गद्दार देशभक्त complete

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गद्दार देशभक्त complete

Post by kunal » 01 Jul 2017 08:39

गद्दार देशभक्त

उस और सुन्दर लड़की के हलक से ऐसी चीखें निकल रही थी उसे किसी धारदार छुरी से हलाल किया जा रहा हो ।


लेकिन ऐसा था नहीं, जो था, असल में वह किसी छूरी से हलाल किए जाने से भी बीभत्स और बदतर था ।


लड़की को लग रहा था कि उसका सिर, बाकी शरीर से अलग होने ही वाला है और सिर को उसके लम्बे, घने और काले बाल अपने साथ उखाड़कर ले जाएंगे ।


वे बाल, जिम्हें बारह बाई बारह के छोटे-से सीलन भरे कमरे के लेंटर के बीचोंबीच लगे कूदे के साथ बंधी रस्सी के निचले सिरे से कसकर बांधा गया था ।


लड़की का बाकी शरीर, हवा में झूल रहा था ।


उसके पेैर फर्श से करीब तीन फुट ऊपर थे । हाथ भी खुले हुए थे, पैर भी । बालों के अलावा जिस्म के किसी हिस्से को नहीं बांधा गया था । जिस्म पर मेंहदी रंग का सलवार-कुर्ता था जो कई जगह से फट चुका था और वहाँ से उसका गोरा जिस्म ही नहीं बल्कि ताजा बने हुए लम्बे-लम्बे जख्म भी झांक रहे थे ।


कांटेदार हटरों से बने जख्म ।


उसके चारों तरफ चार आदमी खड़े थे ।

आदमी की जगह अगर उसे जल्लाद भी कहा जाए तो अनुचित न होगा ।


चारों के हाथ में वे हंटर थे जिनके निशान लड़की के जिस्म पर खून की लकीरों के रूप में नजर आ रहे थे ।



रोशनी के नाम पर कमरे में मनहूसियत-सी फैलाती पीली रोशनी बिखरी हुई थी, जिसे चालीस बॉट का एक बल्ब उगल रहा था ।


"बोल......बोल !" उनमें से एक ने कहा----"कौन है तू ?"



लड़की को चीखने से फुर्सत मिले तो कुछ बोले भी ।


उनमें से एक का हंटर वाला हाथ पुन: चलने ही वाला था कि ऐसी आवाज हुई जैसे भारी-भरकम लोहे का दरवाजा खुला हो ।



चारों ने एक साथ आबाज की दिशा में देखा और तुरंत ही उनके जिस्म सावधान की मुद्रा में अा गए ।



तीनों के मुंह से एकसाथ निकल---------"हाफिज लुइस साहब !"


मोटी-मोटी सलाखों के दरवाजे को पार करके जो शख्स कोठरी नुमा कमरे में दाखिल हुआ उसकी लम्बाई किसी भी तरह साढे़ सात फूट से कम नहीं थी । जिस्म पहाड़ जैसा । चेहरा इतना चौड़ा जितना वह तवा होता है जिस पर रुमाली रोटियां बनाई जाती है ।



रंग भी तवे जैसा ही काला था । आंखें बाहर को उबली हुई-सी । लाल सुर्ख । जैसे धतूरे का नशा किए हुए हो । छोटा-सा माथा । लम्बे-लम्बे कान । पकौड़े जैसी नाक और लटके हुए-से चौडे होंठ ।


कुल मिलाकर, हाफिज लुईस नाम का वह शख्स शक्ल से ही इतना डरावना था कि कमजोर दिल वाले को तो उसे देखते ही हार्ट अटैक पड़ सकता था । उसके जिस्म पर पठानी सूट, पेरों में भारी बूट और सिर पर काबाईली पगड़ी बंधी हुई थी ।


उसने लड़की की हालत का मुआयना किया और बोला…"गुड काफी कंफरटेबल कंडीशन में रखा है तुम लोगों ने इसे ।"


"फिर भी कुछ बता नहीं रही है सर ।" एक बोला ।

"दूं।" हाफिज लुईस ने एक लम्बा हु'कारा भरते हुए जेब में हाथ डाला ।


पाकिस्तानी सिगरेट का पैकिट निकाला । उसमें से एक सिगरेट निकालकर मोटे होंठों पर लटकाई । उसे लाइटर से सुलगाने के बाद कश लिया और नथुनों से धुवां छोड़ता बोला-----“बताएगी, जो पूछा जाएगा वो बताएगी । हाफिज जब अपना रौद्र रूप दिखाता है तो पत्थर भी टर्र-टर्र करने लगते हैं । इस बेचारी अदनी-सी लड़की की तो बिसात क्या है!"



