खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

kunal
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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 10 Jan 2017 19:21



"मैंने कोई गलती कर दी क्या?"


"बहुत बडी! शैतान के बेटे की अमानंत कहां है?"



"अमानत..... वो .... चाकू... .?"



“हां ।"



"बाहर तिपाई पर रखा !”



"उसे मोना चौधरी ने उठा रखा है और उसे खोलकर भी देख रही है !"


"ओह !"



"अगर उस चाकू पर से तेरा अधिकार छिन गया तो जानता है शेतान का बेटा तुझे कितनी बुरी मौत मारेगा । तेरी जो आवभग़त वो कर रहा है, अपनी अमानत की वज़ह से कर रहा है, वरना तू इस लायक नहीं है कि तेरे को शैतान का बेटा अपनी सरपरस्ती में ले ले । भवतारा ने वहुत बड़ा अहसान किया है तुम पर...... !"



मगलू का चेहरा गुस्से से भर उठा । वो तेजी से दरवाजे की तरफ बढा ।



"कहा जा रहा है?” जंगला की सरगोशी उसके कानों में पडी ।



"मोना चौधरी से वो चाकू लेने जा रहा हूं।"



“तो गुस्से में क्यों है । अन्तिम से काम ले अभी तेरे को तीन दिन यहां रहना है ।"
मंगलू ठिठका दो-तीन लम्बी सांसे लेकर उसने खुद पर.काबू पाया और चेहरा शांत करते बाथरूम से निकला कि ठिठक गया। सामने ही मोना चौधरी दिखी ।


मोना चौधरी बाथरूम के दरवाजे की तरफ़ ही देख रही थी !


"किससे बाते कर रहे थे ?" मोना चौधरी ने पूछा ।


मंगलू की निगाह उसके हाथ में थमे चाकू पर जा टिकी । वो आगे बढा । उसके हाथ से चाकू और लेदर केस लेकर, चाकू उसमे रखा और मोना चौधरी से कहा ।



"तुम्हें इस चाकू को नहीं छेड़ना चाहिए था ।"


"क्यों?"



" तुम जानती हो कि ये चाकू किसी की अमानत है । ये बात तुम्हें पहले भी बता चुका हूं . . , !"


मोना चौधरी की निगाह मंगलू पर टिकी थी ।



" तुमने बताया नहीं कि बाथरूम में किससे बाते कर रहे थे ?"


"ये बात भी तुम्हें बता चुका हूं कि मुझे अपने से बाते करने की आदत है !"


"मैंने तुम्हारे शब्द सुने ।"


" क्या ?"



"तुम कह रहे थे-मोना चौधरी से चाकू लेने जा रहा हूं-इसका मतलब कि तुम्हें किसी ने बताया कि चाकू मैंने उठा रखा ।"



"तुमने. ..!" मंगलु-मुस्कराया-------" मेरे अलावा किसी और की आवाज सुनी !"



"नहीं ।"


" तो, फिर?"


"लेकिन तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि चाकू मेरे हाथ में है ।" मोना चौधरी कह उठी ।



मंगलू मोना चौधरी को देखने लगा ।


"क्या तुम दीवारों के पार देखते हो?"


"पागल तो नहीं हो गई हो तुम?"


"तो फिर तुम्हें कैसे पता चला कि मैंने चाकू उठा लिया है?"
"तुम्हारे कान बज रहे हैं क्योकिं मैंने ऐसा नहीं कहा । मैं तीन दिन आराम करना हूं और तुम बातें करके मुझे परेशान कर रही हो ।" मंगलू ने शात स्वर में कहा---"मैं जाऊं यहां से ?"


" तुम मेरी कार टकराए हो इसलिए तीन दिन मेरे घर पर आराम से रह सकते हो । मैं बाहर जा रही हूं । तुम दरवाजा भीतर से बंद कर लो ।" मोना चौधरी ने पलटते हुए कहा ।



"कहा जा रही हो?"


"तुम्हारे कपडे लेने । कोई फोन बजे तो तुमने नहीं उठाना है । डोर बेल बजे तो दरवाजे में लगी आई मैजिक देख लेना कि बाहर कौन है, मैं हुईं तो दरवाजा खेलना, नहीं तो मत खोलना । कुछ खाने का मन हो तो फिज में देख लेना । वहीं खाने का सामान रखा है ।"



मंगलू उसके पीछे चलता ड्राइंगरूम में आ गया ।


मोना चीधरी ड्राइंगरूम के प्रवेश द्वार के पास पहुंचकर ठिठकी । उसे देखा ।


मंगलू की निगाहों को उसने अपने शरीर पर फिर से पाया ।


मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े । मंगलू ने सकपकाकर मुंह फेर लिया ।


"तुम मेरे यहां मेहमान हो । अपने स्तबे की कद्र करो । कोई भी ऐसी हरकत्त मत करना कि तुम्हें बाहर निकलना पड़े ।"



"मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया !"


