कठपुतली -हिन्दी नॉवल complete

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कठपुतली -हिन्दी नॉवल complete

Postby Jemsbond » 10 Jan 2017 16:41

कठपुतली -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

"मार डाला मार डाल विनम्र । विनम्र नामक युवक के अन्दर बैठी जाने कौन-सी ताकत ने उसे उकसाया------" मार डाल उस लड़की को!


जरा सोच, मरने के बाद वह कितनी सुन्दर लगेगी । गला दवा दे, उसकी बड़ी बड़ी आखे फटी की फटी रह जाएगी यहीं स्वीमिंग पूल के नीले से नजर अाने बाले पानी पर तैरती रह जाएगी उसकी लाश ।


" पहले वह डूबेगी ।



फिर खुबसुरत जिस्म में पानी भर जाएगा और वह फूलकर कुप्पा हो जाएगी । कांच की गोलियों की तरह बेजान हो चुकी आंखें खाली आकाश को ताकती रह जाएगी ।


वाह !


क्या सीन होगा वह । मजा आ जाएगा! विनम्र, मजा आ जाएगा ! मार डाल उसे।"


"विनम्र विनम्र ।" किसी ने उसे झझोड़ा ।


"आं" वह चौका ।


चौंककर झझोड़ने वाली की तरफ़ देखा ।


वह श्वेता थी ।


उसकी अपनी श्वेता ।


वब, जिसके साथ विनम्र यहाँ आया था । जिसे वह वहुत-वहुत प्यार करता था ।


परन्तु!


इस वक्त वह उसे अजनबी-सी लगी ।


"विनम्र । " हैरान नजर आ रही श्वेता ने पूछा---" क्या होगया है तुम्हें ?"


" म--मुझे?" विनम्र के मुह से हड़वड़ाए हुए शब्द निकले-----म-मुझे क्या होता ?"


"कुछ तो हुआ था ।" श्वेता बोली------"आस-पास आइना होता तो तुम्हें दिखाती । भभक कर लाल हो गया तुम्हारा चेहरा । ठीक यूं जैसे किसी दहकती भटृटी के नजदीक बैठे । जबड़े कस गए थे । आंखों में आखों में इस कदर हिंसक भाव उभर अाए थे कि मुझ तक को तुमसे डर लगने लगा था !"
बिनम्र को लगा------"श्वेता (shweta) ठीक कह रही है बह खुद को अभी-अभी किसी भयंकर स्वप्न से बाहर निकलता सा लगा ।।



वड़वड़़ाया-----" हां कुछ हुआ तो था । "

"क्या हुआ था?" श्वेता ने पूछा ।


" नहीं पता ।"


"अजीब बात कर रहे हो विनम्र तुन्हें कुछ हुआ और तुम्हीं को नहीं पता कया हुआ था । ज़ब तुम्हें कुछ हुआ था तब तुम 'उसे' घूर रहे थे ।"


"क-किसे ?"



"उस क्लमुंही को ।" श्वेता ने अपनी वड्री-बड्री आंखे स्वीमिंग पूल की तरफ घुमाइं।



अब.. .बिनम्र ने भी उस तरफ देखा ।

हां , वह वही थी । एक लड़की । एक ऐसी लडकी जिसके जिस्म पर केवल ब्रा और बी शेप का अण्डरवियर था ।

स्वीमिंग पूल के पानी में अपने पुरूष साथी साथ अठखेळियां कर रही थी ।।।। पुरुष अथेड्र था। लड़की से करीब दुग्नी उम्र के पुरूष ने उसे बांहो मे भरना चाहा मगर लड़की खिलखिलीई और मछली की मानिन्द पानी के अंदर तैरती चली गई यूं जैसे पुरुष को 'तरसा' रही हो !


स्वीमिंग पूलपर और लोग भी थे।


बल्कि अनेक लोग वे ।


वे शोर भी कर रहे थे मगर विनम्र के कानों में गूंजी तो सिर्फ ओर सिर्फ उस लड़की की खिलखिलाहटा यह खिलखिलाहट ।।।। विनम्र के अपने कानों मे पिघलते हुए शीशे की मानिन्द उतरती सी लगी और आंखे.. आखें एक बार फिर उसी पर जमीं रह गई ।


उस पर जिसे विनम्र ने आज से पहले कभी नहीं देखा था । वह लड़की उसके लिए पूरी तरह अजनबी थी ।



इसके इस वक्त उसे सिर्फ और सिर्फ वह लडकी ही नजर आ रहीं ।


स्वीमिंग पूल पर मौजूद भीड़ में से उसे और कोई नजर नहीं आ रहा था !!!!!


उसका पुरुष साथी भी नहीं ।


एक बार फिर जेहन ने बिस्फोट-सा हुआ ।।।


उसके अंदर मौजूद अंजानी ताकत चिखी -----" कितनी सुन्दर है यह लडकी, मगर मरने के बाद और भी ज्यादा सुन्दर लगेगी । हाथ-पैर ठंडे पड़ जाएगे उसके! वाह !!...मजाआ-जाएगा! बिनम्र मार डाल उसे।"



दिखो----देखो विनम्र ।’" श्वेता की घबराई हुई आवाज वहुत दूर से आती महसूस हुई----" तुम्हारा चेहरा फिर भभकने लगा है । जबड़े फिर कस गये है । तुम्हें कुछ हो रहा है विनम्र । खुद को सम्भालो !!"
"हां ।" विनम्र ने मन-ही-मन खुद से कहा ---- " श्वेता ठीक कह रही है । मुझे खुदे को सम्भालना चाहिए । वरना मैं उस लड़की को मार डालूँगा । मगर क्यों------मैं तो उसे जानता तक नहीं । फिर मैं क्यों उसे मार डालना चलता हूं? है भगवान ये मुझे क्या हो रहा है? मैं क्यों उस लड़की की गर्दन दबाना चाहता हूं ?"



"क्योंकि यह मरने के बाद सुन्दर लगेगी ।" जवाब उसके अंदर मौजूद अज्ञात ताकत ने दिया---"उससे कई गुना ज्यादा सुंदर जितनी इस वक्त लग रही है !! अपनी आंखों को सुकून पहुचाना चाहता है तो उसे मार डाल । बहुत शांती मिलेगी तेरी आत्मा को । यकीन नहीं आता तो उसकी गर्दन दबाकर देख ।"


"होश से आओ विनम्र होश में आओ ।" घबराई हुई श्वेता ने उसे एक बार फिर झंझोड़ा ।


बिनम्र फिर चौका ।


जैसे सोते से जागा हो ।


उस लडकी के अलावा भी सब कुछ नजर जाने लगा । लड़की के साथ का पुरुष भी । स्वीमिंग पूल पर मौजूद भीड भी और बुरी तरह आतंकित श्वेता भी । एक बार फिर श्वेता को अजनबियों' की-सी नजर से देखा । साथ ही महसूस किया, उसका अपना चेहरा इस वक्त पसीने से बुरी तरह भरभराया हुआ है ।


"तुम्हें फिर कुछ हुआ था विनम्र?" श्वेता ने पूछा----" आखिर बात क्या है?"


“चलो यहां से ।" श्वेता के सवालो का जवाब देने की जगह बिनम्र ने उसकी कलाई पकड़ी और तेजी के साथ 'स्वीमिंग पूल जौन' से बाहर निकलने बाले रास्ते की तरफ बढ गया ।



"अरे---अरे!" उसके साथ खिंची चली जा रही श्वेता ने कहा---"ये क्या कर रहे हो विनम्र हम लोग यहाँ 'एन्जजॉय' करने आए थे मगर तुम हो कि जाते ही बापस चलने........


"श्येता ।" उसने ठिठक-कर कहा--"अगर मैं यहाँ रुका तो उसका खून कर दूंगा ।"


"ख-खून ।" श्वेता के जिस्म का रोया खड़ा हो गया ।


"हाँ ।"


"क-किसका?"
विनम्र ने स्वीमिंग पूल में अठखेलियां कर रही लडकी की तरफ इशारा करके कहा…"उसका ।"


" क--वया बात कर रहे हो?" श्वेता हकला गई…“क्या तुम उसे जानते हो?"


"नहीं ।"


"फिर क्यो. . .क्यों खून कर दोगे उसका?"


“मुझे नहीं पता । "


"अजीब बात कर रहे हो विनम्र । जिसे जानते तक नहीं । जिससे न तुम्हारी दोस्ती है न दूश्मनी । जिससे तुम्हारा कोई सम्बन्य ही नहीं है उसे क्यों कत्ल कर दोगे ?"


"कहा न मुँझे नहीं पता ! केवल इतना जानता हूं---अगर वह लड़की मेरी आंखों के सामने रही तो मैं उसे छोड़ूंगा नहीं । क्या तुम चाहती हो मैं हत्यारा वन जाऊं ?"