वे चारों पत्थर के बुत से खड़े रहे ।
मोटी-मोटी उंगलियों के बीच उनसे कम मोटी सुलगती हुई सिगरेट लिए हाफिज हवा में झूल रही लड़की के करीब पहुंचा और बोला-------"नाम बताओं?"


"म. . .मरजीना ।" चीखों के बीच लड़की मुश्किल से कह पाई ।



"ऊंहूं । तुम तो यार शुरुआत ही झूठ से कह रही हो । जो भुगत रही हो, निजात चाहती हो तो असली नाम बताओ ।"


लड़की गुर्राई……"मुझे उतार कमीने ।"


"अरे!" हाफिज ने अपनी मोटी-मोटी आंखें मटकाईं....."ये तो बदतमीज भी है । जलील को कमीना कहती है ! फिर भी एक बात बता, अगर में तुझे उतार दूं तो क्या तू मुझे असली नाम बात देगी?"


"मेरा नाम मरजीना ही है ।”



हाफिज ने कहा…“तेरां नाम नीलिमा है ।"
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Re: गद्दार देशभक्त

Post by kunal » 01 Jul 2017 08:39

एक पल के लिए तो लड़की सन्न रह गई । जैसे जवाब न सूझा हो । अगले पल बोली----" कौन नीलिमा ?"



“बो नीलिमा जिसका घर मुम्बई में है ।" हाफिज ने कान्सिडेंस भरी मुस्कान के साथ कहा था…"वो नीलिमा जिसके बाप का नाम केसरी नाथ है । दो केसरी नाथ जो अरवों-खरबों का मालिक है ।"


हकबकाई हुई लड़की ने कहा…“पता नहीं तुम क्या बक रहे हो । मेरा नाम मरजीना ही है । पाकिस्तानी हूँ । इस्लामाबाद में रहती हूं । पूरा एड्रेस बता चुकी हूं ! तस्दीक कर सकते हो ।"


"मुझे मालूम है, तस्दीक हो जाएगी । क्योंकि तुमने पाकिस्तान में खुद को इसी नाम और एड्रेस के साथ स्थापित कर रखा था । ऐसा करने वाली तुम अकेली नहीं हो, चार साथी और हैं तुम्हारे । वे सब भी पकडे़ जा चुके है और इसी जेल की अलग-अलग कोठरियों में तुम्हारी तरह ऐश काट रहे हैं । उनके नाम अंजली, सुबोध, अनिल और समर हैं । वे भी इस्लामाबाद में अलग-अलग एड्रेसो पर, अलग-अलग मुस्लिम नामों से स्थापित थे । तुममें से किसी को भी 'नकली' साबित नहीं किया जा सकता क्योंकि तुम्हें इस्लामाबाद में बसाने के लिए प्लानिंग ही इतनी पुख्ता बनाई गई थी लेकिन हम भी, आखिर हम हैं । क्या ये भी बताने की जरूरत है कि जिस काम से तुम पाकिस्तान में अाकर बसे थे, उसका नाम

आँपरेशन दुर्ग

है !"

लड़की की जुबान को जैसे लकवा मार गया था । कुछ बोलना तो दूर, पीड़ा से चीखना भी भूल गई थी वह ।



जेहन में ऐसा शोर गूंज रहा था जैसे एक ही रनवे पर सैकड़ों विमान दौड़ रहे हों । वह समझ नहीं पा रही थी कि इन लोगों को इतना सब कैसे मालूम हो सकता है ।


"हैरान रह गई न !" हाफिज ने वही कह दिया जो नीलिमा के दिमाग में चल रहा था-------" यह सोच-सोचकर होश फाख्ता हुए जा रहे हैं न कि हमें इंडियन सीक्रेट सेल के इतने राज कैसे मालूम हो गए ! जो कुछ मैंने कहा, क्या उसी से तुम्हें यह आभास नहीं हो गया है कि हमें सबकुछ मालूम हो गया है । बस एक बात को छोडकर ।"



"तुम हम पर बेजा इल्जाम लगा रहे हो ।" नीलिमा ने पूरी दृढता से कहा था…“जाने कौंन-से आपरेशन दुर्ग की बात कर रहे हो?"


