खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

kunal
Expert Member
Posts: 268
Joined: 10 Oct 2014 21:53
Contact:

Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 11 Jan 2017 19:03

सतपाल वापस पहुचा ।


रास्ते में ही उसने मिथलेश और राजन को फोन कर दिया था ।


वो दोनों उसे उसी फ्लैट में मिले, जिस फ्लैट को वे आँफिस के तौर पर इस्तेमाल करते थे । मिथलेश और राजन ने शादी कर रखी दी और बच्चे भी थे परंतु सतपाल ने व्याह न किया था ।


सुबह के ग्यारह बजे सतपाल वहां पहुंचा ।


ह्यथ-मुंह धोकर कपडे बदले और दोनों के पास आ बैठा ।


"तुम थके हुए हो ।" राजन बोला-----" कुछ आराम कर लो, ठीक रहेगा ।"


" पहले बातचीत हो जाए, फिर आराम भी हो जाएगा ।"


"जाने का कुछ फायदा हुआ?" मिथलेश ने पूछा ।


“कुछ कुछ ।"
"क्या हुआ, पूरी बात बताओं ।"



" सतपाल ने तांत्रिक मौहम्मद और तांत्रिक बेलीराम की सारी बातें बताई ।


दोनों ने गंभीरता से सब कुछ सुना ।


"कोई खास फायदा तो नहीं हुआ ।" राजन ने कहा ।


"फायदे की बात यही है कि तांत्रिक मोहम्मद ने मेरी सुरक्षा के लिए, ये नीला धागा मुझें दिया, जो मैंने पहन रखा है, जिसकी वजह से तांत्रिक बेलीराम कुछ मजबूर दिखा । उसने ये भी कहा है कि मंगलू और चाकू मुझे इसी शहर में मिलेंगे ।"


"यहां?" मिथलेश की आंखें सिकुडी ।


"हाँ ।"


"ओह परंतु कैसे !"


"ये मुझें पता नहीं !" सतपाल बोला…“उघर बेलीराम ने ये माना है कि शैतान के बेटे का शरीर उंसकै पास सुरक्षित रखा हुआ है परंतु वो किसी कीमत पर बताने बाला नहीं कि किधर रखा हुआ है ?"



"उसने अपने उसी आश्रम में रखा हो सकता… ।" राजन ने कहना चाहा ।



"वो इतना भी बेवकूफ नहीं होगा कि शैतान के बेटे का शरीर अपने पास ही कहीँ रखा हो ।" मिथलेश बोला ।


"तुम ठीक कहते हो ।" सतपाल ने सिर हिलाया----"शैतान के बेटे का शरीर उसने अपने से दुर कहीं सुरक्षित रखा होगा । कोई ऐसी दूसरी जगह जहां कोई पहुंच न सके । जहाँ के बारे में कोई सोच भी न सके !"



" तो क्या हम जान नहीं सकते कि वो शरीर कहां है?" राजन बोला ।


“ये एक कठिन काम है, फिर भी जानने की चेष्टा की जा सकती है ।" सतपाल ने राजन को देखा ।



"कैसे?"


"'तांत्रिक बेलीराम पर नजर रखकर ।"


”ये काम मैं करूंगा ।" राजन बोला ।।



"जल्दबाजी मत करो राजन! ये काम बहुत खतरनाक होगा।”


" कैसे ?"
"जब मैं बेलीराम के डेरे पर पहुचा तो उसे मेरे आने की खबर होगई थी !"


"ओह !"



"इसका मतलब बेलीराम को उसकी ताकतों ने तुम्हारे बारे में बता दिया होगा ।" मिथलेश कह उठा ।



" हां, अगर हममे से कोई उस पर नजर रखता है तो वो भी उसकी नजरों में आ सकता है ।"


"परवाह नहीं । मैं बेलीराम पर नजर रखूंगा ।"


"कैसे ?"


"उसके आश्रम जाकर ।"


"उसके डेरे पर तुम कितनी देर रह सकते हो । लोग वहां इलाज कराने जाते हैं और एक-दो दिन में वापस आ जाते है ।"


"मैं......मैँ कोई साधु बनकर वहां पहुंचूगा और वहीं, रहने लगूंगा ।


सतपाल और मिथलेश की नजरे मिलीं ।


"जाने दो इसे ।" मिथलेश बोला ।


"परंतु इस बात की क्या गारंटी है कि बेलीराम शैतान के बेटे के मृत शरीर के पास जाएगा ?" राजन ने पूछा।


"वो जाएगा ।" सतपाल दृढ स्वर में कह उठा…"देर-सवेर में पक्का जाएगा, क्योकि उनका दावे के साथ कहना था कि बहुत ही जल्दी शैतान का बेटा इस धरती पर आने वाला है । ऐसे में बो शैतान के बेटे के शरीर के पास जाएगा ।"


"मैं अभी वहाँ जाने की तैयारी शुरू करता हूं।" राजन उठते हुए बोला ।


"सावधान रहना, ये खेल नहीं है । तुम्हारी जान भी जा सकती है ।"


"में जानता हूं कि मैं क्या करने जा रहा हूं ।" राजन ने कहा और बाहर निकल गया ।


चंद पलों के लिए वहाँ खामोशी आ ठहरी ।


सतपाल ने सिगरेट सुलगाकर कश लिया ।


"शैतान के बेटे के मामले में हम हाथ डालकर क्या ठीक कर रहे हैं?" मिथलेश गंभीर स्वर में बोला ।



"ठीक कर रहे हैं ।"
"शैतान का बेटा और उसके सेवक हमसे ज्यादा ताक्तवर है । वे हमारी जान भी ले सकते है !"


"जानता हूं।"


" हमे एक बार फिर बिचार कर लेना चाहिए कि क्या हमें ये काम करना चाहिए?"


