मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

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Ankit
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Re: मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

Post by Ankit » 11 Jun 2017 17:43


संग्राम


चिमाजी अप्पा अपने मन-मस्तिष्क में मस्तानी के विरुद्ध एक गुप्त जंग का बिगुल बजा देता है और मस्तानी को तंग करने के लिए राजनीतिक चालंे चलनी प्रारंभ कर देता है। सर्वप्रथम वह मस्तानी के विरुद्ध पाँचवे छत्रपति महाराजा शाह के पास जाकर उनके कान भरने का प्रयत्न करता है, “देखो महाराज, हमारे योद्धे को क्या हो गया है ? बस एक मामूली सी नर्तकी ने उसको अपनी उंगलियों के इशारों पर नचा रखा है। यदि हमने अवसर को न संभाला तो हमारा मराठों का भविष्य बहुत धुंधला हो जाएगा।“



छत्रपति शाहू, चिमाजी अप्पा की बात सुनकर बहुत देर तक चुप रहने के पश्चात बोलते हैं, “ऐश करने दो, अप्पा। यूँ ही व्यर्थ की चिंता न कर। चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं। बाजी राव बहुत समझदार है।“

चिमाजी अप्पा अपनी बात नीचे लगती देखकर और ज़ोर लगाता है, “इससे पहले कि एक कंजरी हमारी गौरवशाली मराठा इतिहास का अंग बन जाए, हमें कुछ करना चाहिए। इस प्रकार मूक दर्शक बनकर तमाशा देखने से काम नहीं चलेगा।... बाजी राव की जगह रणभूमि में है, न कि एक मुसलमानी के नृत्य मंच पर ! वह तो दिन रात उसी के पल्लू से बंधा रहता है। आपकी बात बाजी राव कभी अनसुनी नहीं कर सकता। आपने उसको पेशवाई प्रदान की है। इसलिए आप ही उसको समझाकर सीधे रास्ते पर डालें ताकि वह इस मस्तानी का पीछा छोड़कर युद्धकार्यों की ओर ध्यान दे सके। हम समस्त भारतवश मंे मराठा राज फैला सकें। एक स्वतंत्र हिंदू राज पैदा करने का छत्रपति शिवाजी ने जो स्वप्न देखा था, उसको हम कैसे पूरा करेंगे ?“

“पेशवा बाजी राव के काम से कोई शिकायत नहीं है और यह उनका पारिवारिक मामला है। जिसमें छत्रपति द्वारा किसी प्रकार की दख़लअंदाजी करना उचित नहीं होगा। मेरे विचार में तुम्हें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है।... और हाँ, अप्पा, गुस्से में कुछ ऐसा न कर देना जिसके लिए बाद में तुम्हें पछताना पड़े। याद रखना, मस्तानी की ओर आग करोगे तो सेक सबसे पहले बाजी राव को लगेगा। बाजी राव बहुत चाहता है मस्तानी को। हाँ, कमबख्त, सुंदर भी बहुत है।“ महाराजा शाहू अपने सिर खुजलाता हुआ चिमाजी अप्पा को टाल देता है और चले जाने कहता है।

छत्रपति द्वारा इन्कार किए जाने पर चिमाजी अप्पा धर्म गुरू महाराज ब्रह्ममहिंदरा स्वामी के पास अपनी शिकायत लेकर जाता है। चिमाजी अप्पा जानता है कि महाराज शाहू के बाद केवल गुरू ब्रह्ममहिंदरा ही एक ऐसा व्यक्ति है जिसका कहा बाजी राव कभी नहीं टाल सकता। बाजी राव धार्मिक मार्गदर्शन के लिए प्रायः आचार्य ब्रह्ममहिंदरा के पास जाता रहता है।
चिमाजी अप्पा गुरू महाराज को उकसाने का बहुत यत्न करता है, लेकिन उन्होंने भी बाजी राव और मस्तानी के रिश्ते के बारे में कोई एतराज न किया और चिमाजी अप्पा को कह दिया, “बाजी राव ने उसके साथ विवाह करवाया है। वह उसकी पत्नी है। वे दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं। फिर हम कौन होते हैं, उनके गृहस्थ जीवन मंे खलल डालने वाले ?“

चिमाजी अप्पा इन दोनों पुरुषों से निराश होकर दूसरे षड्यंत्र घड़ने लग जाता है। कई बार जो काम पेशेवर पुरुष भी न कर सकें, वह काम घरेलू स्त्रियाँ कर दिया करती हैं। चिमाजी अप्पा अपनी माँ राधा बाई के पास जाता है और उसको भावुक करने का यत्न करता है, “आई(माँ), अपने हँसते-खेलते घर को तो जैसे किसी बुरे की नज़र लग गई है। भाऊ बाजी राव को पता नहीं इस मुसलमानी ने क्या सुंघाया हुआ है ? हर समय मस्तानी के नाम की ही माला जपता रहता है और उसकी सांसों में सांस लेता है। औरत को, और वह भी एक रखैल को इतना सिर पर नहीं चढ़ाना चाहिए। स्त्री की गर्दन के पीछे अक्ल होती है। शीघ्र ही पगला जाती है। मुझे तो भय है कि यह कलयोगिन कहीं हमारा सारा खानदान ही न तबाह करके रख दे।“

“हाँ पुत्र, मेरे से अधिक उसकी किसे चिंता है ? मैं तो स्वयं उठते-बैठते बहुत चिंता करती हूँ। मुनड़ा, वह तो हम सभी को भुलाये बैठा है। दिन रात मस्तानी की बगल में से नहीं निकलता और उसके पास पड़ा शराब पीता रहता है। पता नहीं, क्या तावीत घोलकर पिलाये हैं उस जादूगरनी ने ? भगवान सुमति दे मेरे राव को। मैं तो महादेव के मंदिर में हवन करवाऊँगी।“

चिमाजी अप्पा जलती आग पर और तेल डालता है, “हाँ, माताश्री, मैं तो छोटा होने के कारण कुछ कह नहीं सकता। पर आप यदि थोड़े कान खींचो तो शायद भाऊ कुछ संभल जाए।“

“मैं तो बहुत ज़ोर लगाकर हाँफ गई हूँ, ज़ोरू के गुलाम पर। कोई भड़ुआ मेरी माने भी सही। जब भी सामने पड़ता है, मैं तो तभी कलपती हूँ। भई अक्ल की राह पकड़। अब तुम्हें और अक्ल तो आने से रही। बच्चा हो तो दो हाथ मारकर टिका दूँ। बराबर का है, अब बता क्या करूँ, पुत्र ? मैं तो असमर्थ और विवश हूँ। दूसरी उपस्त्री तो तुम्हारे पिता ने भी रखी थी। पर उसने ये करतूतें नहीं की थीं। परदे में भीखू की माँ के पास जाया करता था और मुँह लपेट कर तड़के को मेरे पास चला आता था। पर बाजी राव ने तो लक्षण ही उलटे पकड़ लिए। ये स्त्रियाँ तो महाभारत करवा देती है बेटा। रावण की सोने की लंका एक स्त्री के पीछे ही राख हो गई थी।“

“मेरा वश चले तो उस मस्तानी कंजरी को चुटिया से पकड़कर नर्बदा नदी में गोते लगवाऊँ। शराब तो भाऊ पहले भी पीता था, पर तब ऐसा नहीं करता था जैसा अब हर समय मदहोश हुआ रहता है। ईश्वर जाने, ये बुंदेलखंड वाले क्या डालकर दारू निकालते हैं ? भाऊ की तो कतई बुद्धि भ्रष्ट कर रखी है। भाऊ को सदैव दारू में धुत किए रखती है। दो बार मेरे हाथों मरते बच गई। एकबार पहाड़े के कातिल को भेजा थो, वो नाकाम रहा और अपनी जान गवां बैठा। दूसरी बार दासी के माध्यम से ज़हर वाली अफ़ीम दी, साली ने मुँह में ही नहीं धरी। लगता है, मुझे ही कुछ करना पड़ेगा।“ चिमाजी अप्पा क्रोध में दांत पीसता है।

संयोगवश उस समय महाराजा छत्रसाल द्वारा भेजे शर्बतों के मटकों के पहुँचने का संदेश आ जाता है। चिमाजी अप्पा को अपनी भड़ास निकालने का एक और बहाना मिल जाता है। वह सारे शर्बतों वाले घड़े ले जाकर नदी में उलटवा देता है। जब मस्तानी को इस बारे में पता चलता है तो उसको बहुत दुख होता है। वह बाजी राव के पास रोष प्रकट करती है, “उन्हें बिखेरना क्यांे था ? यदि स्वीकार नहीं करने थे तो लौटा देते। शर्बत था, कोई ज़हर तो नहीं था। किसी गरीब के मुँह में पड़ता।“

क्रोध में बाजी राव जाकर चिमाजी अप्पा से इसकी पूछताछ करता है। चिमाजी अप्पा बड़ी चुस्ती के साथ अपना पक्ष प्रस्तुत करता है, “हाँ, ज़हर ही था वो।... शर्बत नहीं, वह शराब थी शराब। भाऊ आपकी बुद्धि पर तो दारू पिला पिलाकर उस दो टके की नर्तकी ने पर्दा डाल दिया है। आपको हर समय मदिरा पिला कर वह मदहोश किए रखती है। शराबों कबाबों के साथ आपकी बुद्धि मारी गई है। आप कभी होश में हो तो आपको पता चले। पक्का शराबी बना दिया है उसने आपको।“

बाजी राव अप्पा पर भड़क पड़ता है, “मस्तानी ने हमंे मांस खाने और मदिरापान करने की राह नहीं डाला। अपितु हमने उसको शराब पीने की लत लगाई है। उसका प्राणामी धर्म तो मांस और मदिरा के प्रयोग की मनाही करता है। तुम अच्छी प्रकार जानते हो, हम तो मस्तानी के आने से बहुत पहले से इन वस्तुओं का सेवन करते आ रहे हैं।... तुम तो यूँ ही रस्सियों को सांप बनाये जा रहे हो। वह तो महज शर्बत था। केसर, कुमकुम और मेवों वाला लाल, पीला रंग-बिरंगा। जिसे तुमने मदिरा समझकर बिखरवा दिया है। गर्मियों में मेहदे को ठंडक देता है यह शर्बत। तुम्हें शराब और शर्बत में अन्तर नहीं पता ? तुम तो खुद दारू पीते हो। कम से कम सूंघकर तो देख लेते, यदि पीकर नहीं देखना था। तुम्हें ज्ञान हो जाता कि वे घड़े शर्बत के थे या शराब के।“

“भाऊ, आपके तो दिमाग पर काम का पर्दा डाला हुआ है। आप मस्तानी के विरुद्ध कुछ सुनना ही नहीं चाहते। हम भूले नहीं शर्बतों को। यह वही कुंवरसा मस्तानी के शर्बत हैं जिन्हें पीकर आप कई कई दिन मदहोश पड़े रहते हो।“

बाजी राव, अप्पा से बहस करता है, “मैं तुम मूर्खों को कैसे समझाऊँ ? चलो, मैं मस्तानी को अभी बुलाकर उससे शर्बत बनवाकर दिखाता हूँ। तुम अपनी आँखों से देख लो।“

बाजी राव, मस्तानी को बुलवाकर समस्त परिवार को एकत्र कर लेता है। बाजी राव के आदेश से मस्तानी गुड़ और कुमकुम डालकर शर्बत बनाती है और अपनी सास राधा बाई को एक प्याला पेश करती है, “लो माताश्री, पीकर बताओ कैसा है ? कुमकुम डाला होने के कारण इसका रंग ही लाल शराब जैसा लगता है। लेकिन एकदम मीठा है और इसको पीने से कोई नशा नहीं होता। बल्कि पीने वाले की प्यास बुझती है।“

राधा बाई ने नाक चढ़ाते हुए एक घूंट भरा तो शरबत उसको सच में बहुत स्वादिष्ट लगा और वह पूरा प्याला पीने से स्वयं को रोक न सकी, “वाह ! लाजवाब है। पहले कभी यह चीज़ क्यों नहीं पिलाई, मस्तानी ?“

“आई, आप मौका ही कब देते हो मस्तानी को ?“ बाजी राव प्रसन्न होकर सबको मस्तानी का बनाया शरबत बांटने लग जाता है। सब मस्तानी की प्रशंसा करते हैं तो चिमाजी अप्पा पहले से भी अधिक जलभुन जाता है।

चिमाजी अप्पा अपनी इस पराजय को लेकर मन ही मन विष घोलने लग जाता है। अब चिमाजी अप्पा के पास एक अन्तिम शस्त्र बाजी राव की पहली पत्नी काशी बाई रह जाती है। वह काशी बाई को मस्तानी के विरुद्ध भड़काना प्रारंभ कर देता है, “वाहिनी साहिबा(भाभी), मुझसे आपका दुख देखा नहीं जाता। भाऊ ने तो आपको बिल्कुल ही आँखों से ओझल कर रखा है। उसको तो वह वेश्या मुसलमानी ही हर तरफ दिखाई देती है। पता नहीं क्या सिर में डाला है उस मस्तानी भूतनी ने ?“

