कठपुतली -हिन्दी नॉवल complete

Jemsbond
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Re: कठपुतली -हिन्दी नॉवल

Post by Jemsbond » 10 Jan 2017 17:23



दोनों उछल पड़े । पलक भी नहीं झपकी थी कि विनम्र के चेहरे पर भी मारिया जैसा खौफ उभर अाया ।


" क-कौन हो सकता है?" फुसफुसाकर विनम्र ने पूछा ।



मारिया बेचारी के हलक से तो आबाज तक न निकल सकी । इशारे ही से 'पता--नहीं' कहा ।


विनम्र ने रिवॉल्वर से इशारा किया-------" पूछो ।। "


मारिया पूरी ताकत लगाने के बाद हलक से आवाज़ निकाल सकी । । "क-कौन है?"

"गोडास्कर ।" यह आवाज गडगड़ाती हुई विजली बनकर दोनों पर गिरी ।


उस विनम्र की हालत देखने लायक थी जो बस एक ही पल पहले कामयाबी के कधों पर सवार होकर झूम रहा था ।


बुरी तरह हड़बड़ा गया बह । चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी । जिस्म जूडी के मरीज की मानिन्द कांप रहा था ।


मारिया की हालात भी उससे अलग नहीं थी ।


गोडास्कर की आवाज़ उभरी----"दरवाजा खोलो डार्लिग ।"


विनम्र बड़ी तेजी से मारिया के कान पर झुककर फुसफुसाया--"यहां से निकलने का कोई और रास्ता है?"
जैसे लाश की गर्दन इंकार में हिली ।


विनम्र का जी दहाड़े 'मार-मार कर रोने को चाह रहा था ।।



इस बार गोडास्कर ने दरवाजा न खोलने पर उसे तोड़ डालने की चेतावनी थी । वह चेतावनी इतने ठंडे लहजे में दी गई थी कि मारिया बरबस ही दरवाजे की तरफ बढ गई कांपता-हांफता विनम्र उसका रास्ता रोककर खड़ा हो गया । रिवॉल्वर की नाल एक बार फिर उसके मस्तक पर रख दी थी ।



सूखे होठों पर जीभ फेरती मारिया ने कहा-----“वह वगैर दरवाज़ा खुलवाए नहीं जाएगा ।"


"धीरे बोल ।" विनम्र दांत भींचकर गुर्राया ।



"समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे वि…


"धांय ।"


विनम्र ने उसके मुंह से अपना नाम निकलने से पहले ट्रेगर दबा दिया ।



एक चीख के साथ मारिया कटे वृक्ष सी गिरी ।।




उधर, फायर की आवाज ने मानो तहलका सा मचा दिया ।



"क्या हो रहा है अंदर?" गोडास्कर की इस दहाड़ के साथ यूं लगा जैसे दरवाजे से हाथी टकराया हो ।


विनम्र समझ गया----वह गोडास्कर का विशाल जिस्म होगा ।।


एक ही 'बार' में दरवाजा चरमरा गया ।


दूसरा 'वार हुआ ।



विनम्र को इस यकीन ने दहला दिया कि दरवाजा गोडास्कर का "तीसरा" वार नहीं झेल पाएगा ।


झपटकर खुद को दरवाजे के नजदीक दीवार से सटा लिया । 'तीसरे वार' पर किबाड़ का उपरी हिस्सा चौखट से अलग हो गया ।



चौथे वार पर उसे बेडरूम के अंदर गिर पड़ना था । विनम्र को कुछ और नहीं सूझा तो हाथ बड़ाकर 'डंडाला' खोल दिया ।


बाहर से गोडास्कर ने पूरी ताकत लगाकर 'चौथा वार' किया था मगर किवाड "सड़ाक' से खुल गया ।


झोंक में यह फर्श पर पड़ी मारिया के ऊपर जा गिरा ।


विनम्र पलक झपकते ही कमरे से बाहर निकला । यह काम इतनी तेजी के साथ किया था कि गोडास्कर उसे देख न सके । उसे दिखै भी तो केवल पीठ दिखे । जबकि हकीकत ये है----गोडास्कर उसकी पीठ तक नहीं देख पाया था । मारिया के जिस्म से ठोकर खाकर मुंह के वल गिरा था बह ।
जब तक सम्भलकर उठा । पलटा । तव तक "धाड़' की आवाज के साथ दरवाजा बंद हो चुका था । गोडास्कर ने अपने हाथ में मौजूद रिवाल्वर से फायर किया । गोली बंद किवाड़ पर टकराकर रह गई हालांकि वंह अगले ही पल झपटकर दरवाजे पर पहुच चुका था मगर तव तक दरवाजा बाहर से बंद किया जा चुका था । ऊपर की तरफ से चौखट से अलग हो गया दरवाजा जब केवल अंदर की तरफ खींचकर तोड़ा जा सकता था । मगर काफी टटोलने के बावजूद गोडास्कर को किवाड़ में ऐसी कोई चीज हाथ नहीं लगी जिसे पकड़कर उसे अपनी तरफ खींच सके ।।


कंधे के जैसे वार करके उसने बाहर से दरवाजे को तोड़ा था बैसे 'बार अंदर से करके नहीं तोड़ा जा सकता था ।



गोडास्कर कसमसाकर रह गया ।


दरवाजे को खोलने या तोड़ डालने की कोई जुगत नहीं थी । तभी कानो में मारिया के कराहने की आबाज आई ।

वह उसकी तरफ झपटा । मारिया वस मरने ही बाली थी । गोडास्कर फर्श पर बैठ गया ।


उसका सिर उठाकर अपनी जांघ पर रखा । करीब-करीब चीख पड़ा----"कौनं था ? कौन था वह?"



" बह पागल है ।" मारिया अपने मुंह से हर लफ्ज अटक-अट्ककर निकाल पाई--" जुनूनी हत्यारा । क-किसी मर्द को लुभा रही लड़की " को देखते ही गर्दन दबाकर मार डालता है । क-क्रिस्टी को भी मार डाला ।"


"है कौन बो?" गोडास्कर चीखा--"सारी बाते भूलकर नाम बताओ मारिया ।"



" व-वो-वो-वि........."


"हा । हां । बोलो ।" गोडास्कर ने उसे झंझोड़ा मगर, सिर उसकी जांघ पर लुढक चुका था ।।।
मारिया के बेडरूम का दरवाजा बाहर से विनम्र ने नहीं, कुंती देवी ने बंद किया था ।


विनम्र को तो दरवाजा बंद करने का होश ही नहीं रह गया था । वह तो बाहर निकलते ही एक ही जंम्प में काउन्टर पार करके उस हाल में पंहुच गया था जहां शराबी लोग बैठकर पिया करते थे । रुख सीढियों की तरफ था मगर अपने पीछे दरवाजा बंद होने की आवाज सुनकर चौंका ।

ठिठका ।


उस तरफ से गोली चलने की आवाज भी आई थी । याद अाया----बाहर निकलते वक्त उसने एक साए को दरवाजे के नजदीक हरकत करते देखा था ।



दिमाग में बडी तेजी से विचार कौंधें------" कौन थी वह? दरवाजा किसने बंद किया?"


घूमा ।



और अभी ठीक से कुछ समझ भी नहीं पाया था कि दौड़ता हुआ साया उसके नजदीक अाया ।


हाथ पकडकर उत्तेजित स्वर में बोला…"भागो विनम्र ।। गोडास्कर दरवाजा तोड़कर बाहर निकल अाया तो हम वच नहीं सकेंगे ।"



विनम्र के जेहन में मानो अणु बम फटा ।


मां ।।



ये तो मां क़ी आंवाज है


कुंती देवी की ।


सच्चाई ये है कि हैरत की ज्यादती के कारण वह आवाज की आज्ञा का पालन करना भूल गया था । यह जानने के बावजूद भूल गया था कि 'यही उसके हित में है ।' जिन हालात में वह हैं, यही करना चहिए ।।



गोडास्कर बाहर निकल अाया तो सारे किए धरे पर पानी फिर जाएगा ।


वह आंखे फाड़े साए की तरफ़ देख रहा था । साया अब भी कम रोशनी कि के कारण साया ही नजर अा रहा धा । उसे यकीन अाकर नहीं दे रहा था कि वह उसकी मां ही है ।


इधर, कुंती के खींचने पर भी वह सीढियों की तरफ़ नहीं खिंचा तो कहा-"विनम्र प्लीज, सोचने के लिए हमारे पास एक पल भी नहीं है ।निकलो यहां से ।। "



बिनप्र को लगा--- बात सच है । सो, सीढियों की तरफ लपका । जेहन अभी भी फिरक्नी की तरह घूम रहा था ।



सीढियों पर पहुंचकर कुंती देबी ने वहाँ मोजूद दरवाजा भी बाहर की तरफ से बंद कर दिया । बिनम्र अागे था, कुंती देवी पीछे । सीढियां चढ़कर ऊपर कमरे में पहुचे । कुंती देबी ने वहाँ मौजूद दरवाजा भी बंद कर दिया ।


फुटपाथ पर खड्री बेन की तरफ दौडती बोली-"गोडास्कर ने तुम्हें देखा तो नहीं?"


