तेज़ी दिखाए गा , तो शाहेंशाह से कह कर उसे सज़ा दिलवा दूँगा ..

फ़ातिमा :- हाए मामू जान .. आप समझते क्यूँ नही ..वो आदमी नही , एक शरीर जिन्न है जिस ने इंसानी इज़म मे आकर ये शैतानी चाल चला रखा है … जल्द किसी आमिल को बुलाए और हां मुझे एक लम्हे के लिए भी अकेला ना छोड़ा जाए .. ये सख्ती से हिदायत करती हूँ .. अगर आप ने मुझे तन्हा छोड़ दिया .. तो वो मुझे फिर पकड़ कर ले जाएगा …
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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Postby Jemsbond » 20 Jan 2017 12:13

तबरेज़ी और बिलाल शम्स हेरत से फ़ातिमा के ये उखड़े उखड़े और बे मानी जुमले सुन रहे थे .. शरीर जिन .. शैतानी चाल … आमिल .. बिलाल शम्स की निगाहों के सामने सूबेदार जलालाबाद का भयानक चेहरा और जिस्म आ रहा था .. बंद दरवाज़े से इस का एक दम आना और गायब होना ..आहट किए बगैर चलना .. फिर इतने क़ीमती हीरे और जवाहरात .. क्या दुनिया मे ऐसा जिन्नाती वुजूद भी मुमकिन है जो हसीन ओ जमील इंसानी लड़कियों से शादी करें , उन्हे अपने साथ ले जाए .. आख़िर क्यूँ ? .. तभी तबरेज़ी ने कहा

तबरेज़ी :- घबराओ नही फ़ातिमा .. अब वो खबीस इस हवेली मे दाखिल होने की जुर्रत नही करेगा … मुझे पहले भी ये शक था कि वो कोई बहुत बड़ा जिन या भूत है .. में अभी अफ़ज़ल बैग को भेजता हूँ .. यहा शहर मे एक बुज़ुर्ग ए अम्लयात ओ तावेज़ात के फन मे आमिल है .. उम्मीद है इन के अमल से जिन का असर ख़तम हो जाए ..

इन्हों ने फ़ातिमा को इस के ख्वाब गाह मे पहुँचाया .. वो इतनी घबराई हुई थी कि तबरेज़ी को इसके पागल हो ने का शक पैदा हो गया … वो बार बार यही कहती कि इसे अकेला बिल्कुल आ छोड़ा जाए .. इन्हों ने झट पट कमरे की सारी लाइट जला दी और हर खिड़की और हर दरवाज़े को अच्छी तरह से बंद कर दिया ..

अभी वो इस करवाई से फारिघ् नही हुए थे कि फ़ातिमा ने निहायत डरी हुई आवाज़ मे जैसे कोई सरगोशी करता है , ये कहा

फ़ातिमा :- खुदा की पनाह .. वो हवेली मे आ गया है .. वो हवेली मे आ गया .. मामू जान इसे रोकें .. वो मुझे लेने आया है … मे इसके साथ हरगिज़ ना जाउन्गी … देखो .. देखो .. वो रहा .. अब वो सहेन से गुज़र कर मामू जान के कमरे मे जा छुपा है ..

इन अल्फ़ाज़ के साथ ही इसके बदन मे थर्थरि छूट गयी , आँखें उबल पड़ी .. होंठो के किनारे झाग से भर गये और वो बे हिज़ ओ हरकत हो गयी ..

बिलाल शम्स ने तबरेज़ी को वही रहने का इशारा किया और खुद तलववर खींच कर बाहर निकला .. उसे यू लगा जैसे एक इंसानी साया सहेन से होता हुआ आका ए तबरेज़ी के कमरे की तरफ चला गया .. बिलाल शम्स दौड़ा , इस ने कमरे का एक एक कौना अच्छी तरह देखा , मगर वहाँ कोई ना था .. अलबत्ता वो ये कहने के लिए तैयार था कि उसने एक इंसान साया को तबरेज़ी के कमरे मे जाते देखा .. दहशत से बिलाल शम्स का बदन काँपने लगा .. ऐसा लगता है जैसे इस अज़ीम उशन हवेली मे किसी जगह कोई नदीदाह वुजूद ज़रूर है और इन की तमाम हरकतों का बखूबी जाइज़ा ले रहा है ,..

बिलाल शम्स ने रुमाल निकाल कर चेहरे पर इस सर्दी मे आया हुआ पसीना पोंच्छा और दुबारा फ़ातिमा की ख्वाब गाह मे आया ..तबरेज़ी ने सवालिया नज़रों से बिलाल शम्स की तरफ देखा .. इस दौरान फ़ातिमा भी होश मे आ चुकी थी और पलक झपकाए बगैर ही बिलाल शम्स की तरफ देख रही थी.. बिलाल शम्स ने कहा

बिलाल शम्स :- जनाब मे ने हवेली का एक एक कोना छान मारा , वहाँ तो कोई नही .. ऐसा मालूम होता है फ़ातिमा बेगम कोई डरावना ख्वाब देख रही थी , शायद ये इसी का असर है ..

फ़ातिमा :- हर गिज़ नही… में ने खुद उसे हवेली मे दाखिल होते देखा है ये ऊँची ऊँची और बड़े बड़े दरवाज़े उसकी राह मे रुकावट नही बन सकते .. में उसे अच्छी तरह जानती हूँ … आह .. अब वो इस कमरे मे आ गया है .. वो देखो .. वो मेरे सामने खड़ा है ..

उस ने बुरी तरह चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया .. तबरेज़ी और बिलाल शम्स दोनो तलवार ले के इधर उधर फिरने लगे .. इन्हें वो पूर इसरार सूबेदार दिखाई तो नही दे रहा था लेकिन उसकी मौजूदगी महसूस कर सकते थे .. फ़ातिमा ने दुबारा कहा

फ़ातिमा :- हाए … इसे बाहर निकालें मामू जान .. में मर जाउन्गा , खुदा के लिए मुझे अकेला ना छोड़ें .. वरना वो मुझे घसीट कर ले जाएगा ..

इसके साथ ही फ़ातिमा ने उठ कर तबरेज़ी का हाथ पकड़ लिया और कहा

फ़ातिमा :- में आपको यहाँ से बाहर जाने नही दूँगा मामू जान .. आप यही रहेंगे .. इसी कमरे में .. वरना याद रखिए आप फिर कभी मेरी सूरत ना देख पाएँगे ..

उन्हों ने बहुत मुश्किल से दुबारा फ़ातिमा को बिस्तर पर लिटाया .. उसकी हालत लम्हा ब लम्हा खराब होती जा रही थी और जिन्नो का असर उरूज़ पर नज़र आ रहा था .. इतने मे एक सफेद पॉश बुज़ुर्ग जिसके चेहरे से नूरानियत नज़र आ रहा था , अफ़ज़ल बैग के साथ अंदर दाखिल हुए .. इन के आते ही फ़ातिमा खामोश हो गयी और कहने लगी ..

फ़ातिमा :- वो भाग गया .. इस कमरे से चला गया .. लेकिन इस हवेली से बाहर जाने का इरादा नही रखता ..

तबरेज़ी और बिलाल शम्स ने बुज़ुर्ग को अदब से सलाम किया .. फिर तबरेज़ी ने मुख्तसर अंदाज़ मे सूबेदार और फ़ातिमा का क़िस्सा बुज़ुर्ग को सुनाया .. इस बुज़ुर्ग का नाम स्येद अकमल बॅनौरी था , आलीमियत मे मुताज़ मक़ाम रखते थे , इन के बारे मे मशहूर था कि इनके चेहरे को देख के ही भूत , प्रेत और शरीर जिन्न भाग जाते है ..