“ये पूछो हमे क्या पता नहीं लगा है?"


"तुम्हें जो पता लगा है, गलत पता लगा है ।"


“तुम नहीं बता रहीं तो चलो, मैं ही बता देता हूं ।” हाफिज ने एक कश लगाने के बाद कहा था…“भरपूर कोशिश के बावजूद हम यह नहीं जान सके हैं कि अर्जुन कहां है मगर ये जानते है कि उसके बारे में सिर्फ तुम बता सकती हो । उसका पता बता दो । ईमान से, न सिर्फ तुम्हें आजाद कर देंगे बल्कि मुम्बई, तुम्हारे घर पहुचा देंगे ।"



"पता नहीं किस अर्जुन की बात कर रहे हो...आह ! आह !" शब्द चीखों में बदलते चले गए क्योंकि ठीक उसी समय हाफिज ने सुलगती हुई सिगरेट उसके नंगे बदन पर रख दी थी ।

और फिर, ये सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर रूका ही नहीं ।



हाफिज बार-बार कश लेकर सिगरेट सुलगाता और पुन: उसके जिस्म के किसी हिस्से पर रख देता ।



सवाल एक ही था…“अर्जुन कहां है?"

और जवाब भी एक ही था--"'मैं किसी अर्जुन को नहीं जानती ।”


जव तक सिगरेट खत्म हुई तब तक नीलिमा पर बेहोशी सी छाने लगी थी ।
हाफिज अपनी नाकामी पर भन्ना गया था । सिगरेट के अंतिम दुकड़े को उसने फर्श पर डालकर जूते से कुचला और दांत भींचने के साथ अपना चौड़ा हाथ अपने ही बालो पर लटकी नीलिमा की पतली गर्दन पर जमाता हुआ बोला---“धींगामुश्ती से काम नहीं चलेगा लड़की । पक्के तौर पर समझ ले कि मैं अपने सवाल, एक मात्र सवाल का ज़वाब तुझसे लेकर रहूंगा । दो घंटे देता हूँ । सोच ले, जवाब अपने जिस्म को बगेर कोई कष्ट पहुंचाए देना है या तब देगी जब मैं हॉकी जैसी उम्दा चीज तेरे जिस्म में घुसेड़ दूगा ।"



कहने के बाद भन्ताया हुआ हाफिज लुईस वहां से चला गया ।



नीलिमा न पूरी तरह होश में थी, न ही बेहोश । वह अपने जेहन को अपने अतीत में छलांग लगाने से न रोक सकी थी!

तव, नीलिमा एक ताजी खिली हुई कली थी । वह यूनिर्वसिटी के गेट के बाहर, सड़क पर खड़ी अपनी जगुआर के बोनट से पीठ टिकाए अर्जुन का इंतजार कर रही थी ।



उस वक्त उसने डेनिम की काली र्जींस और सफेद टॉप पहन रखा था ।


उसमें वह बेहद सुन्दर लग रहीं थी ।



अर्जुन फाइनल ईयर का अंतिम पेपर देकर बाहर निकला ।


उन दोनों का बचपन साथ गुजरा था । उनके पिता पुराने दोस्त थे और दोस्ती को रिश्ते में बदलने का फैसला कर चुके थे ।


नीलिमा अर्जुन को पसंद करती थी बल्कि यह कहा जाए तो गलत न होगा कि उससे प्यार करती थी !



प्यार तो अर्जुन भी करता था नीलिमा से लेकिन अभी शादी के लिए तैयार नहीं था ।


नीलिमा को देखते ही वह उसके करीब पहुंचा और सहज भाव से पूछा-"मेरा इंतजार कर रही हो?”



