खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 11 Jan 2017 18:18

पचास बरस के मिथलेश के चेहरे पर गभीस्ता ठहरी हुई थी ।



इस वक्त मिथलेश ऐसे कमरे में था, जिसे कि लायब्रेरी का नाम दिया हुआ था ।


दीवार के साथ-साथ शीशा लगी अलमारियाँ खडी थी । जिनके भीतर करीने से किताबे लगी थी । सारी किताबें पुरानी और मोटी थी । लम्बी…लम्बी चौडी थी । देखने से ही पता चल रहा था कि वो किताबें बरसो पुरानी है । कोई पचास साल पुरानी थी तो कोई दो सौ साल पुरानी । ये उनके पिता गिरधारी लाल की मेहनत से खडी की गई लायब्रेरी थी । इसमें अधिकतर ऐसी ही किताबे दी, जिनकी , दूसरी प्रति मिलपाना सम्भव ही न था । कई किताबे तो हजार साल तक पुरानी थी ।


कुर्सी पर बैठा मिथलेश, टेबल पर से एक लम्बी-सी किताब को देखने में व्यस्त था । जिसका आकार छ: इंच चौड़ा औऱ 10 इंच लम्बा था ।


उसके पन्ने पीले से होकर मोटे हो रहे थे । पन्ने पलटने केलिए उसे बहुत ही सावधानी से काम लेना पड़ रहा था । जल्दबाजी में पलटने से वो फट सकते थे ।


सतपाल का फोन आने के बाद वो लायब्रेरी में आ गया था । कई किताबों को चैक करने के बाद उसे अपने काम की सामग्री इसी किताब में मिली थी और उसकी निगाह किताब में लिखे शब्दों पर घूम रही थी !! पन्ने पलटने जा रहे थे ।
सारी किताब हाथ से लिखी गई थी । जिसमे काली स्याही और कलम का इस्तेमाल किया गया था ।


दो घंटे हो गए थे उसे इसी प्रकार व्यस्त हुए ।


सतपाल ने कहा था कि वो आ रहा है, परंतु अभी तक पहुंचा नहीं था !!


ज्यों-ज्यों मिथेलंश _किताब पडता जा रहा था, त्यों-त्यों गंभीर होता जा रहा था ।

आखिरकार एक खास पन्ने के बाद उसने किताब बंद कर दी । चेहरे पर व्याकुलता-सी नजर आ रही थी । कुर्सी से वो उठा और उसने किताब को वापस शीशे के रैक में रख दिया ।


यही वो वक्त था, जब सतपाल ने बहां कदम रखा था ।


॥॥॥॥॥
॥॥॥॥॥


"बहुत देर से आया तू।” मिथलेश तो देखते ही बोला ।


" रास्ते में एक काम याद आ गया तो वहीं रुक गया । तू बता-शैतान के बेटे भवतारा के बारे में जानकारी मिली !"


दोनों कुर्सियों पर बैठ गए।


"मिली, लेकिन पहले तू मुझें बताएगा कि बात क्या है ?"मिथलेश गभीर स्वर में बोला-----" शैतान के बेटे की याद तुझे कैसे आ गई, जो उसके बारे मे जानने के लिए तूने बोला !"



सतपाल ने उस बुरी आत्मा की बात बताई, जिसे युवक के भीतर से निकाला था ।


"उस बुरी शक्ति ने खामखाह शैतान है बेटे भवंतारा का नाम नहीं लिया था । जरूर कोई बात होगी ।"



मिथलेश ने गंभीरता से सिर हिलाया ।



""क्या?" सतपाल की निगाह उसके चेहरे पर जा टिकी ।


"तांत्रिक मनीशंकर की लिखी किताब में भवतारां का जिक्र है ।"


""क्या? "


"तात्रिक मनीशंकर ने ये किताब शैतान के बेटे भवतारा कीं मृत्यु के दस बरस पश्चात लिखी थी, जब वो खुद को बहुत बूढा महसूस करने लगा था और अज्ञातवास पर चला गया था ।"


" अज्ञातवास------तो फिर ये किताब हमारे पास कहां से आई ?" सतपाल ने टोका ।

" ये सव पिताजी की मेहनत का ही नतीजा है ।"
"मतलब कि ये किताब दो सौ वर्ष पहले की लिखीं 'हुई है ?"



"हां ३)!" मिथलेश गंभीर हुआ-" तांत्रिक मनीशंकर का लिखना है कि दो सौ बरस के बाद शेतान का बेटा भवतारा पृथ्वी पर इंसानी रूप में आने की चेष्टा करेगा । तब भवतारा के पास दंग कर देने वाली शक्तियां होंगी । वो वहुत ज्यादा ताकतवर होगा । उस वक्त भवतारा अपने शैतान पिता से विद्रोह करके धरती पर आएगा ।"



"आ जाएगा वो?" सतपाल के होंठों से निकला ।


"हां-किताब में लिखा है कि इस काम में मगंलू नाम का युवक उसकी भरपूर सहायता करेगा । अवतारा के पुन: मानवीय जीवन लेने की राह, उसके ही चाकू से निकलती है, उसने अपनी मैंत से पूर्व कहीं छिपा दिया था ।" मिथलेश ने कहा-"उस चाकू पर इंसानी खून लगेगा और खून से रंगा वो फ़ल ही इस्तेमाल करके, भवतारा इंसान के रूप में आएगा ।"



“वो चाकू कहां है?"


"ये नहीं लिखा ।"


"मंगलू के बारे में कुछ लिखा है कि वो...!"


"नहीं । किताब में सिर्फ नाम ही लिखा है मंगलू का ।"


"कैसे इस्तेमाल करेगा वो चाकू ?"


"नहीं लिखा, परंतु भवतारा के पुन: मानवीय शरीर में आने की वजह मंगलू नाम का वो युवक ही बनेगा ।”



दोनों गंभीर निगाहों से एक-दूसरे को देखने लगे ।"


" शैतान का बेटा धरती पर मानवीय रूप में आ गया तो बहुत अनर्थ हो जाएगा सतपाल!" मिथलेश ने गंभीर स्वर में, कहा---"क्योंकि शैतान के बेटे भवतारा का प्रिय भोजन इंसानो खून है । वो धरती पर आया तो मनुष्यों का खून पीएगा । किताब में तात्रिक मनीशंकर ने स्पष्ट तोर पर लिखा है कि भवतारा इंसानी खून पीने की खातिर ही जन्म लेगा । क्योंकि शैतान की, धरती पर वो ,कुछ ऐसी क्रियाएं कर चुका है कि वो क्रियाएं तभी पूर्ण होगी, जब वो धरती पर जन्म लेकर इंसानी खून पीएगा।"


"ओह . . ! "



"भवतारा को जन्म लेने से हमें रोकना होगा ।"
"ये काम कैसे कर सकेंगे हम । क्योंकि हमें न तो मंगलू का कुछ पता है और न ही उस चाकू-का जो.......!"



"किताब में लिखा है कि इस बारे में अगर बाकी जानकारी चाहिए हो तो पश्चिम में गोलाबंद नाम के गांव के पास पहाडियों में तात्रिक मोहम्मद मिलेगा आगे की बात उससे की जा सकती है ।"


"गोलाबंद ये कहाँ है ?"



" पश्चिम दिशा में कहीं है, इसका पता लगाना पडेगा ।" मिथलेश बोला-------" राजन कहाँ है?”



