रहस्य के बीच complete

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Rohit Kapoor
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रहस्य के बीच complete

Post by Rohit Kapoor » 09 Jul 2017 09:17

रहस्य के बीच

हर ओर जैसें खून की बरसात हो रही थी । रहस्यों का गहराता जाल हर पल कसता जा रहा था और दुनिया कै सभी महान जासूस इस जाल मे फंसे तड़प रहे थे । बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं था ।


कही बिकास अकेला ही उन रहस्यों को भेदने का प्रयास कर रहा था तो कही विजय लेकिन मौत का यह सन्नाटा हर बीतते पल के साथ और भी गहरा होता जा रहा था ।


वेदप्रकाश शर्मा की जादुई कलम से निकला......

हारॅर स्टोरी

विजय विकास सीरिज

रहस्य के बीच



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Rohit Kapoor
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Re: रहस्य के बीच

Post by Rohit Kapoor » 09 Jul 2017 09:17

सन् 1955 की 5 जनवरी।


पांच जनवरी की कडकड़ाती हुई सर्द स्याह रात ।

गर्जना करते हुए बादल, प्रकोप दिखाते हुए मेघ, चमचमाती हुई बिजली और तीव्र हवा के झक्कड़ इस स्याह रात को मौत-सी भयंकर बना रहे थे ।


बात है श्मशानगढ़ की ।


श्मशानगढ़ ।


एक ऐसी स्टेट जो पूर्णतया अपने नाम के समान गुण वाली थी, अर्थात् श्मशान से भी अधिक भयानक । वहां रात का आगमन होते ही मानो साक्षात मौत सड़क पर नृत्य करती थी ।


बिजली चमकी l


पलभर के लिए प्रकाश से वातावरण जगमगाया ।


इस एक ही पल के प्रकाश में पेडों के झुरमुट मेँ बनी वह दैत्याकार हवेली ऐसे चमकी मानो कोई खतरनाक डायन अपने शत्रु क्रो डसना चाहती है ।


प्रत्येक चमक के साथ दैत्याकार हवेली चमकती और वातावरण के डरावनेपन मेँ चार चांद लगा देती ।


उस दैत्याकार हवेली के एक कमरे मे एक बिस्तर पर दो प्राणी गहरी नींद के आगोश में थे ।


पहली एक युवती जो चेहरे से पैतीस वर्ष के लगभग लगती थी और दूसरा था उसका बच्चा जो आठ बर्ष का लगता था ।

गर्म रुई की रजाई में उनके चेहरों के अतिरिक्त सम्पूर्ण जिस्म लिपटा था लेकिन फिर भी बच्चे को शायद सर्दी लग रही थी क्योंकि बच्चा वार-बार कुलबुलाता तथा अपनी मां के वक्षस्थल में समाकर उसकी गर्मी प्राप्त करने की चेष्टा करता ।


मां ने उसे बांहों मेँ भरकर अपने आंचल मेँ छुपा लिया था ताकि उसे और अधिक सर्दी न लग सके ।


सहसा एक धीमी…सी आहट हुई दरवाजा खुला ।


तभी जोरदार गड़गड़ाहट के साथ बिजली र्कोंधी ।


दरवाजे पर एक डरावनी शक्ल-सूरत का व्यक्ति नजर आया । चेहरे पर भयानक भाव थे । दहकती सुर्ख आंखों से झांकती राक्षसी हवस । उसकी आंखें मानो इंसानी लहू की प्यासी थीं । होंठों पर क्रूरतम मुस्कान तथा नथुने फड़क रहे थे । जबड़े कुछ सख्ती के साथ मिंचे हुए थे । जिससे चेहरे की एक…एक हड्डी स्पष्ट चमक रही थी ।


क्षण मात्र के प्रकाश मेँ वह दरवाजे के बीचों बीच खड़ा किसी दानव से किसी भी प्रकार कम नहीं लग रहा था । अब भी रह…रहकर जब बिजली कौंधती तो वह किसी दैत्य के समान डरावना लगता था ।


उसकी दैत्याकार आकृति दरवाजे से हिली । वह कमरे के अंदर दाखिल हुआ तथा पलंग की ओर बढा ।