" मै ये काम करूँगा, अगर. तुम पीछे हटना चाहते हो तो बेशक हट सकते हो ।"


"मेरा ये मतलब नहीं था ।"


'मैं तुम्हारा मतलब अच्छी तरह समझ रहा हूं । सच में ये खतरनाक खेल है, बो सव हमसे ज्यादा ताकतवर है वक्त आने पर हम उनका मुकाबला नहीं कर पाएंगे । सच को हम झुठला तो नहीं सकते । इस मामले में हाथ डालकर शायद मैं बेवकूफी ही कर रहा हूं परंतु पीछे हटने का मेरा इरादा जरा भी नहीं है ।" सतपाल ने गंभीर स्वर मे कहा ।।


"मैं भी तुम्हारे साथ ही हूं।" मिथलेश बोला ।


सतपाल मुस्कराया।

कश लिया । तभी कॉलबेल बजी ।


"सावधान रहना ।" सतपाल बोला--"कभी भी शैतान के बेटे की तरफ़ से हम पर हमला हो सकता है ।"


"मेरे खयाल में !" मिथलेश उठते हुए मुस्कराकर बोला-काॅलबेल बजाकर हम पर हमला नहीं होगा ।"


" कुछ भी हो सकता है ।" मिथलेश कमरे से बाहर निकलकर मुख्य द्वार पर पहुचा, फिर दरवाजा खोला ।



सामने पारसनाथ खड़ा था ।


"कहिए?" मिथलेश ने शात स्वर में पूछा ।



“मेरा नाम पारसनाथ है । सर्किल रोड पर रेस्टोरेंट है । सतपाल साहब से मिलना था मुझे ।"


" काम?"



"मुझें पता लंगा है कि आप लोग भूत-प्रेत-आत्माओं जैसी, चीजों से वास्ता रखते हैं ।"



"अगर कोई यकीन माने तो... ।"


"आप ही सतपाल साहब हैं?"


" नहीं, वो मेरे भाई हैं और भीतर हैं, आइए. . . !"
मिथलेश पारसनाथ को लेकर सतपाल के पास पहुचा ।


"पारसनाथ साहब तुमसे मिलना चाहते हैं------" बैठिए ।"


सतपाल की निगाह पारसनाथ पर जा टिकी ।


पारसनाथ बैठा । मिथलेश भी बैठ गया ।


"कहिए ।" सतपाल बोला ।



"कुछ अजीब-सी बात हो रही है ।" पारसनाथ ने कहा--"इसी कारण मैंने आप जैसे आदमी के बारे में पता किया, तलाश करने की चेष्टा की तो किसी ने विस्वास के साथ आपके पास जाने को कहा ।"



"क्या आपके परिवार का कोई सदस्य, किसी तरह की कोई समस्या में है?" सतपाल ने पूछा ।


दो पल खामोश रहकर पारसनाथ ने कहा ।



“मेरी दोस्त है, महिला दोस्त------" उसके साथ कुछ अजीब सी, बाते हो रहीं हैं ।"



'किस तरह की ?"


"मेरी महिला दोस्त-जिसका नाम मोना चौधरी है, दो दिन पहले उसकी कार से सडक पार करता एक युवक टकराया और मर गया । कुचला गया वो ।" पारसनाथ ने शांत स्वर में कहा ।



"ये तो पुलिस केस है ।" मिथलेश कह उठा ।


"लेकिन दो मिनट बाद ही उसके शरीर में जान आ गई और वो स्वस्थ होता चला गया ।"


" क्या? "



" हां इस युवक का नाम मंगलू है और वो....... !"


सतपाल खडा हो गया ।

! मंगलू?" उसके होठों से फटा-सा स्वर निकला ।


मिथलेश भी हक्का-बक्का रह गया ।


"आप दोनों हैरान क्यों हो गए?" पारसनाथ ने दोनों को देखा ।


सतपाल का चेहरा उत्तेजना से भर चुका था ।


" कव की बात है?" उसके होंठों निकला ।


"दो दिन पहले की ।"


" अब मंगलू कहां है?"


"मेरी उसी महिला मित्र मोना चौधरी के घर पर ।"


"उस मंगलु के पास एक चाकू भी होगा?" मिथलेश के होंठों से तेज स्वर निक्ला ।
"हां ।" पारसनाथ हैरान हुआ---"आपको कैसे फ्ता ?"


"उफ-आखिर वो मिल ही गया हमे…!"


"क्या मतलब------मै समझा नहीं?" पारसनाथ के होंठ सिकुड़े, ।


" उस युवक की तलाश थी मुझे, मैं सब कुछ आपको बताऊंगा, आप पहले बो बताइए, जो बुताने आए हैं ।"


पारसनाथ सब कुछ बताने लगा ।


दस मिनट में उसने बात समाप्त कर दी । अगले दस मिनट में सतपाल ने शैतान के बेटे और मंगलू कै बारे में सव बताया।


यानी कि एक-दूसरे की बातो से वाकिफ हो गए थे । सब कुछ जानकर पारसनाथ गंभीर और व्याकुल हो उठा ।


"ये खतरनाक मामला है ।" पारसनाथ ने कहा ।


" सरासर ।"



"अब आप क्या करना चाहेंगे?"


"मंगलू को हमने पकड़ना है । उससे चाकू लेना है ।" सतपाल बोला ।


"मेरे ख्याल में तो चाकू नही देगा ।"


"जानता हूं । परंतु उससे चाकू लेना बहुत जरूरी है । वो शैतान के बेटे का चाकू है और यूं कह लो कि वो चाकू शैतान के बेटे के धरती पर आने की चाबी । मै तुम्हें बता ही चुका हूं कि शैतान का बेटा धरती पर आ गया तो क्या होगा ।"



"ऐसे में तो बेहतर है कि मंगलू को खत्म कर दिया जाए ।" पारसनाथ बोला ।



“ तुम शैतान के बेटे को नहीं जानते । वो वहुत ताकतवर है उसने मगंलू मे कई शक्तियां डाल दी होंगी । उसे मारना आसान नहीं होगा । जैसे वो कार के नीचे आकर कुचला गया । मर गया और फिर जिन्दा हो गया ।"


"ओह...!" पारसनाथ के होंठों ने निकला ।


"मंगलू को मारने के अपेक्षा, उससे चाकू लेना सरल होगा ।" मिथलेश ने कहा ।


"ये भी आसान नहीं होगा ।" सतपाल ने व्याकुल लहजे में कहा ।


"आप लोगों की बाते सुनकर अजीब-सा लग रहा है मुझे !" पारसनाथ बोला ।
"जरूर लग रहा होगा, क्योंकि हमारा काम, हमारी बाते, दुनिया के कामों से हटकर हैं । आधे हम इस दुनिया में रहते हैं और आधे दूसरी दुनिया में । हम जो काम करते हैं, आम लोग उस पर भरोसा नहीं करते ।" सतपाल ने गंभीर स्वर में कहा… "अधिकतर लोग हमें पागल और हमारे कामों को पागलपन समझते है, लेकिन हमें किसी की परवाह नहीं है । हमें अपना काम काना है और बुराई से लोगों को मुक्त कराना है ।



"लोग न माने तव भी....!"



"जब लोगों पर मुसीबत आती है तो वो हमारे पास ही आते है । तब मानते हैं इन बातों को !"


