वारदात complete novel

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Re: वारदात

Post by 007 » 09 Jul 2017 08:08

देवराज चौहान ने कार को सडक के किनारे रोका और ब्रीफकेस लेकर उतरते हुए गली में प्रवेश कर गया ।


दो-तीन गलियां पार करने के पश्चात् वह एक घटिया-से इलाके में पहुचा जहा कच्चे-पक्कै मकान वने हुए थे । उन्ही मकानों की एक गली में उसने प्रवेश किया और एक मकान के सामने जाकर ठिठका ।


फिर आगे बढ़कर मकान का दरवाजा खटखटाया ।


कुछ ही पलों में दरवाजा खुला । दरवाजा खोलने वाला साठ वर्षीय बूढा था ।


"आओं बेटा देवराज चौहान?" बूढा उसे देखतें ही बोला-"मैं सोच ही रहा था कि वहुत दिन हो गए तुम्हें आये I” कहते हुए वह पीछे हटा तो देवराज चौहान भीतर प्रवेश करते हुए बोला ।

"चचा I तुम तो जानते ही हो कि मेरा काम केसा । मालिक के साथ पन्द्रह-पन्द्रह दिन टूर पर रहना पडता है । खुद नहीं पता होता कि आने वाले दिन में मैंने कौंन से शहर होना हे I"


"सो तो है बेटा । पेट पालने की खातिर सबकुछ करना पढ़ता हे I" बूढा सिर हिलाकर बोला ।


"चचा, आज चाय नहीं पिलाओगे ।"



"तो क्या अभी फिर जाओगे ?" बूढ़ा ने हैरानी से उसे देखा I



"हां चचा I मालिक के साथ काम हे । मैं तो समझो तुमसे सिर्फ मिलने आया हूं।"


"ठीक है । मैँ चाय बनाकर लाता हूं।" बूढा सिर हिलाता हुआ किचन की तरफ बढ़ गया ।


देवराज चौहान आगे बढा और वन्द कमरे के सामनै ठिठका । दरवाजे पर ताला लटक रहा था । जेब से चाबी निकालकर ताला खोला और भीतर प्रवेश कर गया ।



कमरे में एक तरफ चारपाई बिछी थी । दूसरी तरफ लकडी की बहुत पुरानी आलमारी थी जोकि उसी बूढे की थी । डैढ़ साल से देवराज चौहान ने यह कमरा किराये पर ले रखा था । बूढे से यह कहकर कि वह टूर का काम करता हे । महीने में पच्चीस दिन तो उसे टूर पर शहर से बाहर ही रहना होता है । हर महीने वह बूढे को वक्त पर किराया दे दिया करता था ।



देवराज चौहान ने आलमारी खोलकर ब्रीफकेस उसमें रखा I जेबों में रखे नोट निकालकर आलमारी में रखै । तत्पश्चात् कपडे उतारकर नये कपडे पहने । फिर आलमारी से कुछ नोट निकालकर जेब में ठूंसे और बाहर आकर हाथ-मुंह धोकर बालों में कंघा किया । अब वह खुद क्रो फ्रेश महसूस कर रहा था ।



तभी बूढा चाय बना लाया ।



"लाओ चचा ।" देवराज चौहान उसके हाथ से चाय का गिलास थामता हुआ बोला-" तुम्हारे हाथ की बनी चाय तो मुझे हमेशा ही अच्छी लगती है । जब टूर पर रहता हूं तो तुम्हारी चाय मुझे कई बार याद आती हे ।"



बूढा हौले से हंसकर रह गया ।



देवराज चौहान ने चाय का घूंट भरा फिर जेब से रुपये निकालकर उसको को थमाए ।


"इस महीने का किराया I"



"तुम रहते तो हो नहीं । कमरा वन्द ही पड़ा रहता हे I किराया देकर ....।"

" चाचा अब मैँ भी क्या करूं , मेरा काम ही ऐसा है कि मुझे शहर से बाहर रहना पड़ता है ।"



बहरहाल चाय समाप्त करने कै पश्चात् देवराज चौहान ने बूढे चचा से चन्द और ऐसी ही बातें कीं । फिर जल्दी आने क्रो कहकर बाहर निकल गया I अपने कमरे पर ताला लगा दिया था l यह कमरा उसने मुसीबत के समय के लिए
किराए पर ले रखा था कि कभी भागने छिपने की ज़रूरत पड गई तो कोई तो जगह हो । वेसे भी उसे कोई तो जगह चाहिए ही थी कि जहां वह अपना माल-पानी रख सकै । इतनी देर लगातार वह कभी भी किसी जगह पर नहीँ रहा था । परन्तु रंजीत श्रीवास्तव को सबक सिखाने ओर उसे कंगाल बनाने के लिए उसने जो योजना बनाईं थी वह जरा लम्बी और धीरे-धीरे काम करने वाली थी, इसी कारण पिछले छ: महीने से वह बिशालगढ़ में रुका पड़ा था ।


देवराज चौहान वापस अपनी कार में बैठा और कार आगे बढा दी । होंठों के बीच सुलगती सिगरेट र्फसी हुई थी ।


चेहरे पर गहरी सोच के भाव उभरे पड़े थे |

उसने कलाई पर बंधी घडी में समय देखा रात कै ग्यारह बज रहे थे । पौन घंटा कार ड्राइवर के पश्चात् उसने कार को महलनुमा खूबसूरत बंगले के ऊंचे चौड़े फाटक कै सामने-रोका और हॉर्न बजाया । कार की हेडलाईट से फाटक पूरी तरह रोशन था । उसके हॉर्न बजाते ही वर्दीधारी दो नेपाली दरबान फौरन प्रकट हुए । उन्होंने कार को देखा और अगले ही पल आनन-फानन फाटक खोल दिया और सलाम की मुद्रा में उनके हाथ माथे तक पहुच गए ।



देवराज चौहान ने कार को विशाल बंगले कै पोर्च में ले जा रोका । इंजन बन्द करके वह कार से उतरा ही था कि सदर द्धार से वर्दीधारी नोकर प्रकट हुआ ।



"सलाम साहब ।" नौकर बोला l



"सलाम ।" देवराज चौहान ने सिर हिलाया-"कैसे हो रामलाल ? "



"अच्छा हूं साहब जी !! मालिक आपको सैकडों बार याद कर चुके हैं l” रामलाल ने बताया ।



देवराज चौहान ने सिर हिलाया फिर भीतर प्रवेश करता चला गया I



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फीनिश
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देवराज चौहान ने कमरे के वन्द खूबसूस्त दरवाजे को थपथपाया I



"कम इन ।।" भीतर से आता भारी रवर उसके कानों में पड़ा I


देवराज चौहान ने दरवाजा खोला और भीतर प्रवेश कर गया I


सामने ही रंजीत श्रीवास्तव टहल रहा था । शरीर पर सिल्क का कीमती गाऊन था । पांवों में कीमती स्लीपर थे । उसका खूबसूरत चेहरा इस समय निचुड़ा हुआ लग रहा था । सिर के बाल बिखर का माथे पर झूल रहे थे l वह स्पष्ट ही बहुत परेशान नजर आ रहा था । चेहरे पर व्याकुलता और सख्ती के भाव नाच रहे थे I परेशानी मेँ वह कभी कभी दांत किटकिटा उठता था, जैसे उसे समझ ना आ रहा हो कि उसे क्या करना चाहिए ।




देवराज चौहान को देखकर वह ठिठका I कुछ कहने ही वाला था कि एकाएक फोन की घंटी बज उठी ।


उसका खुला मुंह बन्द हो गया और त्तेजी से फोन की तरफ झपटा । जल्दी से रिसीवर
उठाकर कान से लगाया I



"हैलो"


"मालिका मैं शेरसिंह.... I"



"काम हुआ कि नही?" उसकी बात काटकर रंजीत श्रीवास्तव ने अधीर स्वर में कहा ।


"नहीं मालिक !"