नाइट बल्ब के मद्धिम प्रकाश मेँ वह कोई खूनी भेडिया लग रहा था । उसकी लाल आंखें इस प्रकाश से और भी लाल हो गई थी । आंखों में एक हवस थी, इंसानी लहू की प्यास, खूंखार तरीके से वह पलंग की और बढ रहा था ।

उसके सीधे हाथ मे तलवार थी, एक चमचमाती तलवार ।।


वह आगे बढ़ रहा था, निरंतर पलंग की ओर ।


बादल गरजे तथा फिर-बादलों की गरजना के साथ वह युवती तथा तथा उसका पुत्र हड़बड़ाकर उठ गए और तभी उनकी नजर कमरे मेँ उपस्थित भयानक व्यक्ति पर पडी ।


उनके कंठ से चीख निकल गई ।



बच्चा अपनी मां के सीने से लग गया ।


लेकिन उस भयानक व्यक्ति पर इस बात का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ा । उसके चेहरे पर उसी प्रकार खूंखार भाव, वही क्रूरता, वही हवस झलक रही थी ।



तलवार सम्भाले वह निरंतर उन्हीं की ओर बढता रहा l सहसा वह युवती जैसे उसे पहचान गई थी, वह बोली-“आप यहां?"



लेकिन वह कुछ नही बोला, उसी प्रकार भयंकर तरीके से उनकी ओर बढता रहा ।



"हाँ, मैं यहाँ?" वह बोला…" कमीनी, कुतिया, मैं तुम दोनों के लहू का प्यासा हू । मैं तुम्हारे खून से अपनी आत्मा को तृप्त करूंगा । तुम्हारे मीठे लहू का आनंद लूंगा । हा. . .हा . . हा . . . l" कहने के बाद उसने अट्टहास लगाया ।



अट्टहास ने सर्द तूफानी रात के वातावरण को झिझोड़ दिया । ऐसा लगा मानो अनेक आत्माएं मिलकर खिलखिला रही हों I


मां और पुत्र कांप गए । उन्हें लगा उनके सामने खड़ा कोई जीवित व्यक्ति नहीं है बल्कि कोई प्रेतात्मा है । मौत और भय को परछाइयां उनकी आंखो में तैरने लगीं ।

उसने अपने बच्चे को और भी अपने आगोश में छुपा लिया और फिर साहस बटोरकर गिड़गिडाई----" नहीँ...नही...हमेँ क्षमा कर दीजिए. . .अ. . .अ. . . I” अभी वह कह भी नही पाई थी वह फिर भयानक तरीके से हंसा । उसकी हंसी इतनी भयानक थी कि स्वयं भयानकता भी कांप जाए ।



"बडा पागल है वो जो तुम्हारे मीठे लहू का आनंद न ले I” वह उसी प्रकार आगे बढता हुआ भयानक स्वर में बोला ।


“इस.. .बालक का ल. . हू . . .अ…अ I”


फिर वह आगे कुछ न कह सकी ।


बिजली कौंधी ।


उसके हाथ की तलवार लहराई ।


खच ।


एक जोरदार चीख से वातावरण झनझनाया ।


क्षण मात्र में सिर धड़ से अलग हो गया ।


गर्म लहू की बौछार, तृप्त खून का फव्वारा तथा उबलते रक्त की धारा एकदम निकली और वह हवस का पुजारी झपटा गर्म लहू की प्यास बुझाने के लिए और तीव्रता से धारा के रूप में बहते लहू को वह ओक से पीने लगा ।


वह लहू पर ऐसा झपटा था मानो वर्षों का प्यासा हो ।


तभी दूर कहीं ।


कोई कुत्ता रोया ।


उल्लू बोला ।


चमगार्दड़ चिल्लाए । लेकिन वह भयंकर राक्षस लहू पीकर अपनी प्यास बुझा रहा था ।

उसका सारा चेहरा और हाथ लहू से सन गए थै I

इस समय वह राक्षस लग रहा था । भयानक व्यक्ति, खूंखार लहू का प्यासा, लहू से सना उसका चेहरा भयंकरता की चरम सीमा को स्पर्श कर गया था ।



