मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

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Ankit
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Re: मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

Post by Ankit » 11 Jun 2017 17:37


सोलह कला और सोलह शिंगार

नाना साहिब के विवाह के बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। बाजी राव और मस्तानी कभी कभार कोथरूड़ से ससवाद भी आने लग जाते हैं। रफ्ता रफ्ता मस्तानी बाजी राव के परिवार में फिर से घुलने मिलने लग जाती है। दोनों ननदें और नाना साहिब की पत्नी गोपिका बाई के साथ मस्तानी की बहुत बनने लग जाती है। तीनों ही सहेलियों की भाँति सारा दिन घर और बागों में खेलतीं, हँसी-मजाक करतीं, झूले झूलतीं रहती हैं। इसके अलावा महिलाओं वाले काम जैसे सिलाई, कढ़ाई, खाना पकाना और अन्य घरेलू कामों में भी मस्तानी उनका हाथ बंटाती रहती है। फुर्सत के समय सभी लड़कियों को एकत्र करके मस्तानी गीत गाकर सुनाती है या नृत्य करके उनका मनोरंजन भी कर देती है।


एक दिन गोपिका बाई मस्तानी को नृत्य करते देखकर पूछ लेती है, “ताई साहिबा(बड़ी बहन), आप हर काम जानते हो। जैसे मेंहदी लगाना, शर्बत और शराब बनाना, पगड़ी बांधना, खाना पकाना, सिलाई, कढ़ाई, शस्त्र चलाना, घुड़सवारी और तैराकी वैगरह। आप यूँ सोलह कला सम्पूर्ण कैसे बन गए ?“

मस्तानी आ रही खांसी को रोककर बोलती है, “नहीं, छुटकी बहिन, यह सारे काम तो सब स्त्रियों को आने चाहिएं और बहुत सी स्त्रियाँ जानती भी हैं। इसको सोलह कला सम्पूर्ण नहीं कहते। दरअसल कोई भी इन्सान सोलह कला सम्पूर्ण नहीं हो सकता। क्योंकि यदि सोलह कला सम्पूर्ण हो गया, वह तो भगवान बन जाता है। भगवान राम भी सोलह कला सम्पूर्ण नहीं थे। उनमें भी केवल चैदह कलायें थीं और वह अंश अवतार माने जाते हैं। आखि़री के दो अर्थात पंद्रहवीं और सोलहवीं कला स्वरूपावासतिष्ट भाव सम्पूर्ण ज्ञान और असली रूप छिपाकर भेष बदलना, बहिरूप होना हुआ करती हैं। ये दो भगवान राम ने मातलोक में अवतार धारण करते समय छोड़ दी थीं ताकि रावण को शिवजी द्वारा दिया वरदान कि भगवान उसको मारेगा, पूरा हो सके। भगवान विष्णु ने राम बनकर इन्सानी जामा धारण किया और दो कलायें जानबूझ कर त्यागकर रखी थीं, रावण को मारने के लिए। हाँ, भगवान कृष्ण सोलह कलाओं में सम्पूर्ण थे। वह जीव और ब्रह्म दोनों रूपों में विचरते थे। वह दार्शनिक भी थे, छलिया भी, कपटी, राजनीतिज्ञ, प्रेमी, संगीतकार, योद्धा, चोर, धार्मिक, तपस्वी आदि सब कलायें उनके अंदर थीं। एक आदमी में इतने गुण होना संभव नहीं हैं।“

“वाहिनी साहिबा, ये कलायें क्या होती हैं ?“ भिहू बाई प्रश्न करती है।

“वणसा (ननद), कलायें आध्यात्मिक और रूपक स्तर पर होती हैं। इन्सान के प्रगट होने वाले गुणों को कलायें कहा जाता है। वह कहा करते हैं न कि ‘बारह कला सूरज और सोलह कला चन्द्रमा’। इसका तात्पर्य है कि सूरज की बारह और चन्द्रमा की सोलह कलायें होती हैं। सूरज की बारह कलाओं के नाम हैं - तपनी, तपानी, धरूमा, मारछी, ज्वालिनी, रूची, सूक्ष्मना, भोगदा, विश्वा, बोधनी, धारणी और क्षमा। इस तरह इन कलाओं के दौरान सूरज का प्रताप और प्रकोप बढ़ता घटता रहता है। इसी प्रकार चन्द्रमा के सोलह दिनों में आकर परिवर्तन को सोलह कलाओं का नाम दिया गया है। प्रकाश पक्ष से चन्द्रमा हर रोज़ पन्द्रह दिनों तक थोड़ा थोड़ा बढ़ता रहता है और नित्य नई कला चाँद की हमें देखने को मिलती है। चन्द्रमा सोलहवें दिन जाकर पूरा हो जाता है। उस सम्पूर्ण चन्द्रमा वाले दिन पूर्णमासी होती है। पूर्णमासी के बाद चन्द्रमा फिर नित्य एक एक दजऱ्ा अमावस तक घटता चला जाता है। चन्द्रमा की सोलह कलायें अमृता, मानदा, पुष्पा, पुष्टी, तुष्टी, धृति, शाषनी, राशनी (रति), चंद्रिका, कांति, ज्योतस्ना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्णता और पूर्णामृता हैं। ब्रह्मवैवरत पुराण में ईश्वर के अवतारों के सोलह गुण दजऱ् हैं। वे सोलह कलायें अर्थात सोलह शक्तियाँ हैं - अनन्य माया, प्राणायाम माया, मनोमाया, विज्ञान्य माया, आनन्दय माया, आतिशयानी माया, विपर्यानविमी, संकरामनी, प्रभावी, कुंठीनी, विकासनी, मर्यादनी, सनहालायदीनी, अलादीनी, प्रीपूर्णन्य, स्वरूप अवस्थी।“

अनु बाई अपनी बेसमझी का प्रकटीकरण करती है, “क्यों भटका रहे हो। सरल सा करके बताओ, इनका क्या अर्थ होता है ?“

मस्तानी अपनी ओढ़नी का पल्ला संभाल कर विद्वता झाड़ने लग पड़ती है, “ज्ञान, ध्यान, शुभ कर्म, हठ, संयम, धर्म, दान। वि़द्या, भजन, सुप्रेम, जत, अध्यात्म, सतनाम। दया, नेम और चतुरता, बुध सुध यह जान। सरल भाषा में ज्ञान हासिल करना, ध्यान लगाने के लिए समाधि अवस्था में जाना, शुभ और नेक कर्म करना, आवश्यकता पड़ने पर डट कर खड़े होना अर्थात हठ करना और अपनी जि़द प्रकट करना, मितव्यय और संयम को कायम रखकर जीवन में संतुलन पैदा करना, धर्म के मार्ग पर चलना, दान और पुण्य के कार्य करना, आवश्यक विद्या प्राप्त करना, प्रभु का सिमरन अर्थात तप करना, जीव जन्तुओं से प्रेम करना, जत कायम रखना और पराई स्त्री या पुरुष के साथ संबंध न बनाना, अध्यात्म भावना को जीवित रखना और सच पर पहरा देना। ब्रह्मवैवरत पुराण में दिए कलाओं के क्रम के अनुसार इनमें से पहले पाँच गुण तो मनुष्य में होते हैं और अगले तीन अभ्यास से ग्रहण किए जा सकते हैं। परंतु नौवें गुण प्रभावी को प्राप्त करने वाला मनुष्य ब्रह्म में लीन हो जाता है। समस्त सोलह गुण सम्पूर्ण व्यक्ति फिर इन्सान नहीं रता। बल्कि ईश्वर का अवतार बन जाता है। हमारे शास्त्र बताते हैं कि ब्रह्मा ने इन्सान का शरीर पृथ्वी, आकाश, हवा, आग और पानी - इन पाँच तत्वों से बनाया है और ये पाँच तत्व भगवान शब्द में हैं। जैसे भगवान का ‘भ’ भूमि का सूचक है, ‘ग’ गगन का, ‘व’ वायु का, ‘आ’ यानी अग्नि का और ‘न’ नीर का। सब इन्सान भगवान ने पाँच तत्वों से बनाये हैं। जिस मनुष्य में जितनी अधिक कलायें हों, उसको उतना उŸाम और सर्वोŸाम माना जाता है।“

“हूँ... वाह ! शस्त्र और शास्त्र विद्या तो आपने फिर पहले ही सीख ली थी। आपको यह कहाँ पता था कि आपको पंडितों की बहू बनना है ?“ राधा बाई मंद मंद मुस्कराती है।

“नहीं माता श्री, इतना तो हर चेतन व्यक्ति को धर्म के बारे में ज्ञान होना ही चाहिए। स्व रक्षा के लिए शस्त्र विद्या भी प्रत्येक प्राणी को सीखनी चाहिए।“
गोपिका बाई फिर मस्तानी का ध्यान आकर्षित करने के लिए छेड़ती है, “मस्तानी ताई, शस्त्र विद्या तो चलो स्व रक्षा के लिए आपने सीखी। पर आपने नृत्यकला और गायन क्यों सीखा ? इसकी क्या आवश्यकता थी ? यह तो नर्तकों के काम होते हैं।“

धैर्यवान मस्तानी बड़े प्रेमपूर्वक समझाती है, “नहीं, विदेशी लोगों की कथा के अनुसार एकबार पुरुष और नारी का एक सुंदर सरोवर में मिलन हुआ। दोनों एक दूसरे के करीब आने के लिए तैरते हुए आगे बढ़ने लगे। दोनों ने अनुभव किया कि पानी में हाथ पैर मारने से कुछ मधुर सुर उपज रहे हैं। उन्हें प्रेम तरंगे छिड़ती महसूस हुईं। इसके साथ उन्हें एक आंतरिक प्रेरणा मिली, उनके अंदर एक दूसरे में समा जाने के भाव उत्पन्न हुए। दोनों आपस में घुलमिल गए और उन्होंने जल स्वरों का पूर्ण आनंद प्राप्त किया। इस प्रकार नृत्य परम्परा की नींव पड़ी। औरत मर्द का संभोग करना भी तो एक नृत्य ही है।... हवा के साथ दरख़्तों के पŸाों टहनियों का हिलना भी एक नृत्य ही है। हमारा सांस लेना भी हमारे धड़कते दिल का नृत्य है। बादशाह अकबर कहा करता था कि आदमी का दिल बहलाने के सब काम औरत को आने चाहिएँ। यदि औरत सज संवर कर रहे और पति का नृत्य, गायन के साथ चिŸा लगाये रखे तो उसका मर्द कभी किसी दूसरी औरत की ओर आकर्षित नहीं होता है।“

गोपिका बाई अपने और नाना साहिब के ताज़ा अनमने और डावांडोल संबंधों के बारे में सोचती हुई बोलती है, “अच्छा ? यह बात है तो आप मुझे सोलह शिंगार करना और नृत्य गायन अवश्य सिखाओ।“

“क्यों ? क्या नाना साहिब को तुम्हारा नाट्यशाला जाना अच्छा नहीं लगता ?“ मस्तानी गोपिका बाई की दुखती रंग पर हाथ रख देती है।

गोपिका बाई गंभीर और उदास हो जाती है। मस्तानी उसके बिना कुछ कहे ही सब कुछ गोपिका के चेहरे पर से पढ़ लेती है, “ठीक है, मैं तुम्हें पहनने, सजने की ढंग, रूप सज्जा, वेशभूषा का सलीका, नृत्य और गायन कला सिखाऊँगी। स्त्री को सदा संतनी ही नहीं बने रहना चाहिए और काम भावनाओं में ग्रस्त होकर अपने नायक पति के पास खुद चली जाना चाहिए। उसको क्रीड़ा के लिए उकसाना चाहिए। गोपिका जब तुम इन कलाओं में निपुण हो गई, देखना तेरे नवरे (पति) की क्या मजाल है कि वह कंचनियों, नायिकाओं, गणिकाओं और अभिनेत्रियों के पास चला जाए।“