"लेकिन करने की नीयत रखते हो !" मोना चौधरी ने उसे घूरा ।


"नहीं मेरी नीयत बित्कल साफ है ।”


मोना चौधरी ने दरवाजा खोला और मगंलू के हाथ में दवे केसयुक्त चाकू को देखा ।


"बंद करों ।" कहकर मोना चौधरी बाहर निकल, गई ।



मंगलू ने दरवाजा बंद कर लिया ।


मोना चौधरी कुछ पलों तक बंद दरवाजे को देखती रही ।


वो ये न देख सकी कि दरवाजे पर लगी आई मैजिक में से मंगलू उसे देख रहा है । फिर मोना चौधरी पलटी और नीचे जाने वाली सीढियों की तरफ बढ़ गई । सीढियां उतरकर नीचे पार्किग में खडी अपनी कार के पास पहुची और मोबाइल निकालकर पारसनाथ का नम्बर मिलाया ।

दो-तीन बार काई करने कै बाद नम्बर मिला ।



" हैलो !" पारसनाथ की आवाज़ कानों में पड्री ।
" तुम अपने रेस्टोंरेट में हो?"


"हां ।"


"में वहीं आरही हूं।"


“डिसूजा वोहरा के साध गया है पैसे लेने ।"


"कोई बात नहीं, मैं पैसे के लिए नहीं आ रही ।"






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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 10 Jan 2017 19:37



पारसनाथ ने मोना चौधरी की कही सारी बात सूनी !


मोना चौधरी के खामोश होते ही वो कह उठा ।



"अजीब-सी बात बता रही हो तुम ।"



“सच में अजीब है।" मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव मंडरा रहे थे ।


"बो तुम्हारी कार के नीचे कुचला गया । मर गया था?"



"हां ।"



"तब तुमने चेक किया था कि वो मर गया है?" पारसनाध ने पूछा ।।



"बिना चेक किए ही मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि तव वो मर गया था ।" मोना चौधरी ने दुढ़ स्वर में कहा ।



"और फिर वो जिन्दा हो गया?" पारसनाथ ने उसे देखा ।। मोना चौधरी ने सहमति मे सिर हिलाया ।



दोनों कई पलों तक खामोश निगाहों से एक-दुसरे को देखते रहे ।



“क्या ये सम्भव है कि कोई मर जाए और फिर जिन्दा हो जाए?"



"ये सम्भव हुआ है । इतना ही नहीं, उसके शरीर की सांरी टूट फूट ठीक हो गई । इसके अलावा उसके शरीर पर जो ज़ख्म वने थे , वो भी जाने कहां गायब हो गए । एकदम ठीक नजर आने लगा वो !"



"हेरानी है।”



" इसी हैरानी के वजह से मैंने उसे अपने घऱ में ठहरा लिया है । कहने लगा कि मुझें तीन दिन आरास की जंरूरत है । उसका एक्सीडेंट हुआ है, इसीलिए उसे आराम की आवश्यकता है ।"


मोना चौधरी गंभीर स्वर में बोली-------"सबसे बडी हैरत की बात वो चाकू है, जिसे उसने हर पल थाम रखा था । एक्सीडेंट के वक्त भी उसकी मुट्ठी मे ज़कड़ा था । दिखने मे वो साधारण-सा चाकू है, परतु वो पुराना है !"
"पुराना है?”


" हां ,जैसे कि सौ साल पहले का हो या इससे भी ज्यादा । चाकू का दस्ता रंग-बिरंगे हीरे-पन्नों से ज़ड़ा हुआ है और दस्ते पर इंसानी खोपड्री का निशान वना हुआ है ।"


"खोपडी का निशान?" पारसनाथ अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरने लगा ।


"वो जब मुझे मिला तो बुरे हाल में था । मैले-पुराने फ़टे हुए कपडे । बढी हुई शेव । बालो की ये हालत कि जैसे महीने-भर से नहाया न हो । वो उस जैसा लग रहा था, जैसे कागज़ बीनने वाले, गरीब लड़के घूमतें हैँ ।" मोना चौधरी का स्वर, धीमा हो गया----" मै दावे के साथ कह सकती हू कि वो युवक रहस्यमय है ।"


पारसनाथ ने सिगरेट सुलगाई । कश लिया ।


"मन नहीं करता कि तुम्हारी बात पर विश्वास करू?"


"मैं सच कह रही हूं ।"


"मुझे मालूम है कि तुमं सच कह रही हो ।" पारसनाथ ने कश लिया--“ चाकू पर खोपडी का निशान क्या साबित करता है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं।”



"खोपडी का निशान कुछ खास तरफ इशारा करता है, जो कि हम समझ नहीं पा रहे हैं ।"



" ऐसे निशान अपराधी संस्था के लोग भी रखते हैं, जो,..... !"


"वो युवक किसी अपराधी संस्था से वास्ता नहीं रखता । अजीब-सा है वो । उसकी आंखों में भी अजीब-से भाव हैं । मुझे लगता है कि जैसे उस चाकू में कोई रहस्य है जिसे वो अपने से जुदा नहीं करना चाहता ।"


“कैसा रहस्य?"



