हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - complete

Jemsbond
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Re: हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - रीमा भारती सीरीज

Post by Jemsbond » 27 Jul 2017 08:51

वह चुप रहा । लेकिन उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि मुझे लेकर उसके दिमाग में कहीं-न-कहीं कुछ जरुर चल रहा है । अब कार शहर में दाखिल हो चुकी थी ।

"बस यहीं रोक दो ।"

किग्ले ने कार सडक के किनारे रोक दी ।

मैं अपनी खिड़की खोलकर नीचे उतरी, फिर दरवाजा बँद करती हुई बोली--"आपका बहुत्-वहुत शुक्रिया मिस्टर र्किग्ले ।"

वह धीरे से सिर हिलाकर रह गया ।

मैंने उसके चेहरे के भावों से साफ-साफ महसूस किया था कि वह अभी तक भी अपने सोचों के दायरे से बाहर नहीं निकल पाया था । मैं शर्तं लगाकर कह सकती थी कि मैंने अपने बारे में किंग्ले को जो कुछ बताया था । वो अब उसके गले से नीचे नहीं उतर रहा था ।

और फिर . , …

उसके यहाँ से रुख्सत होने तक मैं वहीं खडी रही । तदुपरान्त मैंने किसी पी०सी०ओ० की तलाश में दायें-बायेँ नजरे घुमाई । सडक के दाई तरफ चंद मीटर के फासले पर मुझे एक पी०सी०ओ० नजर आया, जिसके कांचयुक्त स्पिग वाले दरवाजे पर सुर्ख रंग से मैंरीना टेलीकॉम सेन्टर लिखा था ।

मैंने पी०सी०ओ० की तंरफ कदम बढा दिये । सड़क पर कई सेनिक गश्त लगा रहे थे । मैं चेहरे पर से लापरवाह नजर आ रहीं थी, किन्तु मन -ही-मन च वेहद सतर्क थी ।

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कुछ पलो बाद मैं पी०सी०ओ० का दरवाजा धकेलकर भीतर दाखिल हुई । सामने सनमाइक युक्त मेज के पीछे ऐक बीस साल के' आसपास पहुंची बेहद हसीन युवती कुर्सी पर मोजूद थी । मेज के एक तरफ दो अधेड़ व्यक्ति थे । उनमें से एक कान से रिसीवर चिपकाये फोन पर बात कर रहा था । में मेज के करीब पहुची।"

"यस मैडम?" युवती मुस्कुराई।

"लोकल फोन ।" मैंने कहा ।

"वो सामने ।" उसने लकडी के केबिन की तरफ संकेत किया ।

मैं केबिन की तरफ बढ़ गई ।

अगले पल मैं केबिन में खडी मार्शल के दायें हाथ सोल्जर का नम्बर पुश कर रही थी । म

सम्पर्क स्थापित हुआ ।

"हेलो ।" दूसरी तरफ से मेरे कानों मे कठोर स्वर टकराया ।

" मिस्टर सोल्लर से बात करनी है ।"

" बोल रहा हूं।" लाइन पर स्वर उभरा-"लेकिन तुम कौन हो ?"

अब मेरे लिये अपना असली परिचय देना जरूरी हो गया था क्योकि तभी मैं कामयाबी की मंजिल तक पहुच सकती थी ।

"मेरा नाम रीमा है ।" मैं सावधान स्वर में बोली ।

"कौन रीमा?"

"रीमा भारती ।" मैंने उत्तर दिया--"भारत की जासूसी सस्था आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेंट ।"
लाइन पर खामोशी छा गई ।

जाहिर है कि मेरा परिचय सुनकर सोल्लर को काठ मार गया होगा । उसकी खामोशी इस बात की चुगली खा रहीं थी ।

"क्या हुआ मिस्टर सोल्जर ?" मैंने पूछा ।

दूसरे क्षण सोलजर का चकराया-सा स्वर उभरा---" आप वहीँ रीमा भारती हो, जिसके कारनामें समूचे संसार में गूंजते हैं । जिसे चलती-फिरती मोत भी कहा जाता है ।"

"यानि तुम मुझे जानते हो सोल्जर ?"

"मैं तुम्हें जानता ही नहीं, बल्कि तुम्हारे कारनामो से भी परिचित हूं। ये बात अलग है कि मैंने आज तक तुम्हें देखा नहीं ।"

"बहुत जल्दी तुम मुझे देख भी सकोगे ।" "अच्छा ।"

"यस ।"

"गुड, लेकिन मुझे ये बताओ कि तुम्हें मेरा पर्सनल फोन नम्बर कैसे मिला?" उसका हैरानी भरा स्वर उभरा ।

"आखिर मैं एक जासूस हूं मिस्टर सोज्जर । ये तो मेरे लिये एक छोटी-सी बात है । मैँ तुम्हारी पूरी जन्मपत्री जानती हूं ।"

"खेर, ये बताओ कि तुमने किसलिये फोन क्रिया हूँ?"

"कोई किसी को बेवजह कोन क्यों करेगा । मेरे फोन की भी क्रोईं-न-क्रोई तो वजह जरूर होगी ।"

"मैं वजह जानना चाहता हू !"

"मैं तुम्हें एक धमाकेदार खबर देना चाहती हूं जिसे सुनकर तुम खुशी उछल पडोगे मिस्टर । सोल्जर ।" मैंने कहा ।

" वो ऐसी कौन सी धमाकेदार खबर है?"

"तुम लोग सर ,एडलॉफ़ के समर्थकों के मुखिया क्लाइव को गिरफ्तार करना चाहते हो, लेकिन अभी तक तुम लोग उसकी परछाई को भी नहीं छु पाये हो । क्योंकि तुम्हें नहीं मालूम कि क्लाइव कौंन-से बिल में छुपा हुआ है?"

मेरे इन शब्दों को सुनकर लाइन पर मौजूद सोज्जर निश्चित रूप से 'स्पिंग' बन गया होगा ।

मैं उसे झटके-पर-झटके दिये जा रही थी !

"त. . .तुम इस बारे में कैसे जानती हो?" दूसरी तरफ से सोल्जर का आश्चर्य भरा गहरा स्वर उभरा । इसके अलावा मैं और भी बहुत कुछ जानती हू।"

"और क्या जानती हो तुम?"

"में जानती हूं कि क्लाइव कहां छिपा हुआ है?"

" व.....व्हाट !"

"यस !"

"व. .वो कहा छिपा हुआ है? "

"अभी मेरी बात पूरी नहीँ हुई है सोज्जर डियर । गौर से सुनो, मैं न सिर्फ ये बता सकती हूँ कि; क्लाइव कहां छिपा हुआ है, मैं उसे गिरफ्तार भी करवा सकती हू।"

ये तो मैंने एक बम ही फोड दिया था ।

मेरी इस बात ने सोल्जर र्की खोपडी को फिरकनी की तरह घुमाकर रख दिया होगा ।

इस वक्त उसके चेहरे पर आश्चर्य ओर अविश्वास के ढेरों भाव होंगे, क्योकि मैं एक ऐसा काम करने के लिये कह रही थी, जो उन लोगों के लिये कठिन ही नहीं लगभग असंभव था ।

"य.. .ये तुम क्या का रही हो?"

"मैंने वही कहा है, जो तुमने सुना है ।"

"मुझे विश्वास नहीं हो रहा है ।"

" करना सीखो सोज्जर ।" मैंने ठोस लहजे में कहा-- "जो काम सेना और सेना के बड़े-से-बड़े आफिसर नहीं कर सके । उस काम को मैं कर सकती हूं ।"

"तुम क्लाइव को कब गिरफ्तार करवा सकती हो ?"