“सच ?“ गोपिका बाई की आँखों में एकदम चमक उभर आती है।

“पढ़े लिखे को फारसी क्या और हाथ कंगन को आरसी क्या ! खुद ही अनुभव करके देख लेना। यदि मेरा कहा गलत हुआ तो मुझे मस्तानी न कहना। गोपिका बहिन, मैं तुझे सोलह शिंगार करने सिखाऊँगी। देख, सोलह शिंगार रूप को सजाने के लिए किए जाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं। पहली प्रकार के शिंगार प्राकृतिक होते हैं जिनके साथ प्रभु ने हर स्त्री को स्वयं शिंगारित किया है। जैसे कहा करते हैं न कि ‘त्रै काले, दो उजले, पतले पंज प्रकार। चार पुष्ट, दो कठन हैं, ये सोलह शिंगार।’ सिर के केश, आँखों की पलकें और स्तनों के चूचक, इन्हें त्रैकाल कहा जाता है। दो उजले नाखून और दंत। पाँच पतले का अर्थ है - होंठ, नाक, गर्दन, कमर और उंगलियाँ। चार पुष्ट से भाव है - दो बांहांे की भुजाएँ और दो टांगों की जांघें। दो कठन योनि के दोनों अधर है या योनि और नितम्ब। पर कुछ ग्रंथों में दो कठन छाती पर स्तनों की स्थिति को माना गया है। इसके बिना शेष सोलह शिंगार बनावटी होते हैं, जो हर स्त्री अपने प्रिय पुरुष को भरमाने के लिए कर सकती है। इनसे दूसरी किस्म के शिंगारों के साथ शरीर के सोलह अंगों को सुंदर बनाने का यत्न किया जाता है। अर्थात शरीर पर वटना मलना, स्वच्छ जल में स्नान करना, सुंदर वस्त्र धारण करना, मांग में सिंदूर भरना, बालों को संवारना, माथे पर बिंदी लगाना, मुँह पर तिल का निशान बनाना, शरीर पर सुगंधित पदार्थ लगाना, पान खाना, गले में हार पहनना, महावर रचाना और केशों में फूल टांकना। ये पुरुष को रिझाने के लिए स्त्री के लिए करने आवश्यक समझे जाते हैं। ये शिंगार शरीर की शोभा बढ़ाते हैं। रसिक प्रिया में लिखा है, ‘प्रथम सकल सुचि मजन अमलवास। जावक सुदेस केस पाश को सुधारबो। अमगरास भूषण विविध मुखवास रंग। कजल कलित लोल लोचन निहारबो। बोलन हसन मृदलोचन चितौन चार। पल पल पतिव्रत प्रीति प्रतिपारबो। केशोदास सविलास करहो कुवरि राधे। इह विधि सोरहि शिंगारन सिंगारबो।“

“आपको क्या लगता है कि यदि मैं भी ये सोलह शिंगार करूँ तो यह (नाना साहिब) बाहर मुँह मारने से हट जाएँगे ?“ गोपिका बाई शंका निवृति के लिए पूछती है।

“लो, और नहीं तो क्या ? उसका तो बाप भी हट जाएगा।“ मस्तानी गोपिका बाई की जांघ पर हाथ रखकर उसको आँख मारती हुई हँस पड़ती है।

“यह बात है तो मुझे अभी से नृत्य सिखाना प्रारंभ कर दो ताकि मैं भी आपकी तरह अपने नवरे (पति) को अपनी उंगलियों पर नचा सकूँ और वह ज़ोरू का गुलाम बनकर रह जाए।“

मस्तानी बड़े प्रेमपूर्वक समझाती है, “इतना सरल काम नहीं है यह। नृत्य के लिए अभ्यास की अत्यंत आवश्यकता है और जीवन को समर्पित करना पड़ता है। मेरे उस्तादों ने छडि़याँ मार मारकर मुझे सिखाया था और घंटों मैं पताशों पर नाचा करती थी। जब तक सारे पताशे चूर चूर नहीं हो जाते थे, मैं हटती नहीं थी। यूँ ही तो नहीं लोग मेरी मोरों जैसी चाल देखकर कहते हैं कि मस्तानी पताशे चूरा करती जाती है।“

“मुझे भी फिर चाल से पताशे चूरा करना सिखाओ ताई साहिबा।“

“हाँ हाँ! पताशे क्या, मैं तो ठरक पीसना भी सिखा दूँगी। मैं तुझे ठोकपीट कर हर कला में निपुण बना दूँगी। संस्कृत में रचे ऋषि वात्सयान और कोका पंडित के कोक शास्त्र का ज्ञान भी तुझे दूँगी। काम सुख एक अद्भुत आनंद का अनुभव है, जिसमें शरीर की पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ (त्वचा, कान, आँख, जीभ और नाक) एकसुर हो जाती हैं। संभोग तन और मन की तृप्ति का सबसे बड़ा साधन है। संभोग सुख को दुगना करने की विधि भी तुझे सिखाऊँगी। कैसे नाखूनों से नोच-खरोंच प्रेम करते समय की जाती है। दाँतों से हल्के हल्के काटना(Love bites)... अश्लील वार्तालाप( Lusty conversation)... कामुक सिसकियाँ(Moaning & Groaning)...हस्तमैथुन(Masturbation)... हवशमयी होकर चाटना और नोंचना(Snoging, Licking, Kissing, Biting)...मौखिक काम (Oral Sex ), विलाशी स्पर्श(Tender Touch)... बाहों और टांगों में जकड़ना... आदि के सारे गुर तुझे दूँगी। औरत और मर्द भगवान द्वारा बनाई गई वो श्रेष्ठ कला रचना है जो जब आलिंगनबद्ध होकर एक दूसरे में समा जाते हैं तो यह मूर्ति सम्पूर्ण होती है। स्त्री और पुरुष की देहों की बनावट और काम अंगों की रचना प्रभु ने की ही इसीलिए हैं। इसलिए लज्जा और संकोच त्याग कर संभोग का मदहोश होकर जी भरकर आनंद लेना चाहिए। नाना साहिब के ऊपर लेटकर कभी क्रीड़ा की है ?“

“नहीं। कभी नहीं। मुझे तो बहुत अधिक लज्जा आती है। मैं तो चेहरे पर ओढ़नी लेकर आँखें मींचकर पड़ी रहती हूँ।“

“बस, यही तो तू गलती कर जाती है। पागल लड़की, जब नाचने लग पड़े, फिर घूँघट कैसा। अपितु निसंगता से साथ दे अपने पति के संभोग में।“

“ऊँ...! मैं नहीं, मुझे तो लज्जा आती है।“

“जिसने की शरम, उसके फूटे करम।“

उस दिन से गोपिका, मस्तानी से नृत्य और गायकी की शिक्षा लेने लग जाती है और इस प्रकार उनके मध्य बहुत अधिक निकटता और सखीपना उत्पन्न हो जाता है। उनके बीच गुरू और शिष्या का रिश्ता बन जाता है।

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Re: मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

Post by Ankit » 11 Jun 2017 17:38


अंगूठी

मस्तानी आए दिन नये वस्त्र, नये गहने पहने होती है। हर बार जब वह ससवाद आती तो सिर से पैरों तक का हार-शिंगार और वस्त्र उसके सदैव बदले हुए होते हैं। यदि कुछ नहीं बदलता तो मस्तानी के बायें हाथ की तर्जनी में पहनी हीरे की अंगूठी कभी नहीं बदलती। हर बार वही अंगूठी देखकर एक दिन मस्तानी की ननद भिहू बाई पूछ लेती है, “वाहिनी साहिबा (भाभी), आपके बाकी तो सब जेवर नित्य बदले हुए होते हैं परंतु आप कभी यह अंगूठी नहीं उतारते।“


“नहीं, वनसा(ननद)। कभी नहीं।“ मस्तानी मुस्कराकर उतार देती है।
अनू बाई भी उत्सुक हो जाती है, “स्नान करते समय या रात को सोते समय भी नहीं ?“

“नहीं, कभी भी नहीं।“ मस्तानी इन्कार में सिर हिलाती है।

गोपिका बाई की भी अंगूठी में दिलचस्पी जाग्रत हो जाती है, “ऐसी क्या विशेषता है इस अंगूठी में ?“

“इसमें तो मेरी जान बसी हुई है और यह हमारी बुंदेलों की इज्ज़त आबरू की रक्षक है। एकबार पहनने के बाद बुंदेलों की लड़कियों की उंगली में से अंगूठी जीते जी नहीं उतरती। बस, उनकी मृत्यु के बाद ही उतारी जाती है।“ मस्तानी गंभीर हो जाती है।

“हमें भी तो कुछ बताइये न, इस अंगूठी का रहस्य ?“ दूर बैठी उनकी बातें सुन रही काशी बाई वार्तालाप में अपनी टांग अड़ाती है।

मस्तानी खंखारते हुए इतिहास की कहानी शुरू कर देती है, “बुंदेलखंड वतन के वासी हम बुंदेल अपनी आन, बान और शान के लिए अपने रक्त की एक एक बूँद बहा देते हैं। हम मित्रों के लिए खून देना भी जानते हैं और शत्रु का खून लेना भी हमें आता है। लहू की अन्तिम बूँद देने और लेने की खासियत के कारण हमें बुंदेल कहा जाता है। अर्थात् रक्त की बूँदें बहाने यानी लेने देने का, रक्त के कतरों का व्यापार करने वाले लोगों की जाति। हम तो अपनी कुल देवी विद्यावासिनी को भी रक्त की बूँदें ही भेंट में चढ़ाते हैं। हमें तो गुढ़ती भी नंगी तलवार पर रक्त की बूँदें लगाकर दी जाती है। मेरी दादीसा यानी काकाजू महाराजा छत्रसाल जी की धर्म माता जी सारंधा(महाराजा छत्रसाल की सौतेली माँ) रानी बड़ी बहादुर और दिलेर स्त्री थी। हमारा कुल अयोध्या के राजा भगवान राम चंदर के बेटे कुश से चलता है। दादीसा मेरे दादासा राजा चंपत राय की सबसे प्यारी रानी अर्थात् पटरानी थी। दादीसा का एक भाई था अनरुद्ध सिंह, वह अपनी पत्नी शीतला देवी को बहुत प्रेम करता था। एक बार तुर्कों के साथ युद्ध में पराजित होकर वह अपनी जान बचाकर रणक्षेत्र से भाग आया। घर आए अनिरुद्ध को सारंधा ने तलवार म्यान में से खींच कर उसको ललकारा कि या तो विजयी होकर आता, नहीं तो शहीद हो जाता। कायरों की तरह रणभूमि में पीठ दिखाकर आने के लिए अपने भाई को दादीसा ने लाहनतें दीं और कहा कि वह खुद उसको मौत की सज़ा देगी। अनिरुद्ध सिंह का स्वाभिमान जाग उठा और वह उन्हीं पैरों से वापस लौट गया और छह महीने पश्चात जंग जीतकर घर लौटा। दादीसा के साथ बाद में सीतला देवी, उनकी भाभीसा बहुत लड़ी और ताना मारती हुई बोली कि जान से जीत अधिक प्यारी थी तो जब तुम्हारा विवाह हुआ था, तब अपने पति को भेज कर देखती। मेरे पति को क्यों भेजा ? दादीसा ने कहा, “अगर ऐसी स्थिति आ गई तो पति क्या, वह अपने पुत्र के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करेंगी।“

“वाह ताई साहिबा ! बड़े जिगर वाली थी आपकी आजी (दादी) फिर तो।“ गोपिका बाई प्रभावित हो जाती है।

