वारदात complete novel

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Re: वारदात

Post by 007 » 13 Jul 2017 20:06

खाने का कौर उन्होंने देवराज चौहान कै मुह मे गले तक ठूंस दिया । देवराज चौहान को अपना दम रूकता सा महसूस हुआ ।


वह तढ़पा और मुह में पडा सारा खाना बाहर निकाल दिया और खांसने लगा I उसके हाथ पीछे बांधे हुए थे । उसे कुर्सी पर बिठाकर खाना खिलाया जा रहा था । जबकि देवराज चौहान कई बार खाना खाने को मना कर चुका था ।



देवराज चौहान की मुंह से खाना उगलते देखकर तीनों बदमाश ठहाका मारकर हंस पड़े I


उनकी इस हंसी ने देवराज चौहान पर जले पर नमक का काम किया । उसके होंठों से गुर्राहट निकली आंखों में क्रोध की लाल सुर्खी उभर आई, मुंह घुमाकर बांह से उसने होंठ साफ किए I



"क्यों !" एक ने देवराज चौहान को नाक पकडकर हिलाया-“इतना बडा हो राया हे तुझे तेरी मां ने खाना खाना नहीँ सिखाया जो उसे मुंह से बाहर उगले जा रहा है?"



"हरामजादे ।” देवराज चौहान के होंठों से फुफकार निकली…


"मेरी माँ ने खाना खाना सिखाया था । बहुत ही अच्छी तरह सिखाया था I लेकिन तेरी मां ने तुझे खाना खिलाना नहीं सिखाया ।"

"फालतू बात मत करो । जो भी बकना चाहते हो फौरन बकौ I" बैनर्जी गुर्राया ।



राजीव मल्होत्रा ने सिर हिलाया फिर कहा ।


“तुमने मेरे चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी की थी?"


"हां I ”



"प्लास्टिक सर्जरी को हटा सकत्ते हो । मेरा चेहरा साफ कर सकते हो?"



, . “क्यों नहीं । वह तो मैँ अभी करने ही वाला हू।"



"ठीक है । पहले मेरा चेहरा साफ करो । बाकी बातें हम फिर करेंगे डॉक्टर बेनर्जी !"



डॉक्टर बैनर्जी कईं पलो तक राजीव मल्होत्रा को देखता रहा। फिर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ !"

“सिर्फ आधे घण्टे में मैं तुम्हारे प्लास्टिक सर्जरी साफ करके तुम्हें तुम्हारे असली में ला दूंगा । तुम्हारा असली और कमीनगी से भरा चेहरा देखने का तो कब से मेरा मन कर रहा हे I"



राजीव मल्होत्रा के होंठों से गहरी सांस निकल गई ।


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फीनिश
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खाने का कौर उन्होंने देवराज चौहान कै मुह मे गले तक ठूंस दिया । देवराज चौहान को अपना दम रूकता सा महसूस हुआ ।


वह तढ़पा और मुह में पडा सारा खाना बाहर निकाल दिया और खांसने लगा I उसके हाथ पीछे बांधे हुए थे । उसे कुर्सी पर बिठाकर खाना खिलाया जा रहा था । जबकि देवराज चौहान कई बार खाना खाने को मना कर चुका था ।



देवराज चौहान की मुंह से खाना उगलते देखकर तीनों बदमाश ठहाका मारकर हंस पड़े I


उनकी इस हंसी ने देवराज चौहान पर जले पर नमक का काम किया । उसके होंठों से गुर्राहट निकली आंखों में क्रोध की लाल सुर्खी उभर आई, मुंह घुमाकर बांह से उसने होंठ साफ किए I



"क्यों !" एक ने देवराज चौहान को नाक पकडकर हिलाया-“इतना बडा हो राया हे तुझे तेरी मां ने खाना खाना नहीँ सिखाया जो उसे मुंह से बाहर उगले जा रहा है?"



"हरामजादे ।” देवराज चौहान के होंठों से फुफकार निकली…


"मेरी माँ ने खाना खाना सिखाया था । बहुत ही अच्छी तरह सिखाया था I लेकिन तेरी मां ने तुझे खाना खिलाना नहीं सिखाया ।"

'देवराज चौहान के शब्द सुनते ही बदमाश दांत भींचकर आगे बढा और देवराज चौहान कै सिर के बाल मुट्ठी में पकडकर उसे कुर्सी से उठाया और चेहरे पर जोरदार घूंसा जड दिया ।

देवराज चौहान के होंठों से कराह निकली और वह दूर जा … लुढका ।


घूंसा इतना जबरदस्त था कि उसके होंठों के कोनों से खून की पतली-सी रेखा बह निकली । भीतर से गाल फट गया या ।



नीचे पड़े ही पड़े देवराज चौहान ने खूनी निगाहों से उसे निहारा ।



तभी दूसरा आगे बढा और उसकी बांह पकडकर .उसे जबरदस्ती ही उठाया । साथ ही त्तगड़ा घूंसा पुन: उसकै चेहरे पर जड़ा I


इस बार देवराज चौहान लडखड़ाया गिरा नहीं ।



"हमसे ठीक तरह बात कर ।" उसने शब्दों क्रो चबाकर सख्त स्वर में कहा I



"तुम जैसों से ऐसे ही बात की जाती है ।" देवराज चौहान गुर्राया I


तभी उस आदमी का घूंसा चला I



देवराज चौहान इस बार होने वाले हमले कै प्रति सावधान था I उसके हाथ बंधे हुए थे परन्तु टांगें अवश्य आजाद थी । इससे पहले कि वह घूंसा उसे पडता उसने फौरन ही अपनी जगह छोडी । सामने वाले का घूंसा खाली गया I


इससे पहले कि वह संभल पाता . देवराज चौहान के जूते की ठोकर तुफान के वेग की भाति उसकी कमर पर पडी । वार इतना जबरदस्त था कि उसके पांव उखड गये I दो क्षण के लिए उसका शरीर हवा में लहराया फिर दीवार से उसका चेहरा जा लगा ।


धप ।



उसके होंठों से तीव्र चीख निक्ल गई I


चेहरा दीवार से लगने के कारण उसकी बुरी हालत हो गई थी । नाक टूट गई थी । आगे के दो दांत मुह मे घूमने लगे थे ।



नाक ओर मुंह से बेइन्तहा खून बहने लगा था I दोनों हाथों से चेहरा ढापा तो पल-भर में ही दोंनों हाथ खून से भर गये थे I



उसकी चीखें बराबर गूंज रही र्थी । तड़पते हुए वह नीचे बैठ गया था । , .