" जब तुम चाहों ।"

"ऐसे शुभ काम में देरी नहीं होनी चाहिये ।" उसका बेचैनी भरा स्वर उभरा-" तुम आज किसी वक्त उसे गिरफ्तार करवा दो, अगर तुम क्लाइव को इससे भी जल्दी गिरफ्तार करवा दोगी तो बेहतर होगा ।"

"जरूर करवा दूंगी, लेकिन में कोई भी काम मुफ्त में नहीं करती । मैं तुम लोगों की एक पहाड़ जैसी प्राॅब्लम चुटकियों में ख़त्म कर रही हू । मगर मुझे क्लाइव को गिरफ्तार के बदले क्या मिलेगा ?"

"ताज्जुब है ।"

"किस बात का ?”

"मैंने तो सुना था कि भारती ऐसे किसी काम को करने की एवज में कुछ भी नहीं लेती है !"

"बिल्कुल भी कुछ नहीं लेती थी, लेकिन अब ऐसा करना मेरी मजबूरी है ।"

"ऐसी तुम्हारी क्या मजबूरी है रीमा?"
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Re: हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - रीमा भारती सीरीज

Post by Jemsbond » 06 Aug 2017 09:57

"में खतरों भरे इस खेल से ऊब चुकी हूं सोल्लर, इसलिये काफी अर्से से आई०एस०सी० छोड़ देना थी । अपनी इस

खतरों भरी जिन्दगी से किनारा कर लेना चाहती थी मैं । लेकिन मैं जानती थी, अगर मैंने आई०एस०सी० छोड़ने की कोशिश की तो वे लोग नहीं छोड़ेगे । मैं आ०एस०सी० के इतने राज जानती हूँ की जुबान बंद करने के लिये किसी-न-किसी बहाने मौत के घाट उतार दिया जायेगा । इसलिये मैं मौके की तलाश में थी, और पहला मौका मिलते ही तुम्हारे मुल्क में भाग आई हूं। क्योंकि यहां` के हालात मेरे अनुकूल हैं । आई०एस०सी० चाहकर भी कभी मुझे यहां तलाश नहीं कर पायेगी । फिर यहाँ मैं बागियों से टकरा गई ।कुछ रोज मजबूरी में उनके साथ काम भी किया इसी बजह से मैं

जानती हूं कि क्लाइव कहां है? मगर ये मेरी मंजिल नहीं है सोल्जर । मुझे वहुत ऊचे जाना है । रीमा हमेशा शान से जी है और शान से जीना चाहती है ।"

"तुम्हारा मतलब है कि तुम्हें दौलत चाहिये ।“ सोज्जर का स्वर उभरा-पचास लाख डॉलर ।"

मैं खामोश रहीँ ।

"इस काम की एवज में हम तुम्हें एक करोड डॉलर तक दे., सकते हैं ।"

"मुझे दौलत नहीं चाहिये ।"

"अ. . . अगर तुम्हें दौलत नहीं तो और क्या चाहिये?" उसका स्वर हैरानी से भर उठा।

"इस वक्त न तो मैं आ०एस०सी० की एजेन्ट हूँ और न ही आई०एस०सी० से मेरा किसी तरह का कोई सम्बंध है । इस समय मेरी हैसियत एक मुजरिम जैसी है । दूसरी तरफ क्लाइव को गिरफ्तार करवाकर मैं बागियो से भी पंगा ले लूंगी । वे भी मेरी जान के दुश्मन हो जायेंगे । अत: तुम लोगों को मेरी जिदगी की गारंटी लेनी होगी और मुझे सेना में भी महत्वपूर्ण पद देना होगा । अगर तुम्हें मेरी शर्त मंजूर हो तो बोलो ।"

लाइन पर सन्नाटा छा गया ।

जाहिर था कि सोल्जर मेरी शर्त पर विचार का रहा था ।

अर्थात् मेरी 'स्टोरी' जम रहीं थी । मेरी स्कीम के सफ़ल होने के शत-प्रतिशत चांस नजर आने लगे थे । बो स्कीम, जो इनके साथियों की मुकम्मल बर्बादी का कारण बन जाने वाली थी ।

" किस उलझन में पड़ गये सोल्लर ? " जब खामोशी मुझे खलने लगी तो मैं बोल उठी ।

"तुम्हारी शर्त के बाद मेरा उलझन में पइ जाना स्वाभाविक है रीमा, जो शर्त तुमने रखी है । उसका निर्णय करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है ! इस बात का निर्णय-करने का अधिकार सिर्फ हमारे चीफ मार्शल को है ।"

"लेकिन मैंने सुना है कि तुम मार्शल के दायें हाथ हो ।"

"तुमने ठीक सुना है, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं है कि मैं जो भी फैसला करूंगा, तो मार्शल को कबूल होगा, हाँ, मैं तुम्हारी शर्त मार्शल तक पहुंचा दूंगा,लेकिन वो भी उस वक्त जब तुम क्लाइव को गिरफ्तार करवा दोगी ।"

"फिक्र मत करों सोलजर । क्लाइव को तो मैं गिरफ्तार करवा ही दूंगी ।"

"तो मैं भी तुम्हारी शर्त मार्शल साहब को बता दूंगा ।"

"अगर मार्शले ने मेरौ शर्त न मानी तो. . . ?"

"मुझें उम्मीद है कि तुम्हारी शर्त मान ली जायेगी । तुम्हें निराश नहीं होना पडेगा ।"

"एक बात और सुन लो सोज्जर ।"

"सुनाओ ।"

. "में सच्चे दिल से तुम्हारी मदद कर रही हूँ । मुझे विश्वासघात पसंद नहीं है, अगर मेरे साथ धोखा हुआ तो मैं बर्दाश्त नहीं करूगी ।"

" धोखे की बात अपने दिमाग से निकाल दो । तुम हमारे लिये एक ऐसा काम करने जा रही हो, जिसके लिये सेना एड्री चोटी का जोर लगा चुकी है, लेकिन उसे सफलता हासिल नहीं हुई । इसलिये हमारा धोखा करने का सवाल ही नहीं है ।"

"फिर ठीक है ।" मैंने कहा--"काम तकरीबन चार बजे तुम पांच सात सैनिकों के साथ शहर के बाहर 'वाले खण्डहरों में पहुच जाओ । क्लाइव उन्हीं खण्डहरों में पहुंचेगा ।"

"बेहतरं !"

"सैनिकों की फौज लाने की जरूरत नहीं है, अगर यहां पहुंचकर क्लाइव को तुम लोगों की भनक लग गई तो शिकार हाथ से निकल जायेगा-औरे तुम हाथ मलते रह जाओगे ।" . .

"मैं ऐसा ही करूंगा, लेकिन तुमसे कहां मुलाकात होगी?"

"मैँ तुम्हें खण्डहरों में ही मिलूंगी लेकिन मैंने तो तुम्हें आज तक देखा नहीं है । मैं तुम्हें पहचानूगी कैसे?"

"इस बारे में परेशान की ज़रूरत नहीं है, हालांकि मैंने तुम्हें आज तक देखा नहीं है, लेकिन फिर भी मैं तुम्हें पहचान लूंगा ।"

"ओ०र्के० ।"

"मैं तुम्हारा इंतजार करूँगा ।"

"मैं वक्त से पहले पहुच जाऊंगी ।"

"लेकिन मेरी समझ में एक बात नहीं आ रही है कि तुम क्लाइव को खण्डहरों में बुलावाओगी कैसे?"