अर्जुन पर एक भरपूर नजर डालने के साथ उसने शिकायती लहजे में कहा था…“तुम्हारा इंतजार करने के अलावा मेरे पास और काम ही क्या है?”


“शिकायत कर रही हो?"


"शिकायत केैसी! मुझे अच्छा लगता है ।"


""क्या? "

"इंतजार करना----इस इंतजार में जो मजा है, तुम मर्द लोग उसे शायद ही कभी समझ सको ।"



" कितना फ़र्क है हम दोनों की बुनियादी आदतों में नीलम ।" वह नीलिमा को हमेशा नीलम ही कहता था…“तुम्हें इंतजार करना पसंद है और मुझे इंतजार करना सख्त नापसंद है । फिर भी हम जीवन-भर के रिश्ते में बंधना चाहते है ।"


"तुम्हारी कार कहां है?” नीलिमा ने बात बदली ।


“आज नहीं लाया । एक दोस्त के साथ चला आया था ।"


"मैं छोड़ दूंगी ।"


"थैक्स ! "


“बैठो ।”


अर्जुन कंडेक्टर सीट पर बैठ गया ।


नीलिमा कार को घुमाकर मेन रोड पर ले आई और एक्सीलेटर पर दबाव बनाती बोली…“तुमने फाइनल पेपर दे लिया है । कोई शक नहीं है कि पास हो ही जाओगे । उसके बाद ?"



अर्जुन गहरी सांस भरकर बोला---“अगर ये सवाल हमारे रिश्ते को लेकर है तो, तुम्हें अभी और इंतजार करना होगा ।"


नीलिमा ने सड़क नजर हटाकर गहरी नजरों से उसे देखा, फिर वापस सड़क को देखने लगी ।


"क्या फर्क पड़ता है ।" अर्जुन ने कहा…“तुम्हें तो इंतजार करना वैसे ही वहुत पसंद है?"


"हां ।"


“फिर भी डर गई?"


"यह डर तुम्हारे लिए है ।"


"मेरे लिए ! क्यों भला ?"


"क्योंकि तुम्हे इंतजार करना सख्त नापसंद है । फर्ज करो कि कभी तुम्हें मेरा इंतजार करना पड़ा तो क्या होगा !"



"तुम कहना क्या चाहती हो नीलम?" अर्जुन एकाएक बेचैन नजर आने लगा था ।

“कहना नहीं, पूछना चाहती है अर्जुन । हमारा यह रिश्ता बहुत पाक है । सबसे बडी बात, इस रिश्ते में कोई बाधा, कोई इम्तहान नहीं है, फिर भी मैं आशंकित हुं, क्योंकि मैंने अाज तक कभी इस रिश्ते को लेकर तुम्हारे अंदर वार्म फीलिंग्स महसूस नहीं की । आखिर क्या चल रहा है तुम्हारे दिमाग में ?"
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Re: गद्दार देशभक्त

Post by kunal » 01 Jul 2017 08:40

" मेरे जज्जातों पर शक मत करों नीलम । मैं भी तुम्हें उतना ही चाहता हूं जितना तुम मुझे ।” कहने के बाद मन-ही-मन बड़बड़ाया था वह…"या शायद उससे भी ज्यादा ।'


"तो लड़कियों जैसे नखरे की वजह?”


"सच बोलूं ?-"'


"वही सुनना चाहती हूं ।"


"सुन सकोगी ?"


"बचपन से खेलते आए हो मेरे साथ । इसके बावजूद नहीं समझ सके कि तुम्हारी नीलम कड़वे-से-कड़वे सच को बगैर हाजमोला की गोली इस्तेमाल किए हजम कर सकती है ।"


अर्जुन थोडा हंसा । बोला-----"सच कुछ ज्यादा ही कड़वा है ।"


"अजमाजो तो सही अपनी नीलम को!"



"डरता हु----अजमाने के चक्कर में कहीं तुम्हें खो ही न बैठूं ।"


“अजीब चक्करदार आदमी हो यार, खोना भी नहीं चाहते पाना भी नहीं । सारी जिदगी यूं ही त्रिशंकू वने रहोगे?"