उसने अधिक खून नहीं पिया । शीघ्र ही हट गया तथा भयानक तरीके से बालक की ओर देखा ।


“नही.. .नही. . . I” वह बालक भय से पीला पड़ गया था ।


"तेरा खून इस कुतिया से ज्यादा गर्म होगा बदजात I” वह भयानक तरीके से बालक की तरफ़ बढ़ता हुआ बोला ।



बालक सिसका, बिलबिलाया, रोया, बिलखा लेकिन उस राक्षस पर किसी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा बल्कि उसी प्रकार की भयानक हंसी के साथ वह बालक की तरफ़ बढा ।


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Re: रहस्य के बीच

Post by Rohit Kapoor » 09 Jul 2017 09:18

झन्न . . .न . . .न



तलवार फिर लहराई ।


फिर खच की एक आवाज ।


एक मासूम की करुण चीख ।


तथा पलभर में सिर से धढ़ अलग हो गया ।


उसने एक किलकारी मारी, जो मासूम बालक के गर्म खून को देखकर उसकी प्रसन्नता की परिचायक थी । वह किलकारी के साथ झपटा तथा उसने खून से ओक लगा दी ।


अगले ही क्षण वह उस गर्म खून को बड़े चाव के साथ पी रहा था ।


जब वह सम्पूर्ण खून पी गया तो भी मानो उसको प्यास न बुझी थी । वह पागलों की भांति झपटा तथा अपनी जीभ से फ़र्श पर पड़े लहू को कुत्ते की भांति चाटने लगा ।



यह मानव था या राक्षस अथवा कोई प्रेतात्मा?

@@@@@@@@@@@@@@@@@@
ज्यों ही युवती को तलवार लगी कई काम एक साथ हुए I


पहला-क्षण मात्र में घड और सिर का नाता टूट गया ।


दूसरा-वह निर्जीव हो गई ।


लेकिन क्यों?



वह निर्जीव क्यों हो गई?



सिर और धड़ के अलग होते ही, उसके दिल की धड़कने बंद हो गई । सीने मेँ फंसी रूह एक तीव्र झटके के साथ बाहर आई I इस रूह के शरीर से पृथक होते ही वह निर्जीव हो गई l सिर कटना उसके निर्जीव होने का वास्तविक कारण नहीँ था बल्कि वास्तविक कारण था इस रूह का शरीर त्याग देना । रूह उस शरीर मेँ नहीं रह सकती जो अस्वस्थता की सीमा से निकल गया हो और यही कारण उस युवती की मृत्यु का था । जैसे ही धड़ सिर से अलग हुआ, शरीर आत्मा के निवास के योग्य नहीं रहा । और आत्मा ने उसके शरीर क्रो त्याग दिया । इधर आत्मा ने शरीर'को त्यागा ।



आत्मा एक गोले के रूप में बाहर आईं, वह तेर्जी के साथ घूम रही थी ।



मानव आत्मा एक छोटे-से गोले के रूप में थी । वह अत्यंत तीव्रता के साथ वायुमंडल में घूम रही थी ।



उस समय हवस का वह पुजारी युवती का खून पी रहा था । आत्मा के अंदर प्रतिशोध की भावना थी । भयानक प्रतिशोध की ज्वाला उसके सीने में धधक रही थी ।

बदले के शोले उफन रहे थे । यह आत्मा अपने शरीर की मौत का बदला लेना चाहती थी इस भयानक इंसान से, लेकिन?



लेकिन यह असहाय थी, मजबूर थी । बिना किसी शरीर के वह आत्मा अपना प्रतिशोध पूरा नहीं कर सकती थी । बिना शरीर की वह आत्मा इस भयानक व्यक्ति की तो बात ही क्या एक बालक को भी हानि पहुंचाने में असमर्थ थी ।



कुछ देर तक आत्मा कमरे मेँ ही घूमती रही ।


कुछ काल तक आत्मा भटकती रही लेकिन जब रास्ता न मिला तो एक खिडकी का शीशा हल्का-सा चटक गया और आत्मा वायु के रूप में बाहर के तूफानी वातावरण में आ गई ।



