चीते का दुश्मन complete

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Re: चीते का दुश्मन

Post by 007 » 03 May 2017 17:24

परंतु बेचारा जेम्सबांड ।।


उसका सारा जिस्म क्रोध से कांपकर रह गया। अंदर-ही-अंदर वह कसमसा उठा ।



और टुम्बकटू ने बड़े रोमांटिक स्वर मेँ कहा-“यूं ना देख हसीना मेरा दिल धडकता है ।"



बांड कै क्रोध की ज्वाला में जेसे घी डाल दिया गया हो I


जिस्म का सारा खून उसकी आंखों में सिमट आया I जबड़े एक-दूसरे पर सख्ती के साथ जम गए । कदाचित ऐसी स्थिति जेम्सबांड के जीवन में पहली बार आईं थी ।



हर जासूस बांड की स्थिति अच्छी तरह समझ रहा था । मगर सब विवश थे I कोई कर क्या सकता था? पूरा एक मिनट इस उत्तेजनात्मक स्थिति के कारण गहन संनाटा छा गया, फिर बागारोफ ने इस सन्नाटे को तोडा ।



"अबे बोल दे जो ये हरामजादा कहता है ।"



"गलत बात मत करो बड़े मियां I" टुम्बकटू तुरंत बोला…"बात बोलना अलग बात है । बादा करना अलंग I”



हालांकि बांड उत्तेजना में पागल हुआ जा रहा था किंतु वह एक सफ़ल जासूस था ।

असली जासूस अपना मतलब निकालने के लिए गधे को भी बाप कहने से नहीँ चूकता । इसी सिद्धांत को याद करके बांड ने अपनी उत्तेजना पर काबू पाने का प्रयास करते हुए कहा…"मैं वादा करता हूं।”



“क्या वादा करते हो?” टुम्बकटू ने शरारत के साथ मुस्कराते हुए कहा ।



ऐसा ताव आया बांड को कि वह टुम्बकटू का मुंह नोच ले र्कितु फिर वह अपनी पवित्र भावना का गला घोंटकर बोला…"मैं वादा करता हूं कि आज के बाद मैं रोजाना धनिया और क्लाकंद मिलाकर खाया करूंगा ।"



"गुड I" टुम्बकटू इस प्रकार खुश होता हुआ बोला मानो किसी बच्चे को उसकी इच्छित वस्तु मिल गई हो, बोला-“तो साहबानो, बात ये है कि वह फिल्म विकास प्राप्त कर चुका है । न केवल प्राप्त कर चुका है बल्कि फिल्म के आधार पर मेरे रहस्यों तक पहुचने के लिए रवाना भी हो चुका है I"



"कब?” एक साथ सबके मुंह से यही प्रश्न निकला ।



"परसों रात I” टुम्बकटू ने जवाब दिया ।



बस, उसके बाद पुन: एक बार जासूसों के बीच सन्नाटा छा गया । सब एक…दूसरे की सूरत देखने लगे, अब न तो उन्हें टुम्बकटू से पूछने के लिए कोई अगला प्रश्न ही सूझ रहा था और न ही ये सूझ रहा था क्रि अब वे क्या करें? माइक, बांड और त्वागंली जैसे जासूस तो ये सोचकर ही चकरा रहे थे कि बिकास उनका चीफ बन जाएगा । एकाएक माइक के दिमाग मे कुछ आया, वह टुम्बकटू से मुखातिब हो बोला…“तुम तो उस फिल्म के सारे रहस्य जानते होगे?"

"अगर जनाब से मैँ ये कहूंगा कि मैं नहीं जानता तो मेरा झूठ पकडा जाएगा I” टुम्बकटू ने कहा-""क्योंकि फिल्म ही-मेरी है I”



"तुम वहां तक पहुचने का रास्ता भी जानते होगे?” बांड भी माइक के प्रश्न का मतलब समझकर बोला ।



"इसके जवाब में भी मेरे वही शब्द समझें जो अभी थोडी देर पहले कहे थे I” टुम्बकटू बोला ।



"इसका मतलब तुम वहां का रास्ता जानते हो I” रहमान ने कहा-"तुम्हें हमेँ वो रास्ता बताना होगा l”



"अगर नहीं बताऊंगा तो आप लोग मुझें गोली मार देगे ।" टुम्बकटू बोला-“जब वो साला हमारा बाप वहां पहुच ही रहा है तो आपके ही पहुचने से हमेँ क्या नुकसान होगा । आप लोगों के टकराव से हम भी जरा लुफ्त ले लेंगे l तुम हमें साथ रखो, हम रास्ता बताते रहेगे I”


"यहीं से रास्ता बताओ?" बांड बोला ।



"अभी तक तुमने धनिया और क्लाकंद मिलाकर नहीँ खाया है इसीलिए मेरी बात का मतलब नहीं समझ रहे हो I" टुम्बकटू बोला---" भाई जान, हमारी बात का मतलब ये है कि अगर हमने तुम्हें सही रास्ता बता दिया तो फिर तुम्हें हमारी जरूरत नहीं रहेगी और इस स्थिति में तुम हमारी राम नाम सत्य कर दोगे, लेकिन अगर यात्रा के बीच हम तुम्हारे साथ रहकर रास्ता बताते चलेंगे तो मंजिल तक पहुचने तक तो हम सुरक्षित रहेंगे ही I"



"हम तुमसे वादा करते हैं कि हम तुम्हें छोड देंगे I” माईक ने कहा ।

"आप तो मुझे छोड देगे लेकिन में आपको छोड़ना नही चाहता ।" टुम्बकटू ने कहा'…-'"आप लोगों से कुछ ज्यादा प्यार हो गया है ना इसलिए आपसे विनती है कि आप लोग कृपा करके इस गरीब बच्चे को अपने साथ ही रखिए ।'"



उससे पूछने की हर चंद कोशिश की गई ।



लेकिन सब नाकाम ।।



दुम्बकटू अपनी बात पर ज्यों…का-त्यों जमा हुआ था । सारे जासूस सोच रहे थे कि ये टुम्बकटू क्या वस्तु है? ऐसा दूसरा व्यक्ति जिंदगी में कभी किसी ने नही देखा था । जब टुम्बकटू नहीं माना तो अंत मेँ विवश होकर बागारोफ़ बोला-“अच्छा हमारे बाप. . .तू साथ ही रहियो । अब ये तो बता कि यात्रा के लिए कौन-सा वाहन चाहिए?"