श्येद साहिब ने कुछ पढ़ कर फ़ातिमा पर दम किया , फिर एक तावीज़ देकर कहा कि इसे इसके गले मे डाला जाए .. और इसके लिए इन्हों ने लोहे की चन्द कीलें तलब की .. इन्पे कुछ पढ़ के दम किया और कहा कि इनहें हवेली के चारों ओर ठोक दिया जाए …

जब तक स्येद साहिब वहाँ रहे फ़ातिमा पर सुकून नज़र आई , लेकिन इन के रुखसत होते ही इसने आँखें खोल दी और दुबारा चीखने चिल्लाने लगी .. इतने मे आधी रात होने का ऐलान हुआ .. ऐलान ख़तम होने के साथ ही हवेली मे बेपनाह शोर उठा जैसे आँधी आ गई हो.. दरवाज़े और खिड़कियाँ खुद ही खुलने और बंद होने लगी , तस्वीरें दीवारो से गिर कर टूटने लगी .. बर्तन और फर्निचर आपस मे टकरा रहे थे .. एक एक कर के हवेली क़ी सारी लाइट बुझ गयी .. हवेली मे क़बर की सी तरीकी फेल गई .. इस शोर मे फ़ातिमा के चीखने की आवाज़ बराबर सुनाई दे रही थी ..

फ़ातिमा :- मामू जान … बिलाल शम्स .. जल्द रोशनी करो.. वो अंधेरे मे वार करे गा जल्दी रोशनी करो .. अंधेरा ख़तरनाक है ..

वो दोनो फ़ातिमा के कमरे मे उसके पास बैठे थे दोनो चिराग जलाने के लिए एक ही वक़्त पे उठे .. इनके बाहर जाते ही कमरे से होलनक आवाज़ के साथ फ़ातिमा की ख्वाब गाह का दरवाज़ा आप ही आप बंद हो गया .. फिर इन्हों ने फ़ातिमा की चीखें सुनी .. वो दोनो कमरे की तरफ दौड़े मगर देर हो चुकी थी , ये ख़तरनाक आँधी रुक चुकी थी .. अफ़ज़ल बैग शम्मा दान रोशन कर के लाया .. फ़ातिमा की ख्वाब गाह का दरवाज़ा बंद था .. इन्हों ने इसे खोलने के लिए बहुत ज़ोर लगाया मगर बे सूद .. ऐसा लगता था जैसे कोई नदीदा क़ुआत इस दरवाजे के पीछे है ..

फ़ातिमा के चीखने की आवाज़ मुसलसल इनके कानों मे पिघले हुए लोहे की तरह उतर रहे थे , लेकिन वो दोनो कुछ भी नही कर सकते थे .. फिर इन्हों ने इस कमरे मे वो खिड़की खुलने की आवाज़ सुनी जो गली की तरफ थी ..इस के साथ ही फ़ातिमा की आखरी आवाज़ सुनी .. तबरेज़ी ने चिल्लाकर कहा

तबरेज़ी :- जल्दी करो .. बिलाल शम्स .. उधर जाओ ..वो शायद फ़ातिमा को वहाँ से ले जाने की कोशिश कर रहा है


बिलाल शम्स ये सुन कर दौड़ते हुए जब चक्कर लगा कर उस दरवाज़े के सामने पहुँचा तो देखा खिड़की खुली हुई थी और तेज़ हवा की वजह से अपने आप ही खुल रही थी और बंद हो रही थी और जब वो वापिस अंदर आया और दरवाज़े तोड़ने की कोशिश की तो दरवाज़ा खुद ब खुद खुल गया .. वो दीवानों की तरह कमरे मे दाखिल हुए .. फ़ातिमा का बिस्तर खाली पढ़ा था .. इन्हों ने खिड़की से बाहर झाँका .. मगर गली सुनसान और वीरान पड़ी थी ..

ये वाक़या ऐसा ना था कि छुपा रहता .. बहुत जल्द आग की तरह फ़ातिमा के गायब होने की खबर फेल गयी .. शहेंशाह ने तबरेज़ी को तलब कर के सारा वाक़या सुना और हैरत का इज़हार किया .. फिर शहेंशाह के होकम से जासूस पूरे मुल्क मे फेल गये ….

लेकिन सारी कोशिशें नाकाम साबित हुई .. बड़े बड़े आलीमों की खिदमात हासिल की गयी और इन्हों ने भी सेंकडो जतन किए मगर ला हासिल … तबरेज़ी इसी गम मे सूख कर काँटा हो गया और घुल घुल कर मर गया … मरने से पहले इसने अपनी सारी दौलत और जायदाद बिलाल शम्स को सोन्प दी थी , लेकिन बिलाल शम्स इस दौलत का क्या करता ? इसे अपना कुछ होश ना था .. दीवानो की तरह चाक ए ग़रेबान , दीदाह ए गर्यन और सीना ए बरया , गली कूचो , शहरों और क़स्बों मे आवारा फिरता कि शायद कहीं उस महबूबा ए दिल नॉवज़ की एक झलक दिखाई दे .. कोई तरस खा कर खाने के लिए कुछ दे देता तो खा लेता वरना भूका ही पड़ा रहता ..

इसी तरह घूमते घूमते वो जलालाबाद के नवाह मे उसी जगह जा निकला जहाँ उसकी और तबरेज़ी की मुलाक़ात बूढ़े ज़ेयीफ से होई थी … ज़ेयीफ मर चुका था , लेकिन इस के बेटे और पोते इस खंडहर हवेली मे मौजूद थे .. बिलाल शम्स को वो सियाह घोड़े और बग्गी याद आई … ज़ेयीफ के बेटों ने इस को बताया कि एक रात किसी शख्स ने इनकी हवेली का दरवाज़ा खटखटाया .. दरवाज़ा खोला गया … तो सफेद कपड़े सर से लेकर पाँव तक ओढ़े एक अधेड़ (ओल्ड एज) उमर आदमी खड़ा था .. रात की तरीकी मे सिर्फ़ इसकी आँखें चमक रही थी और ऐसी चमक रही थी जैसे दो कॅंडील हो … इसके दाए पहलू मे तलवार लटक रही थी .. इसने पूछा ज़ेघाम कहाँ है ? ज़ेघाम इस वक़्त बहुत बीमार था , तहाँ इस अजनबी के होकम पर उसे बाहर लाया गया… ज़ेघाम ने ज्योन्हि उसकी सूरत देखी थर थर काँपने लगा .. अजनबी ने कारख़्त आवाज़ मे कहा

अजनबी :- ओ बूढ़े ! हमारे घोड़े और बग्गी किधर है ??

ज़ेघाम :- जनाब आप की अमानत इस खादिम के पास हर तरह महफूज़ है ..

अजनबी :- जल्दी हाज़िर करो ..

चुनांचा घोड़े गाड़ी मे जोड़ दिए गये और वो उसे ले कर चल दिए .. हां , जाते जाते उस ने बूढ़े ज़ेघाम को एक थाली दी जिस मे सोने की एक सो अशरफियाँ थी …

बिलाल शम्स को जलालाबाद के नवाह मे बड़ी राहत मिलती थी .. यही वीराना ही वीराना था .. कहीं कहीं क़दीम इमारतों के खंडहर थे .. पुराने वक़्तों का एक क़ब्रिस्तान भी दिखाई दिया जिस मे बहुत बड़ी बड़ी झाड़ियाँ थी .. इस क़ब्रिस्तान के आख़िरी किनारे पर ख़ासी पुरानी मस्जिद का असर भी बिलाल शम्स को दिखाई दिया ..