"क्योंकि तब उनके पास दूसरा रास्ता नहीं होता ।"



सतपाल ने सिगरेट ऐश-ट्रे में डाली तो पारसनाथ ने सिगरेट सुलगाकऱ कहा ।


"अब क्या करना चाहेंगे आप?"


"बता दिया तुम्हें ।" सतपाल गंभीर स्वर में बोला--"परंतु मोना चौधरी को वहां से बाहर निकल जाना होगा । बाकी का काम हम कर लेंगे । वो बहीं रही तो उसे भी खतरा हो सकता है ।"


“मोना चौधरी की आप फिक्र न करें । उसे खतरों से खेलने की आदत है ।" पारसनाथ ने कहा ।


"क्या मतलब?"


" वो इस्तिहारी मुजरिम मोना चौधरी है । डर उसके पास भी नहीं फटकता । नाम सुना होगा उसका ।"


"नहीं सुना । हम सिर्फ अपने काम से वास्ता रखते है ।"


"अब देखिए कि आपको मगलू से कैसे निबटना है । मोना चौधरी के बारे में फिक्र न करें । अगर ये काम दुनिया के भले के लिए है तो मैं और मोना चौधरी भी आपकी मदद कर सकते है ।"

kunal
Expert Member
Posts: 268
Joined: 10 Oct 2014 21:53
Contact:

Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 11 Jan 2017 19:04

"ये खतरनाक खेल है । हमारी मदद वो ही कर सकता है, जो ऊपरी ताकतों की जानकारी रखता हो । मोना चौधरी को फोन करके बता सकते हो कि हम किस तरह काम के लिए वहां पहुच रहे हैं ।" सतपाल ने कहा ।



"क्यों नहीँ--अभी बता देता हूं।"


"बताओं ।'" सतपाल उठते हुए बोला-----" तब तक हम अपनी जरूरी तैयारी कर ले ।"
मंगलू पीछे वाले बैडरुम में आराम से लेटा हुआ था ।


मोना चौधरी ड्राइंगरूम में थी । बारह बज रहे थे । सुबह से उसने ब्रेकफास्ट भी नहीं किया था ।



किचन में से कॉफी और टोस्ट बनाकर लौर्टी थी और बैठकर आराम से खाने लगी ।


उसे मंगलू पर हैरानी हो रही थी कि अब उसे यहाँ आए तीसरा दिन हो रहा था और खाना-पीना तो दूर, पानी तक न पिया था उसने ।


अब बात भी कम करता था।

बीते तीन दिनों में मोना चौधरी घर पर ही थी और मंगलू की हरकते नोट कर रही थी, परंतु कोई खास हरकत नहीं देखी उसने ।।


एक-दो बार उसकी आवाज अवश्य सुनी कि जैसे किसी से बात कर रहा हो ।


मोना चौधरी अब इस बात की अभ्यस्त हो गई थी और मंगलू का अपने से बात करना उसे अजीब लगता,था ।।


स्लाइज खत्म किए ही थे कि मंगलू वहां आ पहुंचा ।



"मैं आज शाम को यहां से चला जाऊंगा ।"


"शाम को?" मोना चौधरी ने उसे देखा ।


"हां ।"


"रात भी यहाँ रह लो, कल सुबह चले जाना ।"


"नहीं, शाम को मैं जाऊंगा ।" कहकर वो कमरे से बाहर निकल गया ।


मोना चौधरी ने कॉफी का घूंट भरा कि तभी फोन बजा । हाथ बढाकर मोना चौधरी ने रिसीवर उठाया ।


" हैलो !"


" मोना चौधरी?" दूसरी तरफ़ पारसनाथ था ।


“कहो !"


और पारसनाथ रनतपाल और मिथलेश के साथ हुई बातचीत बताने लगा ।


मोना चौधरी उसकी बात सुनते ही हैरानी में पड़, गई ।


सव कुछ सुनने के बाद बो धीमे स्वर में बोली ।


"मैं अभी तक नहीं समझ पाई कि ये शैतान का बेटा कौन है?"
"नर्क का राजा शेतान है, उसके बेटे की बात हो रही है ।"


"वो इस दुनिया मे क्यों आना चाहता है?"


“वो अक्सर आता रहता है । 210 बरस पहले उसकी मृत्यु हो गई थी । अब फिर से आने की कोशिश कर रहा है । उसका भोजन इंसानी खून है और खून पीने के लिए ही वो धरती पर आता है ।"



" ओह !"



"और इस बार उसके आने की वजह मंगलू बनने जा रहा है । सतपाल उसे रोक देना चाहता है ।"


"मंगलू को?"



"हां ।"


" कैसे रोकेगा?"



"उसके पास मौजूद चाकू हासिल करके !"


"ये काम तो मैं भी कर सकती हूं !"


"गलती मत कर देना । ये गंभीर मामला है । मंगलू के शरीर मैं शैतानी शक्तियों का प्रवेश हुआ पड़ा है ।"



"तुम क्या समझते हो कि मुझे ये बात माननी चाहिए?" मोना चौधरी ने उलझन भरे स्वर में पूछा ।।



"मान लेने में बुराई क्या है ?"


"क्या ये बेवकूफी वाली बाते नहीं हैं?"


"मेरे ख्याल में तो नहीं । मैं सतपाल के साथ कुछ देर मे बहां पहुचूंगा । वहां जो भी होगा हम देखेंगे ।"


मोना चौधरी ने गहरी सांस ली, फिर बोली ।


"ठीक है । उसने तीन दिन यहां रहने को कहा था और आज तीन दिन हो गए है बो शाम को जाने को क़ह रहा है ।"



"शाम में वहुत वक्त है । हम अभी पहुच रहे हैं ।"


मोना चौधरी ने रिसीवर रखा ।।


चेहरे पर गंभीरता छाई हुई थी ।।


पारसनाथ की बताई बाते उसके गले से नीचे न उतर रही थी ।



शैतान का बेटा!


इस धरती पर पुन: आ रहा है इंसानी खून पीने कै लिए । मोना चौधरी विचलित-सी हो उठी ।


इस कशमकश में थी कि यकीन करे या नंहीं?
kunal
Expert Member
Posts: 268
Joined: 10 Oct 2014 21:53
Contact:

Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 11 Jan 2017 21:52

मंगलू कुर्सी पर बैठा अपनी सोर्चों में डूबा था कि उसके कानों में जंगला की फुसफुसाहट पडी ।


" मंगलू!"


“हां।"


"मुझे खतरे की महक आ रही है ।"


"खतरे की महक?" मंगलू के चेहरे पर अजीब-भाव उभरे।


"तुझे मुझ पर यकीन नहीं क्या?"