देवराज चौहान की आंखों में मौत के शोले नाच रहे थे ।



.अन्य दोनों बदमाशों कै चेहरों पर क्रूरता से भरे खतरनाक भाव छा गये I



"यह तो हम पर वार करता हे I”

"मरना तो इसे है ही । पहले इसके हाथ-पांव तोडते हैं । " दूसरे ने कहते हुए जेब से चाकू निकाल लिया ।


“यह चीखेगा आवाज बाहर तक जाएगी ।"


"नहीं जाएगी । बंगले से सडक दूर है I"


"जा तो सकती है I”


"ठीक हे ज़ब यह चौखे तो साले की गर्दन दबा देना, मरना तो इसे है ही ।"



दूसरे ने सिर हिलाते हुए जेब से चाकू निकालकर हाथ में लिया । फिर दोनों हाथ में थाम रखे चाकुओं क्रो हिलातें हुए देवराज चौहान की तरफ बढे ।


देवराज चौहान की आखें धधक उठी । आंखों में बसे शोले जेसे बाहर निकलने लगे । वह उसी प्रकार खडा आगे बढते उन्हें देखता रहा और फिर जैसे बिजली कोंधी हो । देवराज चौहान का शरीर कब हवा में लहराकर आगे बढते दोनों पर गिरा वह समझ ही न सके ।



देवराज चौहान उनसे टकराने के बाद सीधा अपने पांवों पर खड़ा हो गया । उनके हलक से चीख निकली और वह कमरे में पड़े सामान से टकराते हुए नीचे जा गिरे ।


एक कै हाथ से चाकू छूटकर देवराज चौहान कै पांचों के पास ही गिरा । देवराज चौहान फौरन पीठ के वल झुका और अपने बंधे हाथों से चाकू उठाकर हथेली में कसकर पकड लिया ।


तत्पश्चात् घूमा और उठकर उन दोनों को देखने लगा जो उठकर खडे हो चुके थे । देवराज चौहान के होंठ मौत की मुद्रा मे भीचे हुए थे । उसकी निस्तेज हो रही मोत के भावों से भरी आंखें उन दोनों से हटने का नाम नहीं ले रही थीं ।



“इसने मेरा चाकू उठा लिया हे ।"



“उठा लेने दो । खुश होने दे बेचारे क्रो I" दूसरा खतरनाक लहजे में कह उठा-“वंधे हाथों से वह चाकू का क्या इस्तेमाल करेगा । अब मैं इसे जिन्दा नहीं छोहंगा । ग्यारह बज चुके हैँ । इसका काम तमाम करके लाश कौं ठिकाने लगा आते हैं । हरामजादा हमसे टकराता हे ।"



जिसका चेहरा दीवार से टकराया था वह तो अर्द्ध बेहोशी की सी हालत में नीचे पड़ा गहरी-गहरी सांसें ले रहा था ।


उसे डाँक्टर की फौरन आवश्यकता थी परन्तु इन दोनों के पास इतनी फुर्सत नहीं थी कि अपने साथी की हालत की तरफ ध्यान दे पाते ।



चाकू थामे वह बदमाश धीरे-धीरे आगे वढा ।

ऐसा करते ----हुए वह एकटक देवराज चौहान की आंखों में झांके जा रहा था और देवराज चौहान उसकी आंखों में ।



~ दोनों एक-दूसरे की जान लेने पर आमादा थे I


उसका साथी वहीँ खड़ा था । उसे पूरा बिश्वास था कि देवराज चौहान अब तो गया ।


एकाएक वह देवराज चौहान पर झपटा । होंठों से अजीब-सी गुर्राहट निकली ।


देवराज चौहान फौरन उछलकर उसके रास्ते से हट गया । वह अपनी झोंक में आगे गया और सोफे से टकराकर सीधा हो गया I अगले ही क्षण होंठों से गुर्राहट निकालकर पलटा । अब
उसके चेहरे पर क्रोध हो क्रोध नजर आ रहा था ।



देवराज चौहान आंखों में मौत के भाव लिये उसे देखे जां रहा था । पीठ पीछे बंधे हाथों में उसने चाकू को कसकर थाम रखा था । इस समय उसका चेहरा कोई देखता तो भय से कदम-भर तो अवश्य पीछे हो जाता ।


वह पुन: देवराज चौहान की तरफ बढा ।


एकबार फिर जैसे बिजली कौधी देवराज चौहान का जिस्म हवा मे लहराया I चाक्रू चाले को संभलने का जरा भी मौका नहीं मिला ।

ठक ।


देवराज चौहान के जूते की ठोकर वेग के साथ उसकी कनपटी पर पड्री I

उसकै होंठों से कराह निकली I
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Re: वारदात

Post by 007 » 13 Jul 2017 20:07

चाकू हाथ से निकलकर बन्द खिढ़की से जा टकराया । दोनों हाथों से उसने अपना सिर थाम लिया ।



कनपटी पर चोट करने के पश्चात् देवराज चौहान हवा में हो सीधा होते हुए जूतों के वल फर्श पर आ खडा हुआ । दुसरे कै प्रति वह सावधान था कि कहीं वह कोई हरकत न कर दे निगाह उस पर भी थी जिसकी कनपटी पर उसने ठोकर मारी थी I



उसने दोनों हाथों से सिर क्रो थाम रखा था । आंखें वन्द थीं ।



चेहरे पर पीडा के चिन्ह थे I वह हक्का-बक्का घूमे जा रहा था I देवराज चौहान फोरन समझ गया कि वह काफी दमदार व्यक्ति है ।


