रहस्य के बीच complete

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Rohit Kapoor
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Re: रहस्य के बीच

Post by Rohit Kapoor » 09 Jul 2017 09:23

जबकि वह वहां पहुचा जहां उस स्याह व्यक्ति तथा सफेद चोगे वाले की टक्कर हुई थी तथा स्याह व्यक्ति ने सफेद चोगे वाले को बेहोश अथवा मृत अवस्था मे छोडा था ।



उस समय विजय को कम आश्चर्य न हुआ जब उसने उस स्थान से न सिर्फ सफेद चोगे वाले इंसान का जिस्म गायब पाया बल्कि यह भी देखा कि यहां कोई भी ऐसा चिन्ह न था जिससे ये जाहिर होता कि यहां कोई उत्पात हुआ है ।



वहां खून की एक बूंद का छींटा भी न था जबकि सफेद चोगे वाला लहूलुहान होकर फर्श पर गिरा था ।



हंसी और खिलखिलाहट अब लगभग समाप्त हो चुकी थी ।



विजय ने उस स्थान को ध्यान से देखा और सीटी बजाने कै अंदाज में होंठ सिक्रोड़े ।


फिनिश


रहमान अपनी सम्पूर्ण इंद्रियों की सतर्कता के साथ दबे पांव सफेदपोश कमसिन-सी लडकी का पीछा करता जा रहा था। अभी तक रहमान उसकी सूरत देखने मे भी सफ़ल न हो सका था क्योंकि उसने एक बार भी पीछे घूमकर नहीं देखा था !



रहमान अभी तक यह निश्चय करने मेँ भी असफ़ल था कि यह लडकी कोई जीती-जागती कमसिन लडकी है अथवा भटकती हुईं कोई रूह ।


खिलखिलाहट तथा भयंकर डरावनी आवाजे अभी तक वातावरण में गूंज रही थीं ।



लेकिन रहमान यह अनुमान भी न लगा सका था कि ये डरावनी आवाजे आखिर आ कहां से रही हैं?


रहमान को वह सफेदपोश लडकी स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी । वह लगभग बीस फुट दूर रहकर उसका पीछा कर रहा था ।



एकाएक रहमान बुरी तरह चोंक गया l वह कांप गया…सारे शरीर में झुरझुरी-सी दौड गई ।



आश्चर्य से उसकी आंखें फैल गई ।



भय से वह कांपा तथा पीछे हट गया ।


उसके चेहरे से कोई चमगादड़ टकराया तथा चीखता हुआ भाग गया l



तभी एक ऐसी जोरदार चीख, जो उसके दिल में उतरती चली गई, एक ऐसी खिलखिलाहट जिससे वह कांप गया l



ये आवाजें उसके ठीक सामने तथा अत्यधिक निकट से आ रही थीं ।
उसने देखा--!



देखकर भय से पीछे हट गया ।


उसके चेहरे के ठीक सामने…सिर्फ एक फुट दूरी पर एक चेहरा उभरा था, एक जिस्म उभरा था ।



एक पैंतीस वर्ष की युवती का जिस्म ।


वृक्ष पर लटका हुआ उल्टा जिस्म?


वह कांपकर पीछे हट गया ।


यह भयानक आवाजें उसी के मुख से निकल रही थीं । बड़ा ही खौफनाक था यह जिस्म ।


" युवती का शरीर पेड पर उल्टा लटका हुआ था. . लेकिन सबसे खौफनाक बात तो यह थी कि उस युवती के घड़ और गर्दन के ऊपर का भाग पृथक था…बिल्कुल पृथक, हवा मेँ लहराता हुआ-उसके धड़ के उपरोक्त भाग से लहू बह रहा था-गर्दन से भी लहू टपक रहा था ।


उफ......!



कितना खतरनाक था इस युवती का हवा में लटका हुआ चेहरा ।



आधे काले आधे सफेद बाल धरती की तरफ लटके हुए थे । हाथी की भांति दो दांत होंठों पर लटके हुए थे l



आंखें अंगारों की भांति दहक रही थी तथा माथे पर सलवटें पडी हुई थी ।



वह क्रोघावस्था में चीख रही थी तथा खूनी निगाहों से रहमान को देख रही थी ।



रहमान कांपकर पीछे हट गया ।

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Rohit Kapoor
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Re: रहस्य के बीच

Post by Rohit Kapoor » 09 Jul 2017 09:24

भयभीत वह इसलिए हो गया था क्योंकि वह वृक्ष पर उल्टी लटकी युवती अचानक ही उसके सामने आ गई ।



पीछे हटकर उसने स्वयं को कुछ सम्भाला तथा ध्यान से देखा तो उसने पाया कि युवती का उल्टा जिस्म सिर्फ हवा में लहरा रहा हे, पैरों वाला भाग नजर ही नहीं आ रहा था ।



रहमान ने स्वयं पर संयम किया तथा बोला…“कौन हो तुम?”