" है !"


“भवतारा का चाकू मुझें खतरे में लग रहा है । तेरे से चाकू छीना जाएगा ।"


"ये कैसे हो सकता हैं?"



" होगा…तेरे को पहले, सावधानी बरत लेनी चाहिए ।"


"क्या? "



"यहां से अभी निकल जा ।"



"हां । ड्राइंगरूम में बैठी मोना चौधरी अब किसी के आने का इंतजार कर रही है । वो लोग तेरे से चाकू छीनने आ रहे हैं ।" मंगलू फौरन कुर्सी से उठ खड़ा हुआ ।


" मोना चौधरी को मैं अभी खत्म !"


"नहीं !"


" तुमने ही तो कहा था कि मोना चौधरी को मार.......!"



" वो तब की बात थी, अब तू निकल जा, यहां से बाहर ......!"



"ठीक है ।" कहते हुए वो दरवाजे की तरफ़ बढ़ गया ।

॥॥॥॥॥
॥॥॥॥॥


"कहां जा रहे हो?” मंगलू को मुख्य द्वार की तरफ बढते देखा तो मोना चौधरी के होंठों से निकला ।



"जा रहा हूं।" मंगलू ने ठिठककर मोना चौधरी को देखा ।


“तुमने तो शाम को जाने को कहा.. . !"



" मै अभी जा रहा हूं ।"



"प्रोग्राम कैसे बदल गया?"
"क्योंकि तूने लोगों को बुला लिया है । चाकू छीनना चाहते हो तुम ।"



मौना चौधरी चौंकी और खडी हो गई।



"तुम्हें किसने बताई ये वात?" हैरान-सी मोना चौधरी बोली ।



" मुझें सब पता चल जाता है ।"


"तुम्हें जाने नहीं दूंगी ।" मोना चौधरी एकाएक कह उठी । मोना चौधरी तेजी से मंगलू की तरफ़ दौडी और उससे जा टकराई ।


मंगलू लड़खड़ाया और पास के स्टूल से जा टकराया । मोना चौधरी पुन: मंगलू पर झपटी ।


मंगलू ने हाथ बढाकर उसे रोक दिया । मोना चौधरी ने मंगलू को देखा । मंगलू की आंखें गुस्से से भरी थीं ।



"मेरे रास्ते मे मत आओ!" मोना चौधरी ने उसकी आगे बढी बांह की पीछे करना चाहा ।


परंतु बांह टस-से-मस न हुई ।



"मैं जा रहा हूं औंर मुझे जाने दो ।" कहकर मंगलू पुन: दरवाजे की तरफ बढा ।


उसी पल मोना चौधरी ने उसकी पीठ पर छलांग लगाई और उसे पीछे से पकड़ लिया मंगलू ठिठका ।



"क्या तुम मरना चाहती हो ?" मंगलू गुर्रा उटा ।



"मैं नहीं जाने दूंगी ।"


उसी पल मगंलू ने खुद को पीठ के बल गिरा लिया ।


मोना चौधरी नीचे दबी और उसके होंठों से कराह निकली ।



पकड़ ढीली हो गई ।


मंगलू फौरन आजाद होकर खडा हो गया ।


मोना चौधरी उछंल कर खडी हो गई ।


मंगलू के चेहरे पर अब दरिन्दगी नजर आने लगी थी ।



"मैं तुम्हें मार दूंगा ।" मंगलू मोना चौधरी की तरफ बढा ।



मोना चौधरी सावधानी से हटने लगी ।



" ये क्या कर रहा है मंगलू।" जंगला की फुसफुसाहट मंगलू के कानो में पडी ।


मंगलू ठिठका ।


"यहां रहकर वत्त बर्बाद मत कर !"
"मोना चौधरी ही मेरे रास्ते में आ रही है ।" मंगलू गुस्से से बोला ।

"बेवकूफा ये सव मूर्ख मनुष्य हैं । तू यहीं ठहरकर अपना वक्त क्यों बर्बाद करता है ।"



“छोड दूं मोना चौधरी को?"


"हां । यहां से फौरन बाहर निकल, वरना शैतान का बेटा तेरे से नाराज़ हो जाएगा ।"



मोना चौधरी मंगलू के होंठों से निकालने वाले शब्दों को सुन रही थ्री ।


उस वक्त मंगलू पलटा और दरवाजे की तरफ बढा ।


मोना चौधरी विना वक्तं गंवाए, तेजी से मंगलू की तरफ दोडा ।



आहट सुनकर मंगलू ठिठकते हुऐ पलटा ।


मोना चौधरी उसके करीब ही थी।



मगलू ने उसी पल हाथ आगे करके मोना चौधरी को रोका और उसके चेहरे पर घूंसा मारा, फिर पलटकर दरवाजा खोलते हुए बाहर निकल गया ।



मोना चौधरी को ऐसा लगा जैसे उसकां चेहरा लोहे के खम्बे से टकरा गया हो । आंखों के सामने अंधेरा उभर आया ।


लड़खड़ाकर वो नीचे जा गिरी । उसे होश तो था, परंतु उठने की हिम्मत जैसे गवा चुकी थी ।

॥॥॥॥॥
॥॥॥॥॥



मंगलू तीन दिन बाद खुले में आया था । बाहर की हवा उसे अच्छी लगी । वहां से बाहर निकलकर वह सड़क के किनारे फुटपाथ पर चलने लगा था ।



"अच्छा किया जो तू बाहर आ गया ।" कानो मे जंगला की फुसफुसाहट गूंजी ।



"अब मुझे किस तरफ जाना है?"


"मैंने शैतान के बेटे से बात करने की चेष्टा की, परंतु बात नहीं हो सकी । वो कहीं व्यस्त हे ।"


"तो?"



"मैं नहीं जानता कि तूने कहां जाना है । अब तेरे को क्या बताऊं? "


"अजीब हो तुम । वहां से मेरे को बाहर जाने को कह दिया है अब कहते हो कि तुम्हें नहीं पता, मैंने किधर जाना है ।"
"सच तो कहा है ! शैतान का बेटा फुर्सत में आते ही, मुझसे वात करेगा, तो तेरा हाल बताऊंगा ।"



"तब तक मैं, क्या करू?"


जंगला की तंरफ से कोई आवाज नहीं आई ।


"कहाँ भाग गया ।" मंगलू पुन: बोला ।।



“तेरे पास ही हू ।"


"जवाब दे मेरी बात का । जिन लोगों को चाकू चाहिए, वो मुझे तलाश कर लेगे, यूं खुले मे रहा तो।"



"तू होटल में ठहर जा !"