तीव्र हवा के झक्कडों के साथ आत्मा इधर-उधर लहराई । तीव्रता के साथ घूमी और फिर वायु के वेग के साथ बहती चली गई । इस आत्मा में उस युवती के समस्त विचार, भावनाएं तथा इच्छाएं आदि अभी तक सुरक्षित थे तथा वह उडी चली जा रही थी । आत्मा की अपनी कोई शक्ति नहीं थी । वह तो पूर्णतया वायु के वेग पर निर्भर थी ।



वह उडती जा रही थी, उड़ती गई और उड़ती ही चली गई ।



अंत में । लगभग साठ मिनट पश्चात ।



वायु के साथ भटकती हुई वह एक विशाल बूढे पीपल के वृक्ष के विशाल तने से टकराई-तने में चिपकी आत्मा रेगी ।



फिर सबसे अंत मे ।



वह आत्मा उस पेड़ के विशाल तने में बने एक बड़े गोलाकार छिद्र में समा गई l पीपल का वृक्ष भीतर से खोखला था तथा आत्मा वृक्ष के भीतरी खोखले भाग मेँ भटक रही थी ।



युवती की वह आत्मा उस वृक्ष मेँ कैद होकर रह गई ।

ठीक इसी प्रकार l बालक की आत्मा ने भी शरीर त्यागा ।

उस बालक की प्रतिशोध की ज्वाला अपनी मां की आत्मा से अधिक तीव्र थी । क्योंकि अभी इस आत्मा को बालक का यह शरीर बहुत प्रिय था और आत्मा उसे त्यागने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नही थी ।


बदले की आग चाहे कितनी भी तीव्र क्यों न थी लेकिन बिना किसी शरीर के तो आत्मा किसी का कुछ बिगाड ही नहीं सकती थी ।



अत: मजबूर वह आत्मा भी पहले से ही 'क्रैक' हुए शीशे के रास्ते से तूफानी रात मेँ वायुमंडल में आ गई ।



वह भी हवा के झक्कडों के साथ इधर-उधर लहराई, घूमी तथा घूमती हुई वेग के साथ तीव्रता से आगे की तरफ उडी चली गई ।


काफी समय तक वायुमंडल मेँ इसी प्रकार भटकने के पश्चात ।


अंत मेँ l


इस बालक की भटघन्ती हुई आत्मा एक झोंपडी कै बंद दरवाजे की दरार में से झोंपडी में प्रविष्ट हो गई I


झोपडी में एक तेल का लेम्प टिमटिमा रहा था ।


लैम्प का जर्जर पीला प्रकाश झोंपडी में फैला हुआ था तथा झोंपडी में किंहीं दो व्यक्तियों की सांसें तीव्रता से चलने की ध्वनि गूंज रही थी ।
झोंपडी में सिसकारियों का साम्राज्य था ।

एक टूटी-फूटी-सी खाट चरमरा रही थी l



यह कोई नवविवाहित जोड़ा था जो संसार के सर्वोत्तम सुख में डूबे इस सर्द रात्रि की सर्दी से बचने का उपाय कर रहे थे ।



वे एक…दूसरे में डूबे जा रहे थे ।



एक…दूसरे में समाना चाहते थे ।



बालक की आत्मा इसी झोंपडी के वायुमंडल में चक्कर लगाने लगी ।


और फिर ।


सबसे अंत मेँ ।


बालक की वह आत्मा वायु के साथ सांस के माध्यम से संभोग करती उस युवती के शरीर में चली गई तथा वहीँ कैद होकर रह गई ।


रात की भयंकरता में किसी प्रकार कभी न आई थी ।



फिनिश


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Re: रहस्य के बीच

Post by Rohit Kapoor » 09 Jul 2017 09:19


रहमान ।।


बंगला सीकेट कोर का एक जांबाज जासूस ।



यूं तो यह केवल बीस वर्ष का नवयुवक था । लेकिन बीस बर्ष का यह नवयुवक विजय की उम्मीदों से कही अधिक खतरनाक साबित हुआ था । 'पाकिस्तान का बदला' वाले केस मे बंगला सीक्रेट कोर की ओर से बिजय की सहायता के लिए उसे भेजा गया था और जब वह बिजय से मिला तो खूनी ब्लैक दिसम्बर के एजेंटों की रायफलॉं में साए में था I



