पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Jemsbond
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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Post by Jemsbond » 08 Jan 2017 21:10

वो समझ रहा था कि अब अक़ा ए तबरेज़ी के सबर की इंतिहा हो चुकी होगी.. जलालाबाद के इस एहमाक़ सूबेदार को इसकी मौत ही यहाँ खींच लाई है .. किस गुस्ताख़ी और बे बाकी से फ़ातिमा का सौदा कर रहा है … कोई भी गैरत मन्द आदमी इसे बर्दाश्त नही कर सकता .. लेकिन इस ने देखा कि आका ए तबरेज़ी इसी तरह बे हिज़ ओ हरकत बैठा रहा .. इसके मूँह से मुख़ालफ़त या इनकार का एक भी अल्फ़ाज़ ना निकल सका .. अलबत्ता इस के चेहरे पेर फेली हुई हैरत के आसार अब और भी गहरे हो गये थे .. खुद इसे भी सूबेदार जलालबद से इस क़िस्म के मुतबल की तवक्को ना थी

अलबत्ता इस के चेहरे पेर फेली हुई हैरत के आसार अब और भी गहरे हो गये थे .. खुद इसे भी सूबेदार जलालबद से इस क़िस्म के मुतबल की तव्क़्क़ो ना थी .. आख़िर इस ने हद ओ दरजाह निदमत और इन्किसार अमीज़ लहजे मे कहना शुरू किया

तबरेज़ी :- आली जां मे ने आप का इरशाद सुन लिया .. मेरी ये खुश क़िस्मती है कि आप का इंतिखाब मेरी भांजी फ़ातिमा है .. यक़ीनन इसे आप से बेहतर शौहर नही मिल सकता अफार मेरे एख्तियार मे हों तो मे अभी इसी वक़्त हां कर देता , लेकिन आप जानते है कि मे ने आज तक फ़ातिमा पर अपनी राय या मर्ज़ी मुसल्लत नही की , हमेशा इसे अपने मामलात मे आज़ादी से सोचने और अमल करने की इजाज़द दी है और ये तो इसकी ज़िंदगी का सब से अहम मामला है इस से मशवरा किए बघेर मे कोई वादा कैसे कर सकता हूँ ..

ये सुन कर सूबेदार को बहुत गुस्सा आया , आँखें गुस्से की वजह से और भी लाल हो गयी , इसने गर्राया तो इसकी आवाज़ हवेली की देवारों से टकरा टकरा कर गूँज रही थी जैसे सैकड़ों बद रूहें चिल्ला रही हो

सूबेदार :-बहाने बनाने की कोशिश मत कर तबरेज़ी .. मे सब समझता हूँ तुम्हारी इन चाल बाज़ियों को .. तुम ही उसके सरपरस्त हो .. बोलो क्या मे ग़लत कह रहा हूँ .. अगर तुम चाहो तो सब कुछ मुमकिन है .. फ़ातिमा को तुम्हारे हुकुम ना मानने की मज़ाल ही नही है और मुझे फ़ातिमा पसंद आ गयी है तो मे उसे हासिल कर के रहूँगा ..

तबरेज़ी :- मुझे इस रिश्ते से कोई इनकार नही है .. मे तो इस मौके मे सिर्फ़ फ़ातिमा की रज़ा मंदी हासिल करने की कर रहा था .. आप दौलत के ज़रिए फ़ातिमा को सारी खुशियों देंगे लेकिन रिश्ते नाते करने मे सिर्फ़ दौलत ही तो नही देखी जाती , हस्ब नस्ब भी कोई चीज़ है और हम इस मामले मे काफ़ी सख़्त है .. मुझे अभी तक आप के हस्ब नस्ब के बारे मे कुछ भी जानने का मौक़ा नही मिला ..

सूबेदार मुस्कुराया और अपने सियाह लबादे ( लोंग कोट ) के अंदर हाथ डाल कर पुराने कगाज़ निकाले और तबरेज़ी की तरफ फेंक कर कहा

सूबेदार :- मुझे पता था तुम यही सवाल करोगे , इसलिए अपने शजरे ( फॅमिली बॅकग्राउंड ) के कागजात साथ ही ले आया..

तबरेज़ी ने झुक कर वो कागज उठाए और एक नज़र देखने लगा और कुछ सोचने लगा उसे इतमीनान हो गया और वो कागज वापिस देते हुए कहा

तबरेज़ी :- मुझे इतमीनान हो गया है आली जहाँ कि आप बहुत आला हस्ब नस्ब के मालिक है ..

