खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज complete

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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 13 Jun 2017 17:13

मोना चौधरी ने सतपाल को देखकर पूछा ।


" क्या शेतान का बेटा इस चाकू से वास्तव में खत्म हो जाएगा?"


" तुम्हें संदेह है क्या?"


" मै इन बातों के बारे में ज्यादा नहीं जानती इसलिए पूछा है !" मोना चौधरी ने कहा।



"इस चाकू के बारों के साथ मुझे एक खास मंत्र को चालीस वार दोहराना है, ऐसा होते ही उसकी मौत निश्चित है ।"

मोना चौधरी सिर हिलाकर रह गई, फिर कह उठी ।


" ‘कामिनी के चक्कर में मगलू हमारा साथ दे रहा है, वरना ये कभी भी 'खबरी' न बनता, शैतान के बेटे के खिलाफ ।"



"ऐसा होना ही था ।" सतपाल ने गंभीर स्वर में कहा ।


" क्यो ?"



"तांत्रिक मोहम्मद ने खबरी के बारे में हमें पहले ही खबर दे ही थी कि वो मिलेगा ।"



“ओह !"



"कोई कितना, भी त्ताकतवर हो उसकी ताकत को तोड़ने का कारण भी ताकतवर के साथ पैदा हो जाता है ।"


मोना चौधरी सिर हिलाकर रह गई ।


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"जंबाई बाबू?" बसन्ती ने सामने आते भवतारा को देखा तो कह ऊठी----" कल तुम जो साडी… !"



"चुप कर ।" प्रेस करता हुआ दीनू झल्लाकर बोला ।



"तू चुप कर बूढे! बीच में मत बोला कर बसन्ती खा जाने वाले स्वर में बोली ।


भवतारा इतने में पास आ पहुचा था ।


" बैठो-बैठो !" बसन्ती पहले ही रखी कुर्सी को थपथपाकर बोली…“खड़े-खड़े थक जाओगे।"



भवतारा बैठा ।



"तुम्हारे पास गाड्री-वाडी नहीं है !" एकाएक बसन्ती ने पूछा ।


" बहुत हैं ।"


"बहुत हैं ।" वसन्ती मुस्कराई, दीनू क्रो देखकर कह उठी...."देखा, मैं न कहती थी कि दो-चार गाडियां तो होंगी ही ।"



"कब कहा तूने?” दीनू के होंठो से निकला।

" लो कर लो बात ।।" बसन्ती आखें तरेरकर कह उठी------" आज सुबह ही तुम मेरा सिर खाते रहे कि जंवाई बाबू कै पास गाड्री है कि नहीं अब इतनी जल्दी भूल भी गए ।"


दीनू ने मुह फेर लिया । वसन्ती पुन कह उठी भवतारा से।

"जंवाई बाबू मैं कह रही थी कि कल तुम जो मेरे लिए सिल्क की पीली साड्री लाए, वो बहुत अच्छी है । पहनकर देखी थी मैंने, परंतु कुछ जंची नही ! उसमे मै कुछ मोटी लग रही हु । पीला रंग ही ऐसा है, लेकिन नीले रंग में मैं मोटी नहीं दिखती । आज तुम नीले रंग की बनारसी साडी ला देना । उसमें तो मैं बिल्कुल पतली लगती हूँ । मुझे देखकर कल सब लोग कहेगे कि बेटी तो बेटी सास भी कुछ कम नहीं है ।"



दीनू आहत भाव से बसन्ती को देखने लगा ।



भवतारा मुस्कराया ।



"आज बाजार जाना है ना कामिनी के साथ?"


"हां ।"



"तो फिर साडी ले ही आना । कल व्याह है, अब वक्त ही कहां रहा, जो मैं खुद बाजार जाकर लांऊ ?"


" कामिनी कहीं है?" भवतारा ने पूछा ।


"झोंपडी में तैयार हो रही है । ये तो बताओ, शादी करनी कहां है ?"


"मंदिर में ।"


"जहां तुम ठहरे हो ?"


"हां ।"


"वो हम जैसे लोगों का मंदिर नहीं है । उस मंदिर का देवता कोई और ही है । हम तो भगवान के मंदिर में शादी करेंगे । तुम कहो तो कल यहीं पर चार डंडे गाड़कर मंडप बनवा देती दूं। शादी कराने वाला पडित भी ले जाऊंगी।"


" ये ठीक रहेगा ।" भवतारा ने कहा ।



"तुम्हारी तरफ़ से कोई रिशतेदार वगैरा आ रहे है या नहीं?"