"होटल में-वहां पैसे खर्च होंगे । मेरे पास पैसे नहीं है ।”



"ये तो मामूली-सी समस्या है । वो देख, सामने गली है ।"


"हां ।" मंगलू ने गली की तरफ़ देखा ।


" वहीं कहीं खडा हो जा । कोई गली में आएगा तो तू उसे मारकर उससे रुपए छीन लेना ।"



" पुलिस मुझे पकड़ लेगी !"


" तूने अपने दोस्त को मारा, तेरे को पुलिस ने पकड़ा क्या?"


"नही ।"


"तो अब कैसे पकड़ लेगी । तेरी पीठ पर शैतान के बेटे, भवतारा का हाथ है । बेफिक्र रह तू !"



तभी मंगलू ने एक औरत को गती में जाते देखा ।



" वो औरत गली में जारही है ।"


"पीछे जा, काट दे गला उसका-निकाल शैतान के बेटे का चाकू।"


मंगलू ने अपने कदम तेज कर दिए ।



ओरत गली मैं जा चुकी थी।


मंगलू गली के किनारे पर पहुचा । गली में दो लोग और भी जा रहे थे, परंतु वे कुछ दूर थे ।
kunal
Expert Member
Posts: 268
Joined: 10 Oct 2014 21:53
Contact:

Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 11 Jan 2017 21:53

मंगलू दीवार पास मुंह कंरके ठिठका और पैट खोलने लगा । थोडी-सी खोलने के बाद उसने भीतर हाथ डाला और घुटने के ऊपर, टांग पर बांध रखे चाकू को बाहर निकालकर दांतों में
फंसाया और तेजी से वापस पैट बांधी ।


उसके बाद गली में औरत के पीछे बढ गया ।

दांतों में फंसा चाकू हाथ मे पकडा और उसे लेदर केस से बाहर निकाला ।
अब उसके एर्क हाथ में चाकू था और दुसरे में लैदर केस । " मंगलू ठीक औरत के पीछे पहुंचा ।


"सुन ।" मंगलू बोला ।


वो औरत ठिठकी । पलटी ।


अगले ही पल औरत की आंखें भय से फेल गई, उसके हाथ में चाकू देखकर ।


वो चीखने को हुई ।


" चीखना मत ।" मंगलू गुर्राया ।



औरत का मुंह फौरन बंद हो गया ।


मगंलू निगाह औरत के गले में पड़े सोने के हार पर जा टिकी ।


"ये सोने का हार दे मुझे ।" मंगलू गुर्राया ।



औरत ने कांपते हाथों से गले से सोने का हार निकाला ।


मंगलू ने फौरन हार झपट लिया ।



"मुझे मारना मत !"


"क्लाई में पड़ा कड़ा भी दे मुझे ।"

औरत ने फौरन कड़ा निकालकर दे दिया । उसका चेहरा पीला हो रहा था । मंगलू के हाथ में चाकू चाकू उसकी टांगे कांप रही थी । हार और कडा जेब में डालते हुए मंगलू खतरनाक स्वर में बोला ।

"पेसे निकाल ।"


उसने पर्स मंगलू की तरफ किया----" सब कुछ ले लो ।"



मंगलू ने उसका पर्स लिया । खोला, देखा । पर्स में सिर्फ तीन से रुपए थे । उसने रुपए निकलकर अपनी जेब में डाले और पर्स एक तरफ़ फेंकते हुए चाकू को औरत के पेट में घोंप दिया ।



औरत की आंखें फटकर फैल गई । दो पल के लिए तो उसे समझ ही न आया कि वो मरने जा रही है । उसका तो ख्याल था कि सब
दे दिया है, अब ये लुटेरा उसे नहीं मारेगा । मंगलू ने वहशियों की तरह चाकू को औरत के पेट में घुमाकर इस त्तरंह निकाला की उसकी सांसों की डोर पलक झपकते ही टूट गई । कटे पेड की तरह बो नीचे जा गिरी थी ।


मंगलु का चेहरा दरिंदों की तरह हो रहा था । उसने चाकू को वापस लेदर केस में डाला और कमीज के भीतर पेट के साथ फ़साते हुए आगे बढ गया ।
चेहरे पर उभरे मौत के भाव अब कम होने
लगे थे ।


"तू लाजवाब है मगंलू ।।” कानों में जंगला की फूसफुसाहट पड्री-" शैतान के बेटे को ऐसे सेवकों की ही जरूरत रहती है । पूरा भरोसा है कि तू शैतान के बेटे के, नाम को रोशन करेगा ।"


"मुझे पैसा चाहिए।”


"कितनी आसानी से तूने पैसा पा लिया------- ।"


"ये नहीं-मुझे वो पैसा चाहिए जो शैतान के बेटे ने मुझें देने को, कहा था-वहुत सारा ।"


"वो भी मिलेगा । शेतान के बेटे का ये काम तो पूरा कर । चाकू पर जितना खून लगेगा, उतना ही शैतान के बेटे की ताकत बढेगी । अब फिर चाकू का फल खून से चमक उठा है ।"



"अब मैं क्या करूं?"


"होटल दूंढ़ । कमरा ले वहां और रुक जा ।-शैतान का बेटा तेरे से जल्दी बात करेगा ।"


मंगलू गली के दूसरी तरफ़ से बाहर आ गया । सामने ही सड़क थी । देरों वाहन आ-जा रहे थे । मगलूं का चेहरा अब तक पूरी तरह सामान्य हो चुका था ।


मगलूं ने अब होटल की तलाश करनी थी ।

॥॥॥
॥॥॥॥
॥॥॥॥॥

होटल भी मिल गया ।

एक इलाके में तीन मंजिला होटल वना हुआ था । मंगलू वहां पहुचा तो रिसेप्शन डैस्क के पीछे एक व्यक्ति को मौजूद पाया ।


"कमरा चाहिए ।" मंगलू उसके पम पहुचते ही बोला ।


"डबल या सिंगल?"


"जो भी दे दो ।"


"हजार रुपया किराया होगा, चेक आउट 24 घटे ।" उसने रजिस्टर मगलू की तरफ घुमाया ।



" क्या है?”


" रिजिस्टर-----अपना नाम-पता भरो और .....!"