तबरेज़ी आगे कुछ बोलने ही वाला था कि सूबेदार ने कहा

सूबेदार :- बस तो फिर ताकीर ना करो

और अपने लबादे ( लोंग कोट ) की जेब से एक और कगाज़ निकाला और तबरेज़ी को दिया और कहा

सूबेदार :-ये हमारे और तुम्हारे दरमियाँ एक मुआहिदा ( डील) है जिस के तेहेत मे अपना ज़र ओ जवाहर से भरा हुआ ये डब्बा तुम्हारे पास छोड़ के जा रहा हूँ .. इसकी उसूली की रसीद मुझे दो और कागज पे लिखो कि फ़ातिमा की शादी मुझसे कर दो गे .. मे ज़्यादा धूम धड़ाका पसंद नही करता … ये काम बिल्कुल खामोशी से होना चाहिए … अब फ़ौरन इस पर दस्तख़त कर के मेरे हवाले करो ..

तबरेज़ी :- मगर .. हुज़ूर .. इतनी जल्दी .. मुझे कुछ गौर करने का मौक़ा तो दीजिए ..

सूबेदार ने ये सुन कर क़हक़हा लगा कर कहा

शूबेदर :- मौक़ा ! में ने हर तरह तुम्हारी तस्सली कर दी है और तुम हो कि बराबर बहाने बना रहे हो .. जल्द दस्तख़त करो .. मेरा ख़याल है एक दिन की मुहलत काफ़ी होगी ..

उसने फिर अपने लबादे ( लोंग कोट ) मे हाथ डाल कर क़लम निकाला और कहा

सूबेदार :- अगर तुम्हारे पास क़लम नही है तो ये लो मेरे पास है ..

तबरेज़ी ने क़लम सियाही मे डाला और काँपते हाथों से दस्तख़त किया …

सूबेदार :- इधर आओ नौजवान तुम भी बतौर ए गवाह दस्तख़त करो..

एक खरीदे हुए गुलाम की तरह बिलाल शम्स ने भी उस कागज पर दस्तख़त किए जिसके तहत सिर्फ़ एक दिन बाद जलालाबाद का सूबेदार हमेशा के लिए फ़ातिमा का मालिक बन जाने का हक़ रखता था ..दस्तख़त होते ही इस ने मुअहिदे का कागज लप्पेट कर अपने लबादे (लोंग कोट) की जेब मे रख लिया और दरवाज़े के क़रीब जाते ही बोला

सूबेदार :- तबरेज़ी मे कल रात ठीक 9 बजे तुम्हारे मकान पर पहुँच जाउन्गा और ये कहने की ज़रूरत नही कि हमारे दरमियाँ जो तहरीरी मुआहिदा हुआ है , तुम हर तरह इसकी पाबंदी करोगे ..

ये कहते ही रुखसती सलाम और मूसहफ़ा ( हाथ मिलाना ) के बगैर वो दरवाज़े से बाहर निकल गया .. बिलाल शम्स लपक कर गली की जानिब खुलने वाली खिड़की मे जा खड़ा हुआ .. गली सुनसान पड़ी थी और इसे पूरा यक़ीन था कि अब वो उस सूबेदार को इस रास्ते से जाते हुए ज़रूर देखेगा मगर वक़्त गुज़रने लगा सूबेदार गली मे दाखिल ही नही हुआ .. ना वो हवेली के मेन दरवाज़े से बाहर गया .. बल्कि वो तो हवेली के किसी दरवाज़े से बाहर जाते हुए नही दिखे ..

गली सुनसान पड़ी थी और इसे पूरा यक़ीन था कि अब वो उस सूबेदार को इस रास्ते से जाते हुए ज़रूर देखेगा मगर वक़्त गुज़रने लगा सूबेदार गली मे दाखिल ही ना हुआ .. ना वो हवेली के मेन दरवाज़े से बाहर गया .. बल्कि वो तो हवेली के किसी दरवाज़े से बाहर जाते हुए नही दिखे ..

ये एक ऐसी दहशत अंगेज़ दर्याफ़्त थी , जिस ने नौजवान मुसावार ( पेंटर ) को हिला के रख दिया था .. वो सोचने लगा ये सूबेदार कॉन है ? कही इंसान की शकल मे कोई भूत , प्रेत या कोई जिन तो नही ? फिर उसने अपने आका को देखा जो गुम सूम अपनी जगह खड़े थे .. बिलाल शम्स को वापिस आते देख कर उसने ठंडी सांस भर कर कहा
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

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Jemsbond
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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Post by Jemsbond » 08 Jan 2017 21:36

तबरेज़ी :- मुझे तो लगता है ये शख्स सनकी है .. यही जलाल आबाद का सूबेदार … लेकिन इसमे कोई शक नही कि आदमी दौलत मंद और खानदानी है … में हैरान हूँ कि इसने फ़ातिमा को कैसे देखा ? वाक़ई 4 माह पहले मे हज़रत ख्वाजा मुईन उद्दीन के रोज़े की ज़ियारत के लिए गया था और फ़ातिमा मेरे साथ थी .. मुझे याद नही आ रहा कि जलालाबाद नाम की कोई जागीर भी आई थी , लेकिन वो तो यहाँ से ख़ासी दूर है .. क्या ख़याल है तुम्हारा बिलाल … फ़ातिमा की शादी ऐसे आदमी से ठीक रहेगी ..