नज़ाने बिलाल शम्स को क्या जोश आया .. उसने कुएँ से पानी निकाला और वज़ू कर के नमाज़ पढ़ने बैठ गया और देर रात तक खुदा के हुज़ूरमे सजदे मे रहा और रोता रहा … हैरत अंगेज़ तोर पर उसकी रूह और बदन को सुकून पहुँचा रहा था .. धीरे धीरे उसको नींद आने लगी और वही मस्जिद के फर्श पेर लेट गया और नींद की आगोश मे चला गया ..
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Postby Jemsbond » 20 Jan 2017 14:15

नज़ाने कितनी देर वो वही सोता रहा , फिर किसी ने उसका बाज़ू हिला कर जगाया .. बिलाल शम्स ने जब आँखें खोली , तो उसे एक सफेद सफेद साए वाला इंसान अपने क़रीब नज़र आया .. ये कोई औरत नज़र आ रही थी .. जिसने सफेद चादर अपने जिस्म पर ओढ़ रखी थी .. इस का चेहरा नक़ाब से ढका हुआ और बाए हाथ मे छोटा सा शम्मह दान था .. वो बिलाल शम्स से थोड़ी ही दूरी पर खड़ी थी ..

इस का चेहरा नक़ाब से ढका हुआ और बाए हाथ मे छोटा सा शम्मह दान था .. वो बिलाल शम्स से थोड़ी ही दूरी पर खड़ी थी .. बिलाल शम्स उठ कर बैठ गया और उसका दिल धड़कने लगा और बिलाल शम्स ने पूछा ..

बिलाल शम्स :- कॉन हो तुम ??

उस औरत ने कोई जवाब ना दिया , और मस्जिद से बाहर निकल कर एक तरफ को चल दी .. फिर उसने रुक कर बिलाल शम्स की तरफ देख के इशारा किया कि मेरे पीछे आओ .. बिलाल शम्स भी इसके पीछे हो लिया .. औरत एक टेढ़ी मेधी पगडंडी पर चली जा रही थी .. ये पगडंडी इसी क़दीम क़ब्रिस्तान मे से गुज़र रही थी .. चारों तरफ मौत की सी खामोशी छाई थी और बिलाल शम्स इन क़ब्रों के बीच से लड़खड़ाता , बल ख़ाता , फलांगता हुआ बराबर औरत के पीछे चला जा रहा था ..

दूर एक सियाह इमारत का खंडहर दिखाई दिया .. जिसके इर्द गिर्द ऊँचे ऊँचे दरखतो का घना झुंड था .. बिलाल शम्स ना पहचान सका कि ये दरख़्त किस क़िस्म के हैं … वो औरत के क़दमों पर निगाह रखे हुए था .. इन दोनो का दरमियानी फासला दस बड़े हाथ से ज़ियादा ना था .. कभी कभी मूड मूड कर वो देख लेती कि बिलाल शम्स आ रहा है या नही , फिर मुतमइन हो कर आगे चल पड़ती ..

इमारत के क़रीब पहुँच कर वो रुक गयी .. बिलाल शम्स इस के बिल्कुल नज़दीक पहुँच गया .. शम्मह दान अभी तक औरत के हाथ मे था .. दाए हाथ से इस ने एक दम सियाह नक़ाब उलट दी .. बिलाल शम्स के हलक़ से घुटि घुटि चीख निकली

बिलाल शम्स :- फ़ातिमा !!!

फ़ातिमा :- सस्शह … खामोश …

फ़ातिमा ने होंठों पर उंगली रख के उसे चुप रहने का इशारा किया .. बिलाल शम्स के ज़हन मे हज़ारों सवाल उभरने लगे .. लेकिन वो कुछ भी ना कह सका .. फ़ातिमा ने इसे चुप रहने का हुकुम जो दिया था … फिर फ़ातिमा ने फूँक मार कर शम्मह बुझाई .. धुए की एक पतली सी लकीर बुझी हुई शम्मह से निकली और हवा मे गायब हो गयी …

बिलाल शम्स सिर्फ़ ये समझ सका कि ये इमारत किसी बादशाह का मक़बरा है जो पुराने ज़माने के खंडहरों मे तब्दील हो गया … लेकिन सवाल ये था कि फ़ातिमा यहाँ क्या कर रही है ..अब वो फिर चल पड़ी थी .. वो सहेन मे जा पहुँची ..

यहाँ भी क़ब्रे ही क़ब्रे और बड़ी बड़ी झाड़ियाँ थी .. इस से परे एक गोल चबूतरा सा बना हुआ था .. चबूतरे के उपर रात की तरीकी मे किसी हैबत नाक जिन्न के सर की मानिंद एक गेंद सा दिखाई दिया .. फ़ातिमा चन्द सीढ़ियाँ चढ़ कर चबूतरे पर गयी .. एक गोशे मे सुनेहरी रंग बिस्तर लगा हुआ था और उसके इर्द गिर्द सियाह रंग की चादर तनी हुई थी …

बिस्तर के क़रीब पहुँच कर उसने बिलाल शम्स को इशारे से नज़दीक बुलाया , फिर पर्दे को एक साइड से पकड़ कर उठाया … बिलाल शम्स ने बड़ी मुश्किल से चीख रोकी .. क्यू कि सूबेदार जलालाबाद बिस्तर पर सो रहा था .. बिलाल शम्स ने इसे पहचानने मे ज़रा देर भी ना लगाई .. अभी वो ये भयानक सरपा देख ही रहा था कि सूबेदार ने आँखें खोली ..

बिलाल शम्स बेहोश हो कर गिर पड़ा ..

सुबह उधर से गुज़रने वाले चन्द किसानों ने बिलाल शम्स को वहाँ से उठाया .. होश मे आने के बाद वो पागलों की तरह इधर उधर दौड़ता रहा .. वो ये यक़ीन करने को किसी तरह भी तैयार ना था कि इसने कोई ख्वाब देखा है .. वो बड़ी से बड़ी क़सम खाने के लिए तैयार था कि वो सब बेदरि मे हुआ है ना कि ख्वाब मे और फ़ातिमा यहीं कहीं किसी खंडहर मे क़ेद है , लेकिन किस खंडहर मे ? वहाँ तो मीलो तक शिकस्त इमारतों के खंडहर फेले हुए थे …

इसका दिल गवाही दे रहा था कि फ़ातिमा मरी नही, ज़िंदा है और जलालाबाद का वो पुरीसरार सूबेदार दौलत ख़ान , जो ना जाने कॉन था , फ़ातिमा को यही ज़माना ए क़दीम के इन खंडारों मे कहीं छुपाया हुआ है … बिलाल शम्स की हालत उन दीवानो की सी थी जिनको अपने तन बदन का कोई होश नही रहता .. और जो अपनी धुन मे दुनिया से बे परवाह एक ऐसी मंज़िल की जानिब रवा दवा रहते है जिस की खबर खुद उन्हें भी नही होती कि कहाँ हैं ..

हां एक ही सूरत इस के सामने हर दम रक़्स करती रहती और वो सूरत फ़ातिमा की थी .. वो खूब जानता था कि फ़ातिमा को फरमोश कर देना इस के लिए ना मुमकिन है .. बाज़ औरत खुद फारमोश के ऐसे लम्हात भी बिलाल शम्स पर आते रहते कि उसे ये भी याद नही रहता कि वो कहाँ है और क्या कर रहा है .. तहाँ इस आलम मे भी इस की रूह मे से फ़ातिमा फ़ातिमा की आवाज़ें उठी रही थी …

बिलाल शम्स की ख्वाहिश थी कि इसी तरह एक बार फिर फ़ातिमा उससे मिले और वो उससे पूछे कि सूबेदार का ठिकाना कहाँ है … और तुम्हे उसके शेतानी पंजे से कैसे छुड़ाया जा सकता है … इसी धुन मे वो वीरानो के चक्कर काटता रहता .. थक जाता , तो किसी बौसीद से क़बर के पास लेट कर सो जाता .. कोई राहगीर इधर से गुज़रता तो नादिर ज़मान पर रहम खा कर इसे खाने के लिए कुछ देता .. इस कोशिश मे बहुत कम लोग कामयाब रहते .. वो किसी से सवाल करता ना किसी के घर जाता और ना किसी से बात करता ..आहिस्ता आहिस्ता गार्ड ओ नवह मे इसकी शौहरत एक पहुँचे हुए फ़क़ीर की हैसियत से पेर लगा कर उड़ने लगी …

