हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - complete

Jemsbond
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Re: हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - रीमा भारती सीरीज

Post by Jemsbond » 17 Sep 2017 20:02

आठो सैनिकों की निगाहें हमारी तलाश में चारों तरफ घूम रही थीं । दो सैनिकों की निगोहें घूमती हुई उस गुफा पर स्थिर होकर रह गई, जिसके भीतर हम छिपे बैठे थे ।

" वो रही !" एक सैनिक हर्षित स्वर में बोला ।

अब मुझे कुछ-न कुछ करना था । सैनिकों ने हमें देख लिया था ।

किसी क्षण उनके हाथों में दबी गने गरज सकती थीं ।

क्लाइव ने मेरी तरफ देखा, मैं उसका अभिप्राय समझ गई थी । वह पूछ रहा था कि खतरा सामने है । अब क्या करें?

"भून डालों हरामजाद्रों को ।" मैं बोल उठी ।

अगले क्षण ।

हमारे हाथों में दबी गर्ने. गरज उठी ।

'तढ़.. .तढ़.. .रेट. .रेट... !'

गोलियों कीं तढ़तड़ाहट के बीच इन्सानी चीखे गूंजी ।

आठो सेनिक होठों से हदय-विदारक चीखे उगलते हुए पीछे की तरफ उलट गये । हम लोगों ने उन्हें कुछ करने का मौका ही नहीं दिया था ।

" गोलियों किधर से चलीं हैं !" वातावरण में एक तेज स्वर गुजां ।

"पहाडियों की तरफ से चली हैं ।" दूसरा स्वर मेरे कानों से टकराया ।

"पहाडियों को घेर लो ।" कोई चीखा-" भागों ।"

और फिर दूसरे क्षण वातावरण में भारी बूटों की आवाजें गूंजती चली गई

-------------------

गोलियों चलने की आबाज वातावरण में सुनी गई थी , लेकिन हम मजबूर थे । हमारे सामने गोलियों चलाने के अलावा रास्ता भी तो नहीं था, अगर हम गोलियां न चलाते तो सैनिक मार डालते ।

"सैनिक आ रहे हैं मैडम !" क्लाइव बोला ।

"आने दो । हमें तैयार रहना है ।" मैंने जवाब दिया-"उनमे' से कोई भी जिन्दा नहीं बचना चाहिये । पहले हम सैनिकों से निबर्टेगे उसके बाद अगले कदम के बारे में सोचेंगे ।"

क्लाइव खामोश हो गया ।

हम सैनिकों के पहुंचने का इन्तजार करने लगे ।

देखते ही-द्रेखते गुफा के सामने सैनिक प्रकट हुए ।

मैंने सैनिकों को गिना । वे: संख्या बारह थे । सेनिक पथराये खड़े अपने साथियों की गोलियों से छलनी लाशो को देख रहे थे ।

अभी तक वे हमें देख नहीं पाये थे ।

अपने साथियों की लाशें देखकर उनको तो जैसे लकवा मार गया था । हमारी निगाहें सैनिकों पर थीं ।

"इ.. .इन दोनों को किसने मार डाला?" कई पलों बाद एक सैनिक के होठों से आश्चर्य भरा स्वर निकला ।

"ये काम उसी जासूस रीमा भारती का है ।" दूसरे सेनिक ने कहा--" उसे तलाश करके कुत्ते की मौत मार डालो । वो शर्तिया इन्हीं पहाडियों में कहीं छिपी है ।“

मैं व्यंग से मुस्कुराई ।

"मुझे मारने का इरादा रखते हो मिस्टर ।" एकाएक मैं बोल उठी ।

वे उछल पड़े । पलक झपकते ही उनकी निगाहें आबाज की दिशा में घूम गई ।

"यहां छिपी बैठी है हरामजादी ।" उस सैनिक के होंठों से कि गुर्राहट निकली, फिर बह अपने साथियों को सम्बोधित करते हुए बोला-----"देख क्या रहे हो? इसे गोलियों से भून डालो ।"

इससे पहले कि सैनिक हम लोगों पर हमला करते । हमारे हाथों में दबी गने गर्ज उठी ।

तड.....तड़.. ..रेट .रेंट…

गोलियां उनकी तरफ झपटीं ।

सैनिक होठों से हौलनाक चीख उगलते हुए पीछे की तरफ उलटने लगे ।
हमने उनमें से किसी को भी संम्भलने कां मौका नहीं दिया था । कुछ पलो बाद वहाँ उन सैनिकों की लाशें बिखरी नजर आ रही थी ।

"अब यहां से हिलो क्लाइव । अब हमारा यहां एक पल भी रुकना खतरनाक हो सकता है ।" मैंने कहा----"गुफा से निकलकर अपनी मंजिल की तरफ बढो ।"

"ओ०के० मेडम ।"

हम गुफा से बाहर निकल आये । मैंने अपनी गन चेक की । मेरी गन खाली हो चुकी थी । मैंने गन फेंककर एक सैनिक की लाश के पास से गन उठा ली ।

हम पेडों के नीचे से गुज़रते हुए आगे बढे गये । उस तरफ खाली जगह थी ।

रास्ता ऊबड़-खाबड़ था ।

मैं पाले से कहीं ज्यादा सतर्क हो उठी थी ।

=====

=====

न्यू

हम लगातार आगे बढ़ रहे थे ।

खतरा बढ गया था ।

अचानक मेरे पेरों में ब्रेक लग गये । मेरे हाथों की पकड़ गन पर मजबूत होती चली गई ।

वजह ।

हमारे बायी तरफ धनी झाड्रियां थीं । उन झाडियों में हल्की-सी सरसराहट हुई थी । जिसे मेरे वायरलेस बने कानों ने साफ साफ सुना था ।

मेरे ठिठकते ही क्लाइव भी ठिठक गया था । वह सतर्कता की मूर्ति नजर आ रहा था । उसने अपनी गन का रुख उसी तरफ कर दिया था । जाहिर था कि उसने भी सरसराहट सुन ली थी । हम अगले पाच मिनट तक यूं ही दम साधे सतर्कता की मुर्ती बने खडे रहे, फिर न तो दोबारा झाडियाँ ही हिलीं ओर न ही सरसराहट सुनाई दी ।

"झाडियों में सरसराहट क्यों हुई थी?" क्लाइव फुसफुसाया । ।

"कोई जंगली जानवर होगा ।" मैँ बोली ।

"मुझे तो गढ़बड़ लगती है ।"

"क्या गड़बड़ हो सकती है?"

"झाडियों में सैनिक भी छिपे हो सकते हैं ।"

"पागल हो !" मैंने कहा…"ये तुम्हारा वहम है, अगर झाडियों में सैनिक छूपे होते तो अब तक हमारे ऊपर हमला कर चुके होते ।

आगे बढो ।।।

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Re: हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - रीमा भारती सीरीज

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Re: हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - रीमा भारती सीरीज

Post by Jemsbond » 17 Sep 2017 20:20

हम फिर आगे बढने लगे ।

सफर था कि खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था ।

और फिर तकरीबन एक घंटे चलने के बाद हम जिस स्थान पर पहुंचे तो सामने चढाई थी ।

बायी तरफ पहाडियों थीं । पहाडियों पर जगह-जगह छोटे-बडे पत्थर बिखेरे हुए थे ।

पत्थरों का कब्रिस्तान-सा लग-रहा था वह ।

"अब किधर चलना है?" मैंने पूछा ।

"हमें चढाई चढकर दूसरी तरफ पहुंचना है । उसके बाद आगे का सफर होगा ।"

" चलो !"