"न-नहीं?" श्वेता कांपक्रर रह गई…"म-मैं भला ऐसा कैसे चाह सकती हूं ?"


"तो फिर आओ मेरे साथा निकलो यहां से ।" कहने के साथ एक बार फिर वह उसकी कलाई पकडकर "स्वीमिंग पूल जोन' से बाहर की तरफ़ बढ़ गया । लड़की अब भी अपने पुरुष साथी को 'सता' रही थी ।



Last edited by Jemsbond on 10 Jan 2017 17:32, edited 1 time in total.
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Re: कठपुतली -हिन्दी नॉवल

Postby Jemsbond » 10 Jan 2017 16:44

बेचारी को तो इल्म तक नहीं थी कि वह मरने से बाल-बाल वची है !
विनम्र के हाथ काले रंग की चमचमाती हुई लैंसर के स्टेयरिंग पर जमे हुए थे ।



बहुत ही प्रान्त भाव से गाडी ड्राईव कर रहा था वह ।

श्वेता बगल बाली सीट पर बैठी थी । पिछले करीब दस मिनट से उनके बीच संन्नाटा था और दस मिनट ही उन्हें होटल ओबराय के ' स्विमिंग पूल जोन ' से निकले हुए थे ! विनम्र ने खामोशी से गाड़ी निकलकर सडक पर डाल दी यी । श्वेता भी खामोशी के साथ बगल वाली सीट पर बैठ गई थी ।


विनम्र का दिमाग इस वक्त पूरी तरह शांत था । उसके अंदर की कोई आवाज परेशान नहीं कर रही थी । हां जहन में सवाल जरूर धुमड़ रहे थे ।
जैसे------" हुआ क्या था मुझें? क्यों मैं उस बेचारी अंजान लडकी को मार डालना चाहता था?"


अभी इन्हें सवालों में उलझा हुआ था कि श्वेता ने खामोशी तोड़ी---'विनम्र ।"

"हू ।”


"तुम ठीक हो न?"


" हां ! अब मैं बिल्कुल ठीक हूं ।"


कुछ देर की के बाद श्वेता ने अगला सवाल किया---"क्या तुम उस आदमी को जानते थे ?”


"किस आदमी को"'


" बही जो स्वीमिंग पूल में नहा रही लड़की के साथ था ।"


" नहीं, मैं उसे नहीं जानता । पर तुम यह क्यों पूछ रहीं हो?"


" कारण जानने की कोशिश कर रही हू किं तुम्हारे दिमाग में उस लड़की को मारने का ख्याल वयों अाया? लड़की के बारे में तो बता ही चुके हो तुम उसे नहीं जानते थे । जब तक किसी की किसी से दोस्ती या दूश्मनी न हो तब तक कोई किसी को मारने की बात नहीं सोचता । तो मैंने सोचा मुमकिन है उस आदमी को जानते हो-----तुम्हें यह लड़की उस आदमी के साथ अच्छी न लगी हो । इसी कारण तुम्हारे दिमाग में लड़की को मारने की बात अाई हो । और"

श्वेता का वाक्य अधूरा रह गया ।


कारण था-विनम्र द्वारा जोरदार ढंग से लगाया गया ठहाका ।


श्वेता को 'बरगलाने' का उसे यहीं एक मात्र रास्ता सूझा था । यह कि जोरदार ठहाका लगाने के बाद लगातार जोर-जौर से हंसता चला गया । इस कदर कि श्वेता को कुछ कहने का मौका हो नहीं मिला ।


वह तो बस हकवकाई--सी, हैरत में दूबी उसे देखती रह गई उसे, जो इस वक्त एक हाथ से स्टेयरिंग सम्भाले हुए था । दूसरे से पेट पकड़कर हंस रहा था । वह तब तक हंसता रहा जब तक हैरान-परेशान श्वेता ने पूछ नहीं लिया'----" 'बिनम्र पागल हो गए हो क्या? इस कदर हंस क्यों रहे हो ?"


"हंसू नहीं तो क्या करूं ?" हंसने के बीच ही उसने कहा था-" तुम्हारे तो छक्के छूट गए ।"


" क क्या मतलब तुम उस लड़की को कत्ल करने की बात कर रहे थे । छक्के नहीं छूटते तो ओंर क्या होता?"
" और तुमने यकीन कर लिया ?"


"यकीन न करने का कारण ही क्या था? लेकिन...........


"क्या लेकिन?" वह अब भी हंस रहा था ।


"तुम्हारी इस हंसी का आखिर मतलब क्या है? "



" मतलब ये मेरी जान कि मेरे दिमाग में तुमसे शरारत करने का ख्याल आया और मैंने शरारत कर डाली ।"


"श-शरारत वह शरारत थी ?"


"और नहीं तो क्या तुम सचमुच मानती हो कि मैं किसी का कल कर सकता हूं ?"


"नहीं ।" श्वेता ने गोर से उसके चेहरे को देखने के साथ दूढ़तश्वर्वक कहा------" मैं नहीं मान सकती वह शरारत थी । मुझे अब तक तुम्हारा वह खूंखार चेहरा याद है । उफ्फ! उस चेहरे को याद करके मैं अब भी अपने सारे शरीर झुरझुरी-सी महसूस कर रही हूं । अचानक ही डरावने नजर अाने लगे थे तुम । तुम्हें ज़रुर कुछ हो गया था । नहीं हुआ होता तो तुम्हारी आंखों में खून नहीं उतर अाया होता ।"’


एक्टिग जारी रखे विनम्र ने कहा------अव तुम मेरी एक्टि'ग की तारीफ कर रहीहो न ... शुक्रिया !!



"एक्टिंग !" श्वेता ने उसे घूरा…"वह एविदंग थी ?"


"मगर 'रीयल' लगा । पूरी तरह झांसे मैं आ गई मेरे । तव तो मानना पड़ेगा----मैं एक परफैक्ट एक्टर हूं !"

श्वेता उसे जब भी संदिग्ध नजरों से घूरती वोली -- " तुम सच बोल रहे हो न ?"


"क़माल है । मैं तुम्हें तब एक्टिंग करता लग रहा हूं जब एक्टिंग नहीं कर रहा ! "

" इसका मतलब तुमने मुझे बेवजह डराया?"


"मुझे नहीं मालूम था तुम इतनी डरपोक हो ।’


" क्यूं. . .क्यूं. . .क्यूं . . . डराया मुझे?" कहने के साथ उसने अपनी छोटी-छोटी मुटिठयों से बिनम्र के बलिष्ठ कंधे पर घूंसे बरसाने शुरू कर दिए-----" और डराने के लिए भी तुम्हारे दिमाग में इतना भयंकर बिचार आया । उत बेचारी लड़की के, कत्ल की बात करने लगे?"


"वस-बस देवी जो?" विनम्र अब भी हँस रहा था---"ज्यादा घूंसे वरसाओगी तो गाडी किसी से टकरा जाएगी ।"



"टकरा दो यही तो चाहती हूं मैं । मौत भी मिले तो तुम्हारे साथ ।।।।
तुम्हारी बांहों मैं ।"


" पगली । " विनम्र का लहजा उसके प्रति प्यार से लबरेज था ।

श्वेता ने भावुक अंदाज़ में अपना सिर उसी कंधे पर रख दिया जिस पर पल भर पहले घूंसे बरसा रही थी । नेत्र बंद होगये ! होंठों से शब्द निकले------" विनम्र, बहुत डर गई थी मैं । "

श्वेता को तो खैर उसने संतुष्ट करदिया मगर खुद को संतुष्टनहीं कर पा रहा था । एक ही खौफ उसे बूरी तरह थर्राये दे रहा था वह यह कि अगर फिर कभी उस अज्ञात ताकत ने उसे किसी का कत्ल करने के लिए उकसाया और वह खुद को नहीं रोक पाया तो क्या होगा?"

उसके जिस्म में मौत की सिहरन, अ्काशीय बिजली की मानिन्द कौधंती चली गई !!!!!!!
"कहो नागपाला कैसे याद किया मुझे ?" पूछने है बाद विंदू ने शी वाज रीगल'के पेग से भरा गिलास होंठो से लगा लिया ।



" विनम्र को जानती हो?” सूअर की थूथंनी जैसे चेहरे वाले ने पूछा ।


गिलास सेन्टर टेबल पर रखती बिंदु ने कहा---"क्या तुम भारद्वाज कंस्ट्रक्शन कम्पनी के मालिक की बात कर रहे हो ?"