काशी बाई के अंदर से मानसिक पीड़ा उछलकर बाहर आ जाती है, “मुझे भी लगता है जैसे उस तवायफ मस्तानी ने कोई जादू-टोना कर रखा हो। यह तो मेरी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते।“

चिमाजी अप्पा आग को और अधिक हवा देता है, “मुझ तो बताते हुए भी लज्जा आती है... यह अंगूठी देखो। आपके मायके वालों ने जो भाऊ को उपहार में दी थी, एक मल्लाह को भाऊ ने उठाकर दे दी।“

अंगूठी देखकर काशी बाई को सातों कपड़ों में आग लग जाती है, “लेकिन यह आपके पास कैसे आई ?“

“भाऊ ने मस्तानी से मिलने जाने के लिए नदी पार करनी थी और किश्ती में नदी पार करवाने वाले मल्लाह को मेहताने के रूप में यह अंगूठी दे दी। कल वह दरबार में आकर यह अंगूठी देकर धन ले गया है। मैंने जब भाऊ से इस बारे में पूछा तो कहने लगा कि नदीं में तूफान आया हुआ था। मल्लाह जाना नहीं चाहता था। मेरा मस्तानी के पास जाना आवश्यक था। मैंने लालच देने के लिए अंगूठी देकर कहा था कि बहुत सारा धन दूँगा। दरबार में आकर ले जाना। उस समय मेरे पास देने के लिए और कुछ नहीं था।... वाहिनी साहिबा, आप ही सोचो भला कोई प्रेम की निशानी भी ऐसे खैरात में बांटता है ? इतनी क्या आफ़त आ पड़ी थी, प्रलय में जाने की ? मस्तानी कहीं भाग चली थी ?“

चिमाजी अप्पा की इतनी भर वार्ता सुनकर काशी बाई की रूलाई फूट पड़ती है और वह रोती हुई अपने कक्ष में चली जाती है। चिमाजी अप्पा अपने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर मुस्कराता है। उसको विश्वास हो जाता है कि उसका तीर सही निशाने पर जा लगा है।

बाजी राव घर में आता है तो गुस्से में फनफनाती काशी बाई उसके साथ लड़ पड़ती है, “मैं सारी उम्र परमेश्वर मान कर आपको पूजती रही हूँ। आपको एक होनहार पुत्र पैदा करके दिया है और आपके बचपन की साथी हूँ। आप पल में ही उस कंचनी के होकर बैठ गए ?“

बाजी राव को गुस्सा आ जाता है और वह गुस्से में एक थप्पड़ काशी बाई को मार देता है, “खामोश ! तेरी बिलांद भर की जो जुबान चलती है, काटकर रख दूँगा। मस्तानी भी मेरी पत्नी है। दूसरे लोगों के साथ अब तू भी मुझे ताने मारने लगी है।“

“मुझे तो चुप करवा लोेगे। लेकिन प्रजा को कैसे चुप करवाओेगे ? सारे पूणे में लोग तरह तरह की बातें करते फिरते हंै।“ काशी बाई सिसक सिसककर रोने लग जाती है।

बाजी राव उसके समीप पलंग पर बैठकर उसको अपनी छाती से लगा लेता है, “काशी, तू तो जानती है कि मैं पेशवाई को सलामत रखने के लिए कितना संघर्ष कर रहा हूँ। जैसे महाभारत में अर्जुन को केवल चिडि़या की आँख ही दिखाई देती थी, वैसे ही मुझे भी केवल दिल्ली ही दिखाई देती है। देख, महाराजा छत्रसाल की बेटी का रिश्ता स्वीकार करना मेरे लिए राजनीतिक समझौता था। अगर हवस होती तो मैं मस्तानी का डोला भी स्वीकार कर सकता था। परंतु फिर मुझे मस्तानी के पिता की जागीर में से न तो उसके भाइयों के बराबर हिस्सा मिलता, न अपने कर्ज़ चुकाने और युद्धों के लिए माली इमदाद और न ही हमारी दिल्ली पर मध्य रास्ते बुंदेलखंड में छावनी बन पाती। क्या तू नहीं चाहती कि तेरा पति दिन दुगनी, रात चैगुनी प्रगति करे और समस्त भारतवर्ष में मराठा हिंदू स्वराज और साम्राज्य स्थापित करे ? हम अपने धार्मिक स्थान मुगलों से स्वतंत्र करवायें ताकि हमारे हिंदुओं को अपने तीर्थ स्थानों पर अपनी इच्छा से जाने की छूट हो और अपने धर्म का पालन करने के लिए मुसलमान हाकिमों को जजि़या न देना पड़े। मुसलमान हमारे मंदिरों को खंडहर बना रहे हैं। मूर्तियाँ तोड़ रहे हैं। जबरन हिंदुओं को मुसलमान बना रहे हैं। हमारा धन, हमारी संपŸिायाँ और हमारी अस्मतों को लूट रहे हैं। हिंदुस्तान देश हमारा है और शासन मुसलमान कर रहे हैं। तू नहीं चाहती कि इस सबकी रोकथाम की जाए ? मुगलों को नथ डाली जाए ? छत्रपति शिवाजी ने (30 मार्च 1645 ई.) व्रत रखकर स्वतंत्र हिंदवी राज्य की नींव रखी थी। जिसको कायम और सुरक्षित रखना मेरा धर्म है।“ इतना कहकर बाजी राव शांत हो जाता है और काशी बाई की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लग पड़ता है।

धार्मिक विचारों की होने के कारण काशी बाई ढीली पड़ जाती है, “स्वामी, मुझे तो आप शांत करवा लोगे, लोगों और भाईचारे का मुँह कैसे बंद करोगे। ?“

मस्तानी के साथ रहने के बाद बाजी राव को ढंग आ चुका है कि स्त्री की कब कौन सी रग दबानी चाहिए। बाजी राव सोच विचार मंे डूबी और हिचकियाँ भरती काशी बाई की गाल को चूम लेता है, “प्रिय काशी, एकबार एक बाप और बेटा गधा खरीद कर ला रहे होते हैं। रास्ते में उन्हंे कोई मिलता है और ताना कसता है - देखो तो, ये बाप बेटे भी गधे हैं। गधे को साथ साथ चलाये जा रहे हैं। बाप को इतनी भी अक्ल नहीं कि बच्चे को गधे पर बिठा दे। यह सुनकर बाप अपने बेटे को गधे पर बिठा देता है। कुछ आगे जाने पर कोई अन्य कहता है -कितना बदतमीज बच्चा है। बूढ़ा बाप पैदल जा रहा है और बेटा मौज से गधे पर चढ़ा बैठा है। लड़का फौरन उतरकर गधे पर बाप को बिठा देता है। फिर कोई अन्य उसके करीब से निकलने वाला राहगीर कह देता है -सयाना होकर भी बाप गधे पर बैठा है और बेटे को पैदल चला रहा है। अब दोनों ही गधे पर बैठ जाते हैं। आगे जाने पर कोई अन्य आता है और कहता है - कितने निर्दयी हैं। एक जानवर पर जुल्म ढा रहे हैं। ईश्वर ने अच्छी भली टांगें दी है। चल नहीं सकते ? यह सुनकर दोनों गधे पर से उतर जाते हैं और गधे की टांगे बांधकर उसको एक डंडे पर लटका कर चल पड़ते हैं। इस पर सभी लोग देखकर हँसते हैं। इस कहानी का यह सार निकलता है कि सुनो सबकी, पर करो अपने मन की। जितने मुँह उतनी ही बातें। लोगों की कोई जुबान तो पकड़ नहीं सकता। लोग तो कल को कहंेगे कि कुएँ में छलांग लगाओ तो तुम छलांग लगा दोगे ?“

“पर जिस समाज में हम रहते हैं, उसका आदर-सम्मान तो करना ही बनता है। मैंने कल मंदिर में सुना था कि ब्राह्मणों में आपके और मस्तानी के संबंधों को लेकर पंथक मसला बहुत गरमाया हुआ है। शायद वे कल दरबार में भी आपके पास आएँ।“ काशी बाई अपने पति बाजी राव को कसकर आलिंगन में ले लेती है।

“आ जाने दो, मैं अकेले अकेले को देख लूँगा। देशास्था ब्राह्मणों को पेशवाई छिनने का दुख है। वे सोचते हैं कि चितपवन भट्टांे ने मुनीमी (बाजी राव का पिता पेशवा बनने से पूर्व मुनीम था) करते पेशवाई कैसे प्राप्त कर ली। यूँ ही बात का बतंगड़ बनाते हैं और हमें नीचा दिखाने के बहाने खोजते रहते हैं। मैं उनकी सब चालंे समझता हूँ। मैंने अब तक युद्ध ही लड़े हैं। डरता नहीं मैं किसी से।“ बाजी राव क्रोध में आ जाता है।

काशी बाई आँखों में उमड़ते आँसू बहाती हुई बोलती है, “रोना तो पतिदेव इसी बात का है कि आप गृहस्थ जीवन के साथ भी युद्धभूमि वाला व्यवहार ही कर रहे हो। बाहर के युद्ध तो आपने बहुत लड़े और जीते, काश ! कभी पारिवारिक जंग भी जीत कर देखो तो आपको पता चले। आप तो हर समय मुझसे दूर ही रहे हो।... कभी जंग लड़ने, कभी सियासत में हिस्सा लेने के बहाने और कभी चैथ एकत्र करते घूमते हो। पति के वियोग में तड़पती नारी की अवस्था आप क्या समझो। भगवान ने तो नारी का सिर्फ़ बुत बनाया है। लेकिन पुरुष जब उसका स्पर्श करता है तो उसमे प्राण पड़ते हैं और वह देह का बुत उस समय पत्थर से जीती जागती स्त्री का रूप धारण करता है। रामायण में एक कथा आती है - अहल्या राम चंद्र भगवान अर्थात पुरुष के स्पर्श से ही वास्तव में पत्थर से स्त्री बनती है। एक युद्ध स्त्री के अंतःकरण में भी चलता रहता है। कभी मेरे साथ वह युद्ध लड़कर मुझे सेज संग्राम में पराजित करो तो मैं आपको असली मर्द मराठा योद्धा मानूं और मुहब्बत की सल्तनत पर आपकी पेशवाई को स्वीकार करके अपने चुम्बनों की चैथ देती हुई अपने बदन की सरदेशमुखी आपको समर्पित कर दूँ।“

बाजी राव, काशी बाई की ठोढ़ी पकड़कर उसका झुका हुआ चेहरा ऊपर उठाता है और उसकी आँखों में आँखें डालकर देखता है। उसका काशी बाई बहुत संुदर लगने लग पड़ती है। बाजी राव काशी को बिस्तर पर लिटाकर चूमने लग पड़ता है और काशी बाई की नौ गज़ की सूती साड़ी खुलकर पलंग के नीचे जा गिरती है।...

Re: मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

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Re: मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

Post by Ankit » 11 Jun 2017 17:44


कचेहरी


काशी बाई के पास चंद दिन रहकर उसको शारीरिक संबंधों से संतुष्ट करने के बाद बाजी राव मस्तानी के पास चला जाता है। मस्तानी के साथ कुछ रातें व्यतीत करने के पश्चात वह काशी के पास अपनी उपस्थिति दजऱ् करवाने आ जाता। इस प्रकार, कुछ अरसे बाद बाजी राव ससवाद में आकर काशी को शांत करके पुनः मस्तानी के पास रहने के लिए कोथरूड़ चला जाता। बाजी राव के जीवन के दिन और रातें काशी और मस्तानी के बीच बंटने लग जाती हैं। वह किश्ती की तरह एक किनारे से दूसरे किनारे सफ़र करता हुआ अपने परिवार और मस्तानी के साथ अपना रिश्ता निभाते हुत अपने जीवन में संतुलन बनाये रखने का यत्न करता रहता है।



समय इस प्रकार अपनी गति चलता रहता है। बाजी राव के मस्तानी के साथ रिश्ते का लेकर विवादों के अलाव सुलगते रहते हैं। फिर अचानक ऐसी हवा बहती है कि वह अलाव प्रचंड अग्नि का रूप धारण करते हुए एक विस्फोटक ज्वालामुखी बन जाते हैं। उनमें से ऊँची-ऊँची लपटें उठने लग पड़ती हैं।

मस्तानी के विषय को लेकर भाईचारे में हो रही भिन्न-भिन्न प्रकार की बातों के चक्रवात समस्त पूणे में घूमकर पेशवा के दरबार तक पहुँच जाते है। अप्पा स्वामी के प्रोत्साहन से पंडितों का एक दल पेशवा के दरबार में हंगामा खड़ा करने के लिए आ धमकता है। बाजी राव अपने सिंहासन पर से उठकर आदर सहित उनका स्वागत करता है, “आओ आचार्य, आसन ग्रहण करो।“

ब्राह्मणों को बिठाकर उनके विरोध के लिए स्वयं को तैयार करता हुआ बाजी राव सोच रहा होता है कि काशी के ब्राह्मणों ने तो छत्रपति शिवाजी को भी नहीं बख़्शा था। शिवाजी महाराज का भी नाक में दम किए रखा था। 1673 ई. में जब उन्होंने सार्वजनिक राज्याभिषेक का मुद्दा उठाया था तो रूढ़ीवादी ब्राह्मणों ने शिवाजी को क्षत्रिय मानने से इन्कार कर दिया था। फिर मैं महज एक पेशवा इनके सम्मुख किस खेत की मूली हूँ।