"क्या कह रहे हो बड़े मियां?" टुम्बकटू एकदम बोला-"मेरे बराबर तो तुम्हारे बेटे होंगे...और तुम मुझे बाप कह रहे हो I"



"अब हम समय व्यर्थ करना नहीं चाहते मि. टुम्बकटू. . . ।" कदाचित माईक ने पहली बार उसका नाम लिया…“ज़ल्दी से रास्ता बताओ I"



"रास्ता समुद्री है I” टुम्बकटू ने जवाब दिया…"एक जलपोत का प्रबंध कर लो ।"




इसके बाद जासूसों ने टुम्बकटू से एकाध प्रश्न और किया । टुम्बकटू ने अपनी आदत के अनुसार उनके प्रश्नों का उत्तर अजीब-अजीब ढंग से घुमाकर दिया । अब सभी जासूसों को इस यात्रा पर रवाना होने की जल्दी थी । टुम्बकटू की उसी प्रकार गठरी सी बना दी गई थी । उसे एक कमरे में डाल दिया गया । कमरा बाहर से बंद कर दिया गया और इस काम से फारिग होकर माईक ने बागारोफ से कहा…"चचा, ये तुम्हारा देश है. . .तुम आसानी से जलपोत का प्रबंध कर सकते हो !"



माईक की इस बात से सभी सहमत थे । जलपोत का प्रबंध करने का भार बागारोफ को सौपा गया । बागारोफ प्रबंध करने चला गया । बाकी जासूस वही बैठकर अपनी यात्रा का कार्यक्रम-सा बनाने लगे । तीस मिनट तक उनमें बातें होती रही । उनकी बातों का क्रम एक डॉक्टर ने आकर तोड़ दिया ओर बोला'…""मि. बरगेन शों होश में आ गए हैं I”




सुनते ही जेग्सबांड और माईक खड़े हो गए। बाकी सब वही रह गए और वे दोनों डॉक्टर कै साथ…साथ उस हाल जैसे कमरे से बाहर निकल गए । गैलरी में से होते हुए वे डॉक्टर के साथ एक छोटे-से कमरे में पहुचे । कमरे मेँ एक तरफ़ वेड पर बरगेन शों लेटा हुआ था l उसके जिस्म पर जगह-जगह पट्टियां बंधी हुई थीं ।



"क्या हाल है?” माईक ने उसके समीप पहुंचकर दोस्ताना लहजे मेँ कहा ।


उन्हें देखते ही बरगेन शां ने उठकर बैठने का प्रयास किया, तभी बांड ने आगे बढकर उसे कंधे से पकडकर लिटाते हुए कहा…“लेटे रहो!"



“हाल तो जैसे हैं, सामने हैं I” बरगेन शॉ ने पीड़ा के बावजूद भी मुस्कराने का प्रयास करते हुए कहा"--"ये बताओ कि हुआ क्या?"



जवाब में माईक ने उसे कार के टकराव से लेकर टुम्बकटू से सौदा होने तक की सारी बातें बता दी ।

सुनकर एकदम चौंका बरगेन शॉ, बोला…“तुमने उसे रेशम की डोरी से बांधा है ।"



"बुरी तरह बांध रखा है, किसी भी हालत में नहीं खुल सकता I" जेम्सबांड ने कहा ।




“रेशम की डोरिर्यो को तोड़ने मेँ उसे एक मिनट भी नहीं लगी होगी ।" बरगेन शॉ एकदम बोला ।



“क्या बेवकूफी की बातें कर रहे हो?” एक साथ दोनों बोल पड़े ।



जवाब मे बरगेन शॉ ने उन्हें बताया कि वह ररिसयों से किस प्रकार खुल गया था I




सुनते ही दोनों चौंके और हॉल की ओर भागे। उन्हें बोखलाई-स्री स्थिति में देखकर सारे जासूस चोंक पड़े, किन्तु किसी की तरफ़ ध्यान दिए बिना वे उस कमरे की ओर लपके जिसमें उन्होंने टुम्बकटू को कैद किया था । बडी तेजी के साथ उन्होंने दरवाजा खोला ।



कमरा खाली देखते ही दोनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लर्गी ।
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Re: चीते का दुश्मन

Post by 007 » 03 May 2017 17:26

अन्य जासूस भी सिमटकर उनके पास आ गए । कमरा एकदम खाली था । सभी के चेहरे फक्क पड़ गए ।



जिस रेशम की डोरी से टुम्बकटू को बांधा गया था, उसके दुकड़े कमरे के फ़र्श पर पड़े हुए थे । कुर्सी के पास ही दो कागज भी पड़े हुए थे । बांड ने दूर से ही देख लिया था कि कागजों पर कुछ लिखा हुआ है । सबसे पहले जेम्स बांड ही कमरे मे दाखिल हुआ । उसकी नजर कमरे की नाली पर पडी और बांड समझ गया कि टुम्बकटू उसी में से पार हो गया है।

और अन्य जासूस भी झपटकर उसके पीछे-पीछे कमरे में दाखिल हो गए । बांड ने वो दोनों कागज उठा लिए । एक कागज पर कुछ आडी-तिरछी रेखाएं खिंची हुई यी। दूसरे पर कुछ लिखा था…आडी-तिरछी रेखाओं वाला कागज बांड ने समीप ही खड़े माईक को थमा दिया और दूसरा कागज़ पढने लगा, लिखा था… "मैंरै प्यारे जासूसों । सबसे पहले सुट्टम सुट्टा और उसके बाद ये कि आप लोग मुझे अपने साथ रखना नहीं चाहते थे ना. . इसीलिए मैं जा रहा हूं । लेकिन पिछली धटना से आप लोगों के दिमाग में कुछ गलतफहमियां घुस गई होंगी , उम्हें निकाल देना चाहता हू. ...... . l



पहली तो ये कि आप लोग शायद ये समझ रहे होंगे कि आपने टुम्बकटू को गिरफ्तार करकै उसे बांध के और जिस्म सै दो चार गनै सटा कै अपने प्रश्नों का जवाब लेने कै लिए विवश कर लिया था । मैं आप लोगों से प्रार्थना करता हू कि आप लोग अपने दिमागों से यह गलतफहमी निकाल दें । कम से-कम तुम जैसै मच्छर तो टुम्बकटू की कभी विवश कर नहीं सकते ।



आप लोगों कै हर सवाल का जवाब मैने अपनी योजना के अनुसार ही दिया हैं I अब आप लोग ये जानना चाहेंगे कि वह योजना क्या है? तो साहब लो, सुनो. . आखे, कान नाक, मुंह सब कुछ खोलकर सुनै-योजना ये है कि आप लोगों को भी मैं वहीं पहुचाना चाहता था जहां बिकास हैं क्योंकि मैं जानता हू कि विकास वह सब कुछ प्राप्त कानै की कोशिश करेंगा जो वहाँ है और आप लोग अगर वहां होगें तो निश्चय ही आप उर्स वो सब प्राप्त करने से रोकेंगे । यही काम मेरा है अर्थात् आप मैरे ही काम में सहयोग देंगे ।। इसलिए आप लोगों का वहां पहुचाना मेरै ही हित में हैं ।। बैसे आप लोग केवल उस रोकने का काम नहीं करेंगे बल्कि मैं ये भी जानता हूं कि आप भी वह सब प्राप्त करना चाहेंगे जो मैं किसी को प्राप्त नही होने देना चाहता । लैकिन फिर भी मैं ये जानता हू कि अकेले विकास को सम्भालना तुम सबको एक साथ सम्भालने से कठिन है । आप लोग विकास को वह सब प्राप्त नहीं करने देंगे और बिकास आपकी ऐसा नहीं करने दैगा/ इधर मैं तुम में ने किसी को भी वह वस्तु प्राप्त नही करने दूगा ।