इसके ज़ुबार मे हैरत अंगेज़ तासीर आ गयी थी .. आलम ए बेहोशी मे जो कुछ उसकी ज़ुबान से निकलता , पूरा हो जाता .. दुनिया के सताए हुए और अपनी ख्वाहिशों के मारे हुए बे शुमार लोग दिन रात इसे घेरे हुए रहने लगे .. कोई हाजत मंद इसके पास पाओं दबाता , कोई पंखा झूलता , कोई इसके लिए उम्दा मिठाइयाँ और लज़ीज़ खाने लाता और कोई ज़र ओ जवाहिर निच्छावर करने के लिए हर वक़्त तैयार रहता … लेकिन ये शख्स ऐसा निराला था कि आँख उठा कर भी इन चीज़ों की तरफ नही देखता .. अगरचे इस के बदन पर चीथड़े लटक रहे थे , सर के बाल और दाढ़ी के बाल बढ़ कर एक हो गये थे … हाथ पैरो पर खाक धूल आई थी , लेकिन चेहरे पर जलाल की वो केफियत थी कि किसी को इस से आँखें मिलाने की जुर्रत ना होती …

वो हर वक़्त गर्दन झुकाए आप ही आप पूर इसरार आवाज़ और अनोखे लहजे मे किसी नदीद हस्ती से बाते करता दिखाई देता … अक़ीदत मंद सोचते कि ना जाने फ़क़ीर किस मक़ाम पर है ..अक़ीदत इतनी बढ़ गयी कि दिन रात का कोई लम्हा ऐसा ना था जब दो चार हज़्जत मंद और अपनी मुरादें पूरी करने वाले बिलाल शम्स के गिर्द दस्त बस्ता ना खड़े हो …

उस रात भी यही केफियत थी .. बिलाल शम्स ने एक मर्तबा अपने अजीब ओ ग़रीब मुराक़बे से चौंक कर झूर झूरी सी ली .. आँखें खोली .. तो इर्द गिर्द चन्द अग्राद अदब से हलक़ा बाँधे खामोश बैठे दिखाई दिए .. फ़क़ीर ने जून्ही आँख खोली सब ने हाथ जोड़ दिए और अपनी अपनी राम कहानी कहने लगे .. बिलाल शम्स ने अपना फटा पुराना कंबल जिस्म पर लपेटा और किसी से कुछ कहे बगैर एक तरफ चल पड़ा ..

लोगों ने उसके पीछे आने की कोशिश की मगर उसने करख्त आवाज़ मे उनको डाँट डपट कर सब को भगा दिया , गैर मर्रयि ताक़त उसे ना जाने किधर लिए जा रही थी .. आसमान पर गहरे बादल छा रहे थे और मघृिब की जानिब से तेज़ हवा का तूफान आने ही वाला था..

जब वो क़ब्रिस्तान से गुज़रा तो यकायक एक सियाह रंग की एक बहुत बड़ी बिल्ली एक शिकसता क़बर मे से उछल कर निकली और जबड़ा खोल कर बुरी तरह से घुर्राने लगी .. बिलाल शम्स ने इतनी बड़ी बिल्ली पहले कभी ना देखी … वो फ़ौरन रुक गया .. बिल्ली चन्द गज़ दूर मुसलसल गुर्रा रही थी .. इसके सफेद नोकीले दाँत अंधेरे मे चमक रहे थे और सब्ज़ आँखें मशालों की मानिंद रोशन थी .. आहिस्ता आहिस्ता इस की चीन्खे और घरराहटें तेज़ होने लगी और इन भयानक आवाज़ से ज़मीन लरज़ने लगी .. बिलाल शम्स अपनी जगह बुत बने खड़ा था .. बिल्ली आगे बढ़ी , इसकी आँखों से शेल बरस रहे थे और बिलाल शम्स पर हमला करने के लिए तैयार थी .. बिलाल शम्स के पास अपनी हिफ़ाज़त क लिए कोई हथियार ना था .. इसने एक पत्थर उठाया और पूरी ताक़त के साथ बिल्ली की खोपड़ी पे दे मारा .. पत्थर लगते ही बिल्ली के सर से खून का फव्वारा निकला और पीछे को भाग गयी …

देर तक इसके लरज़ाह खेज़ आवाज़ों से क़ब्रिस्तान गूँजता रहा .. बिलाल शम्स के बदन पर कपकपि तरी हो गयी और वो बगैर सोचे समझे एक तरफ भागने लगा .. आसमान मे बिजली कडकनी शुरू हो गयी और जल्द ही मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी ..

बिलाल शम्स पानी मे भीगता हुआ और ठंड से कांपता हुआ पनाह की तलाश मे भागता रहा .. ना जाने कितनी बार वो ठोकरें खा कर ज़मीन पर गिरा , उठा और फिर दौड़ा .. अब वो क़ब्रिस्तान से निकल कर आगरे को जाने वाली सड़क पर दौड़ रहा था .. फ़ातिमा की तलाश मे वो कयि बार इस रास्ते पे आया था और इस रास्ते के चप्पे चप्पे से वाक़िफ़ था …

तभी उसे अपने सामने एक झोंपड़ी दिखाई दी जिसमे चिराग जल रहा था .. वो वही ठिठक कर खड़ा हुआ और हैरत से सोचने लगा कि ये झोंपड़ी किसकी है और इस खौफनाक तूफान मे ये कैसा चिराग है जो बराबर रोशन है और बुझता नही .. वो हद दर्जा हैरत के साथ आहिस्ता आहिस्ता झोंपड़ी की तरफ बढ़ा .. क़रीब पहुँचा ही था कि अंदर से एक पुर जलाल आवाज़ आई ..

आवाज़ :- बिलाल शम्स ! अंदर चले आओ

ये आवाज़ सुनते ही उसका कलेजा मुँह को आया क्यू कि इस आवाज़ मे और सूबेदार की आवाज़ मे ज़ियादा फरक़ नही था ..वो वहाँ से भागने का इरादा कर ही रहा था कि वही आवाज़ फिर से आई

आवाज़ :- डरो नही बिलाल शम्स .. बे ख़ौफ़ होकर अंदर आ जाओ ..

उसने फिर भागने का सोचा मगर उसे ऐसा लगा जैसे ज़मीन ने उसके पाँव थाम लिए है .. थोड़ी देर मे उसने अपने आप को झोंपड़ी मे पाया .. एक निहायत ही पुराने बोरे पर बूढ़ा बुज़ुर्ग गर्दन झुकाए दो ज़ने बैठे थे .. इनकी दाढ़ी सफेद और नाफ़ तक बढ़ी हुई थी .. पलकें भी अंधे की तरह सफेद थी .. क़रीब ही एक पत्थर पर दिया रोशन था .. इन पीर मर्द की उमर का कोई अंदाज़ा बिलाल शम्स को ना हो सका .. इस के अंदर दाखिल होते ही बुज़ुर्ग ने गर्दन उठाई … इनकी आँखों मे हैबत की बिजलियाँ ही कुन्द रही थी .. बिलाल शम्स बे एख्तियार उसके क़दमों मे गिर पड़ा और सिसकियाँ ले कर रोने लगा .. उसे महसूस हुआ कि रोने से छाति पर रखा हुआ बे अंदाज़ बोझ हल्का हो रहा है ..जब वो गंगा जमना बहा चुका था , तो बुज़ुर्ग ने उसके सर पर शफक़त से हाथ फेरा और कहा

बुज़ुर्ग :- बिलाल शम्स क्या तुम खुदा की रहमत से मायूस हो गये ? मर्द को यूँ रोना ज़ेब नही देता …

ग़रीब शिकसता हाल शिकसता दिल मुसव्वर ( पेंटर ) ने फिर उन पीर मर्द के पाँव पकड़े और अक़ीदत से बोसा दे कर बोला

बिलाल शम्स :- हुज़ूर पर मेरा हाल सब रोशन है .. में अपनी ज़ुबान से क्या बोलू ..