"काम पर था, परंतु अब तक तो उसे आ जाना चाहिए था ।"


"भूगोल के बोरे में राजन जानता है ।" कहने के साथ ही मिथलेश ने फोन निकाला और राजन का नम्बर मिलाने लगा ।


दोनों के चेहरे पर गभीरता नजर आ रही थी ।

सतपाल बोला ।


“मैं जल्द-से-जल्द गोलाबंद की पहाडियों मे पहुचना चाहूगा ।"


" राजन से गोलाबंद का पता करता हू। किताब में लिखा है कि जो भी ढवतारा को आने से रोकना चाहेगा, वो भारी खतरे में पड़ जाएगा । मामूली बात होगी कि उसकी जान चली जाए ।”



"मैं शैतान के बेटे को को आने से रोकना चाहूगा मिथलेश! ! " सतपाल ने दुढ़ स्वर में कहा ।


" वो तुम्हारी जान ले लेगा ।"


"में डरने वाला नहीं दूंगी। वो आ गया तो कहर बरपा देगा ।"


नम्बर मिला तो मिथलेश राजन से बात करने लगा ।

॥॥॥॥॥
॥॥॥॥॥


उसी शाम सतपाल ने विमान से ढाई घंटे की यात्रा की और देश के कम विकसित शहर में जा पहुचा । वहाँ से गोलाबंद जाने के लिए पता किया तो कोई टैक्सी वाला जाने को तैयार नहीं हुआ, क्योंकि वहा तक का रास्ता काफी ऊबड़-खाबड़ था, आखिरकार बो रोडवेज के अड्डे पर पहुचा और गोलावंद जाने वाली वस में बैठ गया । तव रात के साढे आठ बज रहे थे ।

ढाई घंटे का सफर ही बस में किया ।
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Postby kunal » 11 Jan 2017 18:58

सात ग्यारह बजे के करीब वस गोलावंद के बस अड्डे पर पहुंची ।



अडूडा कहाँ, यूं ही खुली जगह में बसों को खडा कर रखा था । वहां कुल चार बसें नजर आई थी ।


वहाँ उतरने वाले उसके अलावा दो और व्यक्ति थे ।



पास ही दात-रोटी के लिए ढाबा था । उसके बाहर लटका पीला-सा बल्ब अपनी कमजोर रोशनी फैला रहा था । वस के ड्राइवर-कंडक्टर भी वहां आ पहुंचे थे रोटी खाने के लिए ।


गोलाबंद, पिछडा हुआ कस्वा था । हर तरफ अंधेरा ही नजर आ रहा था । कहीं-कहीं दूर बल्ब जल रहा था । सतपाल का प्रोग्राम था कि रात में ही के तान्निक मोहम्मद के पास पहुचकर मिल लेगा, परंतु यहां हालात से उसे इस बात का अहसास लगा था कि रात मे सफर जारी रखना सम्भव नहीं हो पाएगा ।


सतपाल दावे, पर पहुचा ।


ड्राइवर-कंडक्टर ने खाना भी शुरू कर दिया था ।

तन्दूर में रोटियां लगाता दावे का मालिक बोला।


"साहब जी जल्दी से खाना खा लो । इसी बस के आने का इंतजार कर रहे थे । दुकान बंद करने का वत्त हो गया है !"



चौदह-पंद्रह साल कां लड़का ड्राइवर-कंडक्टर को रोटी देता बोला ।


"खाना लाऊं साहब जी?"


"क्या है खाने मे !"


"दाल-रोटी है ।" ढाबे का मालिक बोला---"यहां यही मिलता ।"


"लगा दो ।"


" लगा छोटे?"


"अभी लो ।"


सतपाल ने आस पास देखते हुए पूछा ।



"यहा पास ही कहीं पहाडी है?”


" है साब जी, क्यों?" ढाबे वाला रोटी तंदूर में लगाता कह उठा ।



"मुझे वहां जाना है ।"


"पहाडी पर…क्यों?"


"वहां तांत्रिक रहता है !"



“तुम्हें किसने बताया साब जी?" वो कुछ हैरानी से बोला ।
"किसी ने बताया कि उसका नाम तांत्रिक मोहम्मद है !"


"ठीक कहा, लेकिन आपको उससे क्या काम है?"



" है काम…मैं.....!"



"वो तो पागल-सा है ।"


"पागल-सा?"



" यू तो पहाडी पर ही रहता है, कभी-कभी वो पहाडी से नीचे आता है । महीने दो महीने में एक बार । किसी-न-किसी घर के के सामने बैठ जाता है और बोलता है खाना दो । अगर वो घर वाले खाना देते हैं तो ठीक, नहीं तो वापस पहाडी पर चला जाता है । उस वक्त वो अन्य किसी धर का दिया नहीं खाता ।" उसने बताया ॥॥



"कभी-कभी नीचे आता है पहाडी से?”


" हां ।"



“और जब वह पहाडी पर रहता है, तब क्या खाता है वो?” सतपाल ने पूछा।


"पता नहीं ।"



"तुम्हारे पास भी आया कभी वो खाने ?"



" नहीं !"


" करता क्या है वो ?"


"क्या पता--यहां के लोग अपनी समस्याएं लेकर उसके पास जाते हैं, वो समस्याओं को दूर करता है, परंतु लेता कुछ भी नहीं । कभी-कभार पहाडी पर से उसके ठहाके लगाने की आवाज आती है।"



"और तुमने उसे पागल समझ लिया?" सतपाल मुस्कराया।



जवाब मे वो कुछ न कह सका ।


"साब जी, दाल-रोटी लगा दी ।"


सतपाल भीतर गया और बैंच पर बैठकर दाल-रोटी खाने लगा ।


ड्राइवर-कंडक्टर खाकर बस में ही सोने चले गए थे ।। ढाबे वाला सतपाल के पास जा बैठा ।



" पहली बार कोई बाहर का आदमी उस तांत्रिक बाबा को पूछेने आया है।"



'मुझे वहां जाना'है--कैसे जाऊँ ?" सतपाल खाना खाते बोला ।


"इस वक्त जाना है?"



" हां !"
"रात के अंधेरे में नहीं जा सकोगे वहां, पहाडी चढ़नी पडेगी रास्ता खतरनाक है ।"


"अगर रात-रात में तुम मुझें वहां पहुचा दो तो सौ रुपए दुगा !"


“मैं समझ गया, लेकिन रास्ता खराब है । नहीं हो पाएगा । तुम्हें सुबह ही जाना होगा ।"



"मे जल्दी वहां पहुंचना चाहता हूं !"


"गिर जाओगे, हाथ-पाव तुड़वा लोगे ।" ढाबे वाला मुस्कराकर कह उठा ।



सतपाल खामोशी से खाना खाता रहा ।


ढाबे वाले ने बीडी सुलगा ली !!


"तो सुबह ही जाना होगा मुझे वहां?" खाना खाकर उठता वो बोला।


ढाबे वाले ने सिर हिलाया ।


रात में कहां रहूं ?"


" दस रूपए खर्च करोगे तो यहीं पर चारपाई बिछा देता हूँ । होटल तो इस इलाके में है नहीं ।"


सतपाल ने खाने के पैसे ओरे चास्पाई के दस रुपए दिए ।


“साब के लिए चारपाई बिछा दे । अच्छी तरह साफ करके बिछाना !"