इस सिचुएशन में मजा आएगा ।।



आप लोग भी वहां पहुच सकें इस सहूलियत कै लिए साथ वाले कागज पर वहां तक का नक्शा छोडे जा रहा हूं । ये तो मैं जानता हू कि आप इतनी आसानी से विकास को सबसे बडा जासूस नहीं बननै देंगे ।। आप लोग निश्चित ही इस यात्रा पर रवाना होंगे लेकिन हस बात पर अच्छी तरह गौर फरमा लैना कि मेरा नाम टुम्बकटू है और आप लोग मैरी तरफ बढ रहे हैं ।। मैं आशा नहीं करता कि आप लोग जीवित अवस्था में वापस लौट सकते हैं ।। वैसै ज्यादा क्या लिखुं । आप लोग तो खुद ही काफी समझदार हैं ।।

अगर चाहते हो कि विकास तुम सबका चीफ न बने तो तुरंत नक्शे पर आगे बढ जाओ ।

जैम्सबाड तुम अपना वादा याद रखना I



अच्छा अब सुट्टम सुट्टा ।
टुम्बकटू ।।


जेम्सबांड ने पूरा पत्र पढा और माईक की तरफ़ बढा दिया ।।



फिनिश




"श्रीमान जी…क्या मैं अंदर आ सकता हू?” इस आवाज को सुनकर एयरपोर्ट की इमारत कॅ अंदर में बैठा हुआ एक ओंफिसर चौंक पड़ा। उसके चौकने का मुख्य कारण ये था कि आवाज ऐसी थी मानो पूरी पावर पर चलता हुआ रेडियो अचानक खराब हो गया हो । आवाज सुनते ही एक कागज पर चलता हुआ उसका पैन खुद रुक गया। एक झटके के साथ उसने कमरे के द्धार क्रो ओर देखा र्कितु द्धार एकदम बंद था ।



"वहाँ नहीं श्रीमान जी…बंदा यहां है ।" एक बार पुन: कमरे मेँ वैसी ही आवाज गूंजी ।



एक झटके के साथ आंफिसर की निगाह आवाज की दिशा मे घूम गई । उस समय उसकी आंखों में गहन आश्चर्य झांकने लगा, जब उसने रोशनदान पर एक अजीब-से कार्टून को लटके पाया । अभी वह खुद को सम्भाल भी नहीं पाया था कि कमरे में 'फटाक' की ऐसी आबाज गूंजी जैसे हवा से भरा गुब्बारा एकाएक फट गया हो । अगले ही क्षण उसने देखा-एक गन्ने सरीखा व्यक्ति उसकी मेज के पास इस तरह लहरा रहा था मानो लम्बे…चौड़े खेत में इकलौता गन्ना तेज हवा के कारण हिल रहा हो । -आफिसर की खोपडी चक्करघिन्नी की तरह घूम रही थी ।



“क्या श्रीमान जी, मुझे यहां विराजने की इजाजत देगे?" पुन: वही आवाज आंफिसर के कानों से जहन में उतरती चली गई ।



आँफिसर उसे इस प्रकार देख रहा था मानो वह इस संसार के सबसे बड़े आश्चर्य को अपने सामने देख रहा हो । अपनी हवा में उडती खोपडी पर काबू पाने की चेष्टा करता हुआ बोला…"तुम कौन हो?"



"बंदे का लेबिल टुम्बकटू है ।" कहता हुआ वह इस प्रकार से सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया मानो एकाएक गन्ना तेज हवा के कारण बीच मे से लचककर टूट गया हो ।



आंफिसर की हवा तो वैसे ही खराब हो चुकी थी।



टुम्बकटू का एक लपज भी उसके पल्ले नहीं पड़ा था, फिर भी बोला-“यहां क्यों आए हो?"



“जनाब, एक दरख्वास्त करने I" कहते हुए टुम्बकटू ने अपनी रंग…बिरंगी सिगरेट निकालकर सुलगा ली ।



आफिसर अपने दिमाग पर नियंत्रण करने का प्रयास कर रहा था । उसने ध्यान से देखा, फिर बोला…"क्या?”



"मुझे एक विमान की जरूरत हैं l" टुम्बकटू ने रंगीन धुआं आंफिसर के चेहरे पर मारते हुए कहा I


" विणान । " बुरी तरह चौंककर बोला वह…“क्या मतलब?"



"अगर आप रूसी से ज्यादा किसी अन्य भाषा को समझते हो तो आपको उसमे बता सकता हूं।"



"आप शायद ये नही जानते फि आप कहां बेठे हैं और क्या बात कर रहे है !"

उस आफिसर ने कहा…"'पहती बात तो ये कि आप किस आथर्टी से बिमान मांग रहे हैं, दूसरी बात ये है कि विमान आपका बाप बना भी नहीं सकता I”



"लेकिन आपकी कलम मुझे कुछ देर के लिए बिमान दे सकती हे ।" टुम्बकटू बोला ।



"मेरी समझ मेँ तो तुम्हारा नाम ही नहीं आया I”



“वो भी समझ में आ जाएगा!" टुम्बकटू ने कहा---" पहले आप ये बताने की कृपा करें कि आप विमान दे रहे हैं अथवा नहीँ? "



"विमान देने का कोई प्रश्न ही नहीं. .?"