" ठीक समझी ।" नागपाल ते अपना गिलास मेज से उठाकर होठों से लगा लिया ।


"इस किस्म की बातें समझने में मुझे महारत हासिल हैं ।" र्बिदू ने गाल पर लटक आई अपने वालों की एक लट को पतली-पतली और कोमल अगुंलियों से कान पर अटकाते हुए कहा----"वह आज देश की सबसे वेड़ी कंस्ट्रक्शन कम्पनी का मालिक है और तुम्हारा काम है बड्री बड़ी का्लोनियां बनाने के ठेके लेना! तो जाहिर हैं-तुम उसी विनम्र भारद्वाज की बात कर रहे होंगे ।"



"वाकई तुम समझदार हो ! " भले ही नागपाल ने अाकर्षक अन्दाज में मुसकराने की कोशिश की थी मगर वह मुस्कान काले और मोटे हौंठो पर वेहद भध्धी लगी थी---" और जब इतनी समझदार हो ही तो यह भी…समझ गई होगी के मैने तुम्हें किसलिये याद किया है?”

"जिस कालोनी का ठेका तु म हथियाना चाहते हो वह कहाँ बन रही है?"


" हरिद्वार में "


“स्थिति क्या है?"


"' उसी काम के हासिल करने की कोशिश मेरे जैसे दूसरे ठेकेठार भी कर रहे हैं। टैंडर डाले जा चुके हैं । मुझे मालूम है--टैंठर के बेस पर यह
काम नहीं मिलेगा । मेरा कप्पटीटर कम से भी कम में काम करने की अपनी पॉलिसी के तहत दुसरे बड़े कामों की तरह इसे भी हथिया लेगा !
"तो इन हालात में तुम्हें एक मात्र मैं नजर आई ।"


“जाहिर है ।"


" ऐसा किस वेस पर समझते होकि मैं तुम्हारे लिए इस काम को हासिल कर सकती हूं ?"



"विनम्र अभी लडका है । जवान पटृठा! गर्म गोश्त. की ताप से वह खूद को बचा नहीं सकता । बल्कि. मेरे ख्याल से तो इस उम्र मे कोई भी खुद को उस सबसे नहीं बचा सकता जो तुम्हारे पास भरपूर है ।" कहने के साथ नागपाल ने एक भरपूर नजर बिंदू के गदराए जिस्म पर डाली ।



बह खिलखिलाकर हंस पड़ी ।

सच्चे मोतियों से उसके दांत झिलमिला उठे ।


वह सुन्दर थी । सुन्दर शायद इतनी नहीं थी, जितनी सैक्सी नजर अाती थी । उसके गोरे और गोल मुखडे पर मोजूद नोकिली नाक, सामने बाले को अपनी तरफ़ खींचती आंखें और हमेशा गीले से रहने वाले होठों में ऐसा था कि हर पुरुष की इच्छा उन्हें चूमने की हो उठती ।

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Re: कठपुतली -हिन्दी नॉवल

Postby Jemsbond » 10 Jan 2017 16:44


उसने मेज पर पड़ा 555 का पैकिट उठाया और सोफा चेयर से उठकर खडी हो गई अपने पांच फुट पांच इंच लम्बे जिस्म पर इस वक्त उसने टांगो से चिपकी ब्लैक कलर की जींस और’ टी शर्ट पहन रखी थी । बेहद लम्बी सुडौल टांगो और पुष्ट वक्ष स्थल के कारण वह कुछ ज्यादा ही सैक्सी नजर आती थी ।


नपे तुले जिस्म को और ज्यादा नपा-तुला शायद इसलिए वना रखा था क्योंकि यह जिस्म ही उसकी वह दुक्रान थी जिसकी कमाई पर ऐश किया करती थी ।।।।



म्युजिकल लाईटर से सिगरेट सुलगाने के बाद कमरे में चहलकदमी शुरू की । बोली ----- " दुनियां में ऐसा कोई मर्द नहीं है जिसे बिंन्दू अपनी अगुंलियों पर नचा ना सके मगर.................


" मगर ? "


" कीमत बोलो ! "


" एक लाख !"


बिंन्दू ने ऐसा मुंह बनाया जैसे कुनैन की गोली फंस गयी हो । बोली --" इतने धटिया आदमी तुम पहले तो नहीं थे !"


" क- क्या मतलब ?" नागपाल हड़बड़ा सा गया ।


" दस लाख । " कहने के साथ उसकी तरफ घूमी ।।।।


" दस लाख । " नागपाल चिहुंका --" दिमाग खराब होगया है क्या ?"
"मंजर हो तो हां‘ कहो । नामंजूर हो तो मैं चली । 'शी वाज रीगल’ के पग के लिये शुक्रिया ।" कहने के साथ यह घूमी और दरवाजे की तरफ बढ गई

"अरे अरे----कहां जा रही हो?" नागपाल चीखता-सा गया ।।।

वह ठिठकी । पलटी और बोली-"मेरे पास वेस्ट करने के लिए टाईम नहीं है नागपाल । काम होने से पहले पांच लाख देने को तैयार हो तो तुम्हारे साथ 'शी वाज रीगल' का एक और पैग पीने का मूड बनाऊं ।"


"प-पाच ।" नागपाल ने कहा --"सारे काम के पांच लाख मिलेंगे ।"

बिन्दू बोली-"ढाई काम होने के वाद और ढाई अभी! यहीं! इसी कमरे मे !"


" डन ।" नागपाल को कहना पड़ा ।


" गुड ।" एपने रसभरे होठों पर मुस्कान बिखेरने के साथ वह लम्वे-लम्बे दो ही क़दमों में न केवल सेन्टर टेबलके नजदीक आ गई बल्कि "शी वाज रीगल' की बोतल से एक पैग अपने गिलास मे डालती हुई बोली------" अब तुम्हें केवल यह बाताना है विनम्र को मुझे कब और कहां शीशे मैं उतारना होगा ?"


जवाब देने से पहले नागपाल को अपना पैगं हलक से नीचे उतारने की सख्त जरूरत महसूस हुई ।


जिस वक्त यह ऐसा कर रहा था ठीक उसी वक्त कमरे की एक खिडकी के उस तरफ खडे बेहद पतले-दुबले शख्स ने अपने हाथों में मौजूद कैमरे का बटन दबा दिया ।

कमरे का दृश्य कैमरे मे कैद हो गया ।

उस शख्स के कैमरे में जो अपनी हालत और पहनावे से "फक्कड़' नजर आ रहा था । बाल विखरे हुए थे उसके । कपड़े मैले । जूते फटे हुए और कैमरा भी कोई खास कीमती नहीं था ।


फोटो खीच लेने के वावजूद वह खिडकी से हटा नहीं ।
" सॉरी मिस्टर नागपाल ।"


विनम्र ने विनम्ररता पूर्वक कहा ---" यह प्रोजेक्ट भी आपको नहीं मिल सकता ।"


"वजह जान सकता हु."'

" आपके रेट बहुत, ज्यादा है ।"


'कितने ज्यादा हैं ? "


"आप जानते है…किसी और के रेट बताना बिजनेस के उसूलों के खिलाफ है ।"


"चलिए मैं किसी और के रेट नहीं पूछता ।" कहने के साथ सुअर जैसी धूथनी बाले शख्स ने जेब से पांच सौ पचपन का पैक्रिट निकालकर एक सिगरेट सुलगाई और जिस कुर्सी पर बैठा था उसकी पुश्त से पीठ टिकाकर थोडे 'रिलेक्स' अंदाज में बैठता बोला----‘"मगर इतना यकीन दिलाता हूं कम से कम यह काम मैं और केवल मैं ही करूंगा ।"


"रेट खुल चुके है मिस्टर नागपाल और. . .


"अभी केवल रेट ही खुले है न विनम्र साहब । गगोल को काम तो नहीं दे दिया आपने?"


"गगोल को! " विना का लहजा थोडा सखा हुया---"आपकों कैसे मालूम टेंडर में मिस्टर गगोल के रेट सबसे कम थे?"


" क्योंकि कम-से-कम में केवल वही काम कर सकता है ।"


“ओह् ।" इस वार विनम्र के होठों पर मुस्कान उभर अाई----" तो अाप इस बात को जानते हैं?"