" नहीं ।' वेन के नजदीक पहुंचकर विनम्र ने 'साए' की तरफ देखा ।
वहां स्ट्रीट लाईट के भरपूर प्रकाश के कारण उसने कुंती देवी को साफ देखा था ।।



वह हमेशा की तरह अपने परम्परागत लिबास में थी । सफेद साड़ी, खुले बाजू-वाला सफेद ब्लाऊज ।


विनम्र की हैरत कम होने का नाम नहीं ले रही थी । भागकर अाने के कारण दोनों की सांसे फूली हुई थीं ।


वावजूद इसके विनम्र चीख-सा पड़ा----" त-तुम यहां क्या कर रही हो मां?"


कुंती देवी हड़बड़ा-सी गई घबराकर इधर-उधर देखा ।। वेन के नजदीक ही गोडास्कर की जीप खड्री थी ।


कुंती देवी ने कहा-----'"यह जगह ऐसी बात करने केलिए मुनासिब नहीं है । यहाँ हमे किसी ने देख लिया और बाद में गोडास्कर को बता दिया तो अब तक किया गया सारा संघर्ष वेकार होजाएगा ।"



विनम्र को बात ठीक लगी ।


उसने भी चारों तरफ देखा ।


हालांकि बस्ती सुनसान पडी थी । मगर किसी भी वक्त कोई भी निकलकर सड़क पर जा सकता था ।



विनम्र ने जेब से वेन की चाबी निकली ।।



ड्राईविंग डोर खोला । कुंती देवी घूमकर कंडेक्टर गेट पर पहुंची ।


अगले पल वे विनम्र की बगल वाली सीट पर बैठी थी । इधर विनम्र ने इग्नीशियन में चाबी घुमाकर गाड़ी स्टार्ट की उधर सामने बाले मोड़ से लढ़खड़ाता हुआ एक शराबी मुड़कर इस सडक पर आया । मगर अब विनम्र या कुंती देबी में से किसी को उसकी परबाह नहीं थी ।। वेन कमान से निकले तीर की मानिन्द शराबी की बगल से गुजरी ही थी कि कुंती देवी ने पूछा ---" तुम सारे पाजेटिव और निगेटिव ले आए न?"'



"हां । मगर...........



उसे बोलने का मौका दिए वगैर कुंती ने अगला सवाल किया---" मारिया का क्या हुआ?"



"वह मर गई है ।"


"कैसे?"


“मैंनें उसे गोली मारी थी।"


"हां । कमरे के अंदर से मैंने फायर की अावाज सुनी थी । इसीलिए पूछा…उस आवाज को सुनकर गौडास्कर पर भी मानो जुनून सवार हो गया था । वह हाथी की तरह पीछे हट-हटकर की दरवाजे पर बार करने लगा परन्तु. . क्या तुम्हें यकीन है, मारिया मर गई थी ?"


"मतलब ? "
" अगर वह बच गई होगी तो गोडस्कर को बता देगी गोली मारने बाले तुम थे । ऐसा होगया तो .........


"नहीं होगा । वह मर चुकी थी ।"


कुंती देबी बड़वड़ा उठी---"भगवान करे ऐसा ही हो ।"


"मगर तुम यहाँ क्या करं रहीं थीं मां?" मौका लगते विनम्र एक बार फिर चीख पड़ा-" तुम क्या कर रही थी बंहां?"


" घर चलो । सब बता दूंगी । तुम 'कठपुतली' क्यों वने, शायद यह बताने का वक्त अा गया है ।" कहने के बाद कुंती देवी ने सिर इस तरह कुर्सी की पुश्त पर टिका दिया था जैसे जीवन की दौड में दौड़ते--दौडते थक गई हो ।।



आंखें बंद करली थी उन्होंने ।


विनम्र ने महसूस किया---बह रो रही हैं । आंसूं बंद पलकों से झिरी बनाकर कपोलों पर लुढक अाए थे ।। विनम्र की हिम्मत यह तक पूछने की न पडी वे रो क्यों रहीं हैं । वेन को विला तक नहीं ले गए थे ।


रास्ते ही में एक जगह छोड़ दिया । अपनी अंगुलियों के निशान मिटा दिए ।

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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: कठपुतली -हिन्दी नॉवल

Post by Jemsbond » 10 Jan 2017 17:23


अटैची निकली । कुछ देर पैदल सफर किया ।


फिर एक टैक्सी के जरिए विला पहुचे ।। अपने कमरे में ले जाकर कुंती देवी ने उसे एक कुर्सी पर बैठा दिया ।


बैठते वक्त यह कुर्सी विनम्र को कुछ अलग किस्म की लगी थी ।


बावजूद इसके वह कोई शक नहीं कर सका था लेकिन उस वक्त तो मारे हैरत के उसके रोंगटे खड़े हो गए जब कुंती देवी ने सामने रखे टी .वी ० के ऊपर से एक रिमोट उठाया ।


उसका एक बटन दबाया ।

और परिणाम स्वरूप "खटृट-खटृट’ की आबाज के साथ कु्र्सी के दोनों हत्थों से चमड़े के पटृटे निकले और पलक झपकते ही उन पट्टों ने विनम्र को कुर्सी के साथ जकड़ लिया ।

अब अपनी मर्जी से कुर्सी से उठना तो दूर वह हिल-ठुल तक नहीं सकता था ।

हलक फाड़कर दहाड उठा विनम्र--------" ये तुमने क्या किया मां? क्यो किया ऐसा? ये मै तुम्हारा कौन-सा रुप देख रहा हूं?”
विनम्र के पिता थे वे ।


वे जो अपने से काफी छोटी-उम्र की निहायत ही खूबसूरत लड़की से कह रहे थे-----" मेरा ख्याल है तुम्हें मेरी बात मान लेनी चाहिए । इसमे बुराई ही क्या है? ऐसे अनेक लोग हैं जिनकी दो या दो से ज्यादा पत्नियां भी एक छत के नीचे रहती हैं । मैंने उन्हे बहनों की तरह रहते देखा है ।

फिर भी, यह नहीं कहूंगा-----तुम कुंती की बहन की तरह रहना । पर इतना तो कर सकती हो----भले ही किसी नौकरानी की तरह सही मगर कुंती इस घर के किसी कोने में पड़ी रहे । मैं तुमसे बादा करता हूं रूबी, तुम्हारे अधिकार से कभी कोई कमी नहीं, अाएगी । सव कुछ तुम्हारा है और तुम्हारा ही रहेगा । "



" यह वह कह रहा है, वह शख्स जिसने मुझसे कोर्ट में शादी की है ।" रुबी नामक खूबसूरत लड़की कहती चली गई ----" जिसने शादी करते वक्त मुझसे हजार-हजार वादे किए थे । कहा था----" कुंती को हमेशा के लिए अपने घर से बाहर निकाल देगा ।"



"वही तो किया है रूबी । यही तो किया मैंने ।" विनम्र के पिता गिड़गिड़ा से रहे थे---" तुमसे किए गए वादे के मुताबिक मैंने अपनी ब्याहता को घर से निकाल दिया है अाज वह दर-की ठोकरें खाती घूम रही है । मुझे किसी ने बताया-----भीख मांगकर गुजारा कर रही है बह । प्लास्टिक की झोंपड़ी बनाकर फुटपाथ पर वहाँ रह रही है जहाँ बंगलादेश के शरणार्थी रहते हैं ।"



"और यह सब सुनकर तुम्हारा कलेजा हिल गया?"
" हां । ये सच है रुबी । कुंती के बारे में सुनकर मेरी आत्मा तक कांप उठी है । रह-रहकर धिक्कार रही है मुझे । कचोट रही है । कह रही है------"तेरी ब्याहता थी । कोई कुसूर भी नहीं था उसका । कुसूर तेरा है । तूने धक्के दे-देकर उसे धर से बाहर निकाला है । इसलिए आज वह गंदी नाली में रेंगने वाले कीडे जैसी जिन्दगी गुजार रही है ।"



"तो तुम यह चाहते हो---" कल वह जिन्दगी मैं गुजारू ?"



"नहीं । मैं ऐसा बिल्कुल नहीं चाहता । ऐसा कब कहाँ मैंने ।। मैं तो ये चाहता हूं कि तुम दोनों...........