" बैसे तो नहीं आ रहे, लेकिन आप कहैं तो रिश्तेदारों को..... !"


"रहने दो जंवाई बाबू क्या जरुरत है बुलाने की । खामखाह कोई होते काम में टाग न मार दे । मैं भी किसी रिशतेदार को नहीं बुला रही, जिसने शगुन देना होगा तो यहां आकर बाद में भी दे जाएगा । क्यों जी मैंने ठीक कहा ना?"


"भाग्यवान! तुम गलत कब कहती हो !" दीनू बोला।


तभी कामिनी झोंपडी में से बाहर निकली ।
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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 13 Jun 2017 17:13

वो सजी--धजी इतनी खूबसूरत लग रही थी जैसे कि कोई परी है?"



भवतारा मंत्र मुग्ध सा प्यार-भरी नजरों से उसे देखता रह गया ।


“जंवाई बाबू !" उसकी नजरे पहचानकर बसन्ती मुस्कराकर कह उठी…"मैं तो इस उम्र में कामिनी से भी ज्यादा सुन्दर होती थी ।


भवतारा की विचार-तंद्रा भंग हुई ।



"मैंने तो कभी इसे सुन्दर रूप में नहीं देखा ।" दीनू बडबडा उठा ।



"क्या कहा तुमने?" बसन्ती बोली ।



"भाग्यवाना बच्चों की उम्र है , तू अपने बीते वक्त को याद करके अपने आपको क्यों तकलीफ देती है?”



भवतारा और कामिनी में आखो-ही-आखों में बात हुई ।



"मां, हम बाजार जा रहे हैं ।" कामिनी कह उठी ।

"जाओ-जाओं, मैं शादी की तैयारियां करती हू । आज तो फुर्सत ही नहीं मिलने वाली । हां, वो नीली बनारसी साडी ले आना । कल ब्याह के वक्त वो ही पहनूंगी और फोटो खींचने वाले को भी पुछ लूंगी । देखें तो सही कि नीली साडी में मैं कैसी लगती हूं !"


कामिनी और अवतारा बाजार चले गए ।


"कितना अच्छा लग रहा है कि कामिनी का व्याह हो रहा है, इतना अच्छा तो मुझे अपने व्याह में भी नहीं लगा था ।" बसन्ती बोली ।


" तेरे को अच्छा क्यों लगता, सारी फुलझडियां तो तूने व्याह से पहले ही बजा ली थीं! व्याह के बाद बजाने को बचा ही क्या था, जो तू खुश होती? मेरे हाथ में फुलझड्री की तीली ही आई, उस तीली को अभी तक ढो रहा हूं !"



"तीली तो है ।" हाथ हिलाकर बोली…"खुशनसीब हो, कइयों को तीली भी नहीं मिलती ।"


@@@@@@@@@@@@@@@@@@


1


वो दिन बीता ।


भवतारा कामिनी के साथ दोपहर तक बाजार में घूमता रहा । कामिनी ने आज भी पेट भरकर पानी-पूरी खाई और मन-पसंद सामान खरीदा । बनारसी नीली साडी भी खरीदी बसन्ती के लिए ।


शाम चार बजे वे दोनों वापस आए । कामिनी ने सामान झोंपडे पर छोडा और भवतारा के साथ मंदिर चली गई ।


भीतर मंगलू मौजूद था । भवतारा के साथ कामिनी को वहां आया देखकर मगंलू को अच्छा न लगा । उसने कामिनी के साथ कोई बात न की ।



भवतारा ने मंगलू को बाहर भेज दिया, और कामिनी के साथ प्यार-परी बातों में लग गया ।


मंगलू बाहर पुलिया पर आ बैठा था ।


रह-रहकर मगलू की निगाह मंदिर के गेट की तरफ जा रही थी । मन व्याकुल था, ये सोचकर कि भीतर भवतारा और कामिनी अकेले हैं । समय बीतने के साथ-साथ मगंलू की बेचैनी बढने लगी । ।



वो जानता था कि अंधेरा होते ही भवतारा शैतान वन जाएगा । उसे प्यास लगेगी इंसानी खून की, कहीं कामिनी ही उसका शिकार न जाए ।।