" ये मेरी सिरदर्दी है कि मैं क्लाइव को वहाँ कैसे लाती हूं । तुम्हें क्लाइव चाहिये, तो तुम्हें मिल जायेगा । तुम आम खाओ । पेड़ गिनने की कोशिशे मत करै ।"कहकर मैने रिसीवर वापस रखा और केबिन के बाहर निकलकर मेज के करीब पहुंची । मैंने बिल अदा क्रिया और दरबाजे की तरफ पलट गई ।

अब मुझे क्लाइव से सम्पर्क स्थापित करना था । क्लाइव से सिर्फ ट्रांसमीटर पर सम्पर्क स्थापित क्रिया जा सकता था और इसके लिये मुझे एकांत की जरूरत थी ।

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Re: हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - रीमा भारती सीरीज

Post by Jemsbond » 06 Aug 2017 09:57

"भागो ।" मैंने पी०सी०ओ० से बाहर कदम रखा था कि सड़क पर मौजूद लोगों मे से कोई चिंलाया---" सैनिक आ रहे हैं ।"
मेरे पेरों मे व्रेक लग गये।

मैंने देखा ।

उस घड्री यहां से एक छोटा-सा जुलूस गुजर रहा था । करीब दो दर्जन लोग हाथों में तख्तियां उठाये शांतिपूर्ण ढंग से एक तरफ बढे जा रहे थे, किन्तु उन तख्तियों पर सैनिक शासन के-खिलाफ नारे लिखे हुए थे ।

सैनिकों का नाम सुनते ही अचानक उन लोगों के बीच यूं भगदड़ मच गई मानो मधुमक्खियों के छत्ते पर पत्थर मार दिया गया हो । लोग गिरते-पड़ते अपनी जान बचाने के लिये इधर उधर भागने लगे ।।

"अपनी जान बचाओ ।" इस बार दूसरा गला फाड़कर चीखा-""वरना सेनिक सबको गोलियों से भूनकर रख देगे ।

सड़क के दोनों ओर बनी दुकानों के शटर फ़टाफ़ट नीचे गिरने लगे । हर किसी के चेहरे पर खौफ के भाव थे । आंखों में मौत के साये थिरकने लगे थे ।

हालातों को देखते हुए मुझे भी करना था । मैंने तेजी से आसपास निगाहें दौड़ाई, मुझे कोई जगह नजर नहीं आई थी । एक क्षण गंवाये वगैर बला की फुर्ती से एडियों पर घूमी और पी०सी०ओ० का दरवाजा खोलकर वापस भीतर दाखिल हो गई ।

पी०सी०ओ० की मालकिन दौडती हुई दरवाजे के करीब पहुची ।

" आप एक तरफ हटिये मैडम ! दरवाजा लॉक करने दीजिये ।" लह घबराई-सी दरवाजा लॉक करती हुई बोली- सैनिकों का कोई भरोसा नहीं है 1 वे इन जुलूस वालों के चक्कर में पी०सी०ओ० में भी आ सकते हैं । उस स्थिति में हमें गोलियों से भी भून सकते हैं । अक्सर चने के साथ घुन भी पीस जाता है । वे इंसान नहीं, दरिन्दे हैं ।"

. . . इधर युवती ने अपना वाक्य पूरा क्रिया उधर सेना की कई जीपें पी०सी०ओ० के ऐन सामने पहुंचकर रुकीं । अगले क्षण जीपों से ढेर सारे सेनिक धड़ाधड़ नीचे कूद पड़े ।

सभी के पास गर्ने थीं ।

" फायर:" उनमें से एक सेनिक चीखा---" जो भी बागी नजर आये । उसे गोलियों से भून डालो ।"

"तड़. . .त्तड़. . .रेट. . .रेट. . . ।"

आदेश मिलते ही बाकी सैनिकों ने गंनों के मुंह खोल दिये ।

गोलियों की तढ़तड़ाहट के बीच निर्दोषों की चीखे गूंजने लगी थीं ।

भाग रहे लोग गोलियां खा-खाकर सड़क पर ढेर होने लगे ।

"ये तो सरासर अन्याय है ।" न चाहते हुए भी मेरे होठों से निकल गया ।

" अ . . . अन्याय तो है ही ।" मेरी बगल में बैठी युवती थर थर कांपती हुई कह उठी…"लेकिन इस देश में आज अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ कौन उठा सकता है? अगर किसी ने आवाज उठाने की कोशिश की तो उसका यहीँ अंजाम होगा, जो आप देख रही हैं ।" मैंने चुप्पी साध ली ।

सहसा :

धड़ाम ।

एक भयानक विस्फोट से वातावरण का कलेजा थर्रा उठा ।

बम सैनिकों के बीच सड़क पर फटा था ।

और बो बम सढ़क के दूसरी तरफ एक बहुमंजिता इमारत की छत पर से फैंका गया था।

मैंने छत की तरफ देखा था ।

किन्तु मुझे छत पर कोई नजर नहीं आया था ।

इधर विस्फोट इतना जबरदस्त था कि दर्जन भर सैनिकों के जिस्म के चीथड़े उड़ गये थे ।

बचे हुए सैनिक इधर-उधर भागे ।

मुझे अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बम फेकने बाले सर एडलॉफ के समर्थकों के अलावा और कोई नहीं हो सकते थे ।

" बम फेंकने वाले सर एडलॉफ के समर्थक हैं । वे कुत्ते बचकर नहीं जाने चाहियें ।" वातावरण में एक सेनिक का चीखता स्वर गूंजा-" उन हरामजादों को तलाश करों । बम उस इमारत की छत से फेंका गया है । "

पलक झपकते ही आधा दर्जन सेनिक उस बहुमंजिला इमारत की तरफ़ झपटे ।

उसी क्षण ।
इमारत की छत पर से गोलियों की बाढ छुटी ।

त्तड़.. .तड़. ...रेट .…रेट .।।

इमारत कीं तरफ़ बढ़ रहे सैनिक होठों से मर्मातक चीख उगलंते हुए सढ़क पर देर हो गये ।

मैंने देखा, इमारत की छत पर दस-बारह व्यक्ति न्जर आ रहे थे । उनके हाथों में गनें दबी थीं ।

"हमला हो गया है ।" कोई चीखा-" पोजीशन लो ।"

सैनिक इधर-उधर फैल गये और छत की तरफ गोलियां बरसाने लगे । गोलियों का ज़वाब गोलियों से ही दिया जाने लगा ।

पलक झपकते ही बहां युद्ध जैसा दृश्य उत्पन्न हो गया था ।

सर एडलॉंफ के समर्थक सैनिकों पर भारी पड़ने लगे थे । उनके पांव उखड गये थे । वे अपनी जान बचाने के लिये इधर उधर भागने लगे ।

" तुम लोग बचकर नहीं जा सकते !" कोई सैनिक हलक फाड़कर चीखा -"वेहतर होगा कि अपने हथियार फेंककर अपने आपको हमारे हवाले कर दो ।"

"हम मर सकते हैं ।" छत पर मौजूद व्यक्तियों से एक अपनी गन ऊची करता हुआ चीखा-" हमें झुकना कबूल नहीं है ।"

"क्यों बेमौत मरना चाहते हो ? अगर तुम अपने आपको हमारे हवाले कर दोगे तो तुम लोगों की जान बख्शी जा सकती है ।"

"हमेँ अपनी जान की परवाह नहीं है । हम लोग तुम्हारे विदेशी आकाओं को इस मुल्क से खदेड़कर ही दम लेंगे, हमेँ उन लोगों की गुलामी स्वीकार नहीँ है ।"

"बड़े हिम्मत वाले लोग हैं ।" मैं बोल उठी ।

" इनकी हिम्मत ज्यादा देर तक नहीं रह सकती । कुछ देर बाद बेचारों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा । सैनिक मौत बनकर इन लोगों पर टूट पड़ेगे ।" वह युवती हमदर्दी भरे स्वर में बोली ।

मैं चुप हो गई ।

" आप तो इण्डियन-लगती हैं मैडम?" युवती ने विषय बदला ।

" हां !"

"किंग्स्टन में ही रहती हैं ।"

"इण्डिया में ही रहती हू ।" मैंने उत्तर दिया----"चार-पाच दिन पहले ही विंगस्टन आई हू।"

"क्यों ?"