मस्तानी को भी अपनी दादी की वीर गाथा सुनाने में आनन्द आने लग पड़ता है। काशी बाई पर प्रभाव डालने के उद्देश्य से वह स्वयं ही आगे का किस्सा बयान करने लग जाती है, “दादासा अपनी पाँच रानियों में से सब से अधिक प्रेम सारंधा दादीसा को करते थे। दादासा की बहादुरी के विषय में सुनकर दिल्ली दरबार से शहजादा दारा शिकोह ने दादासा को नौ लाख की काल्पी (Kalpi is a city and a municipal board in Jalaun district in the Indian State of Uttar Pradesh. It is on the right bank of the Yamuna) की जागीर और मंत्री पद की पेशकश कर दी। दादासा बुंदेलखंड की राजगद्दी अपने भाई पहाड़ सिंह को सौंप कर दिल्ली दरबार में चल गए। दादासा अपनी बहादुरी से आए दिन ईनाम और जागीरें बादशाह से प्राप्त करते चले गए। परंतु दादीसा का मन प्रसन्न नहीं होता था। वह एक दिन दादासा से बोलीं कि कहाँ हम ओरशा के राजा थे और कहाँ आप बादशाह के हुक्म बजाने वाले गुलाम बन गए हैं ? यह सुनकर दादासा ने सब कुछ त्याग दिया। वह वापस ओरशा आ गए।“

राधा बाई बीच में टोक देती है, “और फिर अपके आजोबा(दादा) ने अपना राज वापस ले लया था ?“

“हाँ ! उन्होंने अपने भाई पहाड़ सिंह को तो अस्थायी तौर पर ही राजा बनाया था। उसको दादासा ने दूसरी रियासत देकर वहाँ का राजा बना दिया। पर समय बड़ा बलवान होता है। राजाओं से भीख मंगवा देता है और रंक को राजा बना देता है।“ मस्तानी का स्वर गमगीन हो जाता है।

सभी स्त्रियाँ एकदम कान खड़े कर लेती हैं और उनके मुँह से एकसाथ निकल जाता है, “फिर क्या हुआ ?“

मस्तानी गहरा निश्वास लेते हुए कहती है, “दिल्ली का बादशाह शाहजहां बीमार होकर बिस्तर पर पड़ गया। उसके पुत्रों में राजगद्दी के लिए जंग छिड़ गई। शहजादा मुराद और शहजादा मुहीद-उद-दीन ने बागी होकर दक्खिन से दारा शिकोह के विरुद्ध आक्रमण करने के लिए दादासा चंपत राय से मदद मांगी। दादासा ने दारा शिकोह के साथ पुराने संबंध होने के कारण इन्कार कर दिया। लेकिन दादीसा ने उन्हें यह कहकर मना लिया कि दर पर आए सवाली को खाली हाथ नहीं लौटाया करते। दादासा रज़ामंद हो गए और दारा शिकोह की फौजों के साथ हुई भयानक जंग में दादीसा खुद भी लड़ी थीं। एक जगह युद्धभूमि में दादीसा की मुठभेड़ विरोधी सेना के सिपहसालार वली बहादुर खान के साथ हो गई। दादीसा ने वली बहादुर खान को बुरी तरह घायल कर दिया। वह घोड़े पर से नीचे गिर पड़ा। दादीसा को उसका अरबी घोड़ा पसंद आ गया और दादीसा ने सिपाहियों को उस घोड़े को कब्ज़े में लेने का आदेश दे दिया। युद्ध की विजय के उपरांत शहजादा मुहीद-उद-दीन तख़्त पर बैठकर आलमगीर औरंगजेब बन गया। दारा शिकोह का सिपहसलार वली बहादुर खान कपटी था। वह औरंगजेब की शरण में जाकर उसका वफ़ादार बन गया। बादशाह औरंगजेब ने उसको क्षमा करके अपनी सेवा के लिए रख लिया। उसने वली बहादुर को उच्च पद और जागीरें प्रदान कीं। दादासा चंपत राय को आलमगीर ने ओरशा से बनारस और बनारस से यमुना नदी तक के इलाके दिए और बारह हज़ार घुड़सवार फौज का मनसब बना दिया। बारह हज़ारी मनसब बनने के पश्चात एकबार फिर दादासा बादशाह और दिल्ली दरबार के अधीन हो गए।“ यह बताते हुए मस्तानी खामोश हो कर ख़यालों की बाढ़ में बह जाती है।

शांत हो गई मस्तानी को गोपिका बाई कुरेद कर पूछती है, “फिर वे दुबारा राजा कैसे बने ?“

मस्तानी सभी के चेहरों की ओर गौर से निहारती है, “दादीसा रानी सारंधा जैसी स्त्री से हार जाने के कारण वली बहादुर दादासा के साथ खुंदक रखने लग पड़ा। सीधा पंगा तो वह नहीं ले सकता था पर आए दिन कोई न कोई इल्लत अवश्य करता रहता। काकाजू महाराज छत्रसाल उस समय अभी बाल्यावस्था में ही थे। एकबार काकाजू वली बहादुर खान के घोड़े पर सवार होकर जा रहे थे। वली बहादुर ने देखकर काकाजू से वह घोड़ा छीन लिया। जब दादीसा रानी सारंधा को पता चला तो वह काकाजू पर बहुत गुस्सा हुईं और कहने लगी कि घोड़े के छिन जाने का दुख नहीं है, पर तुम मुँह लटकाकर खाली हाथ घर लौटने की अपेक्षा वली बहादुर को सबक सिखाकर आते तो वह दुबारा कभी बुंदेलों की किसी वस्तु पर आँख नहीं रख सकता था। दादीसा ने झिड़का कि क्या तुम्हारी रगों में बुंदेलों का खून नहीं दौड़ता ? काकाजू महाराज छत्रसाल उस समय बहुत छोटे थे। दादीसा उसी समय बीस-पच्चीस घुड़सवारों के साथ गए और उन्होंने वली बहादुर को आलमगीर औरंगजेब के दरबार में जा ललकारा। दादीसा ने व्यंग्य करते हुए कहा, “वाह रे खान, चम्बल की घाटी में खाई मार भूल गया जो तूने दुबारा बुंदेलों से पंगा ले लिया? तुझे शर्म नहीं आई, एक बच्चे से घोड़ा छीनते हुए ?“ वली बहादुर खान के हिमायती उठ खड़े हुए। दोनों पक्षों के बीच तलवारें चलने लग पड़ीं। औरंगजेब को पता चला। वह दादीसा से बोला, “आपने इससे घोड़ा छीना था। इसने आपसे छीन लिया है। हिसाब बराबर।“ इस पर दादीसा बोली, “नहीं, हिसाब बराबर नहीं। जंग का उसूल है, हारने वाले के माल-असबाब को विजयी द्वारा अपने कब्जे़ में लेना। पर वली बहादुर ने बच्चे से घोड़ा छीनकर चोरी-डकैती की है। हम अपना घोड़ा हर कीमत पर वापस लेंगे।“ आलमगीर औरंगजेब ने वली बहादुर से पूछा कि क्या करना है ? वह बोला, “ये कोई दूसरा जो चाहे घोड़ा ले लें। यह घोड़ा मुझे प्यारा है, मैं इसे नहीं दूँगा।“

इस पर दादीसा बोलीं, “घोड़ा तो हमें भी प्यारा है और हमें यही लेना है। दूसरा घोड़ा लेकर हम क्या करेंगे ? हमारे पास क्या घोड़े नहीं हैं ?“

वली बहादुर बोला, “ मैं यह घोड़ा नहीं दे सकता। बेशक घोड़े के वजन के बराबर सोने की मोहरे तौलकर मुझसे ले लें।“ उधर हमारी दादीसा हठ पर थीं कि हमें हर हालत में यही घोड़ा चाहिए। आप जो चाहे कीमत ले लो। आलमगीर ने दादीसा से पूछा कि आप क्या कीमत दे सकते हैं ? दादीसा झट बोलीं कि तमाम जागीरें और मनसबी इस घोड़े पर कुरबान करते हैं। बादशाह औरंगजेब पूछने लगा कि आप एक घोड़े के पीछे ओहदे और जागीरें तक छोड़ने को तैयार हो ? दादीसा ने बताया कि घोड़े के लिए नहीं, स्वाभिमान और इज्ज़त से सिर ऊँचा करके जीने के लिए हम हर बलिदान देने के लिए तैयार हैं। दादासा की मनसबी और जागीरें लेकर बादशाह ने घोड़ा दे दिया। दादासा और दादीसा ओरशा लौट आए।“

“फिर तो बड़ी बददिमाग थी आपकी दादी। एक घोड़े के बदले जागीरें और रुतबे ठुकराकर घाटे वाला सौदा कमाया उसने !“ काशी नाक चढ़ाती है।

मस्तानी काशी बाई की ओर कड़ी नज़र से देखती है, “घाटे का नहीं, मुनाफे का। इज्ज़त मान धन से नहीं खरीदे जाते। इन्सान के पास स्वाभिमान ही न रहा तो पीछे क्या बचा फिर ?“

“वाहिनी साहिबा, आगे क्या हुआ यह बताओ न ?“ भिहू बाई मस्तानी की साड़ी का पल्लू खींचती है।

“औरंगजेब की वली बहादुर खान अक्सर चापलूसी करता रहता था और बुंदेलखंड पर कब्ज़ा करने के लिए उकसाता रहता था। औरंगजेब ने अपनी सेना भेजकर दादासा पर चढ़ाई कर दी। पूरे तीन साल युद्ध होते रहे। कई लड़ाइयाँ दादासा जीतते रहे और कई हारते रहे। एकबार ओरशा के किले का घेरा लम्बा हो गया और दादासा की तबीयत बहुत खराब हो गई। वह चिंतित हो गए कि शत्रु से लड़ने के योग्य नहीं रहे और हार कर बंदी बनना उन्हें स्वीकार नहीं था। दादासा को वज़ीरों ने चोर दरवाजे से किला छोड़कर भाग जाने का परामर्श दिया। दादासा मान गए, पर दादीसा रानी सारंधा अड़ गईं। दादासा कहने लगे- जीवत रहेंगे तो लड़ सकेंगे, नहीं मारे जाएँगे। दादीसा बोली - कायरता के साथ जीने से बहादुरी के साथ मरना लाख गुना बेहतर है। दादासा की हालत बीमारी के कारण बहुत बिगड़ गई। लड़ना तो दूर की बात रही, वह अपने आप बिस्तर पर से उठने योग्य भी न रहे। उन्होंने दादीसा से विनती की कि वह उन्हें मार दें ताकि वह शत्रु के हाथों अपमानित होकर मरने की अपेक्षा इज्ज़त की मौत मर सकें। दादीसा ने तलवार से दादासा का गला काटकर और अपनी अंगूठी का हीरा चाटकर उसी समय दादासा के साथ आत्महत्या करके मौत को गले लगा लिया। उन्हें मरना स्वीकार था, पर इज्ज़त-आबरू पर दाग लगना बर्दाश्त नहीं था।“ मस्तानी गर्व से सिर ऊँचा कर लेती है।

“अच्छा तो मस्तानी तेरी अंगूठी का हीरा चाटने से भी मृत्यु हो सकती है ?“ राधा बाई समीप बैठी बोल उठती है।

मस्तानी अंगूठी को सहलाने लग जाती है, “हाँ, माताश्री। इसलिए काकाजू ने मुझे यह उपहार में दी थी। जब मैं अल्हड़ लड़की से नवयौवना होकर स्त्री बनी थी तो मेरे काकाजू, महाराजा छत्रसाल ने मुझसे कहा था कि पुत्री, तू जवान हो गई है। कई बार सुन्दरता का वरदान इन्सान का सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। काकाजू ने यह अंगूठी देते हुए कहा था कि मर जाना, पर कभी इज्ज़त को दाग न लगने देना। यह अंगूठी तेरी रक्षा करेगी।“