बुज़ुर्ग :- नही तुम खुद बयान करो … हम कोई साहिब ए कशफ़ नही …हम ने तुम्हारा ज़िक्र लोगों से सुना है और एक आध मर्तबा यहाँ से गुज़रते देखा भी है … जब इस तूफ़ानी रात मे हम ने किसी इंसान के दौड़ने की आवाज़ सुनी तो में ने अंदाज़ा लगा कर तुम्हे आवाज़ दी और मेरा अंदाज़ा सही भी निकला … हम किसी हद तक तुम्हारे मुसीबत से आगाह भी है … पर में तुम्हारी ज़ुबानी तफ़सील से सुनना चाहता हूँ ..

और तब बिलाल शम्स ने आहों, आँसुओं और सिसकियों के साथ अपनी पूरी कहानी सुनाई …पीर मर्द चुप चाप सुनते रहे .. एक दो बार अपने सुर्ख आँखों से उसे देखे फिर मुस्कुरा कर गर्दन झुका कर बिलाल शम्स की वो आलम नाक कहानी सुनता रहा … आख़िर मे जब बिलाल शम्स ने क़ब्रिस्तान वाली बिल्ली का ज़िक्र किया तो वो चोंक कर कहने लगा

बुज़ुर्ग :- इसका मतलब वो खबीस अब भी जलालाबाद के नवाह में है …

बिलाल शम्स :- क्या आपका मुराद सूबेदार जलालाबाद से है ??

बुज़ुर्ग :- हां … वो बहुत शरीर जिन्न है और बहुत अरसे से वहाँ रह रहा है ..इससे पहले भी वो कयि बार इंसानी भेस मे आ के हसीन लड़कियों को ले जा चुका है .. इसके पास बाज़ ताक़तें ऐसी है जो इन शैतानी कामों मे इसकी मदद करती है .. काली बिल्ली की शकल मे वोही था .. तुम ने अच्छा किया जो पत्थर उसकी खोपड़ी पे मारा … आइन्दा वो इस शकल मे आए तो बे परवाह उसे मार देना ..

ये कह कर पीर मर्द ने अपने बोरी के नीचे हाथ डाल कर एक खंजर निकाला और बिलाल शम्स को देते हुए दुबारा अपनी बात शुरू की …

बुज़ुर्ग :- इसे अपने पास रखो .. वो दुबारा किसी ना किसी रूप मे दुबारा आएगा .. और मौक़ा मिलते ही इसे उसके जिस्म मे घोंप देना .. खुआह वो किसी भी शकल मे हो बिल्ली की या इंसान … तुम्हारा वास्ता जिस जिन्न से है वो बहुत बड़ा आमिल है , और यही वजह है कि मामूली अमल इसका कुछ नही बिगाड़ सकते … पहले वो दुकान की जानिब पहाड़ों मे किसी घर मे रहता था लेकिन हज़रत मुहम्मद गेसू दराज़ वहाँ तशरीफ़ ले गये .. तो उनके क़दमों की बरकत से वहाँ से भाग गया .. और जलालाबाद के नवाह मे आ कर पुरानी मस्जिद के पास कहीं रहता है … औरतें इससे बहुत तंग थी .. मगर अब इसका हौसला इतना बढ़ गया है कि ये इंसानी शकल मे आ कर हसीन औरतों को उठा कर ले जाता है … फ़ातिमा इसी की क़ैद मे है और जब तक वो मरेगी नही ये उसे नही छोड़ेगा .. ये खबीस काफ़ी अरसो से इन शैतानी हरकतों मे मसरूफ़ है … मगर अब लगता है इसका आखरी वक़्त आ गया है …

बिलाल शम्स :- हज़रत क्या कोई ऐसा तरीक़ा नही जिससे फ़ातिमा को आज़ाद किया जा सके ??

बुज़ुर्ग :- तरीक़ा सिर्फ़ ये है कि इस मखलूक़ ( क्रियेचर ) पर जजिस की हकूमत है उसे सारा वाक़या सुनाया जाए और उसी के हुकुम से ये फ़ातिमा को छोड़ देगा … हम सिर्फ़ इससे मुलाक़ात का क़ायदा तुम्हे बता सकते है .. बाक़ी काम तुम्हे करना होगा .. लेकिन ये सोच लो कि इसमे जान का ख़तरा हर वक़्त लहक़ है … अगर ज़रा भी अपनी हिफ़ाज़त मे गाफील हुए या इस अमल मे नाकाम रहे जो हम तुम्हे बताएँगे ..तो ये शरीर जिन्न तुम पर हावी होगा और तुम इसके रहम ओ करम पर होगे…


इन अल्फाज़ों मे बरकत इतनी थी कि बिलाल शम्स के दिल मे जुर्रत ओ हिम्मत की बुझी चिंगारी रोशन हो गयी .. फ़ातिमा के लिए वो अपनी जान पर खेलना मामूली बात समझता था .. लिहाज़ा उसने दुबारा उस बुज़ुर्ग के पेरो पे बोसा दिया और इसने कहा कि वो अमल बताए .. वो हर मुमकिन कोशिश कर के इस पर पूरा खरा उतरेगा …

पीर मर्द ने ये सुन कर कहा कि इसकी पहली शर्त ये है कि हर दम पाक और साफ सुथरा रहना होगा … ता कि शरीर जिन्न और बदरूह तुम्हारे क़रीब ना आ सके…

फिर इसके बाद तुम्हे जलालाबाद के पास पुरानी मस्जिद मे बैठ कर इज़म ए ज़ात 3 रातों मे सवा लाख मर्तबा पढ़ना होगा … जो इस मक़सद के लिए बताया जाएगा .. फिर तुम इस मक़सद के लिए तैयार हो जाओगे ..इसमे कामयाबी का रास्ता आसान है … इस अमल को खराब करने की पूरी कोशिश जिन्नात की तरफ से होगी .. और वो आमिल को भी तरह तरह के धोके दे के हिसार ( गोल दायिरे ) से बाहर लाने की कोशिश करेंगे … लेकिन आमिल को इनकी कोई परवाह नही करनी चाहिए और हिसार मे ही रहना है … ज़िन्नात हिसार मे दाखिल होने की जुर्रत नही करेंगे .. जब अमल पूरा होगा तो शाह ए जिन्नत से राबता क़ायम करना मुश्किल ना होगा ..

इन बुज़ुर्ग का नाम स्येद सलाह था और उमर 125 थी … बिलाल शम्स इसी झोंपड़ी मे रहने लगा और स्येद सलाह से इस अमल के तमाम क़ायिदे अच्छी तरह मालूम कर के याद किया … इस दौरान इन मे एक अजीब काम ये होता है कि जब तक वो झोंपड़ी मे रहता इसे कोई ख़ौफ़ ना होता .. लेकिन जब वो झोंपड़े से बाहर क़दम रखता तो क़िसम क़िसम के वास्वासे , वहाँ और डरावने ख़यालात इस पर हावी हो जाते …

हवा मे पुर इसरार आवाज़ें सुनाई देने लगती और कभी कभी ऐसा लगता जैसे कोई नदीदा दुश्मन इसके दाए बाए मौजूद है .. जो बिलाल शम्स की हर हरकत पर नज़र रखे हुए है .. ऐसे वक़्त मे वो स्येद सलाह का दिया हुआ वो खंजर निकाल कर हाथ मे लेता ..

श्येद सलाह की हिदायत पर इसने अपने सर और दाढ़ी के गैर ज़रूरी बाल काट दिए और हमेशा पाक सॉफ रहने लगा … आख़िर वो रात आ ही गयी जब इसे जलालाबाद के पास पुरानी मस्जिद मे ठीक 12 बजे जा के अपना अमल शुरू करना था ..