हम चढाई चढने लगे ।

चढाई खडी थी ।

हमें एक-एक पैर जमाकर रखना पड़ रहा था । जरा-सी चूक हमारी मौत का सबब बन सकती थी ।

"मैंने कहा था ना मेडम कि रास्ता छोटा अवश्य है , लेकिन जोखिम भरा है ।" क्लाइव ने कहा ।

" तुम चलते रहो ।"

" मै रुका कहां हू। चल ही तो रहा हु ।" क्लाइव ने अपनी बात इस अंदाज में कही, थी कि मैं मुस्कुराये बगैर नहीं रह सकी ।

चढाई चढने में हमें आधे घण्टे से ऊपर का वक्त लगा था ।

कई बार तो हम फिसलते-फिसलते बचे थे । हम ऊपर पहुंचे ।

कुछ देर तक समतल जगह थी । उसके बाद ढलान था ।

चढाई चढने के कारण हमारी सांसें फूल गई थीं और हम यूं हांफ रहे थे मानो अभी-अभी भीलों लम्बी रेस लगाकर आये हों ।

क्लाइव एक चट्टान से पीठ सटाकर बैठ गया ।

"थक गये क्या?" मैंने पूछा ।

"इ. . इतनी ऊचाई चढकर आया हू।" वह अपनी ऊखडती हुई सांसों पर नियंत्रण करता हुआ बोला-" थकान तो होगी । "

मैं भी पत्थर से टिककर अपनी उखडी सांसों पर काबू करने लगी ।

"अ. . . आप भी थोडी देर बेठ जाइये। उसके बाद जागे चलेंगे ।" वह पुन: बोल उठा ।

मैं क्लाइव की बगल में चट्टान से पीठ सटाकर बैठ गई ।

"अभी तो मंजिल दूर है ।" क्लाइव धीरे से बोला ।
" तुम बार-बार मंजिल का रोना क्यों रोने लगते हो? मजिलं कितनी दूर सही, उसे तय तो करना ही पड़ेगा ।"

" 'मैँ रोना नहीं रो रहा । आपको बता रहा हूं ।"

" तुम बता तो चुके हो कितनी बार बताओगे बैसे ऐसा लगता है कि इस से जाने पर तुम खुश नहीं हो ।"

"ये बात नहीं मैडम ।।"

" यही बात है । तुम्हारे चेहरे के भाव साफ बता रहे हैं । तुम्हारे चेहरे पर कुढ़न और झुझलाहट के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे है । ये रास्ता भी तुम ही ने चुना था । अगर ये रास्ता इतना ही मुसीबतों से भरा था, किसी दूसरे रास्ते का चुनाव करते ।"

क्लाइव ने होंठ मीच लिये ।

"यहा तो दूर-दूर तक किसी इन्सान की परछाईं तक नजर नहीं आ रही है ।" सहसा वातावरण में एक स्वर उभरा----"मुझे नहीं लगता कि वे लोग इस तरफ आये हौं ।"

"वे इसी तरफ आ सकते हैं और क्रिस तरफ जायेंगे?" मेरे कानों से दूसरा स्वर टकराया । मैं चौंकी ।

वे आवाजें चट्टानों के पीछे से आई थीं । आवाजें सुनकर मुझे अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बातें करने वाले सेनिक हैं । पट्ठे हमें तलाश करते हुए यहां तक आ धमके थे ।

मुसीबत पर मुसीबत ।

एक क्षण बगैर एक अटके से उठी ओर मैंने पलटकर चट्टान के दूसरी तरफ देखा । मेरा अंदाजा ठीक निकला था । दूसरी तरफ पांच सेनिक खड़े थे । वे चट्टान के नीचे खड़े आपस में बातें कर रहे थे । दूर तक खाली समतल जगह थीं ।

" सैनिक ।" क्लाइव उठकर खड़ा होता हुआ बोला ।

"हां !"

" लगता है कि ये हरामजादे हमारा पीछा छोड़ने वाले नहीं हैं ।"

क्लाइव ने अपना वाक्य पूरा किया ही था कि उनमें से एक सैनिक बोल उठा "अब क्या किया जाये?"

" हम लोगों को चट्टानों के पीछे जाकर देखना चाहिये । हो सकता है कि रीमा भारती चढाई चढकर उपर पहुची हो ।" दूसरे ने कहा ।

" अब सोच क्या रही हो मेडम?" क्लाइव फुसफुसाया---" इन पाचों को ऊपर पहुचा देते हैं ।"

" पाचो को उपर तो पहुचाना ही है, लेकिन गोलियां चलाना हमारे हक में ठीक नहीं होगा ,
क्योंकि आसपास दूसरे सेनिक भी हमेँ तलाश कर रहे होगे । गोलियों की आवाज सुनकर वे इसी तरफ भागेंगे । वो स्थिति हमारे लिये ठीक नही-रहेगी । इन्हें रास्ते से हटाने का कोई दूसरा रास्ता सोचना पडेगा ।"

"इन हालात में दूसरा कौन-सा रास्ता हो सकता है?" उसने आश्चर्य भरे स्वर में पूछा ।

" जरा सोचने दो ।"

मैं सोचने लगी ।

मेरी निगाहें सामने एक बड़े से पत्थर पर स्थिर होकृर रह गई । दूसरे क्षण मेरी आंखें चमक उठी ।

"इस पत्थर को नीचे लुढ़काने में मेरी मदद करो ।" मैं गन कंघे पर लटकाकर उस पत्थर पर दोनों हाथ रख़कर बोली ।

"इ. . .इस पत्थर को लुढकाने से क्या होगा?" चकराये-से क्लाइव ने पूछा ।

. , . "ये पत्थर ही उन सैनिकों की मौत का कारण बनेगा । बस इस पत्थर को नीचे की तरफ ढलान पर लुढ़काने की देर है ।"

क्लाइव. ने आगे कोई सवाल नहीं काया, ।

वह पत्थर नीचे लुढ़काने में मदद करने लगा ।

पत्थर काफी भारी था । हमने पत्थर लुढ़काने में अपनी .समूची ताकत लगा दी थी । आखिर हम पत्थर तुढ़काने में कामयाब हो गये । पत्थर अपने साथ धूल और मिट्टी के कण उडाता हुआ तेजी से नीचे की तरफ़ लुढ़कता चला गया ।

सेनिक वार्तालाप में व्यस्त थे । वे उस वक्त चोंकं जब पत्थर मौत बना उनके सिर पर पहुंच चुका था । उनके पास संभलने का वक्त ही नहीं था । पत्थर सैनिकों को अपनी चपेट में लेता चला गया । पांचों सैनिक उस पत्थर के नीचे दबे पड़े थे । कुछ पलों तक वे 'हाथ पटकते नजर आये, फिर उनके हाथों में हरकत नहीं हुई ।

पांचो लाशों में तब्दील हो चुके थे । तभी!-

'तढ़. . .तढ़. ..रेट. . .रेट. . . ।'

अभी मेरी निगाहें पत्थर की चपेट में आ आये सैनिकों पर थी कि बायीं ओर की चट्टानों की तरफ से गोलियां बरसने लगी । मैं एक क्षण का सौवां हिस्सा गंवाये बगैर जमीन पर बैठ गई ।

क्लाइव भी कम फुर्तीला नहीं निकला था ।

उसने मेरा अनुसरण किया था ।
गोलियों हमारे ऊपर से गुजर गई । हम दोनों चट्टानों की ओट में होकर जवाबी कार्यवाही में लग गए ।

"तुम लोग चारों तरफ से धिर चुके हो ।" सहसा वातावरण में एक कर्कश स्वर गूंजा-"तुम्हारी खैरियत इसी में है कि हथियार फेंककर अपने आपको हमारे हवाले कर दो, वरना बहुत बुरी मौत मारे जाओगेगे ।" . .

हालांकि उस चेतावनी का हम पर जरा भी प्रभाव नहीं पड़ा ।

किन्तु खतरा कभी भी हम लोगों के सिर पर पहुंच सकता था । मेरा मस्तिष्क तेजी से काम का रहा था ।

मैंने अपने आसपास का मुआयना क्रिया और इस नतीजे पर पहुंचीं कि वे हम लोगों तक आसानी से नहीं पहुच सकते थे । फिर भी उन सैनिकों का जिन्दा बचे रहना हमारे लिए घातक सिद्ध हो सकता था ।

"क्लाइब ! एक पल कुछ सोचकर मैं फुसफुसाईं ।

"यस मैडम !"

