खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete

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kunal
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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 11 Jun 2017 16:57

"चलो । वाकी बाते होटल चलकर करेगे !" मोना चौधरी ने कहते हुए मंगलू के कंधे पर हाथ रख दिया !!



चलही पडां मगंलू उनके साथ ।।



वे होटल पहुँचे ।।


रास्ते-भर मगतू चुप-धुप-सा रहा था । मोना चौधरी और सतपाल जानते थे कि मंगलू धीरे--धीरे रास्ते पर आ रहा है । कामिनी का झुकाव भवतारा की तरफ हो जाने की वजह से मंगलू का दिल टूट चुका है, इसी बात का वो फायदा उठा लेना चाहते थे, वरना जानते थे कि मंगलू अपनी बात का कितना पक्का है, वो शैतान के देते के बारे कुछ भी नहीं बताने वाला ।



होटल के कमरे में पहुंचते ही मोना चौधरी ने बात शुरू को ।


"तुम कामिनी को पाना चाहते हो, उससे शादी करना चाहते हो?"



" मैं तो चाहता हू परंतु अब कुछ नहीं हो सकता । भवतारा बहुत खतरनाक है ।" मंगलू बोला ।



"शेतान के बेटे की बात तुम हम पऱ छोड दो । क्या तुम कामिनी को पाना चाहते हो?"



"हां ।"


"हमारा साथ दोगे?"



"साथ?" मंगलू बेचैन हुआ ।



"कामिनी को पाना है तो हमारा साथ देना ही होगा बोलो तैयार हो ?" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा ।




" साथ मे-क्या करना होगा-कैसा साथ चाहते हो तुम लोग?”



"शैतान का बेटा कहां हैं?" सतपाल ने कहा-----" बताना होगा ।


मंगलू सतपाल को देखने लगा ।



"तुमने कामिनी को पाना है तो हम शैतान के बेटे को खत्म करेगे । तभी तुम कामिनी को हासिल कर पाओगे ।"


मंगलू ने बैचेनी से पहलू वदला ।



मोना चौधरी कह उठी ।


"शैतान के बेटे ने तुम्हारी कामिनी को तुमसे छीन लिया है, इसकै बाद भी क्या तुम इस बात पर ।"



"वो वो बहुत शैतान है । खतरनाक है, उस पर काबू पाना असंभव बात है । इंसानों का खून पीता है और तब जब वो इंसानों का खून पीता है, उसका रूप पूरी तरह बदल जाता है । सामान्य तौर पर बो खूबसुरत युवक है, परंतु अंधेरा होने पर जब वो खून पीता है तो वहुत भयानक लगता है ।....


..... बो-वो नहीं रहता, दरिन्दा वन जता है । उसका रूप बदल जाता है । चेहरा ऐसे भयावह हो जाता है किं कोई देखे तो मर जाए । उसके आगे के दात बाहर आ जाते है । उँगलियों के नाखून बड़े-बड़े हो जाते हैं, सिर के बार खडे हो'जाते हैं !


उसके होंठों से वहशियों की तरह गुर्राहटैं निकलती हैं और इंसान का खून पी लेने के बाद वो ऐसे चलता है, जैसे नशा कर लिया हो ।

शैतानी ताकतों का स्वामी है वो है जिसका मुकाबला नहीं किया जा सकता ।"



" हम मुकाबला करेगे उसका ।" सतपाल बोला--"" हम खत्म करेगे उसे ।"


" असम्भव तुम दोनों के लिए तो उसे छु पाना भी नामुमकिन हैं । उससे पहले ही वो तुम लोगों को मार देगा ।"


मोना चौधरी और सतपाल की नजरे मिली ।



" मंगलू! " मोना चौधरी समझाने वाले गभीर स्वर में बोली-“तुम हमें शैतान के बेटे का ठिकाना बताओ । उसके बाद जो करना होगा, वो हम ही करेगे, तुम्हें कुछ नहीं करना होगा, तुम्हारी जान नहीं जाएगी !"




“तुम लोग उसे बता दोगे कि मंगलू ने तुम्हें उसके बारे मैं … बताया था !"