"जाननी पडी । पिछले एक साल से गगोल मुझे मात पर मात दिए जा रहा है । पहले ही से इस धंधे से मेरे कप्पटीटर दूसरे लोग भी है मगर वे कभी मेरा काम नहीं छीन सके । एक साल पाले गगोल ने मुझसे अलग होकर अपना धंधा शुरू किया था । तब से आज तक उसने मुझें भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का एक भी काम नहीं लेने दिया । कारण एक ही है-----वह मेरे काम करने के स्टाईल से पूरी तरह परिचित है । जानता है कि अपने रेट कहां और किस तरह मेरे से कम रख सकता है ।"


"वह कंपटीशन अाप दोनों का है । उस सब से मुझे कोई मतलब नहीं । जिस कुर्सी पर इस वक्त मैं बैठा हूं उस की डिमांड है कम-से-कम रेट में काम कराना ।"


"आपने रेट.. .ओंर केबल रेट पर ध्यान देना कव से शुरु कर दिया ?"
"क्या मतलब ? "


"कुछ दिन पहले तक अापका ध्यान रेट से ज्यादा क्वालिटी पर हुआ करता था ।"


" अब भी है! मिस्टर नागपाल, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं --- हमारी कम्पनी की पॉलिसियां बिल्कुल नहीं बदली हैं ।'"


"तब मैं ये कहुंगांअगर पंलिसिंयां नहीं वदली है तो क्वालिटी पर आपकी तबब्जी कम जरूर हुई है ।"


"मैं नहीं समझता ऐसा हैं ।"


" ऐसा ही है विनम्र साहब हन्डेरेड परसेन्ट _एसा ही है ।" नागपाल अपनेएक-एक शब्द पर जोर देता कहता चला गया------" मैं साबित कर सक्ता हूं गगोल उस क्वालिटी का काम नहीं कर रहा जो क्वालिटी भारद्वाज कंस्ट्रक्शन कम्पनी को मैं दिया करता था ।"


विनम्र के गुलाबी होठो पर मुस्कान दौड़ गई बोलै ----" मिस्टर नागपाल, फिलहाल कहने के लिए इसके अलावा आपके पास औंर है क्या?"


"मैं केवल कह नहीं रहा विनम्र साहब अपनी बात साबित करने की बात कर रहा हूं !"


" ऐसा है तो कीजिए साबित मैं सुन रहा हू।" कहने के साथ विनम्र भी रिलेक्स मूड मे आ गया ।


"यहां नहीं !"



" मतलब ?" विनम्र थोड़ा चौंका ।


"मेरी बात ध्यान से सुनने और समझने के लिए आपको ओबराय कांटीनेन्टल के सुईट नम्बर सेबिन जीरो थर्टीन में आना होगा ।"


“ऐसा क्यों ?"


"इस 'क्यों' का ज़वाब भी आपको बहीं मिले तो बेहतर होगा ।"



"सॉरी मिस्टर नागपाल! मैं वहाँ नहीं जा सकता ।" विनम्र ने निर्णायक स्वर में कहा---"आपको मालूम होना चाहिए, में बिजनेस से कनेबिटड हर डीलिंग यहां और केवल यहीं करता दूं। अपने आँफिस मे ।"


"जबकि यह जगह अब उतनी सुरक्षित नहीं है जितनी कभी हुआ करती थी !"



"क्या मतलब ? " इस वार विनम्र को चोंक जाना पडा । "


"आपके इस साबाल का जबाब मुझे यहीं देना होगा ।
वर्ना समझ चुका हुं, अाप बहां नहीं आएंगे ।" कहने के साथ नागपाल ने अपनी सिगरेट का अतिंम सिरा मेज पर रखी एशट्रै में कुचला और बगैर जरा सी भी आवाज पैदा किए कुर्सी ते खड़ा हो गया ।



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Re: कठपुतली -हिन्दी नॉवल

Postby Jemsbond » 10 Jan 2017 16:45


उसके यूं वात अधूरी छोडकर खडे़ होने पर विनम्र को आश्चर्य हुआ । कुछ कहने के लिए उसने मुंह खोला ही था कि नागपाल अपने होठों पर अंगुली रखकर चुप रहने का इशारा किया ।


विनम्र चेहरे पर हैरानी के भाव उभर अाए ।


उस वक्त तो मानो उसकी समझ में कुछ अाने को ही तैयार नही था जव नागपाल को दवे पांव अाफिस के दरवाजे को तरफ़ बड़ते देखा । वह पूछना चहता था --- यह अाप क्या कर रहे है मिस्टर नागपाल? मगर, नागपाल की तरफ़ से किया जा रहा चुप रहने का इशारा, किंकर्त्तव्यविमूढ़ बनाए हए था ।


नागपाल दरवाजे कै नजदीक पहुचा ।


और फिर, एक झटके से दरवाजा खोल दिया ।

दरवाजे का खुलना था कि झोंक में 'भारद्वाज कंस्ट्रक्शन कम्पनी' का एक कर्मचारी यूं लड़खड़ाकर आँफिस में अाया जैसे दरवाजा खुलने से पहले दरवाजे पर कान लगाए अंदर की बाते सुनने की कोशिश कर रहा था ।

नागपाल ने उसके बाल पकड़कर पूरी तरह आँफिस के अंदर खीचा । दूसरे हाथ से आँफिस का दरवाजा वापस बंद किया । उस सबको देखकर विनम्र अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया था । मुंह से निक्ला---" ये सव क्या है मिस्टर नागपाल?"


"यह सबाल मुझसे नहीं, इससे पूछिए । इससे?" कहने के साथ नागपाल ने को विनम्र की तरफ धकेला ।


कर्मचारी ने लडखड़ाकर खुद को गिरने से बचाया ।


नागपाल ने थोड़े उत्तेजित स्वर में कहा----“पूछिए इससे, किसके हुक्म पर हमारी बाते सुन रहा था?"


"'क्यो मिस्टर पाठक ।" विनम्र का लहजा सख्त था ---"ये सब क्या है? तुम दरवाजे पर क्या कर रहे थे?"

पाठक चुप रहा । उसने गर्दन झुका ली थी ।


उसकी चुप्पी ने विनम्र को ताव दिला दिया । हलक सैं गुर्राहट निक्ली--- " जबाव दो।"


वह अब भी चुप रहा ।
विनम्र ने झपटकर दोनो हाथों से उसका गिरेबान पकड़ा । अव मरे गुस्से के उसका बुरा हाल हो चुका था । गर्जा---"जवाब दो मिस्टर पाठक वरना हम तुम्हें इसी वक्त पुलिस के हवाले कर देगे ।"


"स-सॉरी सर ।" वह केवल इतना ही कह सका ।


"क्या सौरी? क्या मतलब है इस सांरी का ? " विनम्र चीखा…"किसके इशारे पर कर रहे थे ऐसा?"


"ग-गगोल साहब के ।"


"गगोल. . .! क्या कहा था उसने ?"


"म-मुझे माफ कर दीजिए सर । मैं थ्रोड़े से पैसों के लालच में आगया ।"


विनम्र आपे से बाहर हो चुका था, उसे झंझोड़ता हुआ गुर्राया-"जो पूछा है उसका जवाब दो_! गगोल ने तुमसे क्या कहा था ?"


" उन्होंने कहा-था'--बिनम्र साहब की दूसरे ठेकेदारों से जो भी बाते हों मुझे पता लगनी चाहिएं ।"


"और तुमने ऐसा करना शुरू कर दिया?"


उसने नजरे ही नहीं पूरा चेहरा झुका लिया ।


"जवाब दो?" विनम्र ने उसकी ठोडी पकडकर चेहरा एक झटके से उठाते हुए पूछा'--""कब से कर रहे हो ये काम?"

" और उसने केवल मेरी और विनम्र साहब की बाते खुद तक पहुंचाने के लिए कहा था या विनम्र साहब से होने बाली सभी ठेकेदारों की बातें?" अागे बढकर नागपाल गुर्राया ।


"स--सभी की ।" सहमे हुए पाठक ने _कहा---'उसने सभी की बाते सुनने के लिए कहा था ।" '


“कितने पैसे देता है वह तुम्हें?" बिनम्र ने पूछा ।


"पांच हजार रुपये महीना ।"


"और तुमने इस रकम के लिए जपना ईमान वेच दिया, कम्पनी से गद्दारी की!"

एक बार फिर पाठक ने चेहरा झुका लिया ।

"अब वार-बार मुंह क्यों छुपा रहे हो ? क्या वह तुमसे दूसरे ठेक्लऱरो के टेंडर्स में भरी रकम के बारे में . . .


"नहीं सर ऐसा कभी कुछ नहीं किया मैंने ।"
उसके द्वारा खरीदा गया अापकी कम्पनी का यह अकेला कर्मचारी
नही है विनम्र साहव !” नागपाल ने कहा ---" और लोग भी है इसलिए कहा था बाते करने के लिए यह जगह सुरक्षित नहीं रह गई है ।"


"और किसको खरीद रखा है गगोल ने ?" विनम्र नै पाठक से पूछा ।


पाठक ने कहा--------" और किसी के बारे में मैं नहीं जानता ।"



"झूठ बोल ऱहे हो तुम । भला ऐसा कैसे होसकता है कि...


"यह सवाल इससे नहीं, मुझसे पूछिए विनम्र साहव ।" उसकी बात काटकर नागपाल ने कहा ।


"आपसे?"