"यही तो मेरी समझ में नहीं जा रहा वो मर गया, फिर जिन्दा हो, गया । उसके जख्म पलक झपकते ही ठीक हो गए । शरीर की जो जो हड्रिडयां टूटीं, वो जादुई ढंग से ठीक हो… गई…क्या ये रहस्यमय बात नहीं हुई पारसनाथ?"


तुम बहुत खतरनाक बात की तरफ इशारा कर रही हो?"


“कहीं ये तात्रिर्कों जैसा मामला तो नहीं?”



"कुछ भी हो सकता है । मुझे वो साधारण इंसान नहीं लाता ।।"



"मैं किसी से इस बारे में पता करने की कोशिश करता हू।"
मोना चौधरी उठ खडी हुई ।


" तुम जा रही हो?"


"उसके लिए कपडे लेने और ये बाते तुम्हें बताने आई थी !" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा----" यकीन के साथ कह सकती हु कि वो चाकू जो कि लेदर केस में है, जिसे वो अपने से जुदा नहीं कर रहा, वो चाकू कोई खास है । ऐसा लगता है, जैसे उस चाकू मे उसकी जान हो?”







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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 10 Jan 2017 19:38


मोना चौधरी वापस अपने फ्लैट पर पहुंची । हाथ में कपडे का लिफाफा थाम रखा था । बेल बजाने लगी कि दरवाजा खोले मुर्गे की तरह नंदराम दरवाजे से बाहर झाकता दिखा ।


"साईं वो भिखारी किधर है नी?” नंदराम ने पूछा…“चला गया नी?"


"भीतर है ।"


"वड्री अपनी इज्जत का तो खयाल कर । अपनी नेई तो आस-पडोस की इज्जत रख ले । अब तेरा स्टैंडर्ड इतना नीचे गिर गया कि तू गंदे छोकरे को पकडकर लाने लगी?"


" वो गंदा नहीं है, मेकअप किया हुआ है ।"


"तेरा मतलब वो नया फिल्म स्टार है?"


"हा ।"


"तब तो मैं, कभी भी स्टार ऩेईं बनूंगा । ये तो बोत गंदे होते हैं ।"


मोना चौधरी ने कॉलबेल पर उंगली रखी और बटन दबा दिया । भीतर वेल बजने का स्वर सुनाई दिया ।



" इधर आ जा नी । चिल्ड बीयर मारते हैं । सिंगापुर की बीयर है । मेरी बीबी लाई थी ।"

"तू पी ले नंदराम !"


"मैं तो पीता ही रहता हूं। अब दोनों बैठकर…!"


तभी दरवाजा खुला । मंगलू दिखा ।


उसने शेव कर रखी थी । नहा-धोकर महाजन की पेट-कमीज पहन रखी थी । सांवला रंग था उसका । पहले से अब वो बहुत अच्छा नजर आ रहा था ।


"अब तो वहुत अच्छे लग रहे हो ।” मोना चौधरी ने मुस्कराकर कहा ।
मंगलू दरवाजे से हट गया ।


मोना चौधरी ने भीतर आकर दरवाजा बंद किया । इस लिफाफे में तुम्हरि लिए कपड़े हैं ।" मोना चौधरी ने लिफाफा एक तरफ़ रखा ।


, "अभी तो ये ही कपड़े ठीक हैं ।" मंगलू ने कहा ।


मोना चौधरी ने गहरी निगाहों से मंगलू को देखा । वो शांत-सा लग रहा था ।



"कुछ खाया तुमने?"


"नहीं ।"


"क्यों?"


"भूख नहीं लगी ।" मंगलू ने कहा और सोफे पर जा बैठा ।


"मैं चाय बनाने जा रही हूं। क्या तुम पीओगे?"

"न ।"


"पानी पिया तुमने?" जाने क्यों मोना चौधरी ने पूछा ।



"नहीं, प्यास नहीं लगी ।"



"ठीक है । मैं अपने लिए चाय बना लाऊं ।" कहकर मोना चौधरी किचन की तरफ बढ़ गई ।


किंचन में चाय बनाते हुए मोना चौधरी ने मोबाइल से पारसनाथ को फोन किया ।


"कहो ।"


"एक और अजीब बात देखी है उस मंगलू में ।"


"क्या?"



"बो जब से आया है, कुछ भी खाया-पीया नहीं है, पानी तक नहीं पिया, कहता है प्यास नहीं लगी ।"



"सच में हैरत की बात है ।"


" उसमे कुछ खास है पारसनाथ! "


"मुझे भी वैसा ही लग रहा है । मैं ऐसे किसी व्यक्ति की तलाश कर रहा हूं जो इस बारे में कुछ बता सके !"