"जब तक हम चट्टान के पीछे छिपे सैनिकों को खत्म नहीं कर देते, तब तक हम यहां से हिल भी नहीं सकते । तुम अपना ध्यान रखना । अगर कोई भी सैनिक अपने आसपास नजर आये, वो बचना नहीं चाहिये । मैं उन से निबटती हु ।"

"मैं भी आपके साथ चलता हू।"

"तुम मेरे साथ नहीं चलोगे । तुम्हें यहां रहना ज़रूरी है । अगर हम दोनों साथ गये तो पीछे से सैनिक हम पर हल्ला बोल सकते हैं ।-तुम यहाँ रहोगे तो तुम उन्हें सम्भाल तो लोगे ।"

" मै समझ गया । आप जाइये मैडम!" मैं सोच चुकी थी कि मुझे क्या करना है? "

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Re: हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - रीमा भारती सीरीज

Post by Jemsbond » 17 Sep 2017 20:20

मैं मुह के बल जमीन पर लेटी क्रोहनियों की मदद से सामने वाली चट्टान की तरफ सरक रही थी । . . मेरे एक हाथ में गन थी ।

वे क्षण बड़े ही खतरनाक थे ।

अगर सैनिकों की निगाहें मेरे ऊपर पड़ जातीं तो वे मुझे सम्भलने का मौका भी देने वाले नहीं थे, लेकिन इस वक्त मेरे पास रिस्क. लेने के अलावा अन्य कोई रास्ता भी तो नहीं था । पथरीली ओर उघड-खाबड़ जमीन पर रेंगने के कारण मेरी क्रोहनियां और घुटने छिलने लगे थे । मगर मुझे इस सबकी परवाह कहां थी ।
मेरा तो अब एक ही मकसद था । उन सैनिकों का खात्मा ।
कुछ पलो बाद मैं उनके सिरों पर पहुच चुकी थी ओर उन्हें भनक नहीं लगी थी । इस वक्त मैं एक चट्टान पर सीने के बल लेटी थी ।
मैं उन लोगों को साफ-साफ़ देख रही थी ।
वे गिनती में पांच थे ।
एक कैप्टन और चार सैनिक ।
"सर । रीमा भारती और क्लाइव को अपने कब्जे में करने के लिये क्या ये बेहत्तर नहीं होगा कि उन्हें पीछे से घेरकर गिरफ्तार कर लिया जाये ।" एक सेनिक बोला । .
"गिरफ्तार करने की क्या जरूरत है?" जबाब दूसरे सैनिक ने दिया-"उन्हें गोलियों से भून डालो अगर रीमा मारती जिन्दा बचीं रही तो अभी और न जाने कितने सैनिकों और औफिसरों की लाशें बिछा देगी ।"
"नहीं ।" कमाण्डर कठोर लहजे में बोला-"उसे मारने की बात दिमाग में भी मत लाना । रीमा भारती के साथ-साथ हमें क्लाइव को भी जिन्दा गिरफ्तार करना है । हमें क्लाइव से सर एडलॉफ के बारे में उगलवाना है कि वो कहां छिपा हुआ है ? ये जानकारी हासिल होने के बाद उन्हें कुत्तों की मौत मारा जायेगा ।"
मेरे होठों पर जहरीली मुस्कान नाच उठी ।
उन पांचों की जिन्दगी क्री उल्टी गिनती शुरु हो चुकी थी । वे क्या जानते थे कि मौत उनके सिर पर पहुंच है ।
"तो फिर उन दोनों को पीछे से घेर लिया जाए सर ।" तीसरे सैनिक ने पूछा ।
"ल. . . लेकिन उन्हें पीछे से घेरना तो जरा मुश्किल होगा ।" पहला जल्दी से का उठा ।
"क्यों?"
" चट्टानों के दोनों तरफ काफी नीची समतल जगह है और वे दोनो ऊंचाई पर हैं । अगर हम उनकी निगाहों में आ गये तो वे हमें फौरन शूट कर देगे और हमारे सामने चट्टानों के उस पार ढलान है । उस ढलान पर चढना हमारे लिये आसान काम नहीं होगा ।"
"चढना आसान नहीं है तो मुश्किल भी नहीं है ।" कैप्टन आदेश पूर्ण लहजे में बोला-"दिस इज माई आँर्डर ।"
"ओ० के० सर ।"
अगर मैं चाहती तो अब तक उनकी लाशें बिछा चुकी होती, लेकिन मैं चाहती थी कि उन्हें ये मालूम होना चाहिये कि वे जिस रीमा भारती को-गिरफ्तझर करने कीं फिराक में हैं । वे उसी के हाथों मर रहे हैं ।
सैनिकों ने घूमना चाहा ।

" तभी में बोली-"तकलीफ करने की जरूरत नहीं है दोस्तों! तुम लोग जिस रीमा भारती को गिरफ्तार करना चाहते हो, वो तो कब की मौत बनी तुम्हारे सिर पर खडी है, अगर तुम लोगों में हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार कर के दिखाओ, ।"

उन पांचो को बिजली जैसा' शॉक लगा ।

पलक झपकते ही उनके चेहरे ऊपर की तरफ उठते चले गये ।

कैप्टन के होठों से सरसराता स्वर निकला--" . .तुम?"

जवाब में मैंने हत्का-सा कहकहा लगाया ।

"देख क्या रहे हो?" कैप्टन चीखा--" 'पोजीशन लो, वरना . हमारी मौत निश्चित है ।"

परन्तु इससे पहले कि वे अपने ब्रचाव में कुछ कर पाते, मैंने दांत पर दांत्त जमाकर अपनी गन का मुंह खोल दिया ।

"तड़. . .तड़. . .रेट. . .रेट. . . ।"

असंख्य गोलियों सनसनाती . उनके जिसमें में धंसीं और वे कई कई फूट उछलने के बाद जमीन पर गिरकर ठण्डे हो गये ।

पाचों को जहन्मुम का रास्ता दिखाने के बाद मैंने घूमकर चारों तरफ का मुआयना किया ।

मैं देख लेना चलती थी कि आसपास ‘ और सैनिक तो नही हैं ।

किन्तु फिलडाल दूर दूरतक मुझे कोई सैनिक नजर नहीं आया था ।

पूर्णतया संतुष्ट मैं पलटकर चट्टान से नीचे उतरने लगी ।

कुछ पलों बाद मैं क्लाइव के पास पहुंच चुकी थी ।

. "चलो क्लाइव ।" इससे पहले कि क्लाइव मुझसे कुछ पूछता । मैं बोल उठी-" उन्हें टिकाने लगा दिया है ।"

"ये जंग का अन्त नहीं है मैडम । अभी तो हमें न जाने और कितने सैनिकों को -ठिकाने लगाना होगा ।" वह ठण्डी सांस के साथ पलटकर आगे बढता हुआ बोला ।

मैं खामोशी के साथ क्लाइव के पीले चल पडी ।

पहली बार मैं एक ऐसे मिशन पर काम कर रही थी, जहाँ मेरे लिये कदम-कदम पर मौत बिछी थी ।

====

====



सफर जारी था ।

इस वक्त हम खुली और समतल जगह से गुजर रहे थे । हमें दूर तक का नजारा साफ दिखाई दे रहा था । उस खुली जगह में कहीं-कहीं घनी झाड्रिया और वृक्ष तो अवश्य दिखाई दे रहे थे ।
लेकिन किसी इन्सानं की परछाई तक नजर नहीं आ रहीँ थी ।

हमारे चलने की रफ्तार तेज थी ।

हमारी सतर्कता में बाल बराबर भी फ़र्क नहीं आया था ।

"अरे !" क्लाइव बोल उठा-"'ये बैग किसका है?"

"ब्रैग कहां है ?"