ब्राह्मणों की मंडली में से एक उनका मुखिया मुद्दा उठाता है, “श्रीमंत आप पेशवा हो, हमारे शासक। मराठा योद्धाओं और आने वाली पीढि़यों के लिए प्रेरणा-स्रोत आपको ही बनना है। इतिहास के सुनहरी पन्नों ने आपने नाम को दजऱ् करवाना है। आपके द्वारा किए अधार्मिक कार्य केवल आपका या भट्ट खानदान का ही नहीं, अपितु समूचे चितवन ब्राह्मणों का सिर लज्जा से झुका सकते हैं और भविष्य में मराठों को अपमान और लज्जा का सामना करना पड़ सकता है।“

“आप तो वेदों के श्लोकों से भी अधिक उलझी भाषा का प्रयोग करने लग गए हो। मुझे तो आपकी संस्कृत बिल्कुल समझ में नहीं आती। कृपा करके बुझारतें न डालें और मुझे सरल भाषा में बतायें, जो आप कहना चाहते हैं? मैंने कभी कोई गलती नहीं की।“ बाजी राव खंखारते हुए रौबीली आवाज़ में बोलता है।

पंडितों की मंडली में से अन्य कोई बोलता है, “पेशवा जी, नादान न बनो। इन्सान तब सिरे से गलत होता है जब वह सोचने लग जाए कि वह गलत नहीं है। आप हमारे इस दरबार मंे यूँ आने का कारण भलीभाँति जानते हैं...। चलिए, फिर भी हम खुलकर बताते हैं। हमंे तो उल्लेख करते हुए भी लज्जा आती है।“

“यदि विषय आपको लज्जित करता है, तो क्या वैद ने कहा है कि उस पर अवश्य बात करनी ही है ?“

“हाँ... और आप वह कुकर्म बेझिझक खुलआम कर रहे हो।“ एक और पंडित जोश में आकर बोलता है।

बाजी राव पूरे संयम और धैर्य में रहता है, “कौन सा कुकर्म किया है हमने ?“

“जैसे आप कुछ जानते ही नहीं। भोले न बनिये। आपके आचरण में आई गिरावट को सारा जग जानता है। आप एक मुसलमान कंचनी को सरेआम अपने घर में रखकर उसके साथ अवैध संबंध स्थापित किए हुए हैं। हम आपकी रखैल मस्तानी की बात कर रहे हैं।“

“आचार्य जी, वह रखैल नहीं। हमारी बेगम...हमारी बायिको(पत्नी) है। हमने बाकायदा उसक साथ विवाह किया हुआ है।“

“हमने तो किसी ने आपका विवाह होते देखा नहीं। कोई है गवाह आपके पास ?“

“अग्नि साक्षी है। इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है ? हमारे कई सरदार उस समय वहाँ उपस्थित थे, जब मस्तानी ने हमारी तलवार के साथ अग्नि के इर्द-गिर्द फेरे लिए थे।“

ब्राह्मणों का मुखिया गरम हो जाता है, “श्रीमंत हम ऐसे विवाह को स्वीकार नहीं करते। यह तो शास्त्रों और विधि विधान का घोर उल्लंघन है। जीवत प्राणी के अवसर पर उपस्थिति होते हुए वस्तु के साथ शादी नहीं की जा सकती। हम इस विवाह को नहीं मानते। कुल पुरोहितों से कुंडलियाँ मिलवाकर लगन के लिए शगुन निकाला जाता है। हल्दी बटना होता है और पवित्र नदी केे जल से पवित्र होकर माला बढ़ाई जाती है। कन्यादान होता है। अग्निकुंड के चारों तरफ फेरे लेकर दुल्हन को मंगलसूत्र पहनाया जाता है। क्या आप भूल गए कि मराठों के विवाह कैसे हुआ करते हैं, श्रीमंत ? यह भी कोई विवाह हुआ, जैसा आपने मस्तानी के संग रचाया है ?... मस्तानी पर्दा नहीं करती। आपके साथ सुना है, रणभूमि में भी जाती है। पालकी की बजाय आपके बराबर घोड़े की सवारी करती है।“

“द्रोपदी पांडवों के साथ अज्ञातवास और माता सीता भी तो भगवान राम के साथ बनवास में हर समय साथ रहने के लिए गई थीं। बनवास तो केवल राम चंद्र को मिला था, सीता माता को नहीं।“ बाजी राव तर्क देता है।

एक अन्य ब्राह्मण की आवाज़ उभरती है, “हम कुछ नहीं जानते। उसको देखकर कल हमारी बहू-बेटियाँ भी बागी हो जाएँगी और बेपर्दा होकर मुजरे करने लगेंगी। हम यह सहन नहीं कर सकते। हमको आपके पियादे गणेश बाबू ने सब बताया है कि मस्तानी अप्सराओं की भाँति नृत्य करती है और गाती है।“

“नृत्य तो मन की उमंग है। भगवान कृष्ण की भक्तिन मीरा बाई भी तो यही सब करती थी। प्रभु भक्ति में लीन होकर नाचती, गाती थी। नृत्य का तो आविष्कार ही भगवान भोले शंकर शिवजी महाराज ने किया, स्त्रियों के लिए लास्य और पुरुषों के लिए तांडव की रचना करके। क्या आप नहीं जानते कि शिवजी भगवान पार्वती माता को प्रश्न करने के लिए नृत्य का सहारा लिया करते थे ? दूसरी से आठवीं सदी के मध्य रचे गए नाट्य शास्त्र में भरतमुनि वर्णन करता है कि सतयुग के सुनहरी युग के बाद त्रेता का युग आया तो सृष्टि में अहम परिवर्तन हुए। देवताओं ने अपने सिरमौर देव इंद्र देवता को सृष्टि रचियता ब्रह्मा के पास भेजा। नाट्य शास्त्र के प्रथम कांड के ग्यारहवें बारहवें श्लोक में आता है कि इंद्र ने ब्रह्मा से कहा कि हे सृष्टि के सृजनहार ! विश्व में दुख बहुत बढ़ गए हैं। कोई ऐसा यत्न करें कि मानवजाति को आनंद और मनोरंजन प्राप्त हो सके। कोई ऐसा उपाय निकालें जिससे आँखों और कानों को तृप्ति मिले। चार वेद केवल उच्च श्रेणियों के लिए आरक्षित हैं। इसलिए कोई पाँचवा वेद रचो जिसका शूद्र भी रसानंद ले सकें और वह सबका साझा हो। ब्रह्मा अंतध्र्यान हो गए और उन्होंने ऋग्वेद मंे से शब्द, सामवेद में से संगीत, यजुर्वेद में से अभिनय और अथर्ववेद में से रस प्राप्त करके पाँचवे वेद की रचना की। ब्रह्मा ने नाट्य वेद की शिक्षा भरतमुनि को दी और भरतमुनि ने आगे अपने सौ पुत्रों को इसका ज्ञान करवाया। इस प्रकार नाट्य वेद इंद्रपुरी से उतरकर मातृलोक में आया। इस तरह नाट्य, नृत्य और संगीत के सुमेल वाला यह ग्रंथ विश्व में स्वीकृत हुआ है। ये चीजे़ं तो हमारे धर्म के साथ ही चली हैं। हमारे प्राचीन गं्रथों में वर्णन आता है कि एक बार शिव पार्वती को सुनहरी तख़्त पर बिठाकर उसकी सुंदरता के अमृत को अपनी निरंतर दृष्टि से पी रहे थे। जितना शिव इस अमृत को पीते जाते, उतना ही वह बढ़ता जाता। शिव पार्वती के सौन्दर्य पर मोहित होकर उसकी संुदरता के जाम से खुद को मदहोश करने लग पड़े। शिव ने सुरूर में आकर पार्वती को प्रसन्न करने के लिए नृत्य करना शुरू कर दिया। यह देखकर देवी-देवता और परियाँ एकत्र हो गईं। लक्ष्मी गाने लग पड़ी। सरस्वती ने वीणा, इंद्र ने वेणु, विष्णु ने मृदंग और ब्रह्मा ने खड़तालें बजानी प्रारंभ कर दीं। शिव से यह नृत्य उसके शिष्य तंडू ने सीखा और इसको सुधारकर तांडव का नाम दिया। भगवान विष्णु भी तो वृंदावन में गोपियों के साथ नाचते-गाते रासलीला रचाया करते थे। कृष्ण जी बचपन से नर्तक थे। क्या वह यमुना नदी के तट पर चाँद की चाँदनी मंे गोपियों और ग्वालिनों के साथ नृत्य नहीं करते थे। उनके नृत्य में मुजरे की तरह शिंगार रस की अधिकता होती थी। भगवत पुराण की दसवी पोथी में ऋषि वेदव्यास ने इस नृत्य पर पाँच कांड रचे हैं। जब कृष्ण जी अपनी बंसरी से मधुर धुनें बजाते थे तो यह संगीत गोपियों को खींच लाता था। ग्वालिनों को कृष्ण बंसरी के सुर इतना मंत्रमुग्ध करते थे कि वे जहाँ भी होतीं, सभी काम छोड़ कर सरेआम कृष्ण के पास आ जाती। उनके पति भी उनको न रोक पाते। रात रातभर यमुना तट पर रास-नृत्य होता रहता। कहते हैं जब कृष्ण गोपियों के संग नृत्य करते तो हर गोपी के साथ एक अलग ही कृष्ण नृत्य करता दिखाई देता। इस नृत्य में रूहानियत शामिल हो जाती और वह आध्यात्मिक मिलन का माध्यम बन जाता। नृत्य को तो धार्मिक स्वीकृति भी प्राप्त है। सदियों से नृत्य को पूजा की एक विधि के रूप में स्वीकारा जाता रहा है। शिव मानस में इसका उल्लेख है। मंदिरों की नर्तकियों को देवदासियाँ कहा जाता है। हमारे भात के प्राचीन मंदिरों में नृत्य मुद्राओं वाली सुशोभित मूर्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं। नृत्य तो मन की स्व के साथ एक संवाद रचाने वाली अवस्था है। जिस प्रकार हम नदी में स्नान करके शारीरिक मैल से मुक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार नृत्य रूपी व्यायाम करते हुए जब हमें पसीना आता है तो उससे इन्सान पवित्र हो जाता है। तन के रोमछिद्रों से अंदर की सारी मैल बाहर निकल कर शरीर को भी धो देती है। फिर नृत्य स्नान तो नदी स्नान की अपेक्षा उतम ही हुआ जो मनुष्य के शरीर को अंदर और बाहर से स्वच्छता प्रदान करता है। फिर क्या बुराई है नृत्य करने में ? नृत्य प्रेम के प्रकटीकरण का सुंदर माध्यम है। वास्तव में प्रेम भाव ही नृत्य की अंतरात्मा है जो शारीरिक स्तर से आध्यात्मिक मंडलों में प्रवाहित होता है। शेष, राम आपका भला करे, जो गायन की बात है, क्या आप आरती करते हुए भजन गायन और मंत्रों का उच्चारण नहीं करते ?“

एक अन्य पंडित बोलता है, “हमारी बात और है। वह ग़ज़ल गाती है जो कि एक अरबी विधा है। ग़ज़ल के तो शाब्दिक अर्थ ही है - प्रेमी की प्रंशसा करना। इसको अय्यास लोग सुनते हैं। मस्तानी मुजरा करती है। मुजरा वो नाच है जो मुगल अपनी ऐशपरस्ती के लिए ईरान और अफ़गानिस्तान से हिंदुस्तान में लेकर आए थे। वह विदेशी संस्कृति हम पर थोप रही है। हम अपनी संस्कृति को कतई पतित नहीं होने देंगे।“

बाजी राव अपना तर्क प्रस्तुत करता है, “अधिक कट्टर न बनो। आप अरबी घोडि़यों की सवारी क्यों करते हो ? प्रसाद में काबुल के पिस्ते और बादाम क्यों प्रयोग करते हो ? ईरान के बने वस्त्र क्यों पहनते हो ? बदखशन के फल और खाड़़ी देश के अनार क्यों खाते हो ? नृत्य और संगीत कला के रूप मंे हंै और कला सीमाओं की कै़द में नहीं रहती। हम हिंदुस्तानी भजन गायन और तांडव, कत्थक और भरत नाट्यम आदि नृत्यों को धर्मप्रचार के लिए प्रयोग करते थे और मुगल मुजरा नृत्य को निजी मनोरंजन के लिए प्रयोग करते थे। सूफियों में बेपरवाह नृत्य करके मुर्शद मनाने की प्रथा है। प्रभु भक्ति में भी कोई आत्मा भी लीन होगी, जब वह खुशी और हर्षातिरेक की अवस्था में रहेगी। जीवन के दुखों और कष्टों से मुक्ति पाने के लिए मनोरंजन भी परम आवश्यक है और नृत्य-मुजरा एक मनोरंजन का माध्यम है। मस्तानी हमारा मन बहलाने के लिए जो मुजरा शैली का नृत्य करती है तो यह कोई गुनाह तो नहीं है ?“