"चटाक ।"


तभी उसके गाल पर जैसे लोहे का भारी पत्थर टकराया हो ।




एक ही पल में दांतों सहित उसका जबड़ा बाहर आ गया । इसके साथ ही ढेर सारा खून भी मेज पर आ पड़ा और उसका दायां गाल बाएं गाल से इश्क फरमाने लगा । बिना किसी चू-पटाक के आंफिसर शहीद हो गया । उसकी लाश कुर्सी से नीचे गिर पडी ।



“बदतमीज़ ।" टुम्बकटू ने कहा…“शहनशाहे आलम की शान में गुस्ताखी करता है I”



कहकर उसने बड़े आराम से सिगरेट में एक कश लगाया और इस प्रकार कमरे के दरवाजे की ओर बढ गया मानो कुछ हुआ ही न हो । अभी वह दरवाजे से थोडी दूर ही था कि एक झटके के साथ आँफिस का दरवाजा खुला और एक वर्दीधारी नौकर ने अंदर प्रवेश करना चाहा ।

उसके हाथ मेँ ट्रे थी और वह शायद आफिसर के लिए चाय लेकर आया था । सबसे पहले उसने टुम्बकटू क्रो देखा-एक क्षण में वह निर्णय नहीँ कर पाया कि उसके सामने आदमी खडा हि या जानवर । अलबत्ता अपने सामने खड़े कार्टून को देखकर उसके हाथ से ट्रे छूट गई ।



"बड़े नमकहराम हो?” टुम्बकटू ने एकदम उसे मालिक की भांति डांटा…"चाय केतली, कप, प्लेट सब एक ही झटके में खत्म कर दिया l" तब तक नौकर की नजर अपने आंफिसर की लाश पर पढ़ चुकी थी l



"ख. . खू. . खून.. l” वह एकदम चिल्लाया…“ खून ।।” और एकदम भागना चाहा ।



झपटकर नौकर कमरे से बाहर निकला परंतु तभी टुम्बकटू का हथोड़े जेसा घूंसा उसके सिर पर पडा l एक ही घूंसे मे तरबूज की भांति फ़टकर सिर के दो भाग हो गए! ढेर सारा खून एकदम फ़व्वारे की भांति उछला । पलभर मे वह ढेर हो गया लेकिन यह सब कुछ कमरे से बाहर गैलरी मे हुआ था इसलिए गेलरी में उपस्थित अनेक इंसानों ने इस दृश्य को अपनी आंखों से देखा l हैरत की अंतिम सीमा तक पहुचा देने वाले इस दृश्य को देखकर सब सकते की-सी हालत में आ गए l



अगले ही पल . . .खून . . खून . . खून I


सारी गेलरी में शोर-सा मच गया ।



किंतु ।


टुम्बकटू ने पूर्ण लापरवाही के साथ अपनी सिगरेट में कश लगाया और

उसे वही फेककर रनवे की ओर चल दिया। जिधर वह बढा, उधर के लोगों में एकदम ऐसी भगदड मच गई जैसे किसी मेले मेँ बिगडा हुआ हाथी पहुच गया हो । पूरे एयरपोर्ट पर बुरी तरह हड़कम्प मच गया ।



टुम्बकटू अपने लम्बे-लम्बे कदमों के साथ बढता ही चला गया । चारों ओर बुरी तरह शोर मच चुका था ।




इतना सब कुछ होने के पश्चात भी रनवे की पहली सीमा तक टुम्बकटू के मार्ग में कोई बाघा नहीं आई । उसने पहले ही देख लिया था कि रनवे पर एक यात्री-बिमान खडा था । इस समय एयरपोर्ट पर मात्र एक ही विमान था ।



अभी वह रनवे की सीमा मेँ प्रविष्ट नहीं हुआ था । पुलिस की सिपाहियों की एक लम्बी कतार उसके सामने अड़ गई ।



बीचोंबीच अर्थात् टुम्बकटू कै ठीक सामने एक इंस्पेक्टर खड़ा था । उसके हाथ में रिवॉल्वर था ।



"वहीँ रुक जाओ मिस्टर वरना मैं गोली मार दूगा I" इंस्पेक्टर ने कड़े स्वर में चेतावनी दी ।



मगर क्या मजाल कि रिवॉल्वर की गोली से टुम्बकटू डरे? ये तो उसकी शान मेँ गुस्ताखी है । न उसे रुकना था और न ही रूका ।


"धांय . . .धांय . .।"



इंस्पेक्टर का रिवॉल्वर दो बार गजां परंतु...



देखने वालों ने देखा । टुम्बकटू का खरपच्ची जैसा जिस्म किसी कबूतर की भांति हवा में कलाबाजियां खाता हुआ पुलिस के सिपाहियों की कतार से पार जाकर रनवे से टकराया । मगर पुन: रबर के गुड्डे की भांति उछलकर हवा मेँ लहराया ।
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Re: चीते का दुश्मन

Post by 007 » 03 May 2017 17:26

इंस्पेक्टर की रिवॉल्वर की गोलियां अपनी रेज तक भागकर गिर गईं । पुलिस वाले तेजी से अपने पीछे घूमे । इंस्पेक्टर ने फायर किए लेकिन मजाल है कि टुम्बकटू के जिस्म को एक भी गोली ने स्पर्श किया हो! पलक झपकते ही वह बिना किसी क्षति के विमान के करीब था । उसी समय विमान की खिडकी ऊपर खिंचने लगी, एक ही जम्प मे टुम्बकटू सबसे निचली वाली पैडी पर बैठ गया । सीढी बडी तेजी से विमान कै अंदर खीची । उसके साथ ही खिंचा टुम्बकटू । कदाचित विमान के अंदर से सीढी टुम्बकटू के डर से ही खीची गई थी लेकिन ये किसको अनुमान था कि जिस मुसीबत से वे बचना चाह रहे हैं वह उनकी सीढी के साथ ही विमान में पहुच गई । सीढी के अंदर पहुंचते ही विमान का दरवाजा बंद हो गया ।



विमान में यात्री थे, यात्रियों ने कार्टून को देखा। सारा विमान चीखों से गूंज उठा ।


टुम्बकटू के पास ही एक पायलट खडा था । हिम्मत करके एक झटके के साथ उसने रिवॉल्वर निकाला । मगर व्यर्थ ।



खटाक से रिवॉल्वर उसके हाथ से निकला और टुम्बकटू के चुम्बकीय नाखूनों से लिपट गया ।



"भाई साहब, आदाब… I” बड़े सम्मान से टुम्बकटू ने पायलट से कहा ।


"ये क्या बदतमीजी है?" पायलट एकदम चीखा ।

तभी उसकी गर्दन पर टुम्बकटू के हाथ की कैरेट पडी। टुम्बकटू से कहा गया वाक्य पायलट के जीवन का अंतिम वाक्य बन गया ।


एक हल्की-सी आवाज के साथ उसकी रीढ की हड्डी ने उसके साथ गद्दारी कर दी और इसके साथ ही उसकी रूह भी उससे रूठ गई ।



लहराकर उसका जिस्म विमान के फर्श की शोभा बढाने लगा ।



"नालायक I" मूर्ख की भांति बोला टुम्बकटू-“आदाब को बदतमीजी कहता है I”



इस दृश्य को देखने वालों की चीखे निकल गईं । फिर एकदम सन्नाटा छा गया ।



सबके चेहरों पर मौत का पीलापन नजर आने लगा। सबकी निगाह टुम्बकटू पर स्थिर थी । न तो कभी किसी ने ऐसा अजीब जानवर अथवा इंसान ही कहीँ देखा था और न ही इतने अच्छे-भले स्वस्थ आदमी को इस तरह पहले देखा था ।