जवाब में युवती का जबड़ा खुला, जोरदार खिलखिलाहट गूंजी तथा कहकहा-सा लगाने के बाद उसके होंठ हिले ।



रहमान को लगा जेसे दस-बारह कुत्ते मिलकर रो रहे हों लेकिन फिर भी शब्द स्पष्ट थे ।



युवती के होंठ हिलते ही रहमान के कानों में आवाज टकराई-“वापिस चले जाओ. . .वापिस चले जाओ. . . ।"



«मै. . .उस. . .लडकी के. . .पीछे. . .जाऊंगा..... I" रहमान के मुख से निकला ।



“चुप. . .गघे. . .के. . .बच्चे ।" वह युवती बुरी तरह क्रोध में चोखी…"कमीने. .कुत्ते. . .मैं-मैं तेरा. . .मांस. . .खाऊंगी. . . तेरी. . .हड्डियां खाऊंगी ।" यह कहने के साथ ही वह रहमान की तरफ झपटी ।



आश्चर्य यह था कि वह अभी तक सीधी नहीँ हुई थी ।



वह हवा में उल्टी उस पर झपटी थी ।



रहमान क्योंकि सम्भल चुका था इसलिए वह स्वयं को बचा गया और फिर फुर्ती कै साथ अपना बैग खोल लिया ।



वह जान चुका था कि यह कोई प्रतिशोध मे जलती आत्मा है ओंर वह यह भी जानता था कि प्रतिशोध में धधकती आत्मा पर काबू करना कितना कठिन होता है । लडकी की आत्मा रह रहकर उस पर झपट रही थी ।



व्रह स्वयं को बचाता तथा बेग से कुछ निकालने का प्रयास करता ।



और लगभग पांच मिनट पश्चात l



रहमान ने बैग से एक पुडिया निकाली । उस पुडिया मेँ चने की दाल थी ।



उसने चने की दाल का एक दाना निकाला और आत्मा के रहस्य से खुद को बचाता हुआ होंठों…ही-हौंठों में कुछ बड़बड़ाने लगा ।



थोड़ा बड़बड़ाने के बाद…


जेसे ही आत्मा उस पर झपटी…


रहमान ने दाल का वह दाना उस पर फेंक दिया ।


आश्चर्यजनक परिणाम ।


दाल का दाना युवती के जिस्म से टकराया ।


आग के शोले घधके ।


रहमान के मतानुसार आत्मा धधक जानी चाहिए थी लेकिन परिणाम एकदम विपरीत था ।


आग के शोले क्षण मात्र को चमके फिर विलुप्त हो नए ।



आत्मा भयानक ढंग से चिल्ला उठी । फिर भयानक ढग से रहमान पर झपटी । रहमान पीछे हटा, वह चकराया, उसका पहला मंत्र प्रतिशोध की ज्वाला से धधकती इस आत्मा पर प्रभावहीन सिद्ध हो गया था ।



सहसा उसने फुर्ती के साथ बैग से एक बड़ा चाकू निकालकर खोल दिया ।

आत्मा चाकू देखकर खिलखिला पडी ।


लेकिन आश्चर्य ।



महान आश्चर्य ।।



चाकू का चमकदार फल अंधेरे में बिजली की भांति चमका और अगले ही पल 'खच' से रहमान की जांघ मेँ घुस गया ।



वास्तव में रहमान ने स्वयं यह चाकू अपनी जांघ में मारा था ।



आत्मा के आक्रमण से बचते हुए उसने चाकू आत्मा के नजर आने वाले जिस्म पर फेंक दिया लेकिन चाकू शरीर के बीच से गुजरकर दूसरी तरफ़ 'खन' से धरती पर जा गिरा ।



रहमान की जांघ से खून की धारा बह निकली ।

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Re: रहस्य के बीच

Post by Rohit Kapoor » 09 Jul 2017 09:24

उसने झपटकर खून अपने हाथ की हथेली में भर लिया और अगले ही पल वह सारा खून आत्मा पर उछाल दिया ।