"सुना है, कोई भी लड़की अपने ब्वॉय फ्रेंड से यह सुनना पसंद नहीं करती कि लह उससे ज्यादा किसी और से प्यार करता है !"



धक्क-से रह गया नीलिमा का दिल ।



कई पल के लिए जैसे वह धड़कना ही भूल गया था ।


पलक झपकते ही नीलिमा के दिमाग में दिल को तोड़ देने वाला मकड़जाल सा वन गया था । यह विचार जेहन से तूफानी झोंके की तरह टकराया था किं…"ये कया कह रहा है अर्जुन मुझसे ज्यादा किसी और को चाहता है! कौन है वो? मैंने तो आज तक इसके अास-पास किसी लड़की का साया तक नहीं देखा ।"



"क्या सोचने लगी?" अर्जुन के शब्दों ने मस्तिष्क को झंझोड़ा ।


वह हड़बड़ाकर बोली "क----कुछ नहीं । कुछ भी तो नहीं ।'"

"मैंने तो पहले ही कहा था, सच बहुत कड़वा है ।" अर्जुन फिर थोड़ा-सा हंसा था-“अभी तो कुछ वताया भी नहीं है । सिर्फ भूमिका बांधी है । बता दिया तो क्या हाल होगा!"


“क्या हाल होगा!" नीलिमा अपने अंदर के बंवडर को दबाए रखकर बिंदास अंदाज में बोली-----" मैं भी टाटा, बाय-बाय कर दूंगी तुमसे । मैं कौन सा घंटी बनकर तुम्हारे गले में लटकना चाहती हूं ! पापा से भी कह दूंगी और अंकल से भी-----जब अपना अर्जुन प्यार ही किसी और से करता है तो उसी से शादी कर दो इसकी । मेरी जिन्दगी क्यों बरबाद करते हो! वेसे भी, अब हम कोई बच्चे तो है नहीं कि हाथ पकड़कर चाहे जिसके साथ बांध दे । बालिग हो गए हैं । आखिर हमारी भी कोई मर्जी है ।”


"बिल्कुल ठीक ।"


"क्या ठीक?"



"जो तुमने कहा ।"


"नाम तो बता दो ।" पूछते वक्त नीलिमा का दिल जोर-जोर से उसकी पसलियों पर सिर पटक रहा था ।



अर्जुन ने पूछा-"किसका?”


"उसी का, जिसका जिक्र चल रहा है । जिससे प्यार करते हो ?"


"हिंदुस्तान ।"


नीलिमा चिहुकी----"किसो लड़के से प्यार करते हो क्या?"


" उसका दूसरा नाम भारत है ।"


"ये भी लड़के का नाम है, लड़की का नाम बताओं ना"


"इंडिया ।"


“हां ये हो सकता है लडकी का नाम । कहां रहती है?"


"वो कहीं नहीं रहती । हम सब उसमें रहते हैं ।"



नीलिमा ने सड़क से नजर हटाकर अर्जन को धूरा और धुरती ही रही । अर्जुन को कहना पड़ा-“सड़क देखो, एक्सीडेंट हो जाएगा ।"


"तुमने क्या कहा, मेरे छोटे से दिमाग में फिक्स नहीं हुआ ।" उसने वापस सड़क की तरफ़ देखते हुए कहा था ।


"मैंने ये कहा डार्लिग कि मैं मुल्क को, अपने देश को या अपने वतन को तुमसे ज्यादा प्यार करता हूं !”

"धत्त तेरे की ।" नीलिमा ने दोनों हाथ थोडे ऊपर उठाकर बापस स्टेयरिंग पर पटके…“तुमने तो यार गोबर कर दिया सारी बात का । मैं तो समझी थी कैटरीना से प्यार करने लगे हो, दीपिका पादुकोण को चाहने लगे हो या कंगना रनावत दिल में बस गई है ।"


"तुम जानती हो नीलम, लड़की के नाम पर मेरी जिदगी में तुम्हारे अलावा और कोई नहीं है !”



या मेरे रब्बा !" सारे डर खत्म होते ही मारे खुशी के नीलिमा की आंखें डबडबा गई थी----"गाड्री न चला रहीं होती तो इस वात पर थोबड़ा चूम लेती तुम्हारा और कई जन्मों तक चूमती ही रहती ।"
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Re: गद्दार देशभक्त

Post by kunal » 01 Jul 2017 08:40

"डर गई थी ना"


"हां । डर तो गई थी लेकिन...