काश ! काश ! आका ए तबरेज़ी को इन दोनो की मुहब्बत के बारे मे पता होता , तब वो ये सवाल बिलाल शम्स से ना करते .. नौजवान ने बड़ी मुश्किल से अपने आँसू रोक रखे थे , लेकिन इस बर्दाश्त के बावजूद इस के दिल दिल की गहराइयों से एक सर्द आह निकल ही गयी …वो लड़खड़ाया और अगर तबरेज़ी आगे बढ़ कर इसे ना संभालते तो वो औंधे मूँह फर्श पर गिर जाते ..

तबरेज़ी और भी परेशान हो गये और पूछे

तबरेज़ी :- तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना ?? तुम ने आज खाना भी नही खाया ..

बिलाल शम्स ने खुद को संभाल कर कहा

बिलाल शम्स :- मुझे आज भूक लगी ही नही जनाब .. बस वैसे ही एक चक्कर आ गया था .. अब आप अपने महल मे तशरीफ़ ले जाए और मुझे इजाज़त दें .. एक ज़रूरी काम से मुझे बाहर जाना है मे रात को शायद वापस ना आ सकूँगा .. बाबा अफ़ज़ल बैग से कह दीजिएगा मेरा इंतज़ार ना करें …

वो डरता था कहीं इस की और फ़ातिमा की मुहब्बत का राज़ फ़ाश ना हो जाए .. यक़ीनन जज़्बात के हाथों मजबूर हो कर वो कोई ऐसी हरकत कर बैठेगा जिस से ये राज़ खुल सकता था .. लिहाज़ा हवेली से चले जाना ही मुनासिब था …

तबरेज़ी हीरों और जवाहीरों से भरा वो डिब्बा साथ लिए और फ़ातिमा के सोने के कमरे मे गया .. इसे पूरा भरोसा था कि फ़ातिमा इसकी बात नही टालेगी .. तबरेज़ी ने फ़ातिमा से कहा

तबरेज़ी :- फ़ातिमा बेटी कैसी हो ??? तबीयत खराब लग रही है तुम्हारी ..

फ़ातिमा :- अब तो ठीक हूँ मामू जान .. आप कल अपने उस तबीब ( डॉक्टर ) दोस्त को बुलवा लीजिए जिसने पहले भी मेरा इलाज किया था .. कल से मेरा जी घबरा रहा है और कलेजा बैठा जाता है .. सर मे चक्कर आते हैं और अजीब तरह के डरावने खवाब नज़र आने लगे हैं ..

तबरेज़ी ने उसके सर पे हाथ फेरते हुए कहा

तबरेज़ी :- अच्छा ! किसी ने मुझसे ज़िक्र नही किया इस बारे मे … खेर तबीब (डॉक्टर) भी कल आ जाएगा .. अब तुम एक खुशख़बरी सुनो … बेटी तुम्हे पता है ना तुम मुझे दुनिया की हर चीज़ से ज़ियादा अज़ीज़ और प्यारी हो … में ने तुम्हारे लिए एक ऐसा आदमी चुना है जो तुम्हे पसंद करता है और मुझे यक़ीन है वो तुम्हे हमेशा खुश रखेगा .. इसके पास माल ओ दौलत की भी कोई कमी नही … आज वो मेरे पास आया था … ये देखो … तुम्हारे लिए वो कितने क़ीमती हीरे और कैसे उम्दा ज़ेवर लाया है … वो जलाल आबाद का सूबेदार है बेटी …मे उसकी शख्सियत से बहुत मुतसिर हुआ हूँ …

ये कह कर उस ने वो डिब्बा खोल कर हीरे दिखाने लगा , मगर फ़ातिमा ने नज़र उठा कर एक मर्तबा भी इस डब्बे की तरफ ना देखा , बल्कि एक दम इसने दोनो हाथों से अपना चेहरा ढांप लिया और बुरी तरह रोने लगी … ये तो इस ने कभी सोचा भी ना था कि इस तरह इस के जज़्बात कुचल दिए जाएँगे और यू दौलत के बदले उसके जिस्म ओ जान का सौदा होगा. तबरेज़ी ने ये देख कर कहा …