वस्ना जैसी ठोकर उसने मारी थी उससे अब तक उसे बेहोश हो जाना चाहिए था I यह खतरे का लक्षण था I उतने फौरन ही खुद को संभालकर उसके सामने आ खड़े होना था और उसका यह अन्दाज तव और भी खतरनाक होना था ।


देवराज चौहान ने छोटी सी छलांग भरी और सांड की भाँति अपने सिर की चोट उसके माथे पर मारी I उसके होंठों से चीख निकली I पछाड खाकर वह पीठ के बल गिरा ।


फिर न उठ सका I बेहोश हो गया था वह । कम से कम घण्टा-भर तो वह होश में आने वाला नहीँ था ।



देवराज चौहान पलटा और तीसरे को देखने लगा l पीछे बंधे हाथों में अब भी उसने चाकू थाम रखा था ।


आँखों में मौत कै भाव समाए हुए थे ।



"मानना पडेगा ।" तीसरा दरिन्दगी से भरे स्वर में कह उठा----“हो जिगर वाले आदमी । इन दोनों की तुमने जो हालत बनाई इससे पहले किसी दूसरे ने नहीं बनाई थी I"



देवराज चौहान होंठ भीचे उसी मुद्रा में उसे घूरता रहा I



“मैं बचा हू अभी । देखूं तो सही, मेरा भी तुम यही हाल करते हो ।" तीसरे का स्वर वेहद खतरनाक था ।


उसने अकेले हीँ देवराज चौहान से टकराने का फैसला कर लिया था-“इसे अपने चाकू पर भरोसा था लेकिन मैं खाली हाथों से हीँ तुम्हारी ऐसी-तैसी करूंगा I तुम्हारे हाथ पीछे बंधे हूए हैं । तुम्हारी टांगों के वारों का I मैं ध्यान रखूंगा । फिर देखूंगा तुम मुझ पर वार करने में कैसे कामयाब होते हो । सुपरमैन तो तुम हो नहीँ I”



देवराज चौहान के र्भिचे होंठ जरा भी न हिले । आखों में मौत के भाव विद्यमान थे ।


दोनों हाथों को फैलाये वह बदमाश खतरनाक अन्दाज़ में देवराज चौहान की तरफ बढा ।


देवराज चौहान बुत की तरह खडा उसकी आखो मे झाकता रहा । करीब पहुचते ही उसने देवराज चौहान पर घुसा चलाया। देवराज चौहान फौरन नीचे झुका । उसका घूंसा खाली गया । इधर नोचे झुकते ही देवराज चौहान ने अपना सिर पूरी शक्ति के साथ उसके पेट में दे मारा । सिर का वार पेट में होते ही उसने गले से भैंसे की डकार निकाली और वह पछाड़खाकर नीचे जा गिरा । दोनों हाथउसने पेट पर दवा लिये थे । पीड़ा के मारे वह तड़पने लगा I


देवराज चौहान ने उसे संभलने का मौका नहीं दिया । वह फोरन आगे बढा और उसकी छाती पर चढ बैठा I पीठ पीछे बंधे हाथों में थाम रखा चाकू नीचे दबे व्यक्ति के पेट में चुभने लगा था । चाकू की चुभन का अहसास पाकर वह अपनी पीडा को भूल गया । आंख खोलीं तो अपनी छाती पर सवार देवराज चौहान के चेहरे कै भाव देखकर वह मन ही मन कांप उठा I


देवराज चौहान के चेहरे पर दरिन्दगो का गहरे भान विद्यमान थे ।

मौत की काली छाया में उसकी आंखें डूबी हुई थी I जबड़े कसे हुए थे I होंठ सख्ती से र्मिचे हुए थे I इस समय वह किसी खतरनष्क भेड्रिये से कम नहीं लग रहा था ।


"डाल दूं चाकू पेट में?" देवराज चौहान खूंखारता-भरे स्वर में कह उठा ।



"न....न.....नही l" वह कांप उठा ।



"तुम रहम कै काबिल नहीं हो l”


"भगवान कै लिए मुझें माफ कर दो मैं.....मैं ।"



"खोल मुझे I"


"क्या ? ”



"मेरे हाथ खौल I” देवराज चौहान ने वहशी स्वर में कहा-----"ध्यान रखना चाकू मेरी मुट्ठी में दबा रहेगा और नोक तेरे पेट के साथ सटी रहेगी । जहां तूने गड़चड़ की बंही चाकू तेरे पेट में धंस जाएगा । अपने हाथ सिर्फ मेरे हाथों पर बँधी रस्सी पर ही रखना । चाकू पर हाथ डालने को चेष्टा की तो अपनी मौत का तू खुद जिम्मेदार होगा । समझ गया न मेरी बात?"



"हा....हां....सपझ गया I” घबराहट में उसका स्वर कांप रहा था ।



"खोल मेरे हाथ के बन्धन I"


"मुझे उठने तो दो I"


“नहीं । तू ऐसे ही मेरे बन्धन खोलेगा I मैँ तेरी छाती पर बैठा हू। इसी प्रकार लेटे ही लेटे तेरे हाथ आसानी से मेरे हाथों कै बन्धनों तक पहुच सक्रता हैँ शुरू हो जा।"



देवराज चौहान की बात मानने के सिवाय उसके पास और कोई रास्ता नहीं था । इन्कार करने का मतलब था चाकू का पूरा फल पेट में घुस जाना । चाकू की नोक-निरन्तर उसके पेट में चुभ रही थी । दोनों हाथ सीघे किए और देवराज चौहान की क्लाई पर बंधी नाइलोन की रस्सी को खोलने की चेष्टा करने लगा ।



"मुझे चाकू दो तो में एक सेकण्ड में बंधनों को काट दूं ।" वह बोला I



“बकवास मत कर । तू हाथ से ही बन्धन खोलेगा I चाकू देककर मैं अपनी पीठ पर चाकू नहीं खाना चाहता I" देवराज ने गुर्राकर मौत से भरे स्वर में कहा ।


तत्पश्चात् उसने पांच मिनट लगाये, कलाइर्यो पर बंधी रस्सी खोलने में ।



वन्धन खुलते ही देवराज चौहान की आंखों में चमक भर आई । वह' उछलकर उसकी छाती से खडा हुआ और .....