"लेकिन ?"



"अपने देश से कौन प्यार नहीं करता! मैं भी करती हूं लेकिन मेरे तुम्हारे बीच ये मुत्क से प्यार कहाँ से आ गया? मैंने कब कहा कि अगर तुम मुझसे प्यार करते हो तो वतन से प्यार न करना ।"


“तुमने तो नहीं कहा मगर डरता हूं !"


"किस बात से?"


"कहीं तुम्हारे साथ कोई नाइंसाफी न हो जाए ।"


“मेरे साथ नाइंसाफी हो जाएगी! बो कैसे?"


"नीलम ।" एकाएक गम्भीर हुआ-“तुम तो जानती ही हो कि मेरे पिता देश की बडी इंटेलिजेंस के वहुत बड़े अफ़सर हैं । मुल्क के सच्चे सिपहसलार हैं ।"


" जानती हूं ।"


"मैं भी उन्हें की तरह मुत्क का सिपाही बनना चाहता हूं ।”


"मुझे खुशी होगी । लेकिन...


" लेकिन ?"



"कोई खास वजह?"


"जब मैं अखबारों में अातंकबादियों की करतूत पढ़ता हूँ या जव टीवी पर उनके द्वारा मारे गए के बेगुनाहों की फोटो देखता हूं । उस बरबादी को देखता हूं जो उनके बमों की होती है तो. . . ।" कहता कहता वह रुक गया । जोश की ज्यादती के कारण आवाज कांपने लगी थी !

नीलिमा ने एक वार फिर सड़क से आंखें हटाकर उसकी तरफ़ देखा और दंग रह गई क्योंकि उसे अर्जुन का चेहरा, चेहरा नहीं बल्कि दहकते ज्वालामुखी सा लगा था ! बडी मुश्किल से बस वह इतना ही कह सकी थी…“तो?"


"लोग जिन खबरों को पढ़कर अखबार एक तरफ़ फेंक देते है और चाय-बिस्कुट उड़ाने लगते हैं, उन खबरों को पढ़कर मेरा खून खेलने लगता है ।" ज्वालामुखी के अंदर से शब्द लावा बनकर निकलने लगे थे…“मैं अपनी मां-भारती के लिए तड़पने लगता हूं ! आज इस मुल्क में हर तरफ़ घना कोहरा छाया हुआ है । चारो तरफ अंधेरे के अलावा और कुछ भी नहीं दिखता । भारत-माता की कराह किसी को भी सुनाई नहीं देती । हर नौजवान बस खुद ही की तरक्की करने के लिए दौड़ा चला जा रहा है । किसी को इस बात की परवाह नहीं है कि हमारा मुल्क रो रहा है-तड़प रहा है-सिसक रहा है । इस मुल्क के आंसू किसी को क्यों नजर नहीं आते और. . और ।" इतना कहकर वह बुरी तरह हांफने लगा था ।


नीलिमा ने एक बार फिर पूछा…"और ?"



"और मेरी समझ में यह नहीं आता कि ऐसा मेरे ही साथ क्यों होता है? किसी और के साथ क्यों नहीं होता ?"


"मैं बताऊं ऐसा तुम्हारे ही साथ क्यों होता है?"


“त. . .तुम ?" उसने आश्चर्य से पूछा--"' तुम बता सकती हो ?"



"क्योंकि तुम्हारी रगों में पुश्तैनी देशभक्तों का खून बह रहा है अर्जुन ।” नीलिमा कहती चली गई…“तुम्हारे दादा जी परमवीर चक्र विजेता थे । दुश्मन के सात टेंक ध्वस्त करने के बाद दम तोड़ा था उन्होंने और तुम्हारे पापा भी इंटेलिजेंस में हैं । वहां वे भी वही काम कर रहे है तुम्हारे दादा जी ने किया था ।"


" श......शायद तुम ठीक कह रही हो । शायद इसीलिए मेरे अंदर से भी बार'-बार एक सिपाही बनने की आवाज अाती है । दिल चाहता है कि देश में धमाके करने वालो के परखच्चे उडा़ दूं !”