"क्यों नहीँ हुआ?" रंजीत कै होठों से गुर्राहटभरा स्वर निकला-“बारह घण्टों में तुम उसे तलाश नहीं कर सके । काम करना भूल गए या में सिखाऊं तुम्हें काम करना I हराम का माल खाने क्री आदत पढ़ गयी है तुम्हें I"




"मालिक हम पूरी कोशिश कर रहे हैँ कि डॉक्टर बैनर्जी को कैसे भी हो, कहीँ से भी तलाश करें ।"



"शेरसिंह ! मुझे नहीं सुनना कि तुम कोशिश कर रहे हो या नहीं । मुझे काम चाहिए । डॉक्टर बैनर्जी को हर हाल में मैं अपनी पकड में देखना चाहता हू। यह बहुत नाजुक मामला हैं l”



“मैँ समझ रहा हू मालिक ।"



“समझ रहे हो तो काम की गति तेज करों । शहर में चारों तरफ अपने आदमी फैला दो I उस हरामी डॉक्टर को हर हाल में मैं वापस उसी जगह देखना चाहता हूं I" रंजीत श्रीवास्तव एक-एक शब्द चबाकर बोला…"और फोन पर मुझे बराबर रिपोर्ट देते रहो कि तुम क्या गुल खिला रहे हो I"


"जीं मालिक I"



“जल्दी करो! जल्दी तलाश करो उसे ।" रंजीत श्रीवास्तव ने क्रोध से रिसीवर वापस रखा ओर कांपते हाथों से सिगरेट सुलगाकर बेचैनी से चहलकदमी करने लगा । होंठ सख्ती से भिंचे हुए थे ।



देवराज चौहान ने फोन पर हुई सारी बात सुनी । डेढ साल से वह रंजीत श्रीवास्तव के साथ था, परन्तु इस दौरान में उसने कभी शेरसिंह या डॉक्टर बैनर्जी का नाम नहीं सुना था I जबकि वह यहीँ सोचता था कि रंजीत श्रीवास्तव की कोई बात उससे छिपी नहीं हुई डै । लेकिन अब उसे मालूम हो गया था कि उसका ख्याल कितना गलत हे । रजीत श्रीवास्तव की कई बातें उसे नहीं मालूम l



साथ ही वह मन ही मन हैरान था कि रंजीत श्रीवास्तव को क्या हो गया हे । इतना परेशान और चिंतित तो उसने उसे कभी भी नहीँ देखा था । दो तीन दिन पहले तो वह उसे ठीक-ठाक छोडकर गया था परन्तु इस समय वह अपने हाव-भाव से आधा पागल नजर आ रहा था ।




“नमस्कार मालिक !"



देवराज चौहान की आवाज सुनकर रंजीत श्रीवास्तव ने ठिठकंकर उसे देखा । सोचों में वह इतना व्यस्त था कि कमरे में खड़े देवराज चौहान कै बारे में मी भूल सा ही गया था l



"ओह तुम !! तुम कहां चले गये थेदेवराज चौहान?" रजीत श्रीवास्तव ने तीखे स्वर में कहा l



“आपसे तीन दिन की छुटूटी लेकर गया था । गांव में अपने घरवालों से मिलने ।"



"तुम्हें तुम्हें अभी जाना या गांव ।" रंजीत श्रीवास्तव ने दांत भींचकर कहा ।



देवराज चौहान मन ही मन हैरान हुआ । रंजीत ने आज तक उससे इस लहजे में बात नहीं की थी । बहरहाल इतना तो स्पष्ट ही जाहिर हो गया था कि रंजीत किसी वडी मुसीबत में फसा बैठा था ।
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Re: वारदात

Post by 007 » 09 Jul 2017 08:09

"क्या हो गया मालिका बात क्या है?" देवराज चौहान ने सामान्य स्वर मेँ पूछा ।



"बात! बात वहुत ही गम्भीर है?" रंजीत श्रीवास्तव कहते कहते ठिठका ।

देवराज चौहाँन कै चेहरे पर निगाह मारकर पुन: बेचैनी से चहलकदमी करने लगा I वह समझ नहीँ पा रहा था कि देवराज चौहान को कैसे बताए कि वह असलं में रंजीत नहीं अशोक हे । चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी द्वारा उसने अपना चेहरा रंजीत जैसा वना रखा है । देवराज चौहान को बताने का मतलब था अपनी कमजोरी उसके हाथ में देना और यह ऐसी बात थी कि जो उसके खिलाफ कभी भी इस्तेमाल की जा सकती थी । वह फैसला नहीं कर पाया कि देवराज चौहान को वह कुछ बताये या नहीं । अगर बता दे तो शायद यह असली रंजीत और डॉक्टर बैनर्जी को ढूंढ निकाले ।



रंजीत इस प्रकार खामोश होते देखकर देवराज चौहान मन ही मन बहुत हैरान हुआ ।



"मालिक । बात क्या है" देवराज चौहान ने सामान्य लहजे में कहा-"आज पहली बार है कि आप मुझे कुछ बताते-बताते रुक गये और फिर यह शेरसिंह और डॉक्टर बैनर्जी कौन हैं? मैने तो आज तक इनका नाम नहीं सुना । क्यों ढूंढा जा रहा है र्डोंक्टर बैनर्जी क्रो । फोन पर आप कह रहे थे कि बहुत नाजुक मामला है । मेरी तो समझ में कुछ भी नहीं आ रहा । आप मुझे कुछ नहीं बता रहे । इसका मतलब आपका मुझ पर से विश्वास उठ गया है ।"



रंजीत उर्फ अशोक ने फोरन ही फैसला कर लिया था कि अभी वह इस बारे में देवराज चौहान को कुछ नहीं बताएगा । उसकै आदमी तलाश तो कर हो रहे हैं डॉक्टर बैनर्जी को I



“ऐसी कोई बात नहीं देवराज चौहान, जैसा कि तुम सोच रहे हो । कोई खास बात; खास वजह नहीं है । मामूली-सा मामला हे । मै तुम्हें बताने की जरूरत नहीं समझता l तुम्हें मै वही काम देता हू जो किसी दूसरे के वस का नहीँ हो । जाओ तुम आराम करो । कल सुबह हम इस बारे में बात करेंगे ।"



"जैसी आपकी इच्छा ।" देवराज चौहान बाहर निकला और उस कमरे की तरफ बढ़ गया जो उसे रहने के लिए मिला हुआ था । चेहरे पर सोच के गहरे भाव विद्यमान थे ।



देवराज चौहान कै जाते ही रंजीत पुन: बेचैनी से चहलकदमी करने लगा । वह खुद को बेहद खतरे में महसूस कर रहा था । डाँक्टर बैनर्जी उसकी कैद से भाग निक्ला है । अगर वह असली रंजीत क्रो लेकर पुलिस के पास पहुच गया तो वह सीधा जेल मे पहुँच जाऐगा ।

डॉक्टर बैनर्जी ने उसके चेहरे पर की प्लास्टिक
सर्जरी साफ कर दी तो तब भी वह फंस जायेगा । उसका नकली होना सबके सामने आ जाएगा। तो वह क्या करे?