"यहां मेरे एक जान-पहचान वाले रहते हैं । उनसे मिलने आई हूं।"

मैने उससे झूठ बोला ।।
" आपको ऐसे मोहाल में विंगस्टन नहीं आना चाहिये था । यहां आकर आपने अच्छा नहीं क्रिया । आपने अपनी आंखों से देख ही लिया होगा कि जनता पर किस तरह से अत्याचार हो रहे हैं? किसी को भी अपनी जिदगी का एक पल का भरोसा नहीं है ।" एक पल ठहरकर वह पुन बोल उठी----"मेरी राय मानिये कि आज ही आप इण्डिया वापस लौट जाइयेगा । यहां आपकी जिदंगी भी सलामत नहीं है ।"

उधर सैनिकों ने छत पर मौजूद सर एडलाफ के समर्थकों पर जबरदस्त हमला बोल दिया । सर एडलॉफ के समर्थक गोलियां खाखाकर पके आम की तरह टपा-टप सडक पर गिर रहे थे ।

वातावरण में उनकी होलनाक चीखे गूंज रहीँ र्थी ।

इमारत की छत पर चार-पाच समर्थक ही बचे थे । उनकें पांव उखड़ गये थे । वे अपनी जान बचाने के लिये पलटकर भाग खडे हुए ।

उन लोगों के हौसले पस्त होते देखकर सैनिक धड़धडाते हुए उस इमारत में दाखिल हो गये ।

"जो बागी बचे हैं । अब वे भी वेहरमी की मौत मारे जायेगे" ।" युवती ने सर्द सांस छोडी ।

इमारत के भीतर क्या हो रहा था? मेरे देखने का प्रश्न ही नहीं था । अब मुझे सैनिकों के वहां से चले जाने का इंतजार था । इस वक्त मेरा यहां से निकलना खतरनाक हो सकता था ।

मैं बुरी फसी थी ।

वक्त सुस्त रफ्तार से गुजरता जा रहा था ।

मेरी निगाहें इमारत के प्रवेशद्वार पर स्थिर थीं ।

कठिनाई से पाच-सात मिनट ही गुजरे थे कि सैनिक चार आदमियों को घसीटते सड़क पर ले आये ।

"अपने-अपने घरो की खिड़क्रियों से झांककर देखो ।'" एक सैनिक ने यहाँ फैले मरघट जैसे सन्नाटे को भंग किया--" ये हरामजादे हम लोगों से मुकाबला करने आये थे, अब इनका क्या अंजाम होगा?"

उन चारों आदमियों को सैनिकों ने सड़क पर पटक दिया । पलक झपकते ही वे उठ खड़े हुए । परन्तु क्या मजाल जो उनके चेहरों पर घबराहट का एक भी भाव नज़र जा रहा हो ।।

" बोलो किस तरह की मौत मरना चाहते हो तुम लोग ?" दूसरा 'सेनिक भयानक स्वर में बोला ।

"मौत तो मौत ही होती है चाहे वह क्रिसी भी रूप में क्यों न मिले ?"

उनमें से एक बेखौफ स्वर में बोला---"हम लोग शेर जैसी मौत मरना पसंद करेंगे ! लेकिन हम चारों को मारने से तुम लोगों की समस्या का समाधान नहीं हो जायेगा । तुम लोग समझते हो कि हमें मारकर सर एडलॉंफ के समर्थकों का सफाया कर दोगे । तुम लोग समर्थकों को मारते-मारते थक जाओगे, लेकिन वे खत्म नहीं होंगे ।"

" अच्छा ?!

"'हां !"

"एक बात और सुन लो ।'" दूसरा बोला !

"वो क्या?"

"हमें गोलियों से भून डालो । हमें अपनी मौत का डर नहीं है । मौत तो एक-न-एक दिन आनी ही है ।" एकाएक उसका स्वर गम्भीर हो उठा…" लेकिन हमारा ये बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा । ये बहुत जल्दी रंग लायेगा ।"

"इन कुत्तों की बातें सुनना बःद करो ।" वातावरण में आदेश भर्रा कर्कश स्वर गूंजा…" इन्हें गोलियों से भून डालो ।"

आदेश का तुरंत पालन हुआ ।

‘तड़.. .तढ़. ..रेट. ...रेट ।'

उन सैनिकों की गनों ने एक साथ गरजकर उन चारों के जिस्म में अनगिनत झरोखे वना दिये थे । वे कटे पेड़ की तरह सड़क पर गिरे । कुछ क्षण उनके जिस्म फड़फड़ाये, फिर शांत हो गये ।

पलक लपकते ही मेरा चेहरा पत्थर की त्तरह कठोर होता चला गया । जबड़े एक दूसरे पर जमकर सख्ती से कसते चले गये । मगर मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी ।

हालांकि भावुकता से मेरा कोई रिश्ता नहीं है । लेकिन जब मैं किसी निर्दोष पर जुल्म होते हुए देखती हूं तो अपने आपको रोक नहीं पाती । निर्दोष को अपनी आखो के सामने बेरहमी की मौत मरते देखकर मेरा खून खोल उठा था, लेकिन इस वक्त हालात मेरे विपरीत थे ।

युवती आँखें बंद किये खडी थी कदाचित उसमें इतना हौंसला नहीं था कि उन आदमियों को मौत के मुंह में जाते हुए देख सकती ।

"द. दरिंदों ने चारों समर्थकों को बेरहमी की मौत मार डाला ।" उसने धीरे-धीरे आँखे खोली, फिर कंपकंपाते स्वर में बोली"-'न जाने बेरहमी का ये सिलसिला कब खत्म होगा? कब तक औरतों की मांग उजडती रहेंगी? मासूम बच्चे अनाथ होते रहेंगे? कब तक मासूमों और निंदोंष लोगों की जाने ली जाती रहेंगी ।"

मैं गहरी सांस लेकर रह गई ।

देखते-ही-देखते सैनिक जीपों में सवार होकर लोट गये । वे अपने पीछे छोड़ गये थे एक ऐसा मंजर, जिसे देखकर ही दिल कांप उठता था ।

"लॉक खोलो ।" मैंने युवती से कहा-"सैनिक चले गये ।"

"फिर भी अभी खतरा टला नहीं है मैडम ।" युवती बोली--" लाशें उठाने के लिये क्रिसी भी क्षण सैनिक यहाँ पहुच सकते हैं, अगरं उन्हें सड़क पर कोई भी नजर आया तो वे उसे नहीं बखशेगे । जब तक सब कुछ पहले जैसा नहीं हो जाता तब तक आपका बाहर निकलना ठीक नहीं होगा ।"

मैं रिस्क लेने के मूड में नहीं थी ।

मुझे युवती की बात माननी पडी ।

" ल. . . लेकिन ये भी तो पता नहीं है कि सेनिक कब तक यहीं के पहुंचेंगे?" मैंने कहा ।

. "इस बारे भी में कुछ नहीं कह सकती ।"

मेरे सामने एक समस्या आ खडी हुई थी । मेरे पास वक्त का तोड़ा था । पहले मुझे क्लाइव से सम्पर्क स्थापित करना था । उसके बाद खण्डहरों में पहुंचना था ।

एकाएक क्षण मुझे सालों के बराबर लग रहा था । लेकिन मेरे सामने उस वक्त तक रुके रहने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था जब तक सब कुछ पहले जैसा सामान्य नहीं हो जाता ।

फिर मुझे ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा था । कठिनाई से दस मिनट नहीं गुजरे थे कि सेना की कई गाडियां तेजी से पी०सी०ओ० के आकर रुकीं । दूसरे क्षण उनमें से सैनिक धड़ाधड़ नीचे कूदने लगे । देखते-ही-देखते वे मानव अंग और लाशो को उठाकर गाडियों में लादने लगे । उंनका अंदाज कुछ ऐसा था मानो बे सब इंसान नहीं बल्कि मेरे हुए जानवर हों ।

' कुछ देर बाद गाडियां चली गई ।

आधे घंटे बाद सब कुछ सामान्य हो गया था । कोई कह नहीं सकता था कि कुछ देर पहले यहाँ मौत का नंगा नाच हुआ था ।

