खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete

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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 13 Jun 2017 17:20

मोना चौधरी भी गहरी सांस लेकर मुस्करा पडी ।


"तांत्रिक मोहम्मद ।" सतपाल आभार भरे स्वर में कह उठा----" सब आपकी मेहनत का ही... !"


"मेरी नहीं सबकी । तिनका-तिनका इकट्ठा हो जाए तो पेड़ के तने को भी तोड़ सकता है ! यही अब हुआ । जाता हू मै , मेरी समाधी का वक्त हो चुका है !"


इस आवाज के साथ ही वहां खामोशी-सी आ ठहरी । अगले ही पल मंगलू की घबराहट-भरी आवाज ने उन्हें चौंका दिया ।


"औह ।। ये चाकू मेरे हाथ में.. ये क्या हो गया मुझे? मैने किसी को नहीं मारा । .ये. ।"


तभी उसकी निगाह भवतारा के शरीर पर पडी तो चेहरे पऱ अविश्वास के भाव आ ठहरे । हाथ में थमे चाकू को भूल गया ।


सतपाल उसके पास अच्चा पहुचा ।


"..तुम...... तुमने. .!" मंगलू ने सतपाल को देखा-"म....म....मार दिया शैतान को सच में तुमने मार दिया ।"


सतपाल मुस्करा पड़ा।


"..ल..... लेकिन ये चाकू मेरे हाथ मेँ क्यों आया? मैंने तो इसे पकडा न था ।"



"हमारा काम पूरा होगया । ये ही बात्त याद रखो । फालतु के सवालों में न पडो ।"



"ओह.....!" मगंलू ने चाकू छोड़ कर पेट पकड़ लिया -----" मुझे भूख लग रही है, खाने को चाहिए मुझे । "


"कामिनी नहीं चाहिए?" मोना चौधरी हंसकर बोली ।



"कामिनी?" मंगलू मुस्करा पड़ा-" हां , वो भी चाहिए, लेकिन पहले खाना भूख बहुत लगी है । जान निकली जा रही है ।"




@@@@@@@@@@@@@@@@@@




"क्यों बूढे! तू मुह लटका के क्यों बैठा है?” बसन्ती ने पूछा ।



" दुल्हा नही आया।" दीनू ने कहा-"त्तीन बज गए !"


" तो हमारा क्या जाता हे, तू मजे से बैठा रह ।"



" मजे से… !"


“और नहीं तो क्या-हमारी लडूकी हमारे घर पर है । भारी नहीं पड़ रही हमें । आएगा तो व्याह कर ले जाएगा, नंहीं आएगा तो मौज करे बो । लाखों रुपया उसने हमेँ दे दिया । कपडे मिल गए, अब बाकी का काम उसका है ।" बसन्ती मुंह बनाकर और आंखें नचाकर कह रही थी…" आज नहीं, आया तो उसे सालभर चक्कर लगवाऊंगी ।"



"साल-भर?"



"हां, कह दूंगी, साल-भर अब मुहूर्त नहीं, क्यों पंडितजी?” ,


पंडितजी, जो कि मंडप के पास अधलेटे-से पडे थे, जवाब में सिर हिलाने लगे !

"तुम क्यों फिक्र करते हो पंडितजी, तुम्हारे तो 2100 पक्के है, वो आए या न जाए ।"


पंडितजी मुस्कराकर कह उठे ।


"अगर एडवांस मिल जाते तो ।"


अब इतनी भी जल्दी मत करो, तुम तो बिना फेरे के ही डोली बिदा कराने पर लगे हो !"


झोंपडी के भीतर कामिनी सजी-धजी पडी थी । सुबह बसन्ती ने जल्दी उठा दिया था । अब चारपाई पर लेटी तो आंख लग गई । जब आंख खुली तो हढ़बड़ाकर उठी । अपनी सजावट को पास रखे शीशे में निहारा । कपडों को देखा । अगले ही पल उसका चेहरा उतर गया ।


ओह ।। ये क्या करने जा रही थी वो । (शैतान के बेटे भवतारा की मौत के साथ ही, शैतानी शक्तियों का घेरा उस पर से उठ गया था, ऐसे में के फिर पहले वाली स्थिति मे, यूं कहें कि होश में आ गई थी ।)


ऐसे इंसान से व्याह करने जा रही है जिसे वो पसंद नहीं करती ओह ।। क्या हो गया है उसे ।
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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 13 Jun 2017 17:21

कामिनी उसी पल झोंपडी से बाहर निकली, ।



“मां !"