तबरेज़ी :- में ने ये सब कुछ तुम्हारे शानदार मुस्ताक़बिल के लिए किया है बेटी …कही ना कही आख़िर तुम्हारी शादी तो करनी ही थी और मे समझता हूँ ऐसा शौहर तुम्हे ना मिलता … वो तुम्हे बहुत पसंद करता है और मे ने इस भरोसे पर कि तुम अपने मामू तबरेज़ी को ज़लील होते देखना ना चाहोगी , हां कर दी … अब वो कल शाम 9 बजे आएगा , इसी वक़्त तुम्हारा निकाह होगा और फिर तुम रुखसत हो जाओगी …

फ़ातिमा ने कोई जवाब ना दिया .. जवाब देने का मौक़ा था भी कहाँ .. सब कुछ तो तबरेज़ी ने कह दिया था .. उसके हसीन ख्वाब चिकना चूर हो चुके थे … बिलाल शम्स से जो इसकी शादी नही हो रही थी .. वो ग़रीब था जो शायद एक नया जोड़ा भी फ़ातिमा को खरीद कर नही दे सकता था … मगर फ़ातिमा को तो कुछ नही चाहिए उसके प्यार के सिवा … और फ़ातिमा को ना ज़ेवर … हीरे … जवाहिरात और किसी सूबेदार मे दिल चस्पी थी … तबरेज़ी ने इसकी आरज़ुओं , उम्मीदों और ख्वाहिशों का ग़लत अंदाज़ा किया था ..

अगले रोज़ भी तबरेज़ी ने वक़्त का बड़ा हिस्सा फ़ातिमा को समझाने और मुस्ताक़बिल की रोशन तस्वीर दिखाने मे लगाया .. फ़ातिमा ने इस दौरान एक लफ्ज़ भी मुँह से ना निकाला और ना कुछ खाया पिया था .. एक दिन मे उस के चेहरे का रंग रूप सब गायब हो गया था …

दोपहर को बिलाल शम्स हवेली मे दाखिल हुआ … उसे देख कर लग रहा था कि वो बहुत रोया है सारी रात और सोया भी नही है उसके चेहरे पे आँसुओं के निशान बन गये थे .. बाल बिखरे हुए थे और कपड़े भी मेले और गंदे … ये देख कर तबरेज़ी को बड़ा झटका लगा और आगे बढ़ कर उसने बिलाल शम्स का हाथ पकड़ा .. तो उसे पता चला कि बिलाल शम्स का बदन आग की तरह गरम है .. तबरेज़ी ने चिल्ला कर कहा

तबरेज़ी :- तुम्हे तो बहुत तेज़ बुखार है बिलाल .. मे अभी तबीब (डॉक्टर) को बुलाता हूँ .. दो दिन से फ़ातिमा की भी तबीयत ठीक नही है कहती है सर चकराता है ..

नौजवान ने रुक रुक कर और निहायत अदब से इल्तिजा (रिक्वेस्ट) किया ..

बिलाल शम्स :- आप बराह ए करम मेरे लिए तबीब को बुलाने की ज़हमत ना करें.. में इस क़िस्म की बीमारियों का आदि हूँ , अलबत्ता आप से ये दरख़्वास्त कर सकता हूँ कि फिलहाल आप फ़ातिमा के लिए भी तबीब को ना बुलाए … आप सूबेदार के साथ किए हुए वादे की तैयारी करें … अगर तबीब की वजह से इसमे ज़ियादा वक़्त लगा तो सूबेदार नाराज़ हो जाएगा …

तबरेज़ी ने खुश होते हुए कहा

तबरेज़ी :- सच कहते हो .. सच कहते हो .. अभी तुम अपनी निगरानी मे हवेली की सफाई वाघेरा करवा दो , नौकर आते ही होंगे .. इसके बाद बड़े कमरे में मुअज़्ज़ाज़ मेहमानों के बैठने का इंतज़ाम करो … रात के खाने पर तुम भी हमारे साथ शिरकत करोगे … बाहर से किसी को बुलाने का मेरा कोई इरादा नही है …

नौजवान ने अपने उस्ताद के हुकुम पर प्युरे हवेली को आईने की तरह चमका दिया और बड़े कमरे मे नया क़ालीन बिछा दिया गया और एक तरफ शानदार सोफा दूल्हे के लिए बनाया गया .. शाही रकब्दारों ( शेफ़ ) से कयि खाने पकवाए गये और इन्हें मुअज़्ज़ाज़ मेहमान के आने से पहले ही रुखसत कर दिया गया …

9 बजने मे अभी चन्द ही मिनट्स बाक़ी थे … हवेली मे इस वक़्त निकाह करने वाला क़ाज़ी , इसके दो शागिर्द , तबरेज़ी , बाबा अफ़ज़ल बैग और बिलाल शम्स के सिवा कोई ना था .. क़ाज़ी से तय क्या जा चुका था कि निकाह का रसम होते ही वो तशरीफ़ ले जा सकते हैं ..