"वो देखिये !" क्लाइव ने करीब ही झाडियों की तरफ संकेत क्रिया ।

मैंने झाडियों की तरफ़ देखा ।

वहां खाकी रंग का बडा-सा बैग पड़ा था ।

"ये तो सैनिकों का बैग लगता है ।" मैंने कहा-"उठाकर लाओ, देखते हैं कि उसमें क्या है?"

क्लाइव बेग उठा लाया ।

फिर उसने ब्रैग खोलकर देखा, उसमें रम की दो बोतलों के अलावा कुछ हथगोले तथा कपड़े मौजूद थे ।

"ये बैग यहां -कैसे आया मेडम?" वह बैग बन्द करता हुआ घबराया-सा बोला ।

" साफ-सी बात है कि सेनिक झाडियों के करीब सुस्ताने के … लिये बैठे होंगे और उनमें से कोई अपना बैग भूल गया होगा ।"

"इसका मतलब है कि सैनिक उस तरफ़ हैं, जिस तरफ से हम लोग आ रहे हैं।"

"ये जरूरी तो नहीं है कि वे उस तरफ गये हों । ये भी तो हो सकता है कि सेनिक हमारी तलाश में इस तरफ गये हों । जिस तरफ हम जा रहे हैं ।" मैंने उत्तर दिया ।

"यानि फिर सैनिकों से हमारा टकराव होने वाला है । " वह लम्बी सांस छोड़कर बोला ।

"उम्मीद तो है ।"

क्लाइव ने चुप्पी साध ली ।

"जो होगा देखा जायेगा आगे बढो ।"

"आप थक तो नहीं गई मैडम् ।" क्लाइव ने मेरी तरफ देखा । "

" नहीँ ।"

" अगर आप थकावट महसूस कर रहीं हों तो कहीं बैठकर एक-दो पैग लगा लें । आपकी सारी थकान चुटकी बजाते ही गायब हो जायेगी । इस वक्त रम टॉनिक जैसा काम करेगी !"

मुझे लेशमात्र को थकावट नहीं थी । न जाने कितनी बार मिशन के दौरान भी लम्बा सफर तय कर पचुकी थी । हां, 'शराब की ' आवश्यकता अवश्य महसूस कर रही .थी ।

"क्या ख्याल है मैडम? अगर आप-एक दो पैग लेगी तो मै भी पानी बनी पीकर तरोताजा हो जाऊँगा ।।
" मैं समझ गई थी कि क्लाइव थकान महसूस कर रहा है और वह रम की जरूरत महसूस कर रहा था । ये बात जुदा थी कि वह मुझसे खुलकर नहीं कह पा रहा था । मैं उसकी इच्छा को दबाता नहीं चाहती थी । अत: मैंने कहा-"ठीक है, किसी जगह बैठ तो ।"

… "उन झाडियों के पीछे बैठ लेते हैं ।" वह झाडियों की तरफ बढता हुआ बोला-" मेरी निगाहों में उससे अच्छी जगह दूसरी नहीं हो सकती ।"

मैं उसकै पीछे चल पडी।

मैं चलती हुई आने वाली परिस्थितियों पर गम्भीरता से सोच रही थी, वो बडी ही खतरनाक हो सकती थी । क्योंकि हम लोग अपने पीछे सैनिकों की दर्जनों लाशें छोड़कर आ रहे थे । सेनिक हमें तलाश कर रहे थे । अपने साथियों की लाशें देखकर उन्हें पता चल जाना था कि हम इसी इलाके में मौजूद थे ।

हम झाडियों के पीछे पहुंच गये । यहाँ मखमली घास की चादर-सी बिछी हुई थी ।

"बैठिये मैडम !"

मैंने तीक्ष्य दृष्टि से आसपास का जायजा लिया । मुझे कहीं कोई खतरा नजर नहीं आया था । संतुष्ट होकर मै घास पर गई ।

क्लाइव मुझसे थोड़ा हटकर बैठ गया । उसने बैग खोलकर रम की बोतल निकालकर घास पर रख दीं, फिर बैग टटोलने लगा । उसने प्लास्टिक का एक गिलास तथा पानी की बोतल निकाल ली-'"लो, काम बन गया । जिस सेनिक का ये वेग है । यह कोई पियक्कड़ लगता है । पट्ठे ने पानी की बोतल और गिलास कपडों के नीचे रखा हुआ था ।"

"तुम्हारे लिये तो अच्छा ही हुआ, वरना पानी और गिलास के बिना दिक्कत आ सकती थी!"

वह खामोशी के साथ पैग बनाने लगा ।

पीने का सिलसिला शुरू हुआ ।

कुछ ही देर में तीन लार्ज पेग हमारे गले से नीचे उतर चुके थे । हम खाली पेट थे । अत: उसने फौरन अपना असर दिखाना शुरु कर दिया था । जब क्लाइव चौथा पैग बनाने लगा तो मैंने कहा-"मुझे और मत देना ।"

" क्यों ?"

"ऐसी परिस्थितियों में में ज्यादा नहीं पीती ।"

"मैं अपने लिये तो एक पेग बना लूं।"
"उतना पीना`क्लाइब जितनी पचा सको । इस वक्त हमारे सामेन इंच इंच पर मौत बिछी है किसी भी क्षण ख़तरा आ सकता है । इसलिये अपने होशो-हवास में रहना ।"

क्लाइव सहमति में सिर हिलाकर रह गया ।

हां एक पल कुछ सोचकर मैं उठकर खडी हुई और झाडियों के उस पार झांका, मैं तसल्ली कर लेना चाहती थी कि अभी कोई खतरा तो नहीं टपका हे? मुझे कोई खतरा नजर नहीं आया था ।

सहसा मैं पीडा बिलबिला उठी ।मेरे जिस्म में पीड़ा क्री तेज लहर दौडती चली गई थी ।

मेरी पिण्डती में किसी जहरीले जीव ने काट लिया लगता था ।

मैंने हड़बड़ाकर नीचे देखा ।

मेरे होठों से सिसकारी -सी निकल गई । मेरे दायें पैर के करीब छः फुट लम्बा सांप कुण्डली मारे बैठा था । यह अपना बित्ता-सा फन फैलाये था । उसकी छोटी-छोटी चमकीली आँखे मेरे ऊपर जमी हुई थी ।

"क.. .क्या हुआ मेडम?" मेरी चीख सुनकर क्लाइव बोला ।

"स.. सांप !"

"कहा है सांप?"

' मैंने ऊंगली से सांप की तरफ इशारा क्रिया और फिर जैसे ही उसने मेरी ऊंगली का पीछा क्रिया तो क्लाइव के होठों से चीख ही निकल गई थी ।

"ओह माई गॉड ।"

मेरा सारा नशा कपूर हो चुका था और मैं बुरी तरह से लड़खड़ायी थी ।

"'म.. .मुझे सांप ने काट लिया क्लाइव ।" मैं बडी मुश्किल से बोल पाई---" आह ।"

क्लाइव उठकर मेरी तरफ झपटा ।

वो काले नाग अभी भी मुझे घूर रहा था । बो इस अदाज में अपनी जीभ लपलपां रहा था, मानो एक बार फिर हमलावर होने का इरादा रखता हो । इस समय उसकी यही मंशा थी, क्योंकी वो एकबार जोर से फुफ्फररा था ।

तभी ।

क्लाइव के हाथ में दबी गन गरज उठी ।

सांप के फन के चिथड़े उठ गये ।
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Re: हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - रीमा भारती सीरीज

Post by Jemsbond » 17 Sep 2017 20:21

क्लाइव ने गन कन्धे पर टागी और मुझे उठाकर कंघे पर लादकर एक तरफ झपटा ।

मेरा पीड़ा से बुरा हाल था । मेरी आखें बन्द होती जा रहीं थी । ऐसा लग रहा था जैसे मुझे जोरों की नींद आ रहीं हो ।
क्लाइव ने मुझे करीब ही पड्री पत्थर की एक व्रड्री सी शिला पर लिटाकर पूछा-"आपक्रो सांप ने कहां काटा?"