" कह चुकी हूं शैलेष । एक बार नहीं, हजार वार कह चूकी हूं ।" रूबी दृढ़ता पूर्वक बोली ---"इस घर में या तो कुंती रहेगी या मैं । अगर तुम उसे यहां लाते हो तो मुझे जाना होगा । मुझे जीनी होगी वह जिन्दगी जिसे आज वह जी रहीं है मगर, कान खोलकर सुन लो मिस्टर शैलेष, मैं कुंती की तरह बेवकूफ़ नहीं हूं । जिसे तुम धक्के मारकर यहाँ से निकाल दोगे और मैं तब भी टसूवे बहाती तुम्हारे कदमों मे गिर जाऊंगी । तुम्हारे न मानने पर धर छोड़कर चली जा्ऊंगी । मुझे अपने अधिकार के लिए लड़ना आताहै ।तुम्हारी 'कीप' जब मैं थी , तब थी-------अब 'कीप' नहीं, पत्नी हूं । कोर्ट में शादी हो चुकी हैं। वह शादी जिसे करते वक्त तुमने मुझसे यहीं वादा किया था जो निभाया भी । कुंती को धर से बेदखल करने का बादा । मगर अब मुकर रहे हो । मैं तुम्हें मुकरने नहीं दूंगी शैलेष । क्यों ? क्यों मुकर रहे हो अब ?"
"रूबी ।। उसके पेट में मेरा बच्चा है ।"



"तो क्या हुआ? कल बैसा ही बच्चा मेरे पेट में भी हो सकता है ।"



"उफ्फ!" कसमसा उठा ---"तुम समझ क्यों नहीं रही?"



"तुम्हे कुंती की कोख मे मौजूद एक बच्चे का ख्याल है । उन दो बच्चों का ख्याल नहीं जो मेरे रखैल रहते तुमने मेरी कोख में डाले थे और फिर तुम्हारे ही कहने पर मैंने 'सफाई' करा ली थी ।"



"तुम भूल रही हो ।" पहली बार शैलेष की आवाज़ ऊंची हुई---“सफाई कराने के लिए मैंने नहीं कहा था । तुम्हारी मर्जी थी वह । अपनी फीगर का ख्याल था । फीगर बच्चे से ज्यादा प्यारी थी तुम्हें ।"




"क्योंकि फीगर ही पर तो कुरबान थे तुम मेरी । बरना कुंती ही में क्या कमी थी जो मेरी तरफ आकर्षित हुए ?"



"हां । ठीक कह रहीं हो । मेरी मति मारी गई थी जो शादी-शुदा होने के बावजूद तुम्हारे रूपजाल में फंसा । मुसीबत मोल ले ली मैने । आदमी साला जब "यौवनजाल' में फंसता है अागे के बारे में कुछ सोच ही नहीं पाता । मुझे पता होता ---- उस छोटे से सुख की इतनी वड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी तो .............



" अब पछताने से कुछ नहीं होगा शैलेष । बच्चे की ख्वाहिश है तो आओ । समा जाओ मुझमें । बच्चा पैदा करना कौन--सा मुश्किल है? दो इसीलिए नाली मे बहा दिए क्योंकि उस वक्त मैं तुम्हारी रखैल थी । अब पत्नी हूं । पैदा कर दूंगी बच्चा । नौ महीने बोझा ही तो उठाना होगा उसका ।"
"बच्चे के लिए जिस तरह की "लेग्वेज’ तुम इस्तेमाल कर रही हो वैसी लेग्वेज इस्तेमाल करने बाली औरत कभी मां बनने के असली सुख को महसूस नहीं कर सकती ।"



"अब तो जैसी हूं , तुम्हारी पत्नी हूं शैलेष । मुझ ही से बच्चा हासिल करना होगा । और कोई रास्ता नहीं है ।"



शैलेष के जबड़े भिंच गए ।गुर्राया---"एक रास्ता है ।"


"कौन-सा रास्ता? ज़रा मैं है तो सुंनू।"



"कानूनी रूप से आज भी कुंती ही पत्नी है ।"



"तुम भूल रहे हो---"हमारी शादी कोर्ट में हुई है ।'"



" भूल तुम रही हो! मैं शादी-शुदा था । तलाक नहीं दे दिया था कुंती को ।

ऐसी अवस्था में तुमसे की गई शादी खुद-व-खुद गैरकानूनी हो जाती है ।"



ऐसा सुनते ही रूबी अवाक रह गई ।।



हालत थी जैसे हवा से परवाज़ करती-करती अचानक जमीन पर आ पडी हो । बहुत देर तक शैलेष को केवल देखती रही । कुछ बोली नहीं । फिर होठो पर मुस्कान पैदा की ।


मादक मुस्कान ।


वह मुस्कान जिसके बारे में वह जानती थी------" शैलेष को अंदर तक रोमांचित कर देने के लिए काफी है ।"



मगर, आज़ शैलेष पर अपनी मुस्कान का उसे वह असर होता नजर नहीं आया जो होना चाहिए था ।। तभी तो कहा----"डार्लिग, आज हुआ क्या है तुम्हें? इतने उखड़े हुए क्यों हो? अाते ही ये किस किस्म की बाते करने लगे ?"






"बताया तो रूबी । मुझे एक आदमी मिला था । उसने कहा’ "कुंती वंगला देशियों की बस्ती में . . .
"छोडो न शैलेष । क्या बेकार की बातें ले वैठे । उसकी बात काटकर रूबी ने अपने जिस्म पर मौजूद गाऊन जैसा लिबास उतार दिया । गाऊन के नीचे वह केवल सफेद अदरूनी बस्त्र पहने हुए थी । वे दोनों कपड़े उसके सांचे से ढले गुलाबी जिस्म पर ऐसे लग रहे ये जेसे गुलाब की पंखुडी की जड़ में सफेद रंग का शेड ।।।




साफ महसूस हुआ…शैलेष का हलक सुख गया है ।



थूक सरकता वह साफ नजर आया ।


ऊंची एड़ी की सैंडिल पर अपने जिस्म को नचाती-सी रूबी अागे बढ़ी । शैलेष की तरफ़ । उसके नजदीक पहुची । नंगी गोल और गुदाज बांहें उसकी गर्दन में डाली ।



बोली------"सुबह से तुम्हारे आँफिस से लौटने का इन्तजार कर रही हूं । जाने क्या-क्या सोचे थी कि तुम्हरे अाते ही यह करूंगी, वो करूगी । सारे जिस्म को चूमूंगी तुम्हारे और तुम्हें भी ऐसा मौका दूंगी कि मेरे सारे जिस्म को चूम सको मगर एक तुम हो आते ही लगे झाड़ने । जानती हूं डार्लिंग आँफिस में सारे दिन का काम तुम्हें थका देता है । थोड़े-चिड़चिड़े हो जाते हो तुम है आओ. .मैं तुम्हारी थकान उतारू ।" कहने के साथ उसने शेलेष को बैड की तरफ खींचा था । शैलेष की मुख-मुद्रा से साफ लग रहा था बह कुछ कहना चाहता है परन्तु रूबी के निमंत्रण को ठुकरा नहीं पा रहा ।



रुबी ने जब महसूस किया-----वह बैड की तरफ खिंचते कुछ हिचक रहा है-------------


तो-------अपने होंठ ऊपर उठाकर शैलेष के होठों पर रख दिए ।
शैलेष कसमसाता नजर अाया । ऐसी कोशिश कर रहा था वह अपने होठो को उसके होठों से अलग करना चाहता हो मगर कब तक? कब तक कर सकता था वह ऐसी कोशिश? साफ नजर अा रहा था-साफ नजर आ रहा था----उसके होठों को चुसकवी रूबी ने ब्रा के अंदर से छलक पड़ने को तैयार अपने यौवन उभार शैलेष की छाती में पेवेस्त कर दिए । अभी तक हिचक रहे, कसमसा रहे शैलेष की बाहें स्वत: बड़ी । रूबी के कोमल जिस्म के चारों तरफ़ लिपट गई ।। रूबी को समेटकर उसने अपने बलिष्ठ जिस्म में यूं समेट लिया धा जेसे चंदन के वृक्ष से नागिन लिपटी रहती है । जाने कब? शायद उसे भी मालूम नहीं था, उसके हाथ रूबी के शरीर पर थिरकने लगे । जाधों से पकड़कर रूबी को उसने ऊपर उठाया । और अब. . वह उसके हेंठों को उससे कहीं ज्यादा जोश में भरकर चूस रहा था ।



"स्टॉप इट. . सटॉप इट ।" कुर्ती के साथ बंधा विनम्र हलक फाड़कर चीख पड़ा । यूं कसमसाया था वह कि सारी कुर्सी को भूचाल झेलना पड़ा ।



चेहरा उसी तरह भभका हुआ था जिस तरह इस किस्म के दृश्य देखकर भभक उठता था । जब तब भी टीबी. पर वही दृश्य चलता रहा तो एक बार फिर चीख पड़ा------''बंद करौ इसे । बंद कर दो वर्ना मैं पागल हो जाऊगां"



" नहीं विनम्र । यह बंद नहीं होगा ।" कुंती देबी ने कहा---" पूरा देखना होगा तुम्हें? मैं जानती थी-इसे देखते वक्त तुम्हारा यही हाल होगा । जुनून सवारं हो जाएगा तुम पर । एक वार फिर टी . वी. स्कीन तोड़ने पर आमादा हो जाओगे । ऐसा न कर सको, इसका इन्तजाम मैंने पहले ही कर दिया हैे । कुर्सी से बांध दिया है तुम्हें । वेसे भी, इस दृश्य को तुम पहली वार नहीं देख रहे । पहले भी द्रेख चुके हो । तभी, जब ये पहली बार हुआ था ।"



"नहीं ।" वह दहाड उठा----" यह शर्मनाक मंजर कभी नहीं देखा ।"




" देखा है विनम्र ।" कुंती देवी का लहजा वहुत ठोस था----" तुमने देखा है ।"


"कब । कब देखा है मैंने यह सब?"