"जरूरी है ।"


"कोई जरुरी नहीं ।" उसने गहरी निगाहों से मंगलू को देखा…"इसे नहीं भरा तो किराया पंद्रह सौ देना होगा ।"
"मैं पंद्रह सौ दूंगा ।"


उसने रजिस्टर अपनी तरफ़ घुमा लिया ।


"एडवांस निकाले ।"


मंगलू ने औरत के पर्स से निकाला तीन सौ रुपया निकालकर उसकी तरफ़ बढाया ।


"ये क्या है ?" उस व्यक्ति ने मुंह बनाकर कहा ।


"रुपया ।"


"कम-से-केम एक दिन का पंद्रह सौ तो दो !"


मंगलू ने तीन सौ रुपया अपनी जेब में डाला और सोने का हार निकलकर रजिस्टर पर रखा ।

वो व्यक्ति चौका । अगले ही पल उसकी आखें चमक उठी और हार उसने अपनी जेब मे डाला ।।




" ठीक है कितने दिन रहोगे।"



"पता नहीं ।"


"सामान भी नहीं है तुम्हारे पास?"


"नहीं !"


"नाम क्या है तुम्हारा?"



" मुझे कमरा दो और मेरे से कम ही बात करना ।'" मगलू ने शात स्वर में कहा ।


“समझ गया…समझ गया । चलो मैं तुम्हें बढिया . कमरा दिखाता हूं। डैस्क के पीछे से निकलता वो बोला और फिर मंगलू को अपने साथ लेकर होटल के भीतर की तरफ़ बढ़ गया ।



॥॥॥
॥॥॥॥
॥॥॥॥॥
kunal
Expert Member
Posts: 268
Joined: 10 Oct 2014 21:53
Contact:

Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 11 Jan 2017 21:54

मोना चौधरी अभी ठीक से संभल न पाई थी कि दरवाजे पर उसे आहट सुनाई दी । उसने सोचा कि मंगलू फिर आ गया है ,उसने खुद को संभालने की चेष्टा में दरवाजे की तरफ़ देखा ।


वहां पारसनाथ को दो व्यक्तियों के साथ खड़ा पाया ।


बो दो और कोई नहीं मिथलेश और सतपाल थे । पारसनाथ फौरन मोना चौधरी के पास पहुचा ।


"क्या हुआ मोना चौधरी?" पारसनाथ ने पास पहुंचकर मोना चौधरी को संभाला ।


"वो-बो चला गया ।"
पारसनाथ ने मोना चौधरी को सोफे पर बिठाया ।


"चला गया दो?" पारसनाथ ने पूछा ।


"हा ।" मोना चौधरी की हालत अब बेहतर होती जा रहीं थी-----" उसे मालूम हौं गया था कि तुम लोग उसके पास मौजूद चाकू छीनने आ रहे हो । ये ही कहकर बाहर निकला था ।"


"शैतानी शक्तियां मंगलू की सहायता कर रहीं हैं । आने वाले खतरे से उसे पहले ही सतर्क कर दे रही हैं ।" सतपाल ने गंभीर स्वर में कहा-"तभी तो उसे पहले सब कुछ पता चल गया कि....... !"


" गलती हमारी थी ।" मिथलेश ने गंभीर स्वर में कहा ।



" वो कैसे?" सतपाल ने गंभीर निगाहों से उसे देखा ।


" मोना चौधरी को जो फोन किया गया, पारसनाथ ने जो बात मोना चौधरी से की, उन्हीं बातों की तरंगों को पकडकर शैतानी शक्तियों को आने वाले खतरे का अहसास हुआ ।" मिथलेश बोला ।



"तुम्हारा मतलब कि अगर पारसनाथ मोना चौधरी को फोन न करता तो उन्हें पता न चलता?"


"हां ।" सतपाल होंठ सिक्रोड़कर रह गया ।


"तुम्हारे साथ क्या हुआ"' पारसंनाथ ने मोना चौधरी से पूछा ।


"वो जा रहा था तो मैंने उसे रोकना चाहा, परंतु सफ़ल नहीं हो सकी । वो मुझे मार देना चाहता था परंतु शायद किसी ने उसे यहां से तुरंत निकल जाने को कहा ।" मोना चौधरी बोली ।



"किसी-कौन? "


"मैं नहीं जानती, लेकिन वो अक्सर किसी से बाते करता रहता था ।!


"शैतानी शक्तियां है उसके आस-पास !" मिथलेश बोला ।


"और वो ही शक्तियों उसकी और शैतान के बेटे के चाकू की रक्षा कर रही हैं ।"


" उसनेने मुझे सामान्य ढंग से घूंसा मारा तो मेरा बुरा हाल हो गया । उसका घूंसा किसी मूसल की तरह मुझे लगा और उसके बाद मैं किसी काबिल नहीं रही ।" मोना चौधरी कह उठी ।
" शैतान के बेटे ने उसके भीतर ताकत डाल रखी है, लेकिन उस ताकत का मुझ पर असर न होता । मेरे पास उस ताकत की काट है !" सतपाल कह उठा…"'चिंता,मत करो, अब मैं तुझे भी सुरक्षित के कर दूंगा।"



मोना चौधरी ने सतपाल और मिथलेश को देखा ।


" ये सब क्या हो ऱहा है, मुझे कुछ भी समझ , नहीं आ रहा ।"



"पारसनाथ ने तुम्हें बताया नहीं ।"


"इसका बताया नाकाफी था । तुम लोग मुझे सब समझाओ ।"


" मै वो कमरा देखना चाहता हु, जहाँ मंगलू ज्यादा देर तक रहा !"


"पीछे वाला कमरा है ।" पारसनाथ इन्हे वो कमरा दिखा दो !"



पारसनाथ उन दोनों को पीछे वाले बेडरूम में ले आया ।


सतपाल ने कमरे में सब तरफ नजर डाली ।



. "क्या देख रहे हो यहां?" मिथलेश ने पूछा ।


"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जाने से पहले मंगलू शेतान के बेटे का चाकू यही भूल गया हो ।"


“मुझे ये सम्भव नहीं लगता कि मंगलू इतनी बडी भूल करेगा ।" मिथलेश ने इंकार में सिर हिलाया ।



" भूल कोई भी कर सकता है । कभी भी हो सकती है । इस कमरे से चाकू दूंढ़ने की केशिश करों । हो सकता है कि जल्दी में निकलने के चक्कर में मंगलू से चाकू यहीं कहीं छूट गया हो ।" सतपाल ने कहा ।



उसके बाद मिथलेश और सतपाल कमरे में चाकू तलाश करने लगे ।



बीस मिनट तक दोनों चाकू दूंढ़ने में व्यस्त रहे । कमरा खंगाल डाला, परंतु चाकू कहीं नहीं मिला 1 म। . .