मोना ने फोन बंद किया और चाय बनाकर ड्राइंगरूम में आ बैठी ।


मगंलू उसी सोफे पर बैठा था ।


अब मंगलू का हुलिया बदल चुका था । पहले की तरह बो मैला…कुचैला न लग रहा था ।
मंगलू दरवाजे से हट गया ।


मोना चौधरी ने भीतर आकर दरवाजा बंद किया । इस लिफाफे में तुम्हरि लिए कपड़े हैं ।" मोना चौधरी ने लिफाफा एक तरफ़ रखा ।


, "अभी तो ये ही कपड़े ठीक हैं ।" मंगलू ने कहा ।


मोना चौधरी ने गहरी निगाहों से मंगलू को देखा । वो शांत-सा लग रहा था ।



"कुछ खाया तुमने?"


"नहीं ।"


"क्यों?"


"भूख नहीं लगी ।" मंगलू ने कहा और सोफे पर जा बैठा ।


"मैं चाय बनाने जा रही हूं। क्या तुम पीओगे?"

"न ।"


"पानी पिया तुमने?" जाने क्यों मोना चौधरी ने पूछा ।



"नहीं, प्यास नहीं लगी ।"



"ठीक है । मैं अपने लिए चाय बना लाऊं ।" कहकर मोना चौधरी किचन की तरफ बढ़ गई ।


किंचन में चाय बनाते हुए मोना चौधरी ने मोबाइल से पारसनाथ को फोन किया ।


"कहो ।"


"एक और अजीब बात देखी है उस मंगलू में ।"


"क्या?"



"बो जब से आया है, कुछ भी खाया-पीया नहीं है, पानी तक नहीं पिया, कहता है प्यास नहीं लगी ।"



"सच में हैरत की बात है ।"


" उसमे कुछ खास है पारसनाथ! "


"मुझे भी वैसा ही लग रहा है । मैं ऐसे किसी व्यक्ति की तलाश कर रहा हूं जो इस बारे में कुछ बता सके !"


मोना ने फोन बंद किया और चाय बनाकर ड्राइंगरूम में आ बैठी ।


मगंलू उसी सोफे पर बैठा था ।


अब मंगलू का हुलिया बदल चुका था । पहले की तरह बो मैला…कुचैला न लग रहा था ।
" तुम कहां के रहने वाले हो?" मौना चौधरी ने पूछा ।



"मेरे से कोई फालतू सवाल न पूछो ।"



मोना चौधरी ने चाय का घूंट भरा और बोली ।


"वो चाकू कहां है?”


मंगलू की आंखें सिकूडी ।


"क्यों पूछ रहीं हो?"


"मैं उसे देखना चाहती हूं।" मोना चौधरी का स्वर शात था ।


मंगलू उसी पल उठा और अपनी पैंट खोलने लगा ।


मोना चौधरी की निगाह उस पर टिक चुकी थी ।


मंगलू ने ..पैट की जिप खोली और उसे नीचे सरका दिया ।


पैंट पैरों के पास जा गिरी ।


" मौना चौधरी की निगाह उसके घूटने के ऊपर टाग पर बधे चाकू पर जा टिकी । लेदर केस में लिपटा वो चाकू टांग पर टेप लगाकर फंसा रखा था । ये टेप उसी की थी और टेबल की ड्रॉज में पडी यी ।


मोना चौधरी समझ गई कि उसके जाने के बाद मंगलू ने उसकी चीजों की तलाशी ली है ।



" देख लिया चाकू !" मंगलू बोला ।



"ऐसे नहीं, मैं अपने हाथ मे लेकर चाकू देखनां चाहती हूं।”


"एक बार तो तुम्हारे हाथ में चाकू आ गया था परंतु अब तुम चाकू को छू भी सकतीं ।"


" क्यों ?"


"मेरा काम इस चाकू की हिफाजत करना हैं ।"


"हिफ़ाजत?"



"हां, ये किसी की अमानंत है और उसे सौंपना है ।"



मोना चौधरी के चेहरे पर अजीब-से भाव उभरे ।


"किसकी अमानत है?”


"भवतारा की।”


"वो कौन है?”



"शेतान का बेटा ।"


"शेतान का बेटा?" मोना चौधरी ने अजीब-से स्वर में कहा…" कहां रहता है ये?"


“मैं नहीं जानता ।" मोना चौधरी ने चाय का घूट भरा ।
दिमाग तेजी से दौड रहा था उसका ।


"तुम मेरी कार के नीचे आकर मर गए थे ।"

मोना चौधरी ने कहा ।


मंगलू ने मोना चौधरी को देखा । कहा कुछ नही ।


"तुम् बोलते क्यों नहीं मंगलू?"


“शायद तुम्हारी बात सच हो । ठीक से मुझे याद नहीं ।" मंगलू ने कहा…"परंतु इस बात का अहसास है मुझे कि जैसे मैं किसी और दुनिया में चला गया था लेकिन फिर वापस आ गया ।


" मुझे हैरानी कि तुम जीवित कैसे हो गए !"


" शैतान के बेटे की कृपा से !"


"कौन है शैतान का बेटा?"


"मैं नहीं जानता ।"


मोना चौधरी को ये बातचीत अजीब-सी लग रही थी ।


" ये चाकू तुम्हें कहां से मिला?"


