आग के बेटे / complete

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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 25 Sep 2017 14:22

"बेकार की बहस में समय व्यर्थ न करो ।" बिगेंजा का लहजा कुछ सख्त हो गया---- "मैं स्वय को सबसे अधिक दिमाग वाला न कहकर सिर्फ तुमसे अधिक दिमाग वाला कह रहा हूं। वह भी तुम्हारी मूर्खता क्रो देखकर ।”


"कैसी मूर्खता ?” अधेड कुछ उलझ सा गया ।


"तुम्हारा यह सोचना कि ब्रिगेंजा को कोई हानि पहुचा सकते हो और वह भी इस कमरे मे । तुम ये न देख सकै

कि जहां इस समय. खडा हू…मेरे पैर कै नीचे एक ऐसा बटन है जो तुम्हारे लिए क्षणमात्र मे मौत्त. भी बन सकता है I.” बिगेजा के होठो. पऱ मुस्कान थी ।


"वह कैसे. . ?" अधेड धीमे से आश्चर्यज़नकृ स्वर में बोला। I . . .


"इसका पूरा चक्कर तुम्हारी बुद्धि में नहीं आएगा I" ब्रिगेजा बोला…"तुम सिर्फ इतना समझ लो कि यह ब्रिगेंजा का … खास कमरा है । यहां टामीगने रिवाॅल्बरे एल.एम.जी इत्यादि ~ भयानक हथियार कमरे की दीवारों तथा छत में इस प्रकार सयोजित किए गए हैं कि कमरे के प्रत्येक कोण पर खडा, आदमी किसी-न-किस्री हथियार की रेज में है । कहां खडा, आदमी किस हथियार की रेज मे है और उसको चलाने के लिए कौन-सा बटन किस ढग से चलाना चाहिए…यह रहस्य ब्रिगेजा के अलावा. कोई नहीं जानता I”

.……." मान -गए मिस्टर ब्रिगेंजा, हम मान गए कि तुम हमसे अघिक बुद्धिमान हो ।" अथेड़ मुस्कराता हुआ बोला I

, --"अब चुपचाप उस चेयर पर जाकर बैठ जाओ और मेरे प्रश्नों का उत्तर दो।"



अधेड़ चुपचाप उस कुर्सी पर बैठ गया जिसकी तरफ ब्रिगेंजा ने इशारा किया था । तभी ब्रिगेंजा ने मेज में लगा एक बटन दबाया…परिणामस्वरूप अधेढ़ ने स्वयं को पूर्णतया बंधनों में पाया I वह कुर्सी से इस प्रकार जकड़ा हुआ था कि तनिक भी नहीँ हिल सकता था । तभी बिगेजा ने एक अन्य बटन दवाया और अगले ही पल वह कुर्सी- जिस पर -वह बधा हुआ था, ऊपर उठने लगीं I कुर्सी के निचले भाग मे फौलाद का सरिया लगा हुआ था ? कमरे के फर्श से बाहर आ रहा था और कुर्सी अधेड, सहित ऊपर. उठ रही थी । उस समय अधेड ,का सिर छत से कुछ ही नीचे था कि चेयर रुक गई l


" इसका क्या मतलब ?" वह अधेड, बोला… !!

" इसका मतलब ये है कि तुम ये तो देख ही रहे हो कि कमरे की छत लोहे की बनी है । ध्यान रहे…अगर किसी भी प्रश्न का उत्तर देने की कोशिश न की अथवा मेरी आज्ञाओं का उल्लघन किया तो एक बटन दबाते ही तुम्हारी खोपडी. लोहे की छत से इस तरह टकराऐगी-जैसे रिवाॅल्बर से निकली गोली । उसका परिणाम क्या होगा ? तुम सहज ही उसका अनुमान लगा सकतें हो ।" ब्रिगेजा का लहजा अपेक्षाकृत सख्त
था l

अधेड धीमे से मुस्कराकर बोला-"इसक्री क्या ज़रूरत थी ब्रिगेजा-मै तो यू ही तुम्हारी वातो का सही ज़वाब दे देता । खैर यू ही सही…पूछो क्या पूछना है ?”