जैसे ही 9 बज गये तो हवेली पर एक हैबत नाक सुकूत तरी हुआ .. हवेली मे मौजूद हर एक शख्स के दिल मे ख़ौफ़ छा गया था .. तभी बेरूनी दरवाज़े के खुलने की आवाज़ आई और दोनो भारी दरवाज़े गड़गड़ाहट के साथ अलग होने की आवाज़ आई और फिर सहेन मे क़दमों की आवाज़ आई … फिर कमरे मे सूबेदार जलालाबाद अपनी सारी आन बान लिए दाखिल हुआ … हस्ब ए मामूल उसका लिबास सर से लेकर पाओं तक काला , हाथों पर चढ़े हुए दस्ताने , जूते और जुर्राबे भी काली .. जो छड़ी इसके दाए हाथ मे थी वो भी काली …

तबरेज़ी लपक कर इसके इस्तिक़्बाल को आगे बढ़ा और उसको उसकी जगह पर बिठाया .. सूबेदार ने जूते उतारने तक की भी ज़हमत ना की .. हिकारत की नज़र से इधर उधर देखा और भारी आवाज़ मे कहा

सूबेदार :- तबरेज़ी मेरे पास ज़ियादा वक़्त नही है फ़ौरन निकाह की रसम अदा होनी चाहिए …

तबरेज़ी :- बहुत बेहतर जनाब .. सब लोग हाज़िर है …

उस ने बिलाल शम्स को इशारा किया … वो दूसरे कमरे से निकाह ख्वान और उसके दो शागीर्दों को बुला लाया.. इन्हों ने आते ही मुअज़्ज़ाज़ मेहमान को सलाम किया .. क़ाज़ी ने निकाह का रसम शुरू किया , एक लाख अशरफ़ी महर के बदले फ़ातिमा का निकाह सूबेदार के साथ हो गया ..इस तमाम अरसे मे एक बार भी सूबेदार ने पलक नही झपकाई .. ऐसा लग रहा था जैसे इसकी पलकें मसनुई ( फेक ) है और इनमे झपकने की हिस्स नही है ..

एक पुर इसरार सी हैबत तमाम हाज़िरीन पर छाइ हुई थी .. निकाह की रसम ख़तम होते ही सूबेदार ने अपनी जेब मे हाथ डाला और कुछ अशरफियाँ निकाल के क़ाज़ी की तरफ फेंक दी .. एक बार फिर एख़लाक़ और अदब के मर्हले तय हुए और क़ाज़ी साहब अपने शागीर्दों को ले कर रुखसत हो गया… सूबेदार ने कहा

सूबेदार :- तबरेज़ी दुल्हन रुखसती के लिए तैयार है ???

तबरेज़ी :- जी आली जां … लेकिन आप खाना तो खा लीजिए ..

सूबेदार :- नही … हमें बहुत जल्दी हैं .. तुम जानते हो जलालाबाद यहाँ से ख़ासी दूर है और रास्ते मे डाकुओं , लुटेरों का ख़तरा भी है , इसलिए हम ज़्यादा देर पसंद नही करेंगे .. हवेली से बाहर हमारी घोड़ा गाड़ी है … फ़ौरन दुल्हन को हमारे साथ कर दो ..


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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Post by Jemsbond » 08 Jan 2017 22:30

अब यहाँ से शुरू होता है इस दास्तान का वो हिस्सा है जो बिलाल शम्स ने खुद मेरे दादा को सुनाया था कि कैसे वो अपनी मुहब्बत को वापिस हासिल करने के लिए गया …

फ़ातिमा और सूबेदार की शादी से बिलाल शम्स की दुनिया वीरान हो गयी , आफ्रीन है इसके सबर पर कि इसने एक लफ्ज़ भी मुँह से शिकायत का ना निकाला …तबरेज़ी फिर भी अपने रोज़ मर्राह की मसरूफ़ियत मे गुम हो गया … इसे अहसास ना था कि बिलाल शम्स के दिल ओ दिमाग़ पर क्या बीत रही है .. और वो एक ऐसी आग मे जल रहा है जो इस की मौत के साथ ही ठंडी हो सकेगी ……

बिलाल शम्स ने अपने आप को मुस्सवीरी ( पैंटिंग ) के फन मे डुबो देने की कोशिश की .. वो 16 16 और 20 20 घंटे अपने तस्वीर खाने मे मसरूफ़ रहने लगा .. इसकी हालत रोज़ बार रोज बिगड़ती जा रही थी मगर इसे होश तक ना था .. हवेली का बूढ़ा चोकीदार अफ़ज़ल बैग इसे कभी कबार समझाता बुझाता , लेकिन बे फ़ायदा .. बिलाल शम्स पर अब किसी नसीहत का असर नही हो रहा था .. इसकी जान चिराग की तरह आहिस्ता आहिस्ता बुझती जा रही थी ..