"उड़ा दो ।"


"क. . क्या?" अर्जुन सकपकाया ।

“देश के दुश्मनों के परखच्चे उड़ा दो । बन जाओ मुल्क के सच्चे सिपाही । आदमी को वही बनना चाहिए अर्जुन जो बनने की आवाज उसके अंदर से आ रही हो । अपने अंदर की आवाज सुनने के अलावा इंसान को किसी और की आबाज नहीं सुननी चाहिए ।"


“य.. .ये तुम कह रही हो?"


"हां । मैं कह रही हूं ! तुम्हारी नीलम ।"


“उस राह में मैं कुर्बान हो सकता हूं !"


"तो तुम्हारी चिता की राख भर लूंगी अपनी मांग में ।"


अर्जुन के मुंह से चीख-सी निकल गई-----“न..............नीलम ।"

"इसीलिए डरते हो ना इसीलिए टाले जा रहे हो न शादी को कि कहीं किसी दिन तुम्हें तुम्हारा देश न बुला ले और तुम्हारी नीलम विधवा न हो जाए! यहीं डर दुविधा में फंसाए हुए है न तुम्हें!"


इस बार अर्जुन कुछ बोल न सका । नीलिमा की तरफ इस तरह देखता रहा जैसे गाडी़ ड्राइव करती उस लड़की ने सड़क की तरफ़ देखते-देखते उसके दिल में लिखी हर इबारत पढ़ ली हो ।


“वेसे तो यह कोई तर्कपूर्ण बात न हुई अर्जुन कि तुम इस डर से शादी ही मत करों कि एक दिन वतन पर शहीद न हो जाओ ।" नीलिमा कहती चली गई…"सिपाही क्या शादी नहीं करते! शहीद क्या घर नहीं बसाते! बसाते है----तुम्हारे दादा ने बसाया, तुम्हारे पिता ने बसाया । तभी तो देश को तुम्हारे पिता और उसके बाद तुम जैसा देशभक्त मिल सका लेकिन इस तर्क के साथ मैं तुम्हें खुद से शादी करने के लिए विवश नहीं करूंगी । वादा करती हूं-----तब तक तुम्हारे सामने शादी का नाम तक नहीं लूंगी जब तक तुम्हारे दिल से यह खौफ़ नहीं निकल जाएगा कि मैं विधवा हो सकती हूं !"



“थ. . .थेंक्यू।" अर्जुन की आंखें भर आई----“थेंक्यू नीलम ।"


“पर एक बात बताऊं?”


“बोलो ।"


"" मुझसे शादी करके फायदे में रहते ।"


“ कैसे?"


"एक ज्योतिषी ने वताया था कि मेरे हाथ में वो लकीर है जो बताती है कि मैं अंतिम सांस तक सुहागिन रहूंगी । जब चिता पर लिटाई जाऊंगी तो मेरे माथे पर बिंदी होगी, मांग में सिंदूर होगा ।"
"त. . .तुम तो मजाक करने लगीं ।"


"यह मजाक नहीं है गधे, और. ..


"और ?"


"एक फैसला मैंने भी कर लिया है ।"



" क्या ?"



"मैं भी सिपाही बनूंगी ।"


"'क.....क्या?” अर्जुन उछल पड़ा ।


"डंक मार दिया क्या बिच्छु ने?"


""य. . .ये तुम क्या कह रही हो नीलम! पागल हो गई हो क्या? तुम एक ऐसे पिता की इक्लोत्ती वेटी हो जिनका अरबों-खरबों का कारोबार सारे भारत में फैला हुआ है । तुम्हें उनका व्यापार संभालना है । वे क्या तुम्हें नौकरी करने देगें ?"



"इतनी जल्दी भूल गए! मैंने कहा था कि इंसान को अपने दिल की आवाज के अलावा किसी की आवाज नहीं सुननी चाहिए और अब . . .जो मेरे दिल ने कहा, वह मैंने तुम्हें बता दिया ।"
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Re: गद्दार देशभक्त

Post by kunal » 01 Jul 2017 08:40

"नीलम, जज्वातों में मत बढ़ो ।"


“वो इंसान ही क्या जो जज्वातों की गंगा में न नहाए, और...