लेकिन जब बिजय ने रहमान को चमत्कारी ढंग से स्वयं को बचाता देखा तो विजय दांतों तले उंगली दबाकर रह गया ।

विजय तभी जान गया था कि रहमान बहुत कुछ कर सकता है ।



रहमान विजय को गुरु मानता था और उसका बहुत आदर करता था । रहमान एक ऐसा नौजवान था जो पाक-बंगता के बर्बरतापूर्ण युद्ध मेँ सिर से कफ़न बांधकर कूद गया था। रहमान की प्यारी बहन की इज्जत पाकिस्तानी भेडियों ने सरे…बाजार नीलाम की थी । मां के स्तनों से अपनी संगीने रंगी थीं, बूढे बाप के जर्जर जिस्म को गोलियों से छलनी कर दिया था तथा एक मासूम छोटे माई को संगीनों की नोक पर रखकर जीवित धधकती हुई आग मेँ धकेल दिया और फिर उसकी आंखों में खून उतर आया था । बीस वर्ष का वह युवक इतना खतरनाक हो उठा कि उसने पाक सेना की टुकड्रियां की टुकडियां मौत के मुंह में झोंक दी थीं । लेकिन फिर भी पाकिस्तानियों के विरुद्ध उसके सीने में जलती प्रतिशोध की ज्वाला कम न हुईं और शायद जीवन-भर कभी कम भी नहीं होगी ।



वह यूं ही सिर पर कफ़न बांधे युद्ध में लड़ता रहा था और अपने बंगला देश को एक आजाद देश बनाया था ।



बंगला से बंगला देश बनते ही बंगला को एक जासूसी संस्था बनानी आवश्यक हो गई तथा बंगला के अधिकारियों ने "बंगला सीक्रेट कोर" का चयन किया और रहमान बंगला देश की इसी जासूसी संस्था का सर्वश्रेष्ठ जासूस था ।



युद्ध के पश्चात पाकिस्तान की एक संस्था "पाकिस्तान का बदला" के पतन हेतु उसे 'बंगला सीक्रेट कोर' की ओर से भारत विजय के पास भेजा गया था ।

पाकिस्तान का बदला वाले केस में रहमान ने बिजय के कंधे-से-कंधे लड़ाकर कार्य किया तथा बिजय जान गया कि रहमान एक श्रेष्ठ जासूस बन सकता है और यही कारण था कि उसने रहमान को फिलहाल बंगला देश नहीं भेजा । उस समय से वह रहमान को जासूसी के एक-से-एक दिग्गज दांव-पेच सिखाता रहा ।


वैसे रहमान तो काफी दिलचस्प भी था । विजय उसके साथ बोर नहीं होता था । और उसे अपनी बकबास करने का पूर्ण मसाला मिल जाता था और वही क्रम अब भी चल रहा था ।



विजय कह रहा था-"तो चेले मियां, अगर आज के बाद तुमने हमारी शान में गुस्ताखी की तो. . ॰ I"



"गुरू मेरा मतलब कुछ और ही था ।" गम्भीर स्वर में वह बोला ।


“क्या मतलब था?"


"मैं झकझकी सुनना चाहता था ।"


"बदतमीज?” विजय एकदम किसी क्रोधी साधु की भांति चीखा ।



"अब क्या हुआ गुरुदेव? "



"तुम झकझकी का अपमान करते हो I"



“ऐसी तो कोई बात नहीं हे गुरु जी I”


“अबे झकझकी सुनने की इच्छा क्रो इस प्रकार व्यक्त करना सरासर झकझकी का अपमान करना है । अगर झकझकी सुनना चाहते हो तो कहना चाहिए झकझकी बोर वस्तु है l”



"आपकी आज्ञा, सिर…आंखों पर गुरुदेव ।" रहमान सिर हिलाकर किसी आज्ञाकारी शिष्य की भांति बोला ।

"फलो-फूलो मेरे बच्चे?"