“अंगूठी कैसे आपकी रक्षा करेगी ?“ गोपिका बाई भोले पन में प्रश्न कर देती है।

मस्तानी अंगूठे के नाखून की मदद से अंगूठी के हीरे को ऊपर उठाकर खोलते हुए उस में पड़ा सफेद रंग का बुरादा दिखलाती है, “यह देखो, यह विष है। देखने में यह ज़रा-सा लगता है, पर किसी शत्रु की जान लेने या खुद के मरने के लिए पर्याप्त है।“

“क्या ?“ सब स्त्रियों की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं। मस्तानी अंगूठी के हीरे को पुनः बंद कर लेती है।

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Re: मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

Post by Ankit » 11 Jun 2017 17:39


झड़प


मस्तानी को बाजी राव के जीवन में आए दो वर्ष का समय बीत चुका होता है। 1730 ई. के मध्य में बाजी राव अहमदाबाद की जंग में उलझा होने के कारण मुगलों के साथ भिड़ने के लिए चला जाता है और पीछे मस्तानी अकेली रह जाती है। दिन रात वह बाजी राव की यादों में खोई रहती है।


चिमाजी अप्पा प्रायः मस्तानी से मिलने के लिए कोथरूड़ आता रहता है और उसकी आवश्यकता की वस्तुएँ देकर चला जाया करता है। लेकिन एक दिन चिमाजी अप्पा मस्तानी से मिलने जाता है तो रात में वहीं ठहर जाता है।

चिमाजी अप्पा उस दिन बहुत उदास होता है और दोपहर से ही निरंतर शराब पीने के कारण शाम तक बहुत अधिक शराबी हो जाता है। शराब पीते पीते चिमाजी अप्पा अचानक ज़ोर ज़ोर से रोने लग पड़ता है। मस्तानी उसका रुदन सुनकर उसके पास जाती है। अतिथिगृह के द्वार में प्रवेश करते ही मस्तानी देखती है कि चिमाजी अप्पा हाथ में जाम लिए गलीचे पर लेटा पड़ा होता है। मस्तानी ने ऐसी अवस्था मेें चिमाजी अप्पा को पहले कभी नहीं देखा होता।

मस्तानी, चिमाजी अप्पा को उठाकर बिठाती है, “देवरसा, यह आज आपको क्या हो गया है ?“

चिमाजी अप्पा मस्तक पर बल डालकर बड़ी कठिनाई से आँखें खोलता है, “वाहिनी सा...हि...बा ! मुझे रोको नहीं। मैं आज मदिरा पी पीकर मर जाऊँगा।“

“क्यों मरना है ? यह कैसी बातें कर रहे हैं आप ?“ मस्तानी, चिमाजी अप्पा के करीब ही गलीचे पर बैठ जाती है।

चिमाजी अप्पा की शराब उतरने लग जाती है।

“मैं ठीक कह रहा हूँ। यह भी कोई जि़न्दगी है। स्त्री के बिना पुरुष का क्या हाल होता है ? यह मैं ही जानता हूँ। आज आपकी देवरानी रकमा बाई की बहुत याद आ रही है। रकमा को मरे दो महीने हो चले हैं(उसकी मृत्यु अगस्त 1730 ई. में हुई थी)। महीने भर के सदाशिव राव (चिमाजी अप्पा और उसकी पत्नी रकमा बाई का पुत्र) को मेरे पास छोड़कर वह भगवान के पास चली गई। मैं बहुत अकेला रह गया हूँ...।“

“ईश्वर की करनी को कौन टाल सकता है ? मुझे आपके साथ पूरी सहानुभूति है। आप दूसरा विवाह कर लें।“ मस्तानी अप्पा को दिलासा देती है।

“आई तो बहुत कह रही है कि मैं अनपूर्णा बाई से विवाह करवा लूँ, पर...।“
“पर क्या ?“

“ले, वो बच्ची सी मेरी क्या ज़रूरतें पूरी करेगी ? मुझे तो कोई दूसरी खेली खाई नखरैली औरत चाहिए।“ चिमाजी अप्पा मस्तानी के चेहरे पर अपनी दृष्टि गड़ा लेता है।

मस्तानी अपनी नज़रें झुका लेती है, “दूसरी कौन ? कौन सी औरत ?“

“वही जो मुर्गाबी की तरह चलती है...जिसकी सुराही जैसी बिलांद भर लम्बी गर्दन है...जो मोरांे की तरह ठुमक ठुमक कर नृत्य करती है... कोयल की तरह सुरीला गाती है... लौटे जैसी जिसकी कमर है...जंगी हाथी की भाँति हमेशा झूल झूलकर मस्त चाल से चलती है...बस, वही मृगनैनी चाहिए हमें तो चिŸा बहलाने के लिए...।“ चिमाजी अप्पा मस्तानी के समीप खिसक जाता है।

मस्तानी, चिमाजी अप्पा की बदनीयत भाँपकर दूर खिसक जाती है, “यह क्...क्या कह रहे हो ? किसकी बात करते हैं अ...आप ?“

“अभी भी नहीं समझी। मस्तानी, मैं तेरी बात करता हूँ। कंजरी, तू दिन रात आँखों में रड़कती है।“ चिमाजी अप्पा झपटकर मस्तानी को बांह से पकड़कर खींचता है और अपने आलिंगन में लेकर चूमने लग पड़ता है।

“नही...। मुझे छोड़ दो।“ मस्तानी उसकी पकड़ से छूटने के लिए ज़ोर लगाती है।

परंतु अप्पा उसको अपनी बाहों में और अधिक कसकर भींचते हुए फर्श पर गिरा लेता है और उसके ऊपर चढ़ जाता है, “तवायफ़ ! तवायफ़ों की तरह पेश आ। अधिक शरीफ़जादी बनने कोशिश न कर। तेरे ये नखरे मेरे सामने नहीं चलने वाले।“

चिमाजी अप्पा की पकड़ में से आज़ाद होने का संघर्ष करती मस्तानी अपनी कमर में बंधा छुरा निकालकर चिमाजी की छाती पर वार कर देती है और उसको धक्का देकर दूर फेंकती हुई उठ खड़ी होती है, “अप्पा, अपनी औकात में रह। मुझे कमज़ोर स्त्री न समझना। मस्तानी हूँ मैं, मस्तानी। बुंदेलखंड की राजपूतनी। फाड़कर रख दूँगी।“

चिमाजी अप्पा द्वारा मोटे वस्त्र पहने होने के कारण छाती पर छुरे से मामूली सा चीरा आता है। चिमाजी अपने ज़ख़्म को स्पर्श करते हुए छुरा लिए खड़ी मस्तानी की ओर देखता हुआ उठने का यत्न करता है, “मुझे भी निजाम न समझना। मराठा हूँ, मराठा ! मस्तानी, देखना मराठे ही करेंगे तेरे दांत खट्टे। दो कौड़ी की वेश्या और ये तेवर ? देख लूँगा तुझ बड़ी वेश्या को... अभी बनाता हूँ तुझे बंदी, कंजरी कहीं की।“

चिमाजी अप्पा तीव्र गति से मस्तानी पर झपट पड़ता है। मस्तानी, चिमाजी अप्पा के हाथ आने से पहले ही भागकर दीवार पर ढाल से टंगी तलवार खींच लेती है, “अप्पा, पहली और आखिरी बार कह रही हूँ। मेरी ओर दुबारा आँखें उठाकर भी देखा तो आँखें निकाल लूँगी और तेरा वो हश्र करूँगी जो वारंगल की रानी तेलंगाना ने उसकी अस्मत को हाथ डालने वाले नवाब का किया था। तेरी भलाई इसी में है कि तू चुपचाप यहाँ से चला जा और दुबारा मेरी नज़रों के सामने न आना, नहीं तो मैं बहुत बुरा करूँगी।“

मस्तानी चंडी का रूप धारण किए खड़ी होती है। चिमाजी अप्पा अवसर की नज़ाकत को समझ जाता है और लज्जित सा होकर वहाँ से चला जाता है।

मस्तानी, बाजी राव से अप्पा के साथ हुई इस झड़प के विषय में कोई बात नहीं करती। लेकिन इस घटना के बाद मस्तानी हर समय बाजी राव के अंग-संग रहने का निश्चय कर लेती है और युद्धों के दौरान भी बाजी राव के संग ही जाने का मन बना लेती है।

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Re: मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

Post by Ankit » 11 Jun 2017 17:40

हैदराबाद और निज़ाम-उल-मुलक
हैदराबाद के इर्द गिर्द वाले क्षेत्र में गोलकुंडा (Shephered’s Hill) पर 624 ई. से 1075 ई. तक चालुक्या वंशियों ने राज किया था। 1158 ईसवी के बाद कल्याण के चालुक्या का साम्राज्य टूटकर बिखर गया। उनके एक भाग में से वारंगल के काकतिया शासक हुए थे। दूसरे भाग में से द्वारसमुंदर के होएसल, तीसरे देवगिरी के यादव। फिर 1190 ई. से 1310 ई0 तक काकतिया वंश, वारांगल (वर्तमान हैदराबाद, आंध्र प्रदेश से 148 किलोमीटर उŸार-पूर्व की ओर) से सिंहासन पर बैठकर राज करते रहे। काकतिया को अपना राज्य कायम रखने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था।


प्रोलराज दातिया के समय काकतियों की प्रसिद्धि बहुत बढ़ी। प्रोलराज दातिया के पोते गणपति ने साम्राज्य का कांची तक विस्तार किया। गणपति की पुत्री रुद्रमा ने अपनी विलक्षण शासननीति से उल्लेखनीय इतिहास रचा। प्रताप रुद्रदेव (प्रथम), दातिया और काकतिया राजाओं की दिल्ली के सुल्तानों के साथ ठनाठनी होती रही थी। हमला करने के लिए अल्ला-उद-दीन खिलजी द्वारा भेजी सेना को प्रताप रुद्रदेव (प्रथम) के हाथों 1303 ई. में पराजित होकर वापस लौटना पड़ा था। चार वर्ष बाद यादवों की पराजय से उत्साहित होकर मुसलमान हुक्मरान फिर काकतिया नरेश पर हमला बोलने आ गए। दिल्ली का सुल्तान वारंगल से धन-दौलत लूटना और कर के रूप में निरंतर आमदनी चाहता था। सुल्तान ने अपने सेनापति मलिक काफूर को फौज देकर प्रताप रुद्रदेव(प्रथम) को अपने अधीन करने के लिए भेजा। प्रताप रुद्रदेव(प्रथम) ने वारंगल के किले में से डटकर मुकाबला किया। सफल घेरा डालकर मलिक काफूर ने 1310 ई. में काकतिया नरेश को संधि के लिए विवश कर दिया। संधि में काकतिया नरेश ने मलिक काफूर को 100 हाथी, 7000 घोड़े, असंख्या हीरे-जवाहरात, रत्न और ढाले हुए सिक्के दिए। इसके अतिरिक्त राजा ने दिल्ली के सुल्तान को वार्षिक कर देना भी स्वीकार कर लिया।

1310 ई. से 1321 ई. तक खिलजी वंश ने गोलकुंडा और वारंगल पर शासन किया। गोलकुंडा की कोयला खानों में से इसी समय अल्लाउद्दीन खिलजी कोहेनूर हीरा लूटकर दिल्ली ले गया। अल्लाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के पश्चात अराजकता फैल गई और प्रताप रुद्रदेव(प्रथम) दातिया ने कर देना बंद करके अपने राज्य की सीमाओं को फैलाना प्रारंभ कर दिया। तुगलक वंश के गियासउद्दीन ने अपने पुत्र मुहम्मद जौना को सेना देकर वारंगल पर कब्ज़ा करने भेज दिया। हिंदू राजाओं ने बहादुरी के साथ मुकाबला किया और उसको डराकर भगा दिया। करीब चार महीने बाद भारी लश्कर के साथ फिर आक्रमण हुआ तो युद्ध में काकतिया नरेश को अपने परिवार और सरदारों सहित आत्मसमर्पण करना पड़ा।