परेशान हो उठा इस सोच के साथ ही. वो ।



भीतर जाने का मन था, परंतु जानता था कि अवतारा को उसका इस वक्त भीतर आना अच्छा नहीं लगेगा ।


इससे पहले कि शाम खत्म होती कामिनी को मंदिर से बाहर आती देखा ।



अब भवतारा भी बाहर निकलेगा । उसे साथ चलने को कहेगा?
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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 13 Jun 2017 17:14

अगले ही पल मंगलु पुलिया से उठा और पास ही कच्ची ढलान पर उतरता चला गया ।



कुछ देर वाद ही कामिनी सामने से निकल गई । मंगलु उसे देखता रहा । खूबसूरत लग रही थी वो । खुश भी थीं वो ।।


मगंलू के दिल मे पीड़ा हुई कि कामिनी गलत इंसान से प्यार कर बैठी । भवतारा उसे कभी भी खुशियां नहीं दे सकता ।


मंगलू वहीं छिपा रहा।


वो भवतारा को नजर नहीं जाना चाहता था ।



अगर भवतारा ने उसे देख लिया तो उसे साथ चलने को कह देगा, जबकि आठ और नौ बजे के बीच मोना चौधरी और सतपाल ने उससे मिलना था !!



शाम अंधेरे की तरफ़ सरकी । भवतारा उसे बाहर निकलता दिखा । मंगलू वहीं पर दुबककर बैठ गया ।



भवतारा पुलिया के पास से निकलकर आगे बढता चला गया । मंगलू उसे जाता देखता रहा ।


भवतारा दूर होता हुआ निगाहों से ओझल हो गया ।


मंगलू ने राहत की सांस ली और छिपी जगह से बाहर, पुलिया के पास आया और मंदिर के गेट की तरफ वढ़ गया । उसका दिल हौले हौले बज रहा था , कल के बारे मे सोच कर कि क्या होगा कल ?



मोना चौधरी और सतपाल क्या भवतारा को खत्म कर पाएंगे?


जाने क्यों मंगलू को विश्वास नहीं हो रहा था कि भवतारा को मारा जा सकता है । उसने भवतारा का रूप उस रात देखा था, जव वो गली में युवती के गले पर दांत गड़ाए खून पी रहा था और कार की हैडलाइट उस पर पडी थी । वो उसका वेहद ज्यादा भयानक रूप था, जब कि मंगलू को वो नजारा याद आता तो वो सिहर उठता था । तब से ही वो मन-ही-मन भवतारा से डरने लगा था, वरना पहले उसके मन में ऐसा डर नहीं था । मंगलू मंदिर के भीतर ठिकाने पर पहुंचा । सोचा कि कुछ देर पहले कामिनी यहां थि, भवतारा के साथ ।



मंगलू ने अपने दिमाग को समझाया कि उसे ये सव बाते नहीं सोचनी हैं । मोना चौधरी और सतपाल के बारे में सोचना है, भवतारा की मौत के बारे में सोचना है, कल के बारे में सोचना है ।


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2



मंगलू जव मंदिर से निकला तो नौ, पौने नो का वक्त हो रहा था है मंदिर में बाहरी लोगों का आना-जाना बंद हो चुका था, परंतु गेट अभी खुला था । दस बजे बंद होता था गेट ।



गेट से बाहर निकलकर मंगलू ठिठका और इधर-उधर नजरें घुमाने लगा । मोना चौधरी और सतपाल उसे न दिखे । अभी आए ही नहीं होंगे । उसने इंतजार करने की सोची ।



तभी अंधेरे से निकलकर वे दोनों उसके पास आ पहुंचे ।



"तुम लोग यहां हो ।" मंगलू उन्हें देखते ही बोला-----" अब वो ग्यारह-बारह बजे आएगा और सो जाएगा ।"



"पहले भी तो आ सकता है, हमे उधर चलकर बात करनी चाहिए ।" मोना चौधरी ने कहा ।



"आज तक तो वो पहले कभी आया नहीं । इस वक्त वो व्यस्त रहता है, फिर भी उधर अंधेरे में चलते हैं ।"


तीनों चंद कदम दूर सड़क से उतरकर अंधेरे से पहुंचे ।



"खबर क्या है?" सतपाल ने पूछा ।


" कल शादी कर रहा है वो कामिनी से ।" मंगलू बोला ।

"कहां ?"