खून अपनी तरफ उछलता देखते ही आत्मा चीख पडी…खून...खून...खून...नहीं...नही... I” कहते कहते आत्मा के चेहरे पर दर्द के भाव उभर आए । खून देखते ही आत्मा न जाने क्यो घबरा गई और इससे पहले कि रहमान कुछ समझ पाता, आत्मा अदृश्य हो गई ।



कुछ देर रहमान पागल-सा वही खडा रहा ।


वातावरण में शांति छा गई थी ।


फिर उसने सामान बटोरा और वापस चल दिया क्योंकि वह जानता था कि वह सफेदपोश लडकी अब उसे कहीं नजर नहीं आएगी ।


अब उसे पूर्ण विस्वास हो गया कि श्मशानगढ़ में प्रेत-लीलाएं भयानक रुप धारण करती जा रही हैं ।।




फिनिश


और तबा जबकि विजय और रहमान मिले । चहककर बिजय बोला-“कहो प्यारे मेहमान! !"


" गुरु, यहां वास्तव में बहुत खतरनाक खेल चल रहा है I”


“तुम्हारी अम्मा का क्या हुआ चेले दी ग्रेट?"


"गुरुदेवा "



"यस चेले I"


“कह दू?”


""क्या? "


"तुम्हें यकीन नहीं आएगा l”


"अबे बक भी. . .क्या हुआ?"



"गुरू वह आत्मा थी I”


"फिर बकबास ।"


"नहीं, गुरु, हकीकत ।।"



"अबे चेले मियां, क्या साले लड़-मरकर आए हो?"


“क्यों?"


"तुम्हारी जांघ से बहता खून. . . I”


"यही तो मैं तुम्हें बताना चाहता हू गुरु I"



""क्या?"



उत्तर मेँ सारी घटना रहमान ने विजय को विस्तार से बता दी l जिसे सुनकर बिजय कुछ देर तक तो रहमान कौ घूरता रहा । वह निश्चय नहीं कर पा रहा था कि रहमान के साथ हुई घटनाओ को मानव करामात समझे अथवा प्रेतों की लीला ।



. . कुछ देर तक वह सोचता रहा तथा फिर बोला…।।

" खैर.....प्यारे चेले मियां, लगता है साला चक्कर घपले का है । अभी साले इस श्मशानगढ़ मे कदम रखा नहीं है कि. . .लफड़े फैलने लगे. . और फिर अभी तो राजीव मियां की झोंपडी भी नजर नहीं आई I"



"मेरा एक विचार है गुरु I"


"हो जाओ शुरू ।"


"मेरे ख्याल से पहले राजीव से ही मुलाकात की जाए. . .हो सकता है कि वह कुछ बाते बताए जिनसे रहस्य की इन परतों मे से जो यहां आकर और भी जटिल हो गई हैं कोई परत उठ जाए अर्थात् हम किसी रहस्य की परत तक पहुच सकें I”


"अबे चेले मियां!"


“यस गुरु ।"


"क्या अपने गुरु की छुट्टी करने का इरादा है?"


"क्यों गुरु?"


“जो बात मुझे कहनी चाहिए थी वह तुमने कह दी ।"


"आखिर चेला किसका हूं I”


“तो फिर चलो I"


"क्रहां? "


"मियां राजीव का झोंपड़ा तलाश किया जाए ।”


"चलो!" और फिर दोनों बिना किसी पते के अनजानी दिशा में चल दिए ।


उन सडकों पर उसी प्रकार की निस्तब्धता और शांति छाई हुईं थी I


अब उनका रुख उसी तरफ़ था जिस तरफ़ रहमान

सफेदपोश लडकी के पीछे आया था और पीपल के वृक्ष के करीब आकर रहमान ने कहा-“गुरू वो है वह पेड़!"