बिलाल शम्स ने मेरे पर दादा तुर्कताज़ ख़ान को अपनी आखरी तस्वीर के साथ साथ कागजों का एक भारी पुलंदा भी दिया था .. ये पुलंदा बरसों से एक कोठरी मे पड़ा रहा और एक रोज़ मे ने ये निकाल के पड़ा … ये बिलाल शम्स का रोज़ नामचा था .. जिसमे बिलाल शम्स ने बहुत हैरत अंगेज़ और होलनाक तरीक़े से अपनी दास्तान बयान की थी .. खेर अब बिलाल शम्स की ज़बानी ही सुनाता हूँ उसकी कहानी …

श्येद सलाह की जब से मुझे ज़ियारत हुई है … मेरी ज़िंदगी मे अजीब सा इंक़लाब आया है .. ये शख्स उलूम ए ज़हरी ओ बातनी का बहुत माहिर है और इस की उमर का बड़ा हिस्सा सेर ओ सियाहट मे बसर हुआ है … मे ने शेख की ज़ुबानी इंतिहाई अज्जीब कहानियाँ सुनी हैं .. जो लफ्ज़ ब लफ्ज़ बयान करूँ तो एक नयी अलिफ लेला तैयार हो सकती है … शेख सलाह ना सिर्फ़ आरिफ़ ए केमिल है .. बल्कि बहुत बड़ा कीमिया गार भी है .. अगरचा वो इस फन को मरदूद क़रार दे कर तुर्क कर चुका है … लेकिन इसने एक रोज़ मुझे इस काम को कंदन मे बदल कर दिखाया .. इसके इलावा अबसी क़बील के बाक़िया चार उलूम को भी जानने वाला है जिन्हें लिमिया , रिमील्या और सीमिया कहा जाता हैं … शेख का बयान है कि ये पाँचों उलूम ऐसे है जिन से दुनिया की काया पलटी जा सकती हैं .. मगर इन का जानना .. सीखना .. और इन पर अमल करना हर इंसान का काम नही है … और ये इल्म हर किसी को अता नही किए जाते है ..

इन उलूम मे से एक शेख ने मुझे सिखाने का इरादा किया है … जो कि एक रूह को दूसरे रूह मे मुन्तक़िल कर ना है .. इसका अमली मुज़ाहिरा भी शेख साहब ने मेरे सामने किया पर मेने बड़ी मुश्किल से अपने दिल पे क़ाबू किया … इतनी दहशत मुझ पे तरी रही कि मे ही जानता हूँ .. शेख ने एक रात अपनी रूह अपने पालतू तोते के जिस्म मे मुन्तक़िल कर दिया … इस दौरान शेख का जिस्म एक जगह बे हिज़ ओ हरकत बैठा रहा और तोता शेख की ज़ुबान बोलता रहा …फिर मुझे उन्हों ने अमल के लिए जाने की इजाज़त दे दी …

रात सख़्त डरावनी और तारीक़ थी … आसमान पर कोई भी तारा झिलमिलाता हुआ नही दिख रहा था .. ऐसा लगता था जैसे फ़िज़ा किसी के सोग मे वीरान है .. में शेख के उस बा बरकत झोंपड़ी से निकल कर जलालाबाद के उस पुराने मस्जिद की तरफ जा रहा हूँ .. जो क़ब्रिस्तान के पास मौजूद है … और जिसके छतो मे चमगादड़ ( बॅट्स ) ने अपना घर बना रखा था …

में चलते चलते देखा कि एक पौधा मेरे सामने सिमटा और फिर उँचा उठने लगा और फिर नाग बन कर अपना छोड़ा फॅन फेलाया और झूमने लगा … इस की ज़ुबान भी लहराती .. तड़पती हुई मे ने देखी और नन्ही नन्ही सुर्ख आँखें अंगारों की मानिंद पाई .. में ने उसकी फूँकार भी सुनी पर मेरे उपर उसका ज़रा भी ख़ौफ़ का असर ना हुआ .. में शेख का दिया हुआ खंजर हाथ मे लिए आगे बढ़ रहा था .. मे आगे बढ़ कर उस नाग के पास गया और खंजर के एक वार से ही उसका फॅन काट दिया … फिर वो नाग दुबारा पौधे की शकल मे आ के एक तरफ हो गयी और में आगे बढ़ा …

में आधा फासला ही तय किया था कि मेरे दाई तरफ के पहाड़ के टीले के पीछे से बच्चे के रोने की आवाज़ आई … में हैरान हो गया कि इस रात बच्चा यहाँ क्या कर रहा है … में इस बच्चे की आवाज़ को नज़र अंदाज़ कर के तेज़ी के साथ आगे बढ़ने लगा… मगर बच्चे के रोने और चीखने की आवाज़ बढ़ती जा रही थी .. में ने देखा कि मुझसे कोई 10 या 20 क़दम आगे एक बच्चा खड़ा रो रहा है … बच्चा रो रो कर कह रहा था

बच्चा :- मुझे घर ले चलो … मुझे घर ले चलो … मुझे घर ले चलो ..

उसने दोनो हाथ फेला दिए … और यकायक दोनो हाथ लंबे हो के मेरी तरफ आने लगे … और मेरी गर्दन दबोचने के लिए हरकत करने लगे … में ने खंजर से वॉर किया तो दोनो बाज़ू मूली की तरह कट कर नीचे गिर गये .. इसके साथ ही वो पुरीसरार बच्चा जो सूबेदार जलालाबाद का भेजा हुआ शरीर जिन्न था चीखता चिल्लाता हुआ वीराने मे भाग गया …

अब मे ढोर के मस्जिद की तरफ जाने लगा .. मगर में मस्जिद से थोड़ी दूरी पे पहुँचा था कि मुझे मस्जिद के पास 10 12 चिराग रोशन दिखाई दिए और वो हरकत कर रहे थे … और जब मेने पास जा के देखा तो मेरी खुशी की कोई इंतिहा ना रही …

क्यू कि यहाँ फ़ातिमा खड़ी थी अपने उसी पुराने हुस्न ओ जमाल के साथ … और उसके हाथ मे एक थाली है जिसमे ये चिराग रखे हुए है … फ़ातिमा ने कहा

फ़ातिमा :- आओ बिलाल शम्स … में कितनी देर से तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ … और ये तुम्हारे हाथ मे खून आलुद खंजर कैसा … फेंक दो इसे और मुझे अपनी बाहों मे लो जानेमन .. मे तड़प रही हूँ तुम्हारे बाहों मे आने के लिए …

में :- फ़ातिमा तुम यहाँ क्या कर रही हो इस वीराने मे ?? … जल्दी बताओ वो खबीस सूबेदार कहाँ है ?? अब वो मुझसे बच कर नही जा सकता ..