ब्रिगेजा ने एक बटन दबाया-जिससे अधेड के दोनो हाथ … स्वतत्र हो गए ।


ब्रिगेजा बोला…"अब तुम्हारे दोनो हाथ स्वत्तत्र हैं…सबसे पहले अपना यह चौधरी वाला कृत्रिम चेहरा उतारो I"


मुस्कराते हुए अधेड ने ब्रिगेजा की आज्ञा का सहर्ष पालन किया-उसने, चौधरी वाला फेसमास्क अपने चेहरे से उतार दिया । उसके पीछे एक खूबसूरत नवयुवक छुपा था-वास्तव मे युवक सुदर था । वह मुस्करा रहा था । ब्रिगेजा उसे बडे ध्यान से देखता रह्म किन्तु ज़ब वह उसे पहचान न सका तो उसने प्रश्न
किया I


" कौन हो तुम ?"


"मेरा एक नाम नहीं हे अलग-अलग स्थानो पर मेने अलग-अलग नाम रख छोडे हे जैसे बेरुत में जिम्बो न्यूयांर्क मे मार्टिन-काहिरा मे जैब्रीन--चीन मे हाईत्तोश इत्यादि-यू मेने भारत मे अपना नाम संग्राम रखा है I” नवयुवक आराम से मुस्कराता हुआ बता रहा था ।


"ओह…तो तुम नए उभरते इटरनेशनल अपराधी हो ।" ब्रिगेजा उसे घूरता हुआ बोला I

"जैसा ठीक. समझो-यू तो मैँ हू बहुत पुराना !"


" कभी तुम्हारा नाम नहीं सुना !"
" मै कोई बेवकूफ अपराधी नहीं-जो प्रत्येक स्थान पर एक ही नाम रखकर इंटरपोल के जासूसो की निगाहें का काटा बनू । मैं अलग अलग नामों से अपराध करता हू -ताकि इटरपोंल कभी न जान सके कि कोई इटंरनेशनल अपराधी उनकी जडों को खोखली कर रहा है तुम इसी कारण मुझे नहीं जानते I" युवक निरंतर मुस्करा रहा था ।


"बैसे तुम्हारा वास्तविक नाम क्या है ?” ब्रिर्गेजा की बेघक दृष्टि उसे घूर रही थी।



"वास्तविक्ता पूछो तो मैं अब तक अपने लिए इतने नाम प्रयोग कर चुका हूं कि मैं अपना वास्तविक नाम लेते हुए सकोच में'पड जाता हू कि क्या वास्तव मे मेरा यही नाम है । वेसे अच्छा होगा अगर तुम मुझे सग्राम ही कहो I"


" खेर माना कि तुम संग्राम हो I” ब्रिगेजा बोल उठा--- भारत में क्या कर रहे हो ?"


" अगर आप कहे तो एक ही सास मेँ अपनी पूरी कहानी सुना दू…उसके बाद जो प्रश्न रह जाए…आप उसे पूछ लेना किंतु कहानी सुनाने से पूर्व मैं आपसे छोटा-सा प्रश्न करना . चाहूंग़ा I"


" कैसा प्रश्न ...?"


"प्रश्न सिर्फ ये है कि क्या मैं आग के बेटे से बात कर रहा हूं ?”



" इसका उत्तर हा में है I” ब्रिगेजा ने स्वीकार किया I'