"मंगलू ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला कि उसी पल, उसके कानों में जंगला ने सरगोशी की ।


"बेवकूफ तू क्यों इसके सवालो के जवाब दे रहा है?"


" तूने मुझें बताया क्यों नहीं, कि मैंने इसके सवालों के ज़वाब नहीं देने है ।"



"इतनी समझ तो तेरे में होनी चाहिए ।"



"तुम किससे बाते कर रहे हो?" मोना चौधरी कह उठी ।


"किसी से नहीं ।" कहते हुए मगलू नीचे झुका और पैट सरकाकर ऊपर चढाई और बांधने लगा ।



"एक बार मुझे चाकू देख लेने दो ।" मोना चौधरी ने कहा ।


"कभी नहीं । अब तुम मुझसे कोई फालतू बात नहीं करोगी ।"



"तुम्हें किसी ने रोक दिया है मेरे से बात करने क्रो?"



"मुझे कौन रोकेगा । क्या तुमने किसी को देखा!"



"नहीं, लेकिन इस बात का मुझें पूरा विश्वास है कि तुम्हें केसी ने रोका है कि मुझसे बात ध करो।"


मंगलू ने कुछ न कहा और पलटकर पीछे वाले बेडरूम में चला गया ।



मोना चौधरी चेहरे पर गंभीरता समेटे चाय पीती रही ।
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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 10 Jan 2017 19:39


कुछ बात तो है ।
शेतान का वेटा----नाम भवतारा-चाकू उसे सौंपना है मंगलू ने ।।


आखिर कौन है शैतान का बेटा? मोना चौधरी ने चाय समाप्त की और मोबाइल फोन निकालकर पारसनाथ का नम्बर मिलाया ।


बात हुई तो मोना चौधरी ये सब बाते बताने लगी । सव कुछ सुनने के बाद पारसनाथ ने कहा कि वो ऐसे किसी आदमी की तलाश कर रहा है, जो इन बातों का मतलब जानता हो ।



मगलू उस कमरे में वेड पर लेटा तो जंगला की फुसफुसाहट कानों मे पडी ।



"तूने वहुत गलत काम किया है?"


"मोना चौधरी से बात करके?" मंगलू धीमे स्वर में बोला ।



"उसे शेतान के बेटे के बारे में बताकर । उसका नाम बताकर ।"



"मैं नया हुं, मुझें नहीं पता था कि क्या नहीं बताना है?"



“अब ये बात पल्ले बाध ले कि हम लोग दूसरे लोगों से ज्यादा बात नहीं करते ।"


"समझ गया ।"


" बहुत जरूरत पडे तो बात करते हैं ।"


"ठीक !"



“अब तुझे सुधार करना होगा ।"


"कैसा सुधार?"



"शेतान का बेटा भवतारा पसंद नहीं करता कि कोई उसके बारे में जाने ।"



"समझ गया ।"


"मोना चौधरी उसके बारे में जान गई हैं ।"



"तो ।"



"तेरे को मोना चौधरी को खत्म करना होगा ।" जंगला की फुसफुसाहट कानों मे पड़ रही थी।


"अभी कर देता हूं।" कहते हुए मगलू ने उठना चाहा।



"अभी नही ।"


"तो ?"
" जब तू यहां से चलने लगे-तीन दिन बाद-तब मोना चौधरी को तूने खत्म कर देना है।"



"समझ गया ।"


" तीन दिन तू आराम क्रंर । शेतान का बेटा तुझे आकर बताएगा कि कब यहां से चलना है !"




"शेतान का बेटा इस वक्त कहां है?”


" अपनी दुनिया में ।”


" अपनी दुनिया…मैं समझा नहीँ ! "



"नर्क मेँ…नर्क के बादशाह का बेटा है वो !"


"तो वो इस दुनिया में नहीं है?” मंगलू के होंठों से निकला ।



"इस दुनिया मे आने की ही तो चेष्टा कर रहा है !"



" तो वो मुझें पैसे कहां से देगा, उसने तो कहा था कि मुझे बहुत पैसे देगा ।"



"बेवकूफ, इस दुनिया की दौलत उसके लिए कोई कीमत नहीं रखती । जितनी चाहेगा, उतनी देगा तुझे। उसकी सेवा करता रह और दौलत से खेलता रह ।" जंगला की सरगोशी कानो में गूंजी ।


" सेवा ?”


"जो काम भवतारा तेरे को कहे, उसे तू पूरा कर ।"


" हां, मैं करूंगा ।”



"याद रख । यहां से जब चले तो इसी से तूने मोना चौधरी को खत्म करना है, जैसे तूने अपने दोस्त भानू को मारा था । तू शेतान का सेवक बनने के गुण रखता है ।"



" हां , मैं सेवक बनूंगा । मुझे पैसे चाहिए । सब काम करूंगा मैं ।"



"अब आराम कर । शेताने के बेटे के लिए इस चाकू की हिफाजत करनी है तूने । ये काम करके दिखा । अपने को साबित कर कि शैतान की खिदमत करने के लायक है तू?”