बिजय ने ध्यान से देखा…मानो कोई विशेषता तलाश कर रहा हो, लेकिन वृक्ष में भला क्या विशेषता हो सकती थी? वह आम पीपल के वृक्षो की भांति ही था । हाँ, वह बहुत विशाल तथा बूढा नि:संदेह था ।

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Re: रहस्य के बीच

Post by Rohit Kapoor » 09 Jul 2017 09:25

वे पूर्ण सतर्कता के साथ उस वृक्ष के निकट पहुचे लेकिन इस बार कोई भी विशेष घटना न घटी । दैत्याकार राक्षस के रूप में पीपल शांत खड़ा रहा ।



वे पीपल के वृक्ष के नीचे से गुजर गए लेकिन ऐसा कदापि महसूस नहीं हुआ कि वह कोई विशेष वृक्ष है । जब वे पेड़ के नीचे से गुजर ही गए तो बिजय ने घूमकर पेड़ की ओर देखा तथा बोला…""क्यो, मियां चेले दो ग्रेट, क्या बात है?"



"अजीब बात है गुरु I"



“तुम ठीक से पहचान रहे हो ना कि यह वही वृक्ष है?"



"नि:संदेह ।।"



"फिर तो अजीब बात है मियां रहमान l”


"अभी तो प्रत्येक रहस्य की परत अपनी जगह स्थिर हैं, गुरु l”


"खैर प्यारे आओ, फिलहाल चला जाए I" विजय ने कहा तथा फिर वे दोनो अपने पथ पर चल दिए ।


वे रास्ते में इस अजीबोगरीब केस के विषय मेँ विचार-विमर्श करते रहे, घटनाएं कुछ इस तीव्रता के साथ हो रही थीं कि अभी तक उन्हें सोचने-समझने का अवसर भी नहीं मिल रहा था ।

अब उनका बिचार था कि वे राजीव से कुछ बाते करने के पश्चात ही इन रहस्यों की परतों में प्रवेश करेगे तथा कुछ करने की चेष्टा करेगे ।

उन बेचारों को राजीव के निवास का भी तो कोई ज्ञान न था । वे सिर्फ इतना जानते थे कि राजीव इस स्टेट के राजा का लडका है । यूं तो स्टेट का बच्चा भी राजा की कोठी बता देता लेकिन यहां तो कोई नजर नहीं आ रहा था ।


लगभग पैंतालीस मिनट तक वे बिना किसी लक्ष्य के बढते रहे । रहमान के हाथ में अपना सूटकेस सुरक्षित था । चाकू से बने घाव पर रूमाल बांध दिया गया था ।


रात की निस्तब्धता में फिर एक चीख गूंजी…हृदय----विदारक चीख !!


वे चौंके तथा दोनों ने एक साथ चीख की दिशा में देखा।


उनकी निगाह एक इमारत पर रुक गई…एक दैत्याकार इमारत पर ।


तभी उन्होंने देखा…इमारत की तीसरी मंजिल के एक कमरे की शीशे की खिडक्री पर एक दृश्य चमक रहा था ।


खिडकी पर कोई नकाबपोश चमक रहा था ।


"चेले मियां, पकडो साले को ।"


बिजय ने कहा तथा तेजी के साथ इमारत की तरफ़ झपटा।


रहमान इमारत के दूसरी तरफ़ भागा जा रहा था ।


विजय उस खिडकी के निकट से गुजरने वाले गंदे पानी के पाइप की तरफ झपटा था ।


और फिर अगले ही पल वह बंदरों की भांति उछलता हुआ पाइप पर चढ रहा था ।


सहसा इमारत मेँ हलचल हुई ।
बिजय खिडकी के निकट आ गया तथा फुर्ती के साथ शीशा तोड़कर कमरे में प्रविष्ट हो गया ।



कमरे मे प्रविष्ट होते ही उसने देखा…सुनहरे कपडों तथा नकाब मेँ लिपटा एक साया छलांग के साथ कमरे से बाहर निकला-बिजय ने एक क्षण भी व्यर्थ नहीं किया…उसने भी 'गोल्डन नकाबपोश' के पीछे जम्प लगाई तथा फुर्ती से उसने जेब से रिवॉल्वर भी निकाल लिया था ।


कमरे के बाहर एक गैलरी थ्री ।


गोल्डन नकाबपोश उसी में भागा जा रहा था ।


धांय.......!