ढाबे वाले ने लडके से कहा ।


"दस रुपए ले लिए चाऱपाई के?”


"ले लिए । तू चारपाई बिछा ।"



सतपाल मोबाइल फोन निकलकर मिथलेश को फोन करने लगा, परंतु ये जगह जाने कैसी थी कि फोन का सिग्नल ही नहीं आ रहा था । वो इंतजार करता रहा कि सिग्नल आ जाए परंतु नहीं आया सिगन्ल ।। बात नहीं हो सकी ।

॥॥॥॥॥
॥॥॥॥॥


अगले दिन भोर के उजाले के साथ ही सतपाल ने सफर शुरू कर दिया था । वहीं से पंद्रह मिनट पैदल चलने के पश्चात पहाडी आ गई थी । पहाडी बहुत हद तक सीधी खडी थी और ऊपर चढने का रास्ता भी खास ठीक नहीं था । ढाबे वाले ने ठीक ही कहा था कि रात को
सफर करना खतरनाक होगा । कठिन-सा रास्ता था । सतपाल पडाड्री चढने लगा ।
सूर्य जब निकला तो पहाडी सफर गर्मी से भरा और भी कठिन हो गया ।


करीब आठ बजे, सतपाल पसीने से भरा हांफ्ता-सा पहाडी पर जा पहुचां।।


टांगों में वो खास थकान-सी महसूस करने लगा था । एक जगब बैठकर सांस संयत करने लगा ।


-बहा बैठे बैठे उसने नजर घुमाई तो पहाडी का काफी बड़ा हिस्सा उसे समतल-सा दिखा । बहां पर चार बड़े-बड़े झोंपड़े बने हुए थे , जो कि काफी दूर थे ।



सतपाल उठा और उन झोंपडों की तरफ बढ़ गया ।


बढती गर्मी के साथ पहाडी भी गर्म होने लगी थी ।


सतपाल एक झोंपड़े के पास पहुचा और भीतर झांका । झोंपड़े के फर्श पर, पहाडी पर लगे पेडों के पत्तों को तोड़कर बिछोना वना रखा था , जो कि अब सूख चुके थे । स्पष्ट था कि बिछौना वनाए दस-पंद्रह दिन हो चुके हैं । वहां कोई भी नहीं दिखा ।

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Postby kunal » 11 Jan 2017 18:58

कोने में एल्यूमीनियम के दो-तीन वर्तन पडे दिखे ।


चंद कदमों के फासले पर मौजूद दूसरे झोंपड़े में झांका सतपाल ने ।




एक बारगी तो सतपाल थमकर रह गया ।



दूसरे झोंपड़े में मानवीय हड्रिड़यों का पिंजर पड़ा था, लेकिन वो टूटा हुआ था । खोपडी कहीं पडी थी तो टांगे बांहें कहीं और । एक
तरफ मानवीय हड्रिडयों का ढेर लगा हुआं था । बीचो बीच हवनकुंड-सा बना रखा था ,जो कि पत्थरों को जोडकर बनाया गया था और भीतर सफेद और काली-स्री राख पडी थी । हवन के आस-पास कई चीजे बिखरी पड्री थी , जिनमें से हल्दी सिन्दूर प्रमुख था ।



परंतु तांत्रिक मोहम्मद यहां भी न दिखा । सतपाल ने बाकी के दो झोंपडों को देखा और फिर एक की तरफ बढा ।


तीसरे झोंपड़े में झांकते ही ठिठक गया सतपाल ।


सामने ही तांत्रिक मोहम्मद मौजूद था ।


वो समाधि ने था ।


जुदा ढंग से थी उसकी समाधि ।।


एक वल्ली से टेक लगाए अधलेटा-सा था बो । टांगे आगे को फैली हुई थी । दोनों हाथ पेट पर थे । पीठ से टेक लगा रखी थी बल्ली पर । बंद आंखें, दाढी के लम्बे बाल, पेट तक पहुच रहे वे ।
कमर पर पुराना-सा कपड़ा पहन रखा था । गले में कई तरह की मालाएं पड्री थी । वों पतले शरीर का लम्बा व्यक्ति था । सतपाल देखता रहा कुछ पल उसे ।


उसकी उम्र का अंदाजा लगा रहा था जो कि, अस्सी-नब्बे के बीच हो सकती थी, परंतु उसकी दाढी और सिर के बालो में कई बाल अभी काले नजर आ रहे थे । उसके चेहरे पर, शरीर पर कई जगह घूल पड्री नजर आ रही थी । स्पष्ट था कि वो कई दिनो से समाधि में है ।



सतपाल आगे बढा और जेब से रुमाल निकालकर तांत्रिक मोहम्मद पर पडी मिट्टी को आहिस्ता-आहिस्ता झाड़ने लगा । कान के पास जाला लगा महसूस हुआ तो उसे भी साफ़ किया । घंटा-भर वो इस काम् में लगा रहा, परंतु तांत्रिक की समाधि न टूटी । वो झोंपड़े से बाहर आं गया ।



उसके झोंपड़े से बाहर निकलते ही तात्रिक मोहम्मद की आंखें फौरन खुल गई । उसकी आंखों में पीलापन झलक रहा था । जैसे वो
कमजोर हो गया हो । कुछ पलो तक वो झोंपड़े के द्धार को देखता रहा फिर सीधे बैठते हुए अपनी शरीर पर नजर डाली और बड़बड़ा उठा ।


"बेवकूफ है, जो मेरे पास आया है ?"


कुछ पल बैठे रहने के पश्चात वो उठा और आगे बढकर झोंपड़े से बाहर निकला ।


सामने ही सतपाल को टहलते देखा ।


सतपाल ने उसे देखा तो ठिठक गया ।


"गिरधारी लाल का बेटा सतपाल है तु ?" तांत्रिक मोहम्मद ने गंभीर स्वर में पूछा ।



"आप तो सब जानते है ।"


"हवा मत दे मुझें-मैं कुछ नहीं जानता,लेकिन मेरी ताकते बता रही थी कि तू आने वाला है मेरे पास ।"


"आपकी शक्तियां सही अहसास करा रही थी ।"


"चला जा यहां से ।"


"क्यों ?"



"कुछ हासिल नहीं होगा । तू गलत कामो में पडा हुआ है !" वो गभीर ही था ।
"मैं जो कर रहा हूं ठीक कर रहा हूं तात्रिक मोहम्मद! !" सतपाल भी गंभीर हो उठा ।।



"मान जा, वरना पछताएगा ।"


"मेरा रास्ता सही है । मुझें भटकाने की कोशिश मत करो । सतपाल ने कहा । . .


" पछताएगा, बहुत पछताऐगा ।"


सतपाल खामोश रहा ।


"क्यों आया है तू?"


"आप तो सब जानते हैं ।"


"मैं तो बहुत कुछ जानता हूं पर तू अपने मुंह से बता! क्यों आया है मेरे पास?"



"मुझे खबर मिली है कि भवतारा 210 बरस के बाद पुन धरती पर आने की केशिश में है ।"



" हां , उसने तो आने की तैयारियां भी शुरू कर दी है ।"



"मैं उसे आने से रोकना चाहता हूं।"


"क्यों? "



"उसका प्रिय भोजन इंसानी खून है, वो धरती पर, आ गया तो बहुत तबाही मचा देगा ।"


"तो तू क्या चाहता है कि भवतारा भूखा रहे ।" तांत्रिक मोहम्मद के माथे पर बल पड़े।




"'मैं चाहता हूं कि वो धरती पर, इंसान के रूप मे आ ही न सकै ।"



"रोकना चाहता है तू?”