" जब यह वास्तव में हुआ था-पच्चीस साल पहले ।'"



तुम शायद पागल हो गई हो मां । मेरी तो उम्र ही साढे चौबीस साल है । फिर ये सब मेरा देखा हुआ कैसे हो सकता है ?"



'" तुमने देखा है बेटे । देखा है तुमने ।" " देवी मानो सचमुच पागल हो गई थी । कहती चली गई---" देखते रहो, शायद कुछ याद आ जाए । ध्यान से देखो-----अभी तो बड़े-वड़े मोड़ अाएंगे इस कहानी में । जिस रात के दृश्य तुम देख रहे हो, बडी ही कयामत की रात थी वह । देखो-------चारों तरफ से ध्यान हटाकर टी . बी पर केद्रित कर लो ।"



विनम्र कुछ समझ नहीं सका ।।।



नजर स्वत: स्क्रीन की तरफ उठ गई थी और फिर बहीं चिपककर रह गई| ।।


अब यह कहना गलत होगा कि शैलेष को रूबी खींचकर बैड पर ले गई थी ।


अब तो यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा एक-दूसरे से गुथे दोनों बैड के नजदीक पहुंचे ।। विनम्र भभकते चेहरे और सुलगती आंखों सै देखता रहा-----रूबी और शैलेष वेड पर पलटियां खा रहे थे ।।



शैलेष की शर्ट के सारे बटन खोल चुकी थी । शैलेष भूल चुका था कि कुछ देर पहले वह रूबी से कुंती की पेरबी कर रहा था । बिनम्र ने देखा---------" जव पूरी तरह कामोत्तेजित हो चुका तो रुबी इस खेल की घुटी हुई खिलाडी की मानिन्द चिकनी मछली की तरह फिसलकर बांहों से निकलेगा ।।



"आओं न रुबी । आओ न ।" वासनायुवत स्वर में कहता शैलेष उस पर झपट पड़ा ।



रुबी हल्की-सी करवट के साथ खुद को बचा गई ।।।


खिलखिलाई । वड़ी ही सैक्सी खिलखिलाहट थी वह ।



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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Jemsbond
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Re: कठपुतली -हिन्दी नॉवल

Post by Jemsbond » 10 Jan 2017 17:24


शैलेष फिर भूखे कुत्ते की तरह रोटी के टुकड़े पर लपका ।

रूबी पुन: खिलखिलाती हुई खुद को बचा गई ।।।


"य-ये क्या कर रही हो रुबी? प्लीज़ । तरसाओ मत ।'"


रूबी ने आँखें तिरछी करके कहा----"एक शर्त पर ।"



"मु-पुझे तुम्हारी हजारो शर्तें मंजूर हैं ।" कामातुर पुरुष और कहता क्या?



रुबी ने तकिए के नीचे से एक बाण्ड पेपर निकाला । साथ में पैन भी था । पैन खोलकर शैलेष की तरफ बढाया । कहा-----इस पर साईन कर दो । उसके बाद सब कुछ तुम्हारा ।"



शैलेष के जेहन में वह नस कहा बची थी जो इंसान को सोचने-समझने की ताकत देती है ।



पलक झपकते ही साईन कर दिए ।
रूबी ने पैन और बाण्ड पेपर वापस तकिए के नीचे सरकाए और उसके बाद यह सब कुछ हुआ जिसे विनम्र अपनी मां के सामने तो क्या, अकेला भी नहीं देख सकता था ।



वह बार-बार टी बी बंद करने के लिए कहता रहा परन्तु जाने क्यों, कुंती देवी ने ऐसा नहीं किया । वह अपने जवान वेटे को यह सब दिखाती रही जो शायद कोई मां अपने एक साल के बच्चे तक को नहीं दिखा सकती ।




चीखते-चिलाते और पगलाये से बिनम्र को जब कुछ और नहीं सूझा तो आंखें कसकर बंद कर ली ।




तभी खोली जब कमरे में फोन की घंटी की आवाज गूंजने लगी । पाया…व्रह आवाज भी टी.वी के स्पीकर्स से ही निकल रही थी ।।



शैलेष ने बैड से उठकर फोन रिसीव किया । दूसरी तरफ से जाने क्या कहा गया । सुनकर वह चौंका ।



रिसीवर वापस क्रेडिल पर पटकने के बाद बैड पर पड़ी रूबी से कहा-----" नई साईड से लोहा चोरी हो गया है । मेरा बहाँ अभी पहुंचना जरूरी है । "




रूबी ने मानो कुछ भी कहना ज़रुरी नहीं समझा । ज्यों की त्यों अपने जिस्म पर एक चादर डाले अलसाई-सी पड़ी रही ।



जिस तरह टी बी स्क्रीन पर से तूफान गुजर चुका था । उसी तरह विनम्र के जेहन पर भी अब तूफान का कोई नामोनिशान बाकी नहीं बचा । अब वह चेहरे पर घृणा लिए स्क्रीन पर नजर आने बाले दृश्यों को देख रहा था ।



शैलेष ने कपडे पहने और कमरे से बाहर चला गया ।



कार स्टार्ट होने की आवाज अाई ।



और. . .जैसे ही दुर होती कार की आवाज सुनाई देनी बंद हुई ।।।


रूबी ने एक झटके से अपने जिस्म पर मोजूद चादर दूर फेक दी । तकिए के नीचे से स्टाम्प पेपर निकाला ।



कूदकर फर्श पर खड्री हो गई इस वात की उसे जरा भी परवाह नहीं थी कि जिस्म पर कपड़े के नाम पर एक थागा तक नहीं है ।




स्टाम्प पेपर खाली था । रूबी ने उसे चूमा और बाथरुम की तरफ बड़ी ही थी कि बूरी तरह चौंकी ।



स्टाम्प पेपर हाथ से फिसलकर फर्श पर जा गिरा ।


" त-तुम ??" हलक से हैरत अंगेज लहजा निकला था----"त-तुम यहां?”




एक पर्दे के पीछे से प्रकट हुई कुंती ने कुछ कहा नहीं ।



मां को स्कीन पर खडी देखकर विनम्र के रोंगटे खडे हो गए । पच्चीस साल पहले की कुंती देवी थी वह ।
जिस्म पर सचमुच भिखारिन जैसा लिबास । बाल बिखरे हुए । दोनों आंखो के चारों तरफ बड़े--बड़े काले धब्बे नजर आ रहे थे । उभरा हुआ पेट बता रहा था-----वह प्रैग्नैन्ट है । कुछ भी तो नहीं बोल रही थी वह । वस अपनी सूनी-सूनी आंखों से रूबी को देख रही थी ।

रूबी ।



बह रूबी जो शुरू में उसे देखकर चौंकी थी ।

हड़बड़ाई थी ।


समय गुजरने के साथ सामान्य होती चली गई सामान्य ही नहीं 'मस्त' होती चली गई वह ।


झुकी । स्टाम्प पेपर वापस उठाया । उसे कलेण्डर की तरह गोल शेप में मोड़ती हुई बोली----"कमाल है, तू यहीं थी ।


इसी कमरे में । पर्दे के पीछे छूपी थी और छुपी ही रही ।


वाकई ।


तेरी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी । अपने पति कोअपनी आंखों से दूसरी औरत के साथ संभोग करते देखती रहीं और चुप रहीं । छुपी रही । सामने नहीं अाई । सचमुच । वहुत हिम्मत है तूझमें ।



तेरी जगह मैं होती तो गोली मार देती दोनों को । मेरी तारीफ में जो कहता रहा, उसे तू अपने कानों से सुनती रही और चीख नहीं पड़ी । कमाल का कलेजा है तुझमे ।



कुंती देवी के होंठ कांप रहे थे ।

आंखों में आंसू थे ।

मगर बोली अब भी कुछ नहीं ।


"बोल ना मां! बोल । तू चुप क्यों है?" बिनम्र इस तरह चीख पड़ा जैसे वह सब वर्तमान हो ।।



स्क्रीन पर पुन: रूबी ने ही कहा था-------" बैले शुरु में । तव, जब शैलेष इस कमरे आया था । जो कुछ उसने कहा था, उसे सुनकर तो तू गदगद हो गई होगी । पैरवी जो कर रहीं था तेरी । पैरवी ही नहीं, तारीफ कर रहा था । उस वक्त तो मैं विलेन नजर अा रहीं थी उसे । जी चाह रहा था-हरामजादे का मुह नोच लू। मौज मेरे साथ मनाने का चस्का पाल बैठा था । पैरवी तेरी कर रहा था-मूझे जैसे ही उसने कहा----कानून की नजर में अभी भी तू ही उसकी बीबी है तो मुझे झटका लगा । बात ठीक थी । यह बात पहले ही से मेरे दिमाग में थी । तभी तो यह स्टाम्प पेपर मंगाकर रखा था । उसके तेवर भाँपते ही मैंने अपने तेवर बदल दिए । वह सब परोस दिया जिसे उस जैसा मर्द कभी ठुकरा नहीं सकता । और देख मेरे पास कोरे स्टाम्प पेपर पर उसके साईन हैं । कल इस पर उसके द्वारा सारी चल-अचल सम्पत्ति मेरे नाम कर देने की तहरीर लिख दी जाएगी । उसके बाद वह कमीना अपनी कानूनी पत्नी को अपने साथ रखे, मेरी बला से । पर रहना उसे भी तेरे साथ वंगलादेशियो की वस्ती से होगा । कल से खुला छोड़ दूंगी उसे ।
मेरे पास रहना चाहे मेरे पास रहे । तेरे पास रहना चाहे. . .