…"बस तो ठीक है I सग्राम बोला-"अब आप सुनिए-अब से एक हफ्ता पूर्व मैं जिम्बो के नाम से बेरूत में था । मैने अपने कछ साथियों के साथ वहा का खजाना लुटने की योजना बनाई । जाने कैसे यह भनक वहा की सीक्रेट .. सर्विस को लग गई अभी हम लोग अपनी योजना पर विचार कर ही रहे थे कि सीक्रेट एजेंटों ने हमारे हेडक्वार्टर पर हमला बोल दिया I परिणास्वरूप वहां आतक फैल गया । हम सब दोस्त अपनी-अपनी जान बचाकर, भागे । जिसमें किसी को किसी का पता न रहा कि किसके साथ क्या बीती कौन मरा _ और कौन मेरी तरह फरार होने ,में सफ़ल हो गया ? खैर. . .मैंने अपना जिम्बो वाला मेकअप उतार दिया और भारत चला आया । मेरा अगर कोई दोस्त पकडा. भी गया होगा तो वे मुझे सिर्फ जिम्बो के रूप में ही जानते हैं । वे नहीं जानते कि जिंबो के पीछे वास्तविक चेहरा क्या है ? अत बेरुत की पुलिस जिम्बो को तलाश करती रही…जबक्रि जिम्बो संग्राम में बदल चुका था ऐसे संग्राम मे जो केवल बेरूत पुलिस के लिए ही नहीं बल्कि जनता कि लिए भी भोला और नब परिचित चेहरा था । मैंने स्वय को यहा भारतीय पर्यटक बताना प्रारम्भ कर दिया । पुलिस बेचारी क्या जानती थी कि सग्राम ही जिम्बो है । स्वय मेरे साथी नहीं जानते थे कि जो व्यक्ति जिम्बो के नाम से उनका साथी है वास्तव में कुछ और ही है । खैर बेरुत से मैं भारत आया-यहा अधेड का रूप धारण करके अपना नाम घासीराम रख लिया । यहा आते हैं ~ ही मेने आग के बेटों के विषय मे सुना । वास्तविक्ता यह थी कि मैं भारत मेँ किसी ऐसे शक्तिशाली सगठन अपराधी दल की तलाश मेँ था जिसके साथ रहकर मैं कार्य कर सकू । इसलिए आग के बेटों से मुलाकात करने मे घासीराम बना ही रघुनाधं की कोठी की पिछली गली मे गया था किन्तु वहा किसी अनजाने लोगों से टकरा गया । तभी रघुनाथ की कोठी का दरवाजा खुला और एक व्यक्ति बहा से कूदकर मेरी सहायता करने लगा फिर अचानक वे अनजाने लोग पता नहीं कैसे मरने लगे? खैर तभी मिलिट्री के जवानो, के गली मेँ आने की ध्वनि ने मुझे चौंकाया । मुझे क्योकि अपने पकडे जाने का भय था। अत अपने मददगार को धोखा देकर मैं बडी कठिनाई से उस बालक के जरिए वहा से निकला और अत में आज़ जब जिबोरा उस लडकी को घसीट रहा था तो मुझे क्रोध आगया और उससे भिड गया । उसके चाद अचानक तुमसे मुलाकात हुई और मैं समझता हूं यह अच्छा हुआ क्योकि मैं तो स्वय ही तुम्हारे दल में शामिल होना चाहता था ।" संग्राम ने एक गहरी सास ली । ”

ब्रिगेंजा एक ठडी' सास लेकर बोला-" र्तों . इस समय मैं जो चेहरा देख रहा हूं क्या यह वास्तविक हे ?"


……"नकली चेहरा तो तुमने अपनी चालाकी से उतरवा ही लिया । अत यह चेहरा मेरा वास्तविक चेहरा है । वेसे नाम वास्तविक नहीं है I" सग्राम मुस्कराकर बोला ।
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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 25 Sep 2017 14:22

ब्रिगेंजा क्रो उसकी कहानी सुनकर लगा कि वास्तव में यह व्यक्ति काफी दूरदर्शी और चालाक हे । शक्ति और लडने का ढग वह देख ही चुका था । वास्तव में ब्रिगेंजा इस व्यक्ति कै व्यक्तित्व से प्रभाक्ति था । अत वह बोला । "तो तुम हमारे साथ काम करना चाहते हो ??’"



…"पहले ही कह चुका हूं-मैं स्वय इसके लिए उत्सुक हूं किंतु. अब मैं एक शर्त पर काम करूंगा I”



"शर्त कैसी शर्त्त ?” ब्रिगेजा उलझा I

"यही कि में अपनी इस वास्तविक सूरत को छिपाकर प्रत्येक कार्यं करूंगा I”


'-"इससे हमें कोई मतलब नही-वह तुम्हारा अपना काम करने का ढग है चाहे किसी भी मेकअप में कार्य करों ।" ब्रिगेंजा उसकी चालाकी पर मुस्कराया I ब्रिगेंजा यह सोचकर मुस्कराया कि कितना धूर्त हे यह व्यक्ति जो कभी. अपनी असली सूरत को पुलिस रिकॉर्ड में नहीं आने देना चाहता ।


उसके बाद ब्रिगेंजा ने उससे कहा कि उसे आग के स्वामी के सामने पेश किया जाऐगा । फिर बटन दबाकर उसकी कुर्सी साधारण हालत मे कर दी गई । उसे बघनों से मुक्त कर दिया गया-उसने फिर अधेड वाला चेहरा लगाया और उसके बाद ब्रिगेजा की आज्ञा पर उस लडकी को कमरे में भेजा गया ।