”नहीं, हम उसे कुछ भी न बताएंगे ये हमारा तुमसे वादा है ।" सतपाल ने दुढ़ स्वर कहा ।



मंगलू खामोश रहा ।



"कामिनी को पाना है तो तुम्हें हमारा 'खबरी' बनना ही होगा ।" मोना चौधरी कह उठी…"मत भूलो कि वो इंसानी खून पीने वाला शैतान है, वो किसी से शादी नहीं कर सकता, वो कामिनी का खून पी जाएगा । उसकी जान ले लेगा ।"


मगलू के भीतर व्याकुलता ने उछाल मारी ।



"क्या सोच रहे हो?"



"मैं......मैं तो उन दोनों को छोड़ वापस अपनी मां के पास जा रहा था ।" मंगलू ने गहरी सांस लि ।



" अजीब प्यार है तुम्हारा । कामिनी को तुम खून पीने वाले दरिन्दे कें हवाले करके जा रहे हो । तुम्हें......!"



“ मै कुछ कर भी तो नही सकता !"



"हम तो कर सकते हैं, तुम हमें बताओ कि शैतान का बेटा कहां है, किधर ठिकाना है उसका?”



मंगलू ने मुंह खोला ।



ऐसा खोला कि सब कुछ बताता चला गया वो ।


'खबरी’ बनकर हर बात की खबर उन्हें देने लगा था ।



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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 11 Jun 2017 16:58

मोना चौधरी और सतपाल ने उसकी सारी बातें सुनी ।



सारी स्थिति उनके सामने स्पष्ट हो गई! !



शैतान का बेटा अब उनकी पहुच में था ।


उसका ठिकाना और उससे वास्ता रखती हर बात को जान चुके थे । उनकी नज़रे मंगलू के चेहरे पर टिकी हुई थी ।

मंगलू उखडा-सा गभीर-सा था ।



" अगर तुम हम पर भरोसा रखकर चलो तो कामिनी फिर से तुम्हें मिल सकती है ।" सतपाल बोला ।



"झूठी बात कहकर तुम !"


"मैं सच कह रहा हूं।"



"तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सक्से । शैतान है । वो. .!"


“काम थोड़ा कठिन अवश्य है, तुम्हारा साथ मिले तो शायद हम कुछ कर गुज़रे ।" सतपाल _ने गंभीर स्वर में कहा ।



"मेरा साथ?”



"हां।"


"इससे ज्यादा और क्या साथ दे सकता हूं कि उसके बारे में तुम्हें सब कुछ बता दिया है ।" मंगलू बोला ।।


" थोड़ा सा और साथ !"



" वो कैसे?"



मोना चौधरी ने सतपाल के चेहरे पर नजर डाली ।


सतपाल मंगलू से बोला ।



"वो चाकू कहां है?”


"चाकू?" मंगलू की आंखें सिकुड्री ।



"वो ही चाकू जिसकी सहायता से शैतान का बेटा अपने शरीर में पहुंचकर जीवित हो उठा था ।"



"उस चाकू का तुम क्या करोगे?"


"पहले तुम मेरी बात का जवाब दो ।"


"मैं नहीं जानता, मैंने उस चाकू को दोबारा नहीं देखा, ।" मंगलू ने कहा ।


"शैतान के बेटे के पास तो देखा होगा?"



" नहीँ नहीं देखा ।"


सतपाल के होंठ भिंच गए ।



" क्या तुम उस चाकू की तलाश कर सकते हो?" सतपाल ने पूछा ।



"में अब वहां नहीं जाना चाहता ।"


"वो चाकू हासिल करना हमारे लिए बहुत जरूरी है ।" सतपाल ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा !?


“क्यों ?"


" क्योकि उसी चाकू से शैतान के बेटे को मारा जा सकता है !"



"उसी चाकू से?”


"हां !"


"अजीब बात कह रहे हो तुम ।"


"बात अजीब हो सकती है, परंतु सत्य है । शैतान का बेटा शक्तियो का मालिक है । उसे उसके ही चाकू से मौत दी जा सकती है, अन्य चाकु , हथियार या गोली से भी वो नहीं मरेगा । इसलिए वो चाकु हर हाल में चाहिए ही चाहिए ।"



मंगलू सतपाल को देखता रहा ।



"मैं तुम्हें शैतान के बेटे से छुटकारा दिलने की आसान विधि बताता हू बोलूं क्या?"