वाक्य पूरा नहीं हो सका रूबी का ।


कुंती ने झपटकर उसकी गर्दन दबोच ली थी ।



"श-शाबास । शाबास मां ।" कुर्सी पर बंधा बैठा विनम्र पागलों भी मानिन्द चीख पड़ा---"मार डाल इसे । ये इसी लायक है । गर्दन दवा दे इसकी । छोड़ना नहीं मां । लाश बनकर ये ज्यादा खूबतूस्रत लगेगी ।। आंखें बाहर निकल आनी चाहिएं । जीभ लटक जानी चाहिए ।। मार । मार डाल मां । शाबास । मैं इसे लाश में तब्दील होती देखना चाहता हूं ।।"



जुनूनी अवस्था में वह चीखता चला गया ।



अपने स्थान पर खड़ी कुंती बेटे की हालत देखकर रो रही थी ।



उधर, स्कीन पर रूबी उसी तरह छटपटा रही थी जैसे विदू ओर क्रिस्टी छटपटाई थी ।। दांतो पर दांत जमाए कुंती उसकी गर्दन पर अपने हाथो का दवाब बढाती चली जा रही थी ।



उसके चेहरे पर कमोवेश वैसे ही भाव थे जैसे बिंदू और क्रिस्टि का खात्मा करते वक्त विनम्र के चेहरे पर थे ।


रूबी की आँखें उबल अाई । जीभ बाहर-लटक गई ।।


और फिर ।


वह वक्त भी अाया जब रुबी ने छटपटाना बंद कर दिया । हाथ पांव जहाँ के तहां लटक गए । गर्दन से ऊपर का हिस्सा कुंती के हाथों से झूल गया था । उसने हाथ हटाए । रूबी की लाश फर्श पर गिरी ।



"हां । मर गई" विनम्र को मानो अब जाकर चैन मिला हो---" वह मर गई मां । शाबास । अच्छा किया तुमने । वह इसी लायक थी । जिंदा रहती तो जाने कितने मर्दो को अपने जाल में फंसाती । कितने धर बरबाद करती । तुमने अच्छा किया मां तुमने खुद ही का नहीं, सारे समाज का भला किया है, ऐसी लड़कियों का यही अंजाम होना चाहिए ।"



कुंती देबी आगे बड़ीं । टी. वी. से कनेक्टिड बी.सी.आर. आँफ किया । स्क्रीन पर झिलमिल नजर आने लगी । कुंती देवी ने वी.सी.आर. का इजेक्ट वाला बटन दबाया ! वीडियों कैसिट बाहर आ गई ! वह केसिट जिसमे यह सब शूट था ।
"पर मां ।" वहुत लम्बी खामोशी के बाद विनम्र ने पूछा--" यह सव कैसिट में कैसे? किसने सूट किए ये सीन?"



"पवन प्रधान ने ।"



"पवन प्रधान? " विनम्र चौका…"वह्र जो मामा को ब्लैक मेल कर रहा था?"



"हां । वही । वह असल मे तेरे मामा को नहीं मुझ ही को ब्लैक मेल कर रहा था ।"



" म--मगर उस रात तो तुम भी मामा पर भडक रहीं थी । बात कुछ समझ में नहीं अा रही ।"


"उस रात, जिस रात मेरे हाथों रूबी की हत्या हुई । खुद मुझे भी पता नहीं लगा उस कमरे के सारे दृश्य सूट हो चुके है । हालांकि बहाँ रूबी की हत्या के इरादे से नही गई थी । वह तो बस हालातवश हो गई जिस खामोशी के साथ गई थी उसी खामोशी के साथ वंगलादेशियों की बस्ती में लौट गई बाण्ड पेपर साथ ले गई थी । उसके -दुक्रड़े करके नाले में वहा दिए ।

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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: कठपुतली -हिन्दी नॉवल

Post by Jemsbond » 10 Jan 2017 17:25

अगले दिन पेपर्स में रूबी हत्या का समाचार छपा । तेरे पापा सहित किसी को मुझ पर शक होने का सवाल ही नहीं था । उसकी हत्या के हज्जाम में किसी को नहीं पकड़ा जा सका । एक दिन तेरे पिता मेरी झोपडी में अाए । रूबी के रूपजाल से फंसकर भटकने के लिए माफी मांगी और मुझें बंगले से वापस ले गए । चैन की सांस ली ही थी कि पवन प्रधान सामने अाकर खड़ा हो गया । उसने मुझे कैसिट दी । एकान्त में देखने के लिए कहा । देखते ही होश उड़ गए मेरे । अगले दिन वह पुन: उस वक्त अाया जब तेरे पिता घर नहीं थे । उसने बताया…ये शूटिंग उसने कमरे के रोशनदान से भविष्य में रूबी को ब्लैक मेल करने के इरादे से की थी मगर अंत होते-होते मैं उसके जाल में फंस गई उसने कहा-----वह इस कैसिंट की चाहे जितनी कापियां बना सकता है क्योकि मास्टर प्रिन्ट उसके पास है । इस तरह उसके द्वारा ब्लेक मेल होने का सिलसिला शुरु हुआ । तेरा जन्म हुआ । यह सच है---जव तू पांच साल का था तो ' हार्ट फेल' हो जाने तेरे पिता की मृत्यु होगई और या भी सच है------उस वक्त मसीहा बनकर तेरे मामा हमारी जिदगी मे अाए । पवन प्रधान की मांगो से मैं इस कदर त्रस्त हो चुकी थी कि एक दिन सारा भेद तेरे मामा को बता दिया---उसके बाद-उन्होंने ही पवन प्रधान को "टेकिल' करना शुरू कर दिया । कहा-'तुम्हें जो चाहिए, मुझसे मांगोगे पवन प्रधान । बहन को परेशान नहीं करोगे । उससे मिलोगे तक नहीं ।" पवन प्रधान ने कहा---'मुझे इससे क्या फर्क पड़ता है । मुझे तो रकम चाहिए तुम दो या कुंती ।' तव से भैया ही उसे हैडिल कर रहे थे !"
"लेकिन जिस रात बह मारा गया, तुमने तो उस रात भी यह दर्शाया जैसे . . .



"वह सब भैया की जिद पर करने के लिए मजबूर थी ।"


"क्या मतलब ?


"बात उस दिन की है जिस दिन तुमने उत्तेजित होकर टी.बी. सक्रीन तोड़ डाली थी ।" कुंती देवी कहती चली गई-----''" जिस कदर तुम उत्तेजित थे और स्कीन तोड़ने का जो कारण तुमने बताया उसे सुनकर मेरे होश उड गए । तुम्हारी अवस्था और उस अवस्था में तुम्हारे बिचार ठीक वैसे ही थे जैसे रू्बी की हत्या करते वक्त मेरे थे । इस ख्याल ने मेरे होश उड़ा दिए कि 'हैरिडिटी' के रूप में जैसे मां-बाप की वहुत-सी आदतें बच्चों में आ जाती हैं, क्या उसी तरह यह बात भी तुममें आ गई है? तुम्हें याद होगा! उस वक्त मैंने तुझे गले से लगाने के साथ कहा था---" हे भगवान । तेरे विधान में क्या ऐसा भी हो सकता है? यह सोचकर मैं वहुत डर गई थी कि कहीं तू किसी रोज सच में रूबी जैसी लड़की की हत्या न कर बैठे? अपनी शंका भैया को बताई । वे भी हैरान रह गए । दोनों जाकर "साइक्लोजिस्ट' से मिले । बगैर यह बताए उससे डिसकस किया कि केस हमारे ही बेटे का है । उसने स्पष्ट कहा---" बेशक ऐसा हो सकता है । बच्चा जब मां के गर्भ में होता है तो वही खाकर जीवित रहता है जो मां खाती है । इसी तरह, वह सब देखता और सुनता है जो मां देखती और सुनती है । मां अगर खुश है तो बच्चा भी खुश होता है । मां अगर पीड़ा में है तो बच्चा भी उस पीड़ा को उसी शिदूदत से महसूस ही नहीं करता, जीता भी है । फर्क केवल यह होता है कि जन्म होते ही यह सब उसके स्मृति पटल से मिट जाता है ।