कई घण्टे सोचते रहने के पश्चात् रंजीत उर्फ अशोक ने फैसला किया कि अब उसका खेल खत्म होने को है । देर सवेर में, जल्दी ही वह कानून के फंदे में र्फसने वाला है । इससे पहले कि ऐसा वक्त आए? उसे हमेशा के लिए यहां दूरे खिसक जाना चाहिए । जो हाथ लगे उसे लेकर भाग जाना चाहिए । वरना एक बार भी जेल में पहुंच गया-पुलिस के चक्कर में फ़ंस गया तो फिर उसे कोई भी बचा नहीं पायेगा ।



आखिरकार उसने यही निश्चय कि कल वह बैंकों वगेरह से या जहा भी माल पड़ा है, लेकर सव-कुछ समेटकर ज्यादा से ज्यादा जितना भी हो सकै लेकर हमेशा के लिए यहां से खिसक जायेगा ।



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फिनिश
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हमेशा क्री भांति देवराज चौहान सुबह सात बजे तैयार होकर हटा ही था कि नोकर ने आकर कहा मालिक ने फोरन याद किया हे ।


देवराज चौहान रंजीत श्रीवास्तव कै कमरे में पहुचा ।



"गुड मॉर्निंग सर । आपने मुझें याद किया ?" देवराज चौहान बोला ।



रंजीत उर्फ अशोक ने गर्दन घुमाकर देवराज चौहान को देखा ।



“आओ देवराज चौहाना आज हमें वहुत ही खास काम करना है I” उसने कहा ।



" क्या मालिक? "



“पार्टी को आज कैश पेमेंट देनी हे । दो-तीन् बैंकों में जाकर पैसे को इकट्ठा करना हे । तुम मेरे साथ रहोगे !"



"यह काम तो आपका सैकेट्री भी कर सकता हे I” देवराज चौहान बोला ।


"नहीं । कैश रकम का मामला है । रकम बहुम मोटी है इस बार । यह काम मैं खुद करना चाहता हूं।"



"जैसी आपकी इच्छा ।"


"ठीक साढे नौ बजे हम यहां से निकलेंगे I" रंजीत ने सिर हिलाकर कहा ।

"ठीक है । मुझे थोडा-सा काम हे । उसे निपटाकर मैं नो बजे तक वापस आ जाऊंगा ।"



"मुझे तुम्हारे किसी काम से कोई मतलब नहीं ।" रंजीत श्रीवास्तव शुष्क स्वर में बोला-"ठीक साढे नौ बजे जब मैँ बाहर निकलूं तो तुम्हें अपनी कार के पास खड़े पाऊ । ड्राइवर हमारे साथ नहीं चलेगा I तुम ड्राइव करोगे I”


"जी ।" इजाजत लेकर देवराज चौहान बाहर निकल गया ।


उसकी आंखों में तीव्र चमक लहरा रही थी I



देवराज चौहान के जाते ही रंजीत श्रीवास्तव ने उठकर दरवाजा वन्द किया ओर आगे बढकर एक तरफ़ रखी तिजोरी का लॉक खोला । तिजोरी नोटों की -गड्डियों और जवाहरतों से भरी पडी थी । रजीत ने दरवाजा बन्द कर दिया । आज उसे यह जगह हमेशा के लिए छोड देनी थी । जो माल भी हाथ लगना था उसके साथ । सबकुछ ठीक-ठाक कट रहा था, वह रंजीत बना ऐश कर रहा था परन्तु डॉक्टर बैनर्जी ने उसकी कैद से भागकर सारे मामले का सत्यानाश कर दिया था । इससे पहले कि हेराफेरी का मामला बनाकर पुलिस उसे पक्रड़े, उसे फोरन यहां से खिसक जाना चाहिए था । जोकि आज वह करने जा रहा था ।

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फिनिश
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देवराज चौहान ने कार रोकी और उतरकर खूबसूरत अपार्टमेंट की इमारत में प्रवेश कर गया । लिफ्ट से वह पहली मजिल पर पहुचा और एक फ्लैट की बैल बजाई ।


दरवाजा खोलने वाला राजीव मल्होत्रा था ।

उसने प्रश्नभरी निगाहों से देवराज चौहान को देखा ।


देवराज चौहान मुस्कराया !


"कौन हैं आप ?” राजीव की खोजपूर्ण निगाह उस पर ही टिकीं थी ।



"देवराज चौहान !"


"किसने भेजा हे आपको ?" राजीव ने अपना शक दूर करना चाहा ।


"नकाबपोश ने ।"



राजीव ने उसे भीतर आने दिया । फिर दरवाजा वन्द कर लिया । भीतर आकर देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई और फ्लैट में निगाह मारता हुआ बोला I

“उसने तुम्हें दो दिन जो समझाया वह तुम ठीक तरह समझ चूकै हो?”


"हां !"


" भूल तो नहीँ जाओगे?" देवराज चौहान ने उसकी आखों में झांका I



“नहीं I"


"गुड I काम कं लिए तैयार हो?"


"तैयार ही समझो I” राजीव मल्होत्रा ने गहरी सांस ली ।



"रंजीत श्रीवास्तव के साईन की काॅपी कर लेते होए. I" देवराज चौहान ने पूछा ।



"हां । लगातार इसी काम का अभ्यास करता रहा हू। हू-ब-हू साईन कर लेता हू।"


"समझदार आदमी हो ।" देवराज चौहान मुस्कराया l राजीव मल्होत्रा कुछ नहीँ बोला I "आज तुम्हें काम शुरु करना है ।"



"मुझें जो कहोगे, कर दूंगा ।"


“दिन में मैं किसी भी समय आ सकता हू I हरदम तैयार रहना ।" देवराज चौहान ने कहा I


राजीव ने सिर हिलाया I



" तुम्हें वहा पहुंचकर वहां की सारी दौलत मेरी तरफ सरकानी हे । याद है ना?"



“हा, याद है । अब क्या वह नकाबपोश मेरै पास नहीं आयेगा?"



"उसे भूल जाओ I सिर्फ मुझे याद रखो । उसका काम समाप्त हो चुका है । अब तुम्हें वहीँ करना है जो मैँ कहूंगा II उसने मेरे कहने पर तुम्हें जिन्दा करवाया था । जिसने जिन्दा किया वह तांत्रिक मेरी जान-पहचान का था । मेरे कहने पर ही उसने तुम्हें जिन्दा किया था I समझे । तुम पर किए गए इतने बड़े अहसान का असली हकदार में हूं । वरना अब तक तो तुम्हारा शरीर कब का मिट्टी में मिल चुका होता । तुम्हारा वजूद ही इस दुनिया में नहीं होता । अच्छी तरह समझ लो कि मैँ तुम्हारा ज़न्मदाता हू I "


राजीव मुस्कराया ।


"तुम्हारे इसी अहसान को उतारने के लिए तो में यह सव करने जा रहा हू I "

"तभी तो कहत्ता हूँ कि समझदार हो । कोई बात समझानी नहीं पडी तुम्हें !" देवराज ने कश लेकर सिर हिलाया----" आशा हे दोपहर तक आ जाऊंगा, तुम चलने के लिए तैयार रहना ।"