"हां !"


" क्यों?"



"मेरे पिता ने मुझे ये विद्या सिखाते समय हमेशा ये शिक्षा दी है कि इस विद्या को इंसानों के भले पर लगाना और बुरी आत्माओं से लडना है, मैं अपने पिता की शिक्षा....... !"



" कोई फायदा नहीं होगा ।"



" क्यों?"


"भवतारा इस धरती पर आए, ये बात तो उसके शैतान पिता को भी पसंद नहीं । शैतान ने उसे रोका तो अपने पिता से ही उसने विद्रोह कर दिया और पिता की आज्ञा के विना ही, वो इस धरती पर आने को तैयार हो गया है । ......... शैतान के बेटे ने, शैतान की परवाह न की तो तुम्हारी परवाह कैसे करेगा?"
"मैं उसे हर हाल में इस धरती पर आने से रोकना चाहता हूं।"


" कैसे रोकेगा तू?”


"ये ही बात जानने तो मैं आपके पास आया हूं!” सतपाल ने कहा…“पता चला है कि मंगलू नाम का कोई युवक उसकी सहायता कर रहा है और शैतान के बेटे के धरती पर की एकमात्र चाबी, उसका चाकू ही है, जो 210 वर्ष पूर्व मरने से पहले उसने चाकू कहीं छिपा दिया था । उस चाकू की सहायता से ही शैतान के बेटे का हमारी धरती पर आगमन होगा ।"


" तो?"


"आप मुझें बता सकते है कि वो चाकू मुझे कहां मिलेगा । मैं उस चाकू को नष्ट कर दूंगा ।"



"तो क्या इससे शैतान का बेटा धरती पर नहीं आ सकेगा?" तांत्रिक मोहम्मद मुस्करा पड़ा !!



“कुछ वक्त के लिए तो खतरा टल जाएगा ।"


"इतने बड़े खेल को तू आसानी से जीत लेना चाहता है । ये सम्भव नहीं हो सकेगा ।"



" क्या मतलब?"


"जिस रास्ते पर चल रहा है, वो रास्ता छोड़ दे , अभी तो तेरे पास वक्त है पीछे जाने का ,ये वक्त हाथ से निकल गया तो बहुत पछताएगा, शैतान के बेटे की राह मे आने का अंजाम जानता है ।"


"मुझे परवाह नहीं अंजाम की ।"


"गर्म खून उबल रहा है ।"


"आप मेरी सहायता करें !"


" क्यों?"


"मनुष्य को बचाना हमारा पाता धर्मं है । आपको मेरी सहायता करनी पडेगी ।"



" भूल में है तू। मै किसी वचन से नहीं बंधा कि तेऱी सहायता करनी पडेगी मुझे । मैं आजाद हूं।”


"क्या आपके लिए ये चिंता का विषय नहीं है कि भवतारा अगर हमारी धरती पर आ गया तो वो मासूम लोगों का खून पीएगा? यही उसका प्रिय भोजन है, कितने लोगों की वो जान लेगा और उसकी शक्तियां इस कदर ताकतवर हैं कि उसका मुकाबला करना भी आसान नहीं होगा । खून पीने से उसकी ताकत बढेगी और तव वो और भी भयानक हो जाएगा । उसकी हिंसा को रोक पाना असंभव होगा, तब !"



"मैंने कब इस बात से इंकार किया परंतु अब कुछ नहीं हो सकता। तूने आने में देर कर दी।"



" क्या मतलब?” सतपाल की आंखें सिकूडी।



"वो चाकू मंगलू को मिल चुका है । तू पहले आता मेरे पास तो शायद कुछ हो सकता था बचाव ।"


" मगंलू को वो चाकू मिल चुका है?” सतपाल के होठो से निकला ।


" हां , मंगलू शैतान के वेटे की सेवा में लग चुका है।"



"ओंह, ये तो बुरा दुआ ।"


"तू कुछ नहीं कर सकेगा सतपाल! !"


"मै हर हाल में मंगलू को रोक लूंगा, अगर उसका पता चल जाए ।"


" बेकार है तेरी ताकतें फीकी हैं शैतान के बेटे के सामने ।"


“ये सोचकर, मैं आंखें तो बंद नहीं कर सकता ।"


" जिद मत कर, चला जा, कोई फायदा न होगा । भवतारा तेरे से पहले ही वहुत नाराज है ।"


“क्यों ?"


" तूने उसके सेवकों को , जो इस धरती पर आना चाहते थे, बहुतो को वापस भेजा है ।"


" वो तो मेरा धर्म है, मैं बुरी आत्माओं को इस धरती से दूर. .।"



"भवतारा तेरे को मार देना चाहता है !"


" ये उसका कर्म है ।"


“नहीं मानेगा तू?"


"नहीं ।"



तात्रिक मोहम्मद अपनी पीली आंखों से सतपाल को देखने लगा ।


सतपाल के चेहरे पर गंभीरता थी ।


"बोल क्या चाहता है तू?"


"मंगलू कहां है, भवतारा का चाकू कहां है?”



"चाकू मंगलू के पास है एक बात को दोबारा मत पूछ ।"
मंगलू मुझे कहां मिलेगा !"


" बुरा होगा जो तू मंगलू से मिलेगा । मंगलू के भीतर अब शैतान का बेटा कई ताकते प्रवेश करा चुका है । बो अब पहले की तरह साधारण नहीं रहा । उसका मुकाबला करना आसान नहीं होगा ।"



"आप मुझे बार-बार पीछे हटने को क्यों कह रहे हैं?"


"क्योंकि तू शेतान के बेटे, के सामने कमजोर है, मर जाएगा ।"



"मैं परवाह नहीं करता, इस बात की...!"


"तू वापस जा, मंगलू मिलेगा तेरे को ।"


"मिलेगा?"



" हां , उस तक पहुचने का रास्ता मिल जाएगा तेरे को ।" तांत्रिक मोहम्मद कह उठा ।


"ये बताने का शुक्रिया ।"


"'अपने बाप गिरधारी लाल की तरह ही जिद्दी है तू. ..!"


"आप मेरे पिताजी से मिले थे?" सतपाल ने पूछा।


"बेकार की बात मत कर ।"


" सिर्फ एक बात मुझे और बता दीजिए ।"



"बोल.. .!"


. "शेतान का बेटा भवतारा, किस शरीर में प्रवेश करेगा ?" सतमाल पूछा !



"वो अपने शरीर में ही प्रवेश करेगा ।"


"अपने?" चौका सतपाल ।।


"हां ।"


"ये कैसे सम्भव है । उसका अपना शरीर तो 210 साल पहले बर्बाद हो चुका है ।"



"भवतारा तव मृत्यु के द्वार में प्रवेश कर गया था, उसके शरीर कौ कोई क्षति नहीं पहुची थी ।"


"अब तक तो उसका शरीर मिट्टी में मिल गया. . ,!"


“यही तो तेरे को समझाना चाहता हूं कि तू अभी अवतारा को नहीं जानता । शैतान का बेटा है बो, उसके पास अद्भूत शक्तियां हैं । उसके सेवक परिपूर्ण हैं हर काम में । तू उसके रास्ते से हट जा ।"


'क्या मतलब?"
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Postby kunal » 11 Jan 2017 18:59

"शेतान के बेटे का शरीर 210 बरस से बेलीराम ने किसी गुप्त जगह पर संभाल रखा है । उसके शव को सुरक्षित रखा है तात्रिक्र वेलीराम ने । जानता है बेलीराम को तू?”