बावजूद इसके, उन्हीं खास हालात में फंसने पर जिन हालात को उसने गर्भ में रहते शिदूदत से महसूस किया था, वह कर सकता है जो उन हालात में उसकी मां ने किया था । हालांकि यह समझ नहीं पाएगा कि उसने ऐसा क्यों किया ।।


अभिमन्यु का किस्सा अाप लोगों ने जरूर सुना होगा । उसने गर्भ में चकव्यहू तोड़ने की विधि सुनी थी । अर्जुन आधी ही विधि बता पाए थे कि सुभद्रा को नीद आ गई मां को नीद आ गई तो बच्चा भी सो गया । वह भी आधी ही विधि सुन पाया ।

सामान्य अवस्था में अभिमन्मु को पता तक नहीं था कि चक्रव्यूह भी कोई चीज होती है और वह उसे आधा तोड़ सकता है लेकिन जब पाण्डवों के सामने यह समस्या अाई चक्रव्यूह को कौन तोड़े तो अभिमन्यु खुद कह उठा…'आधा चक्रव्यूह को तोड़ना मुझे अाता है ।'
पांडव यह सोचकर हैरान रह गए-अभिमन्यू ने चक्रव्यूह तोड़ना कब सीख लिया? बाद में यह रहस्य कृष्ण ने बताया था कि चक्रव्यूह तोड़ने की
विधि अभिमन्यु ने गर्भ में ही सीख ली थी । उसी तरह--------यदि किसी गर्भवती स्त्री ने हत्या की है तो वैसी ही खास परिस्थति पैदा होने पर उसका बच्चा भी हत्या कर सकता है । इसमें हैरत की कोई बात नहीं है । हां । वह खुद हैरान जरूर होगा क्योंकि जान नहीं सकेगा हत्या उसने क्यों कर डाली?"


" त-तो - तो ये है मेरे हाथों से हुई हत्याओं का रहस्य ।" विनम्र बड़बड़ा उठा ।


"हमने साइक्लोजिस्ट से ऐसे बच्चे के इलाज के बारे से पूछा । उसने कहा 'हां, उसका इलाज हो सकता है । मेडिकल साइंस से ऐसी दवाएं है । वह उस खास परिस्थिति में फंसने पर भी वेसे रियेक्ट नहीं करेगा । कहने का मतलब ये, ऐसा मरीज बिल्कुल ठीक हो सकता है लेकिन उसे लेकर मेरे क्लिनिक पर आना होगा और जब तक उसे दवाओं की मुकम्मल डोज न दे दी जाए तब तक उन खास हालात से बचाकर रखना होगा जिनमें वह किसी की हत्या कर सकता है ।"



"तो फिर तुमने मेरा इलाज क्यों नहीं कराया मां? क्यों हो जाने दी मेरे हाथों से हत्याएं?"



"मैं और भैया दुविधा से फंस गए थे । तुम्हे डाक्टर के पासं ले जाएँ या नहीं ? दो समस्याएं थी । पहली-------तुम क्या सोचोगे । दूसरी---कम से कम उस डॉक्टर को तो पता लग ही जाएगा कि शहर का प्रतिष्ठित कालोनाइजर विनम्र भारद्वाज इतनी खतरनाक बीमारी का मरीज हो सकता है । यहाँ इस बात पर खास ध्यान दो…"मरीज हो सकता है, जरूरी नहीं कि हो ही ।' साईक्लोजिस्ट ने हमसे यहीं कहा था-------ऐसा बच्चा मरीज हो भी सकता है, नहीं भी ।' उसमें मरीज के 'सिम्टम्स' नहीं हुए तो व्यर्थ ही धिछालेदारी हो जाएगी । और भी कुछ नहीं तो डॉक्टर को यह तो पता लग ही जाएगा कि मैं यानी विनम्र की मां एक हत्या कर चुकी हैै मुमकिन है…तुम्हें भी पता लग जाए । इन्हीं कारणों से 'ऊहापोह' में फंसे थे कि भैया को स्टाफ मेम्बर से पता लगा-नागपाल ने तुम्हें ओबराय में बुलाया है । इस बात का जिक्र भैया ने मुझसे किया । कहा------" मुमकिन वह विनम्र के सामने लड़की पेश करे, ऐसा वह पहले भी एक अन्य कालोनाइजर के लिए कर चुका हेै-मगर पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता वह ऐसा ही करने वाला है । मुमकिन है, सचमुच गगोल के आदमियों की लिस्ट देने वाला हो ।
एक बार फिर हम दुबिधा में थे । समझ नहीं पा रहे थे क्या करें?


कहीं ऐसा न हो कि तुम खुद को लुभाने की कोशिश कर रही लड़की को मार डालो । और कहीं ऐसा न हो जाएं कि इस वहम के शिकार होकर हम कम्पनी का नुकसान कर बैठे ।


हालात के मुताबिक तय ये हुआ कि भैया तुम पर नजर रखेंगे । इसीलिए उन्होंने सुईट के ठीक सामने बाला कमरा लिया । पांच बजे बहां पहुंच गए । अपने कमरे की "की होल' से वे सुईट के दरवाजे पर नजर हुए थे ।


उन्होंने सुईट में नागपाल और बिंदू को आते फिर नागपाल को जाते देखा और तुम्हें अाते देखा । आधे घंटे ' के बाद तुम्हें निकलते देखा और देखा तुम्हारे ठीक पीछे निकलते बिज्जू को ।। बिज्जू को उन्होंने सुईट के अंदर जाते नहीं देखा था। इसलिए चौंके । यह तो वाद में पता लगा वह पांच बजे से पहले से ही सुईट में छुपा हुआ था । उसके जाने के काफी देर बाद भी जब विंदू सुइंट से बाहर नहीं अाई तो भैया अपने कमरे से निकले । दवे पांव सुईट के दरवाजे के नजदीक पहुचे । आंख "की होल' से सटाई और होश उड़ गए । सामने बिंदू की लाश पड़ी थी । समझ सकते हो उसे देखकर भैया की क्या हालत हुई होगी । उनके पैरों तले की मानो जमीन ही सरक गई थी । दौड़ते-हाफंते अपने कमरे में अाए । मुझे मोबाईल से बताया-"कुंती वही हो गया जिसका डर था ।' पूरी बात सुनकर मेरे होश भी फाख्ता हो गए । क्या'-"भैया, जैसे भी हो विनम्र को बचाओ ।' उन्होंने कहा----"तू चिन्ता मत कर कुंती, मैं अपने बेटे को कुछ नहीं होने दूगा ।'


उसके बाद मनसब की मदद से तेरे मामा ने जो किया वह तू जानता है ।

सुईट से लाश उन्होंने यह सोचकर हटवाई --वहांसे मिली तो सीधे तुम ही फंसोगे ।"





यानी मामा ने जो किया मुझे बचाने केलिए किया जबकि गोडास्कर ने ठीक इसके विपरीत सौचा---उसकै ख्याल से हत्या खुद करके मामा
मुझे फंसारहे थे।"


"गोडास्कर के ये विचार तूने मुझें बताये । मैंने भैया को । तव भैया ने कहा…"हाला'कि इसकी कोई सम्भावना नहीं है लेकिन फिर भी पहले ही से कह रहा हूं कुंती । अगर ऐसे कोई हालात बने कि गोडास्कर मुझें बिंदू की हत्या के इल्जाम में पकडे तो तू खामोश रहेगी । एक लफ्ज नहीं ।' मैंने उनकी इस बात का पुरजोर विरोध किया । कहा-----ये तुम क्या कह रहे हो मैया? मैं बेटे को बचाने के लिए भाई की बलि कैसे चढ़ा सकती हूं ?