“क्या?"



"तुम्हारे लिए ये आसान है, चुटकी में तुम इस काम को अंजाम दे सकते हो !" सतपाल की आवाज में तेजी आ गई थी-“उसकै चाकू से, दिन के वक्त में उसे आसानी से मार सकते हो । तुम्हारे लिए तो उस पर बार करना वहुत आसान होगा । बगल में बैठकर गद्दारी आसानी से की जा सकती है । तुम कर सकते हो?"



"तुम्हारा मतलब कि मैं-----मै भवतारा को चाकू मार दूं।” उसके होंठों निकला । "


सतपाल ने सिर हिलाया ।


"पागल हो बया, वो क्या चाकू से मरेगा…वो-वो.....!"



"हम पे विश्वास करके, तुम एक बार हमारा साथ दो ।" मोना चौधरी ने कहा ।


"नहीँ ।" मंगलू ने दृढता-भरे स्वर में कहा ।



"ये आसान काम है तुम्हारे लिए…तुम उसे....!"



“ मै......मैं उसे नहीं मार सकता ।" मंगलू के स्वर में कम्पन उभरा----"तुम लोगों ने उसका असली रूप नहीं देखा । वो दरिन्दे से भी भयानक है । वो इंसान नहीं, सच में दरिन्दा है, मैं . .मैं उसे मारने की सोच भी नहीं सकता ।" पल-भर के लिए मंगलू कांप उठा था ।


मोना चौधरी और सतपाल की नजरे मिली ।


“ठीक है । तुम उसे मत मारो ।" मोना चौधरी ने कहा-"परंतु हमारा साथ तो दे सकते हो?"


मोना चौधरी ने पहलू बदला ।



" शैतान के बेटे का चाकू तलाश करो वो हमें दे दो !" मोना चौधरी ने कहा ।।



" तुम क्या करोगे ?"


"हम मारेगें उसे !"


"तुम ?"


" हां , किसी को तो ये काम करना ही है । तुम न सही , हम करेंगे ये काम ?" मोना चौधरी बोली ।।


मंगलू मोना चौधरी की और देखने लगा ।
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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 11 Jun 2017 16:59

"वो नहीं मरेगा और बाद में सारी मुसीबत मेरे सिर पर आ जाएगी । वो समझ जाएगा कि मैंने तुम लोगों की सहायता की है ।" कहते हुए मंगलू ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी------" वो मेरी जान ले लेगा । मुझें मार देगा !"



"ऐसा कुछ नहीं होगा ।" सतपाल ने कहा……" दिन के उजालै में वो आम इंसान की तरह कमजोर और साधारण इंसान हैं। उसकी शैतानी शक्तियां अंधेरे में जागती हैं-. हम दिन में आसानी से उसे घेरकर मार सकते हैं । तुम हम पर भरोसा रखो ।" मंगलू जरूरत से ज्यादा बेचैन हो उठा था ।।



" मैं खामखाह इस मामले में फंस गया । वो मुझें पैसा देगा, इसलिए. .उसका काम किया और अब !"



"हमारा साथ देकर तुम्हें कामिनी मिलेगी ।"



"लेकिन तुम उसे क्यों मारना चाहते हो?"



“यूं तो शैतानी शक्तियों से मेरी दुश्मनी हमेशा रही है ।" सतपाल दांत भीचकर बोला-----"परंतु अब शैतान के बेटे से मेरी व्यक्तिगत दुश्मनी हो गई है । कल रात उसने मेरे छोटे भाई की जान ली और उसका खून पीया । मैं उसे किसी कीमत पर नहीं छोडूंगा। अपने भाई की मौत का बदला उससे लेकर रहूंगा । उसकी मौत के साथ, वो सब बच जाएंगे, जो उसका शिकार बनेंगे भविष्य में । ये एक भलाई का काम है । हम इंसानों को कोई तो अच्छा काम करना चाहिए कि ऊपर जाकर हम बता सकें कि हमने क्या किया है ।"