"तो गुस्वेव, झकझक्री से बोर चीज इस संसार में नही है I»



"अबे ओ बुद्धिमान गुरु के मूर्ख चेले, जुबान सम्भाल के बात कर जानते नहीं हो तुम झकझकिर्यो के सम्राट मुनि श्री 100008 यानी बिजय दी ग्रेट के सामने बेठे हो I तुम हमारे सामने हमारी साहित्यिक क्षेत्र में की गई एक नई खोज 'झकझक्री' को बोर कहते हो I”



"मेरा मतलब.. . I"



"बको मत, मेरी बात अभी समाप्त नहीं हुई है ।" विजय बीच मेँ ही चीखा…“तुमने हमारी झकझक्री का अपमान किया है । अत: हम तुम्हारे सामने अब एक निहायत ही स्वच्छ साहित्यिक झकझक्री पेश करते हैं I"



और रहमान नादान चेले की भांति गर्दन उठाए विजय क्रो देखता रहा तभी विजय ने जो झकझक्री सुनाई वह कुछ इस प्रकार थ्री…



"मेरे घर पर आए मियां रहमान कहने लगे-मान न मान मैं तेरा मेहमान । गरीबी मेँ आटा गीला, मेरी निकल गई जान l उसकी सुनते-सुनते मेरे पक गए कान । "



“मजा नहीं आया गुरु I” रहमान अजीब-सा मुंह बनाकर बोला ।



"अबे तो फिर दूसरी सुन I"



"ठहरो गुरू ।”



"बको चेले!"


"एक झकझक्री मेरी भी ।"

"अबे ओ मिस्टर मेहमान ।"



"मेहमान नहीं गुरु, रहमान I"



“हां . .हां. . .मैं कोई कह रिया था…बात ये है क्रि झकझक्री तो जरूर सुनाओ, लेकिन अपने गुरु की इज्जत बचा के I"



“हां तो गुरूदेव, पेशेखिदमत है ।" रहमान ने कहा तथा’ निम्न झकझकी सुनाई ।।


"आरती करो गुरन्देव की । सफाई करो उनकी जेब की । भेट चढाओ एक सेब की । भैंस है ये बलदेव की I”



"शाबाशा चेले मियां I" विजय उसकी पीठ ठोकता हुआ बोला-"वाह बेटा रहमान । आज हम जान गए कि हमारे बाद भी हमारा नाम रोशन करने वाले कोई हैं?"



और रहमान सीना फुलाकर कुछ इस प्रकार अकड़ गया कि मानो उसे संसार के सबसे अधिक बुद्धिमान की उपाधि दे दी गई हो ।



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Re: रहस्य के बीच

Post by Rohit Kapoor » 09 Jul 2017 09:19


बिजय अभी कुछ कहना ही चाहता था, कि पूर्णसिंह ने कमरे में प्रवेश किया तथा उसे देखकर विजय फिर बोला…“कहो बेटा पूरे शेर यानी सड़े हुए बेर, क्या हाल हैं?"



"साहब, ये चिट्रिठयां अभी-अभी डाकिया दे गया हैं ।” पूर्णसिंह ने अपने हाथ में पकड़े दो लिफाफों को आगे बढाते हुए कहा ।



"मेज पर रख दो ।" विजय ने सतर्कता के साथ कहा ।



पूर्णसिंह चला गया ।



सम्पूर्ण सतर्कत्ताओं को ध्यान मे रखते हुए उसने वे लिफाफे खोले यह उसके दुश्मनों का कोई फ्रेंड नही था बल्कि लिफाफे थे ।


“चेले मियां ।"


“यस गुरुदेव! "



"इन्हें बांचो!"



"बांचो? "


" यानि पढो !"


“ओं l"


"जोर-जोर से I"



"जैसी आज्ञा गुरूदेव I” रहमान ने कहा तथा पहला पत्र पढने लगा ।


लिखा था…



"प्रिय दोस्त विजय?