.......अगले ही पल उसने जो किया वह किसी को भी कंपा देने कै लिए काफी था । हाथ में पकडा चाकू खच के साथ पुरा का पूरा उसके पेट में घुसेड़ दिया । वह चीख भी न सका ।


फिर देवराज चौहान ने चाकू की मूठ को कसकर पकड़ा और पेट में ऊपर से नीचे तक चीरा दे दिया l



वह तढ़पा और उसी पल शांत हो गया ।



इस काम मे जरा भी शोर नहीं हुआ था ।



देवराज चौहान एकदम दरिन्दा लग रहा था ।


हाथ में थमा खुन से सना चाकू जिसकी नीक से बूंद-बूंद खून टपक रहा था । हाथ भी जैसे खून से नहाया लग रहा था ।



इन लोगों के प्रति उसके मन में जरा भी हमदर्दी नहीं थी । क्योकि यह लोग कुछ ही देर में उसकी हत्या करके उसकी लाश किसी चौराहे पर फेंकने वाले थे और अपनी जान बचाना उसकी निगाहों मेँ कोई जुर्म नहीँ था ।



मौत का पुतला बना देवराज चौहान आगे बढा और नीचे बेहोश पड़े सरे आदमी के पास पहुचा । चाकू वाला हाथ उठा और 'खच' का साथ उसके भी पेट में जा धंसा । उसी पल ही उसके पेट में भी चाकु का चीरा दे दिया ।



बेहोशी मे ही वह तड़पा और देवराज-चौहान के चाकू बाहर निकालने से पहले ही ठण्डा हो गया ।


पेट से खून उबल-उबल कर बाहर आने लगा । देवराज चौहान तीसरे कै पास पहुचा चेहरे पर वहशी मौत नाच रही थी ।


वह करवट लिए पड़ा था । चौहान ने जूते की करवट से उसे सीधा किया । उसके होंठों से तीव्र कराह निकली ।


दीवार से टकराने के कारण उसकी नाक पूरी पिचक गई थी । उसके दांत टूटे पड़े थे ।

बहुत बुरी हालत थी उसकी ।


परन्तु देवराज चौहान कै मन में इन दरिन्दो कै प्रति जरा भी हमदर्दी नहीं थी । देवराज चौहान ने उसका भी वहीँ हाल किया जो पहले दो का किया था ।



फिर वह कमरे से लगे बाथरूम में गया और अपने हाथ मुंह धोये । खून से सना चाकू साफ किया । चाकू से अपनी उंगलियों के निशान साफ किए । फिर चाकू को बाथरूम में ही फेंककर हाथ पोंछने के पश्चात् जव कमरे में पहुंचा तो ठिठक गया । चेहरा पुन: मौत कै भावों से भर उठा ।


आंखों में वहशीपन झलक उठा ।
दरवाजे के ठीक बीचों-बीच तारासिंह खडा था । उसके चेहरे पर वेहद खतरनाक भाव थे और हाथों मेँ दबी रिवॉल्वर का रुख देवराज चौहान की तरफ था ।


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Re: वारदात

Post by 007 » 13 Jul 2017 20:07

डॉक्टर बैनर्जी हक्का बक्का , बेहद परेशान और व्याकुल हो रहा था । पिछले तीन घण्टों में वह तरह-तरह कै रसायन, वैज्ञानिक घोल लेकर, राजीव मल्होत्रा के चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी हुतारने की चेष्टा कर रहा था I परन्तु वहां प्लास्टिक सर्जरी होती तो उतरती ।



थक-हारकर अजीब सी निगाहों से वह राजीव मल्होत्रा को देखने लगा ।


राजीव्र मल्होत्रा मुस्कराया ।



" तो आपको विश्वास हो गया होगा कि यह मेरा असली चेहरा हे I"



"ये नहीं मान सकता ।" डॉक्टर बैनर्जी ने बांह से अपने चेहरे पर आए पसीने को पोंछा I



" क्यों, अभी भी आपको मेरी बात पर अविश्वास है?" राजीव मुस्करा रहा था ।



"हां । क्योकि मैँने खुद तुम्हारे चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी की थी ।"



"नहीं । आपने मेरे चेहरे पर नहीं, अशोक श्रीवास्तव के चेहरे पर सर्जरी की थी । मैं अशोक नहीं हूं।"



डॉक्टर बैनर्जी ने अजीब-सी निगाहों से उसे देखा । अब उसका विश्वास भी डोलने लगा था कि उसने जिसके चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी की थी, वह यह नहीं, कोई और हीँ होगा । क्योंकि सर्जरी उतारने की, तीन धँण्टे की अथाह मेहनत जो उसने की थी, उसमें उसे क्रोई सफलता नहीं मिली थी । अब तक इतना तो पूर्णतया विश्वास हो गया था कि सामने बैठा चेहरा प्लास्टिक सर्जरी वाला नहीँ हे ।


* तुम अशोक नहीं हो?" डॉक्टर बैनर्जी ने गहरी सांस ली ।



"नही !"


"फिर कौन हो ।"



" एक बात पहले आप बता दीजिए ।"



" क्या ?"
"अगर मैँ अशोक न निकला तो आप मेरे साथ कैसा सलूक करेंगे ?"



डॉक्टर बैनर्जी ने उसकी आखों में झाकते हुए सिगरेट सुलगाई ।


"इस बात का जबाव में नहीँ दे सकता । अगर तुम अशोक नहीं हो तो तुम्हारा फैसला मेरे डाथ में नहीं है । सिर्फ अशोक .का फैसला हाथ में है।”



"तो मेरा फैसला कौन करेगा?”