"सब्र रख तू भी, तेरी बारात आती ही होगी ।"



"मैं उससे शादी नहीं करूंगी।”



"लो ।" बसन्ती पूरा मुंह खोलकर कह उठी----“देख लो, फिर लग गए टिड्ढियों को पर । कहती है शादी नही करेगी ।"



" नहीं करूगी उससे शादी ।



" क्यों? क्या खा गया तुझे, जो… . !"



" वो मुझें अच्छा नहीं लगता !"



"अभी तक तो वो तेरे को बहुत अच्छा लग रहा था । उसी के गुणगान कर रही थी । रोज उसके साथ खुशी-खुशी बाजार जाती थी । अब कह रही है कि वो तेरे को अच्छा नहीं लगता ।"



"नहीं अच्छा लगता ।"



" सुन छोकरी!" बसन्ती तीखे स्वर-मे कह उठी…"अब तेरी ये बाते चलने का वक्त नहीं रहा । बारात आने वाली होगी । पंडित जी बैठे है, तेरे फेरे उसके साथ ही होंगे । उससे कपड़े ले लिए पैसे ले लिए, अब कहती है कि वो अच्छा नहीं लगता ।"



"मैं ये शादी नहीं करूगी ।" तेज स्वर मैं कह उठी कामिनी-----" पता न नहीं मुझे क्या होगया था, जो उससे व्याह करने को हाँ कह दिया !"



" इस मंडप का क्या करूगी, इस पंडित का क्या करूगी, जो 2100 रुपए लेने की ताक में डटा बेटा है ।"

“मेरा व्याह करना ही है तो मंगलू से कर दो ।"




"मंगलू ये कौन है?" बसन्ती की आंखें सिकुडी ।



"उसी का नौकर है, बो मुझे अच्छा लगता है ।"



"हू .सुना बूढे!"



"मुझे नहीं सुनाई दे रहा, कान बंद हो गए हैं ।"दीनू कह उठा ।



" तुझे क्यों सुनाई देंगे बेटी 'के गुल! ” फिर वो कामिनी से बोली----" जब मालिक तेरे हाथ में हो तो नौकर से क्यों व्याह करती है? व्याह मालिक से कर और..... !" बसन्ती कहते-कहते ठिठकी ।



सामने ही पेडों की तरफ से उसने मोना चौधरी, सतपाल और मंगलू को आते देखा ।



" लगता है, बारात आ रही है, पर दुल्हा साथ नहीं है । वो क्या बाद में आएगा !" बसन्ती कह उठी ।


सबकी निगाह उधर उठी ।



मंगलू पर निगाह पड़ते ही कामिनी कां चेहरा खिल उठा ।


"मंगलू !" उसके होंठों से निकला ।


"ये मंग़लू है, वो छोकरा-सा !"


"हां ।"



"कपड़े तो महंगे पहन रखे है ।" बसन्ती ने कहा---, अच्छा कमाता लगता ।"


"बहुत अच्छा है ये ।" कामिनी खुश होकर कह उठी।




बो तीनों पास पहुंचकर ठिठके ।


“क्यो रे ......" बसन्ती मंगलू से बोली---" तेरा मालिक कंहा है? आज़ उसने दूल्हा बनना था !"



" वो मर गया !" मंगलू बोला।


" क्या?" पंडित जी उछलकर खडे हो गए --- " दूल्हा मर गया?"



"क्या कह रहा है तू?" बसन्ती हड़बड़ाकर कह उठी।



"ये ठीक कह रहा हे, वो अब कभी नहीं आएगा एक्सीड़ेंट में वो मारा गया ।" मोना चौधरी बोली-----" दुल्हा मंगलू बनेगा !"