“इस कमरे में नहीं है चाकू ।" सतपाल ने कहा ।



उसके बाद वे वापस मोना चौथरी के-पास पहुंचे । वहां बैठे ।।


" अब बताओ मुझे कि ये सब क्या मामला है, क्या हो रहा हैं?"




सतपाल बताने लगा ।
मोना चौधरी ने सब सुना। सब समझा ।


बहुत कुछ अजीब लगा, परंतु इन बातों पर यकीन करना भी लाजिमी था । क्योंकि सतपाल और मिथलेश सच बोलते लग रहे थे
और जिम्मेदार व्यक्ति थे ।



"तुम लोगों की बातें अविश्वसनीय हैं ।" मोना चौधरी कह उठी ।


" हां, साधारण लोगों को हमारी बातों पर यकीन नहीं होता ।"


"परंतु मुझे यकीन है, मेरा कहने का ये मतलब नहीं था कि तुम लोग झूठ कह रहे हो ।"


"हम समझते हैं ।"


"मुझें इस बात का वास्तव में दुख है कि मंगलू को मैं नहीं रोक सकी । कोशिश तो मैंने पूरी की थी ।"



"मेरे खयाल में तुम किस्मत वाली हो कि वो तुम्हें जिन्दा छोड़ गया ।" मिथंलेश बोला ।



"शायद उसे यहां से निकलने की जल्दी थी !" सतपाल, ने कहा !



"वो मेरी जान लेता भी क्यों ?" पूछा मोना चौधरी ने ।


" वो शैतानी शक्तियों से घिरा हुआ है ।" सतपाल ने गंभीर स्वर में कहा----"शैतान जो चाहता है, उससे कराता है । उसका खुद का बस अपने पर नहीं रहा । वो शैतान के बेटे का गुलाम वन चुका है ।"



"अगर शैतान का बेटा इस धरती पर आया तो वो लोगों का खून पीएगा ।" पारसनाथ ने कहा ।



" ओह! कितना बुरा होगा तब?"



"पंरंतु हम उसे रोकने की चेष्टा कर रहे हैं क्रि वो न आ सके ।" सतपाल बोला ।


"कैसे रोकेंगे !" मोना चौधरी ने पूछा ।



" अगर शैतान के बेटे का चाकू हमे मिल जाए तो !"



"वो तो मंगलू के पास है, चाकू को अपने से जुदा, नहीं करेगा ।"



"परंतु ऐसा करना है हमें ।"


" सफल नहीं हो सकोगे ।"


"होंगे ।" सतपाल दांत भीचकर बोला ।


"मंगलू के एक घूंसे ने मुझे आधे से ज्यादा बेहोश कर दिया था । वो बहुत ताकतवर है ।"
"सब शैतानी ताकतों का असर है ।" सतपाल बोला…"परंतु , मुझ पर उन ताकतों का असर नहीं होगा । मैंने खुद को ऐसी ताकतों सुरक्षित कंर रखा है । वो मुझे घूसा मारेगा तो उसकी सामान्य ताकत से ही मुझे लगेगा।"



"समझी ।" मोना चौधरी उसे देखने लगी ।
kunal
Expert Member
Posts: 268
Joined: 10 Oct 2014 21:53
Contact:

Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 11 Jan 2017 21:55

सतपाल ने सिगरेट सुलगाकर कहा ।



"मोना चौधरी! तुमने मंगलू क्रो देखा है । उसे पहचानती हो ।"



"हां...तो. ...?"


"हमने मंगलू को जल्दी ही तलाश करना है ।ये काम अब तुम्हारे सहारे ही हो सकता है ।"



"मैं तुम लोगों को मंगलू का हुलिया. ..!"



"हुलिए के दम पर मंगलू की तलाश की तो, तब वहुत देर हो जाएगी ।" सतपाल व्याकुलता से कह उठा ।



“तो?”



"तुम मंगलू की तलाश में हमारा साथ दो । मेरे साथ रहो !"



मोना चौधरी कुछ कहने लगी कि सतपाल कह उठा ।



"हम तुम्हें जायज फीस देगे । कोई भी ठीक रकम तुम हमसे भी ले सकती हो?”



" पैसा बहुत है मेरे पास ।" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा'…"ओंर तुम लोगों का ये काम मुझे खतरनाक और दिलचस्प लगा । ऐसे काम मुझे पसंद आते हैं । तुम न भी कहते तो भी मैं तुम लोगो के साथ रहने को कहती।"



" ओह शुक्रिया!", सतपाल के गंभीर चेहरे पर मद्धिम-सी मुस्कान उभरी और लुप्त हो गई ।



"लेकिन इतने बड़े शहर में मंगलू की तलाश में कहा-कहाँ भटकेंगे?" मोना चौधरी बोली ।



"उसने तुम्हें बताया था कि किधर जाएगा वो?" सतपाल बोला ।



" 'इतना अवश्य कहा था कि चाकू उसने किसी को देना है । कहीं पर पहुचना है ।"



"जाना किधर है ये नहीं बोला?"



“न ।"


पारसनाथ गंभीर चेहरा लिए बैठा उन्हें देख रहा था ।
ये एक ऐसा मामला था कि जिसमे दखल देकर बो मोना चौधरी की सहायता नहीं का सकता था ।


सतपाल ने मिथलेश को देखकर कहा ।


"मंगलू का कैसे पता लगाएं?"


"तुम पता लगा सकते हो सतपाल. !" मिथलेश ने गंभीर स्वर में कहा ।



"कठिन हो जाएगा मेरे लिए…क्योंकि मेरे'पास मंगलू की कोई भी चीज नहीं है । अगर उसकी कमीज का एक धागा भी मेरे पास होता तो मैं मगलू का पूरा सफ़र जान लेता कि वो यहां से कहाँ गया और क्या-क्या किया?”



“धागा?" मोना चौधरी बोली-----" क्या कहना चाहते हो तुम ?"


"मेरे पास मंग की कोई चीज होती तो मैं पवित्र शक्तियों से सम्बध बनाकर, मंगलू के बारे में जान सकता था कि तुम्हारे घर से निकलकर उसने कौन-कौन-सा रास्ता तय किया और किस दिशा मे? "



"उसके फटे-पुराने कपडे हैं, मेरे पास ।"


" कपड़े ?"


सतपाल और मिथलेश के चेहरे चमक उठे ।



"किधर हैं, हमे दो ।"


मोना चौधरी उठी और धर में मंगलू के उतारे कपडों को दूंढ़नै लगी । मंगलू के उतारे कपड़े बाथरूम के दरवाजे के पीछे मिले ।


" मिथलेश! अब हमे देर नहीं करनी चाहिए । यहां से चलो ।"



" हां !"