"ये नहीं पता । भवतारा ने बताया नहीं और मैंने पूछा नहीं । "


"क्या कितने बजे वो मंदिर से निकलेगा?"


"मेरे ख्याल में बारह और एक बजे के ब्रीच निकलेगा ।"


" पहले भी तो निकल सकता है? कल उसने शादी करनी है ।" सतपाल बोला ।


“हो सकता है वो शादी की वजह से पहले निकल आए।" मंगलू सोच-जरे स्वर में बोला-----"बैसे रात को भरपूर नींद लेता है और सुबह उठने की कभी जल्दी नहीं करता ।"


सतपाल ने मोना चौधरी को देखा।
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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 13 Jun 2017 17:14

"हमेँ कल सुबह से ही उसके घात में तैयार होकर बैठना होगा ।" मोना चौधरी ने कहा ।



"हां शैतान के बेटे को शेतानलोक में कल वापस भेजना है तो हमें हर पल सतर्क रहना होगा ।"


अंधेरे में वे तीनों एकं-दुसरे का चेहरा स्पष्ट न देख पा रहे थे ।


"क्या तुम लोग कल सच में उसे मार दोगे?" मगंलू ने पूछा।


“हां ।" सतपाल के दांत भिंच गएं-"कल मैं शैतान बेटे को शैतानलोक भेज दूंगा । वो हर हाल में मरेगा ।"


" वो बच भी सकता है ।" मंगलू बोला ।



"वो मरेगा ।"



"मानी तुम्हारी बात, लेकिन तुम भी मेरी बातं मानो कि वो बच सकता है ।" मंगलू ने प्रतिवाद किया ।


चंद पलों के लिए उनके बीच चुप्पी रही, फिर सतपाल बोला ।


"हां बो वच भी सकता है।"



"वो बच गया तो तब क्या होगा?"



" तुम चिंता मत करो । जो करना होगा, हम ही करेगे ।"


" तुम लोग जो मर्जी करों । मैंने तुम लोगों की बाते मान ली हैं, जो नहीं माननी चाहिए थी । मैंने अपने आपको खबरी बनाकर खतरे में डाल लिया है । आज की रात यहीं पर मेरी आखिरी रात है । सुबह मैं यहां से दुर चला जाऊगां। वो बच गया तो सबसे पहले मुझे मारेगा । दो पलों में ही समझ जाएगा कि सव मेरा किया धरा । मैंने ही तुम लोगों को यहाँ बुलाया है !"


"तुमने हमारे लिए वहुत कुछ किया है ।" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर मे कहा -- “सच बात तो ये है कि तुम्हारी सहायता के बिना हम शायद शैतान के बेटे तक नहीं पहुच पाते । तुम हमारे लिए, महत्वपूर्ण हो, ।"



"तुम क्या समझती हो कि ऐसा सुनकर मै अंपने को और खतरे में डाल लूंगा । कभी नहीं ।"' मंगलू बोला------" मै....!"



"तुमने हमारे लिए जो किया, उसका शुक्रिया अदा कर रही हूं और ये भी जानती हूँ कि कल तक तुम हमारे जो काम आ सके, आ गए । उसके बाद तुम हंमारे काम आ भी न सकोगे, क्योंकि शेतान के बेटे के सामने सव कुछ स्पष्ट हो चुका होगा, फिर वो हमारे हाथ नहीं आएगा, बल्कि हमारे लिए भी खतरा बन जाएगा, इसलिए कल हम उसे हर हाल में खत्म करने की कोशिश करेंगे ।"


“जो मन में आए करो । यहां पर आज की रात मेरी आखिरी रात है और कल मैं यहाँ से दूर...... !"


"बेशक चले जाना ।" मोना चौधरी गंभीर थी…“लेकिन हमे बताए बिना चुपचाप खिसकोगे नहीं । तुम्हारा एकाएक गायब हो जाना सव कुछ गड़बड़ कर देगा, शैतान का बेटा शक खा गया तो वो हमारे हाथों से दूर भी हो सकता है ।"



वो चुप रहा ।। अंधेरे में मंगलू के चेहरे के, भाव मोना चौधरी को नजर न आ रहे थे ।




"..हम.... ."। सतपाल बोला-----'' रात-भर यहीँ पर है, ये जगह देख लो, कोई खबर देनी हो, तो तुम रात में कभी भी हमारे पास आ सकते हो।"



" ठीक है ।"


"कामिनी की झोंपडी किधर है?”