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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 10 Jan 2017 19:40




शाम हो रही थी ।



सूर्य पश्चिम की तरफ़ सरकता जा रहा था । पेडों के साए लम्बे होते जा रहे थे । हल्की-हल्की ठडी हवा चलनी शुरू हो गई थी । दिन-भर की गमी से अब कुछ राहत मिलनी शुरू हुई थी ।


वो चालीस-बयालीस बरस का व्यक्ति था, जो कि आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक था । यूं उसकी कद-काठी पतली ही थी ।
शरीर पर काली पैट और सफेद कमीज पहन रखी थी । वो इस वक्त सामान्य गति से कार चला रहा था । उसका चेहरा इस कदर सपाट था कि वहां कोई भी भाव नहीं था । पास रखा रुमाल उठाकर चेहरे पर बहते पसीने को साफ किया ।


दो दिन से कार का एसी खराब था, परंतु ठीक करवाने का वक्त न मिला था ।


तभी उसके मोबाइल फोन की वेल बजी ।


पास की सीट पर रखा मोबाइल उठाकर स्कीन पर आया नम्बर देखा, फिर कॉलिंग स्विच दबाकर कान से लगाकर कह उटा ।



"पहुंच रहा हूं !"



"तुमने बहुत देर......!"



"बस पांच मिनट.. !!" कहकर उसने फोन बंद किया और पास की सीट पर रख लिया ।



सतपाल नाम् था उस व्यक्ति का । जानने वाले बाखूबी जानते थे कि ये व्यक्ति आत्माओं से बात करने, उसे पकड़ने और उन्हे भगाने का काम करता था । जरूरत पड़ने पर ये मृत लोगों की आत्माओं से भी बात कर लेता था । सतपाल नाम के इस व्यक्ति की वजह से जाने कितने लोग चैन से शात जिन्दगी बिता रहे थे, जिनकी जिन्दगी बुरी आत्माओं ने नर्क जैसी बना दी थी ।



सतपाल अपने काम में माहिर था । परंतु पैसा भी तगडा लेता था ।


जो लोग गरीब होते या पैसा देने की स्थिति में न होते, उनके काम ये मुफ्त में कर देता था । ये काम इसे विरासत में मिला था । सतपाल के पिता गिरधारी लाल ये ही काम किया करते थे और अपने पिता से ही इसने ये सव सीखा था । दो भाई और थे राजन और मिथलेश । वे दोनों भी यही काम करते थे, परंतु पुर्ण रूप से मास्टर न वन पाए थे । जितनी कि सतपाल ने इस विद्या मे महारथ हासिल कर ली थी ।


सतपाल ने एक मकान कै सामने कार रोकी और इजन बंद करके बाहर निकला ।


मकान के गेट पर पाच-सात लोग मौजूद थे । उन्हें में से एक उसका भाई राजन था ।
“ओह ।” राजन उसे देखते ही उसकी तरफ लपका…“मैं उसे नहीं संभाल पा रहा हु, वो बहुत ताकतवर है ।”

सतपाल उसके साथ मकान के भीतर बढ गया ।


"क्या कहता है वो?” सतपाल ने पूछा ।


"कुछ नहीं कहता । बात भी नहीं कर रहा । कई बार मुझें मारने की चेष्टा की ।"



" तुमने नहीं मारा उसे !"



"उसे नहीं भगा पा रहा हूं । अपने बस से बाहर की बात पाकर तुम्हें फोन किया ।"



“अब क्या स्थिति है?"



"खुद ही देख लो…मेरे पासे इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं था ।"


मकान के भीतर भी एक-दो औरतें और दो-तीन मर्द मौजूद थे । वो सव सहमे हुए थे । उनकी आखें ही बोलती लग रही थीं । हर तरफ चुप्पी छाई हुई थी ।


राज़न सतपाल को एक बंद दरवाजे के सामने ले गया ।



"इसमें है !" राजन ने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए धीमे स्वर में कहा ।



सतपाल ने दरवाजा धकेला और भीतर प्रवेश कर गया ।


राजन ने भी भीतर प्रवेश किया और दरवाजा बंद कर लिया ।





वो बीस-इवक्रीस बरस का युवक था । बैड पर रस्सियों से उसके हाथ-पाव बांध रखे थे । उसकी आखें बंद थी, परंतु होंठों से मद्धिम-सी गुर्राहट निकल रही थी । वो गुर्राहट कमरे में गूंजती-सी महसूस हो रही थी । उसके दात भिचे हुए थे ।


सतपाल ठिठका-सा कठोर निगाहों से उसे देखता रहा ।


"मैंने दूसरों की सहायता से बांधा है इसे । राजन बोला-----“इसके अलावा मेरे पास कोई और रास्ता भी न था । ये उत्पात मचा रडा था ।। ये हिंसक हरकतें करने लगा था । किसी की जान भी ले सकता था ।"