1325 ई. में वारंगल पर इस प्रकार तुगलक वंश का नियंत्रण हो गया और जौना ने वारंगल का नाम बदलकर सुल्तानपुर रख दिया। 1347 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक के सिपहसालार अल्लाउद्दीन बाहम शाह ने बगावत कर दी और अपनी बाहम शाही सल्तनत दक्खिनी पठार में कायम करके गुलबर्ग (वर्तमान हैदराबाद से 200 किलोमीटर पश्चिम में) को अपनी राजधानी बना लिया। गोलकुंडा के शासक सुल्तान कौली कुतब शाह ने बाहमनी सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह करके कुतब शाही राज 1518 ई. में स्थापित किया। 1687 ई. (21 सितम्बर) में गोलकुंडा सल्तनत मुगल बादशाह औरंगजेब के अधीन आ गई। कब्ज़े वाले इलाके को उसने डेकन (दक्खिन) सूबे का नाम दे दिया और अपनी राजधानी गोलकुंडा से औरंगाबाद (हैदराबाद से 550 किलोमीटर उŸार-पश्चिम की ओर) में परिवर्तित कर ली।

1713 ई. में फर्खशियार मुगल बादशाह ने आसिफ़ जाह (प्रथम) को डेकन(दक्खिन) का राज्य प्रतिनिधि यानी निजाम-उल-मुल्क बना दिया। 1724 ई. में आसिफ़ जाह ने मुबारिज खान को पराजित करके दक्खिनी सूबे को अपने अधिकार में ले लिया और आसिफ़ जाह वंश का प्रारंभ किया। दक्खिन को उसने हैदराबाद दक्खिन कहना प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार, पुनः आसिफ़ जाह निज़ाम यान हैदराबादी निज़ामों का शासन चल पड़ा।

हैदराबाद में बैठा निज़ाम-उल-मुल्क कमर-उद-दीन (20 अगस्त 1671 - 1 जून 1748), आसिफ़ जाह(प्रथम) दक्खिनी भारत का दिल्ली के बादशाह द्वारा स्थापित किए राज का प्रतिनिधि बनकर अपने पैर जमाने लग पड़ा था। तुर्क आसिफ़ जाह समरकंद (वर्तमान में उजबेकिस्तान) से था। उसका दादा ख्वाजा आबिद, बुखारा रियासत के समरकंद के अधीन पड़ने वाले नगर अलीआबाद का था। लेकिन उसका पिता सहाबुद्दीन खान, आलम शेख और सूफी मत का होने के कारण अधिकांश समय सुहरावर्द, खुरासान (वर्तमान में कुद्रीस्तान) में ही रहा। उसकी ननिहाल सैयद मीर हमदान, समरकंद वाले के खानदान में से थे। (प्रसिद्ध सूफी संत शेख शहाबुद्दीन सुहराववर्दी भी इन्हीं के वंश में ही हुआ है)।

ख्वाज़ा आबिद, काज़ी और शेख-उल-इस्लाम था। वह मक्का में हज करने जाते समय 1655 ई. में शाहजहाँ के शासनकाल के समय हिंदुस्तान में आया था। बादशाह ने दरबार में आमंत्रित करके भारी सम्मान, खिल्लत और उच्च पदों की पेशकश की थी। जिसे उसने हज से लौटकर 1657 ई. मंे औरंगजेब की सेवा में उपस्थिति होकर स्वीकार किया। उस समय औरंगजेब दक्खिन में अपने पिता शाहजहाँ द्वारा बनवाये मयूर राज के सिंहासन (The Peacock Throne : Mayurasana, Thakt-e-Tavus was a famous jeweled throne that was the seat of the Mughal emperors of India. It was commissioned in the early 17th century by Emperor Shah Jahan and was located in the Red Fort of Delhi. The original throne was subsequently captured and taken as a war trophy in 1739 by the Persian king Nader Shah, and has been lost ever since. A 2000 report by The Tribune, estimated the value of the Peacock Throne at $810 million USD Rs. 4.5 billion) पर विराजमान होने के लिए हाथ-पांव मार रहा था। ख्वाजा आबिद ने धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन के अतिरिक्त शस्त्र विद्या भी सीखी हुई थी। औरंगजेब ने उसको अपनी फौज में भर्ती करके ‘इक खाना’ की उपाधि प्रदान की थी। उसके पास फौज में उच्च पद, 3000 पैदल सिपाही और 500 घुड़सवार थे। कुछ छोटे मोटे युद्धों के बाद औरंगजेब ने उसको पहले अजमेर का सूबेदार और फिर मुल्तान का सरपरस्त बना कर ‘खिलचे खाना’ की उपाधि दी थी।

30 जनवरी 1687 ई. को गोलकुंडा के कुतबशाही शासक के साथ हुए युद्ध में ख्वाजा आबिद की अपनी ही तोप का गोला फंस जाने से मृत्यु हो गई थी। उसके पाँच पुत्र थे। जिनमें से सबसे बड़ा शहाबुद्दीन खान उर्फ़ गाज़ी-उद-दीन खान, शाह जहां के महा मंत्री सदाउद्ौला खान की पुत्री साफिया खानुम से ब्याहा हुआ था और बादशाह के दरबार में उच्च अधिकारी था। गाज़ी-उद-दीन खान के पैदा होने वाला पुत्र कमर-उद-दीन, निज़ाम-उल-मुल्क और आसिफ़ जाह वंश का संस्थापक बना था।

निज़ाम-उल-मुल्क कमर-उद-दीन ने बड़ी चतुरता के साथ अपने क्षेत्र में बादशाह की पकड़ ढीली करके अपनी पकड़ मज़बूत की और धीरे धीर विद्रोही तेवर अपना लिया। शासन के नशे में निज़ाम-उल-मुल्क ने चीकलथान में 1721 ई. में हुई दिल्ली दरबार और मराठों की संधि को भी तोड़ दिया। संधि की शर्तों के अनुसार दक्खिन के छह सूबों की चैथ और सरदेशमुखी वसूलने का हक मराठों को था। निज़ाम-उल-मुल्क मराठों द्वारा चैथ उगाहने के हक का विरोध करने लग पड़ा।

निज़ाम-उल-मुल्क आहिस्ता आहिस्ता अपनी शक्ति बढ़ाता गया और 1722 ई. में उसने बादशाह मुहम्मद शाह के विरुद्ध विद्रोह का झंडा खुलेआम ऊपर उठा लिया। उसके उपरांत निज़ाम ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की घोषणा कर दी। औरंगाबाद से बदलकर हैदराबाद को उसने अपनी राजधानी बना लिया। सन 1724 ई. तक निज़ाम-उल-मुल्क दक्खिन में गुजरात और मालवा पर कब्ज़ा करने के पश्चात स्वतंत्र होकर शासन करने लग पड़ा था। उसने अहमदाबाद का राज्यपाल अपने मामा हमीद खां को बना दिया। सरबुलंद खान उस समय काबुल में था। उसने अपने स्थान पर सुजामत खान को अपना उतराधिकारी नियुक्त कर दिया। हमीद खान डर कर अपना अधिकार छोड़ने को तैयार हो गया था। परंतु उन्हीं दिनों खंडो राव दाभाड़े के सहयोगी पिलाजी गायकवाड़ की तरह कंठाजी कदमबांडे भी गुजरात से कर वसूल किया करता था। हमीद खान ने कंठाजी की मदद से सुजामत खान को मरवा दिया। सुजामत खान का भाई रुस्तम अली सूरत का फौजदार था। उसने पिलाजी गायकवाड़ के साथ मिलकर हमीद खान पर हमला कर दिया। हमीद खान के पक्ष में मराठों को देखकर गायकवाड़ भी उनके साथ जा मिला और रुस्तम अली मारा गया। उसके बाद कदमबांडे और गायकवाड़ में चैथ वसूली को लेकर झगड़े होने लगे। तब हमीद खान ने उनकी लड़ाई समाप्त करने के लिए इलाकों का बंटवारा कर दिया कि मही नदी के पश्चिम की तरफ से कदमबांडे और पूर्वी दिशा से दाभाड़े चैथ वसूल किया करेगा।

निज़ाम-उल-मुल्क की धोखाधड़ी से तैश में आकर बादशाह ने अपने सिपहसालार मुबरेज खान को एक सेना की टुकड़ी देकर निज़ाम-उल-मुल्क को सबक सिखाने के लिए भेजा। लेकिन मुबरेज खान को उस के साथ निपटने के लिए मराठों की आवश्यकता पड़ गई। दिल्ली के बादशाह ने मराठों की शर्तें मान कर उनसे सहायता की पुकार की। छत्रपति शाहू ने बाजी राव को इस कार्य की जिम्मेदारी सौंप दी। बाजी राव 1724 ई. को अपना लश्कर लेकर शाही फौज की सहायता के लिए शकरखेड़ा के मैदान में पहुँच गया।

लेकिन युद्ध में से निज़ाम-उल-मुल्क बचकर निकल गया और उसने मराठों की शक्ति को चूर करने के लिए मराठों के बीच फूट डालने की योजनाएँ बनानी प्रारंभ कर दीं।

1726 ई. में बाजी राव कर्नाटक गया हुआ था। उस समय निज़ाम-उल-मुल्क ने मराठा प्रतिनिधि श्रीपदराव को बरार की जागीर देकर अपनी ओर कर लिया। दरअसल, श्रीपदराव बाजी राव से ईष्र्या करता था। उसके उपरांत निज़ाम-उल-मुल्क ने छत्रपति शाहू को प्रसन्न करने के लिए पूणे में मराठा राज स्थापित कर दिया। इसके बाद निज़ाम ने श्रीपदराव के माध्यम से शाहू के साथ संधि कर ली जिसके अनुसार शाहू ने हैदराबाद की चैथ और सरदेशमुखी को छोड़ना था और चैथ के बदले निज़ाम-उल-मुल्क ने छत्रपति को एक सुनिश्चित वार्षिक रकम देनी थी। सरदेशमुखी के एवज में इंदापुर के निकट की जागीर भी निज़ाम-उल-मुल्क ने छत्रपति शाहू को देने का वायदा किया।

जब बाजी राव कर्नाटक से लौटकर आया तो उसको यह संधि उचित प्रतीत न हुई और इस मामले को लेकर बाजी राव और श्रीपदराव के बीच झगड़ा हो गया।

निज़ाम ने कोहलापुर के संभाजी (द्वितीय) को भड़काकर छत्रपति की गद्दी के लिए दावेदार बना दिया और चंद्रसेन यादव, उदाजी चवन, राव रंभा निभबालकर जैसे मराठा योद्धे छत्रपति शाहू से भिड़ा दिए। निज़ाम-उल-मुल्क ने चाल चलकर छत्रपति को संदेश भेजा कि कोहलापुर में केवल शाहू के व्यक्ति ही नहीं अपितु संभाजी के कारिंदे भी चैथ वसूलते हैं। इसलिए पहले निर्णय कर लिया जाए कि कौन छत्रपति है और चैथ वसूलने का अधिकारी। जब तक यह निर्णय नहीं होता, वह किसी को अपने इलाके में चैथ एकत्र करने की अनुमति नहीं देगा।