मंगलू चुप हो गया ।


"तुम हमारा साथ देकर वहुत अच्छा करोगे ।" मोना चौधरी ने कहा ।

कई पलो तक वहाँ खामोशी छाई रही ।


तीनों बेचैनी से एक-दूसरे को देख रहे थे ।


" इसमें सोचने की क्या बात है जो इतना वक्त ले रहे हो !" मोना चौधरी धे खामोशी तोडी----"तुम शैतान के बेटे को मारने की हिम्मत नही रखते तो कोई बात नही ,ये काम हम करेंगे तुम हमे वो चाकू ला दो।"



"ठीक है ।" मंगलू सिंर नीचा किए अपने जूते को देखता कह उठा…"मैं उस चाकू को तलाश करूगा ।"


"वो जरूर चाहिए हमें।"


"भेरी पूरी कोशिश होगी कि मैं वो चाकू तुंम दोनों को लाकर दे सकूं !" मगंलू ने नजरे उठाई ।




" कब--कब करोगे ये काम?" सतपाल ने पूछा।



"आज शाम को !" मंगलू ने सोच-भरे स्वर में कहा----"अंधेरा होने के पश्वात वो शिकार के लिए चला जाता है !"


मोना चौधरी और सतपाल की निगाह मंगलू पर टिकी थी ।।


" और चाकू न मिला तो?" मंगलू पूछ बैठा ।



“क्यो नहीं मिलेगा वो चाकू वहीं है । तुम तलाश करोगे तो जरूर मिलेगा !" मोना चौधरी कह उठी ।


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भवतारा और कामिनी वापस झोंपड़े पर पहुचे । कामिनी ने सामान के, ढेर सारे लिफाफे उठा रखे थे । उसके चेहरे पर खुशी ही खुशी फूट रही थी । भवतारा भी खुश था । आज बाजार में दोनों ने बहुत वक्त बिताया था । सोने का हार, कपड़े और कामिनी ने भरपेट पानी-पूरी खाई थी ।



सारा वक्त दोनों हंसी-मजाक करते रहे, बाते करते रहे थे ।


बसन्ती बाहर ही दीनू के पास बैठी थी । दीनू प्रेस कर रहा था ।



"आओ जंबाई बाबू !" बसन्ती मुस्कराकर बोलि--" तुम्हें खुश देखकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है ।"


" मां , आज मैने पेट-भर कर गोल-गप्पें खाए ।" कामिनी खुशी से बोली ।।



"जंबाई बाबू ।" बसन्ती कामिनी के हाथों में ढेर सारे लिफाफे देख कर कह उठी----" तुम तो हमारे घर को भरे जा रहे हो !"

भवतारा मुस्कराया ।


"मां! आज़ एक और सोने का हार खरीदा । चार सूट मैंने अपने लिए !"



"और मेरी पीले रंग की बनारसी साडी?"


“वो भी लाई हूं!"


"अब तो तेरे को चैन मिल गया होगा भाग्यवान !" दीनू बोल पड़ा । बसन्ती ने दीनू को घूरा, दीनू उधर को देखने लगा ।



"जंवाई बाबू !" बसन्ती प्यार से कह उठी-----"ये खरीददारी तों सारी उम्र होती रहेगी । मेरी मानो तो शादी कर लो !"



"परसों हम शादी को लेगे ।" भवतारा ने कहा ।



"कल क्यों नहीं, जो काम निबट जाए, वो ही अच्छा है” बसन्ती ने हाथ हिलाकर कहा ।


"परसो का दिन अच्छा है ।"


"कोई बात नहीं जवाई बाबू! परसों ही सही ।" दीनू ने कहा…"एक दिन में क्या फर्क पड़ता है?”



" हा-हा !" बसन्ती ने सिर हिलाया-…" एक दिन में क्या फर्क पड़ता है ।"



"कामिनी को मै मंदिर ले जा रहा हूं । एक घंटे बाद आ जाएगी ये ।" भवतारा ने कहा ।


"हां-हां, क्यों नहीं! तेरी ही तो है कामिनी । ले जा-एक क्या दो घंटे भी हो जाए तो कोई बात नहीं।"


दीनू ने बसन्ती को घूरा ।


कामिनी ने सारे लिफाफे बसन्ती के पास रखे और बोली ।



"मैं मंदिर होकर आती हूं !" भवतारा और कामिनी चले गए ।


दीनू जल्दी से कहं उठा ।



" ये तूने क्या किया?"