“हमने तो सुना है, वह भारतवर्ष की ही नहीं है। कहीं बाहरी दूर देश की पैदावार है और वह भाषा भी कोई परायी ही बोलती है।“ उनमें से सबसे कम आयु का ब्राह्मण चोट करता है।

बाजी राव हँसकर बहस करने लगता है, “हाँ, उचित फरमाते हैं आप। उसकी भाषा आपसे भिन्न है और वह मनुष्यता के भले के लिए बोली बोलती है। एक इन्सान को दूसरे से जोड़ने वाली भाषा का मस्तानी प्रयोग करती है। उसकी सरल बोली जीव, जंतु, पंछी और पौधे भी समझते हंै। क्योंकि उसकी बोली में धार्मिक पक्षपात तत्व नहीं है और वह आपकी तरह कट्टर नहीं है। मस्तानी को अनेक भाषाओं का ज्ञान है। उसने पढ़ने लिखने की शिक्षा पाई है। इसलिए वह मराठी के अतिरिक्त राजस्थानी, सिंधी, फारसी, गुजराती, उर्दू, अरबी, हिंदी और संस्कृत के शब्दों का सहज ही प्रयोग कर लेती है। वह स्वामी प्राणनाथ के प्राणामी मत को मानती है और उनकी धार्मिक पुस्तक ‘कुलसम स्वरूप’ को पढ़ा होने के कारण यह स्वाभाविक ही है कि उसके द्वारा मराठी बोलते हुए दूसरी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग हो जाता है। रही बात विदेशी होने की, तो मस्तानी महाराजा छत्रसाल की संतान है। बुंदेलखंड केसरी महाराजा छत्रसाल अस्सी-इक्यासी बरस पहले ( 4 मई 1649 ई.) को कर्च कचनई में जन्मे राजपूत हैं। सारी उम्र वह मुगलों से लड़ते रहे हैं और कट्टर हिंदू हैं। भूल गए कि महाराजा छत्रसाल ने अपनी सेवाएँ छत्रपति शिवाजी को भी दी थीं ? शायद आपको ज्ञान नहीं है कि 1684 ई. में बुंदेलपति केसरी महाराजा छत्रसाल ने जजि़या लेने आये मौलणियों के सिर कलम करके कुरान के पतरों में लपेटकर मुगल बादशाह को भेजे थे। वह सदैव औरंगजेब द्वारा(9 अपै्रल) 1669 ई. में जारी किए गए आदेश ‘काफर कफूर’ का भारी विरोध करते रहे हैं। महाराजा छत्रसाल के पिता चंपत राय ने बहुत पहले ही मुगलों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया था और वह मुगलों के साथ लड़ते हुए बादशाह के चहेते अब्बू फजल को मारकर भगवान को प्यारे हो गए थे। मुगलों और पठानों के साथ बुंदेल पिछले पचास वर्षों से भिड़ते आ रहे हैं। इस विद्रोह के बदले उनके अनेक मंदिरों का अपमान हुआ, लाखों योद्धाओं को शहीद किया गया, बच्चों-बूढ़ों को कै़द किया गया और असंख्य स्त्रियों के साथ घोर अत्याचार भी हुए। परंतु फिर भी बुंदेल साहस के साथ लड़ रहे हैं। बुंदेलों के वंश की उत्पति भगवान विष्णु से होती है। पवारों और धंदरों की भाँति वे सूर्यवंशी हैं और कमल पुष्प उनका राजसी चिह्न है। विद्यावासिनी देवी की वे उपासना करते हैं। आप उनकी बेटी मस्तानी को विदेशी कैसे कह सकते हैं ?“

“मुगलों की तरह राजपूतों में भी बहु-विवाह और रखैले रखने की प्रथा है। मुसलमान होने के कारण क्या मालूम, मस्तानी की माँ का हिंदू महाराजा छत्रसाल के जनानखाने में क्या रुतबा है ? मस्तानी की माँ तो मुसलमानी है न ?“ तीसरा ब्राह्मण फुंकारता है।

बाजी राव अपनी दलील देता है, “मस्तानी की अम्मा का दजऱ्ा और धर्म कुछ भी हो, उसका पिता तो एक हिंदू है न ? उससे भी बढ़कर वह बुंदेलखंड का महाराजा है जो मस्तानी के शाही रक्त होने का साक्षी है। वह कोई ऐरी गैरी और साधारण स्त्री नहीं है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि वंश पुरुष के साथ चलते हैं। बच्चा जब जन्म लेता है तो उसका गोत्र और धर्म वही होता है जो उसके पिता का हो। मैं चितपवन ब्राह्मण भट्ट खानदान का वंशज कहलाता हूँ क्योंकि मेरे बाप दादा का एक वंश था। न कि माता का। मेरे माताश्री देशास्था ब्राह्मण घराने से आए हैं। मैं चितपवन ब्राह्मण कहलाता हूँ, देशास्था नहीं। मुझे बताओ, आप अपने पिता के नाम से जाने जाते हों या माँ के नाम से ?“

“कुछ लोग तो कहते हैं कि मस्तानी महाराजा छत्रसाल की असली संतान नहीं है। मस्तानी का असली पिता जहानत खान था। वह छत्रसाल द्वारा गोद ली गई पुत्री अथवा सौतेली बेटी है।“

“लोगों का क्या है, वे तो बहुत कुछ कहेंगे। जितने मुँह, उतनी ही बातें। बुंदलपति केसरी महाराज छत्रसाल बहुत जिम्मेदार और सुलझे हुए इन्सान हैं। वह सौतेली बेटी को सगी कहकर क्यों हमारे साथ ब्याहेंगे ? यदि ऐसी बात होती तो वह मस्तानी को धर्मपुत्री भी बता सकते थे।“

“पर वह नमाज पढ़ती है और रोजे़ रखती है और वह भी कट्टर हिंदू पेशवा परिवार के घर में रहते हुए। राम...राम...राम।“ पंडितों का मुखिया प्रश्न दाग देता है।

बाजी राव पेट में हँसता है, “अनशन यानि कुछ समय के लिए अस्थाई तौर पर जानबूझ कर अन्न का त्याग करने की प्रथा सिद्धों, नाथों और योगियों ने शरीर को आरोग्य रखने और अन्न की किल्लत को पूरा करने के लिए चलाई थी। अन्न त्याग कर फाका रखने को व्रत कह लो अथवा रोज़ा। अर्थ और उद्ेश्य तो उसके एक जैसे ही हैं। आपको मस्तानी के नमाज़ अदा करने के बारे में ज्ञान है। परंतु इसका इल्म नहीं है कि वह आरती भी करती है और कृष्ण भगवान की भक्ति में भजन गायन भी। वास्तव में, जैसे मैं पहले बता चुका हूँ कि मस्तानी स्वामी प्राण नाथ के प्राणामी मत को मानती है। प्राणामी हिंदू और इस्लाम धर्म की अच्छी बातों को अपनाने का संदेश देते हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी स्वराज का सपना देखा था और बादशाह अकबर ने हिंदुत्व और इस्लाम को एक करने के लिए दीन-ए-इलाही चलाया था। धर्म का काम होता है - जोड़ना। मनुष्य को मनुष्य से तोड़ना नहीं। एक धर्म का पालन करना ही बहुत कठिन होता है। मैं तो मस्तानी पर बलिहारी जाता हूँ कि वह एक समय में दो दो धर्मों का पालन कर रही है। हमारे हिंदुओं में तैंतीस करोड़ देवता हैं। क्या कभी किसी ने शिव भक्त को दुर्गा देवी की पूजा करने से रोका है ? या ब्रह्मा की भक्ति करने वाले को रोका है कि वह विष्णु या महेश की आराधना न करे ? कभी किसी ने काली देवी के उपासक को गणपति को मानने से रोका है ? बस, यह समझ लो कि मस्तानी के तैंतीस करोड़ पर एक देवी-देवता हैं। इसलिए वह नमाज़ भी पढ़ती है। ईश्वर एक है और धर्म उसकी प्राप्ति के अलग अलग रास्ते हैं। शायद आप धर्म शास्त्र और धर्म व्याकरण को समझ नहीं सके।“

यह सुनते ही वे सभी ब्राह्मण जो अभी तक चुप बैठे थे, भी भड़क उठते हैं, “धर्म क्या है, अब हम पंडितों को आपसे सीखना पड़ेगा ? पेशवा जी, आपने अनेक युद्ध लड़े हैं और जीते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि धर्म को आप अपनी मनमजऱ्ी से तोड़-मरोड़कर प्रयोग किए जाओ। आप कौन होते हैं, धार्मिक फैसले करने वाले ?“

“किसी के निजी जीवन में दख़ल देने वाले आप कौन होते हैं ? फिर भी आप हमारे दरबार में चले आए हो, हम आपका सम्मान करते हैं और चाहते हैं कि इस विवाद का यही समाप्त कर दिया जाए। हमने मस्तानी को अपनी पत्नी बनाया है और यह एक अटल सच्चाई है। हम उसको नहीं छोड़ सकते। आपके हृदय को शांत करने का कोई राह है तो आप ही हमें इस चक्रव्यूह से निकलने का मार्ग बतायें ?“ बाजी राव नम्रता से बोलता है।

“श्रीमंत, अब आप हमारी बोली बोलने लगे हैं... हिंदू पेशवाई में मुसलमान स्त्री से संबंध अधर्म है। एक काम हो सकता है।... प्रायश्चित करके मस्तानी का शुद्धिकरण कर लिया जाए और उसको ब्राह्मण बना दिया जाए।“

“प्रायश्चित ? किस बात का प्रायश्चित ? प्रायश्चित तो पापों का किया जाता है। क्या हमारे संग प्रेम करने से मस्तानी ने कोई पाप या गुनाह किया है जो वह प्रायश्चित करे ? मस्तानी कर्म से क्षत्रिय है और क्षत्रिय ही रहेगी। उसकी आत्मा गंगा जल की तरह साफ और पवित्र है, पवन की तरह निर्मल है और हवन की आहुति की भाँति शुद्ध है। फिर आप उसका क्या शुद्धीकरण करोगे ?“ बाजी राव तिलमिला उठता है।

“आपको धार्मिक रीति-रिवाजों पर किंतु-परंतु करने का कोई अधिकार नहीं है। हम कैसे विश्वास कर लें कि आपकी मस्तानी के साथ शादी हुई है ? मस्तानी का जीवन ढंग इस्लामी है। यदि आप उसके साथ शादी करवाकर उसका रहन-सहन, उसका तौर-तरीका, जीवन जीने की दृष्टि, मानसिक सोच विचार अर्थात समस्त जीवन शैली परिवर्तित कर सकते हो तो हमें कोई आपŸिा नहीं, आपके और उसके रिश्ते को लेकर।“ ब्राह्मणों का मुखिया अपना निर्णय सुना देता है।

“मेरे और मस्तानी के जीवन में खलल डालने और हमारे रिश्ते पर कीचड़ उछालने का तो आपको भी हक नहीं है। प्रेम करते समय खुद को बदला जाता है और प्रेमी को उसके उसी रूप में स्वीकारना होता है जिसमें वह हो। उसे बदला नहीं जाता। यही इश्क का उसूल है। हमारा विवाह जब बुंदेलखंड में हुआ था तो उसमें हमारी सेना के अनेक सरदार उपस्थित थे। नर्बदा नदी के तट पर उस विवाह को अन्तिम स्पर्श दिया गया था। यदि आपको इससे राहत नहीं मिलती तो हम दुबारा से इस आने वाले वसंत उत्सव में मस्तानी के साथ विवाह रचाएँगे। आप सभी आकर उसके साक्षी बन सकते हैं।“ बाजी राव खीझ कर सभा विसर्जित कर देता है और क्रोध में दरबार से उठकर चला जाता है।

ब्राह्मण शांत होकर अपने अपने घरों को चले जाते हैं।

बहरहाल, उसी वर्ष 1730 ई. के अंत में बाजी राव मस्तानी के साथ दुबारा विवाह रचा लेता है।

इस विवाह में उसकी माँ राधा बाई और पत्नी काशी बाई को छोड़कर शेष सभी सम्मिलित होते हैं। विवाह के अवसर पर बाजी राव मस्तानी के लिए ब्राह्मण देवकी नंदन पाठक को गीत गोबिंद व्याख्या सहित लिखने और एक बारांदरी बनाने का आदेश देता है।

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Re: मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

Post by Ankit » 11 Jun 2017 17:45

शनिवार वाड़ा


बाजी राव और मस्तानी का प्रेम कोथरूड़ बाग (पूणे का एक इलाका) के एकांतमयी वातावरण में पलने लग पड़ता है। बाजी राव दिन रात मस्तानी के साथ अय्यासी मंे डूबा रहने लगता है। दिन भर मस्तानी, बाजी राव के साथ घुड़सवारी और युद्ध अभ्यास करती रहती है। कभी कभी तो बाजी राव के संग शनिवार वाड़ा में शिकार खेलने भी चली जाती है। संध्या समय वह बाजी राव के बराबर बैठकर मदिरापान करती, नृत्य दिखलाती और अपनी सुरीली आवाज़ में गीत-ग़ज़लें भी सुनाती है। मस्तानी बड़ी निपुणता से अनेक साज बजाना जानती है। शाइरी करने के शौक के कारण मस्तानी ने पढ़ना-लिखना भी सीखा हुआ है। वह अनेक भाषाओं का ज्ञान रखती है। रात्रि में नृत्य करते हुए मस्तानी को बाजी राव अपनी बाहों में उठाकर उसके होंठों से अपने होंठ जब जोड़ लेता है तो यूँ लगता है मानो कृष्ण बंसरी बजा रहे हों। मस्तानी भी बाजी राव के साथ इस प्रकार आलिंगनबद्ध हो जाती है जैसे चंदन के वृक्ष से नाग लिपटा होता है।