"चिन्ता मत कसे। मैं चलने कें लिए हर समय तैयार रहूँगा I"



देवराज चौहान बिना कुछ कहे बाहर निकल गया ।



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Re: वारदात

Post by 007 » 09 Jul 2017 08:09

ठीक साढे नौ बजे रंजीत श्रीवास्तव देवराज चौहान के साथ कार में बैठकर बंगले से बाहर निकला । देवराज चौहान कार ड्राइव कर रहा था । रंजीत कुछ बैचेन-सा था । दरअसल वह जल्द से जल्द इस शहर से, विशालगढ़ से निकल जाना चाहता था । तिजोरी में रखा सारा माल, इस समय सूटकेस से भरा कार की पिछली सीट पर मोजूद था । देवराज चौहान ने रंजीत की बेचैनी भांप ली थी 1 परन्तु वह समझ नहीं पा रहा था कि रंजीत की व्याकुलता के पीछे असल कारण क्या है? आज से पहले उसने रंजीत को इतना परेशान और व्याकुल नहीं देखा या । इतना तो वह जान ही चुका था कि कोई खास गम्भीर मसला हे, जिसके बारे में उसे रत्ती भर भी आभास नहीं । रंजीत भी इस बारे में बताने से उसे गुरेज कर रहा है ।



‘रंजीत की यह बात भी उसे फिजूल ही लग रहीँ थि कि किसी पार्टी को पेमेंट करने के लिए बैंक से पैसा निकालना है । आज से पहले तो मैंने एक बार भी रंजीत को बैंक का रुख करते नहीं देखा था । चाहे कितनी बडी पेमेंट ही पार्टी को क्यों ना करनी हो I



"पहले कहाँ चलना है ?" देवराज चौहान ने कार ड्राइव करते हुए पूछा ।


"माल रोड वाले बैंक चलो ।"



उसकै बाद वह लोग तीन बैंकों में गए । रास्ते में उन्होंनै एक बड़ा सूटकेस और खरीदा। देवराज चौहान क्रो बाहर कार मैं ही बिठाकर रंजीत बैंक में जाता, सूटकेस साथ ले जाता । "बैंक से निकाले गए नोटों को सूटकेस में डाल लाता । दूसरा सूटकेस कार की पिछली सीट पर ही पड़ा रहता था ।



फिर देवराज चौहान ने कार को आँफिस के मोर्च में रोका आँफिस की तिजोरी में भी काफी माल पडा था । रंजीत उस पर हाथ फेरना चाहता था ।

वह ज्यादा से ज्यादा कैश हासिल कर लेना चाहता था । कार से उतरते हुए वह देवराज चौहान से बोला----“तुम नया वाला सूटकेस लेकर मेरे साथ आओ ।"



देवराज चौहान फौरन कार से उतरा और पिछली सीट पर पडा नोटों से भरा सूटकेस निकाला ।


"दूसरा वाला कार में ही रहने दूं?" देवराज चौहान ने रंजीत को देखा ।।



"हां सूटकेस ऊपर छोडकर तुम नीचे आ जाना । यहीँ कार के पास, मैं आधे घण्टे में आ जाऊंगा । फिर यहाँ से चलेंगे। ज़ल्दी करो।.मेरे पास समय कम हे ।"



देवराज चौहान सूटकेस उठाए रंजीत के साथ आगे वढ़ गया । दस मिनट में ही रंजीत को छोडकर पार्किग में खडी कार में वापस आ-बैठा I फिर जेब से छोटी सी मास्टर की' निकाली और पिछली सीट पर पड़े सूटकेस को खोलकर भीतर झांका । सूटकेस में सोना-जेवरात और नोटों की गड्डियां भरे पड़े थे ।



देवराज ,चौहान के होंठ अजीब-सी मुद्रा में सिकुड गए । आंखों में सोच के भाव नजर आने लगे । उसने सूटकेस बन्द करके उसे पुन: लॉक कर दिया । देवराज चौहान को समझते देर ना लगी कि इस सूटकेस का `माल बंगले में पडी तिजोरी वाला हैं ।


रंजीत ने बंगले की तिजोरी का माल भी सूटकेस में भर रखा हे l बैंकों से भी वह माल इकट्ठा करता फिर रहा है । बात क्या है? उसकी हरकतें तो ऐसी हैं, जैसे वह कहीँ भाग जाने का इरादा रखता हो, लेकिन भागेगा क्यों, अपनी जायदाद छोडकर कौन खामखाह भागेगा ।


जो भी हो, रंजीत कीं हरकत सहीं दिशा की तरफ इशारा नहीँ कर रही थी ।


देवराज चौहान ने मुस्कराकर सूटकेस पर हाथ फेरा फिर सिगरेट सुलगा ली । आंखों में तीव्र चमक विद्यमान…हुई पडी थी I वह बेहद निश्चित था ।



आधे घण्टे के बाद रंजीत की वापसी हुई । साथ ने चपरासी था जिसने सूटकेस को उठा रखा था । उसका उठाने का अन्दाजा ही बता रहा था सूटकेस काफी भारी है । कार की
पिछली सीट पर हीँ सूटकेस को रखा गया ।


चपरासी चला गया ।

रंजीत, देवराज चौहान की बगल में आ बैठा; देवराज चौहान ने कार आगे बढा दी । रंजीत क्रो चेहरा अब काफी हद तक तनाव रहित लग रहा था



“कहा चलना हे मालिक?" देवराज चौहान का लहजा हमेशा की भांति सामान्य था ।



“चलते रहो । अभी बताता हूं।" रंजीत ने सिर हिलाकर कहा और सिगरेट सुलगा ली ।



" यहां पास में ही मैने फ्लैट खरीदा है !" एकाएक देवराज चौहान ने कहा-"छोटा-सा फ्लैट है । आप चहा चलेंगे तो मुझे खुशी होगी । वैसे भी आप कुछ थके-से लग रहे हैं । एक कप चाय मेरे हाथ की पी लीजियेगा ।"



“ मुझे कही पहुचना हे देवराज चौहान !" रंजीत ने कहा ।


"ज्यादा देर नहीं लगेगी सर ।"


" ठीक है ! अब तुम्हारा दिल नहीं तोडना चाहता । चाय पीने तक ही वहां ठहरूंगा ।"



"मेरे लिए इतना ही बहुत हे मालिक ।" देवराज चौहान के होंठों के बीच जहरीली मुस्कराहट उभरी ।



लगभग पन्द्रढ मिनट के बाद देवराज चौहान ने अपार्टमेंट के कम्पाउण्ड मे कार रोकी ।



"इन सूटकेसों की तो यहां नहीं छोडा जा सकता ।” एकाएक रंजीत बोला… . … इनमें पैसा है ।"



"कोई बात नहीं । इन्हें साथ लिए चंलते हैं । पैसा इस प्रकार कार में छोडना ठीक नहीं ।" देवराज चौहान ने काऱ में से दोनों सूटकेस निकालक्रंर दोनों हाथों में पकड लिए ।



"आइए ।"' देवराज चौहान रंजीत श्रीवास्तव को साथ लिए अपार्टमेंट में प्रवेश कर गया । लिफ्ट से वह पहली मजिल पर पहुचा फिर फ्लैट के दरवाजे कै समीप पहुंच ठिठका । कालबेल दबाकर बोला ।