"अब तो लॉक खोल दो ।" मैंने युवती से कहा ।

युवती ने तुंरत लॉक खोल दिया ।

एक क्षण गंवाये बगैर मैं दरवाजा धकेल कर तीर की तरह बाहर निकली और एक तरफ बढती, चली गई ।

मैं शहर के बाहर एकांत जगह पर एक मिट्टी के टीले के पीछे पहुचकर ठिठकी ।

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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Jemsbond
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Re: हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - रीमा भारती सीरीज

Post by Jemsbond » 06 Aug 2017 09:58

दूर-दूर तक खुली जगह थी । चारों तरफ सन्नाटे का साम्राज्य स्थपित था । मुझे यहां चिडिया का बच्चा तक नजर नहीं आया था । संतुष्ट होकर अपने दायें पैर के सेण्डिल की एडी को ढक्कन्न की तरह खोला, उस रिक्त स्थान में छोटा-सा शक्तिशाली ट्रांसमीटर मौजूद था ।

ये यही ट्रांसमीटर था, जो मुझे चलते वक्त क्लाइव ने दिया था । उसने मुझसे कहा था कि अगर किसी मुसीबत में फंस जाऊं तो उससे सम्पर्क स्थापित करूं ।

मैंने एडी से ट्रांसमीटर निकालकर उसे ऑन किया । दूसरे क्षण उसमें से पिक-पिक की हल्की-स्री आवाज निकलने लगी फिर मैं ट्रांसमीटर मुंह के समाने ले जाकर बोली-"हेलो . .टाइगर. . . ।"

कुछ पल बाद स्वर उभरा-"यस ! टाइगर स्पीर्किग ओवर ।"

दूसरी तरफ़ क्लाइव ही था ।

" मुझे पहचाना टाइगर ।"

" टाइगर जिस आवाज को एक बार सुन लेता है ! उसे जिदगी भर नहीं भूलता । तुम सही-सलामत तो हो. . . ओवर. . . ।"

"मैं सही सलामत हू. . .ओवर. . . ।"

"आपने मुझसे सम्पर्क स्थापित क्यों नहीं किया? आपको लेकर पैं बहुत ज्यादा चिंतित था. . .ओवर ।"

"तुम्हारा चिंतित होना स्वाभाविक था टाइगर मैंने तुमसे सम्पर्क स्थापित करने का विचार क्रिया था । लेकिन मुझे वक्त नहीं मिल पाया. . . ओवर ।"

"आप अपने मिशन में कहां तक पहुची हैं. . .।"

"तुम्हारे लिये एक खुशखबरी है टाइगर. . . ।"

"क्या खुशखबरी हे?" दूसरी तरफ से क्लाइव का उत्सुक्ता भरा स्वर उभरा… " मुझे जल्दी से तो खुशखबरी सुनाओ. . .ओवर ।"

"मैंने डगलस के बारे में मालूम कर लिया । उसे बुटैल जेल में नजरबंद करके रखा गया है. . ओवर ।"

"खबर पक्की है ।"

"एकदम पक्की है ।"

"तो डगलस को जेल से छुडाने की तैयारी की जाये ।"

"डगलस को उस जेल से छूड़ाना आसान काम नहीं होगा । जेल के सुरक्षा प्रबंध इतने कडे हैं डगलस के पास कोई परिन्दा भी पर नहीं मार सकता, उस तक पहुंचना मंगल ग्रह तक पहुंचने के बराबर है. . . ओवर ।"

"ओह ।" ट्रांसमीटर पर क्लाइव का गंभीरता भरा स्वर उभरा---"जेल के सुरक्षा प्रबंघ के बारे में मालूम है ....ओवर !"

"मालूम क्यों नहीं है? मालूम करने के बाद ही मैं ऐसा कह रही हू. . . । सुरक्षा प्रबंधों के बारे में सुनकर मेरी खोपडी फिरकनी की तरह नाचकर रह गई थी । ऐसे कड़े सुरक्षा प्रबंधों की जानकारी मिलने के बाद कोई डगलस क्रो जेल से बाहर निकालने की बात सोच भी नहीं सकता...ओवर ।"

"य. . . यानि सुरक्षा प्रबंधों को बेधा नहीँ जा सकता. . . ओवर ।"

"क्यों नहीं बेधा जा सकता । आज तक ऐसे कोई सुरक्षा प्रबंध नहीं बने, जिन्हें बेधा न जा सका हो। बस उन्हें वेधने के लिए तेज दिमाग की जरूरत है. . . ओवर ।"

"ओर वो दिमाग आपके पास है । अब आप ये बताइये कि के है आप मेरे पास कब पहुंच रही हैं? ताकि आगे के प्रोग्राम पर विचार-विमर्श क्रिया जा सकै. . .ओवर ।"

. "इस वक्त मेरा तुम्हारे पास आना सम्भव नहीं । शहर के हालात तुम्हारे सामने हैं । शहर भर में सैनिक तलाश कर रहे हैं । अगर मैंने शहर में कदम रखने का प्रयास किया तो मैं पकडी जाऊंगी. . .ओवर ।"

… "फिर क्या किया जाये ?"

' "तुम शाम के चार बजे तक शहर के बाहर वाले खण्डहरों में पहुच जाओ । मैं तुम्हें वहीं मिलूगी । यहां हम लोग आगे की प्लानिंग पर विचार-विमर्श करेंगे । मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं ऐसा कोई रास्ता निकालूंगी कि डगलस को आसानी से जेल से निकाला जा सके । वही तो हमें बतायेगा कि सर एडलॉंफ कहां छिपा हुआ हे. . . ओवर ।"

"ओ०कें० । मैं चार बजे तक खण्डहरों में पहुंचने की कोशिश करूंगा । आप मेरा इंतजार कीजियेगा । मुझे पहुंचने में थोडी देर भी हो सकती है-ओवर ।"

"मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी ।"

कहकर मैंने ट्रांसमीटर बंद करके यथास्थान रखकर सैण्डिल की एडी को बंद किया, फिर आसपास का मुआयना क्रिया । सब कुछ पहले जैसा ही था । मुझे आसपास किसी भी किस्म का ख़तरा दिखाई नहीं दिया था । मैं संतुष्ट होकर टीले के पीछे से निकलकर सड़क की तरफ बढ़ती चली, गई ।

अब मुझे शहर के बाहर बाले खण्डहरों में पहुचना था ।

मेरी स्कीम का तीसरा चऱण शुरू हो चुका था

=====

=====
आधे घंटे बाद मैं खण्डहरों में थी । यहां तक मैं पैदल ही पहुंचीं थी । रास्ते में मेरे सामने किसी भी किस्म की दिक्कत पेश नहीं आई थी ।

वह विशाल खण्डहर कई किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ था । उसके चारों तरफ थोडे-थोड़े फासले पर लंबे लंबे पेड़ किसी प्रहरी की तरह सिर उठाये खड़े थे ।

चहुं ओर खामोशी ने अपने पांव पसार रखे थे ।

मैंने रिस्टवॉच पर नजर डाली ।

अभी सिर्फ तीन बजकर बीस मिनट हुए थे ।

मैं एकदम चौकक्नी थी । मेरे कान' एरियल बने हुए थे ।

मैं वक्त से काफी पहले ही खण्डहरों में पहुच गई । जबकि मैंने सोल्जर को चार बजे पहुंचने के लिये कहा था । क्लाइव. को भी मैंने चार बजे ही बुलाया था । अब मुझे उन दोनों के पहुचने का इंतजार करना था । मुझे देखना ये था कि दोनों में से कौन पहले पहुंचता है ।

चालीस मिनट गुजारने मुझे चालीस साल गुजारने जैसे लगने लगे थे । मेरे पास वक्त गुजारने के लिये कोई जगह नहीं थी । कहीं और मैं किसी नये लफड़े में र्फस भी सकती थी । अत: मैं वक्त से पहले ही यहीं पहुचे गई थी ।