घूं-घूं की मद्धिम-स्री गुर्राहट कमरे में गूज रही थी ।


"कुछ बोला ये?” सतपाल ने गंभीर स्वर में कहा ।


"नहीं लेकिन उत्पात खूव किया है इसने

सतपाल की निगाह पूरे कमरे में घूमी । सारा सामान अस्त-व्यस्त पड़ा था । टी.वी. भी टूट चुका था । फर्श पर कई जगह कांच बिखरा हुआ दिखाई दे रहा था । छत पर लटकते पंखे की दो पंखुडियां टेढी हुई पडी थी । सतपाल आगे बढा और वेड के पास पहुंचकर ठिठका ।


बैड पर बंधे युवक के होंठो से मद्धिम-सी गुर्राहट घूं-घूं बराबर निकल रही थी ।।



सतपाल आगे झुका और बंधे युवक के कान के पास मुंह लेजाकर बोला !


"मैं आ गया हूं। मैं तांत्रिक सतपाल ।" उसी पल युवक की आंखें खुली ।


लाल सुर्ख आंखें!


अगले ही क्षण उसके होंठों से दहाड निकली और वो सतपाल पर झपटा।।


सतपाल तुरंत कुछ पीछे हुआ ।



बंधा होने कारण युवक छटपटाकर रह गया । लाल सुर्ख आंखों से वो सतपाल को घूरने लगा । उसके होंठों से बराबर गुर्राहट भरी घू घूं की आबाज निकल रही थी ।।



"कौन है तू?" एकाएक सतपाल ने तीखे स्वर में पूछा ।।


वो रस्सियों से ज़कड़ा आजाद होने के लिए छटपटा उठा ।



"चला जा यहां से । छोड दे इस युवक को, वरना बहुत मारूंगा तुझे !" सतपाल का स्वर पहले जैसा ही था ।


वो बंधनों में फंसा गुर्राया ।


"नहीं जाएगा ।"


वो खूनी सुर्ख नजरों से सतपाल को देखते हुए गुर्रा रहा था ।


"मेरी बात नहीं मानेगा? -नहीं जाएगा?"


वो वेसे ही सतपाल पर नजरे टिकाए गुर्रा रहा था ।


सतपाल एकाएक बैड पर चढा और उसके पेट पर बैठते हुए जेब से 'ऊं' के आकार का छोटा सा यंत्र निकाला तो वो युवक आजाद होने के लिए छटपटा उठा । उसके, होंठों से चीख निकली ।



"पछताएगा तू।" युवक के होठौ से घरघराती आवाज निकली ।
"मैं नहीं…तू पछताएगा ।" सतपाल उसे 'ऊं' का यन्त्र दिखाता बोला-----"अमी भी वक्त है चला जा । नहीं तो वहुत, दर्द होगा !"


"मैं तेरे को मार दूंगा !"


"तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता !" सतपाल कठोर स्वर में बोला…" तू क्यों आया इस शरीर मेँ?तू है कौन?"


"मैं नहीं बताऊंगां ।" उसके होंठों से गुर्राती आवाज निकली ।।



“क्यों ?"


" चुप रहने का हुक्म है, मैं नहीं.....! "


"तो फिर भुगत.. !" कहने के साथ सतपाल ने 'ऊ' नाम के उस यंत्र को उसकी बांह पर रखकर दबा दिया ।


यंत्र के उसकी बांह से लगने की देर थी कि वो चीख उठा । बांह के जिस हिस्से पर 'ऊं' नामक यंत्र रखा था वहां से हल्का-सा धूंआं उठने लगा ।


वो गला फाड़कर चीखा । अपने को आजाद कराने के लिए भरपूर उछल-कूद की ।


एक तो वो बंधनों में बंधा था, दूसरे सतपाल उसके ऊपर बैठा था।


वो कामयाव न हो-सका।


एकाएक वो शांत पड़ता चला गया ।


आंखें बंद हो गई उसकी ।



सतपाल ने 'ऊं' नामक यंत्र उसकी बांह से हटाया और अपनी जेब में डाल लिया ।


" चला गया?" राजन ने पूछा।


"नहीं नाटक कर रहा है जाने का…गया नहीं ।।" सतपाल ने युवक के चेहरे को देखते तीखे स्वर में कहा ।



युवक अब शात पडा था ।।


सतपाल आगे झुका और कठोर स्वर में बोला ।


"तू मुझे बेवकूफ़ नहीं वना सकता ।।" सतपाल खा जाने वाले कठोर स्वर में बोला---" तू क्या समझता है कि मैं तेरे को छोड़कर यहाँ से चला जाऊंगा । नहीं------मै तो तेरे को भगा के ही दम लूंगा ।।"


एकाएक युवक आखे खोलते हुए गला फाढ़कर चीखते हुए उस पर झपटा ।
सतपाल अपने को फुर्ती से पीछे करके बचा गया ।


युवक इस वक्त दरिंदा लग रहा था ।।


" तू हमारा पुराना दुश्मन है । युवक के होंठों से खरखराती आवाज निकली-“तूने बहुतों को वापस भेजा है, हम तेरे को वहुत बुरी मौत मारेंगे। तेरे को जिन्दा नहीं छोड़ेगे ।"


"कोई भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता । मैं तुम सबसे ज्यादा शक्तिशाली हूं।" सतपाल तेज स्वर में बोला ।



"भवतारा के सामने तेरी औकात ही क्या है ?" उसके होंठों से घरघराती आवाज निकली ।



" भवतारा ?" सतपाल बुरी तरह चौका ।



युवक वहशी अंदाज में सतपाल को घूर रहा था ।


"तुम शेतान के बेटे की बात कर रहे हो ?" सतपाल के होंठों से निकला ।"


"हां !"