"कुछ दिन पहले ही मैँने यह फ्लैट खरीद।।”


रंजीत श्रीवास्तव ने सिर हिलाया । जितना पैसा उसने इकट्ठा करना था वह कर चुका था । अब कुछ देर के लिए वह भी शान्ति से सोचना चाहता था कि इस दौलत कै साथ देश के किस हिस्से रूख करे ।

इसी कारण वह फ्लैट पर चला आया था ।।


देवराज चौहान ने पुन: वैल बजाई ।



"भीतर कौन है?" रंजीत ने पूछा



“दोस्त ।। दोस्त हे मेरा ।" देवराज चौहान मुस्कराया ।


तभी दरवाजा खुला ।


राजीव मल्होत्रा ने दरवाजा खोला था ।


अपने चहेरे वाले को देखते ही एकाएक रजीत श्रीवास्तव की आंखें फेल गई ।



वह हड़बड़ाया । इससे पहले कि वह कुछ कर पाता देवराज चौहान ने उसके चेहरे के भावों को पहचाना । हाथों में पकडे सूटकेस छोड़े । रंजीत श्रीवास्तव को कन्धे से थामकर भीतर धकेला । सूटकेस से लडखडाने के बाद रंजीत छाती कै बल कमरे कै फर्श पर जा गिरां ।



राजीव तो फौरन ही पीछे हट गया था । नीचे गिरते ही रंजीत श्रीवास्तव ने फुर्ती के साथ उठना चाहा कि एक ही छलांग में देवराज चौहान उसके सिर पर था, अपना जूता उसने नीचे पड़े रंजीत की पीठ पर रखा और राजीव से बोला ।



"दोनों सूटकेस भीतर करके दरवाजा बन्द करो । जल्दी ।" राजीव ने फौरन दोनों सूटकेस भीतर किए और दरवाजा बन्द कर दिया ।।




“छोडी मुझे !" नीचे पड़ा अशोक उर्फ रंजीत त्तड़फा ।



देवराज चौहान का चेहरा सख्त हुआ पडा था ! उसने जूते का दबाव और बढा दिया !!



रंजीत के होंठों से पीड़ाभरी कराह निकली ।


"तुम्हारी यह हिम्मत !" रंजीत दहाड़ा-"मैँ तुम्हें नौकरी से निकाल दूंगा ! तुम्हारा ऐसा बुरा हाल करूंगा कि तुम दोबारा जन्म लेने से भी इन्कार कर दोगे । मैं… 'मै' !"



"चुप !" देवराज चौहान के होंठों से गुर्राहट निकली-" बहुत हो गया मालिक-मालिक । तेरे को र्फसाने और अपना जाल बुनने में मैंने अपने छ: महीने खराब कर दिए । अब उन छ: महीनों की कींमत वसूलने का समय आ गया है ।"



"क्या मतलब?" रजीत के होंठों से पीडा और डैरानी वाली आवाज निकली-“ओर यह कौन है तुम्हारे साथ, मेरी शक्ल वाला ? तुम क्या करने जा रहे हो?"

"अभी मेरै पास वक्त नहीं है ज्यदा बात करने का ।" देवराज चौहान नै दांत किटकिटाकर कहा-“ कुछ घण्टे के बाद फिर आऊंगा तव तुझे तेरे हर प्रश्व का उत्तर दूंगा I” कहने के साथ ही देवराज चौहान ने उसकी पीठ से अपना जूता हटाया और अगले ही पल जूते की एड्री 'ठक' के साथ उसकी कनपटी पर दे मारी I



रंजीत श्रीवास्तव के होंठों से कराह निकली और वह बेहोशी की गर्त में डूबता चला गया ।



देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई 'और कश लेकर राजीव ,से बोला ।



_ _ "इसके कपडे उतारो और पहन लो ।"


~ राजीव आगे बढकर बेहोश पड़े रंजीत के कपड़े उतारने लगा ।



' "इसका चेहरा तो बिल्कुल हीँ मुझसे मिलता है ।" क्रपड्रे उतारता हुआ राजीव बोला ।



"तभी तो तुम्हें जिन्दा कराया था । तमी तो इस काम तुम्हारा इस्तेमाल किया जा रहा है l" देवराज चौहान बोला ।




राजींव ने रंजीत के शरीर पर से कपड़े उतारकर, खुद पहन लिए। देवराज चौहान ने अण्डरवियर पहने बेहोश पड़े रंजीत के हाथ-पांब कसकर बांधे । फिर मुंह में कपड़ा ठूंसा, ताकि होश मे आने पर वह चीख न सके ।
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Re: वारदात

Post by 007 » 09 Jul 2017 08:10

तत्पश्चात सुटकेसो को कमरे मे ले जाकर रखा औंर उस कमरे पर ताला लगगा कर पलटा ।


राजीव को देखा ।



राजीव ने सहमति मे सिर हिला दिया -I


"ध्यान रखना, अब तुम राजीव मल्होत्रा नहीं । रंजीत श्रीवास्तव हो I शहर की जानी मानी हस्ती ।"



राजीव ने पुन: सिर हिला दिया ।


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देवराज चौहान ने कार बंगले कै फाटक के मास रोकी और उसकी निगाहें वहां खडी पुलिस जीप पर जा टिकीं जोकि बैक होने जा रही थी I परन्तु उन्हें देखते हीं ठिठक गई ‘I



जीप रुकते ही उसमें से इन्सपेवटर सूरजभान नीचे उतरा और ड्राइविंग सीट` पर बेठे, देवराज चौहान के समीप जा पहुंचा ।


" मिस्टर देवराज चौहान, कल ट्रक नीचे कुचले आदमी के सिलसिले में मैँ आपके बयान लेने आया हू I”



"श्योर आइये! कार कै पीछे भीतर आ जाइये l” कहने कँ साथ ही देवराज चौहान ने दरवान को इशारा किया और खुल चूकै फाटक सै कार ले जाते हुए, उसे पोर्च में ले जाकर रोका I

उसी पल पीछे पीछे जीप आकर रुकी ।


सूरज़भान बाहर आया ।


देवराज चौहान कार से उतंरा और अवब-भरी मुद्रा मे कार का पिछला दरवाजा खोलते हुए सिर झुकाकर कह उठा

" आइये मालिक! "




अगले क्षण राजीव मल्होत्रा , रंजीत श्रीवास्तव बना…उतरा ।


इन्सपेवटर सूरजभान के मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा ।


" इन्सपेक्टर I आप भीतर ड्राइंगरूम मे वेठिए । मै अभी आता हूं।" देवराज चौहान कहने के साथ ही राजीव मल्होत्रा कै साथ आगे बढा कि तभी इन्सपेक्टर सूरजभान ने टोका I


"एक मिनट मिस्टर देवराज चौहान I"


देवराज चौहान के साथ, राजीव मल्होत्रा भी ठिठका I सूरजभान आखों मे आश्चर्य मरे, राजीव मल्होत्रा कौ देखे जा रहा था I



"तुम ?" सूरजभान दो कदम उठाकर उसके पास पहुचा… “तुम कौन हो ?"