"ब. . .बायीं पिण्डली पर. . . आह. . . ।" मेरे होठों से फ़सा र्फसा सा स्वर निकला-"ल. . लगता है कि जहर मेरे जिस्म में त. . .तेजी से फ़. . . फैलता जा. . . रहा है, . . म. . . मैं. . न. . . हीं. . .ब. . . बचूंगी ।"

"आपको कुछ नहीं होगा मैडम । आप चिंता मत कीजिये ।" कहकर वह एक तरफ भागा ।

कुछ पलों बाद वह वापस लोटकर आया । उसकै हाथ में हरे रंग की तेजी- अजीब सी घास थी ।

वह मेरे करीब बैठ गया । उसने मेरी पैन्ट का दायां पोंहचा ऊपर सरका दिया । मेरी गोरी पिण्डली चमक उठी ।

यहीं सर्प के दांतों के नन्हे-नन्हें घाव थे । क्लाइव ने तुरन्त वहां होठ रखकर जहर चूंस-चूस कर थूकना आरम्भ कर दिया । इस काम में उसे तीन-चार मिनट लगे ।

तदुपरान्त क्लगइव ने घास को दांतों से चबाकर बारीक करके उस जगह पर रखकर ऊपर से अपना रुमाल बांध दिया । मेरीआँखे वन्द होती जा रही थी ।

"सोओं नहीं मेडम!" क्लाइव ने मेरा कन्धा पकढ़कर झिझोंड़ा-"आपक्रो कुछ नहीं होगा ।"

मेंने सुन रखा था कि यदि क्रिसी को सांप डंस ले तो उसे जागते रहना चाहिये । सोने से इंसान के जिस्म में जहर तेजी से फैलता है । मैं अपनी तरफ से जागते रहने की पूरी कोशिश कर रही थी, मगर उस घडी नींद पर तो मानो मेरा नियंत्रण ही नहीं रह गया था । मगर फिर एक चमत्कार हुआ ।

धीरे-धीरे मेरी पीड़ा कम होती गई थी । नींद भी गायब हो गई थी ।

घास ने रामबाण का काम किंया था ।

" अब आप कैसा महसूस कर रही हैं मैंडम?" कुछ देर बाद क्लाइव ने पूछा ।

"मेरी सारी पीड़ा गायब हो गई है और नींद न जाने कहां गई ? घास ने तो कमाल ही कर दिया ।" मैंने उठकर बैठते हुए कहा ।

"इस घास को आप सांप के जहर की सबसे बडी और अचूक काट कह सकती हैं । जो काम बढिया-से बढिया दवा नहीं कर सकती, वो ये घास कर देती है । "

========
"तुमने मेरी जान बचाई है क्लाइव । तुम्हारे अहसान का बदला मैं जरूर काऊगी ।"

" आप पर कोई अहसास नहीं दिया है मैडम! अपना फर्ज अदा किया है । आप तो पहले ही अपनी जान जोखिम मे डालकर मेरा साथ दे रही हैं । एक ऐसा काम कर रही हैं, जिसके लिये इस मुल्क की जनता आपको कभी नहीं भुला सकेगी ।"

मैं खामोश रही ।

" अगर आपकी तबीयत ठीक हो गई तो आगे का सफ़र शुरु करे ।"

" यस ।"

क्लाइव उठकर आगे बढ़ गया ।

मैंने उसका अनुसरण किया ।

क्लाइव ने घास पर रखा सामान उठाकर बैग में रखा और जैसे दूसरे कंघे पर लटका लिया । मैंने घास पर पडी अपनी गन उठा ली । मैंने देखा, क्लाइव ने वेग में से रम की बोतल निकाली । बोतल लगभग आधी थी ।

उसने बोतल मुंह से लगाई और जितनी पी सकता था पीकर बाकी बची मेरी तरफ बढा दी । मैंने बगैर कुछ कहे बोतल मुंह से लगाई, फिर खाली करके एक तरफ उछालती हुई बोली…"चलो ।"

हमने आगे कदम बढा दिये । . ,

वो उबाऊ, खतरनाक और लम्बा सफर फिर शुरु हो चुका था।

====

====

न्यू

इस वक्त हम जिस रास्ते से गुजर रहे थे, वो दलदल सें भरा रास्ता था । कहीं सूखी समतल जमीन थी तो कहीं दलदली । जगह-जगह लम्बी-लम्बी घास उगी हुई थ्री । उस घड़ी हमारी जरा सी भी असावधानी हमेँ सीधे मौत के मुंह में पहुचा सकती थी ।

क्लाइव आगे था ।

और मैं पीछे ।

अचानक ।

वातावरण में कुतों के भौंकने की आवाज गूंजती चली गई ।

मैं चौंकी ।

मेरे कदमों में ब्रेक लग गये । क्लाइव के पांव भी जमीन से चिपककर रह गये थे । वह गर्दन मोड़कर मेरी तरफ देखता हुआ बोले-आप

शिकारी कुत्तों की आवाज सुन रही हो न मैडम?"

=====÷===
"हां और वे शिकारी हमारी सूघ लेते घूम रहे हैं । सैनिक आसानी से हमारा पीछा छोड़ने वाले नहीं हैं । हमारी तलाश में शिकारी कुत्ते भी छोड़ दिये हैं, अगर कुत्तों ने हमें तलाश कर लिया तो वे हमें चीर फाड़कर रख देंगे ।"

"अब क्या करे ?"

"हमें अपनी रफ्तार बढानी होगी । साथ ही सावधानी भी बरतनी होगी ।" मैंने कहा ।

हम तेजी से आगे बढ़ने लगे ।

मगर फिर भी कुत्तों की आवाजें लगातार हमारे करीब आती जा रही थीं । क्रिसी इन्सान से तो आसानी से निबटा जा सकता था, मगर ये कुत्ते. ?

बहरहाल अब जो भी होगा, देखा जायेगा ।

"अपने चलने की स्पीड बनाये रखो क्लाइव ।" मैंने कहा ।

वह चुप रहा ।

"थक गये लगते हो?" मैं पुन: बोल उठी--- "लाओ, गन और बैग मुझे दे दो है"

" क्यों ?"

" तुम्हारा बोझ हल्का हो जायेगा, । वेसे मुझे एक पैग रम की ज़रूरत है ।"

उसने बैग थमाते हुए फीकी -सी मुस्कान के साथ कहा--" ये नहीं कहतीं कि आपको रम पीनी है ।"

मैंने भी धीमी मुस्कान के साथ बैग खोलकर उसमें से बोतल बरामद की और अनसील्ड करके मुंह से लगा लिया है मैंने जल्दी जल्दी लम्बे घूट भरकर और बोतल वापस रखकर बैग कंधे पर लटका लिया ।

उसी क्षण ।

पता नहीं कैसे अचानक क्लाइव का पैर फिसल गया और वह करीब ही दलदल में जा गिरा ।

मुझे जोरों का झटका लगा ।

मुसीबत पर मुसीबत ।

एक तो कुत्तों के भौंकने की आवाज़ करीब आती जा रहीं थी । ऊपर से क्लाइव का दलदल में गिरना.. ओर अब आलम ये था कि वो जितना भी हाथ-पांव मार रहा था । दलदल में नीचे की तरफ धंसता जा रहा था । क्लाइव दलदल से निकलने के लिये अपनी पूरी ताकत लगा रहा था, लेकिन कामयाब नहीं हो पा रहा था ।

" म. . . मुझे दलदल से बाहर निकाली मैडम !" क्लाइव चीखा ।
'घबराओ मत क्लाइव । मैं तुम्हें निकालने के लिये कुछ करती हु ।!

अब तक वह घुटनों से उपर तक दलदल में धंस चुका था ।

गनीमत इस बात ही थी कि जिस जगह बह दलदल में था । उसके करीब सूखी पथरीली जमीन थी । पलक झपकते ही मैंने गऩ और बैग कंधे से उतारकर जमीन . पर फेका और बला की फुर्ती से मुंह के बल जमीन पर लेट गई, फिर अपना हाथ क्लाइव की तरफ बढाती हुई बोली -"जल्दी से मेरा हाथ थाम लो क्लाइव !"