" क्यो बूढे, क्या कर दिया मैने? तेरे को तो हर बक्त मैरे मेँ खोट नजर आती है ।"



" कामिनी को उसके साथ नहीं भेजना चाहिए था ।"


" क्यों?”



" मंदिर में वो रहता है, उसका घर है इन दिनों मंदिर वहां बिस्तर भी होगा, कुछ कर लिया उन्होंने तो?”

“कर लिया? तो क्या हो गया, कर लिया तो, परसों तो वो कामिनी, के साथ शादी कर रहा है ।"



"अभी शादी की तो नहीं ।"



"हो जाएगी, तू क्यों मरा जा रहा है? कुछ कर लिया तो भी क्या फ़र्क पड़ता है, इतना सामान लाकर दिया है उसने ।"


“सामान----तेरा मतलब कि ......!"


" तूने मेरे साथ शादी की, तों तेरे को पता था कि मैंने कुछ कर रखा है कि नहीं?”



"क्या?" दीनू अचकचाय् ।


"आज तक तेरे को कुछ पता चला?" बसन्ती हाथ हिलाकर है बोली ।


"..क्या क्या पंता लगा?”


"रहने दे बूढे! बसन्ती कामिनी का लाया सामान समेटकर उठते हुए बोली----"मेरा मुह बंद ही रहने दे । मुह खुल गया तो धोती पकड़कर इधर-- भागता फिरेगा । ढक्कन लगा ही रहने दे !"


बसन्ती सामान के साथ झोंपडी में चली गई ।

दीनू मुँह खोले अभी तक खडा था ।।


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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 13 Jun 2017 17:08

भवतारा और कामिनी मंदिर कें गेट के भीतर प्रवेश कर गए ।


शैतानी हवा कामिनी को अपने घेरे में ले चुकी थी ।



इसलिए वहाँ मौजूद लोग भवतारा की तरह कामिनी को भी… नहीं देख पा रहे थे ।


दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ रखा था ।

"मेरा हाथ छोडो, वो पुजारी आ रहा है ।" कामिनी कह उठी-----"मुझे जानता है, वो क्या सोचेगा!"


" कुछ नहीं सोचेगा ।"


" छोडो भी ।"


परंतु भवतारा ने उसका हाथ नहीं छोडा । दोनों आगे बढते रहे ।।


पुजारी पास से गुजर गया । पुजारी ने मुझे देखा क्यों नहीं? मैं तो हमेशा उसे हाथ जोड़ती हूं ।"



"वो जल्दी में था। इसलिए नहीं देख पाया ।"



दोनों मंदिर के बरामदे की के पास पहुंचकर ठिठके ।

“ये दीवार के पास क्यो रुक गये !" कामिनी ने भवतारा को देखा । भवतारा ने दीवार का एक हिस्सा अंगूठे से दबाया तो दीवार बीच में से इतनी सरक पाई कि एक-एक करके दोनों भीतर प्रवेश कर सके ।



कामिनी हैरान रह राई ।



"ये क्या?"



"आओ !" भवतारा कामिनी का हाथ पकडकर भीतर प्रवेश कर गया । भवतारा ने भीतरं से खूटी घुमाई तो दीवार वापस आ गई । कामिनी अचरर्ज से वहां दीवार पर हर तरफ़ नजरे दौड़ाती कह उठी ।



"ये कैसी जगह हैँ?"

"यहां रहता हूं मै ।"



"तभी तुम्हें कभी बाहर नहीं देखा । ये तो बहुत अच्छी जगह है ।" कामिनी खुशी से कह उठी ।



"परसो हम शादी कर लेगे । उसके बाद तुम यही रहा करोगी !"



“लेकिन तुमने तो कहा था कि बंगला. !"