"वो तो दो सौ दस साल-पहले इस धरती से वापस लौट चुका था ।"


युवक खामोश रहा ।


"क्या वो फिर. धरती पर आ गया है?"


"मैं नहीं बताऊंगा ।"


" तेरे को बताना, होगा ।" सतपाल चीखा ।।


"नहीं बताऊंगा । तू मेरा क्या कर लेगा ।"



"मैं तेरे को दर्द दूंग़ा । तड़पाऊंगा ।" सतपाल जैसे गुस्से से पागल हो रहा था ।



"भवतारा तेरे को निन्दा नहीं छोड़ेगा । तू वहुत तंग करता है हम लोगों को ।" उसके होंठों से घरघराती आवाज निकली "



“वता-भवतारां कहां है?”



" हा-हा-हा ।" वो वहशी अंदाज में हंसा------"नही बताऊंगा । तेरे को पता ही नहीं चलेगा कुछ.....!"


सतपाल ने जैव से छोटी-भी पुडिया निकाली और उसे खोला ।


पुड्रिया में राख भरी हुई थी, जिसे उसने अपनी हथेली पर उड़ेल लिया ।।



"ये क्या करने जा रहा है तू?" युवक के होंठों से बेचैनी भरी आवाज निकली ।
" तेरे को जलाने जा रहा हूं। ये पवित्र राख तुझे जला देगी ।"



"न . . . नही ।"



उसी पल सतपाल ने वो राख युवक के चेहरे पर फेक दी ।
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Re: खबरी-हिन्दी नॉवल - मोना चौधरी सीरीज

Postby kunal » 10 Jan 2017 19:45



युवक के होठों से पीड़ा-भरी चीख निकली और वो तड़पने लगा । उसके ऊपर बैठे सतपाल के शरीर को तीव्र झटका लगा और वो पास ही बैड पर लुढक गया ।



"मुझे मत मारो ।" युवक के होंठों से तड़प भरी आवाज निकली ।



"चला जा, नहीं तो तू मर जाएगा ।" सतपाल चीखा ।


"जा रहा हू लेकिन फिर आऊंगा, तेरे को नहीं छोडूगा ।” युवक के होंठों से घरघराती आवाज निकली ।


फिर सब कुछ शांत पड़ गया ।


युवक का चेहरा सामान्य होने लगा । वो अब गहरी-गहरी सांसे ले रहा था ।



सतपाल बैड से उतरा और राजन को देखा ।



"भवतारा के बारे में वो क्या कह रहा था ?" राजन ने पूछा ।



"शेतान के बेटे के बारे से वो कुछ कहना चाहता था, लेकिन फिर खामोश हो गया ।"



"ओह लेकिन…!" राजन ने कहना चाहा ।


तभी उस युवक को सामान्य होश आ गया ।



"मां-----पापा !"


दोनों ने उस युवक को देखा।


"मैं चलता हूं । तुम इन लोगों से फीस लेकर आ जाना ।" कहने के साथ ही सतपाल कमरे से बाहर निकला । बाहर युवक के परिवार वाले सहमे-से खड़े थे------" जाइए, भीतर आपका बेटा अव ठीक है ।" कहते हुए वो बाहर की तरफ़ बढ़ गया ।






सतपाल बाहर खडी अपनी कार-में बैठा और मोबाइल फोन निकालकर अपने दूसरे भाई मिथलेश से बात की । मिथलेश सव कामों का लेखा-जोखा रखता था ।



"हेलो. . !" उधर ने मिथलेश की आवाज कानों में पडी ।


“कहां है तु ?"


"घर पर ।”
"शैतान के बेटे अवतारा की याद है तुझे?"


"हां पिताजी ने अवतारा के बारे में बताया.... !"



"लायब्रेरी से कोई ऐसी किताब की तलाश कर, जिसमें अवतारा के बारे में भविष्यवाणी की गई हो ।"


" क्यो.. क्या होगया भवतारा के बारे में जानने की क्या जरूरत पड गई?"


“तुझे जो कहा है वो कर । मैं तेरे पास ही पहुंच रहा हूं !'


"ठीक है !" सतपाल ने फोन बंद किया और कार स्टार्ट करके आगे बढा दी । उसके चेहरे पर गंभीरता नजर आ रही थी । आखों में कभी-कभार बेचैनी उछल जाती थी ।


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