आज तुम एक अजनबी का वह का पढ़कर आश्चर्यचकित होगे । लैकिन दोस्त सबसे पहलें मैं तुम्हें अपना परिचय दै दु तो अच्छा हैं शायद तुम मुझे न पहचानते ही लेकिन मैं तुम्हें ध्यान दिलाने का प्रयत्न करता हूँ । मैं इंटर में तुम्हारे साथ पढा था और मेरा नाम राजीव है ।


अब तो शायद मुझे पहचान गए होगे ।

प्रिय दोस्त; हमारी स्टेट श्मशानगढ में आजकल ऐसी-ऐसी भयानक वारदातें हो रही है कि श्मशानंढ़ पह्रलै तो रात में ही श्मशान नजर आता था लोकेन अब दिन में भी यही
हाल है । मुझे तो विश्वास नही हो रहा है कि जो अफवाहें यहां फैली हुई हैं क्या उनमें एक प्रतिश्त भी सच हो सकती है ।।

कहतें हैं कि श्मशानगढ़ आत्माओ भूतो-प्रेतों और राक्षसों की स्टेट है I यहाँ मानव नहीं रह सकता । रात होते ही यहां प्रेतात्माओं की अजीबोगरीब लीलाएँ प्रारम्भ ही जाती हैं । एक सुंदर लड़की हर रात को श्मशानगढ़ की सडकों पर नजर आती है, लोग उससै भयभीत हैं I कहते हैं वह रूह है…भटकती हुई रूह यानी प्रेताआत्मा I


विजय, शायद तुम मुझे पागल समझो क्योकि में अब एक ऐसी बात लिखने जा रहा हू…जिस पर हम जैसै आथुनिक़ व्यक्ति कभी विश्वास कर ही नहीं सकता ।


बडी ही अजीबोगरीब उलझनपूर्ण वारदातें यहां तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं I


तुम्हें पत्र लिखने की आवश्यकता इसलिए पडी क्योंकि यहां हर रोज आत्माओं द्वारा यह धमकी दी जा रही हैं कि स्टेट कै राजा कै खानदान कै एक एक व्यक्ति को तडपा तडपा कर मौत दी जाएगी I



आज से अट्रठारड वर्ष पूर्व 5 जनवरी, 1955 को यहाँ स्टेट की एक रानी तथा उनके बच्चे की इतनी निर्मम हत्या की गई कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता I हत्यारे ने उनका खुन तक पी लिया था I उसी 5 जनबरी सै आज़ तक प्रेतात्माओं की ये लीलाए जोर पकड़ती जा रही हैं I ये समझ लो कि श्मशानगढ़ पुरी तरह प्रेतग्रस्त हैं I

मैं यहां होने वाली प्रेतालीलाआँ का वर्णन विस्तार से करने का साहस नहीं रखता I जब भी इन प्रेत लीलाओं कै विषय में सोचता हू तो भय लगने लगता है । ऐसा लगता है जैसै कोई प्रेताआत्मा मैरे दिलो दिमाग पर काबु करती जा रही है

मुझे कोई प्रेत हाथों से उठाकर पटक दैगा...नहाँ...नहीं,,,, मै उन भयानक वारदातों का वर्णन नहीं कर सकता देखो, अब मेरा हाथ कांपने लगा है । मुझे लग रहा है जैसे कोई प्रेत आत्मा घूरु रही है । मेरै शरीर की शक्ति छिनती जा रही है , जिस्म रज रहित होता जा है ।



दोस्त, बस यह समझ लो कि वास्तव मे शमशानगढ प्रेत आत्माओं की स्टेट है लोकिन मै क्योंकि प्रेत-आत्माओ पर विश्वास नहीं करता, इसलिए सोचता हू कि शायद ये सब एक षड्रयत्र के अंतर्गत हो । हो सकता कि स्टेट कै कुछ पुरानै शत्रू स्टेट का बिनाष चाहते हों. . बैसे सच पूछो तो मेरा विश्वास आधुनिक बिज्ञान के बिचार ( प्रेत आत्माएं नहीं होती ) से हटता जा रहा है और विश्वास होता जा रहा है कि प्रेत आत्माएं भी इसी संसार मे रहती हैं I विजय, अब अंत मे तुमसे यही प्रार्थना करूंगा कि दोस्त अगर तुम्हें दोस्ती का जरा भी खयाल है तो हमारी मदद कै लिए तुरंत श्मशानगढ़ के रवाना हो जाओ । अखबारों मे तुम्हारे कास्नामै पढकर जाने मैरे दिल को क्यों यह विश्वास हो गया कि केवल तुम ही हमारी स्टेट को इन परेशानियों से मुक्त करा सकते हो ।

आशा है दोस्ती की खातिर तुम खतरा मोल लोगे । बैसे तुम्हें यहां पूरा पारिश्रमिक दिया जाएगा


तुम्हारी प्रतीक्षा मे

तुम्हारा ही दोस्त

“लो चेले मियां, कर लो अंग्रेजी में बात ।" रहमान के चुप होते ही विजय ने कहा ।


"केस तो दिलचस्प हो सकता है, गुरु I”



"तो क्या श्मशानगढ़ जाने का इरादा है चेले मियां?"