"ये कैसे हो सकता है ?" दीनू के होठो से निकला ।।


"कामिनी से पूछ लो, वो मंगलू से व्याह करने को तैयार है ?" मोना चौधरी मुस्कराकर कह उठी ।



“मैं तैयार हूं !!" कामिनी मुस्कराकर शरमाकर कह उठी ।



"ये नहीं हो सकता । दीनू कह उठा----"ये......!"



" तू चुप रह बूढे !" बसती कह उठी---. "असली दूल्हा मर गया तो नकली सही, मण्डप तैयार है, पंडित बैठा है और दुल्हन सजी बैठी है तो हर्जं ही क्या है । याद नही तेरे को , तूने भी मुझसे ऐसे ही ब्याह किया था ।

मैं सजी-धजी मंडप में बैठी थी, मेरा असली दूल्हा मंडप में बैठने से पहले मोटरसाइकिल की मांग करने लगा था । उसकी मांग पूरी नहीं हुई तो के बारात के साथ वापस चला गया । अब मेरे बापू ने वहां मौजूद लोगों से कहा कि कोई है, जो मेरी मेरी बेटी से व्याह करे , तो तुम भागे-भागे आकर मंडप में बैठ गए थे ।”


"वो तो मैंने तेरे बाप की इज्जत बजाई थ्री ।" दीनू दांत फाड़ते हुए कह उठा ।



"तो समझ ले बूढे! मंगलू हमारी इज्जत बचा रहा है ।" बसन्ती ने जैसे अपना फैसला सुना दिया ।
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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 13 Jun 2017 17:21

कामिनी एकाएक खिलखिलाते हुए दोड्री और मंडप में जा बैठी, फिर मंगलू को देखकर कहा ।


"आ मंगलू जल्दी से आ जा । हम व्याह कर लेते हैं ।"



मंगलू मुस्कराया और आगे बढकर मण्डप में जा बैठा । पंडित मंत्र और फेरे के लिए फौरन चाक-चौबंद हो गया । उसे 2100 रुपए जो मिलने थे।



“चल बुढे! मण्डप मे लड़की के साथ बैठ, पंडित का हाथ बंटा कामो में, मैं मेहमानों के लिए हलवा तो वना लू।" उठते हुए बसन्ती बोली-"क्या करूँ, मेहमान आ ही गए हैं तो मुह मीठा कराना ही पडेगा । ये बनारसी साडी पहनकर हलवा बनाना भी मुसीबत का काम है ।"



मोना चौधरी और सतपाल की नजरें मिली ।



दोनों ही मुस्करा पड़े ।



पंडित जी ने अपना काम शुरू कर दिया । मोना चौधरी आगे बढकर कुर्सी पर आ बैठी थी । सतपाल ने सिगरेट सुलगा ली ।



"तू बहुत अच्छी लग रही है ।" मंगलू कामिनी के कान में कह उठा ।

"धत ।। वो तो मैं हमेशा ही अच्छी लगती हूं ।" कामिनी शरमाकर कह उठी---" पंडितजी कितनी देर लगाओगे फेरों में ।"



"अभी तो काम शुरू हुआ है ।" पंडित ने कहा ।


"जल्दी कीजिए-ना, मुझे बाजार जाना है, पानी-पूरी खाने के लिऐ । क्यों मंगलू! तु भी खाएगा ना?"



"हां-हां, क्यों नहीं खाऊंगा उसके बाद मां के पास चलेगे । मेरे साथ तेरे जैसी खूबसूरत दुल्हन को देखकर वो वहुत खुश होगी ।"



" अब तू नोकरी नहीं करना । झोंपडी में बहुत सारा पैसा पडा है । दुकान खोल लेना । हम दोनों दुकान पर बैठा करेंगे !" कामिनी खुशी
से कह उठी ।



"ठीक है, जैसा तू कहेगी, मैं वैसा ही करूंगा ।"



पंडितजी फटाफट अपने काम को पूरा करने में लगे हुए थे ।



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THE END
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