तब उन्होंने समझाया----' कुछ नहीं होगा पगली । हत्या ज़ब की ही नहीं है तो अदालत से सजा कैसे होगी ?
तू देख़ना-सुवूतों के अभाव में कोर्ट को मुझे बाइज्जत बरी करना होगा ।

जबकि तु-बोली तो विनम्र फंस जाएगा ।। वह फंसा तो बच नहीं पाएगा क्योकि हत्या सचमुच उसी ने की है ।


कानून को चकमा देने का यहीं एक रास्ता है-----वह फंस जाए जिसने जुर्म किया ही नहीं है । जव किया ही नहीं है तो साबित भी कुछ नहीं हो पायेगा ।


लिहाजा बरी होगा---असली मुजरिम इसीलिए बच जाएगा क्योंकि उसे कोर्ट मे पेश ही नहीं किया गया है ।


भैया के सारे तर्कों से सहमत होने के बावजूद मैं तुम्हें बचाने के लिए उसे फंसने के तैयार नहीं थी ।


तब उन्होंने तुम्हारी कसम देकर ऐसी कोई परिस्थिति अाने पर चुप रहने का वचन लिया ।


कलेजे पर पत्थर रखकर मैंने इस वचन को निभाया ।


सच्चाई यही है विनम्र, तेरे मामा तेरे लिए उतना कर रहे हैं जितना शायद एक बाप भी नहीं कर सकता ।।


उस वक्त तू हम ही से बात कर रहा था जव तेरे मोबाईल पर ब्लैक मेलर का फोन जाया ।

बात करता हुआ तू लांन में चला गया था मगर तेरी भाव-भंगिमाओं ने हमें बता दिया-फोन ब्लैक मेलर का है ।


बिज्जू की लाश मिलने, उसके कैमरे से गायब होने वाली रील ने इस बात सम्भावना पहले ही वना दी थी कि तुम किसी ब्लेक मेलर के चक्कर में फंसोगे।

यह फोन भैया ने खुद सुना । जिसके जंरिए तुम्हें अजंता होटल में एक करोड के साथ बुलाया गया था ।


पवन प्रधान से ब्लैक मेल हो रहे मैं और भैया जानते थे ब्लैेक मेलर किस तरह खून चूसते हैं । तुम्हें झमेले से बचाने के लिए भैया दाढी वाला बनकर अजंता पहुंचे । मगर उस रात ब्लैक मेलर वहाँ पहुचा ही नहीं ।।


तुम जानते हो वहाँ क्या हुआ ?"

----


"और तुम । तुम ‘मारिया वार' कैसे पहुच गई मां"'


कुंती देबी कहती चली गई------" भैया को जब गोडास्कर पकड़कर ले गया तो तेरी 'हिफाजत' के लिए मेरे अलावा कौन आगे अाता?


मेरी आंखें तो चौबीस घंटे तुझी पर ज़मी थी । इधर ने वैंक से एक करोड और निकला । उससे पहले करोड के साथ अटैची में भरा ।।

बिला में टैक्सी बुलाई ।।

मैं समझ गई…तू ब्लैक मेलर से मिलने जा रहा है । तेरे टैक्सी बैठने से पहले ही मैं ड्राईवर की नजर बचाकर पिछली सीट के नीचे छुप चुकी थी ।


तेरे साथ सुनसान इलाके में बने मकान पर पहुंची है जब तू और ड्राईवर डिवकी से अटैची निकाल रहे थे ।। तब मैं टैक्सी से निकलकर झाडियों में छुप गई टेक्सी बाला चला गया । तुम मकान के अंदर गए ।


मैं गेलरी में खडी वेन में जा छुपी थी । मकान के अंदर से जव गोलियां चलने की आवाज अाई तो मेरा कलेजा हिल गया था ।।
मगर जब देखा----तुम मारिया को कवर किए चले आ रहे हो तो सोचा-----जो हो रहा है, ठीक ही हो रहा है ।


मैं और भैया भी तो यही चाहते थे ।

यह कि कुछ ऐसा हो जाए जिससे तुम ब्लेक मेलर के चंगुल से निकल जाओं । यही तुम कर रहे थे ।


मारिया बार में तुम मारिया को लेकर उसके बेडरूम में चले गए । मुझे लग रहा था---काम हो गया मगर तभी बहां गोडास्कर पहुच गया ।


एक बार फिर मेरे होश उड गए लेकिन खैर, अंत भला तो सब भला ।" कहने के बाद कुंती देवी सांस लेने के लिए रुकी थी ।



पुन: बोली-------"'हालात ये है विनम्र, तुमने जो भी किया या हालात ने कराया, किसी का कोई सुबूत कहीं नहीं है । सारे फोटो और रील हमारे कब्जे में है । नाटा, क्रिस्टी मारिया मारे जा चुके है ।


केवल यही जानते थे कि बिंदू की हत्या तुमने की है । यह हमारे लिए बहुत अच्छा रहा कोई सूत्र नहीं है जिसे पकड़कर पुलिस तुझ तक पहुच सके । इससे लगता है…भगवान भी हमारे साथ है ।


बैसे भी, कुसूर क्या है तेरा? तू मेरी तरह बेकसूर है बेटे ।


'हैरीडिटी' वश तूने जो किया यह मेरी देन है, तेरी मां की देन । मैं तेरा इलाज कराऊंगी । वहुत जल्द तू ठीक हो जाएगा । वैसे हालात में फंसने पर भी कोई आवाज तुझे किसी लड़की की हत्या के लिए नहीं उकसाएगी ।"



"मगर मामा । मामा का क्या होगा मां?"



"उनकी फिक्र मत कर । एक दिन की भी सजा नहीं होगी भैया को । बे पूरा प्लान वना चुके हैं ।" कुंती देबी ने कहा----'थोड़ा-सा टॉर्चर होने पर वे वह सब कुबूल कर लेगे जो गोडास्कर कुवूलवाना चाहता है मगर कोर्ट में मुकर जाएंगे । कहेंगें----उन्होने बिंदू की हत्या नहीं की । सुबूतों के अभाव में कोर्ट को उन्हे छोड़ना ही पडे़गा ।"



बात हर एंगिल से विनम्र को ठीक लग रही थी ।
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तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Re: कठपुतली -हिन्दी नॉवल

Post by Jemsbond » 10 Jan 2017 17:26


थैक्यू भैया । थैेक्यू वेरी मच ।" श्वेता ने झपटकर गोडास्कर के गाल का चुम्बन ले लिया था ।



खीरा खाते गोडास्कर ने कहा-----"किस बात पर इतनी खुश है?"



" मेरा अनुरोध जो मान लिया तुमने । इतनी जल्दी सलाखों के पीछे जो पहुंचा दिया विंदू के हत्यारे को ।"'
कहने के साथ श्वेता ने वह अखवार
डायनिंग टेबल पर पटका जिसमें चक्रधर चौबे की गिरफ्तारी की ख़बर
थी । कहती चली गई वह--"विनम्र बेचारा किस कदर टेंस था । मगर, बात है हैरतअंगेज भैया । हालांकि तुमने पहले ही मामा पर शक जाहिर कर दिया था । मगर न विनम्र को यकीन अाया था, न मुझे । मैं और विनम्र तो सोच तक नहीं सकते थे कि बाहर से इतना प्यार जताने वाला मामा अंदर से इतने काले हैं । ये दौलत भी सभी से क्या-किया गुल खिलवाती है । जो कम्पनी एक दिन खुद मामा ने ही बिनम्र को सौंपी थी, उसी कम्पनी का मालिक बनने के लिए उन्होंने विनम्र को हत्या जैसे जघन्य जुर्म में फंसाने की कोशिश की ।"



"तू अगर चोंच बंद करे तो गोडास्कर भी कुछ कहे बहना?"



बहुत खुश थी श्वेता । बीली--'"बोलो भैया ।"




“अखबार से छपी यह खबर रात की है और रात की ज्यादातर चीजें सुबह तक 'बासी' हो जाती हैं ।"



"क्या मतलब?" “गोडास्कर" के चैनल से सुबह के बुलेटिन की ताजा खबर ये है कि बिंदू का हत्यारा चक्रधर चौबे नहीं है ।"



" क-क्या ?" श्वेता उछल पड़ी--"क्या कहा अापने?"



"वही । जो तूने सुना ।" गोडास्कर खीरा चिंगलता रहा ।




“पर ऐसा केसे हो सकता है? अखबार में तो लिखा है------इस केस को अाप ही ने वर्क आऊट किया है । अाप ही ने पकड़ा है मामा को । वे अाप ही की हवालात में हैं ।"




"एक-अक लफ्ज ठीक लिखा है ।"




"और अब अाप कह रहे हैं-हत्या मामा ने नहीं की । बात कुछ समझ में नहीं आई ।




" गोडास्कर ने हालांकि पहली बार गच्चा खाया । लेकिन खा तो गया ही ।। वस एक ही गनीमत रही । यह कि पूरा गच्चा नहीं खा पाया । आधा खाकर रह गया । चक्रधर चौबे को कोर्ट में पेश कर देता तो पूरा ही गच्चा खा चुका होता । गोडास्कर का यह रिकार्ड टूट जांता कि उसके द्वारा कोर्ट में पेश किया गया मुजरिम बगैर मुजरिम सबित हुए नहीं रहता । और इसके लिए शुक्रिया अदा करना पड़ेगा पिछली रात को ।। उस रात को जिसमे घटनाएं काफी तेजी से घटी ।।"



"मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा भैया । तुम कह क्या रहे हो?"




"छोटा-सा दिमाग है गोडास्कर की नन्हीं-सी बहन का । ज्यादा पेंचदार‘ बाते समझने की कोशिश मत कर । वलास्ट हो जाएगा । बस इतना समझ ले…चक्रथर चौबे धोखे में पकडा़ गया । असली हत्यारा कोई और है । पिछली रात उसने तीन हत्याएं और कर दी ।"
"त-तीन हत्याए'?"