मस्तानी बहुमूल्य गहनों और रेशमी वस्त्रों में सदैव सज धज कर रहती है। सबसे बड़ी बात वह जवान और अति सुशील है। मस्तानी बाजी राव से आयु में दस वर्ष छोटी है। गोरी-चिट्टी और लम्बी छरहरी भरपूर यौवना मस्तानी के हुस्न का जादू बाजी राव के सिर चढ़कर बोलने लग पड़ता है। मस्तानी के प्रेम में बाजी राव सब रिश्ते-नाते और दुनियादारी बिसरने लग जाता है। बाजी राव का संसार सिमटकर रह जाता है जो मस्तानी से शुरू होकर मस्तानी पर ही खत्म हो जाता है।

ससवाद (करहा नदी के तट पर बसा पूणे का एक क्षेत्र) से दूर कोथरूड़ में रहने के कारण बाजी राव का रिश्ता लगभग अपने परिवार से टूट ही गया होता है। वह ससवाद एक जिम्मेदारी पूरी करने ही आता-जाता है। परंतु उसका मन वहाँ नहीं लगता। बाजी राव का मन तो मस्तानी के पास ही बहलता है।

बाजी राव मस्तानी को वेल नदी के पास पाबल (श्रीरर तुलका का पूणे से 39.94 किलोमीटर दूर पड़ता एक पंचायती गांव) के नागेश्वसर महादेव मंदिर को दिखाने ले जाता है। मस्तानी भिन्न भिन्न नृत्य मुद्राओं वाली नर्तकियों की मूर्तियों वाले मंदिर की सुंदरता देखकर मोहित हो उठती है। वहाँ के एकांत में मस्तानी मंदिर के पुजारी से मंदिर के विषय में पूछती है।

पुजारी उन्हें बताता है, “इस मंदिर में दूर दूर से लोग अपने प्रेम की प्राप्ति और रिश्तों के लम्बे निभने की मन्नतें मांगने आते हैं। आपके जैसी प्रेमी युगलों का तो यहाँ तांता लगा रहता है। इस मंदिर को कन्नू राजा पाठक ने अपनी महबूब नर्तकी के लिए चैहदवीं सदी में बनवाया था।“

मस्तानी मजाक में बाजी राव से पूछ लेती है, “शाहजहाँ ने मुमताज महल के लिए ताज महल बनवाया था। क्या कभी मेरे लिए भी आप ऐसा जगह कुछ बनवाओगे ? आप तो कहते थे, कुछ बनवाऊँगा जिसको देखकर सारी दुनिया दंग रह जाएगी। कब बनवाओगे ?“

बाजी राव उतर में कुछ नहीं कहता और मस्तानी को बांह से पकड़कर वहाँ से ले जाता है। जब वह मुल्ला-मूथा दरिया के निकट पहुँचते हैं तो बाजी राव मस्तानी से प्रश्न करता है, “मस्तानी, एक बात बता, कैसा लगा तुम्हें हमारा पूणाका (पूणे) ? तेरा यहाँ चित लगा कि नहीं ? मराठों की मातृभूमि बढि़या है कि बुंदेलखंड ?“

मस्तानी हँसती हुई उतर देती है, “स्वामी, विश्व में सर्वोतम तो वही जगह होती है जहाँ आप जन्मे, पले और बड़े हुए होते हो। लेकिन जहाँ वर्तमान समय में रह रहे हो और आने वाली वहाँ आयु बितानी हो तो जड़े जमाने के लिए उस धरती को भी प्यार करना पड़ता है। नहीं तो इन्सान सदा उखड़ा रहता है।“

“नरबादा (मस्तानी), मेरा छत्रपति महाराज शाहू की राजधानी सतारा से अपना केन्द्र बदलने से बहुत पहले से विचार बना हुआ है। मुझे हर काम में शाहू जी की दखलअंदाजी नहीं भाती। मैं भी बिना रोक टोक मुगलों की तरह ऐश परस्ती करना चाहता हूँ। अब पूरा जीवन मैं लड़ मरकर तो व्यतीत नहीं कर दूँगा न?... कभी पूणा एक छोटा सा गांव हुआ करता था। अब यह एक बड़ा शहर बन चुका है। मराठा राजनीति का गढ़ कह लें तो कोई अतिकथनी नहीं होगी। इसके कई पेठ (नगर) हैं और प्रत्येक पेठ में अनेक वाड़े(Residence Complex½) हैं। पर मैं एक दूसरा ही वाड़ा बसाने की सोच रहा हूँ। मस्तानी वाड़ा।“

“वाह ! बहुत सुंदर योजना है। पर कहाँ बनाओगे नया वाड़ा ?“

“यहीं, कस्बा पेठ के समीप मुल्ला-मूथा दरिया के किनारे ही। और कहाँ ? महाराज शाहू जी ने लाल महल वाली यह जागीर मुझे प्रदान की हुई है। मेरा लक्ष्य एक एक ऐसा वाड़ा बनाने का है जो बाकी सभी वाड़ों से खूबसूरत और आलीशान हो। किले की भाँति सुरक्षित हो। वाड़े का हर मकान केवल दो मंजि़ला हो। छत पर सोने के लिए शयन कक्ष। निचली मंजि़ल पर कोई खिड़की न हो ताकि अंदर बसने वाले पर्दे में रह कर अपना जीवन अपनी इच्छानुसार व्यतीत कर सकें।“ बाजी राव अपनी कल्पना में बसा नक्शा खींच देता है।

मस्तानी यह सुनकर उमंगित हो उठती है, “ठीक है। मैं इस कार्य में आपका पूरा सहयोग करूँगी। मेरी ओर से चाहे आज से ही तैयारियाँ प्रारंभ कर दो।“

बाजी राव, मस्तानी के साथ एक नया संसार निर्मित करने के लिए ज्योतिष्यिों को 10 जनवरी 1730 ई. के दिन बुलाकर मुहूर्त निकलवाता है तो शनि देव की कृपा वाला शनिवार का शुभ दिन निकल आता है। मस्तानी के नाम के वाड़े का एकदम विरोध न हो, इसलिए बाजी राव मस्तानी के परामर्श पर उस नये वाड़े का नाम शनिवार वाड़ा यह सोचकर रख देता है कि बाद में उस नाम को बदल दिया जाएगा। सात दिन बाद 17 जनवरी 1730 ई. को नवीन और आधुनिक सुविधाओं वाले शनिवार वाड़े का बाजी राव नींव पत्थर रखकर निर्माण कार्य आरंभ करवा देता है।

राजस्थान के प्रसिद्ध ऐतिहासिक कुम्मवत खत्री को भवन निर्माण का उŸारदायित्व सौंपते हुए बाजी राव समझाता है, “यह वाड़ा पूणे के सब वाड़ों से उŸाम होना चाहिए। समीप के इलाके जूनर के जंगल से सागौन वृक्षों की लकडि़याँ, चिचवड़ से पत्थर, जूजेरी के नींबू बूटों का प्रयोग करके इस को जितना संभव हो सकता है, हमारे रहने के लिए तैयार कर दो।“

कुम्मवत कागज-कलम तैयार कर लेता है, “चिंता न करिये, श्रीमंत। मैं दिन रात एक कर दूँगा। आप इसकी योजना मुझे बता दो एकबार, फिर मंैं जानूँ या मेरा काम जाने। आपकी कल्पना को साकार करके रख दूँगा। ऐसा शानदार वाड़ा तैयार करूँगा कि लोग मुँह में उंगलियाँ दबाकर देखते रह जाएँगे।“

“हम इसके पाँच द्वार बनाना चाहते हैं। सबसे बड़ा मुख्य दरवाज़ा उतर दिशा मंें दिल्ली की ओर खुलता हो ताकि जब भी हम शनिवार वाड़े से बाहर कदम रखें तो दिल्ली पर राज करने का लक्ष्य हमें स्मरण रहे। इसका नाम भी हम दिल्ली दरवाज़ा ही रखेंगे। इस दरवाज़े की मजबूती छातीची होनी चाहिए, माटीची नहीं। मेरा आशय यह है कि दरवाज़ा बहादुर मराठा मर्दों की छाती जैसा मजबूत हो। मिट्टी की तरह भुर जाने वाला नहीं। दरवाज़ा कम से कम इतना बुलंद हो कि होडा (पालकी) सहित हाथी आसानी से इसमें से निकल सके। शत्रु का हाथी टक्कर मारकर इसे ध्वस्त न कर सके। इसलिए दरवाज़े में पचास-साठ तीखे नुकीले बांहों बराबर कील जड़ दो। पूरा दरवाज़ा सख्त लोहे से ढका हो।“

“बेफिक्र रहें, श्रीमंत। पूरा दरवाज़ा लोहे की चादर से मढ़ा होगा। जंगी हाथी के माथे की सीध में आधे आधे गज़ के बहतर कील लगाएँगे। साधारण व्यक्ति के निकलने के लिए छोटा-सा दरवाज़ा लगाएँगे ताकि हमला होने की सूरत मंे फौज जल्दी अंदर प्रवेश न कर सके।“ कुम्मवत खत्री दरवाज़े की तस्वीर बनाकर दिखाता है।

“हाँ, दरवाज़े से निकलते ही रास्ता एकदम बायीं ओर मुड़ना चाहिए ताकि हमलावर को आगे बढ़ने में कठिनाई पेश आए और हमारी सेना आगे बढ़ने वालो को ढेर करती जाए।... एक दरवाज़ा मस्तानी के लिए विशेष तौर पर बनाया जाए। उस ‘मस्तानी दरवाजे़’ (मस्तानी के पोते अली बहादुर के कारण इसको अली बहादुर दरवाज़ा भी कहते हैं) को सिर्फ़ मस्तानी ही अंदर-बाहर जाने के लिए इस्तेमाल किया करेगी। तीसरा दरवाज़ा सुरक्षा की दृष्टि से बनाया जाएगा - खिड़की दरवाज़ा। चैथा दक्षिणी गणेश दरवाज़ा भगवान गणेश रंग महल और कस्बा गणपति मंदिर की ओर जाते हुए रास्ते में बनाया जाए। इस दरवाज़े के द्वारा वाड़े की स्त्रियाँ मंदिर जाया करेंगी। पाँचवा जमभुल दरवाज़ा (कई वर्ष बाद बाजी राव के पोते पेशवा नारायण राव की अर्थी के इस दरवाजे़ सेे श्मसान भूमि को जाने के बाद अब इस दरवाजे़ को नारायण दरवाज़ा कहा जाने लगा है) एक खास मकसद के लिए गुप्त सा बनाया जाए। हमारे वंशजों के मनोरंजन के लिए लुकछिप कर पर्दे में आने वाली रखैलें और कंचनियाँ इस दरवाज़े का प्रयोग किया करेंगी।“

“ये तो दरवाजे़ हो गए। बीच मंे कैसे और कौन से भवन बनाये जाने हैं ?“

“इसमें हमारी प्रिय मस्तानी के लिए विशेष ‘मस्तानी महल’ बनाया जाए। एक थोरलिया रायनचा दीवानखाना (Marathi : The court reception hall of the eldest royal, meaning Baji Rao-I) जहाँ हम दरबार लगाया करेंगे। नृत्य दीवानखाना (Dance Hall) हमारे मुजरे देखने के लिए होगा और जूना आरसा (पुराना आरसी) महल (Old Mirror Hall) फुर्सत के समय वक्त बिताने के लिए होगा जो सारा का सारा शीशों से जड़ा हो...। और हम क्या कहें, आप खुद समझदार और अच्छे कारीगर हो।“ बाजी राव मोहरों की अनेक थैलियाँ कुम्मवत खत्री को इस कार्य के लिए दे देता है।

मोहरों को देखकर कुम्मवत खत्री अवाक और प्रसन्न हो जाता है, “बस, मैं समझ गया सब। आप देखते चलें, मैं आपको क्या करके दिखाता हूँ, हुजूर !“

वाड़े के निर्माण कार्य युद्धस्तर पर प्रारंभ हो जाते हैं।

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Re: मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