कमरा अदर से फिर बद कर लिया गया I अब कमरे मेँ वे तीनों थे l लडकी सहमी-स्री खडी हो गई I उसकी समझ मे कुछ नही आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है ? तभी व्रिगेजा ने उसकी और देखा लडकी ने नजरे झुका ली । ब्रिगैंजा शात और गभीर स्वर में बोला ।

"बैठ जाओ ।"

वह लडकी होले से उस कुर्सी पर बैठ गई जिसकी ओर ब्रिगेंजा ने इशारा किया था… ।


" तुम्हारा नाम क्या है ?" ब्रिगेजा ने पूछा ।



--"'स स सविता l” लडखडाते-से शब्दों मेँ उसने सक्षिप्त उत्तर बडी कठिनाई से दिया l


"'तुम्हें वह आदमी कहा से लाया था ?"



"म म मैं I" वह लडकी गर्दन उठाका बडी ही कठिनाई से बोली…"मैं होटल के बाहर से गुजरती हुई अपनी सहेली के साथ जा रही थी कि उस बदमाश ने मुझे पकडकर अदर खदेडा ।” और उसके बाद वह कुछ न कह सकी बल्कि उसके नेत्रों से आसू निकल पडे और फफककर रो पडी । तभी सग्राम बोला ।



"अरे बडी पागल हो सविता बहन--- अब क्यों घबराती हो तुम्हारा माई तुम्हारे पास है ।"



"भैया.....ऽऽऽऽऽ.... I” सविता इस कठिन संमय में एक अनजान को भाई के इस रूप मे देखकर भावनाओ में बह गई !!


सग्राम के सीने से लग गई । तभी संग्राम ब्रिगेंजा से बोला ।



"मिस्टर ब्रिगेजा मैंने सविता को अपनी बहन बना लिया है । अत्त किसी की भी गदी' नज़र. मैं इसकी और उठती नहीं देख सकता और इस समय यह ऐसे स्थान पर आ गई है-जहा प्रत्येक मर्द की नज़र प्रत्येक स्त्री के लिए गदी होती है । अत्त सबसे पहले मैं चाहूगा कि सविता को उसके घर पहुचा दिया जाए ।"


"ठीक है ।" बिगेंजा ने वेहद ही गभीरता के साथ बोला…" सविता जी आप कहा रहती हैं ?”


"पैतीस गाधी रोड I " अब सविता की सिसकियां समाप्त प्राय हो गई थी ।


"पिता का क्या नाम हे ?” बिगेजा का अगला प्रश्न ।


"मेरे पिता वेज्ञानिक हैं । नाम है प्रोफेसर हेमत..... ।"


'क्या हेमत ?????"


और ब्रिगेंजा की खोपडी मानो हवा में चकरा रही. थी I

संग्राम ने उसके. चेहरे के बदलते भावो को अनुभव किया । ब्रगेंजा बुरी तरह चौंका है ।


उसके चेहरे पऱ ~ उभरने-वाले भाव सख्त हो गए हैं शायद उसके इरादो मे भयानक परिवर्तन होना… चाहता था…ब्रिगेंजा के बदले भाव आने वाले भयानक खतरे के प्रतीक थे ।

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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 25 Sep 2017 14:22

नाटे नकाबपोश का रहस्य तो आग के बेटों और आग के स्वामी पर खुल चुका था । उसे देखकर सब व्याचर्यचक्ति तो रह ही गए थे, किन्तु न जाने उन्होंने क्या सोचा था कि 'उसे उसको नकाब वापस करके कमरा नवंर चार मेँ एक प्रकार से कैद कर दिया गया । इस समय भी उसके चेहरे पर वही काली नकाब थी I


बैसे आग के बेटों पर अपने रहस्य के खुलते का दुख था किंतु ऐसा लगता था जैसे वह कुछ अशो तक अपनी योजना मे सफल भी था । कुछ आग के बेटे उसे इस कमरे मे डाल गए थे । कमरा गोल था जिसमें जीरो वाट का छोटा बल्ब जल रहा था ।



एक तो उसका प्रकाश स्वय ही अत्यंत क्षीण था । दूसरे बल्ब पर जमी गर्द ने और अधिक सहायता की थी I अत छोटे से गोल ,कमरे में क्षीण…सा पीला प्रकाश फैला था I. वहा सिर्फ एक पलग. था-जिस पर कपडे. बिछे थे वह शायद नाटे के सोने अथवा आराम करने के इरादे से डाल दिया गया था और इस समय वह उसी पर पडा न जाने क्या सोच रहा था. I