राजीव मल्होत्रा के कुछ कहने से पहले ही देवराज चौहान तीखे स्वर में कह उठा I



"तमीज से बात करो इन्सपेक्टर I तुम नहीँ आप कहो । यह हमारे मालिक रंजीत श्रीवास्तव जी हैं ।”



“नहीं । य....... यह रंजीत श्रीवास्तव नही हो सकता I” सूरजभान कै होंठों से निकला I



"क्या मतलब?" देवराज चौहान की आंखें सिकुड़कर छोटी होती चली गयीं ।



"यह इन्सान राजीव मल्होत्रा 'है । बैंक-डकैत्ती और हत्याओं का मुजरिम ।” '



राजीव मल्होत्रा के बदन मे ठण्डी सिरहन दौडती चली गई । देवराज चौहान जोरों से चौंका I



“क्या बकवास कर रहे हो इन्सपेक्टर ।" देवराज चौहान की आवाज में सख्ती भर आई I


"मैं सही कह रहा हूं। यह दिल्सी का रहने वाला, राजीव मल्होत्रा 'हे ।"

“देवराज चौहान ।" राजीव मल्होत्रा ने फौरन खुद को सम्भाला और सिगरेट सुलगाकर शांत लहजे में बोला---लगता है ? इस इन्सपेक्टर का मन अपनी नौकरी से भर चुका है, अब यह आराम करना चाहता है !"



, "मुझे भी यहीँ लग रहा है मालिक ।” देवराज चौहान सख्त निगाहों से सूरजभान को देख रहा था----“इसका कुछ इन्तजाम तो करना ही पडेगा, यह आपके बारे में बहुत खतरनाक बात कर रहा हैं ।"



सूरजभान की व्याकुलताभरी एकटक निगंरह, राजीव मल्होत्रा पर थी।



“अब तुम्हें भीतर आने की जरूरत नहीं इन्सेपेक्टर !" देवराज चौहान से कठोर स्वर में कहा-"मैं दस मिनट में लौटता हूं इसके बाद तुमने जो बयान लेना हो ले लेना । रही बात मालिक की तरफ उंगली उठाने की, सो इस बात का खामियाजा तुम्हें भुगतना ही पडेगा विशालगढ़ का बच्चा-बच्चा मालिक को बचपन से जानता है ।”



सूरजभान को वहीँ स्तब्ध ख़ड़े छोडकर देवराज चौहान राजीव मल्होत्रा कं साथ बंगले में प्रवेश कर गया।



"यह इन्सपेक्टर कौन हैं?” देवराज चौहान ने भीतर प्रवेश करते ही राजीव से पूछा ।



“न मैं नहीं जानता ।" राजीव कुछ नर्वस सा दिखाई दे रहा था ।



"यह कैसे हो सकता है कि तुम नहीं जानते । वह तुम्हारे बारे में सब-कुछ जानता मालूम होता हे । तुम्हारा नाम भी जानता है । तुम दिल्ली के रहने वाले हो, यह भी जानता है ।" देवराज चौहान ने अपने शब्दों पर जोर दिया ।



" व ह कुछ भी जानता हो, परन्तु में इस बारे में कुछ भी नहीं जानता । " 'देवराज चौहान ने इस पर फिर कोई बात नहीं की ।



"यहा की हर वस्तु, हर चीज, बगले का नक्शा, तुम वीडियो फिल्म मे देख बुर्के हो ।" देवराज चौहान ने कहा-"अब आंखों से हर चीज को पहचानते जाओ । यहा पर तुम ऐसे चलो जेसे चलने के अभ्यस्त हो । अपनी चाल से नयापन जाहिर मत करौ ।"



राजीव मल्होत्रा की निगाहे तो पहले ही चारों तरफ दौढ़ रही थीं ।

"यहां पर नौकरों के अलावा, और तो कोई नहीं है । मेरा रिश्तेदार वगैरह?"



. , . "नहीं l तुम यहां कै एकमात्र स्वामी हो। जव मी किसी से ’बात करो । अपनी आवाज में विश्वास रखकर बात करो ।” देवराज चौहान चलते हुए धीरे धीरे कहे जा रहा था-“किसी को शक नहीं होना चाहिए I"



"निश्चित रही । यहा का मामला तो में सम्भाल ही लूंगा । तुम असती रजींत श्रीवास्तव को सम्भाल कर रखना कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी कैद से निकलकर; वह यहां आ पहुंचे l”


"उसकी फिक्र मत करो- !"


" उसकी मुकम्मल इन्तजाम काके नहीं आए ! ह्मध-पाव बांध से इन्सान बेबस नहीं हो जाता । वह किती-न किसी तरह अपने वन्धनों को खौल मी सकता हे । वहां से फरार भी हो सकता है I"


"जानता हुँ। अभी यहां से जाकर उसका ठीक इन्तजाम करूंगा ?!" देवराज चौहान ने कहा ।



"और यह इन्सपेक्टर, मुझे तो वहुत तेज मालूम होता है ।” राजीव ने कहा----"इसका क्या किया जाए ।। यह गडबड कर सकता है । हमारे प्लान को फेल करके , हमें फंसवा सकता है ।"



" इसे तो मैँ अभी सम्भाल लूंगा ।'" देवराज चौहान ने विश्वास-भरे स्वर मे कहा ।



दोनों जीना पार करके ऊपर पहुंचे ।


एक कमरे का दरवाजा खोलकर उन्होने भीतर प्रवेश किया । यह खूबसूरत बेडरुम. का सीर्टिंग रुम था ।


"यह तुम्हारा कमरा है । आराम करो । नौकर तभी तुम्हारे पास आएगा, जब तुम उस बटन को दबाकर उसे यहा बुलाओगे I फोन तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करेंगे । सिर्फ वही फोन, आप्रेटर तुम तक पहुँचाएगा, जो तुम्हारे लिए जरूरी होगा । मुझें बिश्वास हैं कि तुम सव-कुछ आसानी से सम्भाल लोगे !"



" तुम कहा जा रहे हो?"



"रंजीत श्रीवास्तव का पक्का इन्तजाम करने I आज दिन-भर तुम आराम करोगे । कल सुबह मैँ तुम्हें आँफिस ले जाऊंगा । कल तुम्हें अपना काम शुरु करना होगा l कैसे? यह रात को बताऊंगा ।"

राजीव मल्होत्रा ने सिर हिलाया ।



"अब में जाऊं?”



"जाओ I" राजीव मल्होत्रा ने बिश्यास -भरे स्वर में कहा----“रंजीत श्रीवास्तव को कैद से मत निकलने देना ! वह कैद में रहेगा तो में यहा आरामं से अपना काम करता रहूंगा I”



देवराज चौहान सिर हिलाकर पलटा और बाहर निकल गया !!


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फीनिश
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देवराज चौहान बाहर आया तो उसके होंठों पर सिगरेट लटक रही थी । सूरजभान; अन्य पुलिस वालों से बात कर रहा था ।


देवराज चौहान को देखते' ही सीधा उसके पास आया l



मिस्टर देवराज चौहान आप मेरी बात का विश्वास कीजिए I वह आदमी रंजीत श्रीवास्तव नहीं, राजीव मल्होत्रा है ।"


देवराज चौहान अपने चेहरे पर नाराजगी और क्रोध कै भाव ले आया I


"इन्सपेक्टर सूरजभान आप अपनी हद से ज्यादा बढ़ रहे हैँ I" देवराज चौहान ने कठोर स्वर में कहा ।



"में अपनी हद में हूं मिस्टर देवराज चौहान । में साबित कर सकता हूं किं जो कह रहा हुं । किसो आधार पर ही कह रहा हू। मेरी बात गलत नहीं ही I" सूरजभान अपने शब्दों पर जोर देकर बोला ।


देवराज चौहान व्यंग्यात्मक हंसी हंसा ।


"तो साबित कीजिए कि जो आप कह रहे हैं, सही कहैं रहे है !"