मैं खाली ही थी।

हथियार के नाम पर मेरे पास एक सुई तक नहीं थी ।

वक्त सुस्त रफ्तार से गुजरता जा रहा था ।

लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था वक्त गुजर नहीं रहा,बल्कि खिसक रहा था । जब किसी का इंतजार किया जाता है तो इंतजार की घंडिया-लंबी हो जाया करती हैं ।

इस वक्त यही मेरे साथ हो रहा था ।

इंतजार करने के साथ-साथ मैं चारों तरफ निगाहें घुमाकर देख लेती थी । किन्तु फिलहाल मुझे उन दोनों में से कोई भी आता दिखाई नहीं दिया था।

खामोशी पूर्ववत् थी ।

ऐसी खामोशी जिसमें मुझे अपने दिल की धड़कने साफ़ सुनाई दे रही थीं ।

सहसा! ।

मैं चोंकी ।
मुझे ऐसा लगा था जैसे कोई दबे पांव मेरे पीछे से चला आ रहा हो । मेरे मेहरबान दोस्त जानते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में मेरे कान एरियल वन जाया करते हैं, जो मामूली से-मामूली-आहट भी सुन लेते है । इस वक्त भी ऐसा ही हुआ था । मैंने पदचाप स्पष्ट सुनी ।

पलक झपकते ही मैं फिरकनी की तरह एडियों पर घूम गई ।

मेरा सन्देह एकदम सहीं साबित हुआ था ।

सामने से एक शख्स ठीक किसी लौमड्री जैसी चाल से मेरी तरफ बढा आ रहा था । मेरी तीक्ष्ण निगाहें उसके जिस्म पर सरसराती चली गई ।

उस शख्स की उम्र पैंतालीस साल के आसपास रही होगी । उसका कद किसी भी तरह से छ: फुट से कम नहीं था । गोरा रंग । मजबूत जिस्म उसके चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता फैली थी और आंखों में जंगली बिल्ली जैसी चमक थी ।

वह हाफ बाजू की सफेद शर्ट और उसी के रंग की पेंट पहने था । उसकी फूली जेब इस बात की चुगली कर रहीँ थी कि उसमें रिवाल्वर मोजूद है, जो किसी भी क्षण उसके हाथ में आ सकती थी ।

"तुम ही रीमा भारती हो ?" उसने मेरे करीब पहुंचकर ठिठक्रत्ते हुए सवाल किया ।

"तुमने ठीक पहचाना।" मैंने उत्तर दिया-और अगर मैं गलती पर नहीं हूं तो तुम सोज्जर हो?"

"यस ।"

मैंने अपनी रिस्टबॉंच पर नजर डाली, फिर निगाहें उसके चेहरे पर टिकाती हुई बोली-" तुम वक्त से पहले आ गये । अभी चार बजने में बीस मिनट बाकी हैं ।"

"ऐसे कामों मे मै वत्त से पहले पहुंचना ही उचित समझता हूं । ताकि सामने बाले को ढंग से परख सकू ।" वह बोला--- "अगर वक्त पर पहुंचता तो तुमसे बात करने का मौका नहीं मिलता । वैसे मैं तुम्हारी नॉलिज के बता दूं कि मैं तुमसे पहले यहाँ पहुच गया था ।"

"अगर तुम मुझसे पहले यहाँ पहुंच गये थे तो मेरे सामने क्यों नहीं आये?" चौंककर पूछा ।
प्रत्युत्तर में सोल्जर धीरे से मुस्कुराकर रह गया । अब उसकी-मुस्कान से ये बात साबित हो गई थी कि सोल्जर -एक चौकस रहने वाला चालाक किस्म का इंसान था । वह मुझसे पहले वहां इसलिए पहुंचा था ताकि देख ले कि कहीं यहीं उसके लिये कोई खतरा तो नहीं । मैं उसे किसी जाल में तो नहीं फंसाने जा रही हूं !"

"तुम आदमी दिलचस्प हो सोल्जर ।…भेरे होठों पर दिलकश मुस्कान उभरी ।

सोल्जर तनिक हड़बड़ाया ।

दरअसल इस वक्त उसकी निगाहें मेरे खुले गले से झांकती मेरी दूधिया चट्टानों की गहराई में झांक रही थी ।

मेरा बो हथियार, जिससे आज तक कोई नहीं बच सका था । फिर भला सोल्जर कैसे बच सकता था? हालांकि उसने तुरंत वहां से अपनी निगाहें हटा ली थीं ।

मेरे होठों पेर फैली मुस्कान गहरी हो उठी थी ।

"अकेले आये हो?" मैँने सवाल किया ।

"लाव-लश्कर के साथ आया हूं !"

मैं अपनी निगाहें चारों तरफ घुमाने के बाद बोली-"लेकिन मुझे दिखाई तो कोई नहीं दे रहा है ।"

"वक्त अने पर तुम्हें सब कुछ दिखाई दे जायेगा । बस इतना जान लो कि मैं पूरी तैयारी के साथ यहां आया हूं।"

"आई सी ।"

"लेकिन अभी तक क्लाइव तो नहीं आया?"

" परेशान होने की जरूरत नहीं मिस्टर सोल्जर । मैंने क्लाइव को यहां पहुचने के लिये चार बजे का वक्त दिया है । वो समय का पांवध है। ववत् पर पहुच जायेगा । अभी चार बजने में दस मिनट बाकी है !"

सोज्जर ने अपनी कलाई पर बधी घडी पर नजर डाली । उसके बाद उसने कुछ नहीं कहा ।

जाहिर था कि उसकी घड़ी में भी चार बजने में दस मिनट बाकी थे ।

" मै तुम्हें एक बात बता देना चाहती हू सोज्जर ।"

" क्या ?"

"क्लाइव बहुत ही ज्यादा चालाक और सतर्क रहने वाला इंसान है । उसे संभालना तुम्हारी सिरदर्दी है, अगर उसे जरा भी भनक लग गई कि उसके लिये यहां कोई जाल बिछाया गया है तो वो छलावे की तरह गायब हो जायेगा । उसके बाद तुम क्लाइव को तलाश करते-करते मर जाओगे, लेकिन उसे तलाश नहीं कर पाओगे ।"
"तुम फिक्र मत करो । उसे भनक भी नहीं लगेगी, और हम लोग उसे आसानी से दबोच लेंगे ।"

"अब मुझे ये बताओ कि मेरी शर्त का क्या हुआ?"

"तुम तो ऐसे कह रही हो । जैसे तुम्हारी शर्त मान लेना मेरे हाथ की बात है । मैं मार्शल साहब का दायां हाथ अवश्य हूं । लेकिन इस तरह के फैसले वे स्वयं करते हैं । मैंने तुम्हारी शर्त साहब को बता दीं है । मुझे उम्मीद है कि तुम्हारी दोनों शर्त मान ली जायेंगी ।"

"सिर्फ तुम्हें उम्मीद है, दावे से नहीं कह सकते?" मैंने कहा----" तुम लोगों के लिये एक ऐसा काम कर रहीँ के जिसे तुम लोग अपनी लाख कोशिशों के बावजूद नहीं कर पाये । इस काम के बदले तो मार्शल साहब को फौरन मेरी शर्त मान लेनी चाहिये थी ।"

"डोंट बी सिली बेबी! तुम्हारी शर्त मान ली जायेंगी, लेकिन पहले मार्शल साहब को क्लाइव के गिरफ्तार होने की खबर तो मिल जाए ।"
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Jemsbond
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Re: हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - रीमा भारती सीरीज

Post by Jemsbond » 06 Aug 2017 09:58

. , इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती, मुझे दूर एक शख्स आता दिखाई दिया । मैंने उसे तुरंत पहचान लिया । क्लाइव था ।

"क्लाइव आ रहा ।" मैं फुसफूसाई--"अब तुम जल्दी से कहीं छिप जाओ और उसके आने का इंतजार करो ।"