निज़ाम-उल-मुल्क का संदेश सुनकर छत्रपति शाहू क्रोध में आ गया। उसने बाजी राव को निज़ाम पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। बाजी राव ने जालना प्रांत से बहुत सारा धन उगाहा और फिर फुर्ती के साथ जाकर औरंगाबाद से बुराहनपुर पर धावा बोलने की अफ़वाह फैला दी। जब कि वास्तव में बाजी राव उस समय खानदेश की ओर गया हुआ था। गुजरात से मराठा निडर होकर वसूली किए जा रहे थे।

बुराहनपुर पर मराठों के हमले का समाचार सुनकर निज़ाम-उल-मुल्क अपनी फौज के साथ बुराहनपुर पहुँच गया। वहाँ पहुँकर निज़ाम को पता चला कि असल में बाजी राव उसके क्षेत्र गुजरात में लूटमार करने चला गया था। निज़ाम-उल-मुल्क को दिशा बदलनी पड़ी। लेकिन निज़ाम बाजी राव के दांत खट्टे करने के लिए मचलने लग पड़ा।

1727 ई. में पेशवा बाजी राव दक्खिन से चैथ उगाहने के लिए गया हुआ था तो निज़ाम-उल-मुल्क ने अवसर का लाभ उठाने के उद्देश्य से पूणे पर हमला कर दिया। निज़ाम-उल-मुल्क के दबाव और संभाजी की राजगद्दी हथियाने की नीयत के कारण सतारा के लिए भी ख़तरा पैदा हो गया था और छत्रपति शाहू को ससवाद के निकट पुरानधर के किले में शरण लेनी पड़ी थी।

जब चैथ एकत्र करके बाजी राव को निज़ाम-उल-मुल्क द्वारा पूणे पर किए हमले की जानकारी मिली तो वह तुरंत पूणे की ओर लौट आया। निज़ाम-उल-मुल्क पहले ही वहाँ अपनी विशाल सेना लिए बैठा पेशवा बाजी राव की प्रतीक्षा कर रहा था।

बाजी राव बहुत दूरंदेशी, चतुर और शत्रु से सदैव एक कदम आगे चलने वाला योद्धा था। उसने भारी फौज के साथ उलझकर अपना नुकसान करवाना उचित नहीं समझा। बाजी राव ने विशेष युद्धनीति तैयार की और जलणा, खानदेश और बुरहानपुर जैसे जो निज़ाम-उल-मुल्क के अधीन थे, इलाकों में लूटमार करनी प्रारंभ कर दी। चारों ओर मुगलों में हाहाकार मच गई। बाजी राव का उकसाया हुआ निज़ाम-उल-मुल्क अपनी आधी सेना पूणा में छोड़कर बाकी दस्ते के साथ बाजी राव की ओर चल दिया। बाजी राव अपनी चाल में सफल हो गया और निज़ाम की शक्ति दो हिस्सों में विभाजित हो गई। रास्ते के मध्य में पालखेड़ (औरंगाबाद के निकट) के मैदान में पेशवा ने निज़ाम-उल-मुल्क को उसकी सेना सहित घेरे में ले लिया। निज़ाम के लिए स्थिति उस समय और अधिक चिंताजनक हो गई जब बाजी राव ने उसको मिलने वाली बाहरी मदद रोकर रसद भी बंद कर दी। भोजन और पानी तक भी बाजी राव ने निज़ाम-उल-मुल्क की फौज तक कई दिन न पहुँचने दिया। निज़ाम-उल-मुल्क को विवश होकर घुटने टेकने पड़े और पेशवा के साथ 6 मार्च 1728 ई. में मूंगीशेव गांव में संधि करनी पड़ी थी। संधि की शर्तों के अनुसार निज़ाम-उल-मुल्क ने मराठों के चैथ उगाहने का हक मंजूर कर लिया और छत्रपति के तौर पर शाहू जी को स्वीकार कर लिया। निज़ाम ने संभाजी (द्वितीय) के साथ भविष्य में कोई सम्पर्क न रखने का वचन भी दिया।

अक्तूबर 1728 ई. को बाजी राव ने अपने लश्कर सहित मालवा पर चढ़ाई कर दी। इस युद्ध में बाजी राव का भाई चिमाजी अप्पा, तानोजी शिंदे, मल्हार राव होलकर और ओदाजी पवार आदि योद्धा भी डटकर लड़े। मराठों ने मुगलों को करारी पराजय देते हुए मौत के घाट उतार दिया और बहुत सारे मुगलों को बंदी बना लिया। इस प्रकार बहुत ही कम समय में मराठों ने मालवा पर अपना कब्ज़ा कर लिया।

उससे कुछ अरसे बाद मुगलों ने अपनी हार का बदला लेने और मराठों से मालवा छीनने के लिए अंबर के सवाई जैय सिंह और मुहम्मद खान बंगस को अपना प्रतिनिधि बनाकर मराठों से उन्हें भिड़वा दिया। परंतु मराठों के हाथों इन दोनों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

मुगल बादशाह के राजपाल मुहम्मद खान बंगस ने 1727 ई. में मराठों और बुंदेलों के साथ अनेक झड़पें कीं। लेकिन उसको कोई विशेष सफलता नहीं मिली। इसी वर्ष मुहम्मद खान बंगस ने बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल को निशाना बनाकर उस पर हल्ला बोल दिया। महाराजा छत्रसाल ने छत्रपति शाहू से मदद मांगी। लेकिन छत्रपति, मराठा फौज के कहीं दूसरी तरफ के युद्ध में लगी होने के कारण समय पर अपनी सहायता न भेज सका। बुंदेलों ने जैतपुर के किले से बहादुरी के साथ कई दिनों तक मुकाबला किया, परंतु अंत में महाराजा छत्रसाल को विवश होकर हार स्वीकार करनी पड़ी और बंगस द्वारा बंदी बनाये जाने के बाद संधि करनी पड़ी।

1729 ई. में मुहम्मद खान के दमन से आज़ाद होने के लिए बुंदेलखंड नरेश महाराजा छत्रसाल ने बगावत कर दी। मुहम्मद खान बंगस ने फिर जैतपुर के किले को फरवरी 1730 ई. में अपनी सेना सहित आ घेरा। महाराजा छत्रसाल ने मराठों से युद्ध में सहायता मांगी। उस समय बाजी राव बुंदेलखंड के करीब की गराह, मालवा में ही था। छत्रपति का आदेश सुनते ही वह महाराजा छत्रसाल की सहायता के लिए जैतपुर की ओर चल पड़ा। मुगलों के जरनैल बंगस को बाजी राव ने जैतपुर में आकर शिकस्त दी और उसकी सहायता के लिए आ रहे उसके पुत्र को भी बंदी बनाकर क़त्ल कर दिया। मुहम्मद खान बंगस ने महाराजा छत्रसाल को भविष्य में कोई नुकसान न पहुँचाने का वायदा करते हुए दिल्ली जाने के लिए राह छोड़ने की विनती की और अपनी जान बचाई। पेशवा बाजी राव के सहयोग से खुश होकर महाराजा छत्रसाल ने बाजी राव को अपनी पुत्री मस्तानी का रिश्ता करने के साथ साथ अपने दो पुत्रों जगतराम और हृदय शाह के बराबर अपनी जागीर में से तीसरा हिस्सा अर्थात सागर, बांदा और झांसी की जागीरंे प्रदान कीं। बाजी राव ने बुंदेलखंड की अपनी जागीर का सरपरस्त गोबिंद पंत बुंदेल को बना दिया।

उस समय गुजरात की राजसी व्यवस्था डगमगा रही थी। बहुत सारे हाकिम स्वतंत्र होकर अपनी मनमर्जी कर रहे थे। इनमें से कई मराठे अथवा मराठों के समर्थक ही थे। जिनमें पिलाजी गायकवाड़ और कंठाजी कदमबांडे प्रमुख थे। इन दोनों का संसारपति खंडो राव दाभाड़े के साथ गठबंधन था जो कि गुजरात में काफी दबदबा रखता था। मराठा सेनापति खंडो राव दाभाड़े को छत्रपति शाहू जी ने गुजरात की चैधराहट बख़्शी थी। 27 सितंबर 1729 ई. को खंडो राव के निधन के पश्चात उसके पुत्र तिंबरकर दाभाड़े ने सेनापति बनकर अपने पिता वाला कार्य संभाला। इनके अलावा गुजरात में हामिद खान भी सक्रिय पदाधिकारी था जिसको निज़ाम-उल-मुल्क की छत्रछाया और समर्थन प्राप्त था।

मुगल बादशाह ने सरबुलंद खान को जब जुलाई 1724 ई. में गुजरात का प्रबंध अपने अधीन करने के लिए भेजा था तो उसने लड़ाई की अपेक्षा कंठाजी कदमबांडे के साथ संधिनामा करके उसको माही दरिया से उतर के इलाके की चैथ वसूलने का अधिकार दे दिया था। बाजी राव ने गुजरात की चैथ एकत्र करने की सरबुलंद खान से ओदेजी पवार के माध्यम से स्वीकृति मांगी तो सरबुलंद खान ने इन्कार कर दिया। बाजी राव ने गुस्से में आकर अपने भाई चिमाजी अप्पा को गुजरात के पेटलड और ढोकलां शहरों में लूटमार करने के लिए भेज दिया। सरबुलंद खान एक ही समय में बांडे और पेशवा की फौज से निपटने में असमर्थ था। इसलिए अपनी परेशानियों को कम करने के लिए उसने न चाहते हुए भी बाजी राव के साथ 1730 ई. में संधि करके पेशवा को गुजरात की चैथ और सरदेशमुखी के हक दे दिए। परंतु सूरत का समुद्री तट इस संधि में शामिल नहीं किया।

1730 ई. में दक्खिनी सूबे की सरदेशमुखी और निज़ामों से चैथ वसूलने के लिए छत्रपति महाराजा शाहू ने बाजी राव को मुहिम पर जाने का आदेश दिया तो मस्तानी भी संग जाने की हठ करने लगी। क्योंकि वह बाजी राव के अनुपस्थिति में पीछे अकेली नहीं रहना चाहती थी।

बाजी राव ने मस्तानी से पीछा छुड़ाना चाहा, “मैं तो चैथ वसूलने जा रहा हूँ। तुम वहाँ जाकर क्या करोगी?“

“मैं निज़ामों का खूबसूरत शहर हैदराबाद देखना चाहती हूँ।“
“पर वहाँ जंग भी हो सकती है। मैं सैर-सपाटे के लिए नहीं, फौजी कार्रवाई करने जा रहा हूँ।“

“मैं क्या जंग से डरती हूँ ? देखा नहीं था बुंदेलखंड में मुझे लड़ते हुए ? अब तो जीना मरना तुम्हारे साथ ही है। इसलिए मैं हर जंग मंे आपके साथ ही जाया करूँगी।“

मस्तानी ने नखरा दिखाया तो बाजी राव उसको संग ले जाने के लिए सहमत हो गया।

मस्तानी खुश हो गई, “हाय मेरे मराठा ! मस्तानी को तुम्हारी इन्हीं अदाओं ने ही तो मार रखा है।“

वैसे भी बाजी राव को निज़ाम आसिफ जाह के साथ जंग लड़ने का कोई खास अंदेशा नहीं होता। आसिफ़ जाह वृद्ध होने के कारण बिना कोई देरी किए मराठों के साथ संधि करने के लिए तैयार हो गया। बाजी राव, निज़ाम को मिलने लाठोर के निकट रोहे-रामेश्वर में मिलता है। निज़ाम, बाजी राव को दक्खिनी सूबों की सरदेशमुखी और चैथ देना कबूल कर लेता है और एक आलीशान दावत देता है।