" उधर. ."। मंगलू ने हाथ से इशारा किया-'…"इस सारी कच्ची जगह की पार करोगे तो उस तरफ़ कालोनी है, उधर सड़क से भी वहां तक घूम के जाया जा सकता है और पैदल भी ।"


मोना ने अंधेरे में सिर हिला दिया ।


"मैँ जाता हूं कोई बात हुई तो बताने आऊंगा ।" मगलू मंदिर के भीतर चला गया ।


"तुम यहीं रहै ।" मोना चौधरी बोली-“मैं कामिनी की झोंपडी देखेकर आती हूं।"



"जरूरत है उसकी झोंपडी देखने की ?" सतपाल ने पूछा !!


"हां, कल अगर शैतान का बेटा मंदिर से निकलकर कामिनी की तरफ गया तो हमें पता होना चाहिए कि कामिनी का ठिकाना कहां पर है । मेरे ख्याल में कल शैतान का बेटा, शादी के लिए कामिनी की झोंपडी तक अवश्य जाएगा । मैं रास्ता देखकर आती दूं।"



"अंधेरे में तुम्हें परेशानी होगी ।" सतपाल बोला ।


" सब ठीक है ।" मोना चौधरी ने कहा और उस तरफ़ बढ गई, जिधर मंगलू ने कामिनी की झोंपडी होने का संकेत किया था ।



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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Post by kunal » 13 Jun 2017 17:15

3


मोना चौधरी ने झोपडी तक का रास्ता देख लिया था । उसने सतपाल को रास्ता दिखा दिया था । अंधेरा अवश्य था , परंतु चंद्रमा की मद्धिम रोशनी में आंखें देख सकने लायक थीं ।



फिर वो दोनों वापस उसी जगह पहुचे ।


नजरे सड़क पर थीं ।



" तुम्हारे दिमाग में आखिर है क्या?" सतपाल ने पूछा ।



" शैतान के बेटे पर कल कावू पाना है, उसी की रूपरेखा तैयार कर रही हूं।"


" कैसी रूपरेखा---मुझे बताओ ।"


"सुबह बतांऊंगी । बो चाकू कहां है?”


"मेरी जैव में !"


"वो मंत्र अच्छी तरह याद है, जिसके बारे में तुमने कहा था कि चालीस बार उस मंत्र को दोहराना पड़ेगा !"



"सब याद है, मेरी तरफ से पूरी तैयारी हैं !"



"उस मंत्र के चालीस बार पढ़ने का फायदा क्या होगा?"



"अनजानी शक्तियां शैतान के बेटे को शैतानलोक में पहुंचाने में मेरी सहायता करेगी । वो मंत्र नहीं पढूंगा तो अकेला पड़ जाऊंगा । तव मेरे सामने कई तरह की कठिनाइयां आ सकती हैं । उस स्थिति में उसे बापस शैतानलोक भेजने मे शायद मैं कामयाब भी न से सकू।”



"ये तुम्हारी बाते हैं, तुम जानो । इन कामों की मुझे समझ नहीं है।" मोना चौधरी ने कहा ।



दोनों के बीच चुप्पी रही।



मोना चौधरी दुर नजर आती खाली सडक को निहारती कह उठी ।



"शेतान का बेटा कभी भी वापस मंदिर में आ सकता है ।"


सतपाल ने सडक की तरफ नजर डाली । बोला कुछ नहीं



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रात बारह से उपर का वत्त हो रहा था तव, जव शैतान का बेटा आता दिखा । मोना चौधरी और सतपाल की निगाह एकटक उस पर टिक चुकी थी । भवतारा मस्त सा झूमता सड़क पर इसी तरफ बढता आ रहा था । रात का सन्नाटा हर तरफ़ फैला हुआ था । झिगुरो की आवाजें रह-रहकर सुनाई दे रही थी । इस सन्नाटे में उभरी जरा-सी आहट भी गूंज जैसी लगती ।


"यही है वो ।" मोना चौधरी ने सरगोशी की-----"अंधेरे मे ही पहचान लिया, कल इसी ने राजन की जान ली थी ।"


" खामोश रहो ।" सतपाल दांत भीचे, फुसफुसाहट भरे स्वर में कह उठा । "