" नहीं !"

"बेलीराम शैतान के बेटे का प्रमुख सेवक है ।"


"प्रमुख" ।


"हां, अंधा भक्त है बेलीराम भवतारा का ।" तांत्रिक मोहम्मद ने गंभीर स्वर में कहा । "


सतपाल की आखें सिकुड गई ।



उसके चेहरे के भाव देखकर तांत्रिक मोहम्मद ने तीखे स्वर में कहा ।


"क्या सोच रहा है तू?”



"अवतारा के शरीर के बारे में सोच रहा हूँ।”


" जानता था कि तू अब ये ही सोचेगा ।"



"अगर शेतान के बेटे का शरीर ही बर्बाद हो जाए तो वो पुन: जीवित नहीं हो सकेगा ।"



"कौन करेगा बर्बाद ।"


" मै !"



" कैसे?"



"ये देखना मेरा काम है ।"


"बेवकूफ शायद तूने मेरी बात सुनी नहीं । बेलीराम ने शैतान के बेटे का शरीर किसी गुप्त जगा पर संभालकर रखा है । वहां तक पहुच पाना संभव नहीँ है । सत्तर साल पहले ऐसी कोशिश कोई और भी कर चुका है ।"



" कौन?"



"जयदयाल । वो तेरे से भी ज्यादा गुणी इंसान था । उसने पहले ही पता लगा लिया था कि शैतान का बेटा पुन: धरती पर, आएगा और कहर बरपाएगा । उसने सोचा कि शैतान के बेटे का मृत शरीर ढूंढकर उसे तबाह कर देता हूं !"


" फिर?"



"वेलीराम के पीछे पड़ गया जयदयाल । वो उससे जानना चाहता था कि शैतान के बेटे का शरीर उसने कौन-सी गुप्त जगह पर छिपा रखा है । वो बैलीराम ही क्या, जिससे कोई बात उसकी मजी के विना जानी जा सके । शैतान के बेटे के लिए तो उसने अपना सब कुछ बलिदान कर रखा है ।।-----
शैतान के बेटे के लिए तो उसने अपना सब कुछ बलिदान कर रखा है ।। बेलीराम ने जयदयाल को समझाया कि के ये रास्ता छोड़ दे, नहीं तो मार दिया जाएगा, नहीं माना जयदयाल तो एक दिन सुबह जयदयाल मरा पाया गया ।"


"हार्ट फेल हो गया होगा?"


तात्रिक मोहम्मद मुस्कराया।



“कुछ भी कह तू परंतु तो मर गया ।"


सतपाल के दात र्थिच गए ।


"तात्रिक वेलीराम कहा पर है, ये मुझें बताइए !"


"तो तू भी मरना चाहता है?”


“मैं मरने से नहीं डरता । मैं तो हर उस काम पूर्ण करना चाहता हूं जो मेरे सामने जाता है ।"



"तू भी जयदयाल की तरह मरेगा ।"


"तात्रिक वेतीराम का पता बताइए ।"


"जा मर, तू भी मर । शैतान के बेटे का कोई मुकाबला नहीं है ।" कहकर तांत्रिक मोहम्मद वेलीराम का पता बताने लगा ।


पता लगने के बाद सतपाल ने गभीर स्वर मे कह ।


"अब मै जाऊं?"


"ठहर ।" कहने के साथ ही मोहम्मद उस झोंपड़े में चला गया, जहाँ मानवीय हड्रिडया पडी थी ।


सतपाल व्याकुल-सा वहीं खड़ा रहा । पांच मिनट बाद वो लौटा । उसके हाथ में नीले रंग का मौटा-सा धागा था ।



"ये ले ।" उसकी तरफ़ धागा बढाते तात्रिक मोहम्मद ने कहा… "पहन लो ।"


"क्या है ये?" धागा लेते हुए सतपाल ने पूछा ।



" तू जिस रास्ते पर बढ़ने की सोच रहा है, वहां सिर्फ मौत ही है, लेकिन तू भला काम करते हुए अपनी जान गवाएगा । ये धागा तुझे मौत से बचाएगा परंतु इस पर पूरा भरोसा मत करना । तूने ये रास्ता न छोड़ा तो तू पक्का मरेगा । तेरे को पहले ही आगाह कर दिया है ।"



सतपाल ने धागा पहन लिया । मुस्कराया ।


" क्यों मुस्कराता है !"


"मुझे मारना आसान नहीं ।"
"क्यों ?"


"ये नहीं बताऊंगा ।" मुस्करा रहा था सतपाल ।


"यकीनन तू अपनी ताकत के नशे में भटक रहा है, लेकिन शैतान के बेटे की एक फूक तेरे को उड़ा देगी ।"



" मै उसे जन्म ही न लेने दूंगा ।"



" अगर ऐसा हुआ तो मेरे लिए ये हैरत की बात होगी ।"


"मुझे इजाजत दीजिए तांत्रिक मोहम्मद! ! अब मै यहा से बेलीराम के पास जाऊंगा ।"




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Postby kunal » 11 Jan 2017 19:01

तांत्रिक बेलीराम! !




उत्तर दिशा में घने जगलों के बीच जिसका 'डेरा' था ।


उसके डेरे तक पहुचने का रास्ता इतना खतरनाक था कि दिन में भी वहुत संभलकर चलना पडता था । जंगल में खतरनाक जानवर थे ।


कई जगह दलदली इलाका था । सांपों का डर था । रात को तो कोई भी सफ़र जारी नहीं रखता था ।


दिन के उजाले के साथ सफर शुरू होता था और सूर्य डूबने के साथ ही सफर थम जाता था । यू दस घंटे का जंगली सफर था डेरे तक पहुंचने के लिए।


जिदगी से परेशान लोग इलाज कराने के लिए उसके डेरे पर जाते, परंतु कोई भी अकेला न जाता था । पांच-सात लोग इकट्ठे होकर ही जाते ।


कुछ लोगों ने वहां गाइड का काम शुरू कर दिया था, जो कि जाने वालों को सुरक्षित डेरे तक ले जाने का दावा करते । गाइडों के पास घोड़े भी थे । जो दिन-भर पैदल नहीं चल सकते, वो घोडों पर यात्रा कर सकते थे, परंतु उसी हिसाब से उन्हें गाइड को पैसा देना पड़ता ।


आज तक तांत्रिक वेलीराम को किसी ने नहीं देखा था । उसके शिष्य ही आने वालों का इलाज करते और उनसे भरपूर पैसा लेते । ये सिलसिला जाने कब से चला आ रहा था, ये बात बेलीराम के शिष्य भी नहीं जानते थे । जंगल का बहुत बड़ा भीतरी हिस्सा काटकर डेरा बनाया गया था । एक तरफ़ तो काफी बड़ा पक्का मकान था ।
तांत्रिक वेलीराम उस मकान के भीतर ही रहता, उसे किसी ने बाहर निकलते नहीं देखा था, वहां कोई पहरा न था, न कोई दरबान था ।