“जो हमारी शान में गुस्ताखी नहीं करेगा सुखी रहेगा I" टुम्बकटू ने अपना सलाई-जैसा हाथ उठाकर कहा ।



बिमान में सन्नाटा छाया रहा लेकिन बाहर भयानक शोर था । बिमान का दरवाजा बंद हो चुका था । पुलिस उस विमान को रोकना चाहती थी लेकिन कोई उपाय उन्हें नहीं सूझ रहा था । विमान को रोकने का एक ही ढंग था, वो ये कि बिमान को शीघ्र ही किसी प्रकार की क्षति पहुंचाई जाए लेकिन क्षति पहुचाने का अर्थ था विमान मेँ मौजूद निर्दोष यात्रियों की जिंदगी से खिलवाड़ ।



पुलिस यह नहीं कर सकती थी और विमान को रोकने का अन्य कोई कारण नजर आ नहीं रहा था । उधर बिमान के अंदर टुम्बकटू ने यात्रियों से कहा और चालक-कक्ष की ओर बढ़ गया । उसी समय एक और पायलट कक्ष से बाहर आया लेकिन लोगों ने देखा कि वह भी क्षण मात्र में पहले पायलट की भांति शहीद हो गया ।



टुम्बकटू चालक-कक्ष में पहुच गया ।



विमान मे मौत अपना सन्नाटा बिछाए हुए थी ।


बाहर पुलिस अभी कोई निर्णय ले भी न पाई थी कि विमान का इंजन गड़गड़ा उठा । दर्शक बौखलाए तो बिमान रनवे पर दौडने लगा और जब तक लोग आश्चर्य के सागर से बाहर आते तब तक विमान रनवे छोडकर हवा में उड़ चुका था ।



विमान में सारे यात्री अवाक् से चुपचाप बैठे थे । मौत का भय सारे विमान में छाया हुआ था । दो पायलटों की इतनी सरल मौत देखने के बाद भला बो कौन मूर्ख पायलट हो सकता था जो टुम्बकटू के सामने आने का प्रयास करता। सबकी आंखो में भय था, एक-दूसरे को देख लेते थे ।


सबके दिमाग यही सोच रहे थे कि ये अजीब कार्टून टाइप किस प्रकार की मुसीबत है?

क्या चीज है?


उनसे क्या चाहता है और उन्हें कहां ले जा रहा है?


इस गन्ने जैसे व्यक्ति में इतनी शक्ति कहां छुपी है कि एक ही हाथ मेँ इंसान को मर जाने पर विवश कर देता है?


यात्रियों के लिए टुम्बकटू इस सदी का सबसे महान आश्चर्य था ।


उधर चालक-कक्ष में टुम्बकटू पूरी निश्चितता के साथ विमान चला रहा था । यह बिश्वास था कि उसके कमाल दिखाने के बाद कोई भी यात्री उसके कार्य में विघ्न डालने का प्रयास नही करेगा
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Re: चीते का दुश्मन

Post by 007 » 11 Jun 2017 13:56

और अगर किया भी तो यात्रियों को एक और कमाल देखने का अवसर मिल जाएगा ।



विमान लगातार दो घंटे तक हवा में चकराता क्या फिर एक पहाडी पर लैंड कर गया ।



चालक-कक्ष से बाहर निकलकर टुम्बकटू बाहर आया ।



यात्रियो कै चेहरे पुन: सफेद पड़ गए, लेकिन टुम्बकटू ने उन्हें बाकायदा सम्मान देते हुए कहा…"शाहबानों, आपका खादिम दरख्वास्त करता है कि आप लोग यहीं पर उतर जाएं I”



बस, यही तो यात्रियों के मन की बात थी । वे किसी भी प्रकार इस मुसीबत से पीछा छुड़ाना चाहते थे । टुम्बकटू ने सीढी लगा दी और सारे यात्री एकदम एक-दूसरे से पहले उतरने के लिए दरवाजे की ओर लपके । तभी...


"अनुशासन सबसे बडी चीज है I” टुम्बकटू ने कहा…“लाइन बनाकर उतरो ।"



टुम्बकटू ने कहा और लाइन एकदम बन गई! देखते ही देखते सारे यात्री बिमान से बाहर आ गए I विमान की सीडी ऊपर खिंची और दरवाजा बंद हो गया । उनके देखते-ही देखते विमान हवा में उठ गया ।



यात्री हवा में अपने से दूर होते हुए विमान को देखते रहे और जिस अनुपात में विमान दूर होता चला गया उसी अनुपात में यात्रियों से मौत का भय घटता गया । मौत उनसे दूर होती जा रही थी I



उन्हे इस बात की चिंता नहीं थी किं उन्हें कहां छोड़ दिया गया है । अब यहां पहाडियों मेँ भटकने से क्या होगा? जबिक उन्हें इस बात की खुशी थी कि साक्षात मौत उनके बिल्कुल पास होकर गुजर गई है I


वे जानते थे कि किसी भी शहर तक पहुंचने मेँ उन्हें काफी परेशानियां उठानी पडेगी, लेकिन ये वे अच्छी तरह जान चुके थे कि दुनिया में टुम्बकटू से बडी परेशानी कोई नहीं है । फिलहाल वे खुद को आजाद-सा पा रहे थे ।



फिनिश




“तो प्यारे दिलजले, हुआ यूं कि हफ्ते से जो कुतिया पाली थी वो साली एक चूहे के इश्क में इतनी पागल हो गई कि कहने लगी शादी करूंगी तो उसी चूहे से करूंगी वरना सारा जीबन क्वारी ही बिता दूंगी ।" विजय ने विकास को अपनी बात में उलझाते हुए कहा…"अब प्यारे, तुम ही बताओ, हम इस बात को कैसे स्वीकार कर लेते! पहली बात तो ये कि भारत में दहेज विरोधी आंदोलन चल रहा है और इसके बावजूद भी चूहे मियां की मांग थी कि वह दहेज में एक रेलगाडी अवश्य लेगा l खैर, उसकी ये मांग भी हम खिलौने वाली रेलगाडी देकर पूरी करते तो समस्या ये आई कि अगर हमने कुतिया की शादी चूहे से कर दी तो पैदा क्या होगा? इसके अलावा हमे अपने पडोसी के उस कुत्ते का भी ख्याल था जो हमारी कुतिया से प्रेम करता था और उसने कसम खाई थी कि जिस दिन हमारी कुतिया की डोली उठेगी उसी दिन उसका जनाजा उठेगा ।"



"फिर क्या हुआ गुरु?" बिकास ने इस प्रकार पूछा मानो विजय उसे बहुत काम की बात बता रहा है ।


"होना क्या था प्यारे दिलजले I” बिजय बोला…"हम साले कुतिया के गार्जियन थे, हमने कुतिया से साफ़ कह दिया कि ये शादी किसी भी कीमत पर नही हो सकती, लेकिन ये इश्क का रोग बडा खराब है मियां I साले दोनों बालिग थे यानी क्रोर्ट में शादी करके रहने लगे I”



"आपने क्या किया?"