"वो भी लेगे, परंतु पहले कुछ वत्त यहीँ पर रहेंगे ।" भवतारा ने प्यार-भरे स्वर में कहा ।


"'मैं तो तुम्हारे साथ यहां भी सारी उम्र बिता सकति दूंगी।"



"आओ, मै तुम्हें सारी जगह द्विखा दूं।”



उसके बाद भवतारा ने कामिनी का हाथ पकड़े उसे नीचे, ऊपर सारी जगह दिखाई ।।



कामिनी मुस्कराकर भवतारा को देखने लगी।



“क्या देख रही हो?” भवतारा ने उसका हाथ पकडा ।


" अपने पति को देख रही हूं और सोच रही हूं कि परसों ब्याह करके यहां पर आ जाऊंगी ।"


"व्याह तो बहाना है, तुम तो अभी भी मेरे दिल में बसती हो ।"



"इतना प्यार करते है मुझसे !"



"इससे भी ज्यादा, तुम्हें दिखा नहीं सकता बता नहीं सकता, मेरा प्यार असीमित है ।"



"मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूं।”



एकाएक भवतारा ने अपनी दोनों बांहें फैला दीं ।



"आओ कामिनी, मेरी बाहों में समा जाओ ।"

कामिनी का चेहेंरा शर्म से सुर्ख-सा हुआ । नजरे झुका ली ।


"ठहरो मत, आ जाओ, मैं अपनी बांहों में ले लेना चाहता हूं !"



"अभी नहीं ।" कामिनी खिलखिलाकर पीछे हटी…“शादी के बाद ।"


भवतारा ने बांहें नीचे कर ली और कामिनी को देखने लगा ।


"नाराज हो गए ।" एकाएक कामिनी जल्दी से बोली…"ऐसा है तो मैं तुम्हारी बांहों मैं आ जाती दूंगी।”


" मै नाराज-नहीं हुआ । तुमसे नाराज हो ही नहीं सकता ।" भवतारा मुस्करा पडा…"मुझे तुम्हारी वात अच्छी लगी कि शादी के बाद . . . ।"



कामिनी खिलखिला उठी ।


“तुम वहुत अच्छे हो ।" कामिनी ने प्यार से कहा ।


दोनों गोल कमरे में आ बैठे और प्यार-भरी बाते करने लगे । अपनी कहने लगे, दूसरे की सुनने लगे ।



कभी हाथ पकड़ते तो कभी एक दूसरे के कंधे पर सिर रखते ।


कितना वक्त बीता, पता ही न चला ।
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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 13 Jun 2017 17:09

एकाएक भवतारा के शरीर में ऐठन ने उछाल मारी ।


भवतारा फौरन सतर्क हो गया । वो उठा और वेहद शांत स्वर में कह उठा ।


"अब जाओं कामिनी, वक्त वहुत हो गया है, तुम्हारे माता-पिता इंतजार कर रहे होंगे ।"

"ये अचानक तुम्हें क्या हो गया ?" कामिनी ने-भवतारा को देखा । बहुत जरूरी काम याद आ गया है । जाना होगा मुझे ।" भवतारा ने मुस्कराने की चेष्टा की ।


“तुमने तो मुझे चाय भी नहीं मिलाई ।" कामिनी हंसी-“भूल गए ।"


" हां ! भूल ही गया, कल पिलाऊगा, अब तुम जाओ ।" भवतारा ने गंभीर स्वर में कहा ।



" आज रात तुम हमारे यहां खाना खाओ ।"


"तुम जाओ, मुझे जल्दी जाना है ।"


"ठीक है, तुम मुझे भगाना चाहते हो तो चली जाती दूंगी। कल तो मिलोगे ना !"

" हां !"


" कब ?"




"आज के वत्त ही-तुम्हारे पास आऊंगा ।"


"पानी पूरी भी खिलाओगे?"


भवतारा के शरीर में पुन: ऐठन उठी । उसके भीतर छिपा शैतान दरिन्दा जैसे बाहर आने को तेयार था !!