मकान के आस-पास काफी खाली जगह को छोड़कर फिर झोंपड्रियों का सिलसिला दिखाई दे रहा था । वहाँ करीब 'सौ' से ज्यादा झोंपडियां थी और ढाई सौ के करीब तांत्रिक वेलीराम के शिष्य थे । एक तरफ बहुत वड़ा मैदान था, जहां आने वाले लोगों के रुकने का प्रंबध था ।


सालों पहले बाहरी लोगों का इलाज न किया जाता था । यहाँ कोई न आता था ।



परंतु शिष्य ज्यादा हो जाने और उनके खाने-पीने की समस्या सामने आई तो बाहरी लोगों को इलाज के वास्ते यहां बुलाया जाने लगा ।


शर्त ये कि जो भी आएगा, ज्यादा-से-ज्यादा खाने-पीने का सामान लाएगा । ज्यादा-से-ज्यादा पैसे देगा ।


जिसका सामान ज्यादा होगा, उसका इलाज पहले और बेहतर ढंग से किया जाएगा । फिर क्या था, उसके बाद खाने-पीने की सारी समस्या दूर हो गई ।



तांत्रिक वेलीराम के जो चेले बाहर अपनी दुकाने खोले बैठे थे, वो भी अपने पास आने बाले लोगों को डेरे पर भेजने लगे । धीरे-धीरें यहां के हालात ये हो गए कि यहीं लोगों का मेला लगने लगा ।

चहल-पहल बहुत् बढ़ गई ।।



तांत्रिक वेलीराम के शिष्य व्यस्त हो गए ।

इस वक्त शाम हो रही है और अब तांत्रिक वेलीराम का हाल देखते है जो कि मकान के भीतर है !






तांत्रिक वेलीराम मकान के ऐसे कमरे में था, जो कि उसका पूजास्थल था ।


चंद पल पहले ही वो यहां पहुचा था ।


पूजा वाले कमरे का साइज काफी बड़ा था ।


एक तरफ़ आदमकद बुत खडा था, जो कि शैतान के बेटे का था । बुत में रंग-विरंगे रंग भरे हुए थे । शरीर पर कपडे का लंगोट बंधा । वो कोई आकर्षक युवक जैसा लग रहा था ।


कमरे के दूसरी तरफ़ हवनकुंड-वना नजर आ रहा था ।
हवनकुंड- की हालत बता रही थी कि अक्सर उसका इस्तेमाल होता रहता है । कमरे का फर्श-दीवारे और छत सफेद रंग की थी । बहुत ही शांत्त वातावरण था कमरे का ।


तांत्रिक वेलीराम ने शैतान के बेटे की आदमकद मूर्ति को हाथ जोड़कर सिर झुकाते हुए प्रणाम किया और मूर्ति के चरणों के पास ही पड़ा छोटा-सा चाकू उठाकर अंगूठे पर लगे कट पर चाकू का कट मारा तो अंगूठे पर खून की चंद बूंदे उभरी । उस खून से आदमकद प्रतिमा के माथे पर टीका लगाया । फिर चाकू वापस रख दिया ।।


" गुरूदेव !"



आवाज सुनकर तांत्रिक बेलीराम पलटा ।



पास ही उसका सबसे खास शिष्य बाबा खड़ा था । वो वूढा-सा व्यक्ति था । आश्रम के लोग उसे बाबा ही कहते थे तो तांत्रिक बेलीराम भी उसे बाबा ही कहने लगा था ।


"कहो बाबा ।।"


॰"आप हर रोज सुबह और शाम मूर्ति को अपने खून का तिलक क्यों लगाते हैं?" बाबा ने पूछा।


“मैं शेतान के बेटे का पुजारी हूं। मेरा सब कुछ शैतान के बेटे का ही तो दिया हुआ है ।"


"सब कुछ ?"



" हां, सब कुछ ।" तांत्रिक बेलीराम ने शांत से स्वर में कहा…"मेरे पास जो शक्तियां हैं, वे सब शैतान के बेटे भवतारा की ही दी हैं मुझे । मेरी उप्र 280 बरस है । ये भी तो अवतारा की देन है!"



" 280 बरस !"


" हां !"


" कितनी उम्र है आपकी ?"



"मेरे कर्मो पर निर्मर है ।जव तक मैं दिल से शेतान के बेटे की सेवा करता रहूगा, मेरी उम्र लम्बी होती जाएगी।"



" ओह !"


"मेरे जिस्म र्में मौजूद खून का एक-एक कतरा शैतान के बेटे की अमानत है। मेरे डेरे की शान शैतान के बैटै से ही है। उसके आशीर्वाद से ही सव कुछ ठीक ठाकक चल रहा है ।"
"शेतान के बेटे के प्रति आपकी श्रद्घा की कोई सीमा नहीं !"


"सच कहते हो बाबा, कोई सीमा नहीं । शैतान के बेटे के लिए ही मेरा जीवन है । वो अब बहुत जल्द आने वाला है ।"



"शेतान का बेटा ?"


"हां मेरी शक्तियां बता रही हैं कि भवतारा का आना शीघ्र ही होगा । वो दिन मेरे लिए वहुत खुशी का होगा । अपने मालिक को मैं अपनी आंखों के सामने देख सकूग़ा, पूर्णतया जीवित अवस्था में ।"


बाबा के चेहरे पर चमक बढ गई ।



"क्या मैं देख पाऊंगा शैतान के बेटे को? मेरा तो जीवन सफल हो जाएगा ।"


"अवश्य देखोगे ।"


"ओह, वो वक्त कितना अच्छा होगा !"


तांत्रिक बेलीराम ने मुस्कराकर बाबा को देखा ।


“हवनकुंड सजाओ । मुझें शैतान के बेटे से बात करनी है ।"


"अभी लीजिए गुरूदेव ।"








तांत्रिक वेलीराम के होंठों से तीव्र गति से मंत्रो की वंड़बड़ाहट गूंज रही थी ।


हवनकुंड में आग जल रही थी । मंत्रो के उच्चारण के साथ-साथ औरे सामग्री के अलावा अपने अंगूठे को दबाकर खून की बूंद भी आग पर गिरा रहा था ।


वो अकेला था वहां पर ।


बाबा पास में मौजूद नहीं था ।


ये किया-कर्म दस मिनट तक चला कि एकाएक हवनकुंड की आग इस तरहु बुझने लगी जैसे कोई उस पर पानी डाल रहा हो । देखते-ही-देखते आग पूरी तरह बुझ गई ।


धुआं भी अव बाकी न रहा था ।


तांत्रिक वेलीराम ने दोनों हाथ जोड़कर हवनकुंड को प्रणाम किया । तभी हवनकुंड से शैतान के बेटे की आवाज उभरी ।


"मैं तुमसे प्रसन्न हुं बेलीराम. . !"


" आपकी दया चाहिए महागुरु ।" सिर झुकाए तांत्रिक बैलीराम ने कहा ।



"कैसे याद किया?"
"आपकी खैरियत के साथ ये कहना चाहता हूं कि आपके इंतजार में आंखें थकने लगी है ।"




“मेरी तैयारियां वापस आने की पूर्ण हो चुकी है ।"


"ओह मेरा भाग्य कितना अच्छा है, तो फिर देर किस बात की?"



"मेरा चाकू अभी तक मेरी हद से दूर है ।"



"मेरे लायक सेवा बताइए महागुरु?"



"मंगलू चाकू लेकर तुम्हारे पास आएगा ।"


" क्या मंगलू को मेरा पता ज्ञात है?"