"हम क्या करते-सोचा है इस बार चूहा पालेंगे I”



"गुरु I” विकास बोला…"'इस यात्रा पर निकले हमें पांच दिन गुज़र गए हैं और इन पांच दिनों मेँ आपने मेरा भेजा खाली कर दिया है । अब वह जगह आने वाली है जो हमारो मंजिल है, मैं गोताखोरी की पोशाक पहनकर समुद्र मेँ जा रहा हू और टुम्बकटू के यान को ढूंढ़ता हूं।”


"तो प्यारे, क्यों न गुरु…चेले साथ-साथ चले?”



"मीठी-मीठी बातों से मुझें चमका देने की कोशिश मत करो, गुरु I" विकास बोला-“आपको याद होना चाहिए कि आपने मुझसे वादा किया है कि इस केस मेँ आप किसी प्रकार की मेरी सहायता नहीं करोगे I मैं अकेला ही जाऊंगा I”



"लेकिन मियां, हम यहां क्या मटर भुनाएंगे?"



“आप यहां बैठकर झकझकियां बनाओ, गुरु I" कहकर बिकास उस कक्ष से बाहर निकल गया ।



"यानी गुरु का बंटाधार I” विजय चिल्लाया और चेयर पर अघलेटी सी स्थिति में जाने क्या-क्या ऊटपटांग झकझकी गाने लगा । एकाएक उसकी कैची की भांति चलती जुबान पर एकदम ब्रेक लग गए । उसके ठीक सामने एक आदमकद शीशा था I



उसने ध्यान से शीशे में खुद को देखा और फिर ठीक किसी लडकी की भांति शरमाकर बोला…"मैं कितना हसीन हू।” फिर उसने झुकी-सी गर्दन ऊपर उठाई और पुनः बोला---""प्यारे विजय ये क्या ऊटपटांग करते हो , अगर कोई देखेगा तो क्या कहेगा ?

कुछ काम करना चाहिए l” खुद से खुद ही कहकर उसने कक्ष में अंधेरा कर दिया । इसके पश्चात उसने प्रोजेक्टर पर एक फिल्म चढा दी, उसी समय कक्ष में बिकास प्रविष्ट हुआ बोला…"क्या बात है गुरु, ये अंधेरा क्यो कर लिया?”



"यार दिलजले, आखिर पिक्चर देखने का शोक हमें भी तो चर्राता है ।" कहने के साथ ही बिजय ने प्रोजेक्टर चालू कर दिया । प्रोजेक्टर के सामने एक पर्दा था । प्रोजेक्टर पर फिल्म चलने लगी l कमरे में हत्का-सा प्रकाश हो गया । बिकास भी प्रोजेक्टर के करीब आकर ध्यान से पर्दे पर देखने लगा । फिल्म तेजी से चलती हुई दो मिनट में खत्म हो गई, अब केवल प्रोजेक्टर के बल्ब का प्रकाश पर्दे पर पड़ रहा था ।



"यार दिलजले ।” बिजय बोला…“साली क्या बक्वास फिल्म है । टिकट के पैसे भी बेकार गए । कोई रोमांटिक गाना तो है ही नहीं I”



"समय कम है गुरु I” विकास गम्भीरता के स्वर में बोला…“जरा फिल्म के एक-एक सीन को अच्छी तरह देखने दो ।" कहते हुए उसने कक्ष की लाइट आंन करके प्रोजेक्टर से फिल्म निकाली और उसे सीधी करके पुन: प्रोजेक्टर पर चढा दी I कमरे में अंधेरा करने के बाद उसने पुन: फिल्म स्टार्ट कर दी । विकास ने फिल्म के पहले ही सीन पर प्रोजेक्टर की गति स्थिर कर दी । पहला ही दृश्य प्रोजेक्टर पर स्थित होकर रह गया I



इस दृश्य में पानी में डूबा हुआ एक विचित्र-सा बेहद विशाल अंतरिक्ष यान नजर आ रहा था । पांच कोनों वाला ये यान पानी मे पड़ा था ।
बैसे इस आकृति से कोई समझ नहीं सकता था कि ये यान है, बिजय और विकास अगर उसे यूं ही देखते हो उसे सागर में डूबी हुई कोई चट्टान ही समझते लेकिन वे टुम्बकटू की सारी फिल्मों क्रो कई बार देख चुके थे । उनमें एक फिल्म ऐसी थी जिस पर चारों तरफ फिल्मों के दृश्यों के बारे में स्पष्ट लिखा हुआ था । उसी फिल्म को पढने के बाद वे जाने ये कि आकृति चंद्रमा के मेक अंतरिक्षयान की है । दृश्य पर्दे पर स्थिर था और विजय और विकास पर्दे के करीब पहुच गए ।



"तो प्यारे ये है वो यान जिसके जरिए ये कार्टून चंद्रमा से धरती पर उतर आया । विजय बोला-“ये है वो भानुमति का पिटारा जिसमें इतने-इतने बिभिन्न रहस्य छुपे हुए है I” एक स्थान पर उंगली रखकर बोला-*और ये है उस अलीबाबा के खजाने का दरवाजा I”



"अब देखना है गुरु कि आखिर टुम्बकटू के पास वो कौन-सी बिचित्र वस्तु है । जिसके बारे में वह यह कहा करता है कि अगर मानव ने वह वस्तु प्राप्त कर ली तो मानव भगवान पर बिजय पा लेगा I" कहने के साथ ही वह पुन: प्रोजेक्टर के करीब वापस आ गया ।




इसके बाद उसने फिल्म के एक दृश्य क्रो बड़े ध्यान से देखा । फिल्म की समाप्ति पर वह बोला…"अब मैं चलता हूं गुरू l”



"जाने वाले को आज तक कोई नहीं रोक सका प्यारे, हम क्या रोकेंगे? "



"ये बात बहुत पुरानी है गुरु, लेकिन फिर भी गलत है I”
बिकास मोहक ढंग से मुस्कराता हुआ बोला--'"सुना है सत्यवान के लिए भगवान के घर से बुलावा आ गया था लेकिन फिर भी जाते हुए सत्यवान को सावित्री ने रोक लिया था I"



"तो प्यारे, ना तो तुम सत्यवान हो और ना ही हम सावित्री हैं अर्थात् तुम्हें हम रोक नहीं सकते ।"