वक़्त अपनी रफ़्तार से गुज़रने लगा … एक महीना … दो महीने .. तीन महीने … इस तमाम अरसे मे फ़ातिमा की कोई खबर तक ना आई और ना ही इसके शौहर ने तबरेज़ी के नाम कोई खत भेजा ..तबरेज़ी ने बहुत खत भेजे मगर कोई जवाब ना आया ..

आख़िरकार तबरेज़ी ने सोचा कि जलालाबाद जा के उससे मिल लिया जाए और फिर बिलाल शम्स को ले के जलालाबाद की तरफ रवाना हुआ , लोगों से पूछ पूछ कर तबरेज़ी और बिलाल शम्स जलालाबाद के नॉवा ( सरहदी इलाक़ा ) पहुँचे मगर इस वक़्त रात हो चुकी थी वो एक घर के बाहर खड़े थे …

क़रीब ही शानदार नसल के दो घोड़े बँधे हुए थे.. और थोड़ी दूर घोड़ा गाड़ी की बघि खड़ी थी .. जिसे देख कर तबरेज़ी फ़ौरन पहचान गया कि ये वोही घोड़े और गाड़ी है जो जलालाबाद का वो पुरीसरार सूबेदार रात के 9 बजे अपने साथ लाया था और इसी मे वो फ़ातिमा को बिठा कर ले गया था ..

दोनो ने अपनी अपनी तलवारें निकाली .. इनका ख़याल था कि शायद यहाँ सूबेदार क आदमी हो और कोई फितना फेसाद बरपा करें .. मगर चन्द लम्हे बाद 70या 80 साल का एक बूढ़ा मकान के अंदर से बाहर आया और इन्हें देख कर कहने लगा

बूढ़ा :- आप कॉन है और क्या चाहते है ??

तबरेज़ी :- मुझे सूबेदार जलालाबाद से मिलना है … बड़े मियाँ क्या आप इन का पता बता सकते है ??

बूढ़ा :- सूबेदार जलालाबाद …?? में नही जानता वो कॉन है और कहाँ रहता है

ये सुन कर तबरेज़ी को गुस्सा आया और उसने चिल्ला कर कहा

तबरेज़ी :- तुम झूठ बोल रहे हो …क्या ये घोड़े और गाड़ी उसी की नही है ??

बूढ़ा :- जनाब ! आप इतमीनान से मेरी बात सुनें , तो अर्ज़ करू … बारह ए करम अपनी ये तलवारें मियान मे डालें मेरा कोई इरादा आप के साथ जंग करने का नही है .. आइए कमरे मे तशरीफ़ लाइए ..

वो इन्हें एक सॉफ कमरे मे ले गया , जहाँ एक तरफ बिस्तर पड़े हुए थे और एक तरफ कुर्सियाँ रखी हुई थी , उसने बिस्तर पर बैठते हुए कहा

बूढ़ा :- इन घोड़ों और बग्घी की दास्तान भी अजीब है जनाब ..

तबरेज़ी और बिलाल शम्स भी कुर्सियों पर बैठ गये , बूढ़े ने आगे बोलना शुरू किया

तबरेज़ी और बिलाल शम्स भी कुर्सियों पर बैठ गये , बूढ़े ने आगे बोलना शुरू किया

बूढ़ा :- मेरा नाम ज़ेघाम है और मे इस इलाक़े मे 50 साल से आबाद हूँ .. ऐसा अजीब ओ ग़रीब वाकिया मुझे पहले कभी पेश नही आया .. ये कोई एक साल पहले की बात है .. सूरज घुरूब हो चुका था .. मेरे बेटे और पोते एक तक़रीब मे गये हुए थे और मे यहाँ तन्हा था ..इस इलाक़े मे सूरज घुरूब होने का मंज़र बहुत हसीन होता है और मे इसे बड़े शौक़ से देखने का आदि रहा हूँ , तो मे टहलते टहलते अपने मकान से ज़रा दूर इस सड़क पर निकल आया जो सीधा जलालाबाद की आबादियों की तरफ जाता है …