"इस बारे में फिक्र करने की जरूरत नहीं । जंगला उसके साथ है । जरूऱत पड़ने पर मैं भी उससे बात कर लेता हूं !"



"चाकू पर मानवीय खून का होना वहुत, जरूरी ।"'


“मंगलू काबिल युवक है । वो पूरे दिल से हमारी सेवा कर रहा है ।"


"मैं समझ गया ।"


“मेरा यकीन है कि वो चाकू लेकर जल्दी ही तुम्हारे पास पहुँचेगा ।"


" उस सुनहरी वक्त का मुझे बेसब्री से इंतजार है । क्या मैं आपके शरीर की साफ-सफाई कर दूं ?"


. "नहीं, मेरा शरीर जैसा है, वैसा ही रहने दो । मंगलू जब चाकू लेकर आए तो चाकू को ठीक मेरे शरीर के पेट के बीचो-बीच तुमने घोंप देना है ।"



"मैं समझ गया महागुरु?"


"उसके बाद तुमने बहां से आ जाना है । बाकी का काम मैं स्वयं ही कर लूंगा ।"


" ऐसा ही होगा ।"


"मुझे तुम जैसे शिष्य पर नाज है वेलीराम! "


“सब आपकी ही देन है । मैं व्याकुल हू आपको साक्षात सामने देखने के लिए ।"



"तुम्हारी ये इच्छा शीघ्र ही पूरी होगी । कोई बेवकूफ तुम्हारे डेरे पर आ पहुचा है ।"


"मैं समझा नहीं ।"


" गिरधारी लाल की तो याद होगी तुम्हें?"



" हा, भूला नहीं । वो माना हौआ तांत्रिक था ।"
" उसके बेटे भी यही काम कर हैं । खास तौर से सतपाल नाम का बेटा । उसने मेरे शगिर्दो को बापस नर्क भेजा है , जो इस धरती पर आकर मेरा नाम चमकाना चाहते थे । वो ही सतपाल तुम्हारे डेरे पर आ गया है !"



" वो क्यों ?"


" बेवकूफ मेरा शरीर पाकर उसे नष्ट करने की सोच रहा है !"


" मै अभी उसे खत्म कर..........!"


" इसकी कोई आवश्यकता नहीं । उसे कुछ कहा तो बात वढ़ जाएगी ।"


"वो क्यों?"


"तांत्रिक मोहम्मद ने उसे अपना आशीर्वाद दिया है जौ कि उसके गले में मौजूद है ।"



"समझ गया । मैं उससे बात करूंगा !"



"उसे वापस भेज दे और अपना कीमती समय, सिर्फ मेरे आने की राह पर लगाओ ।"



" ऐसा ही होगा ।"


उसके बद आवाज आनी बंद हो गई । तांत्रिक बेलीराम हवनकुंड को प्रणाम करके उठा और दरवाजे की तरफ़ बढ गया । दरवाजा खोला तो बाहर बाबा को खड़े पाया ।


" हुक्म गुरुदेव! " बाबा उसके चेहरे के भावों को देखता हुआ कह उठा ।



"बाहर की भीड में सतपाल नाम का आदमी है, उसे मेरे पास ले आओ ।"


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Postby kunal » 11 Jan 2017 19:02

सतपाल अभी ही पहुंचा था वहां ।

डेरे के हालत को समझने की चेष्टा कर रहा था और वहां दौड़ते काम में व्यस्त डेरे बालों को देख रहा था । लोग खाने-पीने का सामान भरकर वहां ला रहे थे । जो रात-भर वहां ठहरते, उनके लिए भी खाने का सामान वन जाता और खाने-पीने का सामान बनाने की जिम्मेदारी भी आने वालो को हीं दे दी जाती ।


इस वक्त डेरे पर बाहर से आने बाले लोग सौ के करीब थे । शाम हो चुकी थी । अंधेरा ज्यादा दुर नहीं था । उसने तांत्रिक बेलीराम के बारे में एक-दो डेरे के आदमियों से पूछा तो पता चला कि बेलीराम किसी से नहीं मिलता ।। ।सव काम उसके चेले ही संभालते हैं ।।
परंतु उसका बेलीराम से मिलना जरूरी था ।


सतपाल इसी उलझन में था कि बो तांत्रिक बेलीराम तक कैसे पहुंचे कि तभी कुछ लोग डेरे के आदमी लोर्गों से कुछ पूछते दिखे । शीघ्र ही उसे पता चल गया कि वो सतपाल नाम के आदमी को ढूंढ रहे हैं । मन-ही-मन उसे आश्चर्य हुआ कि वो उसे क्यों दूंढ़ रहे । तभी एक आदमी उसके करीब पहुंचा । वहां और भी लोग थे ।


" आप मे से किसी का नाम सतपाल ?" उसने ऊंचे स्वर में पूछा ।


" मेरा है ।" सतपाल बोला ।



"तुम्हारे पिता का नाम गिरधारी लाल था?"


"हां ।" सतपाल ने अपनी-हैरानी दबाते हुए कहा ।


" आओं !!"


"कहां?"



"गुरुदेव मिलना चाहते है ।"


"गुरुदेव-क्या तांत्रिक बेलीराम?" उसने पूछा ।


" हां ।। आओं ।"


सतपाल उसके साथ चल दिया । उसकी समझ में न आ रहा था कि तांत्रिक वेलीराम क्यों मिलना चाहता है उसेसे----जबकि सुनने के में आया है कि वो तो किसी से मिलता नहीं ।



"क्यों मिलना चाहता है तांत्रिक बेलीराम मुझसे?"


"तुम वहुत किस्मत वाले हो ।" उस चेले ने कहा…“वरना वो तो कभी हमसे भी नहीं मिलते !"


सतपाल के मस्तिष्क में उथल-पुथल पैदा हो चुकी थी ।


तो क्या बेलीराम जान गया है कि वो क्यों यहाँ आया है? यही बात होगी? तभी तो वो खुद उससे मिलना चाहता है ।


वो चेला उसे बाबा तक ले गया ।



" बाबा, ये है सतपाल, गिरधारी लाल का पुत्र ।" और वो वेला . वहां से चला गया ।।


बाबा ने उसे सिर से पांव तक देखा।


"तुम हो बेलीराम ?" सतपाल ने पूछा ।


"नहीं, मैं तो गुरुदेव का सेवक हूं।”


"क्यों मिलना चाहते हैं वो मुझसे?"


"वही बताएंगे-----आओ ।"


बाबा उसे लेकर मकान की तरफ चल पड़ा ।
"तुम मुझे सिर से पांव तक घूरकर क्यों देख रहे थे?"


"देख रहा था कि तुममें क्या खास बात है, जो गुरुदेव ने तुमसे मिलना चाहा ।"


"खास बात दिखी?"


“मेरे खयाल में वो खास बात तुम्हारे भीतर है, बाहर नहीं है तभी तो दिखी नहीं !"