"ये बात तीसरी है गुरु ।" कहकर विकास पुन: कक्ष से बाहर चला गया । बिजय ऊंट की तरह मुंह ऊपर उठाए जुगाली-सी करता रहा ।



पांच मिनट पश्चात ही बिकास के जिस्म पर गोताखोरी की पोशाक थी । उसके सिर पर एक हैट था, हैट के अग्रिम . भाग में एक शक्तिशाली टॉर्च थी । टॉर्च में एक मझरगन पीठ पर आक्सीजन से भरा गेस सिलेंडर यानी पूरी तरह गोताखोर बनकर वह कक्ष से बाहर आया ।
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Re: चीते का दुश्मन

Post by 007 » 11 Jun 2017 13:57

इस बार वह सीधा चालक-कक्ष की ओर बढ़ गया । वहां धनुषटंकार मोटर बोट चलाने में व्यस्त था ।




"मोंटो ।।" विकास ने उसे पुकारा । आबाज सुनते ही धनुषटंकार उसकी ओर घूमा और अदब से झुककर अपने लिए आदेश जारी करने के लिए कहा ।




"मोटर बोट को यहीँ रोक दो ।” बिकास ने आदेश दिया ओर घनुषटंकार ने तुरंत आज्ञा का पालन किया ।



“मेरे साथ आओ I” विकास का ये आदेश पाते ही थनुषटंकार जम्प मारकर उसके कंधे पर बैठ गया l विकास हल्के-से मुस्कराया जबकि मोंटो अपनी जेब से सिगार निकालने में व्यस्त था । इस समय बिकास मोटर बोट के डेक की ओर बढ रहा था ।
जब वह डेक पर खुले आकाश के गगन नीचे पहुचा तो उसने देखा, ये रात चांदनी थी । सारा आकाश सितारों से सजा हुआ था l गगन में एक तरफ़ चंद्रमा गर्व से मुस्करा रहा था मानो वह इस बात पर गर्वित हो कि इस समय गगन पर उसका एकक्षत्र राज्य था ।



मोटर बोट के चारो ओर दूर तक सागर-ही…सागर था । सागर का पानी चंद्रमां को देखकर बार…बार लहरों के रूप मेँ उछल रहा था । मानो सागर का ये पानी चंद्रमा तक पहुंच जाना चाहता हो l चंद्रमा की चांदनी को देखकर सागर में ज्वार आ रहा था ।



डेक के एक कोने मेँ विजय खडा था । उसके हाथ में एल दूरबीन था । (एल दूरबीन एक ऐसा यंत्र है जिससे अंधेरे में दूर तक देखा जा सकता है । दूरबीन के लेंसों के सामने दो शक्तिशाली बल्ब होते हैं जो दूरबीन में मौजूद बैट्री से जलते हैं । अंधेरे में दूर तक देखना होता है तो इन दोनो बल्वों को रोशन करके आप दूरबीन की तरह इसे आंखों से सटा लेते हे । तब इसके जरिए साधारण दूरबीन की भांति, इससे अंधेरे में भी बहुत दूर की वस्तु क्रो पास और बडी देखा जा सकता है । इसका पूरा नाम लाइट दूरबीन होता है ।)



"क्या देख रहे हो गुरु?" विकास ने विजय की ओर ही बढते हुए कहा l




"उस टापू क्रो देखने का प्रयास कर रहा हू प्यारे जिसका हवाला कार्टून मियां ने दिया है ।" विजय बोला ।




"आपने टुम्बकटू के समुद्रो नक्शे क्रो समझ भी लिया है गुरू ?"

"प्यारे चेले खान ।” विजय बोला-" यूं समझो कि समुद्री नक्शे देखते-देखते ही हम बूढे हो गए हैं । हम यकीन के साथ कह सकते हैं कि हम नक्शे के अनुसार बिल्कुल ठीक जगह पर हे । फिल्म में कार्टून मियां ने यहीँ तक का नक्शा दिया है और लिखी हुई फिल्म मेँ ये भी लिखा है कि सागर मेँ इसी स्थान पर उतरना है । तुम जानते हो कि नक्शे के जरिए ये हवाला भी दिया गया है कि जहां तक का ये नक्शा हे, वहां से थोडी ही दूरी पर टापू है, हम टापू की ही खोज करने के चक्कर मेँ हैं, सम्भव है कोलम्बस और वास्कोडिगामा नामक व्यक्तियों में हमारा भी नाम आ जाए । "




"इसका मतलब ये है गुरु कि हम बिल्कुल सही स्थान पर पहुंच चुके हैं I"



“इसकी तो कोई गारंटी नहीं है प्यारे l”



"क्या मतलब? " हल्के-से चौंककर विकास ने पूछा ।




“मतलब ये प्यारे कि हमें अभी तक कोई टापू नहीं चमका है I" विजय ने कहा…“ये तो ठीक है कि हम नक्शे के अनुसार ठीक स्थान पर पहुचे हैं लेकिन इसका क्या सबूत है कि कार्टून प्यारे ने ये नक्शा पूरी शराफत के साथ बनाया है l”




"में आपका मतलब नहीं समझा गुरु ।" विकास ने कहा…"साफ-साफ कहिए कि आप कहना क्या चाहते है !"





“हमारा मतलब समझने के चवकर में तो अकबर जैसे महान सम्राट भी स्वर्ग सिधार गए मियां लेकिन फिर भी हम तुम्हें समझाते हैं । हमारी बात का कचूमर ये है कि ये भी तो हो सकता है कि कार्टून ने यह नक्शा यूं ही ऊटपटांग बना रखा हो और उसका वास्तविक यान सागर में कही और हो ।"

"ऐसी सम्भावना तो है नहीं, गुरु I” बिकास धीरे-से बोला-""टुम्बकटू झूठ कम बोलता है ।”




"लेकिन बोलता तो है ना प्यारे I” विजय ने कुछ कहना चाहा कि तभी धनुषटंकार ने उससे लाइट दूरबीन छीन लिया विजय अबे-अबे करता रह गया और धनुषटंकार दूरबीत्र सहित उछलता हुआ मोटर बोट की एक चिमनी पर घढ़ गया ।




बिजय इस प्रकार बौखला रहा था मानो उसके सारे जीवन की जमापूंजी एकदम उससे कोई छीनकर ले गया हो विकास के होंठों पर मुस्कान थी जबकि धनुषटंकार तेजी से चढता हुआ चिमनी के शीर्ष पर पहुच गया । चिमनी कै ऊपर खड़े होकर उसने दूरबीन आखों से सटाकर और उसके बल्व आन कर दिए l