फ़ातिमा की मुतरन्नम हँसे फ़िज़ा मे गूँजी .. ये खाद ओ खाल , ये चेहरे की लकीरें , आँखों कर रंग , सब कुछ फ़ातिमा का था पर पता नही क्यूँ मुझे अंदर से इसके लिए नफ़रत होने लगी और मे ने कलाम ए इलाही पढ़ कर फूँक मारी तो तमाम चिराग बुझ गये .. और इसके साथ ही मुझे एक माकरूह क़हक़हा फ़िज़ा मे गूँजती सुनाई दी .. और मे जल्द ही पहचान गया कि ये सूबेदार जलालाबाद था और इसका ये फरेब भी नाकाम हो गया …

और में जल्दी से मस्जिद मे घुस गया … हर तरफ सन्नाटा था … फ़िज़ा मुझे जो नदीदा मखलूक़ों के बोलने और चीखने चिल्लाने की आवाज़ें सुनाई देती थी … अब लगता है उनको साँप सूंघ गया हो … में ने शेख के हिदायत के मुताबिक़ मस्जिद के एक कच्चे फर्श पर अपने खंजर से एक वसीह दयिरा खींचता हूँ .. और मुझे इसी मे बैठ कर अपना अमल शुरू करना था और सूरज के निकालने तक करते रहना था ..
और मुझे इसी मे बैठ कर अपना अमल शुरू करना था और सूरज के निकालने तक करते रहना था ..
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Postby Jemsbond » 22 Jan 2017 22:44

हिसार ( गोल दायिरे ) के अंदर बैठ कर में ने चिराग जलाए .. इसकी रोशनी मे मस्जिद का सहेन .. अन्द्रुनि हिस्सा .. और दरवाज़ा सभी बखूबी दिखाई दे रहे थे … खंजर अपने सामने रख कर कर मे ने अपने चौँगे ( लोंग कोट ) से तसबीह निकाल कर अमल शुरू किया … हिदायत के मुताबिक़ मुझे पूरे अमल के दौरान आँखें खुली रखनी थी … चिराग की रोशनी मे मेरा साया सामने वाली दीवार पर पढ़ रही थी और जब मे मामूली सी भी हरकत करता तो ये साया थर थराता था … और मस्जिद की ऊँची ऊँची दीवारो की वजह से हवा का दबाव भी यहाँ कम था …

में ने अपनी तवज्जुह वहाँ से हटा कर अपने अमल की तरफ की … ज्यूँ ज्यूँ मेरे अमल मे तेज़ी आ रही थी .. त्यु त्यु मेरे इर्द गिर्द अजीब ओ ग़रीब आवाज़ें पैदा हो रही थी .. ऐसा मालूम हो रहा था जैसा किसी पूर हुजूम बेज़ार में हूँ .. और लोग तरह तरह की बातें एक दूसरे से कर रही है .. में उन आवाज़ो को नज़र अंदाज़ कर के दुबारा अपने अमल की तरफ मुतवज्जुह हुआ.. और जल्द ही वो आवाज़ें भी बंद हो गयी .. अब ऐसा लगने लगा था कि जैसे नज़र ना आने वाले जिस्म मेरे इर्द गिर्द है .. और में उनकी साँसों की आवाज़ें सुन रहा था .. फिर यका यक मेरी नज़र सामने दीवार पर थर थराते मेरे ही साए पर पड़ी .. और ये देख कर मेरी साँस ही रुक गयी कि ये साया दाई दीवार से बाए दीवार पर मुन्तक़िल हो चुकी थी … देखते देखते मेरा साया इंसानी शकल एख्तियार करता है .. और दीवार से उतर कर मेरे सामने मगर हिसार से बाहर बैठ जाता है .. ये एक दूसरा बिलाल शम्स है जो मुझे देख देख कर हंस रहा है .. जब मे उसकी तरफ मुतवज्जुह ना हुआ तो उसकी सूरत बदल कर बहुत भयानक हो गयी … आँखों से शोले उबल रहे थे और सर का एक एक बाल खड़ा हो गया था .. मुझ पर हैबत तरी हो रही थी .. मुझे आँख बंद करने की इजाज़त ना थी इसलिए आँखें खोले इन तमाशों को देखना था और खुद पे क़ाबू रखना था … लेकिन गला खुश्क हो रहा था .. और अमल पढ़ने मे सख़्त अज़ीयत हो रही थी .. चन्द लम्हों बाद हालत ये हो गयी कि ज़बान से अल्फ़ाज़ निकलना दुश्वार हो गया .. मेने चेहरा दूसरी तरफ किया तो फिर वो मेरे सामने था .. कुछ देर तक यही केफियत रही .. मगर फिर वो मनहूस चेहरा गायब हो गया .. इसके बाद सूरज निकलने तक मैने इतमीनान के साथ अपना अमल पढ़ा … फिर चिराग बुझा कर हिसार से बाहर आया …

शेख सलाह मुझे मस्जिद के बाहर ही मिले .. मुझे देख कर गले लगाया और मुबारकबाद दी कि पहले इम्तिहान मे कामयाब हो गये .. खुदा ने चाहा तो आने वाली रातें भी कामयाब गुज़रेंगी ..

दूसरी रात मे शेख की झोंपड़ी से निकल कर मस्जिद की तरफ चला .. आधे रास्ते तक किसी ने मुझे परेशान नही किया .. खुश हुआ कि बला टल रही है और अमल पूरा होने के बाद फ़ातिमा मुझे मिल जाएगी .. और में उस शरीर जिन्न का क़िस्सा हमेशा हमेशा के लिए ख़तम कर दूँगा … में मस्जिद के पास पहुँचा ही था कि मसरिक़ ( ईस्ट ) की तरफ से एक चमगादड़ ( बॅट ) बहुत तेज़ी से मेरी तरफ आ रही थी .. उसे देखने से लगा कि वो मुझ पे हमला करेगा .. इसलिए में खंजर निकाल कर तैयार हुआ .. तो वो खंजर देख कर चीख निकालते हुए मघृिब ( वेस्ट ) की तरफ उड़ गया ..

मस्जिद मे जा कर उसी जगह हिसार ( गोल दायरा ) खींचा और बैठ कर अमल शुरू कर दिया .. कल की निसबत आज मुझ पे ज़ियादा ख़ौफ़ तरी ना थी .. मुझे यक़ीन था कि हिसार के अंदर कोई चीज़ नही आएगी .. लिहाज़ा बे फ़िक्री अमल जारी रखा .. अभी ये तसाउरत मेरे ज़ह्न मे थे कि मस्जिद के रोशनदान से कोई परिंदा फड़ फडाता हुआ अंदर आया .. एक अरसे तक मे भी गैर यक़ीनी तोर पर गेर्दन घुमा कर देखता रहा .. ये परिंदा नही मेरी ही शक्ल ओ सूरत का एक आदमी है .. देखते देखते वो दो हो गये … फिर तीन … फिर चार .. इन सब की सूरतें एक जैसी थी ..वो मेरी तरफ ध्यान दिए बगैर एक दूसरे से बातें कर रहे थे … फिर ज़ोर ज़ोर से गर्दन हिला हिला कर हँसने लगे और क़हक़हा लगाने लगे .. इनके भयानक और माकरूह आवाज़ों से मस्जिद गूँज रही थी .. मेरे अमल पर एक दो लम्हे के लिए असर किया .. उसके बाद में ने उनकी तरफ ध्यान दिए बगैर ही अमल जारी की .. जब वो मुझे डराने लगते है और में डर जाता हूँ .. तो खंजर उठा कर उनको डराने लगता हूँ .. वो ख़ौफज़दा हो कर हिसार से दूर हो जाते है और फिर आपस मे बातें शुरू करते है ..

यका यक बेरूनी दरवाज़े से एक लंबे और मज़बूत क़द का हबशी ( काला ) शख्स अंदर आया … उसकी पीठ पे बहुत बड़ी और भारी लोहे की कढाही थी .. वो अपने लाल लाल आँखों के साथ सफेद दाँत दिखा कर मुझे देखा और फिर वो कढाही मस्जिद के सहेन मे पटक देता है .. और फिर दूसरा हबशी मस्जिद मे दाखिल हुआ जिस के हाथों मे बहुत सारी लकड़ियाँ थी .. वो लकड़ियों का ये गट्ठर मस्जिद के सहेन मे फेंक कर वापिस चला गया .. मेरे शक्लो सूरत के वो आदमी जा के लकड़ियाँ जमा करते हैं और फिर आग लगाते है .. शोले आसमान से बातें कर रहे थे आग इतनी बढ़ गयी थी .. और फिर वो कढाही उस आग के उपर रख दी जाती है .. और उसमे तेल भर दी जाती है .. आग की लपट हिसार तक पहुँच गयी थी ..