अभी मे सूरज को डूबते हुए देखने मे खोया ही था कि मुझे इस रास्ते से आते हुए एक शानदार घोड़ों की गाड़ी दिखी .. देखते देखते गाड़ी मेरे क़रीब आ कर रुकी .. घोड़े पसीने से नहा रहे थे पता चल रहा था कि बहुत दूर से आ रहे है .. और घोड़ा गाड़ी मे काला लिबास पहने , हाथों मे लंबा सा चाबुक थामे एक मज़बूत जिस्म का आदमी था …वो छलान्ग लगा कर नीचे उतरा .. पहले उसने दोनो घोड़ों की गर्दनों पर हाथ फेरा .. में ने देखा घोड़े ना मालूम दहशत से काँप रहे थे .. और फिर इस आदमी ने हाथ गाड़ी के अंदर बढ़ाया और एक हसीन ओ जमील लड़की को सहारा देकर बाहर निकाला … में ने ऐसी खूबसूरत औरत ज़िंदगी मे पहले कभी नही देखी .. वो शादी के कपड़ों मे थी , लेकिन ये देख कर मुझे बहुत हैरानी हुई कि वो ज़ार ओ क़तर रो रही थी

तबरेज़ी की आँखों से आँसू गिरने लगे और उसकी ज़बान से ये अल्फ़ाज़ निकले

तबरेज़ी :- फ़ातिमा … मेरी फ़ातिमा … मुझे मुआफ़ करना फ़ातिमा में ने तुम पर बहुत बड़ा ज़ुल्म किया

बूढ़े ज़ेघाम ने पूछा

ज़ेघाम :- क्या वो लड़की तुम्हारी कोई अज़ीज़ा या बेटी थी ??

तबरेज़ी ने गम से निढाल होते हुए कहा

तबरेज़ी :- हां वो मेरी हक़ीक़ी भांजी है .. में उसी की तलाश मे मारा मारा फिर रहा हूँ .. जिसको तुम ने उसके साथ देखा वो खुद को जलालाबाद का सूबेदार बता रहा था और मे ने अपनी भांजी की शादी उसके साथ करदी … खेर तुम आगे सूनाओ ..
ज़ेघाम :- लड़की उसके पंजे से आज़ाद होने के लिए हाथ पाओं मार रही थी और उसके रोने की आवाज़ मज़ीद बुलंद हो गयी .. मुझसे रहा ना गया .. मे ने आवाज़ दे कर कहा .. “ कॉन हो तुम और इस बेचारी से ऐसा सुलूक क्यू कर रहे हो “ जवाब मे उस शख्स ने इस ज़ोर से थप्पढ़ मारा कि मे ज़मीन पर गिरा और फिर मुझे अपने तन बदन का कुछ होश ना रहा … आँखें खुली तो मे अभी तक उसी जगह पड़ा था .. आसमान पर तारे झिलमिला रहे थे .. मे ने गेर्दन उठा कर दाए बाए देखा .. आप मेरी हैरत का अंदाज़ा नही लगा सकते जब मे ने घोड़ा गाड़ी को उसी जगह खड़ा पाया … खुदा जाने वो पुरीसरार शख्स उस लड़की को लेकर कहाँ गायब हो गया था .. उसके थप्पढ़ से मेरे गर्दन और जबड़े बुरी तरह से दुख रहे थे .. क़िस्सा मुख्तसर मे उठ कर गाड़ी के पास गया और अंदर देखा तो पाया अंदर कोई ना था ..फिर मे घोड़ा गाड़ी को लेकर अपने मकान के पास लाया .. मेरे बेटे और पोते के आने पे में ने सारा क़िस्सा उन्हें बताया तो उन्होने महीनों तक खंडहर और जलालाबाद छान मारा , ना वो पुरीसरार शख्स कही मिला और ना ही वो लड़की ..


इस दास्तान ने तबरेज़ी और बिलाल शम्स दोनो पर अजीब असर डाला .. एक की आँखें तर थी और एक की खुश्क .. एक फ़ातिमा का सब कुछ था और एक कुछ भी नही .. एक का गम ज़हिरी था और एक का अन्द्रुनि .. जब वो वापिस आली शान हवेली मे पहुँचे तो मुर्दों से भी बदतर थे ,,, इस सफ़र मे तबरेज़ी पर ये हक़ीक़त भी ज़ाहिर हुई थी कि बिलाल शम्स के तसवुरात और ख़यालात पर किस की हुक्मरानी है …

केयी महीने गुज़र गये .. तबरेज़ी अपनी भांजी और इस के पूर इसरार शोहर की तलाश आए दिन मारा मारा फिरता , लेकिन कहीं से कोई सुराग ना मिलता … तलाश की हर ऐसी मुहिम ( प्लॅनिंग ) मे बिलाल शम्स इसके साथ होता .. सर्दियों के दिन थे , उस्ताद और शागिर्द दोनो रात के खाने से फारिघ् हो कर आतिश दान के क़रीब गर्दन झुकाए बैठे थे .. तभी सदर ( मेन ) दरवाज़े की जानिब से मुसलसल दस्तक की आवाज़ें सुनाई देने लगी .. वो दोनो चोंक कर एक दूसरे की तरफ तकने लगे .. बूढ़ा चोकीदार जल्दी से दरवाज़े की तरफ दौड़ा .. ये दोनो अभी कमरे से निकल कर हवेली के सहेन मे आ गये ..