"खुद रंजीत श्रीवास्तव I”



राजीव मल्होत्रा चंद पलों तक खामोश रहा फिर गहरी सांस लेकर कह उठा ।



"मेरा नाम राजीव मल्होत्रा है I मैं दिल्ली का रहने वाला हू ।”


" तुमने अपना चेहरा, रंजीत जैसा क्यों बना रखा हे ?” डाॅक्टर बैनर्जी तीखे स्वर मेँ कहा ।


"इस बात का जबाब तो भगवान ही दे सकता है ।" राजीब मुस्कराया ।


"क्या मतलब ?"



"यह मेरा असली चेहरा ही है । इसमें कोई बनावट नहीं I" राजीव ने कहा ।


"झूठ बोलते हो तुम, मैं.....I”



“डाक्टर बैनर्जी?" राजीव ने उसकी बात काटकर, अपने शब्दों पर जोर देका कहा-"अगर मैं झूठ कह रहा होता तो अब तक मेरा झूठ खुल चुका होता I आपने मेरे चेहरे को हर प्रकार से साफ़ करने की चेष्टा की है । अगर मेरे चेहरे पर किसी प्रकार का नकलीपन होता तो वह अब तक पक्रड़ में आ गया होता ।"



डॉक्टर बैनर्जी ने गहरी सांस ली, फिर कश लेकर कह उठा I



"रंजीत श्रीवास्तव कं वेष में कब से तुम वहां रह रहे थे?”



"जब आपने मुझें पकडा उससे सिर्फ चंद घण्टे पहले से I”



“और जो रजीत श्रीवास्तव बना हुआ था, वह कहा' है?”


"'मुझें नहीं मालूम I" राजीव ने जान…बूझकर अपार्टमेंट का पता नहीं बताया, जहा पर देवराज चौहान रजीत उर्फ अशोक को बांध आया था-वह देवराज चौहान के मामले में किसी प्रकार का दखल नहीं देना चाहता था । वह नहीं चाहता था कि उसके मुँह में ऐसी कोई बात निकले जो देवराज चौहान के लिए नुकसान देह हो ।

डॉक्टर बैनर्जी ने उसकी आंखों में झांका सख्त स्वरं से कहा ।



"तुम अपने बारे में मुझे सबकुछ बताओ । यह भी बताओ कि तुम रंजीत कैसे बन गए?"


राजीव मल्डोत्रर्य ने दिल्ली में की वैंक-डकैती वगेरह कै बारे में … सव कुछ बत्ताया ।


नकाबपोश और अपनी मौतका भी जिक्र किया ।



. बिशालगढ़ कैसे आया यह, नहीं बताया तो सिर्फ देवराज चौहान के बारे में नहीँ बताया । बाकी की हर बात सच कह डाली थी उसने ।


"अगर आपको मेरी बात पर यकीन न हो तो दिल्ली जाकर पता कर सकते हैं । आज सुबह ही इन्सपेक्टर सूरजभान जो कि दिल्ली में यह केस डील का रहा था,, वह विशालगढ़ में है और उसने राजीव मल्होत्रा के रूप मेँ मुझे पहचाना भी । परन्तु तब मैँ रंजीत था और वह मुझ पर हाथ डालने का हौसला नहीँ कर सका . था । लकिन वह चुप नहीं बैठने वाला वहुत जल्द कुछ-न कुछ तो करेगा ही, यानी कि मैँने जो कहा है,सच कहा है ।"



“तो फिर रंजीत बना अशोक कहां हैं?"



"कहा तो, मैं नहीँ जानता इस बारे में कि उस नकाबपोश ने उसे कहां रखा । बस इतना जानता हूं कि उसने अशोर्क उर्फ रंजीत क्रो वहां से हटाकर, मुझे वहां रंजीत श्रीवास्तव बनाकर भेज दिया । ताकि रंजीत की दोलत इकट्ठी करके उसे सौंप सकू । इससे ज्यादा बताने को मेरे पास कुछ भी नहीं है । अगर आप मुझें पुलिस मे देना चाहते हैं, तो आपकी मर्जी । लेकिन इससे आपको कुछ हासिल नहीं होगा I आप लोगों के साथ जो भी बीती और अब आप जो भी करना चाहते हैं, इन बातों का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं । मैं तो यही कहूंगा कि पुलिस में देने की अपेक्षा आप मुझे छोड़ दीजिए । क्योंकि मेरी आप लोगों से कोई दुश्मनी नहीं I”



“मैँने तुम्हें पहले भी कहा था कि अगर तुम अशोक नहीं तो तुम्हारे बारे में फैसला रंजीत करेगा l” डॉक्टर बैनर्जी ने गम्भीर स्वर में कहा क्योंकि मैं सिर्फ अशोक को ही सजा देने का हकदार हू I ’*



"ठीक है । आप रंजीत से बात कर लीजिए, मै यहीँ पर इन्तजार करता हूं।”



"ऐसे नहीं । तुम मेरे जाने के नाद यहां से फरार भी हो सकते हो, भाग सकते हो I"



“निश्चित रहिये । मैं कहीँ नहीं जाऊंगा, आपके आने तक I"

"मेंने अब लोगों पर विश्वास करना छोड दिया है I" डॉक्टर बैनर्जी ने एक-ऐक शब्द चबाकर कहा ।



राजीव मल्होत्रा प्रश्नभरी निगोहौं से डॉक्टर बैनर्जी को देखने लगा I



“में तुम्हें बांधकर जाऊंगा I"



"आपक मर्जी ।"



कुछ ही देर मे डॉक्टर बैनर्जी, राजीव सल्होत्रा के हाथमांव अच्छी तरह बांध चुका था ।


"जा रहे हो ?"



"हा I रजीत श्रीवास्तव से बात करूगा तुम्हारे बारे में I"



“कब तक लौटेंगे?"