"उनने से एक हत्या ठीक उसी तरह की गई । जिस तरह विंदू की थी । बाकी दो को गोली मार दी । दो हत्याएं सुनसान इलाके में बने एक मकान में ।। गोडास्कर मुआयना कर अाया है । एक हत्या मारिया बार में की । खुद मारिया की । यह हत्या तो पटूठे ने एक तरह से गोडास्कर के देखते ही देखते कर दी ।"



"और वह घटनास्थल से भागने में कामयाब हो गया?"




"यही तो करिश्मा किया पटृठे ने । गोडास्कर को अपनी शक्ल तक नहीं देखने दी । "




" पर एक रात में तीन हत्याएं ? श्वेता के चेहरे पर खौफ था-----"वह पागल है क्या?"





"मारिया का तो यहीं कहना है । कि वह पागल है । हत्या करने का जुनून सवार होता है उस पर । किसी मर्द को लुभाने की कोशिश कर रही लडकी को देखते ही गर्दन दबाकर उसे मार डालता है ।"



"धक्क ।" से रह गया श्वेता का दिल ।




"क--क्या कहा?" मुंह से निकला-……'"क-क्या कहा भैया?"





गोडास्कर अपने शब्द दोहराने लगा । दरअसल ये शब्द उसके अपने नहीं, मारिया के थे । उन्हें सुनते वक्त श्वेता की आंखों के सामने नाच रहा था-------स्वीमि'ग पूल में अधेड से अठखेलियां कर रही लड़की का दृश्य । उस दृश्य को देखकर भभके हुए विनम्र का चेहरा वह आज तक नहीं भूली थी ।


वह उस वक्त भी उस चेहरे को देख रहीं थी जब गोडास्कर ने झंझोड़ा ---“कहां चली गई बहना?"



"आं !! " वह चौंकी…“क-कहीं नहीं । मैं यहीं हूं ।"



"मगर तू चिन्ता मत कर । तेरा भाई जल्दी ही असली मुजरिम को पकडकर विनम्र को टेंसन मुक्त कर देगा ।" उसे सान्तवना देने के लिए गोडास्कर जाने क्या…क्या कहता चला जा रहा था ? उसे नहीं मालुम था, कि श्वेता के कानों तक उसका एक शब्द भी नहीं पहुच पा रहा ।
"त-तुम । तुम यहाँ श्वेता?" विनम्र अचानक उसे अपने बेडरूम में देखकर चोंक पड़ा ?”




श्वेता चहकी-----" क्या मैं यहाँ नहीं आ सकती?"



"आ क्यों नहीं सकती । घर है तुम्हारा मगर...... ..


"मगर?" श्वेता ने उसकी आँखों में झांका ।




" पहले कभी बगैर फोन के नहीं अाई । इसी कारण थोडा आश्चर्य हुआ और...........




"और ?" वह जरूरत से ज्यादा चहक रही थी ।





उसे ऊपर से नीचे तक देखते 'बिनम्र ने कहा------"ड्रेस भी आज तुमने कुछ अलग पहन रखी है ।"




"क्यों, क्या बूराई है इस ड्रैस में?" कहती हुई श्वेता थोड्री पीछे हटी---"स्कर्ट-ब्लाऊज पहना है । अच्छा नहीं लग रहा?"





"अच्छा तो लग रहा है मगर.......




"बात अधूरी वहुत छोड़ रहे हो आज तुम । मगर क्या?"




"ऐसी ड्रेस में मैंने तुम्हें कम देखा है । बल्कि शायद पहली बार देख रहा हूं ।"




गनीमत है, मैंने कुछ पहन तो रखा है । तुम तो कुछ पहने हुए भी नहीं हो । कहने के साथ वह हंसी थी ।।



विनम्र झेंप गया । सचमुच उसके जिस्म पर "वी शेप' अण्डरवियर के अलावा कुछ नहीं था ।



बाथरूम से नहाकर निकला था वह । बेडरुम में कदम रखा ही था कि सामना श्वेता से हुआ । शायद इसीलिए ज्यादा बौखला गया था । जाने वह कब वहाँ आ गई थी ।




जव उसने नग्नता का ध्यान दिलाया तो उपने कपडों के वार्डरोब की तरफ लपका ।




जिस्म पर डालने के लिए शर्ट निकाली ही थी कि अपने दोनों कंधों पर श्वेता के कोमल हाथ महसूस किए ।



सारे शरीर में विधुत तरंगे दौड़ती महसूस की उसने ।



जबकि श्वेता ने अपना गाल उसकी पीठ पर रख दिया । साथ ही बहूत रोमांटिक लहजे मे कहा था-------"कोई जरूरत नहीं है ।"




"क-क्या मतलब? " वह चौंककर कहता हुआ घूमा ।



श्वेता उसके नजदीक खडी थी ।

वेहद नजदीक ।


इतनी ज्यादा कि वह उसकी गर्म सांसों को अपने चेहरे पर महसूस कर रहा था ।।



आंखे 'बरबस ही श्वेता की आंखों से जा टकराई ।


शायद 'बरबस' कहना गलत है । असल में ऐसा इसीलिए हुआ था क्योकि वह उसकी आंखों में झांक रही थीं ।


एकटक ।


अपलक ।



"मुझे तुम ऐसे ही अच्छे लग रहे हो ।" कहने के साथ वह उसके सीने के बालों से खेलने लगी थी ।।
"क-क्या वात कर रही हो श्वेता ।" विनम्र कधें के नज़दीक से उसके दोनों बाजू पकड़कर खुद से अलग हटाता बोला-----""' तुम्हें हो क्या गया है?"





"आज मैं खुश हूं । बहुत खुश ।" कहने के साथ वह उसके हाथों से निकलकर फिरकनी की तरह घूम गई कुछ इतनी तेज कि स्कर्ट ऊचे उड़कर हबा में घूम गई थी । इतने ऊचे कि स्कर्ट के नीचे श्वेता द्वारा पहना गया चुस्त अण्डरवियर तक चमक गया । स्कर्ट थी ही इतनी ऊंची कि यूं घूमने पर उसे चमकना ही था ।




"मगर क्यों, ऐसी क्या बात हो गई है? विनम्र ने खुद को नियंत्रित रखने की कोशिश करते हूए कहा ।




"बिंदू का हत्यारा जो पकड़ा गया । टेंसन मुक्त जो हो गए तुम ।। क्या तुम खुश नहीं हो?" कहने के बाद फिरकनी की तरह घूम रही श्वेता रुक गई थी और विनम्र.......ने पहली बार महसूस किया…....ब्लाऊज के नीचे वह कुछ भी नहीं पहने थी ।




विनम्र ने उसके उठानों को थरथराते महसूस किए थे ।



हे भगवन ।। ये क्या है ??



श्वेता को तो इस तरह उसने कभी नहीं देखा ।



वह हमेशा ब्रा पहनकर रहती थी ।




और गला....... ब्लाऊज का गला भी काफी बड़ा था ।



इतना ज्यादा कि चोटियों का उपरी हिस्सा नजर आ रहा था ।




ब्लाऊज में कोई बटन या हुक नहीं था ।



अपने पेट पर उसने दोनों 'पल्ली' की गांठ-सी बांध रखी थी ।


बह भी इतनी उपर कि नाभि साफ़ चमक रही थी ।।



विनम्र चाहकर भी कुछ न बोल सका । जुबान तालु से जा चिपकी थी ।




श्वेता उसे बहुत ध्यान से देख रही थी । पता लगाने की कोशिश कर रही धी कि उस पर उसकी ड्रैस और अब तक की हरकतों का क्या प्रभाव पड़ा है? सोच रही थी-----क्या इतना मासूम चेहरे वाला जुनूनी हत्यारा हो सकता है? किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी वह । ।




"तुमने जवाब नहीं दिया विनम्र ।"



"आं । " वह हड़बड़ाकर बोला----“कौन सी बात का जवाब?"




"क्या तुम्हें बिंदू मर्डर केस खुल जाने की खुशी नहीं हुई ?"'


" ह-हुआ क्यों नहीं मगर.......


" तुमने फिर बात अधूरी छोड़ दी ।"
"मुझे दुख है, उसके हत्यारे मामा निकले ।"




" दुख भी ज्यादा हैरत की वात है विनम्र ।" कहने के साथ वह ' पॉलिसी ' के तहत विनम्र की तरफ बढी । एक बार फिर उसके बेहद नजदीक पहुंची । बोली ।





" हम सोच तक नहीं सकते थे । मामा' ऐसा कर सकते हैं । भैया ने पहले ही शंका जाहिर कर दी थी । कभी-कभी हम दिल से सोचने वाले लोग वहुत गलत सोच बैठते हैं । इसीलिए धोखा खाते हैं । दिमाग से सोचने वाले भैया जैसे लोग कभी धोखा नहीं खाते । अक्सर इंसान बाहर से और नजर जाता है, अदर से विपरीत निकलता है । ऐसा कि उसके बाहरी रूप को देखकर जैसे की कल्पना तक नहीं की होती ।"




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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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