दस्तकें बराबर दी जा रही थी .. ज्यों ही छोटा दरवाज़ा खुला , कोई अंदर आया … तबरेज़ी और बिलाल शम्स दोनो की निगाहें एक ही वक़्त मे आने वाले पर पड़ी .. और इन के बदन मे खून की गर्दिश तेज़ हो गयी .. ये फ़ातिमा थी .. इसका लिबास फटा हुआ और चिथड़े से लटका हुआ था .. फूल सा चेहरा कमला गया था , आँखें जर्द और अंदर को धँसी हुई … वो धडाम से फर्श पर गिरी और बेहोश हो गयी …

तबरेज़ी और बिलाल शम्स दोनो बे अख्तियार उसको उठाने के लिए लपके .. इन्हों ने उसे कमरे मे ला कर आतिश दान के पास लिटाया .. फ़ातिमा का जिस्म यख ( ठंडा ) हो रहा था और होंठ नीले पड़ चुके थे .. चन्द लम्हों बाद इस ने होश मे आकर आँखें खोली और कांपति हुई आवाज़ मे बोली …

फ़ातिमा :- पानी .. पानी .. खुदा के लिए मुझे पानी पिलाओ.. प्यास से जान निकली जा रही है ..

उन्हों ने जल्दी से उसे पानी पिलाया .. साँस लिए बगैर ही पूरा प्याला पी गयी .. पता नही कब की प्यासी थी ..

फ़ातिमा :- अब मुझे कुछ खाने को दे दो .. फ़ौरन .. वरना मे मर जाउन्गी …

किचन से इसी वक़्त भुने हुए गोश्त का एक बड़ा सा टुकड़ा लाया गया .. बिलाल शम्स ने इसे काट कर फ़ातिमा को खिलाना चाहा , लेकिन इसमे सबर की इतनी भी ताब ना थी , इसने नवजन के हाथ से झपट कर गोश्त का टुकड़ा छीना और दाँतों से काट काट कर चबाए बगैर निगलने लगी , फिर वो अपने हवास मे आई और इसने पहली बार अपने मामू तबरेज़ी और अपने महबूब बिलाल शम्स का पहचाना , फिर शरम से चेहरा हाथों मे ढांप कर रोने लगी … तबरेज़ी ने कहा ….

तबरेज़ी :- फ़ातिमा बेटी ये क्या हाल है ? और वो तुम्हारा शोहर कहाँ है ?

फ़ातिमा :- वो … वो .. मामू जान .. खुदा के लिए उसका ज़िक्र ना कीजिए .. में बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर आई हूँ .. वो तो नज़ाने कॉन है …

तबरेज़ी :- इस वक़्त वो कहाँ हैं ? में उसे तुम्हे तंग करने का मज़ा चखाउन्गा ..

फ़ातिमा :- आह .. मामू जान देर ना कीजिए .. जल्दी किसी को भेजिए .. यहाँ शहर मे कोई अच्छा सा आमिल ज़रूर होगा .. उसे बुलवा लीजिए , वरना वो मुझे कभी नही छोड़ेगा …

तबरेज़ी :- आमिल का यहाँ क्या काम फ़ातिमा बेटी .. में उस बदमाश से निपटने के लिए अकेला ही बहुत हूँ .. अगर वो ज़ियादा तेज़ी दिखाए गा , तो शाहेंशाह से कह कर उसे सज़ा दिलवा दूँगा ..

फ़ातिमा :- हाए मामू जान .. आप समझते क्यूँ नही ..वो आदमी नही , एक शरीर जिन्न है जिस ने इंसानी इज़म मे आकर ये शैतानी चाल चला रखा है … जल्द किसी आमिल को बुलाए और हां मुझे एक लम्हे के लिए भी अकेला ना छोड़ा जाए .. ये सख्ती से हिदायत करती हूँ .. अगर आप ने मुझे तन्हा छोड़ दिया .. तो वो मुझे फिर पकड़ कर ले जाएगा …
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Kamini
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Re: पुरानी तस्वीर ( ए हॉरर लव स्टोरी )

Post by Kamini » 02 Dec 2017 20:50

plz ise bhi poora karo

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