"जल्दी ही I"


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Re: वारदात

Post by 007 » 13 Jul 2017 20:07

रंजीत श्रीवास्तव ने डॉक्टर बैनर्जी की सारी बात दी तो वह ठगा सा खडा रह गंया I कई पलों तक तो उसके मुंह से कोई बोल ही न फूटा ।



अवाक्-सा बैनर्जी का चेहरा देखता रह गया ।



“क्या बात है रंजीत साहब?" डॉक्टर बैनर्जी ने ही उसे टोका ।



"वह मेरा हमशक्ल है?” रंजीत के होंठों से निक्रत्ता l



"हां । वह आपका हमशक्ल हे I"



रंजीत कै होंठ कांपे, लेकिन कुछ कह न सका ।


"आपकी तबियत तो ठीक है?" डॉक्टर बैनर्जी ने ध्यानपूर्वक उसके चेहरे के चढते-उतरते भादों को देखा।



रंजीत श्रीवास्तव के होंठों से गहरी सांस निकल गई ।



आगे बढकर वह कुर्सी पर जा बैठा ।



“डॉक्टर तुम इस बात क्रो नहीँ'जानते, मैं भी नहीँ जानता था परन्तु मेरे पिताजी बताया करते थे हम दो 'भाई पैदा हुए थे । बिल्कुल एक जैसे I एक ही चेहरे कै । कई बार तो हमारी मां भी धोखा खा जाया काली थी ।" _



"क्या कह रहे हैं आप?" अब बैनर्जी कै हैरान होने की बारी थी ।



"सुनते जाओं डॉक्टर I" रंजीत श्रीवास्तव धीमे स्वर में कहे जा रहा था-" यह तव की बात है जब हम दो साल कै हो गए थे, दोनों माई । हमारे यहा एक नौकर हुआ करता था, बनारसी . दास नाम था उसका I शराबी-जुआरी था । उसकी आदतें बिगड़ती जा रही थी ।

अपनी आदतों से ही मजबूर होकर एक दिन उसने पिताजी की पैंट की जेब से पांच सौ रुपये निकाले तो पिताजी ने उसे पकड लिया । तब पिताजी ने उसे बहुत मारा और उसे निकल जाने को कहा । बनारसी दास मन का मी काला था, जाते-जाते .मेरे भाई को वह उठा ले गया । पिताजी ने बहुत तलाश करवाई उसकी, त्तेक्लि वह नहीं मिला । कई साल वह अपने बेटे की खोज में लगे रहे । आओ, मै तुम्हें पिताजी के हाथ की डायरी दिखाता हू । उसमें यह सब बातें उन्होंने लिख रखी हें ।"



रंजीत श्रीवास्तव, डॉक्टर बैनर्जी को बंगले के नौचे बने तहखाने मे ले गया ।



"इस तहखाने का अशोक को पता नहीं था । नहीं तो यहां की कोई भी चीज अब सलामत न मिलती !" रंजीत ने कहा ।


एक तरफ रखीं आलमारी खोलकर उसमें से डायरी निकाली ।


डायरी में षोजूद एक तस्वीर निकालकर, बैनर्जी को दिखाता हुआ बोला !



"यह देखो । हम दोनों भाइयों की तस्वीर है । बनारसी दास जव मेरे भाई को उठाकर ले गया था । उससे चद रोज़ पहले ही यह तस्वीर ली गई थी । पिताजी बताया करते थे ।"


डॉक्टर बैनर्जी ने तस्वीर देखी । तस्वीर में दो साल की उम्र कै दो बच्चे, एक जैसे कपड़े पहने दिखाई दे रहे थे । उनके चेहरों मे अदूभूत समानता थी । ऐसा लगता था जैसे एक ही बच्चे की तस्वीर को, तस्वीर'बनाने वाले ने, दो जगह छाप दी हो ।



बैनर्जी कई पलों तक तस्वीर को देखता रह गया ।



“यह डायरी पढो डॉक्टर पिताजी ने अपने हाथों से इस बारे मे सब लिखा था ।"



डॉक्टर ने डायरी पढी ।


“ अब क्या कहते हो?"


"मैं इस समय किसी भी प्रकार की राय देने की स्थिति में नहीं हू।" बैनर्जी बोला ।



"वह मेरा बचपन का बिछड़ा भाई है ।"



“में इतनी आसानी से आपकी बात का यकीन नहीं कर सकता रंजीत साहब ।।"



"क्यों?"



"क्या मालूम, वह आपका' भाई न हो ।"

"सबकुछ जानबै के बाद भी तुम ऐसा कह रहे हो I" रंजीत ने व्याकुलता से कहा । , .


" आजकल सच्चाई को पहचान पाना बहुत कठिन होता है । कभी कमी तो बड़े-बड़े झूठ सच से ज्यादा सच लगते हैं ।आप हमशक्ल होने की बिनाह पर उसे भाई कह रहे हैँ I"



"मेरे भाई को बनारसी दास उठाकर ले गया था । वह मेरा हमशक्ल ही था I"



डॉक्टर बैनर्जी कुछ न बोला ।



"और जिसकी बात कर रहे हो; वह भी मेरा हमशक्ल डै । रत्ती-भर भी फर्क न होने का मतलब हें कि वह मेरा माई ~ ही है । परायों की शवलें हूबहू नहीं मिलतीं। वह कहां है?" . .



"मकान पर ही है । उसे बांधकर आया हू।"



"चलो डॉक्टरा मैँ उससे बात करूंगा । उसके बाद तुम ही फैसला करना । बनारसी दास की तस्वीर भी यहां मौजूद है । वह भी-मैं साथ ले चलूंगा । सब-कुछ सामने आ जाएगा।" रंजीत ने बेसब्री से कहा-"अगर वास्तव में वह मेरा बचपन का बिछड़ा भाई है तो मैं समझूगा, मुझे खजाना मिल गया l”



“अब तो रात हो रही है । आप सुबह आकर उससे बात कर लीजिए ।"


“नहीं । मैं अभी उससे बात करूंगा । उससे बात किए बिना तो अब मुझे नींद भी नहीं आएगी।"



"रंजीत साहब ।” क्षण-भर की चुप्पी के पश्चात् डॉक्टर बैनर्जी बोला-“उसने खुद स्वीकार किया है कि दिल्ली में अपने दोस्तों के साथ मिलकर, बैंक-डकैती की I ऐसे इन्सान को दुनिया के सामने आप अपना भाई कह सकेंगे?"