"छ: महीने से झक नहीं मार रहा हूं। मेरेदिमाग को लगातार यह सवाल कचोट रहा था कि गगोल द्वारा दिए गए रेट हर बार मुझसे कम क्यों होते हैं? इत्तफाक एक बार हो सकता है । दो बार है सकता है, मगर हर बार नहीं हो सकता । कारण पता लगाने के लिए अपने ढंग से जाल बिछाया । मिस्टर पाठक के अलाया एक-दो नाम और है जो आपसे भी तनखाह पाते हैं और गगोल से भी । बावजूद इसके मैं दावा नहीँ कर सकता कि आपकी कम्पनी में घुसपैठ कर -रहे गगोत के सभी आदमीयों तक पहुच चुका हूं !"


"जिन तक पहुंच चुके हैं उनके नाम बताइए ।"


"यहां नहीं उनके नाम बताने मैं ओबराय के सुईट नम्बर सेबिन जीरो थर्टीन मे पसंद करूंगा ।"


इस बार कुछ कह नहीं सका विनम्र । नागपाल की तरफ कैवल देखता रह गया ।



"आपकी उम्र भले ही कम हो विनम्र साहव मगर मेरी नजर मैँ आप इस धंथे के सबसे सुलझे हुए शख्स हैं ।"


नागपाल ने लोहा गर्म देखकर चोट की…“मेरे ख्याल से कम-से-कम जब आप इस बात पर गोर पकरेगे कि एक तरफ गगोल आपकी इतने कम रेट देता है, दूसरी नऱफ आपके कर्मचारीयों को इतनी मोटी - मोटी तनख्वाहें भी बांटता है तो कैसे
सर्वाइव करता होगा : सर्वाइव करने का उसके पास एक ही तरीका बचता है-क्वालिटी'से समझोता । सारे काम आप खुद तो देखते नहीं । ठीक भी है---सारे काम एक अकेला शख्स भला देख भी कहाँ तक सकता है । क्वालिटी कंट्रोल के लिए आपने अलग विंग बना रखा होगा । उसके इंचार्ज आपके मामा है । मिस्टर चक्रधर चौबे ।।।


उनकी रिपोर्ट पर विश्वास करने के अलावा आपके पास कोई दुसरा दुसरा चारा नहीं हैं । मुझे कहना नहीं चाहिए पाठक जेसे लोग उस बिंग में भी हैं ।।।।
‘भारद्वाज कंस्ट्रक्शन कम्पनी' का काम न मिलने के कारण मैं दिली तोर पर बेहद दुखी था । बार-बार दिमाग से एक ही बात अाती कि-गगोत इतने कम रेट पर काम कैसे कर रहा है? मैंने इन्कवायरी कराई । जानकारियां चौंका देने बाली मिली । पाठक को पकडा जाना तो कुछ भी नहीं है । अगर अाप ओबराय में मुझसे मिले तो मैं न केवल पाठक जैसे दूसरे लोगों को बेनकाब कर दूंगा बल्कि यह भी साबित कर दूगा कि गगोल क्वालिटी में कहां और किस किस्म की गडबड़ कर रहा है । गोर करे विनम्र साहब, मैं केवल बताने की नहीं बल्कि साबित करने की बात कर रहा हूं । अनेक सबूत इकटूठे कर लिए हैं मैंने । ये सभी आपके समक्ष रख दिए जाएगे ।"


विनम्र की अवस्था ऐसी थी जेसे निश्वय नहीं कर पा रहा हो क्या करे ।।



। ' "केवल क्वालिटी से है समझोता नहीं हो रहा बल्कि ऐसे-ऐसे काम किए जा रहे हैं जिसके परिणामस्वरुप भविष्य में भारद्वाज कंस्ट्रक्शन कम्पनी का नाम लेवा, पानी देवा तक कोई नहीं रहेगा ।"


"आपका इशारा किन कामों की तरफ है?" विनम्र ने पूछा ।।



"जानना चलते है तो आज रात नौ बजे ओबराय के नम्बर सेविन जीरो थर्टीन मे पहुंच जाए ।"' कहने के बाद एक क्षण लिए भी नागपाल वहां रूका नहीं, हवा के झोंके के तरह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया जैसे जानता हो इतने सबके बाद विनम्र खुद भी चाहे तो खुद को ओबराय पहुचने से नहीं रोक सकता ।
"फट.....फट' करता थ्री-व्हीलर गंदी वस्ती में स्थित 'मारिया बार" के सामने स्का । पिछली सीट से वह पतला-दुबला शख्स उतरा जिसके जिस्म पर मैले क्रपड़े और फटे हुए जूते थे । सस्ता कैमरा अभी भी गले में लटका हुआ था ।


बेहद पतला था वह ।


इतना ज्यादा कि लगता-यदि तेज हवा चले तो पतंग की तरह उड़ता चला जाएगा ।


छोटी-सी ठोडी पर रखी मक्खी जैसी फेचकट दाड़ी उसके व्यक्तित्व को और भी ज्यादा हास्यस्पद वना रही थी ।



जहां बह उतरा वहां चारों तरफ मछलियां बिक रही थी ।।



मछलियों की बदवू फैली हुई थी मगर उसके नथुनों मैं जेसे कुछ घुसा ही नहीं ।


"थ्री-व्हीलर" वाले को पैसे देने के लिए अपनी घिसी-पिटी जींस की जेब में हाथ डाला । जींस पतली-पतली टांगों से इतनी ज्यादा चिपकी थी कि लम्बी-लम्बी अंगुलियों वाला अपना हाथ जेब में धुसेड़ने लिए कई कोण बदलने पड़े ।


अंतत: कुछ मुडे-तुड़े नोट बाहर निकले ।


नोट भी कपडों की तरह घिसे-पिटे और मैले थे । पेमेन्ट करने के वाद वह "मारिया बार' की तरफ बड़ गया ।


'वार' शब्द तो 'मारिया' के अागे बस लिख भर दिया गया था । असल में यह देशी शराब का ठेका था । दो दुकानों के बीच में एक जीना था ।
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Re: कठपुतली -हिन्दी नॉवल

Postby Jemsbond » 10 Jan 2017 16:46

सीढियां उतरकर पतला दुवला शख्स वेसमेन्ट में पहुंचा । वहां एक हाँल था । बीड़ी और सिगरेट के धुबे से भरा हाल । चारों तरफ शोर धा । अजीब-सा चिल्ल--पों । गंदी मेजें और सस्ती कुर्सियां ।। मेजों पर देशी शराब की बोलले, अद्धै, पव्वे और वेढंगे से गिलास । अखबार के टुकड़ों पर कहीं तली हुईं दाल रखी थी तो कहीं पकौड्रियां ।


ठेके या "मारिया बार' की मालकिन का नाम था--मारिया ।


वह छ: फुट लम्बी विशालकाय औरत थी ।


इतनी तन्दुरुस्त कि अच्छे-अच्छे मर्द की हिम्मत उससे उलझने की नहीं होती थी । रंग गोरा, चेहरा चौडा और वाल "ब्यौयकट' थे । हमेशा की तरह वह हाँल के एक कोने में बने काऊंटर के पीछे ऊचे स्टूल पर बैठी थी । जब्र उसने गले में कैमरा लटकाए पतले दुवले शख्स को सीढियां तय करने के बाद अपनी तरफ अाते देखा चिहुंकौ ।

"तू फिर यहाँ अा गया?" उसने पतले-दुवले शख्स के नजदीक अाते ही कहा---कितनी बार कहा है, यहां बगैर 'नावे' के दारू नहीं मिलती ।"


"में दारु पीने नहीं अाया ।"' पतले-दुबले शख्स ने कहा ।


"तो क्या अपनी अम्मा का नाच देखने आया है?"


"मिलने अाया हू" तुझसे ।"










नस-नस से वाकिफ हूं तेरी ।'" मारिया ने कंहा---"तेरी नजर मेरी दौलत पर है । इम 'बार' पर है । मेरा पति बनने के बहाने असल में तूं इस बार का मालिक बनना चाहता है । कितनी बार कहुं मैं किसी "फक्कड' से शादी नहीं कर सकती ।"


तेरे हिसाव से यही तो एक कमी है मुझमें ।"



यह एक कमी दुनिया की दूसरी सारी कमियां अपने अाप पैदा कर देती है ।"

पतले-दुबले शख्स ने काऊन्टर पर खुलकर थोड़े धीमे स्वर में कहा'--"अगर यह कमी दूर हो जाए तो?"