मस्जिद के दर ओ दीवार तपते हुए दिखाई दे रहे थे .. फिर वो सब सूरतें गायब हो गयी … और इनकी जगह सूबेदार जलालाबाद नमुदार हुआ .. इसका लिबास वैसा ही था जैसा मेने उसे पहली बार देखा था .. वो बड़े इतमीनान से अपनी जगह खड़े मुझे घूरता रहा और फिर गजब नाक लहजे मे बोला ..

सूबेदार जलालाबाद :- आय नौजवान ! अब भी वक़्त है … ये ढोंग छोड़ दे और अपनी जान सलामत ले कर यहाँ से निकल जा .. शायद तू मेरी ताक़त से आगाह नही .. ऐसे ऐसे सेंकडो अमल मे खुद जानता हूँ .. और इन सब का तोड़ भी मेरे पास है .. अगर कहे तो तमाशा दिखाऊ ?

में खामोश रहा .. दिल ही दिल मे अपना अमल बराबर पढ़ रहा था .. और खंजर पर भी निगाह डाल रहा था वक़फे वक़फे से .. सूबेदार ने ताली बजाई .. और मुझे ऐसा लगा किसी ने लोहे से मेरे सर पे वार किया हो .. पालक झपकते ही में ने देखा कि वो हबशी श्येद सलाह को घसीटते हुए मस्जिद मे लाया .. जिसके कपड़े फटे हुए थे .. और बदन लहू लुहान था .. इन की हालत सख़्त अबतार थी . .. अमल भूल कर इनकी तरफ हैरत से तकने लगा .. शेख सलाह ने बे हद धीरे आवाज़ से कहा

शेख्स :- बिलाल शाम … में तुम्हे हुकुम देता हूँ .. ये अमल रोक दो इसी मे तुम्हारी भलाई है मे अपनी हर तसल्ली कर चुका हूँ .. सूबेदार का हुकुम है कि अगर तुम ने ऐसा ना किया तो ना सिर्फ़ वो मुझे मार डालेगा .. बल्कि हमेशा हमेशा के लिए फ़ातिमा को भी तुम से छीन ले गा ..



अगर खुदा की रहमत शामिल ए हाल ना होती तो मे इस फरेब मे डूब ही गया था .. गैर शाऊरी तौर पर मे ने खंजर उठाई .. खंजर उठाना था कि सूबेदार ने चिल्ला कर कहा शेख को खोलते तेल मे डाल दो .. ये अल्फ़ाज़भी ख़तम हुए ही थे कि मे ने शेख को तेल मे पाया .. इस का बदन जल कर कोयला हो गया था .. सूबेदार ने क़हक़हा लगा कर बोला “ अब इस बे वक़ूफ़ मुसव्वर ( पेंटर ) का भी यही हशर करो .. हबशी क़दम बढ़ाता हुआ मेरी तरफ आया .. ऐसा लगा जैसे इसने एक पाँव हिसार मे डाल दिया हो .. में ने खंजर पूरी ताक़त से इसके पाँव पे मारा .. एक होलनाक आवाज़ के साथ सब कुछ गायब हो गया .. ना कढाही रहा ना आग के शोले ना सूबेदार जलालाबाद और ना वो माकरूह सूरत हबशी .. मे बदस्तूर अपने हिसार मे बैठा था और चिराग रोशन था ..

आज इस अमल की तीसरी और आखरी रात है .. गुज़ीस्ता सुबह जब मे मस्जिद से बाहर निकला तो शेख को बाहर पाया .. इन्हों ने फरमाया .. “ बस अब कामयाबी समझो… तुम्हारी हिम्मत और इस्तिक़्लाल पर .. तुम ने इन का हर दाव नाकाम बना दिया .. अब पूरी तवज्जुह और हवस की तमाम बेदारी के साथ अमल पढ़ना .. मुमकिन है जिन्नात आज रात तुम्हे वर्घलाने और अमल से हटाने के लिए कोई नयी तरकीब आज़माए .. वो ख्वाह कुछ करें .. तुम हर गिज़ हर गिज़ वक़्त ए मुक़र्रर से पहले हिसार ना छोड़ना … मे ने शेख से वादा किया कि ऐसा ही होगा और कोई शैतानी ताक़त मुझ पर ग़ालिब ना आ सके गी ..

शेख ने एक तावीज़ भी मेरे गले मे बाँधा .. ये रात पिछली दो रातों से कही ज़ियादा वहशत अंगेज़ और तारीक़ थी . क़दम क़दम पर यू लगता जैसे हज़ारों अनदेखे जिस्म मेरे ताक़ुब मे हैं .. मे इनके क़दमों की आहटें और आवाज़ें भी सुन पा रहा था .. लेकिन नज़र कोई नही आता .. ज्यूँ ज्यूँ मस्जिद की जानिब बढ़ता गया .. त्यु त्यु उन पूर इसरार और ना दिखने वाले जिंसो के होने का अहसास ज़ियादा होता चला गया .. फिर मेरे कानों मे रोने की डरावने आवाज़ें आने लगी .. सेंडकों औरतों के मातम करने की आवाज़ें सुनाई दे रहे थे ..

ये आवाज़ें नही .. नदीदा परछाईयाँ थी जो मेरे दिल मे कभी कभी आती थी .. ये शोर मेरे दाए बाए , आगे पीछे इतने ज़ोर से होने लगा कि मेरे कानों क पर्दे फटने को हुए और आँखों के आगे सितारे से नाचते नज़र आए .. में ने उँची आवाज़ मे कलाम ए इलाही पढ़ना शुरू की और तेज़ी से आगे बढ़ा .. देर तक चलने के बाद भी मस्जिद नज़र नही आई .. रोने और मातम करने की आवाज़ें अब भी मेरा दिमाग़ खराब कर रही थी … मेने आँखें फाड़ फाड़ कर इधर उधर देखा .. ये ऐसा रास्ता था जहाँ मे कभी आया ही नही था .. अब पहली बार मेरे रोंगते खड़े हुए .. में ने सोचा कि शायद शरीर जिन्न और शैतानों ने मुझे रास्ते से भटका दिया है ..एक जगह रुक कर में ने अपना होश ओ हवास दुरुस्त किया और शेख का अता किया तावीज़ गर्दन मे टटोला .. इसे छूते ही अजीब तरह की तस्कीन दिल को हुई और खोफ़ की हालत जाती रही .. यका यक में ने एक रोशन साए को बायाबान मे हरकत करते देखा .. गैर इरादी तोर पर मे उसके पीछे चलता रहा ..

थोड़ी देर बाद में ने खुद को मस्जिद के दरवाज़े पर पाया .. देखते ही देखते वो मस्जिद क अंदर गया और सीधा उस जगह जा के खड़ा हुआ जहाँ मे हिसार बनाया करता था .. मुझे इस साए से कोई डर ना लगा .. खुद ब खुद दिल मे आया कि ये मेरे हिफ़ाज़त और निगरानी के लिए आया है .. अभी मे चिराग रोशन कर के खंजर से हिसार बनाने ही वाला था कि लरज़ा खेज़ चीख मस्जिद मे गूँजी और मे ने देखा कि सूबेदार जलालाबाद औंधे मूँह वहाँ पड़ा है .. उस का जिस्म ज़ंजीरों से जकड़ा हुआ था और आग का एक दायरा इस के इर्द गिर्द बना हुआ था .. सूबेदार के मुँह से अजीब अजीब सी चीखें निकल रही थी जैसे वो बहुत अज़ीयत मे हो .. ये मंज़र देख कर मे पत्थर हो गया और ये भूल गया कि हिसार बँधा कि नही .. मगर तभी किसी ने मेरे कान मे कहा “ बिलाल शम्स क्या गजब कर रहे हो … हिसार बांधो वरना दुश्मन वार करने मे देर ना करेगा “ .. में ये आवाज़ जल्द ही पहचान गया .. ये आवाज़ मेरे उस्ताद आका ए तबरेज़ी की थी ..
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