"इस समय तो मै इतना ही कह सकता कि तीन महीने , पहले दिल्सी कै एक वैंक में चार युवकों ने डकैती डाली थी । तीन हत्याएं की थीं । यह जिसे आप रंजीत श्रीवास्तव कह रहे है । उन्हीं चारों डकैतों और हत्यारों में से एक है । दिल्ली में इसका एक कमरे का फ्लैट हे ।" सूरजभान ने तीव्र स्वर में कहा ।


"आप यह बातें किस बिनाह पर कह रहे हैं इन्सपेक्टर सूरजभान?" देवराज चौहान बोला ।



'इस बिनाह पर कि डकैती और उन हत्याओं की त्तपलीश तव मैंने ही की थी । मेरे ही इलाके में यह हादसा हुआ था । चंद रोज पहले ही पैं यहा पर ट्रांसफर होकर आया हूं… तब...!"

"बाकी के तीन कहां हैँ ?"


“वह फरार हो गए थे, लेकिन कानून की निगाहों से ज्यादा देर बंचे नहीँ रह सकते।"



"यानी कि तुम इस केस में असफल हो गए, इसी कारणं तुम्हारा ट्रांसफार्मर दिल्ली से बिशालगढ कर दिया गया और अब अपनी खीज को मिटाने कै लिए खामखाह नई बात पैदा करंने की चेष्टा कर रहे हो ।"



"ऐसा नहीँ हे , मै.....!"


"कैसा है, में सुनना नहीं चाहता !” एकाएक देवराज चौहान , , ने दांत भीचकर कहा-"बस बंहुत हो चुका । मैं तुम्हें जितना समझाना चाहता था, समझा दिया । लेकिन बात तुम्हारी समझ में नहीं आ रही । अगर अपनी बात पर इतना ही विश्वास हैं तो जाओ भीतर, गिरफ्तार करो रंजीत श्रीवास्तव को ।"
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Re: वारदात

Post by 007 » 09 Jul 2017 08:10

इंसपेक्टर सूरजभान अपनी जगह से हिला भी नहीँ l


“अब खडे क्यों हो? भीतर जाते क्यों नहीं मालिक को गिरफ्तार करने?”



"ऐसे नहीं I” सूरजभान ने सिर हिलाया I


"तो फिर कैसे करोगे?"


" पुख्ता सबुतों के साथ !"


“वह कहा से लाओगे?" देवराज चौहान ने जहरीले स्वर मेँ कहा ।


"दिल्ली के उस पुलिस स्टेशन से, जहां पर पैं तैनात था । वहा पर अभी भी इस केस की फाइल मौजूद है और फाइल में रंजीत श्रीवास्तव की उंगलियों कै निशानों की छाप मौजूद है I"



देवराज चौहान के मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा । इन्सपेक्टर सूरजभान वहुत खतरनाक बात कह गया था ।।



"जो जी में आए करो, लेकिन इतना याद रखना, रंजीत श्रीवास्तव की तरफ ऊंगली उठाना तुम्हें वहुत ही मंहगा पड सकता है ! तुम किसी मामूली आदमी के बारे में बात नहीं कर रहे जो......!"



"कोई बात नहीं, अगर मेरी बात गलत निकली तो में रंजीत साहव के पावों में पडकर माफी मांग लूगा l" सुरजभान ने एकएक शब्द चबाकर कहा-"लेकिन मै अपने इरादे से पीछे हटने चाला नहीं !"

"भुगतोगे ।" देवराज चौहान ने सिगरेट एक तरफ़ उछाली !


"कल के हादसे के बारे में मेरा बयान नोट करो, मेरे पास इतना समय नहीं है कि तुम्हारे साथ सिर खपाता रहूं।”


सूरजभान ने, चौहान का बयान नोट किया I



जब वह लोग जीप में वेठकर जाने लगे तो देवराज चौहान स्थिर लहजे में कह उठा--- "आशा है, अब हमारी मुलाकात नहीं होगी !"



सूरजभान ने कुछ नहीं कहा । पुलिस जीप बाहर निकलती चली गई ।।



देवराज चौहान के होंठ र्भिच गए l मस्तिष्क में खतरे की आंधी चलने लगी।


आज ही उसने अपनी योजना पर असली कार्य करने क्री शुरुआत की थी । रंजीत्त श्रीवास्तव के बदले, राजीव मल्होत्रा क्रो उसकी जगह पर पहुंचाया था और आज ही इन्सपेक्टर सूरजभान के रूप में बहुत बड़ा खतरा उसके सामने आ गया था । वह दिल्ली से राजीव मल्होत्रा कै उंगलियों कै निशान लाने को कह रहा था ।



जाहिर है, वह उंगलियों के निशान तो राजीव मल्होत्रा कै ही होंगे ओर वह मिलेंगे भी । तब मुसीबत का नया दौर शुरू हो जाएगा ।



राजीव मल्होत्रा देर सवेर पुलिस कै जाल में र्फसेगा ही । तब उसे बताना ही पडेगा कि कैसे वह रंजीन श्रीवास्तव बनकर वहां तक पहुंचा । उसके बारे में भी वह मुंह खोलेगा l



यानी कि खेत शुरू होने से पहले ही खत्म l छ: महीने की मेहनत, छः महीने भी काम नहीं आई ।


देवराज चौहान ने मन-ही-मन फैसला किया कि अभी वह खिसकेगा नहीं। जब तक पानी सिर से ऊपर नहीं होगा तब तक वह यहीं रहेगा और ना ही राजीव मल्होत्रा से अभी वह इस बारे में बात करेगा ।


कहीँ राजीव ऊंगलियों के निशानों की बात को सुनकर भयभीत हो गया तो वह आगे कुछ भी ठीक नहीँ कर पाएगा I


हो सकता है वह उसका साथ देने से सरासर इन्कार कर दे । अभी वक्त है देवराज चौहान ने हिसाब लगाया कि इंस्पेक्टर सूरजभान को उंगलियों के निशान लाने क्रो कम से कम दो दिन का समय तो लगेगा ही ।


देवराज चौहान नै नंई सिगरेट सुलगाई और कार में बैठकर वंगले से निकल गया ।

मन ही-मन देवराज चौहान इस बात की तसल्ली थी कि आज रंर्जीत श्रीबास्तव ने जितनी दौलत इकट्ठी की थी , कम से कम वह तो उसके कब्जे में है । बहरहाल इन्सपेक्टर सूरजभान के बारे में सोचकर देवराज चौहान खा दिमाग गर्म होता जा रहा था कि वह उसके किए कराए पर पानी फेरने जा रहा है और वह इस बिगडते हुए मामले को सम्भाल भी नहीं सकता था I

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देवराज चौहान को गए आधा घंटा ही हुआ था कि फोन की घण्टी बज उठी I

राजीव मल्होत्रा ने पर बैठे ही बैठे फोन को देखा। यह सोचकर थोडा-सा घबराया अवश्य कि किसका फोन होगा । उसे फोन करने वाले को वया कहना होगा I खैर यह नौबत तो देर-सवेर आनी ही थी I



आगे बढ कर राजीव मल्होत्रा ने रिसीवर उठाया I



“सर !" आप्रेटर की आवाज आई-"मिस रजनी शाह आपसे बात करना चाहती हैं ।"



रजनी शाहा रंजीत श्रीवास्तव की मंगेतर वी०सी०आर० में देखा उसका खूबसूरत चेहरा आखो कै सामने साकार हो उठा I

अगले ही पल वह सम्भला I

"लाइन दो ।"



"ओ०के० सर ।"



अगले ही पलों में रजनी शाह लाइन पर थी I



"हेलो रंजीत !" रजनी शाह का शोख स्वर उसके कानों से टकराया I



"हेलो रजनी! कैसी हो?" राजीव ने स्थिर लहजे मे कहा ।



"मुझे क्या होना है I एकदम फर्स्ट क्लास हूं I" रजनी की हंसी से भरी आवाज आई-"तुम अपने बारे मे बताओ आज ग्यारह बजे तुमने फोन करना था, मैँ इन्तजार करती रही?"