मुगलों से पहले कुतब वंश ने दक्खिनी सूब पर एक सदी राज किया था। पाँचवे कुतब सुल्तान मुहम्मद कौली कुतल शाह द्वारा हैदराबाद में बनवाये चारमिनार और मक्का मस्जिद दिखाने के बाद घोड़ों पर बैठकर पूने की ओर रवाना होते हुए बाजी राव मस्तानी से पूछता है, “हाँ मेरी रानी ! कैसा लगा हैदराबाद ?“

“बहुत ही खूबसूरत है यह शहर।“

“इस शहर का भी बहुत दिलचस्प इतिहास है। जानती हो, कैसे बसा है यह हैदराबाद ?“

“नहीं, तुम ही बताओ। मुझे क्या पता ?“ मस्तानी कंधे उचका देती है।

“मुहम्मद कौली कुतब शाह ने इस हैदराबाद शहर की नींव 1591 ई. में रखी थी। इसका पहला नाम उसने भागनगर रखा था। गोलकुंडा के हुक्मरान सुल्तान इब्राहिम कौली कुतब शाह का पुत्र, मुहम्मद कौली कुतब शाह भागमती नाम की हिंदू नर्तकी को बहुत प्रेम करता था। उसको भागमती का नृत्य देखे बिना चैन नहीं आता था। वह प्रतिदिन भागमती के गांव चिचलम, मूसी नदी पार करके उसका नृत्य देखने जाया करता था। भागमती से मुहम्मद कुतब शाह का ध्यान हटाने के लिए उसके पिता सुल्तान इब्राहिम ने मुहम्मद कुतब शाह को अनेक भारतीय, अरबी और अन्य देशों से मंगवाकर खूबसूरत स्त्रियाँ पेश कीं। पर कुतब शाह के मन को कोई नहीं भाई। तुर्क कुतब शाह और हिंदू कंचनी भागमती के संबंधों को लेकर विरोध उत्पन्न हो गया और कुतब शाह को भागमती के साथ मिलने पर उसके पिता ने पाबंदी लगा दी।“

“फिर तो अपनी वाली कहानी ही थी उन बेचारों की भी।“ मस्तानी हँसने का ढोंग करती हुई गंभीर हो जाती है।

बाजी राव बराबर वाले घोड़े पर जा रही मस्तानी का हाथ पकड़ लेता है, “एक दिन बहुत बरसात हो रही थी और नदी में बाढ़ आई हुई थी। घरों के घर बाढ़ के पानी में तबाह हो गए। मुहम्मद कुतब शाह को भागमती की चिंता सताने लगी। वह भागमती से मिलने के लिए तड़प उठा। इस भयानक तूफानी हालत में भी कुतब शाह अपनी प्रेमिका भागमती से मिलने घोड़े पर चला गया। लोग उसको बहुत रोकते रहे। पर वह न माना और भागमती से मिलने के लिए घोड़े सहित नदी में कूद पड़ा। उसका घोड़ा नदी के पानी में ही कहीं डूब गया। परंतु जैसे तैसे मुहम्मद कुतब शाह सही सलामत दूसरे किनारे पर पहुँच गया और उसने भागमती को खोज लिया। सारा चिचलम गांव बाढ़ की मार से तबाह हो गया था। कुतब शाह के पिता सुल्तान इब्राहिम ने अपने पुत्र की भागमती से मिलने की जिद को देखकर मूसी नदी पर पत्थरों का मजबूत पुल बना दिया जिसे पुराना पुल कहते हैं। गांव फिर से आबाद हो गया। मुहम्मद कुतब शाह उसी पुल से होकर अपनी प्रेमिका भागमती से नित्य मिलने जाता। दिन व्यतीत होते गए। फिर...।“ बाजी राव सांस लेने के लिए चुप हो गया।
मस्तानी बहुत उत्सुक हो गई, “फिर क्या हुआ ?“

बाजी राव अपनी बात को आगे बढ़ाता है, “फिर प्लेग की बीमारी फैल गई। इस महामारी से भागमती के गांव के सभी लोग मरने लग पड़े। मुहम्मद कुतब शाह भागमती को गोलकुंडा अपने पास ले गया और बाद में कुतब शाह ने भागमती के नाम पर मूसी नदी के तट पर भागनगर नाम का नया शहर बसा दिया। पिता के बाद राजगद्दी पर बैठने के बाद मुहम्मद कुतब शाह ने भागमती का धर्म परिवर्तन करवाकर उसके साथ विवाह करवा लिया और उसका नाम हैदर महल रख दिया। कुतब शाह ने अपने एक पुत्र का नाम हैदर शाह (शेर बहादुर) रखा। हैदर शाह ने भागमती नगर का विस्तार करके इसको बागों, उपवनों से सजा दिया। इस शहर का नाम लोग भागनगर से बागनगर अर्थात बागों का नगर प्रचारित करने लग पड़े। मुहम्मद कुतब शाह ने इसलिए इसका नाम बदलकर हैदराबाद कर दिया था यानी हैदर के लिए आबाद किया गया शहर ताकि उसकी पत्नी के नाम से यह शहर जुड़ा रहे।“

“क्या मेरे नाम पर आप भी कभी किसी जगह का नाम रखोगे ?“ अकस्मात मस्तानी प्रश्न कर देती है।

“हाँ, तेरे लिए हम भी कुछ ऐसा बनाएँगे जिसको दुनिया देखती रह जाएगी। पर समय आने पर ही तुम्हें बताएँगे मेरी जान।“ बाजी राव मुस्कराकर मस्तानी की ओर देखता है और वह अपनी मंजि़ल की ओर बढ़ने लग जाते हैं।

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Re: मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

Post by Ankit » 11 Jun 2017 17:42


शाही कल्लोल


मस्तानी और बाजी राव का प्रेम नीलगगन की उड़ानें भरने लग जाता है।... छोटी-बड़ी जंगें होती रहती हैं। मस्तानी बाजी राव के साथ साधारण सैनिकों की तरह युद्ध में शामिल होती रहती है। देखते ही देखते, मस्तानी मराठा इतिहास के पृष्ठों पर बादल की भाँति छा जाती है। बाजी राव और मस्तानी का इश्क किसी के मुँह से नगमा बनकर गूंजता है और किसी के अधरों पर चुगली बनकर नाचता है। किंतु दिन आनंदपूर्वक व्यतीत होते रहते हैं।


एक दिन पूरी दोपहर तलवारबाजी का अभ्यास करने के उपरांत मस्तानी हमाम की ओर स्नान के लिए चली जाती है। कनीज़ स्त्रियाँ मस्तानी के वस्त्र उतारकर उसको चबूतरे पर लिटा लेती हैं। एक कनीज़ पैरों की ओर बैठकर मस्तानी के पैरों के तलुवे झसते हुए उंगलियों के पटाखे निकालने लग पड़ती है। दूसरी दासी सिरहाने बैठकर मस्तानी के गज़-गज़ भर लम्बें केशों को आंवले, शिकाकाई, नारियल और अरीठे डालकर बनाये गए चमेली के तेल से तर करने लग पड़ती है। तीसरी सेविका हल्दी, चंदन, केसर, बादाम, दूध, दही, मक्खन के बने मिश्रण का लेप मस्तानी के पूरे नग्न शरीर पर मलने लग पड़ती है। मस्तानी आँखें बंद किए आराम से शारीरिक अंगों पर होती मालिश का आनन्द उठाती लेटी रहती है।

“आलीजा, आप हर समय तेल मालिश ही क्यों करवाते रहते हो ?“ एक कनीज़ प्रश्न करती है।

मस्तानी अंगड़ाई लेती है, “नफ़ा पर बेचता हूँ, छिड़क कर सौदा ख़सारे का... मतलब कि सस्ता सौदा पानी छिड़कने से मंहगे दाम में बिक जाता है।“

मस्तानी की लटों को तेल लगाती हुई बांदी बोलती है, “हुजूरेआली ! बुजुर्गों से सुना करते थे कि मलिका नूरजहाँ के केश धरती को छूते थे। पर मैंने कभी किसी के इतने लम्बे बाल देखे नहीं थे। आपके घुटनों तक आते घने और चमकदार बाल देखकर आश्चर्य होता है। जब किसी को हम बताती हैं तो सुनने वाला यकीन नहीं करता। जब आप केश फैलाते हो तो निरा आबशार ही लगते हैं।“

“कुंवरसा, मेरे दादासा ज्योतिषी थे। मैंने थोड़ी-बहुत ज्योतिष विद्या सीखी है। आपके फूलों जैसे कोमल पैरों की रेखाओं का अध्ययन करने के पश्चात मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि ये किसी साधारण स्त्री के पैर नहीं हैं। आप विशेष और अहम शख्सियत हो। मेरे हाथों में आज वो पैर हैं जिन्हांेने हिंदुस्तान के इतिहास में अपने निशान छोड़ने हैं।“ पैर झसती हुई सेविका बताती है।

दूसरी दासी बयान करती है, “मुगलों से सुना है कि कोह-ए-काफ़ की हूरें बहुत सुंदर होती थीं। पर मुझे नहीं लगता हमारी मस्तानी सरकार से हसीन भी कोई हो सकती है। फिरंगियों जैसा गोरा रंग, बिल्लौरी आँखें, तीखे नक्श, सुडौल गठीला बदन, खुदा द्वारा नाप तोलकर सही अनुपात में बनाया हर अंग, रेशम जैसी चमकती रूई की मानिंद नरम मुलायम चमड़ी।“

मस्तानी हुस्न के गुमान में आकर बीच में ही टोक देती है, “यूँ ही नहीं बना यह चमकीला और लचकीला बदन... बचपन से ही मैंने दूध, मलाइयों के साथ पाला है इस बदन को। बटने मल मलकर नहाती रही हूँ। मेरी अम्मी मुझे इत्र वाले संदली जल से स्नान करवाया करती थी।“

“यह तो प्रत्यक्ष ही दिखाई देता है। परियाँ भी देखें तो बेहोश होकर गिर पड़ें। आपके अंगों से तो बंदे की निगाह फिसलती है।“ मस्तानी के स्तनों पर देसी घी की मालिश करती हुई सेविका शरारत से एक स्तन दबा देती है।

मस्तानी की चीख निकल जाती है, “हा...य...! आहिस्ता.... प्यार से मालिश कर कमजात ! मारेगी मुझको ?“

“मार तो आपने दिया है पेशवा सरकार को, अपने हुस्न की कटारी से। पूरे पूना में धूम मची हुई है कि मराठे, मस्तानी से पटे ! मस्तानी सरकार आपके रूप के सारे हिंदुस्तान में डंके बजे पड़े हैं।“ मस्तानी के हाथों की उंगलियों के पटाखे बजाती सेविका फरमाती है।

पंखी से हवा कर रही दासी भी बोल उठती है, “हमारे पेशवा सरकार भी कौन सा कम हैं ?... जब लाखा जंगी लिबास और चमड़े का जे़रे-बख्तर पहनकर बादल घोड़े पर निकलते हैं तो निज़ामों की नारियाँ और मुगलानियाँ हमारे नीली आँखों वाले सांवले राजकुमार को पर्दों की ओट से ऐडि़याँ उठा उठाकर देखने लग पड़ती हैं। एकबार तो नवाब को जब पेशवा जी मिलने गए तो उसके हरम की सभी स्त्रियाँ पर्दों से बाहर पेशवा जी का दीदार करने आ गई थीं और गियास खान मुँह फाड़े देखता रह गया था। श्रीमंत और मस्तानी बेगम आपकी जोड़ी तो बिल्कुल राम-सीता की जोड़ी लगती है। राधा-कृष्ण की तरह आपकी प्रीत अमर हो जाएगी, मेरी बात याद रखना।“

मस्तानी यह सुनकर आँखें खोल लेती है और एक गहरा निःश्वास उसके अंदर से निकलता है, “हाँ, शायद इसी कारण भाग्य की कैकेयी हमें बनवास दिलाने पर तुली बैठी है।“