"अगर गुरूदेव का है. . .तो . . ।"



"अबे बेटा, गुरुदेव की खोपडी का तो दीवाला ही निकल गया ।”



" क्यों? "



“अबे ये साला मूत-प्रेतों का चक्कर अपनी समझ से बाहर होता है । हम तो प्यारे जासूस महोदय हैं, अत: भूत-प्रेतों पर विश्वास करने जैसी महान मूर्खता हम नहीँ कर सकते ।"


“गुरू ।"


"बको I”



"भूत-प्रेतों पर तुम्हें विश्वास करना ही होगा I"


"वो किस खुशी में साले चेले मियां?”



"गुरुदेव, आप तो जानते ही हैं कि मैं बंगाली हूं और आप यह भी जानते होंगे कि बंगाल का काला जादू प्रसिद्ध हे । अब हम बंगाली लोग जादू पर विश्वास करते हैं तो 'भूत-प्रेतों के विषय में भी काफी जानकारियां रखते हैं । यहां तक कि मैं स्वयं किसी तांत्रिक से कम नहीं हूं । खतरनाक-से-खतरनाक आत्मा को वशीभूत कर सकता हूं और जो चाहूं करवा सकता हू । आपके दोस्त राजीव के पत्र में जो लिखा हे यह मुझे किसी हद तक सत्य लग रहा है l"



रहमान शायद अभी आगे भी कोई भाषण देता लेकिन बिजय बीच में ही हाथ उठाकर बोला…

"मिस्टर मेहमान ।"


"यस गुरू ।”



"चुप होने का क्या लोगे?”


"कुछ भी नहीं!"


“तो बोलती पर ढक्कन लगा लो ।"


"लगा लिया ।"


"बात ये है मियां मेहमान, कि साले तुम बंगाली हो, कहीं काले जादू का चमत्कार दिखाकर हमारी खोपडी का दिवाला न निकाल दो । तुम बंगालियों की खीपडियॉ का दिवाला तो निश्चित रूप से पहले ही निकल चुका है जो इस बीसवीं सदी में भूतों पर विश्वास करते हो । अबे मियां, ये हमारे उन बोगस दिमागों की उपज है जिन्हें कहानियां लिखने का शौक था और जिनका दिमाग सठिया गया था । जब उन महापुरुषों क्रो वास्तविक जीवन में कोई 'प्लांट' नजर नहीं आया तो सोचने लगे कि मरने के बाद इंसानों का क्या होता होगा और बस फिर कपोल कल्पित कहानियां गढने में उन्हें देर न लगी तथा आज तक तुम जैसे नौजवानों क्रो मूर्ख बना रहे हैं ।"



"नहीं गुरु, मैंने स्वयं काले जादू द्धारा आत्माओं से बात की है I”


"सब बकवास I”


"गुरु मैँ तुम्हारी भी बात करवा सकता हू I”


"हा तुम साले ठहरे बंगाल के काले जादूगर, हमारा उल्लू खींचने में अधिक समय कहां लगाओगे?"



"ये बात नहीं है गुरु ।" अच्छा एक बात बताओ?"

"पूछो I"


"श्मशानगढ जाओगे?"


"अगर आप जाएंगे ।"


"हमेँ तो प्यारे जाना ही पडेगा, देखते हैं क्या राग-माला है? "


"बस तो गुरु, मैं भी ।"


"देखो मियां, चेले दी ग्रेट ।। अगर तुमने फिर काले…वाले जादू की बात की तो उठाकर बंगाल में फेंक दूगा I”


“कुछ भी हो, मैं अपने ढंग से चलूंगा!”


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