सोज्जर ने उस दिशा में देखा, जिस तरफ से क्लाइव आ रहा था । उसका चेहरा हजार बाॅट के बल्ब की, तरह चमक उठा ।

दूसरे क्षण वह कमान से निकले तीर की तरह माग छूटा । और देखत देखते खण्डहरों में कहीं गायब हो गया ।

अब मुझें गायब होना था । मैंने छिपने की तलाश में चारों तरफ नज़रें घूमाई । मेरी घूमती . नज़रें मलबे के ढेर पर स्थिर होकर रह गई ।

मेरे छिपने के लिये उससे बेहत्तर दूसरी कोई जगह नहीं हो सकती थी ।

एक पल खाद मैं मलबे के ढेर के पीछे बैठी क्लाइव के पहुंचने का इंतजार कर रहीँ थी ।

=====

=====

कठिनाई से पांच मिनट भी नहीं गुजर थे कि मेरे कानों से कदमों की आवाज़ टकराई, फिर एक पल गुजरा था कि वो आवाज मलवे के ढेर के करीब आकर गायब हो गोई ।

मैंने ढेर की एक साइड से तनिक चेहरा निकालकर झांका तो मुझे थोडे फांसले पर क्लाइव खड़ा नजर आया । उसकी बेचैन निगाहें . चारों तरफ घूम रही थीं । जाहिर था कि उसे मेरी तलाश थी ।

किन्तु उसे कहां दिखाई देने वाली थी ? मैं तो मलबे के ढेर के पीछे छिपी बैठी थी ।

"मेडम ।" जब मैं क्लाइव को नजर नहीं आई तो उसने मुझे पुकारा ।

जवाब में मैं खामोश रही ।

"रीमा मैडम ।" उसने पुन: हाँक लगाई ।

इस बार भी जवाब नदारद था ।

क्लाइव ने अपनी कलाई पर बंधी घडी पर नजर डाली । साथ ही उसके चेहरे पर उलझन के भाव उभरते चले गये ।

उसी क्षण ।

मैंने खण्डहरों के बीच से सोल्जर को निकलकर क्लाइव की तरफ बढते देखा, उसके हाँथ में लंबी नाल का रिवाल्चर था और रिवाल्वर का रुख क्लाइव की तरफ़-था ।

सोल्जर पर नजर पड़ते ही क्लाइव बुरी तरह उछल पड़ा ।

जाहिर है उसे तो सपने में भी उम्मीद नहीं रही होगी कि यहाँ उसे मेरी जगह सोल्जर के दर्शन होगे ।

फिर इससे पहले कि क्लाइव कोई हरकत कर पाता ।

" तुम चारों तरफ से धिर चुके हो क्लाइव ।" सोल्जर चेतावनी भरे स्वर मे बोला-"क्रोई गलत हरकत मत करना, वरना वो हरकत तुम्हारी जिदगी की आखरी हरकत होगी ।"

फिर भी गजब की फुर्ती का परिचय देते हुए क्लाइव ने अपनी जेब से रिवाल्वर निकाल ही लिया था ।

"गोली चलाने की गलती मत करना क्लाइव वरना बेमौत मारे जाओगे । इस वक्त तुम गोली चलाने की स्थिति में नहीं हो । बेहत्तर यही होगा कि रिवाल्वर फेंक दो ।" वह गुर्राया---"चारों तरफ निगाहें घुमाकर देखो । तुम्हें मालूम हो जायेगा कि इस समय तुम किस पोजीशन में हो?"

क्लाइव ने चारों तरफ़ निगाहें घुमाई । उसके चारों तरफ ढेरों सशस्त्र सेनिक क्रिसी भूत की तरह सेट हो चुके थे और वे मजबूत कदमों से क्लाइव की तरफ़ बढ़ रहे थे । उनका घेरा लगातार कसता जा रहा था । क्लाइव सन्नाटे में रह गया । तभी सोज्जर के रिवाल्वर ने गोली उगती और क्लाइव के हाथ का रिवाल्वर उससे बेवफाई करता हुआ छिटक कर दूर जा गिरा ।

परन्तु मौत को देखकर चींटी भी अपने बचाव में जान की बाजी लगा देती है, क्लाइव तो एक इंसान था । पलक झपकते ही उसने लंबी जम्प लगाई और मलवे के देर के करीब आकर गिरा, फिर रिअ'भ लगे खिलौने की तरह उछलकर खड़ा हुआ और मलवे के ढेर की तरफ भागा और जैसे ही वह मेरे करीब पहुंचा वेसे ही मैँ फुर्ती से उठकर खडी हुई और तीर की तरह आगे बढकर क्लाइव का रास्ता रोक लिया ।

, .क्लाइव के पैरों में ब्रेक लग गये ।

मुझे इस तरह वहाँ पाकर वह बुरी तरह से उछल पड़ा था ।

उसका उछल पड़ना स्वाभाविक भी था । क्लाइव को तो सपने में भी भी ऐसी हरकत की उम्मीद नहीं रही होगी ।

" य . .ये सब क्या है रीमा: ये लोग यहां. . .

।"

"इसका जवाब मैं तुम्हें देता हूँ क्लाइव !'" सोलजर बीच में ही बोल उठा--"' ये है कि रीमा भारती हम लोगों से मिल चुकी है । इसने कुछ शर्तों पर हमसे तुम्हारा सौदा किया है ।"

"य. . .ये झूठ है ।" क्लाइव को तो जैसे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था…"रींमा ऐसा नहीं कर सकती ।"

"ये सच है क्लटइव । उतना ही बड़ा सच, जितना पुरब से सूरज का उदय होना ।" मैंने उत्तर दिया ।

क्लाइव सन्नाटे में रह गया ।

अब तक सैनिक और सोल्जर उसे पूरी तरह घेर चुके थे ।

"गिरफ्तार कर लो इसे ।" मैंने कहा ।

पलक झपकते ही सैनिकों की गने क्लाइव के जिस्म से आ चिपकी ।

"ऊंट अपने आपको वहुत ऊचा समझता है, लेकिन उसे अपनी औकात का उस वक्त पता चलता है जब वह पहाड़ के नीचे पहुंचता है । अब ऊंट पहाड़ के नीचे आया है ।" सोल्जर, क्लाइव को अंगारे बरसाती निगाहों से देखता हुआ गुर्राया-"तुम लोग वहुत उछल-कूद कर चुके हो । सेना को जितना नुकसान पहुचा सकते थे । पहुचा चुके हो क्लाइव । अब और नुकसान नहीं पहुचा सकोगे । तुम सर एडलॉफ के समर्थकों के मुखिया हो । तुम्हारे गिरफ्तार हो जाने की खबर सुनकर सर एडलाॅफ के समर्थकों के हौंसले वेसे ही पस्त हो जायेंगे । उनकी बुलंद आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो जायेगी ।"

क्लाइव बेबसी भरे अंदाज में दांत पीसकर रह गया ।

"तुम्हें तलाश करने के लिये सेना ने दिन-रात एक कर दिया । हर वो जगह छान डाली, जहाँ तुम्हारे छिपे होने की ज़रा भी संभावना हो सकती थी, लेकिन तुम तो न जाने किस बिल में छिपे बैठे थे कि हम तलाश ही नहीं कर पाये ।" वह पुन: बोल उठा…"हमने तो गिरफ्तारी की उम्मीद ही छोड़ दी । लेकिन रीमा भारती ने हमारा काम आसान कर दिया । इसने तुम्हें गिरफ्तार करवाकर हमारी सारी मुश्किलों को आसान कर दिया है । अब तुम हमें बताओगे कि सर एडलॉंफ के समर्थक कहां-कहां छिपे हुए है। विंगस्टन में उनका टिकाना कहां-कहां है?"