" और ?"


"मैं पापा को मना लूंगी ।"


"खुद को सिपाही बनने देने के लिए?"


"हां ।"


"कैसे ?"


"मेरे पास तर्क है ।"


“कैसा तर्क? "


"पापा मुझे अक्सर बताते हैं कि शुरू-शुरू में उनकी और मम्मी की बिल्कुल नहीं बनती थी । अवसर तकरार हो जाया करती थी । तकरार का कारण था-क्रिकेट । पापा को क्रिकेट का वहुत शौक था । जब मैच आता था तो वे सारे काम छोड़कर टीवी से ही चिपके रहते थे और मम्मी को क्रिकेट के वारे में एबीसीडी भी मालूम नहीं थी ! वे पापा के टीवी से चिपकने पर झुंझलाती थी । तब पापा ने कहा था कि-"पति पत्नी का रिश्ता तभी खुशगवार बना रह सकता है

जव दोनों एक दूसरे की रुचियों में रमें, उनमें दिलचस्पी लें तब मम्मी ने कहा था…"जब मुझे क्रिकेट के वारे में कोई जानकारी ही नहीं है तो मेच में केैसे दिलचस्पी लूं ?" तब पापा बोले------" क्रिकेट के बारे में नॉलिज लो ।" और,मम्मी की समझ में बात आ गई । वे क्रिकेट में दिलचस्पी लेने लगीं । पाप के साथ मैच देखने लगी और जल्दी ही पापा के साथ क्रिकेट पर बात करने लगी । तकरार बंद हो गई । दोनों की लाइफ़ खुशगवार हो गई ।"



"ये सब क्या कह रही हो तुम"


"जब मैं पापा को बताऊंगी कि अपनी लाइफ़ को खुशगवार बनाने के लिए मैं इसलिए सिपाही बनना चाहती ३ क्योंकि मेरा अर्जुन सिपाही बनना चाहता है तो कैसे इंकार कर सकेंगें वे ? कौन-से तर्क के साथ मुझे सिपाही बनने से रोकेंगे ?"


अर्जुन का मुंह खुला जरूर लेकिन कहने के लिए कुछ सूझा नहीं ।


वही बोलीं…“तुम्हें तो लकवा मार गया यार !"


"सिपाही बनना इतना आसान भी नहीं है ।" उसने कहा ।


"मुश्किल काम करने का ठेका क्या तुम्हीं ने उठा रखा है?”


"मतलब? "


"मैं क्या पढ़ी लिखी नहीं हूं ? तुमसे एक ही क्लास तो पीछे हूं और नम्बर भी तुमसे कोई खास कम नहीं अाते और फिर मेरे होने वाले ससुर साहब इतने बड़े इंटेलिजेंस अफ़सर हैं । क्या वे मेरे कहने पर डिपार्टमेंट में छोटी-सी नौकरी भी नहीं देगें ?"


“पापा को यह हरगिज मंजूर नहीं होगा ।"


"मेरा सिपाही बनना?"


“हां ।"


"मुझे तुम्हारा चेलेंज कबूल है । तुम्हारे पापा को मेरी जिद पूरी करनी पड़ेगी । और मेरा तुमसे वादा है, तुम्हें भी मुझसे कोई शिकायत नहीं होगी । मुल्क के लिए अपने हर मिशन पर एक मजबूत चट्टान की तरह मुझे हमेशा अपने साथ खड़ी पाओगे ।"


“य . . .यह नहीं हो सकता नीलम---- कभी नहीं हो सकता ।"


"अब तो यह होकर रहेगा मेरे साजन, समझ तो कि आज से मेरी जीवनधारा बदल चुकी है । अब मैं तुम्हारे लिए जीऊंगी औऱ मुल्क के लिए अपनी जान गंवा दूंगी ।"



नीलिमा के दिमाग में उस वक्त अपने ही शब्द गूंज रहे थे जव एक हॉकी के 'यू-शेप' वाले सिरे ने उसकी ठोडी़ ठकठकाई और कानों में अमजद की आवाज पड़ी…"क्या सोचा?"
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