एकाएक नाटे नकाबपोश की निगाह अपने कमरे के दाई और बने एक जगले पर पडी । वह शायद रोशनदान था-जो किसी अन्य कमरे में खुलता था । शायद नबर पाच में।। उसके दिमाग का न जाने कौन…सा शरारती क्रीड़ा कुलबुलाया ।


वह यह सोचने लगा कि कमरा नंबर पांच मे कौन हैं यह देखने के लिए वह रोशनदान तक पहुचने का उपाय सोचने लगा । उसे अघिक दिमाग नहीं लगाना पडा । तुरत और फुर्ती, किंतु' इस सतर्कता के साथ कि कहीं कोई आहट उत्पन्न न हो। पलंग से समस्त कपडे समेट एक ओर को रख दिए और पलगं उठाकर रोशनदान के नीचे दुपाया खडा किया i पलग का दूसरा सिरा रोशनदान तक लगभग पहुव ही गया l उसने फुर्ती के साथ कमरा अदर से बद किया ताकि अचानक ही कोई अंदर ना आ सके

फिर वह फुर्ती के साथ पलंग पर चढ गया और बहुत ही सतर्कता के साथ कमरा नबर पाच में झाका । वहा विकास था…जो अपने पलग पर बैठा बडे आराम से कछ गुनगुना रहा था ।। देखने मे विकास तनिक भी चिंतित' नहीं आत्ता था । वह पूर्ण लापरवाह था…मानो इस कैद की उसे लेशमात्र भी, चित्ता नहीं है । उस शरारती को देखकर नाटे साए के अधरों पर धीमी सी मुस्कान नृत्य कर उठी । अगले ही पल उसने' अपने मुख से सी सी की धीमी कितु ऐसी ध्वनि निकाली जिसे पलग पर बैठे विकास ने सुन लिया । विकास इस आवाज को सुनकर धीमे से चौंका एक झटके के साथ उसकी 'बडी-बडी आखें रोशनदान की ओर उठ गई । वह अभी कुछ बोलने ही जा रहा था कि नाटे स्याहपोश ने तुरत उसे चुप रहने का सकैत किया।।


विकास एकदम चुप हो क्या औंर ध्यान से उसे देखने लगा ।।


स्याहपोश ने उसे रोशनदान तक आने का सकेत किया । विकास ने भी स्राकेतिक भाषा में ही पूछा…"कैसे ??" सकेत मे ही नाटे ने बिकास को रोशनदान तक आने की , तरकीब बताई-बिकास ने भी अपनी कोठरी की साकल अदर से बद की और उसी प्रकार रोशनदान के नीचे पलग लगाकर रोशनदान तक आ गया ।


"इन्होंने तुम्हें कोई यातना तो नहीं दी ?" तभी नाटा साया बोला .


“ नहीं…यह्य मैं आराम से हू।" विकास तुरत बोला…"किन्तु तुम यहा कैसे फस गए ।”


"परिस्थिक्ति बडे अजीब मोड ले रही हैं ।" नाटा अत्यत गभीर स्वर में बोला…"मेरा विचार था कि प्रोफेसर हेमत ही आग के बेटों का सरदार है अब ऐसा लगता हैं कि कोई और ही है-प्रोफेसऱ हेमत तुम्हारे द्वारा स्टार से डराया जाना आग के वेर्टों से कुछ अलग की ही बात लगती है---मेरे विचार से उसका डरना और यह केस अलग-अलग बात है क्योंकि ये लोग हेमत का अपहरण करके लाए है और इनके चीफ़ ने उसे कमरा नबर एक में रखने का आदेश दिया है ।।"


"तो इसका मतलब हमारा सोचना गलत साबित हो गया । " विकास भी रहस्यम स्वर में फुसफ़साया ।



"ऐसा ही लगता है क्योंकि उन्होंने स्वय प्रोफेसर हेमत को उठवाया है ।"

--" किन्तु अगर प्रोफेसर हेमत का आग के बेटों से कोई.. . सबध नहीं है तो अपहरण उसी का क्यों करवाया क्या ?”