बाबा उसे लेकर मकान के भीतर आ गया ।


“क्यों आए हो तुम यहा?" बाबा ने पूछा ।


"ये बात तुम्हें नहीं बता सकता । बेलीराम से ही वात करूंगा ।"



“तुम्हें गुरुदेव का नाम श्रद्घा से लेना चाहिए ।"


सतपाल ने कुछ नहीं कहा ।


वो मकान को देख रहा था । बाबा, उसे लेकर उस कमरे में पहुंचा, जहाँ तांत्रिक बेलीराम मौजूद था ।।


बेलीराम का इशारा पाकर बाबा बाहर निकल गया ।


बेलीराम ने सतपाल को भरपूर निगाहों से देखा ओर मुस्कराया ।


सतपाल ने बेलीराम को देखा ।

उसकी उम्र का अन्दाजा नहीं लगा पाया, क्योंकि उसके सिर के बाल सफेद थे और शरीर बूढा था, परंतु वो युवकों की तरह स्वस्थ नजर आता था । उसके शरीर में चुस्ती भरी हुई थी ।


"तांत्रिक बेलीराम हो तुम?" सतपाल ने पूछा ।


“हा ।" बेलीराम बराबर मुस्करा रहा था ।।


"क्यों बुलाया तुमने मुझे यहां?"


"क्या तुम्हें अहसास नहीं हुआ अभी तक !"


"नहीं ।"


“मैं जानता हुं, तुम यहां क्यों आए हो?"


सतपाल चौंका ।


"जानते हो ?"


"हां ।" बेलीराम के चेहरे पर बराबर मुस्कान थी ।


सतपाल सतर्क-सा उसे देखता रहा।


"मैं चाहू तो इसी वक्त तुम्हें चींटी की तरह मसल सकता हुं ।" मुस्कराता हुआ बोला बेलीराम ।


"आसान होगा ये तुम्हारे लिए?" चुभते स्वर में कहा सतपाल ने !!
" कठिन भी नहीं !"


"मैं इतना जानता हूं कि मेरी जान को बाहर निकालना, सामने वाले के लिए आसान नहीं होगा ।"


"किसने कहीं ये बात तुमसे ।"


"अपनी विद्या के दम पर पता लगाया है मैंने ।"


"अपने गले में पड़ा मोहम्मद का दिया नीला धागा निकाल दो, किर तुम्हें पता भी नहीं चलेगा कि कब मरे।"


सतपाल ने गले में पड़े धागे को देखा और बोला ।


"क्यों इस धागे से तुम्हें डर लगता है?”


"इतना भी नहीं, लेकिन मैं मोहम्मद से झगड़ा नहीं लेना चाहता। तुम्हें बचाने के लिए उसने धागा दिया है, अगर मैंने तुम्हें मार दिया तो वो मेरे से झगडा कर लेगा ।" बेलीराम मुस्कराया ।


सतपाल ने बेलीराम को गहरी -निगाहों से देखा फिर कह उठा ।


" काम की बात करें ?”



"तुम जिस काम के लिए आए हो, वो पागलपन के अलावा कुछ भी नहीं है ।"


"शैतान के बेटे का शरीर तुम्हारे पास है?"


" हां , मैंने वहुत सुरक्षित जगह रखा हुआ है उसे ।"


"वो मुझे दे । उस शरीर को नष्ट कर देना चाहता हूं।” सतपाल कठोर स्वर में बोला ।


एकाएक बेलीराम का चेहरा दरिन्दगी से भर उठा ।।


"मैं तेरे से इसलिए आराम से बात कर रहा हूं कि तुझे मारना नहीं चाहता । तूने जो कहा है, वो ही शब्द बहुत हैं तुझे मौत देने के लिए ।" बेहद खतरनाक स्वर में कहा बेलीराम ने…“मुझ पर कोई बंदिश भी नहीं है कि तुझे न मारूं ।"



"मुझे बता शैतान के बेटे का शरीर तूने कहां पर रखा है ?"



"तु दस जन्म भी ले ले तो भी ये बात मेरे से पता नहीं कर सकता । चला जा यहां से, वरना मार दूगा तेरे को ।"


"जैसे कभी जयदयाल को मारा था?"


" मोहम्मद ने तेरे को सब बता दिया ।"
" उसे बताना ही था । मै जानता हूं कि तू शैतान के बेटे का बहुत बड़ा सेवक है !"


" चला जा यहां से !"


“ मै ये भी जानता हूं कि शैतान का बेटा भवतारा, हमारी दुनिया हैं फिर आने की चेष्टा मे है । मंगलू जहां भी है, मैं उसे दूंढ़ लूगा । उससे वो चाकू भी ले लूंगा , जो उसके आने की वजह बनने वाला है ।"


बेलीराम ठठाकर हंस पड़ा ।


"पागल, तू कुछ नहीं कर सकता, अलबत्ता अपनी जान अवश्य गंवा देगा !"



"शैतान के बेटे की सेवा तूने बहुत कर ली, अव भगवान की शरण में आ जा ।। तेरा भला होजाएगा । शैतान के बेटे का शरीर मुझे सौंपकर तु इंसानों का भला करेगा तो तेरे को मुक्ति मिलेगी !"



“तेरा बाप भी तेरी तरह जिद्दी था ।"


“पिताजी से मिला था तू ?"


"हां, कई मुलाकातें हुई थी । अब मैं तेरे से बात नहीं करना चाहता, तु यहाँ से चला जा और दोबारा कभी इधर आया तो अपनी मौत का तू स्वयं जिम्मेदार होगा ।" बेलीराम ने सख्त स्वर में कहा-"तू जिस कोशिश में लगा है, वो कोशिश कभी कामयाब न होगी । भवतारा जब इंसानी शरीर में आएगा तो सबसे पहले तेरे को ही मारेगा । वो तेरे से नाराज है । तूने उसका बहूत नुकसान किया है ।"


"मैंने इंसानों का भला किया "।"


"एक ही बात है । इंसानों का भला, शैतान के बेटे का नुकसान ही है । चला जा यहां से !"




" तो तू शैतान के बेटे का शरीर नहीं देगा मुझे?"


"क्यों तू अभी मरना चाहता है? जुबान मत चला । दोबारा यहाँ मत आना !"


" मै दोबारा भी आऊंगा और तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा ।"


"चुनौती मत दे, वरना अभी जला दूगा ।"


" जला ।"


बेलीराम दांत पीसकर रह गया ।

सतपाल गंभीर स्वर र्में बोला ।
"जा रहा हु वापस । एक बार तेरे से बात अवश्य करना चाहता था,वो होगई ।”


"तो तू नहीं मानेगा?"


"नहीं ।"


"वहुत जल्दी मरेगा तू !"


सतपाल पलटकर बाहर निकल गया ।


बेलीराम के चेहरे पर गुस्सा मंडरा रहा था ।


तभी बाबा ने भीतर प्रवेश किया और बोला ।



"मैँ बाहर खड़ा सारी बाते सुन रहा था गुरुदेव । उसके इरादे नेक नहीं हैं । उसे छोड़ना उचित नहीं है !"


"अभी हुक्म नहीं है सतपाल कौ मारने का ।"


"लेकिन क्यों?"



"शैतान का बेटा नहीं चाहता कि उसके आने से पहले ही, कोई नया झगडा खड़ा हो जाए और उसके आने में बाधा आ जाए । अगर इसके गले में तांत्रिक मोहम्मद का आशीर्वाद न होता तो ये बचता ही नहीं । इस वक्त मुझे अपना सारा ध्यान शैतान के बेटे पर लगाना है कि उसके जाने में कोई बाघा ना उत्पन्न हो ।"


"जाने वो खुशनसीब वक्त कब आएगा ?"


"बहुत जल्द दो वक्त आने वाला है !" बेलीराम की आवाज में दृढता भरी दुई थी ।


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