"तुम भी हमारे साथ चलो मोना चौधरी!"



"क्यों नहीं, जरूर !" मोना चौधरी ने कहकर पारसनाथ को देखा ज़रूरत पडी तो तुम्हे बुला लूंगी ।"



" तुम खुद को खतरे में डालने जा, रही हो ।" पारसनाथ ने गंभीर स्वर कहा ।



"ऐसा कुछ नहीं होगा ।"



"मैं तुम्हारे साथ ही रहू तो क्या बुरा है?"



"मेरी फिक्र मत करो । राधा का हाल-चाल पूछ आना महाजन जर्मनी गया हुआ है........
अभी उसके आने में द्रस-पंद्रह दिन लगेंगे । राधा खुद को अकेली महसूस न कर रही हो ।



"मैँ अपनी पली सितारा को राधा के पास भेज दूगा ।"



"ये ठीक रहेगा ।"



उसके बद वे सब वहां से चलने की तैयारी करने लगे ।


॥॥॥॥॥
॥॥॥॥॥


सतपाल और मिथलेश मोना चौधरी को लेकर अपने उसी फ्लैट पर पहुचे, जहाँ वे सव काम करते थे । रास्ते मे उनमें कोई खास बात न हुई थी । सतपाल के हाथ में मंगलू के पुराने कपडों बाला लिफाफा था ।


मोना चौधरी और मिथलेश एक कमरे में रुक गए । सतपाल, मंगलू की कमीज का एक टुकड़ा लेकर एक ऐसे कमरे में पहुंचा, जो कि काफी हद तक खाली था । वहाँ जो चीजे थीं, किसी के काम की नहीं थी, परंतु इनके वहुत काम की थीं ।

सतपाल ने अपने जूते-क्यड़े उतारे और अण्डरवियर मी उतार दिया । फिर वहां पडे लकडी के स्टूल क्रो उठाकर कमरे के बीचो बीच रखा और उस पर चौकड्री मार कर बैठ गया ।


मंगलू की कमीज का एक दुकड़ा अभी भी उसके हाथ में दबा था । अब चेहरे पर गभीरता आ गई थी । अगले ही पल उसने आंखें बंद की और किसी मंत्र को होंठों-ही-होंठों में बड़बड़ाने लगा ।


उसकी मद्धिम-सी वइबड़ाहट कमरे में गूज रही थी ।


परंतु शब्द स्पष्ट न थे कि यों कौ-सा पत्र बड़बड़ा रहा है ।


समाधि की मुद्रा में बैठ सतपाल का तीसरा नेत्र शुन्य के गहरे, काले अंधेरे को देख रहा था । पहले उस काले अंधेरे में रंग-विरगे रंग दिखे, फिर वो काला अंधेरा सफेदी में बदलता चला गया।

दूध की तरह सफेद गुदगुदे-से बादल . .


सतपाल ने अपने को उन बादलों में प्रवेश करते पाया । उसे लगा जैसे बो बहुत हल्का होकर उन बादलों के बीच उड़ रहा हो । हवा के संग मंद-मंद तैर रहा हो, परंतु वो कुछ तलाश कर रहा था । उसकी नज़रे दूंढ रही थी किसी को । एक एक बादल छटने लगे । कुछ कुछ सब स्पष्ट-सा दिखने लगा । जगह-जगह आग-सी लगी महसूस हो रही थी । कोई कहीं पर फंदा लगाकर झूल रहा था तो कहीं पर बिखरती, कदी-फटी लाशें पड़ी थी ।।
कोई किसी को मार रहा था तो कोई भाग रहा था । अजीब-सा शोर छाया हुआ था, जो कि ठीक से समझ न आ रहा था । एक जगह कई आदमी, एक औरत को कोड़े मार हैं थे ।



सतपाल ठीठकर हर तरफ़ नजरें घुमाने लक्गा ।



"ओह तो ये नर्क है! मैं गलत जगह पर आ गया ।"


वो बड़बड़ा उठा।


तभी शोर-सा उठा । सतपाल ने दूसरी तरफ़ देखा तो चौंक उठा । । कुछ लोग भागते हुए उसकी तरफ ही आ रहे थे ।


लोग भी वो अजीब-से दिखाई दे रहे थे ।


किसी का हाथ नहीं था तो किसी की पैर नहीं था । किसी का सिर नहीं था तो किसी की हालत और भी बुरी थी है .



सब कुछ अजीब-सा दिल दहला देने वाला था ।


सतपाल घबरा उठा ।



"ओह, ये तो वो ही लोग हैं, जो धरती पर किसो मनुष्य में प्रवेश करके हमारी दुनिया में आ जाना चाहते थे, लेकिन मैंने इनकी कोशिश सफल नहीं होने दी और इन्हें वापस भगा दिया । ये सब मेरे से बदला लेने आ रहे हैं ।


-वो सब तेजी से उसकी तरफ भागते आ रहे थे । सतपाल पलट कर भागेने लगा । वो इन लोगों से बचना चाहता था । जो रास्ता मिला, उसी पर ही वो दौड़ता चला गया । बारम्बार पीछे पलटकर देख लेता था । वो सब पीछे आ रहे थे । मंगलू की कमीज का कपड़ा उसने अभी भी मुट्ठी में पकडा हुआ था ।।


उसकी सांस फूलने लगी थी ।


परंतु उन लोगों से अपना पीछा ऩ छुडा पा रहा था ।


वो सब बराबर उसके साथ भाग रहे थे । सतपाल को लगा जैसे उनसे पीछा नहीं छुडा पाएगा । अब तो थकान से टांगे भी कांपने लगी थी । पीछे दौड़ने वाले अब उसके काफी करीब आ गए थे । सतपाल को लग रहा था कि वो तेज नहीं दौड पा रहा है । बहुत थक गया है, दौडते-दौडते रास्ते मे ठोकंर लगने से वो कई बार गिरा था ।


" ओह अब मैं नहीं बच पाऊंगा ।" सतपाल ने मन-ही-मन सोचा-----" ये मुझे मार देगे । मैं इंसान हूं। थक गया हु, परं ये सव तो प्रेत योनि है हैं, ये तो कभी नहीं थकते और मुझें पकड ही लेगे ।'"
इस विचार के साथ सतपाल की रही-सहीं हिम्मत भी साथ छोड़ गई । अगले ही पल वो ठिठक गया ।



सामने शैतान खड़ा था । नर्क का बादशाह ।

साक्षात शैतान!



Who is online

Users browsing this forum: No registered users and 2 guests