Post by Ankit » 11 Jun 2017 17:46

प्रेम पौधा
मुगल बादशाह को जब सरबुलंद खान द्वारा 1730 ई. में बाजी राव के साथ चैथ और सरदेशमुखी को लेकर की गई संधि के बारे में पता चला तो उसको यह फैसला पसंद नहीं आया। बादशाह ने सरबुलंद खान को पद से हटाकर जोधपुर के अजीत सिंह के पुत्र अभय सिंह को जिम्मेदारी सौंप दी। परंतु अभय सिंह को भी बाजी राव के साथ समझौता करना पड़ा, क्योंकि वह अकेला बहुत सारे खुदमुख्तारों के साथ नहीं निपट सकता था। ये समझौते मराठा सेनापति तिंबर्क दाबड़े को स्वीकार नहीं थे। वह गुजरात के सब मामलों को वसूलने का अपना हक़ समझता था। वह पहले से ही पेशवा के साथ खार खाता था। उसका कारण यह था कि छत्रपति के बाद दूसरा बड़ा पद पेशवा का होने के कारण वह बाजी राव के साथ उसकी योग्यता के कारण घृणा करता था। दूसरी ओर पेशवा पुराने लोगों की अपेक्षा होलकर, शिंदे और पवार जैसे नौजवानों को पदों पर आसीन करके प्रसन्न होता था।

शिंदे, पवार, गायकवाड़ और होलकर घरानों का उभार भी बाजी राव की कृपा से हुआ था। शिंदे, सतारा जि़ला के कोरेगांव ताल्लुक के कंनेरखेड गांव के वासी थे। इनके पुरखों को इनाम के तौर पर इस गांव की जागीर मिली थी। बाजी राव के पिता बालाजी विश्वनाथ की सेना में राणो जी शिंदे नाम का कारीगर था। उसकी ईमानदारी को देखकर बाजी राव ने उसको अपना निजी सेवक और अंगरक्षक बना दिया था। उरी हिंदुस्तान के युद्धों में लड़ने के पश्चात इसको बाजी राव ने एक बड़ा फौजी दल देकर उसका मुखिया बना दिया था।
होलकर घराने के लोग नीरा नदी क तट पर बसे जंजोरी नगर के निकट पड़ते होल गांव के रहने वाले थे। इस घराने का संस्थापक मलहार राव होलकर था, वह भेड़ें चराकर अपना गुज़ारा किया करता था। बाद में यह किलेदार बन गया। किलेदारी करते हुए इसने युद्ध विद्या सीखी और बाजी राव के साथ अनेक युद्धों में अपने जौहर दिखाये। उसकी बहादुरी को देखते हुए बाजी राव ने उसको पाँच हज़ार सैनिकों का सेनापति बना दिया था।

पवार राजपूतों का वंश बहुत पुराना है। इनकी महिमा धार प्रदेश से ही अधिक हुई। राजा विक्रमादित्य और राजा भोज, धार में बसते रहे थे। विक्रमादित्य ने तो उज्जैन से बदलकर अपने राजधानी धार को बना लिया था। असल राजपूत और मराठा पवार वंश का संस्थापक उदाजी राव पवार को माना जाता है। 1729 ई. में बाजी राव द्वारा उसको धार की जागीर छत्रपति से प्रदान करवाई थी।

गायकवाड़ घराने का आगाज़ भी लगभग शिंदे और होलकर घरानों के साथ ही हुआ था। झिंगोजी राव गायकवाड़ के पुत्र पिलाजी राव गायकवाड़ ने गुजरात में अपनी धाक जमा के 1721 ई. मंे अपना राज स्थापित किया और वड़दोरा (ठंतवकं) को अपना राजधानी बनाया। 1726 ई. में उसने सोनागाड के जि़ले का निर्माण करवाया। इसको पेशवा बाजी राव की ओर से ‘सीना खास खेल’ का खिताब बख्शा गया था। (14 मई 1732 ई. को उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र धमाजी राव गायकवाड़ ने राज संभाला था)।

छत्रपति द्वारा मराठा सरदारों खंडो राव और दाभड़े को यह विश्वास दिलाया गया था कि यदि वे गुजरात जीत लेंगे तो वहाँ की जागीर उन्हें ईनाम के तौर पर दी जाएगी। खंडो राव ने तभी से ही गुजरात में कर वसूलना प्रारंभ कर दिया। सिद्धी हुसैनी ने उस के साथ दो बार युद्ध किया लेकिन वह हार गया। छत्रपति ने इस पर प्रसन्न होकर खंडो राव को सेनापति बना दिया। इसी खंडो राव का साथी दमाजी गायकवाड़ (पिलाजी राव गायकवाड़ का पुत्र) था। वह बड़ा महान योद्धा था। इसलिए छत्रपति ने गायकवाड़ को ‘शमसेर बहादुर’ की उपाधि से नवाजा था। बहुत सारे युद्धों में भी ये सब बाजी राव के संग चला जाया करते थे। गुजरात मामला सुलझाने की अपेक्षा दिन-प्रतिदिन भड़कता ही गया। संसारपति तिंबर्क दाभड़े ने पेशवा बाजी (द्वितीय) (बाजी राव का पुत्र नाना साहिब) पर दाभड़े परिवार और छत्रपति शाहू के मध्य हुए अहदनामी का उल्लंघन करने का दोष मढ़ दिया। संसारपति ने बाजी राव के साथ सख्ती से सीधे ही निपटने के लिए धार की जंग छेड़ ली।

अपै्रल 1731 ई. को धोबाई में हुई इस लड़ाई में तिंबर्क दाभड़े और संभाजी का पुत्र पिलाजी गायकवाड़ मारे गए। इस जंग में बागी हुए उदाजी पवार और चिमनाजी दामोदर को बाजी राव ने बंदी बनाकर युद्ध जीत लिया।

युद्ध से लौटकर आने के उपरांत 2 अपै्रल 1731 ई. को देवकी नंदन का लिखा बाजी राव को एक ख़त मिलता है। उस में बारांदरी और गीत गोबिंद के तैयार हो जाने की सूचना दी गई होती है।

शनिवार वाड़े का निर्माण आरंभ होने से दो वर्ष बाद शनिवार वाड़ा( वाड़े की किलेबंदी और दीवारें, फव्वारे, बाग और ऊँचे बुर्ज़ का काम बाद में बाजी राव के पुत्र नाना साहिब ने 1746 ई. में पूरा करवाया था।) तैयार हो जाता है। शेरू (ब्लचतमेे ज्तमम) के तनों की शहतीरें, छतों के नीचे सहारे के लिए डाली जाती हैं। भवनों की दीवारों पर जयपुर के मोराजी पत्थरवत भोजराजा और चित्रकार रागो द्वारा रामायण और महाभारत के चित्र बनाये जाते हैं।

22 जनवरी, 1732 ई. शनिवार वाले दिन को हिंदू रीति के अनुसार पूजा और हवन करवाकर बाजी राव और उसके समूचे परिवार द्वारा ससवाद छोड़कर शनिवार वाड़े में गृह-प्रवेश किया जाता है। इस शुभ दिन पंद्रह रुपये पचास पैसे का दान बाजी राव मस्तानी के हाथों करवाता है। वाड़ा तैयार करने वाले कारीगरों, कुम्मवत खत्री, मोराजी पत्थरवत भोजराजा, शिवराम कृष्णा, देवाजी, कोंडाजी सूत्र आदि को बाजी राव द्वारा नायक (छंपा उमंदे डंेजमत) का खिताब और भारी ईनाम देकर नवाज़ा जाता है। वाड़े पर कुल लागत 16,100.10 रुपये आ चुकी होती है।

बेशक पेशवा का समस्त परिवार शनिवार के दिन वाड़े में एकत्र होता है, परंतु सभी सदस्य मस्तानी से अपनी एक सीमित दूरी बनाकर रखते हैं। यहाँ तक कि मस्तानी के प्रयोग के लिए कुआँ भी पृथक होता है। रहने के लिए महल भी अलग और वाड़े से बाहर जाने के लिए दरवाज़ा और मंदिर भी अलहदा ही होते हैं। मस्तानी के राह में से निकलने पर भी भट्ट परिवार कन्नी कतराता है। बाजी राव को महज दिखावा करने के लिए ही वे मस्तानी के साथ न चाहते हुए भी तालमेल रखते हैं। वरना मस्तानी का उल्लेख सुनना भी उनको अच्छा नहीं लगता। विशेषकर काशी के मन में से न कभी मस्तानी के लिए नफ़रत गई थी और न ही जा सकती है। मस्तानी को अपने साथ होते पक्षपाती व्यवहार और अस्वीकारे जाने का दुख तो होता है, पर वह अपने मन की भड़ास किसी के सामने नहीं निकालती। सब कुछ अपने अंदर ही समाहित करके बाजी राव के प्रेम में मस्त हुई रहती है।

पेशवा का सारा खजाना वाड़े के निर्माण पर ही खर्च हो चुका होता है। महीना पहले 20 दिसम्बर 1731 ई. को महाराजा छत्रसाल की मृत्यु हो जाने के कारण बाजी राव को बुंदेलखंड से भी आर्थिक सहायता आनी बंद हो जाती है। मस्तानी के भाई शहजादा जगतराज का भेजा पत्र बाजी राव को मिलता है जिसमें उसने लिखा होता है कि महाराजा छत्रसाल की मौत के बाद वह राज को संभालने और सभी साठ भाई-बहनों को उनका हक, हिस्से और जागीरें बांटने में व्यस्त है। जैसे ही वह अपने घरेलू मामलों को निपटा लेगा तो फुर्सत पाकर वह पूणे आएगा और पेशवा को अपने स्वर्गीय पिता की वसीयत के अनुसार बनने वाला तीसरा हिस्सा सौंप देगा।

बाजी राव अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए नये क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए निकल पड़ता है। हर मुहिम में मस्तानी दिन रात बाजी राव के संग संग रहती है। जब कभी युद्ध से फुर्सत मिलती है तो वह शनिवार वाड़े में जाकर आराम करते हैं। पेशवा के शेष सभी परिवार के अलावा अन्य जान-पहचान वाले और सगे-संबंधी भी ससवाद छोड़कर शनिवार वाड़ा में आकर रहने लग पड़ते हैं।

मौसम बदलते रहते हैं। पतझर...सावन...बसंत...बहार...।

वर्ष 1732 ई. में काशी की कोख से बाजी राव को एक पुत्र रामचंद्र की प्राप्ति होती है। लेकिन वह बीमार होकर कुछ महीने बाद ही ईश्वर को प्यारा हो जाता है। उससे अगले वर्ष 1733 ई. में मस्तानी का मामा अनवर खान पूणे में आकर मस्तानी की अम्मी के निधन की ख़बर सुनाता है। मस्तानी कुछ दिन माँ का शोक मनाने के बाद अपने जीवन में पुनः व्यस्त हो जाती है।

इसी वर्ष काशी बाई का एक और गर्भ गिर जाता है। उन दिनों में ही बहुत सारे मराठा सैनिक भी जंग में मारे जाते हैं। पेशवा का परिवार इन सभी मौतों का दोष मस्तानी के सिर मढ़ कर उसको अशुभ मानने लग जाता है।

सिद्धियों के साथ नित्य होती छोटी-मोटी झड़पों को बाजी राव एकबार भयंकर रूप में युद्ध करके समाप्त कर देने पर तुल जाता है। 1733 ई. में सिद्धी नवाब रसूल याकूत की मृत्यु हो जाती है तो उसके पद की दावेदारी को लेकर उसके भाइयों और पुत्रों के बीच झगड़ा उत्पन्न हो जाता है।

बाजी राव ने इस अवसर का लाभ उठाने के लिए जिंज़र को समुद्र की ओर से घेरा डाल लिया। जिंज़र का किला बहुत खस्ता हालत में था और ऐन वक्त पर सेखोजी की अचानक मौत हो गई। सेखोजी के भाई संभाजी के साथ तालमेल न बनने के कारण बाजी राव वापस लौट आया।

बाजी राव के साथ पाँच वर्ष लगातार दिन रात रहने के बावजूद मस्तानी गर्भवती नहीं होती, जबकि काशी को बाजी राव कभी कभार मिलने पर ही गर्भवती करके चला जाता है। यह अलग बात है कि उसके गर्भ में बीच में ही व्यवधान पड़ जाता है। मस्तानी को बांझ कहकर ताने-उलाहने कसे जाने लगते हैं। मस्तानी अपने और बाजी राव के प्रेम पौधे को फल लगा देखने के लिए तत्पर हो जाती है। वह सब तरफ से ध्यान हटाकर शराब छोड़ देती है और संतान प्राप्ति के यत्न प्रारंभ कर देती है।

एक दिन एकदम मस्तानी की तबीयत खराब हो जाती है। बाजी राव उपचारक को बुलाता है। दासियाँ मस्तानी की कलाई पर धागा बांधकर वैद को पकड़ा देती हैं। वैद धाना कानों से लगाकर मस्तानी की नब्ज़ सुन लेता है और मुस्कराता है, “चिंता करने की कोई बात नहीं श्रीमंत सरकार। मुबारक हो। पेशवा परिवार का चश्म चिराग आ रहा है।“

खुशख़बरी सुनकर बाजी राव उपचारक का धन्यवाद करता है और अपने गले में से उतारकर एक कीमती माला वैद को बतौर ईनाम दे देता है। मस्तानी के पास जाकर खुशी में पागल हुआ बाजी राव मस्तानी के चैड़े मस्तक को चूमते हुए कहता है, “मुझे तेरे जैसा सुंदर-सुशील और मेरे जैसा जांबाज मराठा शेर पुत्र चाहिए।“