“आलीजा, दुख महान व्यक्तियों पर ही आया करते हैं। भगवान इन्सान को उतना ही कष्ट देता है जितनी तकलीफ़ें वह झेल सकता होता है। ग़म मनुष्य को शक्तिशाली बनाने के लिए सहायक सिद्ध होते हैं। जीवन का संघर्ष व्यक्ति को मजबूत बनाता है। बस, आप भी लव-कुश जैसी जोड़ी पैदा कर लो। एक सन्तान की ही कमी है आपके रिश्ते में। बच्चा होने पर ससुराल में औरत की कद्र बढ़ जाती है। देखना, सब ठीक हो जाएगा। आप भट्ट परिवार को अपने जैसा सुंदर और श्रीमंत जैसा बहादुर योद्धा बेटा पैदा करके दो। बस, एक मुल्गा(लड़का) नन्हा-मुन्ना सा पेशवा।“

मस्तानी का चेहरा लज्जा की लाली से गुलाबी हो जाती है, “मुल्गा ?... वाह, नन्हा-मुन्ना सा पेशवा ! बात तो तेरी सोलह आने सही है। पर डर जाती हूँ कि इन ब्राह्मणों के परिवार ने तो मुझे ही स्वीकार नहीं किया, मेरी सन्तान को कैसे स्वीकार कर लेंगे ?“

चंदन की लकडि़यों से बने कोयलों का सेक देकर मस्तानी के बालों को भाप देती एक वृद्ध कनीज़ फूट पड़ती है, “इस दुनिया में आने वाला हर इन्सान अपना भाग्य विधाता से लिखवा कर लाता है जी। यह आपका वहम है, सरकार। जब बड़े पेशवा विश्व नाथ जी का अन्तिम समय करीब आया था तो उन्हांेने मृत्यु से पहले बाजी राव जी के हाथ में भिक्खू जी का हाथ थमाकर उसका खयाल रखने की जिम्मेदारी सौंपी थी। आप स्वयं ही देख लो। पेशवा सरकार उतना अपने सगे भाई चिमाजी अप्पा का नहीं करते, जितना भिखू जी से प्यार करते हैं। उसको कभी महसूस ही नहीं होने दिया कि सौतेला है। फिर यह तो पेशवा बाजी राव की अपनी सन्तान होगी। मुझे आशा है कि नाना साहिब से अधिक लाड़ करेंगे सभी घर वाले। पुरुष के मेल से स्त्री पूर्ण होती है और सन्तान पैदा करके सम्पूर्ण हो जाती है।“

मस्तानी मुस्कराती है, “अच्छा तो यह बात है ? ले फिर मस्तानी तो आँधी ला देगी। तुम बच्चों को खिलाने वाली बनो।“ अलफ़ नग्न मस्तानी उठकर गुलाब जल और इत्रों भरे हमाम में प्रवेश कर जाती है।

पेशवा बाजी राव आता है और दासियाँ उसके वस्त्र उतार देती हैं। निर्वस्त्र होकर बाजी राव मस्तानी के साथ जलकुंड में नहाने लग जाता है। गुनगुने पानी में वे दोनों मस्तियाँ करने लग पड़ते हैं। मस्तानी, बाजी राव को आलिंगन में भरकर उसकी गाल पर अपनी लटें घुमाती हुई पेशवा के कान में फुसफुसाती है, “मैंने सुना है, जल में किया संभोग महायज्ञ के समान होता है।“

पेशवा बाजी राव, मस्तानी की कमर को अपनी बांहों में घेरे में लेकर कस लेता है और उसकी आँखों में छलकती काम वासना को देखता है। वह अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाता। वह मस्तानी को चूमने के लिए तेज़ी से झपटता है जैसे रणभूमि में निज़ामों पर हमला किया करता है। पेशवा की ओर से की गई चुम्बनों की बरसात और प्रेम स्पर्शों का मस्तानी भी डटकर उŸार देती हुई उसके संग जलकुंड में ही आलिंगनबद्ध हो जाती है।

मस्तानी की शरारती आँखों में शरारत नृत्य कर रही होती है, “देखते हैं, आज प्रेम युद्ध में एक मराठा जीतता है या यह बुंदेलन।“

“जीत तो मराठा की ही होगी, मस्तानी, मेरी जान ! मराठा युद्ध में से यूँ ही पीछे नहीं हटा करता। तूने कहावत नहीं सुनी। मरहटा...मर के हटा या मार के हटा...।“ बाजी राव वेग में आकर मस्तानी को और अधिक शिद्दत से भोगने लग जाता है।

जल में हलचल मचाते बाजी राव और मस्तानी की प्रेमभाव को प्रकट करती आवाज़ें हमाम में गूंजने लग जाती हैं...“हूँ...हँ...हा....ऊँ...आ... हँ...अ...!!!“

हमाम का पानी किनारों से इस प्रकार टकराने लग जाता है मानो किसी सागर में भूचाल आया होता है।

...और फिर संभोग के शिखर पर पहुँचकर तूफान समाप्त होने के बाद मस्तानी और बाजी राव पानी में निढ़ाल होकर यूँ गिर पड़ते हैं जैसे घायल सिपाहियों की लाशें रणभूमि में पड़ी होती हैं।

मस्तानी मोह के साथ बाजी राव के बालों में हाथ फिराती है, “उफ्फ मेरे मराठे! जान निकालकर ही हटा।“

“क्या बताऊँ मस्तानी ! नशा करवाकर शरीर में से सारी जान ही निकाल लेती हो। सारा ज़ोर लग गया। देह बेजान हुई पड़ी है। पर तुझे छोड़ने को चित नहीं करता। मन करता है, और संभोग करूँ। सारी सारी रात तुझे भोगकर भी मन नहीं भरता। और बातों को छोड़, तू एकबार नज़ारा ही ला देती है। मेरी जान, आनन्द आ गया। ऐसा लगता है मानो दिल्ली के किले पर केसरी मराठा परचम गाड़ दिया हो।“

“और कौन सा झंडा गाड़ने की कसर छोड़ी है ? औरत के दिल से बड़ी कोई सल्तनत नहीं होती। जो वहाँ झंडा गाड़ लिया, समझो उसने दुनिया फतह कर ली !“ मस्तानी, बाजी राव को कसकर छाती से लगा लेती है।

“मस्तानी, जब तू मुझे आलिंगन में लेकर भींचती है या मेरे ऊपर सवार होकर क्रीड़ा करती हुई अपना लचकीला बदन पतली टहनी की भाँति मरोड़ती है न, धर्म से सच जान, मैं तो आनन्द के सरूर में मरने जैसा हो जाता हूँ।... कहाँ से सीखी है इतनी उतम और आनन्द प्रदान करने वाली यह संभोग कला ?... अवश्य खजराहो(जिला-छत्रपुर, मध्य प्रदेश) के मंदिरों की कामुक मूर्तियों को देखती रही होगी, तभी तेरे अंदर इतना काम समाया हुआ है। मैं तो कईबार सोचा करता हूँ कि मूर्तिकारों ने ये मूर्तियाँ तुझे देख देखकर ही निर्मित की होंगी। भई, खूब लुच्चे हो तुम बुंदेली लोग तो। मंदिरों में भी लुच्चापन बिखेरे फिरते हो।“

मस्तानी, बाजी राव को बांहों में कसती हुई कहती है, “नहीं, मेरे पेशवा सरकार, फिर तो आपको खजराहो के मंदिरों में कामग्रस्त मुद्राओं में बनी नग्न और काम उकसाऊ मूर्तियों के विषय में कोई ज्ञान ही नहीं है।“

“चल, तुम करवा दो ज्ञान, प्रिय !“ बाजी राव मस्तानी की गोरी गर्दन को चूमने लग जाता है।

“वास्तव में, खजराहो चंदेलों की राजधानी थी। यह संस्कृत के शब्द खजूरवखा का बिगड़ा रूप है। खज यानी खजूर और वखा, उसको ढोने वाला। खजूर गरम होती है और मनुष्य के अंदर काम भावनाओं को पैदा करती है। खजूर खाया करिए आप भी।“

“मेरे अंदर तो मस्तानी तुझे देखकर ही विलासी भावनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। हर समय मस्तिष्क में काम का भूत चढ़ा रहाता है।“

“हटो, झूठे कहीं के। अच्छा... मैं बता रही थी कि चंदेलों ने खजराहो में महादेव, लक्ष्मण, चतर्भुज आदि लगभग 85 मंदिरों का निर्माण किया था, इसलिए आज भी वहाँ हिंदू और जैन मंदिर भारी संख्या में देखने को मिलते हैं। पुरातन कथा के अनुसार हेमावती नाम की एक ब्राह्मण कन्या को चंद्रमा ने जबरन पकड़कर भोगा और फिर उसके एक बेटा हुआ। उसका नाम उसने चंद्रवर्मन रखा। इस चंद्रवर्मन से ही चंद्रवंशी चंदेलों के वंश का आगमन होता है। चंदेलों के शासन के समय युवक मठों में विद्या ग्रहण करने के लिए जाया करते थे और उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करवाया जाता था। इसलिए वे ग्रहस्थ जीवन से कोरे रह जाते थे। उनके अंदर काम जाग्रत करने और संभोग की शिक्षा देने के लिए चंदेलों ने क्रीड़ा मुद्राओं वाली मूर्तियाँ बनवाई थीं। फिर इन्हें मंदिरों के बाहर स्थापित इसलिए किया था कि लोग काम पर नियंत्रण रखकर काम से ऊपर उठ सकें। इसी में ग्रसित न रहें। यदि मंदिर मंे प्रवेश करने से पूर्व आपका उन उकसाऊ मूर्तियों को देखकर मन भटकता है तो इसका अर्थ है कि आपको अभी और साधना की आवश्यकता है। आप अभी प्रभु को प्राप्त करने की अवस्था में नहीं पहुँचे हो और मंदिर में जाने के योग्य नहीं हो। वरना उन मूर्तियों को उद्देश्य अश्लीलता का प्रदर्शन करना नहीं है।“

“अच्छा ! चल आ अब पहले एक भरपूर संभोग करते हैं और काम से ऊपर उठते हैं।“ बाजी राव अपनी बांहों में मस्तानी को उठाकर हमाम के कुंड में से बाहर आ जाता है।

पानी से बाहर निकलते ही पेशवा और मस्तानी के गीली देहों को सेविकाएँ सुंगधित वस्त्रों से पोंछ देती हैं। दोनों जन निर्वस्त्र ही एक दूजे से आलिंगनबद्ध होकर आरामगाह की ओर चले जाते हैं। बाजी राव गोल सिरहानों की टेक लगाकर शराब और हुक्का पीने लग जाता है। मस्तानी अफीम का टुकड़ा खाकर बाजी राव को पान परोसती है। बाजी राव गीत सुनने की इच्छा प्रकट करता है। मस्तानी गाती हुई नग्न नृत्य करने लग जाती है। दोनों पूरी रात एकसाथ दारू पीते और रंग रास में व्यस्त एक-दूसरे को प्रेम करते रहते हैं।

कई कई महीने ऐसी रंग रास की महफि़लों का सिलसिला चलता रहता है। बाजी राव और मस्तानी शराब के नशे में धुत होकर एक दूजे को प्यार करते हुए रंगरेलियों का आनन्द उठाते रहते हैं।

दिन रात मस्तानी के साथ अय्यासियाँ और शाही काम कल्लोलें करते हुए हुए बाजी राव का समय बहुत हसीन गुज़रता है। इस प्रकार के संभोग यज्ञ में आठों पहर, वार, सप्ताह, पखवाड़े, महीने और वर्ष मशरूफ होकर मस्तानी भी बाजी राव के इश्क में कुल आलम को भूल जाती है।

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