" डॉक्टर बैनर्जी !” रंजीत श्रीवास्तव के स्वर में विश्वास का पुट था-“अगर वह मेरा भाई है तो ढोल पीटकर उसे भाई कहूग़ा । मेरे पास बहुत दोलन हे I मैं उसकै जुर्म पर दौलत की चादर बिछाकर उसे ढक दूंगा । आप चलिए मैं उससे बात करता हूं। पहले मुझे यकीन तो हो जाए कि वह मेरा माई डै ।”



"बनारसी दास की तस्वीर साथ ले चलिएगा ।"



पन्द्रह मिनट बाद रंजीत श्रीवास्तव डॉक्टर बैनर्जी के साथ बाहर निकला । वह दोनों कार में सवार होने जा ही रहे थे कि फाटक पर गाडी की हेडलाइट चमकी । वह ठिठक गए । कुछ ही देर बाद पुलिस-जीप उसके पास पोर्च में आकर रुकी और इन्सपेक्टर सूरजभान नीचे उतरा । साथ मे दो पुलिस वाले थे ।


सूरजभान उसके पास पहुचा । उसके चेहरे पर नींद और थकावट के भाव छाए हुए थे । आज ही वह दिल्ली जाकर दिल्ली से वापस लौटा था । दिल्ली से वह राजीव मल्होत्रा से सम्बन्धित फाइल ले आया था ।



“माफ कीजिएगा ।" सूरजभान बोला-“आपको बेवक्त तक्लीफ दी ।"



"कोई बात नहीं l" रंजीत श्रीवास्तव स्थिर लहजे में बोला----"बोलो क्या काम है?"



"मुझे आपकी उंगलियों , निशान चाहिएं मिस्टर राजीव मल्होत्रा?" सूरजभान ने कहा !




रंजीत श्रीवास्तव के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभरी !



“मैं रंजीत श्रीवास्तव हू।"



“अवश्य होंगे । लेकिन पहले मैं आपको राजीव मल्होत्रा के रूप में जान चुका हूं जब तक मेरी तसल्ली नहीं होती, तब तक मैं आपको राजीव मल्होत्रा ही समझूगा l" सूरजभान ने स्थिर लहजे मेँ कहा---"मुझे पूरा बिश्वास हे कि आप मेरी बात का बुरा नहीं मानेंगे ओर अपने फिगरप्रिट देंगे ।"



"'कानून की तसल्ली के लिए मैँ सब-कुछ करने को तैयार हूं ।"
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Re: वारदात

Post by 007 » 13 Jul 2017 20:08

. रंजीत श्रीवास्तव ने मुस्कराकर र्कहा। वह जानता था उसकी उँगलियों के निशान राजीव मल्होत्रा की उंगलियों से नहीं मिलेंगे और बाद में इस इन्सपेक्टर को मानना ही पड़ेगा कि यहां सिर्फ रंजीत श्रीवास्तव ही रहता है-"कहा लेंगे आप मेरी ऊंगलियों कै निशानं ।"'


“अगर आप शीशे के गिलास पर दे र्दे तो आपकी बडी मेहरबानी होगी ।"


“शीशे के गिलास पर ही क्यों?”


"क्योंकि वहां पर निशान बहुत स्पष्ट आते हैं I"


नौकर को बुलाकर रंजीत ने शीशे का गिलास मगवाया I जिसे कि इन्सपेक्टर सूरजभान ने अपने हाथों से रुमाल निकालकर साफ किया फिर उस पर रंजीत की उंगलियों की छाप ली ।



" अब तो खुश हो ना इन्सपेक्टर?" रंजीत बोला ।



" मुझे पूरा यकीन है कि इस मामले को लेकर भबिष्य में तुम इस तरफ नहीं आओगे I"

“अगर उंगलियों कै निशान नहीं मिले तो नहीं आऊंगा I" सूरजभान ने मुस्कराकर कहा और गिलास क्रो रूमाल में लपेटे दोनों पुलिस चालों कै साथ जीप मे वहां से चला गया ।




“इन्सपेक्टर की इस हरकत से साबित होता है कि राजीव मल्होत्रा जो कहता हे-वह ठीक है ।" बैनर्जी बोला ।



रंजीत श्रीवास्तव सोचभरे अन्दाज मै सिर हिलाकर रह गया ।



"आपके फिगरप्रिंट दे देने से राजीव मल्होत्रा निर्दोष साबित हो जायेगा I” बैनर्जी-ने कहा I



“हां । यूं समझो पुलिस की निगाहों में तो वह निर्दोष साबित हो ही गया । क्योकि मेरी उंगलियों के निशान उसकी उंगलियों कै निशानों से नहीं' मिलेंगे और इस इन्सपेक्टर को तसल्ली हो जाएगी कि वह गलत राह पर है. I चलो डॉक्टर, राजीव मल्होत्रा से मैं जल्दी बात करना चाहता हूं I"


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फीनिश
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'"तुम तो वास्तव मे वहुत खतरनाक हो I” तारासिंह दांत भींचकर बोला । ।




"तुमने क्या सोचा था कि तुम्हारे ये तीन आदमी मुझे बाँध कर रख सकते हैं?" देवराज ने दात मींचकर कहा ।



"हां l अब मैं तुम्हारी बात का यकीन करता हूं ।" तारासिहे ने कहा -----" तुम वास्तव र्मे बहुत खतरनाक हो ।"



“ठीक कहा तुमने I" देवराज चौहान के गले से मौत क्री-सी गुर्राहट निक्ली----" इन्हें बेहोश ही करता अगर - इन्होंने मेरी जान लेने का इरादा ना बनाया होता I यह मुझे जान से मारने जा रहे थे, इसलिए इन्हें जिन्दा छोडना मेरे उसूल कै खिलाफ था।"