अब वह सागर को दूर तक देख सकता था । सागर चंद्रमा की चांदनी के कारण बुरी तरह उछल रहा था । ठीक इसी प्रकार जैसे सागर के नीचे सागर कै बराबर ही कोई विशाल भट्ठी तप रही हो और सागर का पानी उसी के ताप से उबल रहा हो । लहरें शोर मचा-मचाकर एक-दुसरे से टकरा रही थीं । मोटर बोट लहरों पर हिंचक्रोला खा रहा था । धनुष्टंकार लाइट दूरबीन से दूर-दुर कै सागर क्रो बडे ध्यान से देख रहा था I



उस समय वह दक्षिण में देख रहा था । जब अचानक एक स्थान पर उसकी दूरबीन स्थिर हो गई । कुछ देर तक वह उसी दिशा में देखता रहा । फिर उसने आंखों से लाइट दूरबीन हटा
ली I अब उसे दूर-दूर तक केवल उफनता हुआ सागर और सागर के ऊपर बिछी चांदनी दिखाई दे रही थी ।

उसने पुनः दूरबीन अपनी आंख से सटाई और पुन: उसी दिशा में देखा । कदाचित इस बार उसने कुछ देखा…फिर वह तेजी के साथ चिमनी कै ऊपर से उतरकर डेक पर आया और विजय कै कंधे पर बैठकर दूरबीन उसे थमाकर उसी विशा में देखने का संकेत किया I



विजय ने चुपचाप उससे दूरबीन ली और उस तरफ देखा उसे दूर चांदनी में एक काला-सा धब्बा दिखाईं दिया । ध्यान से वह उस धब्बे को देखता रहा l फिर बोला-प्यारे दिलजले लगता है टापू काला है I”



उसी दिशा में देखते हुए विकास ने विजय से दूरबीन ली ही थी कि एकदम तीनों चौंक पडे ।


उसी दिशा में दूर…बहुत दूर अचानक रोशनी चमकी I तीनों की निगाह उसी रोशनी पर अटककर रह गई, तीनों ने एकदूसरे को देखा उनकी समझ मेँ एकाएक चमकने वाली उस रोशनी का रहस्य समझ में नही आया ।



टुम्बकटू ने तो अपनी फिल्म में लिखा था कि ये टापू एकदम निर्जन हैं । वहां किसी प्रकार की कोई आबादी नहीं है । फिर इस रोशनी का रहस्य क्या है? ये अचानक इसी समय क्यों चमकी हे?




बिकास ने दूरबीन आंख से सटाईं और उसी चमकती हुई रोशनी की ओर देखा…उसने देखा ये रोशनी उसी टापू पर चमक रही थी । अभी विकास देख ही रहा था कि अचानक वे तीनों एक बार पुन: बुरी तरह चौंक पड़े । एकाएक वह रोशनी जिस प्रकार चमकी थी और उसी प्रकार विलुप्त हो गई ।



तीनों ने पुन: एक-दुसरे की ओर देखा अभी वे आपस में एक बात भी नहीं कह पाए थे कि. . .

इस बार वे तीनों लगभग उछल पड़े I उसी दिशा मे उन्हें एक विशाल होली-सी जलती नजर आई । ऐसा महसूस हो रहा था जैसे सारा टापू अचानक जल रहा हो I अगर बात यहीं तक रहती तो वे केवल चौककर रह जाते, लेकिन बात इससे भी कही आगे निकल गई ।



जो कुछ वे देख रहे थे एक बार को उन्हें उसपर विश्वास-सा नहीं हुआ । विश्वास भी कैसे करते एकदम अनोखा दृश्य था?



टापू पर जलती आग तो इतनी दूर एक होली जितनी चमक ही रही थी लेकिन साथ ही उन्होंने आग के ऊपर जलते हुए जानवर उछल रहे थे । जल्दी से विकास ने अपनी आंखों से दूरबीन सटाई और देखा-नंगी आंखों की अपेक्षा दूरबीन से दृश्य साफ़ दिखाई दे रहा था । टापू पर आग की लपटें बुरी तरह लपलपा रही थीं. . .उसने साफ देखा...आग की लपटों पर जानवर उड़ रहे थे । विकास को विश्वास नहीं आया…उड़ते केवल पक्षी हैं जानवर भला कैसे उड़ सकते हैं, लेकिन इस समय वह अपनी आंखों से देख रहा था जानवर उड रहे थे । साथ ही उनके तन से आग भी लपलपा रही थी । वे जानवर जल रहे थे । बिकास ने उन्हें ठीक से पहचाना, वे जलते हुए, कुत्ते, बिल्ली और चीते जैसे जानवर थे I उनके सारे जिस्म जल रहै थे, लेकिन फिर भी वे उस जलती हुई ढेर सारी आग पर उड रहे थे I विकास जो कुछ देख रहा था उस पर विश्वास करना नहीं चाह रहा था, उसे विश्वास करना
पड़ रहा था । उसकी समझ में नहीं आया कि टापू पर ये सब क्या हो रहा है?

"गुरु, देखो. . !" कहते हुए उसने दूरबीन विजय को पकडा दी ।



बिजय ने भी वही सब देखा और चमत्कृत-सा रह गया । इसके बाद घनुषटंकार ने देखा और उसके देखते…ही-देखते यह दृश्य इस प्रकार गायब हो गया मानो यह दृश्य पर्दे पर चल रहा था और लाइट चली जाने के कारण अचानक गायब होगया है । दृश्य के इस चमत्कारी ढंग से गायब होने पर तीनों एकदम हक्के-बवके रह गए । उन्होंने बारी-बारी से पुन: दूरबीन लगाकर उसी दिशा में देखा-अब वहां एक काले धब्बे के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था ।



ऐसी चमत्कारिक घटनाएं कदाचित उन्होंने पहली बार देखी थीं ।



कुछ देर तक तीनों के बीच अजीब संनाटा रहा । तीनों के दिमाग अलग-अलग इन घटनाओं के बारे मेँ सोच रहे थे । जब नहीं रहा गया तो बिकास ने कहा-"गुरू ये सब क्या चक्कर है?"


“हमें तो ऐसा लगता है प्यारे कि यह चक्कर नहीं, घनचक्कर है ।" विजय बोला'-…""अपनी समझदानी मे तो आया नहीं । पता नहीं वहां साला ये क्या और क्यों कर रहा है ?"



"मेरे खयाल से उसका रहस्य जानना भी बहुत जरूरी है, गुरु I” बिकास ने कहा ।



"बिल्कुल जरूरी है प्यारे हमेँ उधर चलना चाहिए I" विजय कुछ सोचता हुआ बोला…“मालूम नहीं साला क्या चक्कर है. . कसम खुदा की यार दिलजले, ऐसा दुश्य हमने तो आज तक अपने जीवन नही देखा । इन अफलातूनी घटनाओं का रहस्य जानने के लिए फौरन दिल धडक रहा है I”

इसी बीच दूरबीन की रोशनी में धनुषटंकार ने अपनी डायरी पर यूं लिखा…
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