“हाय अल्ला ! मुझे तो यकीन ही नहीं आता कि मैं माँ बनने वाली हूँ।“ मस्तानी बिस्तर पर पड़ी छुईमुई की तरह सिकुड़ जाती है।

“नित्य जो सागर मंथन करते थे, उसके परिणाम स्वरूप हीरा, मोती, लाल, माणक तो बाहर निकलना ही था। चलो, बधाई हो। एक का नींव पत्थर रखा गया है। ऐसे ही हम मेहनत करके एक विशाल लश्कर पैदा कर लेंगे।“ बाजी राव मूंछों को मरोड़ा देता है।

मस्तानी नखरा करती है, “न बाबा। जान से मारना है मुझे गरीबन को ? यदि फौज बनानी है तो आप बच्चा पैदा करके दिखाओ ?“

“अगर यह संभव होता तो तेरी खातिर हम यह भी कर देते मेरी प्रिय।“ बाजी राव मंद मंद हँसता है।

बाजी राव गरीबों को दान करके अपने परिवार को मस्तानी के गर्भवती होने का शुभ समाचार सुना देता है। काशी बाई को जब मस्तानी के गर्भवती होने के बारे में सूचना मिलती है तो वह तड़प उठती है। वह बहाने से अपनी सास राधा बाई को भड़का कर मस्तानी को बाजी राव से जुदा कर देती है। मस्तानी को जनेपे के लिए शनिवार पेठ के सरदार रसटाका के वाड़े मंे भेजकर खास दाइयाँ और दासियाँ उसकी सेवा में लगा दी जाती हैं। भट्ट पेशवा परिवार की सभी स्त्रियों को गर्भावस्था में वहीं ठहराया जाता है, क्यांेकि वहाँ सभी प्रकार की सुविधायें धरती की सतह पर ही उपलब्ध हैं। चैबारों पर चढ़ने उतरने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

काशी बाई को बाजी राव के साथ समय व्यतीत करने का खुला समय मिल जाता है। दिन रात बाजी राव काशी के पास रहता है। कुछ ही दिनों में काशी भी गर्भवती हो जाती है। मस्तानी और काशी बाई दोनों सौतनें रसटाका वाड़े में एकसाथ हो जाती हैं।

मार्च 1734 ई. में मस्तानी पुत्र को जन्म देती है। चितपवन ब्राह्मणों की रीति के अनुसार बच्चे के जन्म से छह दिन बाद पूजन और बारहवें दिन नामकरण की रस्म होती है। मस्तानी के पुत्र के लिए विशेष पूजा नहीं की जाती और बिना कोई रस्म किए बाजी राव मस्तानी की कृष्ण भक्ति को मुख्य रखकर अपने और मस्तानी के पुत्र का नाम कृष्ण रख देता है। लेकिन बाजी राव के परिवार वाले कृष्ण नाम के साथ सिनहा उपनाम जोड़ देते हैं। मस्तानी का पुत्र कृष्ण सिनहा के नाम से जाना जाने लगता है। न बाजी राव और न ही मस्तानी को उस समय यह ज्ञान होता है कि पुरातन परंपरा के अनुसार बच्चे के नाम के साथ सिनहा जोड़ने का अर्थ बच्चे को अधिकारों से वंचित रखना होता है। सिनहा शब्द का प्रयोग पेशवा के खानदान में अवैध संतान के लिए किए जाने की प्रथा होती है।

कृष्ण सिनहा के जन्म से कुछ माह बाद 18 अगस्त 1734 ई. को उसी वर्ष काशी बाई के रघुनाथ राव नाम का दूसरा पुत्र पैदा होता है। रघुनाथ राव के लिए सभी रस्में बाजी राव के विरोध के बावजूद निभाई जाती हैं। परंतु मस्तानी उनका बुरा नहीं मनाती। मस्तानी के मन को दुख अवश्य होता है, पर वह अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति किसी के सम्मुख नहीं करती।

बाहरी और घरेलू युद्धों से जूझता हुआ बाजी राव अपनी जीवन यात्रा तय किए जाता है। मस्तानी पेशवा के पारिवारिक सदस्यों के षड्यंत्रों से निपटती हुई बाजी राव के साथ हर मैदान में परछाई की तरह साथ रहती है। कृष्ण सिनहा और रघुनाथ राव बड़े होने लगते हैं। काशी बाई के एक अन्य पुत्र जनार्धन (जनोबा दादा) पैदा होता है।

रघुनाथ राव के बड़े होते ही मुंडन करवाकर ब्राह्मणी प्रथा का प्रतीक जनेऊ पहनने की रस्म की तैयारियाँ प्रारंभ हो जाती हैं। बाजी राव जब कृष्ण सिनहा के भी जनेऊ डालने की बात करता है तो एकबार फिर समस्या उठ खड़ी होती है। काशी बाई बवाल खड़ा कर देती है, “लो, जनेऊ नहीं तो और कुछ ? कल की भूतनी और श्मसान का आधा। आज जनेऊ की रस्म में शरीक करो, कल को पेशवाई पर अधिकार मांगेंगे। मुझसे और मेरे पुत्रों से सारे अधिकार छीनकर मस्तानी पर ही सब कुछ लुटा दो।“

“पर कृष्ण सिनहा मेरा बेटा है और हिंदू रीति के अनुसार उसको भी जनेऊ धारण करना चाहिए।“

बाजी राव के तर्क को चिमाजी अप्पा काटता है, “पर वह मुसलमानी का भी पुत्र है। वह क्या जाने जनेऊ का क्या महत्व होता है ? हमारी हिंदू मर्यादाओं का पालन उससे कहाँ हो पाएगा ?“

बाजी राव समस्त परिवार से बहुत माथा पच्ची करता है, पर बाजी राव की कोई एक नहीं चलने देता। मस्तानी के धैर्य का प्याला टूट जाता है। मस्तानी भी खीझकर समस्त पेशवा परिवार को खरी खोटी सुनाती है, “चाट लो अपने ब्राह्मणवाद को। मेरे पुत्र का नाम भी हिंदू नहीं रहेगा। छत्रपति द्वारा जंग में अकेले वीरता दिखाने वाले को ‘शमसेर बहादुर’ की उपाधि दी जाती है। मेरा पुत्र भी अब अकेला ही अपनी जंग लड़ेगा और आज से मैं अपने पुत्र का ब्राह्मणी नाम भी बदल कर राजपूतों और मुसलमानों वाला नाम शमशेर बहादुर रखती हूँ। जैसे आप चलोगे, मैं भी वैसे ही चलूँगी।“

कृष्ण सिनहा प्राणामी धर्म स्वीकार करके कृष्ण सिनहा से शमसेर बहादुर बन जाता है और हिंदू तथा इस्लाम धर्म का पालन करने लग जाता है। बाजी राव पाबल(। अपससंहम सपमे वद जीम समजि ;दवतजीद्ध इंदा व िजीम टमस त्पअमतण् च्ंइंस पे 39ण्34 ज्ञउ ंित तिवउ जीम कपेजतपबजष्े उंपद बपजल व िच्नदम ) वाले महल की मरम्मत करवाकर उसको मस्तानी महल का नाम दे देता है और मस्तानी के नाम कर देता है।

एक नये बने अन्य वाड़े रावरखेड़ी, पाबल में बाजी राव मस्तानी के प्रेम में लीन रहकर मनमर्जी का विलासमयी जीवन व्यतीत करने लग जाता है। वह राजनीतिक कामों और शासन प्रबंध तथा अन्य मामलों जैसे जंगों-युद्धों की तरफ ध्यान देना बहुत कम कर देता है। दिन रात मस्तानी बाजी राव के साथ शराब पीती और उसका चित बहलाने के लिए मुजरे करती रहती है। बाजी राव हाथों में जाम पकड़कर मस्तानी के परोसे पान को मुँह में चबाता हुआ अफ़ीम के नशे में हुक्के की गुड़गुड़ में सारे संसार को बिसार देता है। मस्तानी महल में बाजी राव और मस्तानी के प्रेम का पौधा फलता फूलता रहता है।...

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Re: मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

Post by Ankit » 11 Jun 2017 17:47

जंगनामा

1735 ई. तक मराठों ने समस्त गुजरात और मालवा क्षेत्र पर अधिकार जमा लिया। परंतु कुछ स्थानों पर मुगल ओहदेदारों और जमींदारों ने मराठों का शासन स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। मुगल बादशाह मुहम्मद शाह भी चैथ और सरदेशमुख की सनद मराठों के हवाले करने से कतराता था। बाजी राव ने बादशाह को मिलने के अनेक संदेशे भेजे। पर कोई सफलता प्राप्त न हो सकी। मराठों ने अपनी शक्ति दिखाने के लिए मुगलों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले राजपूताने (राजस्थान) में लूटमार शुरू कर दी।


मुगलों ने जवाबी कार्रवाई करते हुए मीर बख्शी खान और वजीर कमर-उद-दीन की कमान के अधीन दो फौजी टुकडि़याँ मराठों को कुचलने के लिए भेज दीं। लेकिन मराठों के सरदारों ने उन्हें पराजित करके उल्टे पांव लौटा दिया। पिलाजी यादव ने वज़ीर खान की सेना के दांत खट्टे किए और राणोजी शिंदे तथा मलहार राव होलकर ने मीर बख्शी के दल के साथ लोहा लेकर उनके घुटने टिकवा दिए।

सिद्धी अब्दुल रहिमान अपनी दावेदारी के लिए बाजी राव से सहायता लेने आया और बाजी राव ने उसको अपना समर्थन दिया। इसके एवज में सिद्धी के पुराने इलाके जैसे कि रायगढ़, रीवास और चैल आदि संधि के अनुसार 1736 ई. में मराठों के हवाले कर दिए गए। उसके उपरांत दूसरे सिद्धियों ने भी अपने अधिकार क्षेत्र मराठों को सौंप दिए। सिद्धियों के पास केवल जिंज़र, अनजानवल और गोवालकोट आदि छोटे इलाके ही रह गए थे। सिद्धी सत भी हाथी वाले मसले को लेकर हुई जंग में चिमाजी अप्पा के हाथों मारा जा चुका था।

पेशवा ने मुगल बादशाह को सबक सिखाने के उद्देश्य से दिल्ली की ओर दिसंबर 1737 ई. में अपने भारी लश्कर के साथ कूच कर दिया। दो दलों में विभाजित इस सेना की एक टुकड़ी की कमान बाजी राव ने संभाली। दूसरी के सिपहसालार पिलाजी यादव और मलहार राव होलकर बने। आगरा के गवर्नर और उदय के नवाब सआदत खान की भारी सेना ने दिल्ली के बाहर ही होलकर की टुकड़ी को तबाह कर दिया। मलहार राव होलकर जैसे तैसे अपनी जान बचाकर बाजी राव की टुकड़ी के साथ जा मिला। सआदत खान को बाजी राव के लश्कर के बारे में ज्ञान न होने के कारण उसने सोचा कि अब मराठों से उसको कोई ख़तरा नहीं होगा। उसने मराठों को नष्ट करने की खुशख़बरी दिल्ली के बादशाह को भेज दी। विजय की ख़बर सुनते ही अन्य कई मुगल जरनैल दिल्ली छोड़कर सआदत खान के साथ जश्न मनाने चले गए।

बाजी राव को जब अपने गुप्तचरों द्वारा इसकी ख़बर मिली तो उसके कदम तेज़ी से दिल्ली की ओर बढ़ने लगे। 28 मार्च 1737 ई. को दस दिनों की यात्रा केवल 48 घंटे में पूरी करके बाजी राव अपनी सेना के साथ दिल्ली की सरहदों के अंदर पहुँच गया। दिल्ली में प्रवेश करते ही बाजी राव की फौज ने दिल्ली में दहशत पैदा करने के लिए लूटमार प्रारंभ कर दी। मुगल बादशाह लाल किले के अंदर ही छिपा रहा और बाहर आकर बाजी राव के साथ लड़ने का साहस न कर सका। बाजी राव ने पूरी दिल्ली में कोहराम मचा दिया। 8000 की सेना लेकर मीर हुसैन कोका ने बाजी राव का राह रोकने का यत्न किया, पर बाजी राव ने उसकी एक न चलने दी। मीर हुसैन बुरी तरह घायल हो गया।

बाजी राव दो-तीन महीने निरंतर लूटमार करता रहा और उसने मुगलों के नाक में दम किए रखा। दिल्ली को बुरी तरह भयभीत करने के बाद बहुत सारा माल-असबाब और धन दौलत लूटकर बाजी राव 31 मार्च 1737 ई. को दक्षिण को लौट गया।