"क्या मतलब?" मारिया ने अपनी आंखें चौड़ा ली ।


"अंदर चल । बताता बहुत जल्दी मैं लखपति.. बल्कि मौका लगा तो करोड़पति वनने वाला हू।"


"देख विज्जू !" मारिया ने पहली वार पतले-दुबले शख्स का नाम लेकर उसे चेतावनी दी…“तेरे कहने पर चल तो रही हूं कांउ्टर छोडकर अंदर, मगर टाईम खोटा किया तो मुझसे बूरा कोई न होगा । इतनी ढुकाई करूगी कि मेरे वार की तरफ पैर करके तूं सो तक नहीं सकेगा ।"



"मंजूर है ।" कहने के साथ विज्जू मुस्कराया ।।


जवाब मे मारिया ने इस बार कुछ कहा नहीं, काउन्टर के एक कोने से 'पल्ला' हटा दिया ।


बिज्जू उस छोटे से पल्ले के पार करके काउन्टर के उस तरफ पहूंच गया ।



मारिया ने काउन्टर के पीछे नजर आ रहा एक बंद दरवाजा खोता ।


आगे मारिया, पीछे बिज्जू ।।


दोनो दरवाजा पार करके जहाँ पहूंचे वहां एक ठीक-ठाक कमरा था ।


मारिया का बैडरुम था यह । नये फैशन के डबल वेड के अलावा एक कीमती सोफा सेट भी पड़ा था ।


उन्तीस इंच का टी.बी., म्यूजिक सिस्टम आदि ऐसी हर चीज थी जो किसी भी मिडिल क्लास शख्स के बैडरुम में हो सकती थी । दरवाजा वापस बंद करने के साथ मारिया ने क्हा--"ज़ल्दी बक । क्या बकना चाहता है?"


"ये तो तुझे मालूम है न कि मैं तुझसे शादी करने के लिए ठीक उसी तरह मरा जा रहा हूं जैसे फिल्म धड़कन मे सुनील शेटटी शिल्पा से शादी करने के लिए मरा जा रहा था ।"


" तू मतलब की बात शुरू करने के मूड में है या नहीं?"


"वही कर रहा हूं ! मेरे सवाल का जवाब तो दे ।"


“हां 1 मगर . . .


"मगर?"

"अनेक बार कह चुकी हूं …मैं किसी फक्कड़ से शादी नहीं कर सकती ।"
"इसीलिए कैमरा गले में लटकाए अमीर बनने का ख्वाब देखता इस शहर के अमीरों की परिक्रमा में मशगूल रहा करता था । " बिज्जू कहता चला गया--"मेरा ख्याल था-कोई भी आदमी जो आज अमीर है यह सीधे रास्ते से अमीर नही बना हो सकता । यकीनन उसने कभी न कभी कोई न कोई ऐसा काम जरुर किया होगा जिसका भेद खुलने की शंका से उसकी फूंक सरकती होगी ।। अपनी इस फिलॉस्फी के तहत मैंने कई अमीरों का पीछा किया । उनकी निजी जिन्दगियों में झाका । हसरत एक ही थी…-यह कि उनकी फूंक सरकाने वाला प्वाइंट हाथ लग जाए तो धन की जिस गंगा में वह नहा रहा है उसमे दो चार डुबकियां लगाने का मौका मुझे भी मिल जाए । तू तो जानती है…अपुन तो दो चार डुबकियों से ही तर होसकता था पर हाथ लगा तो समुद्र ही हाथ लग गया है ।।।। किस्मत ने साथ दिया तो उस समुद्र से एक नदी. तेरे इस बार की तरफ बह निकलेगी । वार की तरफ इसलिए क्योंकि तब तूमेऱी अर्धागनी होगी ।"


"क्या बके चला जा रहा हे, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा ।"


"एक अमीर आदमी अपने से ज्यादा अमीर आदमी से काम निकालने लिए एक लड़की का इस्तेमाल करने वाला है ।"

" तो ?"


"कोशिश कर समझने की! जब मुझे मालूम है वह ज्यादा अमीर आदमी और लड़की कहां मिलने बाले हैं तो उनके फोटो खींच लेना क्या मुश्किल होगा । सोच ।। ध्यान से सोच-----मेरे द्वारा खींचे गए फोटुओॉ को देखकर उस ज्यादा अमीर आदमी बल्कि यूं कहना चाहिए कि उस "धनकुवेर' की घिग्धी नहीं बंध जाएगी? क्या उन फोटुओं की कीमत के रुप में वह वही निकालकर मेरे सामने नहीं रख देगा जो मेरे मुंह से निकलेगा ।"

लालच के कीटाणु जुगनू वनकर मारिया की क्टोरे जैसी आंखों में था झिलमिलाने लगे थे । पहली बार उसने इन्ट्रेस्ट लेकर पूछा---"पर यह सब बताने तू मेरे पास क्युं अाया है ?"



"'दो कारण हैं ।"


"कौन कौन से दो कारण?"



"पहला----तूं मेरी होने वालो धर्म-पत्नी है । मैं तेरे लायक वस वनने ही वाला हूं यह खबर तुझ को देनी जरुरी थी ।
दूसरा मुझे कुछ रुपयों और टीप-टाप कपडों की जरूरत है ।"


"अच्छे कपडे और पैसे क्यों चाहिए तुझे?"


“वह लडकी और धनंमुबेर फाईव स्टार होटल में मिलने वाले है । जाहिर है उनके फोटो उतारने के लिए मुझे भी वहाँ जाना होगा ।। तूं समझ सकती है, अगर इन कपडों ने फाईव स्टार होटल में घुसने की कोशिश की तो उसके दरबान द्वारा ही उठाकर गटर में फैंक दिया जाऊंगा । मेने ठीक क्या या गलत ।"


"ठीक ।"


"जब फाईव स्वर में जाऊंगा तो कुछ खर्चा भी होगा ।"


"क्रित्तना?"


"गया तो हूं नहीँ पहले कभी पर सुना है-पचासो रुपये की तो साली चाय मिलती है । इस हिसाब से हजार दो हजार रुपये तो जेब में होने ही चाहिएं । जो बचेगा ईमानदारी से तुझे तोटा दूगा ।"


"कौन से फाईव स्टार होटल मे जाएगा तू?"


और फिर।।।।।।



एक सांस में उसे सब कुछ बताता चला गया । सुनते वक्त उसकी आंखें जुगनुओं की मान्निद चमकने लगी थी ।


मगर| सुनने के वाद बोली-------''' अगर में यह कहुं यह सारी कहानी झूटी है !"


"कहा कह कर देख ।"


"क्या करेगा तू?"


"उठकर चला जाऊंगा! कपड़े और चार पाच हजार रुपये किसी और से मांग लूंगा ।"


"पांच हजार की तो वीत ही छोड़ । पांच कौडी तक नहीं देगा तुझे केई ! "


"मानता हूं । साधांरण अवस्था में भले ही नहीं देगा मगर जब वो सब बताऊंगा तुझे बताया है तो लपक-लपककर देने वातो की लाईन लग जाएगी । कम से कम वे तो देगे ही जिन्हे पता है मैं लफ्फाजी नहीं करता ।"


“वे तुझे कपड़े और पैसे भले ही दे दे मगर वैसी सलाह नहीं दे सकते जैसी मैं दे सकती हूं ।"


“कैसी सलाह?"


"क्या तू समझता है कि जब बिन्दू ओर विनम्र विस्तर पर होगे तो उनके कमरे की'लाइंट अान होगी ?"
आँन भी हो सकती है और नहीं भी, इससे क्या फ़र्क पड़ता है ।"


"वहुत फर्क पडता है गधे! मेरे ख्यात से लाईट आफ होगी ऐसे मोको पर लाईटें अक्सर आँफ हुआ करती है । क्या तेरा ये खटारा केमरा अंधेरे में फोटो खींच सकेगा?"


झटका-सा लगा बिज्जू के दिमाग को । ऐसा झटका कि 'मुह' से कुछ न निकल सका । केवल देखता रहा मारिया को । अंदाज ऐसा था चिड्रियाघर में मौजूद सबसे बिचित्र जानवर को देख रहा हो ।


"क्यों हो गई हवा शंट?" मारिया ने अपना तीर सही निशाने पर लगा देख लिया था…"उतर' गया एक ही झटके मे अमीर बनने का भूत?"


"बात तो तूने एकदम सही कही । बल्कि तूं हमेशा सही बात कहती है । इसीलिए तो कद्र करता हू तेरी । वास्तव में दुसरा कैमरा चाहिए ।
ऐसाजो अंथेरे मेफोटो खींच लेता है ।"

"क्या ऐसा भी कोई कैमरा अाता है?"


" हां आताहै।"


होठो पर रहस्यमय मुस्कान लिए मारिया ने पूछा----‘क्तिने का अाता है ।"

"क-कम से कम पचास हजार का ।" बताते वक्त बिज्यूकी आवाज स्वत: हकला गई------" और ज्यादा से ज्यादा ढाई लाख का ।"



"अब बता-------कौन दे देगा तुझे इतने पैसे?"


"कोई नहीं देगा मेरी अम्मा । मगर तू वता ---तूं भी देगी या नहीं?"


"मेरे पास ऐसा एक कैमरा पहले सै मौजूद है ।"


"म-मौजूद है?" मारे खुशी के वह उछल पड़ा ।


"'एक लाख का अाया था । अादमी के कान पर रखकर भी बटन दबाया जाए तो आवाज सुनाई नहीं देती । देनी कहां से । बटन दबने पर आवाज होती ही जो नहीं है ।"
"तव तो वन गया काम उन्हें पता तक नहीं लगेगा कि . .