विजय के रिबॉंत्वर ने शोला उगला ।


सारी कोठी फायर की आवाज से गूंज गई ।


लेकिन गोली व्यर्थ ही गई थी क्योंकि नकाबपोश फायर से पूर्व ही गैलरी के मोड पर दाईं ओर मुड़ चुका था ।

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Re: रहस्य के बीच

Post by Rohit Kapoor » 09 Jul 2017 09:25

विजय भी तेजी के साथ उसी तरफ लपका ।


लेकिन जब वह गेलरी के मोड़ पर घूमा तो गैलरी रिक्त थी, वहां कोई न था ।


अब सारी इमारत में कदमों की आहटें गूंजने लगी थी ।


यहां से चारों तरफ़ को गैलरी जाती थी । तभी गैलरी के दोनो तरफ़ से कुछ व्यक्ति भागते हुए आए । तीसरी तरफ़ यानी सामने से भी एक व्यक्ति दौडता हुआ आया ।


विजय तथा उसके हाथ में मौजूद रिवॉल्वर को देखकर सभी ठिठक गए । सामने की तरफ़ से आने वाला युवक बोला…“कौन हो तुम?"


“यही प्रश्न, मैं तुमसे करना चाहता हू प्यारेलाल ।"
"क्या मतलब?" दाईं तरफ खड़े एक भारी-भरकम शरीर के व्यक्ति ने कहा ।


"तुम कौन होते हो बीच में टांग अड़ाने वाले?" विजय भारी शरीर वाले से बोला ।


“में इस रियासत का राजा चंद्रभान हू और वह मेरा पुत्र सुभ्रांत है ।" भारी भरकम शरीर वाले ने युवक को अपना पुत्र बताया था ।



"क्षमा करना चंद्रभान जी, मैं आपसे बदतमीजी से बोला ।" विजय मुस्कराकर बोला I



"क्या मतलब. . .तुम कौन हो?" चंद्रभान चौंके ।



"मैं राजनगर का जासूस विजय हू ओर शायद आपको भी पता हो कि मुझे आपके पुत्र राजीव ने बुलाया है ।"


"डैडी, एक सुनहरा नकाबपोश, अभी-अभी मेरे कमरे के सामने से निकला तथा फिर न जाने कहां गायब हो गया?" सहसा सुभ्रांत नामक युवक बोला ।


"उसे पकडो सुभ्रांत ।।" विजय ने कहा तथा सामने की तरफ झपटा ।



लेकिन तभी उसे ठिठक जाना पड़ा-एकाएक उसके कानों से चंद्रभान की गरजती हुई आवाज टकराई…"नहीं मिस्टर अजनबी, तुम इस तरह हमेँ धोखा नहीँ दे सकत्ते । अभी हमें यकीन नहीं आया कि तुम वही विजय हो जिसे राजीव ने बुलाया था I”


बिजय ठिठक गया ।


चंद्रभान जी के हाथ में एक रिवॉल्वर चमक रहा था ।


विजय मुस्कराया तथा बोला ।।
""चंद्रभान जी, आज इस इमारत में किसी का कत्ल हो गया हे और कातिल उस गोल्डन नकाबपोश के रूप में फरार हो गया हे । आपको यह तो बिश्वास करना ही होगा कि मैं विजय ही हू।”



"क्या फायर तुमने किया था?"


"जी हां I”


"क्यों और किस पर?"


"गोल्डन नकाबपोश पर…इसलिए कि वह कत्ल करके भाग रहा था I"


"गोली उसे लगी?"



"नहीं ।"



“खैर सीधी तरह पीछे चलो, तुम विजय हो अथवा नही यह फैसला तो राजीव ही करेगा I”

"मेरे खयाल से कत्ल राजीव का ही हुआ है I”


"क्या मतलब? "


"क्या राजीव का कमरा पीछे है?"


“हां ।।”


"तो फिर शीघ्रता से आइए I” विजय ने कहा तथा पीछे मुड़ा । जब वे लोग उसी कमरे में पहुचे तो कमरे में राजीव की कराहटें गूंज रही थीं ।


बिजय शीघ्रता से आगे बढा और बोला’…"'राजीव, मैँ आ गया हूं! "



"बि. . .वि. . .जय. . .म. . .मेरे दोस्त तुम कुछ देर से आए. . . ।" राजीव टूटे स्वर में बोला ।



एक लम्बा खंजर उसकी छाती में धंसा हुआ था ।



""राजीव, क्या तुमने कातिल की सूरत देखी?"
"नही. . . ।" राजीव कै मुख से निकला तथा उसकी गर्दन एक तरफ़ को लुढक गई ।


“राजीव वेटे!" राजीव की मां चीख पडी ।



राजीव मृत्यु कौ प्राप्त हो चुका था ।



यह भी सब जान चुके थे कि विजय वास्तव में विजय है ।



कमरे में गहरा सन्नाटा और भारी निस्तब्धता थी ।




फिनिश

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