"चली जाओ, मुझे देर हो रही है ।" भवतारा के लहजे में इस बार कुछ खुरदरापन उभरा और आगे बढकर उसने बाहर जाने का रास्ता खोला ।।


प्यार में डूबी कामिनी ने उसके खुरदरे स्वर पर ध्याध न दिया और बाहर निकल गई ।


भवतारा ने दरवाजा बंद किया और लम्बी सास ली ।। अब वो स्वयं भी शिकार के लिए बाहर चला जाना चाहता था ।



उसी पल वहां मद्धिम-स्री आवाज उभरी ।



"भवतारा !"



"ओह गुरुदेव!" भवतारा के होंठों से निकला ।



"आज कामिनी बच गई । वो चली गई, वरना कुछ उर देर होने पर बो तेरा भोजन वन सकती थी !"



"वक्त का ध्यान नहीं रहा मुझे ।"



"शादी के बाद भी एक दिन ऐसा अएगा कि तेरे को वक्त का ध्यान नहीं रहेगा और कामिनी तेरी खून की प्यास वुझाएगी ।"


भवतारा के चेहरे पर कटोरता आ गई।


" ऐसा कभी नहीं होगा ।"



" ऐसा होगा भवतारा, अवश्य होगा । एक दिन कामिनी के खून से ही तू अपनी प्यास बुझाएगा ।"


" ऐसी फाते करके आप मुझे कीमिनी से दुर कर देना चाहते है !! भवतारा ने तीखे स्वर में कहा ।


" मैंने तेरे को हकीकत का नजारा करवा रहा हुँ।"


"ये झूठी हकीकत है ।"



"तेरे इनकार करने से सच, झुठ तो नहीं बन जाएगा भवतारा !"


गुरूदेव की आवाज उसके कानों पड्री ।


भवतारा के दांत भिंच गए ।

"मेरे भोजन का समृय हो रहा है 'गुरुदेव, !" भवतारा के होंठो है से गुर्राहट निकली !



"में जानता हू कि अभी तू सब्र रख सकता है । कुछ वक्त यूं ही बिता सकता है ।"


"क्या आप कोई बात करना चाहते हैं?"



" हां !"



"बात कल भी हो सकती है ।"



"मैं अभी करना चाहता दूंगी। मेरे पास इतना वक्त नहीं कि बार-बार तेरे पास आ सकू । मैं तो कब से इस इंतजार में खडा था कि कामिनी तेरे पास से जाए तो तेरे से बात करू ।" गुरुदेव की आवाज बेहद शति थी ।


"बात कहिए ।"



“कामिनी को छोड दे ।”


"फिर वहीँ बात ।" भवतारा और भी गुस्से से भर उठा ।


"तू नहीँ मानेगा तो मुझें दोबारा ही बात करने की जरूरत पडेगी । तू पहले मान जाता तो दोबारा क्यों आता?"



"आप चले जाइए।"



"बात करके चला जाऊंगा और दोबारा तेरे पास आऊंगा भी नहीं । तब तू जैसा करेगा, वेसा ही भरेगा ।"



"कामिनी मेरी जिन्दगी है ।"



" ये तेरे को लगता है, लेकिन कभी भी कामिनी तेरी मौत बन सकती है, क्योंकि तीन सौ साल की उम्र तक तेरे लिए स्त्री का संसर्ग है ही नहीं । शैतानी धर्म की परंपरा के खिलाफ मत चल भवतारा! "



"अभी मेरी उम्र कितनी है?"



"दो सौ नब्बे बरस ! स्त्री के लिए तेरे को दस बरस का इंतजार करना होगा ।"



"इसका मतलब कि दस बरस के लिए मैं कामिनी को अपने से दूर कर दू ।"



"ये ही मैं कहना चाहता हूं जो वस्तु ग्रहों में न हो, उसे पाने की चेष्टा करना भूर्खता है ।"



" आपने तो मुझे धर्मसंकट में डाल दिया है ।"
" इसी वक्त से अपने मन से कामिनी को दूर कर दे । बुरे वक्त का पता नहीं कब आ जाए । स्त्री तेरे पास आएगी तो तेरे ग्रह विपरीत दिशा में भड़केंगे । आज तू दिन-भर कामिनी के साथ रहा ये बात तेरे ग्रहों पर असर डालेगी। कुछ भी हो सकता है।"


भवतारा खामोश रहा ।
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