"कोई काम नहीं बना है । भला मैं तुझे इतना कीमती कैमरा क्यों देने लगी?"


"देगी क्यों नहीं! आखिर तू मेरी होने वाली.. .

"मैं इन चक्करों में अाने वाली नहीं हूं बिज्जू राजा !" एक बार फिर मारिया ने उसका सेटैंस पूरा नहीं होने दिया ।


बिज्जू ने पूछा-----'' किस किस चवकर में आएगी मेरी रानी?"


"मिलने बाती रकम का आधा हिस्सा मेरा होगा ।"


"बडी सियानी है तू। थोडे से कपड़े, एक कैमरा और पांच हजार खर्च करके पांच करोड कमाने के फेर में पड गई मगर खेर अाधे की क्या बात करती है । तुझे तो मैं पुरा का पूरा हिस्सा देने को तैयार हूं ।। जव तू बीबी ही वन जाएगी मेरी तो हमारा बांटेगा कौन?"

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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Re: कठपुतली -हिन्दी नॉवल

Postby Jemsbond » 10 Jan 2017 16:48

"ठीक क्या तूने!" कहने के साथ बह अपने स्थान से उठी । हाथी की सूंड जैसी टांगो पर चलती हुई बिज्जूके नजदीक पहुची झुकी… और इससे पहले कि बिज्जू कुछ समझ पाता उसने अपना भाड़-सा मुंह खोलकर विज्जू के दोनों हौंठ उसमे भींच लिए । जिस वक्त यह उसके होठों को चुसक रही थी उस वक्त विज्जू सोच रहा था यह हाल तो मारिया का तब है जव केवल उम्मीद बंधों है कि वह धनवान बनने वाला है जब वह धन की गंगा का मालिक बन चुका होगा तब तो यह उसे अपनी गोदी में उठाए-उठाए घूमा करेगी ।।।।




सुनहरे भविष्य की कल्पनाओं के साथ बिज्जू ने मारिया के उस जिस्म को अपनी बांहों में समेटने की असफल केशिश की जो बनमानुष तक की बांहों मे पूरा नहीं समा सकता था ।।।।।।
बिज्जू के जिस्म पर 'ग्रे' कलर का शानदार सूट था । बैसी ही टाई । ' सफेद शर्ट और टाई में लगा था एक पिन । ऐसा 'पिन' जिसमे नग लगा था । पिन देते वक्त मारिया ने कहा था…"भले ही यह नग दो कोड़ी का नहीं है लेकिन इन कपडों के साथ फाईव स्टार में जो भी देखेगा 'डायमंड' का समझेगा ।"


ओबराय से दाखिल होते बक्त वह अकड़ा हुआ भी कुछ इसी तरह था जैसे सचमुच डायमंड का पिन लगाए घूम रहा हो । दरबान ने जव कांच वाला गेट खोलने के साथ सलाम टोका तो उसने गर्दन को जुम्विश तक नहीं दी । ज्यों की त्यों अकड़ाए दरवाजा पार कर गया मगर लम्बी-चौड़ी लाँबी में कदम रखते ही वहां सेन्द्रल ए-सी. की ठंडक के वावजूद पसीने छूटने लगे ।।।।



कारण-उसे मालूम नहीं था बढना किधर है? उस वक्त वह लॉबी में इधर-उधर भटक रहा था जब एक
अटेण्डेन्ट ने नजदीक पहुंचकर सम्मानजनक अंदाज मे पूछा--मे अाई हेल्प यु सर?”


"ज-जी?" बौखलाए हुये बीज्जू के मुंह से केवल यही एक लफ्ज निकल सका ।


"अटेण्डेन्ट" समझ गया उसे इंग्लिश नहीं आती अत: उतने ही सम्मान के साथ हिन्दी मे पूछा---"क्या मैं आपकी कोई मदद कर सक्ता हूं ?”


हड़बड़ाए हुए विज्जू के मुह से निकला---"मुझे सुईट नम्बर सेबिन जीरो थर्टीन में जाना है ।"

"लिफ्ट नम्बर फोर आपको सैविन्थ फ्लोर पर छोड देगी ।" अटेण्डेन्ट ने लिफ्ट नंबर फोर की तरफ़ इशारा किया ।


' बिज्जू बगेर एक पल भी रुके लिफ्ट नम्बर फोर की तरफ़ बढ गया ।

असल में अपने नजदीक अटेण्डेन्ट की मौजूदगी उसे मुसीबत नजर आ रही थी । इसी: शंका ने प्राण निकल दिए वे उसके कि उसने अगर उसने कुछ और पूछ लिया तो क्या जवाब देगा। जितने तेज कदमों के … साथ वह अटैण्डेन्ट से दूर हूआ उससे लग रहा था जैसे दौड़ रहा हो ।


दौड़ता हुआ सा बिज्जू लिफ्ट नम्बर फोर के नजदीक पहुंचा ।


कोट की जेब थपथपाई-मारिया द्वारा दिया गया स्पेशल कैमरा यथास्थान मौजूद था ।


लिफ्ट के नजदीक पहुंचकर लिफ्ट में ना घुसना उसे अजीब सा लगा इसलिए लिफ्ट में घुस गया ।


लिफ्टमैंन ने पूछा'---'"बिच फ्लोर?"



“क-क्या?" यह पुन: चकराया ।


"आप कौन-सी मंजिल पर जाएंगे ।"


''स--सेविन ।सुईट नम्बर सेबिन जीरो थर्टीन । उसने यह भी कह दिया जो पूछा नहीं गया था ।







लिफ्टमैंन ने सात नम्बर बटन दवा दिया । यात्रा शुरु हो गई बिज्जू इस खौफ से सांस रोके खड़ा रहा कि लिफ्टमैंन कहीं कुछ और न पूछ ले । मगर, उसने कुछ नहीं पूछा । लिपट सातवीं मंजिल पर जाकर रुक गई गेट खुलते ही बिज्जू उसके पार कूद सा पड़ा । गेलरी में बिछा कालीन इतना गदूदेदार था कि नए जूते उसमें "धंसते’ से लगे ।

लिफ्टमैंन नाम की मुसीबत से बचने के लिए उसने जल्दी से लिपट के सामने से हट जाने में ही भलाई समझी जबकि इसकी जरूरत नहीं थी ।।।।।।


लिफ्ट तो खुद ही लिफ्टमेन को साथ लिए बापस चली गई थी ।


अबा । बिज्जू गैलरी में अकेला था ।


इस एहसास ने उसे काफी राहत प्रदान की ।


गर्दन धूमा कर दोनों तरफ़ देखा । कहीं कोई नहीं था । सभी दरवाजे बंद । दरवाजों पर नम्बर लिखे थे । उसे सेबिन जीरो थर्टीन की तलाश थी । उसी की तलाश में एक तरफ को बढ़ गया ।


वह जानता था-सुइंट नम्बर सेविन जीरो थर्टीन में विनम्र और विंदू को रात के नौ बजे मिलना था । अभी दोपहर के दो बजे थे । उसने वहुत पहले ही सुईट में घूसकर छुप जाने का इरादा बनाया था । मगर अब लगा------वह कुछ ज्यादा ही जल्दी आ गया है ।


फिर सोचा---"आ ही गया हूं तो क्यों न वहीं जाकर छुप जाऊं! बाहर रहकर भी क्या करना है?


सह सब सोचता बढा चला जा रहा था कि नजर सेविन जीरो थर्टीन पर पडी । दिल जौर - जोर से धडकने लगा । एक बार फिर उसने गेलरी में दोनों तरफ देखा । कहीं कोई नहीं था । मौका अच्छा देखकर हाथ हैंडिल की तरफ़ बढाया । मगर हैँडिल को कई बार घुमाने और झटके देने के वावजूद दरवाजा नहीं खुला । इस एहड़ास ने उसमे 'घबराहट' पैदा करदी कि दरवाजा लाक है ।


खुद ही झुंझला उठा वह ।


इस समस्या पर उसने पहले ही गौर क्यों नहीं कर लिया था ?