"जान तो मै भी तुम्हारी लेने चाला हूँ।" तारासिंह 'ने हाथ मे दबी रिवॉल्बर हिलाई।



"जब ले लो, तब कहना l" देवराज चौहान ने खूनी स्वर में कहा…“अभी तो मैँ तुम्हारे सामने जिन्दा खडा हूं ,,गोली तुम्हारी रिवॉल्वर के चैम्बर से बाहर नहीं निकली I"



"गोली निकलने में देर कितनी लगती है ।" तारासिह मौत की सी हंसी हँसा ।



"गोली निकलने में तो देर नहीं लगती तारासिह, हा परन्तु कभी कभी ट्रेगर दबाने में देर लग जाती हैं I जैसे अब होती जा रही है I" देवराज चौहान के स्वर में वहशीपन झलकने लगा ।।


'"तुम तो वास्तव मे वहुत खतरनाक हो !” तारासिंह दांत भींचकर बोला ।


"तुमने क्या सोचा था कि तुम्हारे ये तीन आदमी मुझे बाँध कर रख सकते हैं?" देवराज ने दात मींचकर कहा ।


"हां l अब मैं तुम्हारी बात का यकीन करता हूं ।" तारासिहे ने कहा -----" तुम वास्तव र्मे बहुत खतरनाक हो ।"



“ठीक कहा तुमने I" देवराज चौहान के गले से मौत क्री-सी गुर्राहट निक्ली----" इन्हें बेहोश ही करता अगर - इन्होंने मेरी जान लेने का इरादा ना बनाया होता I यह मुझे जान से मारने जा रहे थे, इसलिए इन्हें जिन्दा छोडना मेरे उसूल कै खिलाफ था।"


"जान तो मै भी तुम्हारी लेने चाला हूँ।" तारासिंह 'ने हाथ मे दबी रिवॉल्बर हिलाई।



"जब ले लो, तब कहना l" देवराज चौहान ने खूनी स्वर में कहा…“अभी तो मैँ तुम्हारे सामने जिन्दा खडा हूं ,,गोली तुम्हारी रिवॉल्वर के चैम्बर से बाहर नहीं निकली I"


"गोली निकलने में देर कितनी लगती है ।" तारासिह मौत की सी हंसी हँसा ।


"गोली निकलने में तो देर नहीं लगती तारासिह, हा परन्तु कभी कभी ट्रेगर दबाने में देर लग जाती हैं I जैसे अब होती जा रही है I" देवराज चौहान के स्वर में वहशीपन झलकने लगा था--------" एक बात का ध्यान रखना, यह जंगली इलाका है । गोली की आवाज दूर-दूर तक जायेगी । फायर करके तुम बचे नहीं रह सकते I”


"आज तक तो मैंने ना जाने कितने फायर किए हैं I फिर भी बचा हुआ हूं।"



"तो फिर आज आखिरी फायर करके देख लो ।" देवराज चौहान गुर्रांया ।



तारासिह ने दांत भीचकर रिवॉल्वर वाला हाथ सीधा किया कि तभी उसे अपनी पीठ पर चुभन महसूस हुईं । उसका हरकत करता जिस्म ठिठक' गया । पीछे से महादेव का वेहद खतरनाक स्वर उसके कानों में पड़ा----,"खवरदार एक इंच भी हिले तो मैं तुम्हारी पीठ मैं छः की छः गोलियां उतार दूंगा ! इसी तरह खड़े रहों-अगर खैरियत चाहते हो तो !"




तारासिंह ठगा-सा खडा रह गया । उधर देवराज चौहान जव तारासिह से बातें कर रहा था तो तारासिंह कै पीछे उसने महादेव की झलक पा ली थी , इसी कारण उसने तारासिंह को बातों मे लगाए रखा और वह चाहता था कि महादेव भी वात सुनकर स्थिति भांप ले और उसी के मुताबिक कदण उठाए।



"कौन हो तुम?" तारासिंह होंठ र्मीचकर कह उठा ।।



"छोडी इस बात को कि मै कौन हूं I" महादेव का लहजा खतरनाक था-"अपने हाथ में पकडी रिवॉल्वर ढीली करो । मेरा हाथ रिवॉल्वर लेने कै लिए आगे आ रहा है !"



इसके साथ महादेव का दूसरा हाथ आगे आया और तारासिंह कै हाथ में दबी रिवॉल्वर को लेकर, सामने खडे देवराज चौहान की तरफ उछालते हुए तारासिंह को धक्का दिया ।




तारासिंह लड़खड़ाता हुआ कमरे के भीतर आ गया । चुकी देवराज चौहान कै हाथ में महादेव की फेंकी रिवॉल्वर दब चुकी थी !


तारासिंह ठिठका और पलटकर महादेव को देखा तो चोंक पडा । * तुम तो दिन में यहां आये थे ।" पडोस में रहते हो !”



" तो ?"



"तुम्हारा इस मामले से क्या मतलब?" तारासिह कै चेहरे असमंजसता कै भाव थे ।


“कोई मतलब नहीं । कोई वास्ता नहीं । यूं ही टहलते हुए इस तरफ निकल आया था l" महादेव ने लापरवाही से कहा ।



“तुम्हारी रिवॉल्वर कहां है?" तारासिंह ने एकाएक होंठ भींचकर कहा ।”


"रिवॉल्वर-कैसी रिवॉल्वर?" महादेव होले से हंस पड़ा l



"जो तुमने मेरी पीठ पर लगाई थी I"



"मैंने कब कहा कि मैंने कोई रिवॉल्वर तुम्हारी पीठ से लगा रखी थी । मैँ तो मजाक कर रहा था । रिवॉल्वर का मेरे पास क्या काम , मैंने तो अपनी उंगली तुम्हारी पीठ पर गड़ाई थी I"




तारासिंह का चेहरा क्रोध से स्याह पड़ गया । उसके दांत भिच गए ।
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