क्लाइव ने झुककर अपना हाथ मेरे हाथ की तरफ़ बढाया, लेकिन हमारे हाथों के बीच में काफी फासला रह गया था ।

अब तक क्लाइव जांघों तक धंस चुका था ।

उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।

आँखों में खौफ की परछाइयां नाच रहीं थी ।

"मेरा हाथ थामने की कोशिश करों । हिम्मत से काम लो, अगर तुम थोडी कोशिश करोगे तो निश्चित रूप से मेरा हाथ थामने में कामयाब हो जाओगे ।"

क्लाइव अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश कर रहा था, किन्तु उसकी हर कोशिश नाकामयाब हो रही थी ।

इधर मेरा प्रयास जारी था । मैंने अपने दूसरे हाथ की हथेली मजबूती के साथ जमीन पर टिका और थोडा आगे की तरफ सरक गई । अब मेरे बढे हुए हाथ की उंगलियां क्लाइव की उंगलियों को छुने लगी थीं।

"थोडी और कोशिश करों क्लाइव । एक बार मेरा हाथ थाम लो । मैं तुम्हें दलदल से बाहर खींच लूंगी ।"

क्लाइव ने मानो पूरी त्तत्कत लगाकर कोशिश की ।

इधर मेरा प्रयास जारी था । मेरा ओर आगे सरकना मेरे लिये खतरनाक हो सकता था ।

मैं दलदल में गिर सकती थी ।

और काफी प्रयास करने के बाद आखिर कामयाबी मिल हों गई थी क्लाइव ने मजबूती के साथ मेरा हाथ थाम लिया था ।

कुत्तों के भौंकने की आवाजें पुन: मेरे कानों से टकराईं । मुझे ऐसा लगा जैसे वो आबाज ऐन मेरे सिर के पीछे से आई हो ।

मैंने उन आवाजों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया । इस वक्त मेरी पूरी तवब्जो क्लाइव की तरफ थी । मुझे किसी भी कीमत पर उसे दलदल से निकालना था । मैं अपनी समूची ताकत बटोरकर उसे अपनी तरफ खींचने लगी ।

कुत्तों के भौंकने की तेज आवाजें बराबर वातावरण में गूंज रही थी ।
" इस बार मैंने आवाज की दिशा में देखा । मेरी जान सूख गई।

दलदल से उस पार तीन कद्दावर कुत्ते खड़े थे । उनका आकार आम कुत्तों से तीन गुणा अधिक रहा होगा । उनके खुले मुंह से जीभ बाहर लटक रही थी । नुकीले दांत साफ नजर आ रहे थे ओर वे सुखं सुर्ख आंखों से मुझे ही घूर रहे थे ।

उनके देखने का अंदाज बता रहा था कि वे किसी-भी क्षण मेरे ऊपर जम्प लगा सकते थे ।

मेरा दिमाग घूमकर रह गया । मैं समझ नहीं पाई कि क्या करू ?

मैं पहले क्लाइव को दलदल से बाहर निकालूं अथवा उन कुतों से निबटू जो साक्षात् मौत बने मुझे घूर रहे थे । क्लाइव का हाथ छोड़ने का सवाल ही नहीं था । कठिन मेहनत के बावजूद उसका हाथ मेरे हाथ में आया था ।

अगर मैंने उसका हाथ छोड़ दिया तो वह शर्तिया दलदल में समा जायेगा ।

वे क्षण बड़े ही तनावपूर्ण थे ।

मेरी निगाहें कुतों पर जमी हुई थीं और मैं क्लाइव को अपनी तरफ खींच रहीँ थी । मैंने कुत्तों का इरादा भांपकर एक हाथ से अपने करीब पड़ी गन उठा ली थी ।

इस क्षण मुझ जैसी युवती भी हिलकर रह गई थी ।

सहसा!

एक कुत्ता मुंह से खौफ़नाक गुर्राहट निकालता हुआ मेरे ऊपर छलाग लगा गया ।

तभी ।

मैंने गन कन्धे से लगाकर लीवर खींच दिया । ‘तड़. . .तड़. . .रेट. .रेट. . .

गन से दर्जनभर गोलियां निकलकर हाथ में लहराते कुत्ते पर झपर्टी ।

निशाना अचूक था ।

गोलियों कुत्ते के जिस्म में धंसी ओर वह दिल दहला देने वाली गुर्राहट के साथ दलदल में गिरा और भीतर समाता चला गया ।

कुत्ते की कब्र दलदल में बन चुकी थी ।

क्लाइव की निगाहें भी कुत्तों पर जमी थीं ।

"न जाने किस नस्ल के आदमखोर कुत्ते है मैडम।" क्लाइव ने कहा---"मुझे जल्दी निकालिये । मुझे लगता है कि वे दोनों भी आप पर झपट पड़ने बाले हैं । आपको चीर-फाड़ कर रख देंगे ।
"तुम फिक्र मत करों क्लाइव ।"मैं उसे बदस्तूर अपनी तरफ खींचती हुई बोली--"' इन्होंने मुझ पर झपटने की गलती की तो इनका भी पहले कुत्ते जैसा परिणाम होगा ।"

मेरी निगाहें क्षण भर के लिये भी उन पर से नहीं हटी थीं । मैं जानती थी वे कुत्ते किसी भी सेकण्ड मेरे ऊपर जम्प लगा सकते थे । अब तक मैं क्लाइव को काफी हद तक दलदल से बाहर तक खींच लेने में कामयाब हो चुकी थी, लेकिन मैंने उसका हाथ नहीं छोडा था । वह फिर दलदल में धंस सकता था ।

" फिर भी सावधानी बरतर्नी जरूरी है मैडम ! वे अपने साथी का हाल देखकर आप पर गुस्सा खाये हुए हैं ।"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया ।

सहसा दोनों कुत्ते तीर की तरह मेरी तरफ झपटे ।

मैंने गन सीधी की तो हढ़बड़ाहट में क्लाइव का हाथ मेरे हाथ से छूट गया ।

मै सन्न रह गई ।

'उधर कुत्ते मेरे काफी करीब आ चुके थे । वे किसी भी क्षण मुझे दबोच सकते थे । उधर क्लाइव फिर दलदल में धंसा जा रहा था ।

मेरे मेहरबान दोस्त जानते हैं कि कैसी भी विषम परिस्थितियों क्यों न हों, में अपना धैर्य नहीं छोड़ती । उल्टा मेरी हिम्मत और हौंसला कई गुणा बढ जाता है ।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - रीमा भारती सीरीज

Post by Jemsbond » 17 Sep 2017 20:22

इस समय भी ऐसा ही हुआ था । क्षण भर के लिये मेरा ध्यान कुत्तो पर से हटा और बिजली जैसी गति से मैंने दोबारा क्लाइव का हाथ थाम लिया, फिर मैंने कुत्तों की तरफ देखा ।

वे एकदम मेरे करीब आचुके थे ।

बस ।

मेरी गन गरज उठी ।

'तड़. .तड़. . .रेट. . .रेट. . . ।'

उनमें से एक कुता अपना गोलियों से छलनी जिस्म लिये पीछे की तरफ़ उलट गया । दूसरा कुता बड़ा ही फुर्तीला निकला था ।

वह दूसरी तरफ जाय लगा गया था ।

इस बीच मैं क्लऱइव को दलदल से बाहर खींच चुकी थी ।

वह सूखी पथरीली जमीन पर पड़ा लम्बी-लम्बी सांसें ले रहा था ।

आखिर उसे मौत के मुंह से बचा तिया था ।

तभी कुत्ता भयानक अंदाज में भौंकता हुआ दोबारा मेरे ऊपर झपटा ।

जवाब में मेरी गन से निकली गोलियों उस पर झपटीं । उसके जिन्दा बचने का सवाल ही नहीं था ।

तीसरा कुता भी देर हो गया था ।
मैंने छुटकारे की सांस ली ।

"क्लाइव ।" मैंने कहा ।

"यस मैडम ।"

"इन कुत्तों के पीछे सैनिक भी अवश्य होंगे ।" मैं एक झटके से उठकर खडी होती हुईं बोली-- "उन्होंने गोलियों चलने की आवाज सुन ली होंगी । इससे पहले कि वे यहां पहुंचे, हमें जल्दी से कहीँ छिप जाना चाहिये !"