"तो ये सब कुछ तुम्हारा किया-धरा है ।" क्लाइव मेरे चेहरे पर निगाहें फिक्स करता हुआ बोता ।

मैंने देखा ।

क्लाइव के चेहरे पर मेरे लिये नफरत-ही-नफरते फैली हुई थी । आखों से चिंगारियां-सी फूट रही थीं ।

"धोखेबाज । मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा तुम एक जहरीली नागिन निकलोगी । मैंने तो पर पहाड़ जितना विश्वास; किया और तुमने मेरी पीठ में छुरा घोप दिया ।" क्लाइव के होठो से नफ़रत का सेलाब फूट निकला----"तुम इन लोगों के हाथों बिक चूकी हो । दौलत के लालच ने अंधा कर दिया । तुमने जो खेल खेला है । उसके लिए गाॅड कभी माफ नहीं बनेगा । इस देश की जनता की बद्दुआएं लगेंगी । तुमने मेरे साथ नहीं, बल्कि इस मुल्क की जनता के साथ विश्वासघात क्रिया है । तुम औरत जाति के नाम पर एक कलंक हो । एक ऐसा कलंक, जिसे कभी र्मिटाया नहीं जा सकता ।"

"तुम्हे ऐसा करने का पूरा अधिकार है क्लाइव । अगर तुम्हारी जगह पर मैं होती तो मैं ऐसा ही कहती ।" मैं मन ही मन बढ़बड़ाइं-"लेकिनं मुझे माफ़ करना दोस्त । मैं ऐसा करने के लिये मजबूर थी, क्योंकि डगलस तक पहुंचने के लिये मेरे पास इसके अलावा दूसरा क्रोईं रास्ता नहीं था ।"

" मैने तो सुना था कि आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेन्ट रीमा भारती ने हमेशा जुल्म के खिलाफ जंग लडी है । निर्दोषों की मदद की है और दोषियों और अत्याचारियों को मोत बांटी है । लेकिन वो सब झूठ निकला।" वह पुन बोल उठा----"कौन कहता है कि रीमा भारती दोस्तों की दोस्त और दुश्मनों के लिये साक्षात् मौत है । इतिहास के जो पन्ने तुम्हारी बहादुरी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा से रंगे पड़े हैं । उन्हें फाड़कर जला देना चाहिए।"

मेरे भीतर अजीब-सा द्धन्द्र चल रहा था ।

सच तो ये था कि क्लाइव के शब्दों ने मुझे भीतर तंक़ हिलाकर रख दिया था ।

" इसे अपनी खुशुक्रिस्मती समझो कि अभी तक तुम मैरे सामने जिंदा खडी हो, अगर मैं आजाद होता तो यहीं तुम्हारी लाश पडी होती । मैं तुम्हें बताता कि मुझसे गद्दारी करने का क्या अंजाम होता है?" वह गुर्रा उठा ।
इस वत्त क्लाइव की हालत घायल शेर जैसी हो रही थी । गुस्से ओर अपमान से उसका चेहरा कनपटियों तक सुलग रहा था । आँखों से मानो आग बरस रही थी ।

" आक थू।" क्लाइव नुफरत से जमीन पर थूकता बोला ----"लानत हैं तुर्म परं रीर्मा जो तुम चंद नोटो की खातिर बिक गई हो । अगर तृम्हें दौलत ही चाहिये थी तो मुझसे कहती । में तुम्हें इतनी दौलत दे सकता था कि तुम्हे जिदगी भर कुछ करने की जरूरत ही नहीँ पडती । तुमने तो दौलत की खातिर अपने देश और डिपार्टमेंट के नाम पर भी कालिख पोत दीं है ।"

"अब ये राग अलापना बंद करो क्लाइव ।" मैंने कहा---"तुम जो कह रहे हो वो बीता हुआ कल था । मैं उस गुज़रे कल को भूल चुकी । वर्तमान की बात करों । इस वक्त वो रीमा तुम्हारें -समने नहीं है जिसकी ईमानदारी, फर्ज और कर्तव्यनिष्ठा की लोग कसमें खाया करते थे । अब मैं बदल चुकी हू। बीते हुए कल का कुछ भी याद करना नहीं चाहती ।"

क्लाइव के चेहरे पर फैले नफ़रत के भाव, गहरे हो उठे ।

"ले चलो इसे ।" सोल्जर सैनिकों को सम्बोधित करता हुआ-आदेशपूर्ण लहजे में बोला ।

" तुम कौन हो?" क्लाइव, सोल्जर की तरफ-घूमा ।

" मै वो शै हूं , जो शीशे से पत्थर को काटता हूँ ।"

"उस शीशे का कोई नाम भी तो होगा ।"

"मेरा नाम सोल्जर है ।"

"सेना में तुम्हारी क्या हैसियत है?"

"मैं सेना प्रमुख मार्शल का दायां हाथ हू। मार्शल का वफादार अदना-सा सेवक ।"

"अर्थात् अगर ये कहा जाये कि तुम मार्शल के पालतू कूते हो तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।"

सोलजर का गुस्सा आसमान छू गया । आँखों से मानो शोले फूट निकले ।

मैं हैरत भरी निगाहों से क्लाइव को देखती रह गई । मुझे आश्चर्य था कि इन हालातों में भी वह इतना कुछ करने का हौंसला कैसे जुटा पाया था?

"मेरा जी तो ये चाहता है कि रिवाल्वर की सारी गोलियों तुम्हारे भेजे मे उतार दूं लेकिन मेरी मजबूरी है कि मैं ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि मार्शल साहब का आदेश है कि तुम्हें जिंदा रखा जाये ।"

"मुझे जिंदा रखना ही पडेगा, अगर तुम लोगों ने मार डाला तो मेरी मौत तुम लोगों के लिये सिरदर्द बन जाएगी।"

"वो कैसे?"

"मेरी मौत की खबर सुनकर सर एडलॉफ के समर्थक पागल हो उठेंगे । वो किसी भी कीमत पर तुम लोगों को जिंदा नहीं छोडेगे क्लाइव ने उत्तर दिया---"तुम क्या समझते हो कि मुझे गिरफ्तार करने के `बाद सर एडाॅलफ के समर्थकों के सीनों में सुलग रही बगावत की आग ठण्डी हो जायेगी, नहीं वो आग और भी तेजी में भडक उठेएगी और उस आग में तुम सब जलकर राख हो जाओगे ।" पलक झपकते ही सोल्जर ने अपना हाथ घुमा दिया ।

चटाख् ।

उसकी चौडी हथेली झंन्नाटेदार थप्पड़ की शक्ल में पड़ी थी ।

क्या मजाल जो क्लग्रइव के होठों से उफ् तक निकली हो ।

उल्टे वह सोल्जर को खूनी निगाहों से घूरकर रह गया ।

"अब तुम्हारी अक्ल ठिकाने आईं है" सोल्जर ने दांत पीसे ।

_ क्लाइव व्यंग से मुस्कराया-"तुम क्या समझते हो कि थप्पड़ मारकर मेरी अक्ल ला दोगे? अगर तुम मेरे जिस्म के दुकड़े-टकड़े भी कर दो । तब भी हर टुकडे से विद्रोह और बगावत गूंज ही सुनाई देगी ।"

. "अच्छा ।" उसके होठों पर व्यंग नाच उठा ।

"मैं तुम्हें हकीकत बता रहा हू ।" वह वोला-"तुम लोगों के पापों का घड़ा भर चुका है । वो जल्दी ही फूटने वाला है ।"

"बहुत बडी-बडी बातें कर रहे हो क्लाइव । शायद तुम भूल रहे हो कि इस वक्त तुम सेना के कब्जे में हो और अब तुम्हारा बचकर निकलना कठिन ही नहीं असंभव है ।" मैं बीच में ही बोल उठी…" बेहतर यही होगा कि अब तुम अपनी मौत का इंतजार करो, जो तुम्हारी जिन्दगी के दरवाजे पर दस्तक दे रही है ।"
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तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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