वे दोनों अंधेरे में दुबके उसे देखते रहे ।

भवतारा बंथ गेट पास जाकर रूका ।



उनके देखते-सो-देखते गेट खुद-ब-खुद खुलता चला गया । भवतारा ने भीतर प्रवेश किया तो गेट बंद हो गया ।



"इस वक्त शैतानी ताकते पूरी तरह इसके साथ हैं । रात के अंधेरे में ये बादशाह बन जाता है शक्तियों का ।" सतपाल ने कहा-----" इस वक्त ये जैसी भी बर्बादी चाहे, ला देगा । अंधेरे में इसका मुकाबला कोई नहीं कर सकता ।"


"और दिन में ।"


"दिन में ये अकेला पड़ जाता है, रोशनी होते ही शैतानी ताकते इसका साथ छोड़ देती हैं और ये साधारण मनुष्य बन जाता है ।"


अंधेरे में मोना चौधरी और सतपाल की नजरे मिली ।


"अब जो होगा, कल होगा ।" मोना चौधरी ने कहा------" ये रात हमें बारी-बारी नीद लेकर बितानी होगी । एक सोएगा, एक जागेगा ।"


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5


बसन्ती और दीनू के लिए ये खुशी भरा दिन था ।


कामिनी का व्याह हो रहा था वो भी पैसे वाले आदमी के साथ । कामिनी तो झोंपड़े में बैठी धीरे-धीरे तैयार हो रही थी । मन में ढेरों तरह के ख्याल कुलबुला रहे थे । कभी मुस्करा जाती तो कभी शरमा जाती । उसके मन का हाल…बेहाल था ।


बाहर बसन्ती ने चार डंडे लन्बे--लम्बे गाड दिए थे और दीनू सुबह-सुबह ही गेंदे के फूलो के ढेर सारे हार ले आया था ।

उन हारों को वो डंडों के साथ बांध रहा था और छत के तौर पर ऊपर बाले हिस्से मे भी बाँध रहा थे ।



बसन्ती ने सुबह-सुबह ही नहा-धोकर नीली बनारसी साडी बांधकर ऊंचा-सा जूड़ा कर कर लिया था । वो सजी-धजी हुक्म चलाने पर आमादा थी और दीनू उसके हुक्म सुन-सुनकर तंग आ चुका था ।



" तू तो तब भी इतनी न सजी थी, जिस दिन तेरा व्याह हुआ था !" जला-भुना दीनू कह उठा ।


"क्योंकि मुझे पता था कि शादी के बाद क्या होता है?"


"क्या पता था?"


"सब पता था ।"


"कैसे पता था?" दीनू हार बाधना छोडकर बसन्ती को देख़ने लगा ।



"अब तेरे को क्या बताऊं, बेटी की शादी कर रहा है, वो ही कर, अपनी शादी की सिलाइयां मत उधेड़ । जव शादी की थि, तब पूछनी थी ये बाते । अब बुढापे में क्यों अपने को दिल का दोरा पडवाता है !"


"तू वहुत बिगड रही है वसन्ती?"


"तब मै कितनी जवान होती थी ।" बसन्ती गहरी सांस लेकर कह उठी-"गोरी-चिट्टी और… . !"


"अब भी तो गौरी है ।"


"अब तो धिस-धिसकर काली हो गई हूं । तेरा सारा काला रंग मुझ पर चढ गया । क्या जवानी के दिन थे, मोटर साइकिलों पर लड़के मेरी झोपडी पर चक्कर लगाया करते थे । किसी की मोटर साइकिल नीली होती तो किसी की लाल ।"


" शरम कर, बेटी की शादी का दिन है और कैसी घटिया बाते कर रही है ।"



"ये शरम की नहीं शान की बात है । इस शान की ही निशानी है कामिनी, वरना दुसरी औलाद होती तो तेरे जैसी सडी हुई होती ।"


"क्या मतलब?"



"बूढे हार बांध । दुल्हा आता ही होगा । जल्दी कर, जल्दी ।" बसन्ती मुंह बनाकर कह उठी और झोंपडी में चली गई ।


"लगता है, इसके लिए भी दूल्हा देखकर इसे भी विदा करना पड़ेगा!"----- दीनू बड़बड़ा उठा…"साली खूसट जवान बनती है !"


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