"ओ०के० ।" कहने के साथ ही क्लाइव एक झटके से-उठकर खडा हो गया । उसने झपटकर पास पडी अपनी गन उठा ली ।

सहसा भारी बूटों क्रो आवाज वातावरण में गूंजती चली गई ।

"आपने ठीक कहा था मैडम ।" क्लाइव बोल उठा--" आवाज सैनिकों के बूटों की है, वे इसी तरफ आ रहे हैं ।"

इस बीच मैं छिपने की जगह देख चुकी थी । करीब ही कई. विशाल पेड़ आपस में सिर जोडे खडे थे । उन पेडों के तनों के पीछे छिपने से अच्छी दूसरी जगह और नहीं भी सकती थी ।

मैंने वेग कंघे पर लटकाया और फिर पेडों की तरफ दौड लगाती हुई बोली…"आओ क्लाइव्र?"

क्लाइव मेरे पीछे भागा ।

शीघ्र ही हम एक पेड़ के विशाल तने के पीछे छिपे खडे थे ।

निगाहें उसी तरफ थीं, जिस तरफ से बूटों की आवाजें आ रहो ।

हमें ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा था ।

सामने से तीन सेनिक भागते दिखाई दिये । उन्होंने अपने हाथों में कुत्तों की जंजीरें थाम रखी थी ।

उनकी निगाहें चारों तरफ रही थीं ।

" यहां तो कोई दिखाई नहीँ दे रहा है ।" एक बोला ।

"जरूर वे आसपास कहीं छिपे होंगे ।" दूसरे ने कहा…"उन्हें तलाश करो ।"

अब वे दलदल के करीब पहुचे ।

"ल. . . लेकिन न तो कुत्ते ही दिखाई दे रहे हैं और न ही उनके भौंकने की आवाज ही सुनाई दे रहीं है ।" पहले वाला सैनिक चकराया-सा बोला ।

. "व....वो देखी ।" दूसरे सैनिकों ने कुतों की लाशों की तरफ संकेत क्रिया--"कुत्तों की लाशें पडी है ।"
"तो वे गोलियां कुत्तों पर चलाई गई थीं ।" दूसरे ने कहा…"उन दोनों की हालत भी कुत्तों जैसी ही कर दो ।"

"उनकी हालत तो ऐसी कर देगे, लेकिन वे मिले तब ना ।" तीसरा बोला-"वे किसी ऐसी जगह छिपे हुए हैं, जहाँ हमारी निगाहें नहीं जा सकतीं ।"

"ये जरूरी तो नहीं है कि वे कहीं छिपे हुए हों ये भी तो हो सकता है कि वे आगे निकल गये हों ।"

"ये देखो कीचड से बने पेरों के निशान ।" पहले ने कहा--- " वे सामने वाले पेडों की तरफ गये हैं । निशान बता रहे हैं ।"

वे निशान क्लाइव के बूटों के थे ।

"जरूर उनमें से एक दलदलल में फस गया था । ये निशान उसी के बूटों के हैं । आओ, इन निशानो के पीछे चलते हैं ।"

तीनों पेडों की तरफ बढे । उन्हें क्या मालूम था कि हम उनके लिये मौत बने एक पेड़ के तने के पीछे छिपे खंड़े हें । मैं उन्हे कुछ करने का मौका नहीं देने चाहती थी । मैं फुर्ती से तने के पीछे से निकलकर उनके सामने आ गई ।

".व .वो रही ।" उनकी निगाहें मुझ पर पडी तो एंक ठिठकता हुआ बोला ।

"देखते क्या हो?" दूसरा अपना हाथ कंधे पर लटकी गन की तरफ बढाता हुआ बोला--"भून डालो ।"

किन्तु इससे पहले कि वे कोई हरकत कर पाते वातावरण में गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी ।

"त्तड़.. .तढ़. . .रेट. . .रेट... . ये गोलियां क्लाइव की गन से निक्ली थीं । उन्हट्रे गर दबाने का मौका ही नहीं मिला था ।

सैनिकों की हौंलनाक चीखो से वातावरण का कलेजा थर्रा उठा था ।

तीनों गोलियों खाकर कटे पेड़ की तरह धड़ाम् से नीचे गिरे और ठण्डे हो गये । मैंने गर्दन मोड़कर पीछे देखा ।

पीछे हाथों में गन सम्भाले क्लाइव खड़ा था । पत्थर की तरह कठोर पढ़ गये चेहरे पर कहर नाच रहा था । आखों से मानो अंगारे बरस रहे थे और जबड़े एक-दूसरे पर जमकर सख्ती से फसे हुए ये । वह सैनिकों की लाशों को घूर रहा था ।
इन सैनिकों की लाशों को भी छलनी करने का इरादा रखते हो क्या ?" मैंने उसके चेहरे पर निगाहें टिकाते हुए पूछा !!

" इरादा तो यहीँ है ।"

"गोलियों बेकार करने से क्या फायदा?" मैंने कहा… " हमारे ' पास तो गोलियों की वेसे ही कमी है ।"

क्लाइव ने गन अपने कंघे पर लटकाई ओर पलटता हुआ बोला-"आइये मेडम ।"

मैं उसके पीछे चल पड्री ।

=====

=====
सहसा हमारे कदमों में ब्रेक लग गये ।

वजह ।

एक उफनती नदीं ने हमारा रास्ता रोक लिया था 1 उस नदीं का स्वच्छ पानी तेजी से वह रहा था । उसके बीच-बीच मेँ पेढ़-पौघे ओर छोटी-बडी चट्टानें दिखाई रही थीं ।

नदी पर पुल नहीं था ।

हम नदी के किनारे ख़ड़े थे । किनारों के दोनों और जगह-जगह धनी झाड्रियां मौजूद थीं ।

"नदी अधिक गहरी तो नहीं है ।" मैंने पूछा ।

"लगती तो नहीं है ।"

"पार कर लोगे?"

" "क्यों नहीं:; ?" क्लाइव ने उत्तर दिया--"अगर तैरने की ज़रूरत' पडी तो मैं तेर भी सकता हू। मैं एक अच्छा तैराक हूं।"

"पहले अपना लिया ठीक कऱ लो । उसके बाद नदी पार करेंगे । तुम्हारे कपड़े जिस्म क्रीचड में लथपथ हैं । पहले नहा तो । उसके बाद वेग से कपड़े निकाल पहन तो । सारी थकान दूर हो जायेगी ।"

"आपका कहना ठीक है ।" उसने कहा…"क्या आप भी नहाएंगी?"

"इरादा तो है ।"

. "फिर तो मुझे झाडियों के उस पार चट्टान के पीछे जाकर नहाना पड़ेगा ।"

"क्यों?"