“सॉरी I मै कुछ बिजी था । फोन करना तो याद था परन्तु कर नहीं सका I"



"अब तो फुर्सत मिल गई?" रजनी की हंसी से भरी आबाज आई I



"हाँ I” राजीव कै होंठों पर मुस्कान कौ रेखा उभरी I



"तो आओ ना, एक-एक कप कॉफी पीते हैं । मैं बोर हो रही हूं।"

"कहां ?" राजीव मल्होत्रा ने मन ही मन में गहरी, सांस ली ।


"बहीँ । साईमन के कैफे में । जहां हमें कोई नहीं पहचानता l”


"साईमन के कैफे !. यह कहा है ? " राजीव के होंठों से निकला ।


"कमाल हे! साईमन के कैफे के बारे में तुम मुझसे पूछ रहे हो । कहीँ और सोच रहे हो क्या?" रजनी हंसी ।



" तुम्हें देने में क्या हर्ज है?" राजीव मल्होत्रा ज़ानबूझकर हंसा ।



"शकर रोड पर । कहो तो लेने आ जाऊं ?" रजनी की आवाज में चंचलता थी ।



“नहीँ, मैं आ जाऊंगा ।"


"कब तक ।।"


"जब तुम कहो ।"



"अभी ।"


"ठीक हे । आधे घण्टे में मैँ यहां से रवाना होता हू I” राजीव ने गहरी सांस लेकर कहा ।



“जरा तैयार होकर आना बातों के लिए l आज मैं. शादी कै लिए बात करूंगी ।” रजनी पुन: हंसी ।


राजीव मल्होत्रा ने हंसकर रिसीवर रखा और रिसीवर रखते ही चेहरे पर गम्भीरता की परत छाती चली गई ।



उसके विचारों . , का केन्द्र रजनी शाह थी ।



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फीनिश
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देवराज चौहान ने एक छोटे-से मकान के सामने कार रोकी ।


सिगरेट सुलगाई फिर कार से बाहर निकलकर आगे बढा और मकान का गेट खोलकर, भीतर प्रवेश करके सदर द्धार कें करीब लगी बेल के बटन पर अनूठा रख दिया।


भीतर घण्टी बजने का स्वर सुनाई दिया l देवराज चौहान ने सिगरेट का कश लिया ।


दरवाजा खुला ।



दरवाजा खोलने वाली अंजना थी । उसने प्रश्नभरी निगाहों से देवराज चौहान को देखा ।



"नमस्कार !" देवराज चौहान ने दोनों हाथ जोडकर बेहद शरीफाना ढंग से नमस्कार किया


जबाव में असमजसता-भरी निगाहों से अंजना ने भी हाथ जोडे ।


"किससे मिलना है, आपको ?"

“अजय साहब तो भीतर ही होंगे?”


"हां l” अंजना ने खोजपूर्ण निगाह देवराज चौहान पर डाली~ “आपको उनसे मिलना है?” देवराज चौहान कें सहमति में सिर हिलाने पर, अंजना ने उसे भीतर ले जाकर बिठाया ।।



“मैं अभी उन्हें भेजती हूँ !"


तभी अजय को कमरे में प्रवेश करते देखकर अंजना ठिठक गई ।।



“यह तुमसे मिलने आए हैं r" अंजना ने अजय से कहा ।



"कहिये I” अजय ने देवराज चौहान को देखा-“मैंने आपको पहचाना नहीं I”



"अवश्य पहचान लेते अगर हम पहले भी कमी मिले होते ।" उसी तरह बैठे बेठे देवराज चौहान मुस्कराया-"वेसे मुझे देवराज चौहान कहते हैं ।"



अजय और अजना की निगाहें आपस में मिलीं । दोनों सतर्क हो गए। देवराज चौहान की बातों से उन्हें खतरे का आभास मिलने लगा था ।



"क्या बात है? आप लोग एकाएक ही खामौश क्यों हो गए?" देवराज चौहान ने दोनों पर निगाह मारी ।


“तो आपका नाम देवराज चौहान है?” अजय खुद पर काबू पात्ता हुआ बोला I


"हूँ ।" . .


"मैं आपकी वया सेवा कर सकता हूं! जबकि हम पहले कभी नहीं मिले I”



" मिले हम अवश्य नहीं । परन्तु मैँ आप लोगों कै बारे में मिलने से ज्यादा जानता हू I"



देवराज चौहान ने सिगरेट का कश लेकर कहा-" बैसे मुझे खुशी है कि आप दोनों ने शादी कर ली हे और अब शराफत से जिन्दमी बिताने का फैसला कर लिया है !" देवराज चौहान अंजना को देखकर मुस्कराया-"जेब काटने का धन्धा ज्यादा देर नहीं चलना था । शादी करके तुमने अच्छा कदम उठाया ।”



अंजना चौंकी । अजय के चेहरे का रंग फक्क पड गया ।


“तुम तुम कौन हो?" अजय के होंठों से निकला ।

"देवराज चौहान ।”

" यह तो तम्हारा नाम हुआ । वास्तव में तुम कौन हो?" अजय की आबाज में कम्पन आ गया था ।



"मरा नाम ही तुम लोगों के लिए बहुत है । दिल्ली में तुम लोग जो करके आए हो, उसके बारे में मैं सब जानता हू । बैंक-डकैती कै पैतीस लाख रुपये इस समय तुम लोगों के पास हैं ।"



" तु....तुम यह सब कैसे जानते हो?” अंजना हक्की बक्की रह गई ।



“मैं पहले भी कह चुका हुं मेरा नाम देवराज चौहान है । मेरी निगाह हर तरफ रहती है ।"



अजय और अंजना के होंठों से कोई बोल ना फूटा l



" क्या चाहते हो?" अंजना के होंठ खुले l



देवराज चाहान ने सिर हिलाया फिर शांत लहजे में कह उठा ।



" तुम लोगों ने कोई जुर्म नहीं किया था, ना तो बैंक डकैतो की । ना ही किसी की जान ली । परन्तु बैंक-डकैती का पैसा, तुम लोग पूरे होशोहवास में दिल्ली से बिशालगढ़ ले आऐ । अगर पुलिस तुम लोगों को मौजूदा डकैती क्री दौलत के साथ गिरफ्तार कर ले तो जानते हो क्या होगा?"



दोनों चुप । कहते भी तो क्या? उनकी सिट्टी पिट्टी गुम हो चुकी थी ।
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