यह बात तो उसे सुझ ही जानी चाहिए थी कि सुईट नम्बर सेयिन जीरो थर्टीन का दरवाजा अपने स्वागत मे उसे चौपट खुला नहीं मिलेगा । होटल के कमरे जब खाली होते हैं तो बंद ही रहते हैं तभी खुलते हैं जव कोई ग्राहक अाता है और आज के ग्राहक नौ बजे अाएंगे । बि'दु अगर विनम्र से कुछ पहले भी आई तो ज्यादा से ज्यादा आठ-साढे आठ बजे आ जाएगी ।


रिसेप्शन से चाबी उसे ही मिलेगी ।


वही अाकर दरवाजा खोलेगी ।
फिर. ..फिर भला वह अंदर कैसे जाएगा? कैसे अंदर जाकर ऐसे सुरक्षित स्थान पर छुपेगा जहां उन दोनों में से किसी की नजर न पड सके ।


इस समस्या का उसे कोई निदान नजर नहीं अाया ।


चेहरे पर निराशा के भाव लिए सुईट नम्बर सेविन जीरो थर्टीन के बंद दरवाजे के सामने से हटा और लगभग वेमकसद गेलरी में बढ़ गया ।।।।।।।

एक मोड़ पर मुड़ते ही ठिठक जाना पडा । वहां दो-तीन औरते नजर आई थी । उनके साथ काफी ऊंची एक ट्राली थी । ट्राली पर तरह-तरह के शेम्पुओँ की शीशियों, साबुन, रुम फ्रैशनर, पेपर रोल और हेयर कवर जेसा अनेक सामान रखा था । वह समझ गया वे औरते होटल की सफाई कर्मचारी हैं । गेलरी के उस हिस्से में स्थित ज्यादातर कमरों के दरवाजे खुले हुए थे । औरते 'वैक्यूम क्लीनर' से कमरों और गेलरी के कालीन साफ कर-रही थी ।

उसने एक सफाई कर्मी महिला के नजदीक पहुंचकर कहा-"मेडम क्या आप मेरी हैल्प कर सकती हैं?"


" कहिए सर ?"' उसने सम्मानपूर्वक कहा ।

"दरअसल मुझे सुईट नम्बर सेविन जीरो थर्टीन में रहने वाले ने दो बजे बुलाया था । मैं राईट टाईम आ गया जबकि वह कमरे में नही है। शायद कहीं फंस गया है लेकिन टाईम दिया है तो अाता ही होगा ।"


महिला ने समर्थन किया-----" टाइम दिया है तो आते ही होंगें ।"
"तुम्हारी इजाजत हो तो मैं सुईट में बैठकर उसका इन्तजार कर लूं ।"


"जी ।"


" चाबी तो होगी तुम्हारे पास ?"


" सारी सर! हम किसी का रूम किसी और के लिये नहीं खोल सकते ! आप नीचे लाँबी मे जाकर इन्तजार कर सकते है ।"

"उफ्फ । " अब कौन लाबी में जाए और फिर यहां बापस . . . .


"पता नहीं कैसे-कैसे लोग हैं इस दुनिया में । दूसरे के वक्त की कीमत नहीं समझते ।" बड़बड़ाकर महिला को यह वाक्य सुनाने के अलावा बिज्जू को कुछ और नहीं सूझा । अब वह निराश हो चला था । सुईट है दाखिल होने की कोई तरकीब 'दिमाग ने नहीं जा रहीं ।

वह यूंही गैलरी में चहलकदमी करने लगा । अंदाज ऐसा था जैसे नागपाल का इंतजार कर रहा हो । एकाएक विज्जू की नजर "मास्टर की'पर पड्री ।

एक बार नजर पड़ी तो वहीं स्थिर होकर रह गई वह ट्राली ने सबसे ऊपर रखी थी ।


मस्तिष्क में धमाका-सा हुअ----"यह चाबी है जिससे इस फ्लोर के सभी दरवाजे खोले और बंद किए जा सकते हैं । सुईट नम्बर सेविन जीरी थर्टीन का दरवाजा भी । इसी के इस्तेमाल से तो ये लोग सफाई कऱती हैं ।। वह पुन: महिला से मुखातिब हुआ-----"' क्या तुम मेरे लिये . .


"सौरी सरा" इस बार उसने उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही थोड्री सख्ती के साथ कहा…“मैं सुईट नहीं खोल सकती ।"


"मैं सुईट खोलने के लिए कह भी नहीं रहा ।"


" तो ?"


"नीचे होटल शाप से जाकर ट्रपल फाईव का एक पैकेट ले आओे !" कहने के साथ उसने जेब से पांच सौ का नोट निकालकर महिला की तरफ बढा दिया था ।।।


महिला कुछ वोली नहीं, बिचित्र सी नजरों से वस उसे देखती रही ।।


"प्लीज ।" याचना-सी कर उठा…"सिगरेट उसका वेट, करने में मेरी मदद करेगी ।


' "मेरी समझ में नहीं आरहा अाप लाबी में जाकर खुद ही ।"
इस वार विज्जू ने उसका वाक्य काटकर आखरी हथियार चलाया----"केवल एक पैकिट बाकी तुम्हारे?"


और. . यह हथियार काम कर गया है, इसका एहसास बिज्जू को महिला की आंखों से हो गया। क्षण भर के लिए उनमें आश्चर्य के भाव उभरे थे . . . . .


अगले पल लालच के जुगंनूं नजर अाए । फिर, विज्जू ने उसके हौठों पर वह मुस्कान देखी जो शुरू से लेकर अब तक नजर नहीं अाई थी ।


नोट बिज्जू के हाथ से यूं खीचा जैसे डर हो कि कहीं वह उसे वापस जेब मे न रख । बोली…"पैकिट केवल सौ रुपये का अाएगा सर ।"


" कहा न । '" खुद बिज्जू के होठों पर दुर्लभ मुस्कान उभरी------जो बचेगा, वह तुम्हारा ।"



"अभी लाई सर ।। अभी लाई ।" कहने के बाद उसने लिफ्ट की तरफ दोड़-सी लगा दी थी । पलक झपकते ही मोड़ पर घूमकर विज्जू की आंखों से ओझल हो गई बिज्जू को पहली वार लगा वह कामयाबी के नजदीक है । गर्दन घुमाकर इथर उधर देखा ।

बाकी महिलाये अपने-अपने हिस्से में अाए कमरे की सफाई में मशगूल थी ।

उसकी तरफ किसी का _ध्यान, नहीं था । बड़े आराम से हाथ बढाकर 'मास्टर की' उठा ली । दूसरा हाथ बढाकर ट्राली पर रखी ढेर सारी साबुन की टिकियों से से एक टिक्की उठाई । उसका "रेपर' अलग करके कोट की जेब के हवाले किया और फिर, चाबी को साबुन पर रखकर जोर से दवा दिया । इतनी जोर से कि साबुन पर चाबी का पूरा अक्स वन जाए ।
स्फाई कर्मचारियों के इंचार्ज' ने "मास्टर की' उठाकर दराज में रख तो ली मगर उसके तुरन्त बाद थोडा चौंक-सा गया । अपने हाथ में, उसी हाथ में अजीब-सी 'चिकनाई' महसूस की जिससे चाबियां उठाकर दराज में रखी थी । ध्यान से अपना हाथ देखा! फिर उस हाथ के अंगूठे के सिरे को और बीच वाली अंगुली के सिरे पर रगड़ा । चिकनाई का एहसास साफ-साफ़ हुआ ।


दराज वापस खोली ।


उसमें वे सभी चाबियां पड़ी हुई थीं जो सफाई करने वाली औरते प्रतिदिन की तरह काउन्टर पर रखकर गई थी । जिन्हें उसने एक-एफ कर के दराज में डाला था ।

करीब पन्द्रह चाबियां थी वे । कुछ देर तक उन सभी को इस तरह घूरता 'रहा जैसे बिल्ली चूहे के विल को घूर रहीं हो, जैसे इंतजार का रही हो कव चूहा निकले और ...................


कब बह उसे दबोच ले ।।।।


फिर उसने अपना दायां हाथ दराज की तरफ़ बढाया पर स्वयं ही ठिठक गया । यह वही हाथ था जिससे चाबियां दराज म रखीें थी । जाने क्या सोचकर पटृठे ने बाएं हाथ से एक-एक चाबी उठानी शुरू की । यह हर चाबी को उठाने के साथ ध्यान से देख रहा था । साथ ही मुट्ठी मे भींचकर हाथ से मसल भी रहा था ।

निराशाजनक मुद्रा के साथ हर चाबी को वापस काउन्टर पर रखता रहा ।।


परन्तु एक चाबी पर ठिठक जाना पड़ा ।


इस बार उसके चेहरे पर निराशा के नहीं बल्कि आशा के भाव उभरे थे । आंखों में ऐसी चमक जगमगाई थी

जैसे चावलों को बीनते-बीनते सोने का चावल 'पा-लिया हो ।


आंखो के नजदीक लाकर उस चाबी को ध्यान से देखा । मुट्ठी बंद की ।


दूसरी चवियों की तरह हाथ पर मसला ।।

उसे अन्य चावियों से अलग काउन्टर पर रखा और वाएं हाथ की अंगुलियों को सिरों को आपस में रगड़ा । उस हाथ से भी बैसी ही चिकनाई महसूस की जैसी दाएं हाथ में महसूस की थी ।


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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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