"आप जो यहाँ नहाएंगी ।"

" अजीब' आदमी हो तुम ?" मैंने कहा --" तुम तो लडकियों की तरह शरमा रहे हो, जबकि शरमाना तो मुझे चाहिए । लेकिन मैं शरमा नहीं रही हूँ । मुझे तुम्हारे सामने नहाने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं होगी । जल्दी से कपड़े उतारकर नहाओ ।"
क्लाइव ने कीचड में सने कपड़े उतार दिये ।

अब यह सिर्फ अण्डरवियर में था ।

वह नदी में उतरकर नहाने लगा ।

मैं भी नहाने के मूड में थी । अत मैंने कंधे से गन और बैग उतारकर किनारे पर रख दिया, फिर एक-एक करके अपने कपड़े उतारने लगी । क्लाइव नहाने मे व्यस्त था । पलभर बाद ही क्लाइव के सामने मेरा निर्वस्त्र जिस्म था ।

मखमली.. -हाह्मकारी जिस्म । जिसकी सिर्फ एक झलक ही किसी को दीवाना वना देने के लिये काफी होती है ।

मेरे यौवन क्लश किसी भी बालिग मर्द को नन्हा-सा बच्चा बनने पर मजबूर कर देते हैं । मेने होठों पर दिलकश मुस्कान सजाये क्लाइव की तरफ देखा । किन्तु अगले ही पल मैं हैरत में रह गई । क्योंकि मेंने क्लाइव के चेहरे पर क्रिसी तरह का ऐसा कोई भाव नहीं देखा था, जिससे लगता कि मेरे नग्न सौन्दर्य का उस पर कोई विशेष प्रभाव पड़ा है ।

न जाने किस मिट्टी का वना हुआ था कमबख्त ।

वह इत्मीनान से नहा रहा था, उसने तो अपनी निगाहें भी मेरी तरफ़ से हटा ली थीं ।

इस वक्त मेरा अचूक हथियार मैदाने-जंग में था ।

जिससे आज तक कोई नहीं बच सका ।

अगर एक बार कोई मेरा निर्वस्त्र जिस्म देख ले तो मुझे हासिल करने के लिये पागल हो उठे, लेकिन , क्लाइव पर तो किसी भी तरह का असर नहीं हुआ था ।

"क्लाइव ।" मैंने जानबूझ का उसे पुकारा ।

"यस मैडम.:" वह बोला तो जरुर, क्रिन्तु उसने मेरी तरफ देखना गवारा नहीं किया था ।

"तुम किस मिट्टी के बने हुएं हो क्लाइव डियर !" मैंने क्लाइव को कुरेदा ।

" जिस मिट्टी की आप बनी हुई हैं ।"

"गलत कह रहे हो तुम अगर तुम उस मिट्टी के बने हुए होते, जिसकी मैं बनी हु, तो तुम मुझे निर्वस्त्र देखकर तुम्हारे ऊपर अवश्य असर पडता । मुझे तो ऐसा लगता है कि तुम्हें बनाने में ऊपर वाले ने किसी दूसरो मिट्टी का इस्तेमाल क्रिया है ।"

"आप जल्दी से नहा लीजिये मेडम ।" वह बोला---हमेँ आगे का सफर शुरू करना है ।"

उसी क्षण! !
छपाक् ।

मैं नदीं में जम्प लगा गई थी ।

ठण्डे पानी से मेरे जिस्म को राहत पहुची । मैं पानी में डुबकी लगाकर किसी मछली की तरह दूर निकल गई । "

मैंने पानी से बाहर सिर निकाला । मेरे करीब ही अब तक क्लाइव भी वहां पहुच चुका था ।

मैं क्लाइव के साथ नदी में काफी समय तक तैरती रही व ठंडक का आनन्द लेती रहीं । फिर नदी से बाहर निकल आई और . क़पड़े पहनने लगी । क्लाइव ने बैग खोलकर सेनिक के कपड़े निकाले और पहन लिये । कपड़े उसके जिस्म पर इस तरह फिट जाये थे । जैसे -उसीके नाप बनाये गये हों, .।

तब तक मैं भी कपड़े पहन चुकी थी । हमने गन कन्धों पर लटकाई और नदी में उतरकर आगे बढने लगे । हमने आधी नदीं तो आराम से पार का ली, लेकिन आधी पार करना कठिन लगने लगा था । हम बहीं कठिनाई से चल पा

रहे थे । क्योंकि पानी का तीव्र बहाव बार-वार हमारे कदमों को उखाड़ देता था ।

हम मुश्किल से नदी पार करके दूसरे किनारे पर पहुचे ।

====

====
हमारा आगे बढ़ना जारी था ।

"अभी हमें कितना और चलना पडेगा क्लाइव ।" अचानक मैंने पूछा ।

" सामने वाले इस जंगल कों पार करने के बाद हमारी मंजिल आ जायेगी ।" बह बोला ।

"जंगल कितना लम्बा है?"

" इस बारे में मैं निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कह सकता ।"

मैंने आगे कुछ नहीं कहा ।

कुछ देर बाद हम जंगल में दाखिल हौं गये थे ।

जंगल घना था । पेडों की सघनता ने वातावरण को और भी डराचंना तथा रहस्यमय बना दिया था । हमारे बूटों से दबकर जमीन पर बिखेरे सूखे पत्ते अजीब-सी आवाज पैदा कर रहे थे ।

कहींन्कहीं तो जंगल इतना घना था कि दिन में भी अंधेरी रात जैसा आभास होने लगंता था । किसी किसी पेड़ के तने पर तो विशालकाय अजगर लिपटे हुए थे । इसलिये हमें बडी सावधानी के साथ आगे बढ़ना पड़ रहा था । बीच बीच में जंगली जानवरों की भयानक आवाजें वातावरण को थर्राकर रख देती थीं ।
दूसरी तरफ जंगल था कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था । यह तो सुरसा के मुंह की तरह फैलता ही जा रहा था ।

कई घन्टे चलने के बाद जंगल का सिलसिला खत्म हुआ । हमने जंगल से बाहर निकलने की जल्दबाजी नहीं की थी । हो सकता था कि जंगल के उस पार कोई खतरा हो ।

मैंने तनिक चेहरा निकालकर दूसरी तरफ़ देखा । सामने दूर तक खुली ऊबड़-खाबड़ जगह थी ।

जगह-जगह ऊचे-नीचे मिट्टी के टीले नजर आ रहे थे । कहीं-कहीं घनी झाडियों थीं ।

कहीं-कहीं छोटे-मोटे पेड़ खड़े थे । किन्तु फिलहाल मुझे कोई खतरा नजर नहीं आया धा । .

"सब कुछ ठीक है मैंडम ।" क्लाइव ने पूछा ।

"फिलहाल तो सब ठीक ही लग रहा है । किसी तरह का खतरा नजर नहीं आ रहा।"

"तो फिर बाहर निकलो ।"

हम जंगल से बाहर निकलकर आगे बढ़ने लगे । क्लाइव इधर-उधर देखता हुआ आगे बढ़ रहा था । ऐसा लग रहा था, जैसे बह कुछ तलाश कर रहा हो । मैंने उसे टोकना उचित नहीं समझा था । उसके देखने का अंदाज बता रहा था कि मंजिल करीब है ।

तकरीबन तीस मिनट तक पुन: आगे बढने का सिलसिला चलता रहा । तत्पश्चात् क्लाइव के पैरों में ब्रेक लगे थे ।

मैं भी रुक गई थी ।

उस जगह एक दूटा फूटा मकान बना हुआ था, जो पूरी तरह है उज़ड़ा हुआ नजर आरहा था ।

मकान के सामने जमीन के ऊपर सूखी घास और पतियों फैली थीं । क्लाइव ने एक सतर्क निगाह चहुं ओर घुमाई, फिर नीचे घास और सूखी पतियों एक तरफ हटाने लगा ।

देखते-ही-देखते वहां लकडी का एक चकोर तख्ता नजर आने लगा । क्लाइव ने तो तख्ता ढवकन की तरह ऊपर उठा दिया ।

तख्ते के नीचे उसी अनुपात का एक चकोर गड्डा था । वहां से एक रास्ता नीचे चला गया था । रास्ता तंग था । उसमें एक समय में एक आदमी ही कठिनाई ते गुजर सकता था ।

क्लाइव गड्डे से उतर गया, फिर उसृ तंग रास्ते में आगे जड़ता हुआ बोला--"

"आईये मेडम "

मैं गड्डे में उतरकर उसका अनुसरण करने लगी ।

अब मेरी समझ में आ गया था कि सर एडलॉफ यहीं छिपा हुआ है ।
वाकई उसने अपने छिपने के लिये एक सुरक्षित जगह चुनी थी । उस जगह क्रो देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था कि उसके भीतर कोई छिपा भी हो सकता है ।

मैं खामोशी के साथ क्लाइव के पीछे चलती रही । मैंने उससे कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं समझी थी ।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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