दिल्ली को अच्छी तरह हिलाकर पूणे जाते हुए केन्द्रीय भारत में बाजी राव अपने मराठा योद्धाओं के लिए रास्ते में अनेक छावनियाँ स्थापित करता गया। दया बहादुर के बाद जयपुर का राजा सवाईं जय सिंह मालवे का सूबेदार बना। यह स्वयं एक कट्टर हिंदू होने के कारण मराठों की सहायता करना चाहता था। मालवा में हर वर्ष शिंदे, होलकर और पवार चैथ और सरदेशमुखी वसूल किया करते थे। परंतु उन्हंे बादशह की ओर से कोई सहायता प्रदान नहीं की गई। 1737 ई. में बाजी राव ने मालवा की सनद प्राप्त करने के लिए उŸार की ओर कूच किया। उसने सवाई जय सिंह के माध्यम से प्रयत्न किए। बादशाह ने बाजी राव को पैगाम भेजा कि वह मालवा की आमदनी में से 13 लाख देने के लिए तैयार है और सनद बाजी राव को दे दी जाएगी। बादशाह ने यह भी कहा कि यदि मराठा राजपूत राजाओं से कर वसूल करेंगे तो दिल्ली दरबार की ओर से उसमें कोई दख़लअंदाजी नहीं की जाएगी। बादशाह ने अपने अधिकारियों के हाथ उपरोक्त शर्तों की सूची और सनदें भी भेजी थीं। लेकिन अपने अधिकारियांे को बादशाह ने यह भी हिदायत दी हुई थी कि यदि मराठा शर्तों को न माने तो सनदंे उनके हवाले न की जाएँ।

यह बात बाजी राव को पता चली तो गुस्से में आकर उसने अपनी मांगे बढ़ा दीं। बाजी राव ने बादशाह से मांग की कि पूरे मालवा की जागीर, धान, मांडु, रसीन और चंबल नदी के दक्खिन का सारा राज, 800 बंगाल के गांवों में चैथ और सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार, 50 लाख रुपये, इलाहाबाद, मथुरा, गया, दक्खिन के 6 प्रांतों की सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार दिया जाए।

बादशाह ने अन्तिम मांग को छोड़कर शेष सभी स्वीकार कर ली थीं। पर इसके साथ ही उसने मराठों की अकड़ भग्न करने के लिए अपनी सेना भी भेज दी। बाजी राव को पहले ही सूचना मिल गई कि वज़ीर खंडो राव और कमर-उद-दीन खां फौज लेकर मथुरा की ओर आ रहे हैं। यह ख़बर प्राप्त करते ही वह तेज़ी से उतर की ओर बढ़ा। उधर दुआब मंे कर वसूल कर रहे मलहार राव होलकर को अयोद्धया के नवाब सआदत खां ने भगा दिया।

बाजी राव उतर से मराठों को एकत्रित करता हुआ दिल्ली पहुँच गया। बाजी राव का इरादा तो शांतिपूर्वक वार्ता करना था। परंतु मुगलों ने मराठों पर धावा बोल दिया। खूब घमासान लड़ाई हुई और मराठे जीत गए।

दूसरी ओर मथुरा की ओर जाते हुए सआदत खां, बंगस और खंडो राव इस युद्ध की सूचना मिलते ही तेज़ी के साथ दिल्ली की ओर मुड़ गए। बाजी राव उनके साथ रास्ते में ही निपटना चाहता था। इसलिए वह दुआब पहुँच गया। बाजी राव ने अपने भाई चिमाजी अप्पा को यह संदेश भेज दिया कि वह निज़ाम-उल-मुल्क को नर्बदा पार करके उतर की ओर न आने दे। परंतु बाजी राव अपने मंसूबे में सफल न हो और उसको दक्खिन की ओर लौटना पड़ा। फिर भी बाजी राव को बादशाह की ओर से 13 लाख रुपये वार्षिक की राशि प्राप्त करने की स्वीकृति मिल गई थी।

बाजी राव के आक्रमण से घबराकर बादशाह ने मराठों को नथ डालने के लिए निज़ाम को दिल्ली बुलाकर मालवा और गुजरात उसके बेटे गाज़ी-उद-दीन के अधीन कर दिए। बादशाह ने गाज़ी से वचन लिया कि वह उन क्षेत्रों में से मराठों को भगा देगा। मुगल बादशाह दिल्ली में बाजी राव द्वारा मचाये गए कोहराम का बदला लेने के लिए तड़प रहा था। उसके द्वारा निज़ाम-उल-मुल्क के साथ दुबारा दोस्ताना संबंध स्थापित करने का उद्देश्य ही मराठों को धूल चटाने का था। बादशाह ने निज़ाम को मुगल फौज का मुख्य सेनापति बना दिया।

निज़ाम-उल-मुल्क मराठों पर चढ़ाई करने चल पड़ा तो राह में और भी अनेक मुगल समर्थक दल उनके साथ जुड़ते चले गए। जब मुगल सेना भोपाल पहुँची तो उनकी संख्या एक लाख के करीब थी। परंतु मुगलों की यह सारी कोशिश व्यर्थ गई क्यांेकि बाजी राव और अप्पा स्वामी पहले ही तैयारी करके मुगलों के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने शाही मुगल फौज को घेरकर उसकी रसद बंद कर दी। निज़ाम को हाथ खड़े करके मराठों के साथ समझौता करना पड़ा।

निज़ाम-उल-मुल्क ने कई राजपूत और बंुदेल राजाओं को अपने अधीन करके अपना रुख मराठों की ओर मोड़ लिया। उसके साथ उसका तोपखाना सिरौंज भी था।

निज़ाम-उल-मुल्क के मंसूबों की भनक पड़ते ही बाजी राव उतर में पहुँच गया। मराठा फौज को देखकर भयभीत हुआ निज़ाम भोपाल में पीछे हटने लग पड़ा। मराठे उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुँच गए। निज़ाम-उल-मुल्क भोपाल के किले में छिप गया। मराठों ने किले को घेरकर उसकी रसद बंद कर दी। विवश होकर निज़ाम-उल-मुल्क ने भोपाल और इस्लाम गढ़ के किले मराठों को सौंप दिए और स्वयं तोपखाने की आड़ में वहाँ से खिसकने लगा। मराठों ने निज़ाम को दबोच लिया। जिसके फलस्वरूप हार मानकर निज़ाम-उल-मुल्क ने बाजी राव के आगे हाथ खड़े कर दिए। संधि की शर्तों के अलावा निज़ाम-उल-मुल्क ने वायदा किया कि वह बादशाह से मराठों को मालवा प्रांत की सनद, निरमाण और चंबल नदियों के मध्य का सारा राज और फौज के खर्च के लिए 50 लाख रुपये दिलवायेगा। (इस अवसर पर 7 जनवरी 1738 ई. को दोरा (सराई) में हुई संधि को इतिहास ‘भोपाल संधि’ के तौर पर जाना जाता है।) मुगलों ने समस्त मालवा, नर्बदा और चंबल के मध्य के क्षेत्र मेें मराठों का राज स्वीकार करके 50 लाख जंगी हर्जाना भरकर मराठों से अपनी जान छुड़ाई।

बाजी राव को मुसलमानों के अतिरिक्त पुर्तगेजि़यों के साथ भी युद्ध करने पड़े। पंद्रहवीं सदी के आरंभ में आए पुर्तगेजि़यों ने तेज़ी के साथ पश्मिमी किनारे से अपना राज्य स्थापित कर लिया था। यह भी मुसलमानों की तरह सफल होने के लिए जनता पर अमानवीय अत्याचार करने से नहीं हिचकते थे। जब बाजी राव को उनके अत्याचारों का पता चला तो उसने सिद्धियों से फुर्सत पाते ही अपने भाई चिमाजी अप्पा को कोकण में लश्कर सहित भेज दिया।

चिमाजी अप्पा ने सालसती दीप, थाना, बेलपुर, बेसवी आदि स्थानों को कब्ज़े में करने के उपरांत शंकराजी केशव और खंडोजी मानकर को कोकण की रक्षा का उतरदायित्व सौंप दिया। स्वयं चिमाजी अप्पा पूणे वापिस लौट गया। चिमाजी के लौटते ही पुर्तगेजि़यों ने पुनः सिर उठाने शुरू कर दिए और लोगों को सताने लग पड़े। बाजी राव ने रामचंद्र हरि पटवर्धन को माही और केलवे जीतने के लिए भेज दिया। यह मंतव्य सफल न हो सका। फिर बाजी राव ने 1738 ई. में शिंदे और होलकर को कोकण भेजा। तब तक पुर्तगेजि़यों को जनरल लिस्बन से सहायता प्राप्त हो गई थी। लेकिन फिर भी पुर्तगेजि़यों को भारी नुकसान मराठों ने पहुँचाया और उनका गोवा का गवर्नर मारा गया।

इधर बसाई से पुर्तगेज़ा का दमन करने के लिए चिमाजी भी कोकण में पहुँच गया। शेष स्थानों पर कब्ज़ा करते हुए फरवरी 1739 ई. को अप्पा ने बसाई को चारों ओर से घेर लिया। तीन महीने की कोशिशों के बाद मराठों ने बसाई पर विजय प्राप्त की।

जिस समय बाजी राव भोपाल में निज़ाम को घेरे खड़ा था, उसी समय नागपुर के भौंसले ने इलाहाबाद में घुसकर दहशत फैला दी थी। तभी रघुजी ने पूर्व में आक्रमण करके कटक को लूट लिया। भौंसले और रघुजी ने मराठों के साथ उक्त दोनों मुहिमों में सफलता पाई थी।

बाजी राव को यह अच्छा न लगा और उसने भौंसले को काबू मंे करने के लिए आवाजी काबड़े को भेजा। असल में इस कार्य को पूरा करने के लिए बाजी राव स्वयं जाना चाहता था, पर ऐन वक्त ईरान के बादशाह नादिरशाह ने दिल्ली पर हमला करके लूटपाट शुरू कर दी थी। बाजी राव हिंदू मुसलमानों को एकत्र करके नादिर शाह के साथ टक्कर लेने की तैयारी कर ही रहा था कि उसको नादिर शाह के ईरान लौट जाने का समाचार मिला।

बाजी राव को मराठा साम्राज्य की सीमाओं को फैलाने और मराठियों की धाक जमाने के लिए उम्र भर कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। लेकिन कभी भी वह बड़ी से बड़ी मुसीबत देखकर घबराया नहीं था। हर युद्ध मंे सबसे आगे कूदकर उसने सदैव अपनी बहादुरी का प्रमाण दिया था। इसलिए सभी मराठे बाजी राव को श्रेष्ठ ‘रणपुरुष’ मानते थे।

एक तरफ मराठों ने सिद्धियों के साथ जिंज़रा में जंग छेड़ रखी थी और दूसरी ओर पश्चिमी घाट पर पुर्तगेजि़यों और अंग्रेजों को भी वह सबक सिखा रहे थे जो कि मराठा राज के लिए नित्य नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे थे। पुर्तगेज़ी व्यापार के बहाने भारत में प्रवेश करके अपना अधिकार जमाने लग पड़े थे। बाजी राव ने कोकण के मनाजी अंगारे के लिए खतरा पैदा कर रहे पुर्तगेजि़यों को अपने नियंत्रण में कर लिया था। इसके शुक्राने के तौर पर पेशवा अंगारे ने 7000 रुपये की सलाना रकम देना स्वीकार कर लिया।

बाजी राव, पुर्तगेजि़यों से सालसती टापू के मसले को लेकर काफ़ी नाराज़ था। बम्बई (अब मुम्बई) के इस हिस्से में मराठा कारखाना लगाना चाहते थे जिसमें पुर्तगेज़ी विघ्न डाल रहे थे। इस मसले से निपटने के लिए बाजी राव के भाई चिमाजी अप्पा ने मार्च 1738 ई. में पुर्तगेजि़यों पर बम्बई के निकट हमला कर दिया। चिमाजी अप्पा ने थाने, परसिक, बेलपुर, धारवी, अरनाला और वर्सोवा आदि इलाकों पर फरवरी 1739 ई. तक पुनः कब्ज़ा करके मई 1739 ई. को इस मुहिम का बेसन(वसाई) को जीतकर अंत कर दिया।

बाजी राव ने दुबारा दिल्ली को घेरने के बारे में सोचकर निज़ाम-उल-मुल्क के क्षेत्र में से गुज़रने की सहायता मांगी तो निज़ाम-उल-मुल्क के पुत्र नासिर जंग ने भोपाल संधि को भुलाकर कोरा जवाब दे दिया। निज़ाम-उल-मुल्क ने संधि की शर्तों को पूरा न किया तो बाजी राव को गुस्सा आ गया और उसने निज़ाम-उल-मुल्क पर हमला करने की तैयारी कर ली। औरंगाबाद में नासिर जंग को घेर लिया। नासिर जंग की फौज बाजी राव की सेना से दो-तीन गुणा अधिक थी। दोनों पक्षों में काफी समय तक डटकर मुकाबला हुआ। आखिर मराठों को हावी होता देखकर नासिर जंग झुक गया। बाजी राव ने उसको 28 फरवरी 1740 ई0 को औरंगाबाद में बंदी बना लिया। बाजी राव से अपनी जान की सलामती के लिए नासिर जंग ने हांडिया, खरगौन, बरगौन जि़ले और नर्बदा के दक्षिणी इलाके बाजी राव के हवाले कर दिए। उसने बाजी राव के साथ दुबारा 1740 ई. में संधि कर ली। संधि के अनुसार दोनों दलों ने अमन, शांति कायम रखने तथा प्रजा को कोई कष्ट न देने का वायदा किया।(दुर्भाग्य से यह बाजी राव का अन्तिम युद्ध था)।

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