"इस प्रश्न का उत्तर, अभी पूर्ण रूप से मैं कछ नहीं दे सकता। अनुमान के आधार पर मैं. यह कह सकता हू कि शायद हेमत से कोई खतरा उत्पन्न हो गया होगा ।” दोनो की बाते अत्यत धीमे और रहस्यमय ढग से हो रही थीं ।


. ……३"कहीं प्रोफेसर हेमत के अपहरण के पीछे उनकी विजय अकल से की गई वह घोषणा तो नही…जिसमें उन्होंने दो तीन दिन मेँ आग कै बेटों को बिफल कर देने के विषय मेँ कहा था ?" विकास का स्वर अत्यत्त धीमा था ।।



"सभव है वह कारण भी रहा हो किंतु' इन्हें उस घोषणा का पता कैसे लगा होगा ?"



"ऐसे दलों के हाथ बहुत लम्बे हौते हैं-किसी भी तरीके से पता लगा सकते हैं ।"



"खेर सब पता लग जाएगा !" नाटा साया बोला…"अब तुम एक अन्य घटना सुनो…जिसे तुम सुनकर निश्चित रूप से चौक पडोगे I” नाटा साया अत्यत्त रहस्यमय प्रतीत होता था।



"कैसी घटना ?”


"आप के बेटों पर मेरा रहस्य खुल चुका हैं ।" वह मुस्कराकर बोला ।



"क्या कहा कैसे ?" वास्तव में विकास चौंक पडा फिर बोला ---"अब इस षडयत्र का लाभ ही क्या रहा?"


"मज़बूऱी…है...!" नाटा बोला -"लो अब यह नकाब तुम पहनो !" कहते हुए नाटे ने अपना हाथ नकाब को उतारने के लिए बढाया ही था कि वह बुरी तरह चौक पडा ।।

कोई व्यक्ति बाहर से उसकी कोठारी का दरबाजा खटखटा रहा था ।

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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 25 Sep 2017 14:23

यह जानते ही कि सामने बैठी लडकी प्रोफेसर हेमत की लडकी हैं । ब्रिगेजा का दृष्टिकोण उसके प्रति एकदम बदल गया ।। अभी तक विचार था कि सग्राम की भावनाओ क्रो ध्यान में रखकर वह इस लडकी' को सकुशल अपने पर पहुचा देगा , लेकिन यह जानने के बाद कि सविता हेमत की लडकी है-उसकै दिमाग मेँ एकदम कई बाते घूम गईं । क्षणमात्र में उसने निश्चय किया कि सविता आग के बेटों की प्रगति को चार चांद लगा सकती है ।



ब्रिगेजा को पता था कि उनके दल ने हेमत का~अपहरण इसलिए किया है…क्योंकि वह एक प्रगतिशील वैज्ञानिक हैं। उसके वैज्ञानिक मस्तिष्क को प्राप्त करने के लिए ही उसका अपहरण किया गया है।।


उसका अपहरण इसलिए किया गया है-कि वह आग के बेटों कै लिए काम करने लगे ।”


एक क्षण में ही ब्रिगेंजा के दिमाग में सब' कुछ घूम गया ।। बिगेजा यह जानता था कि हेमत एक भारतीय वैज्ञानिक' है जो स्भवाभ से बडे दृढ जिददी होते हैं और किसी भी कीमत . पर अपने दिमाग को शत्रुओं को अथवा अपराधियों को नहीं ब्रेचतें हैं यानी कि ब्रिगेंजा को सदेह था कि प्रोफेसर हेमत्त उनक. लिए काम करने के लिए तैयार हो जाएगा और अगर ऐसी स्थिति आती है तो सविता उनकें लिए वरदान सिद्भ हो सकत्ती है ।

अपनी बेटी क्री यातनाए शायद हेमत न देख सकै और वह उऩके लिए कार्य करने के लिए बाध्य हो जाए । मतलब ये कि इस समय ब्रिगेंजा कै हाथ में सविता के रूप मेँ एक हीरा था…जिसे वह किसी भी मूल्य पर खो ’नहीं सकता था । यही क्रारण था कि उसके चेहरे भाव परिवर्तित हो गये । आखों' में दृढता उभर आई । वह बोला ।


"मैं तुमसे अकेले में कुछ बाते करना चाहता हूं ।" उसका संकेत सग्राम की ओऱ था ।

"क्या मतलब? ” इस बार सग्राम उछल गया ।


सविता के मुखडे पर फिर परेशानी के लक्षण उभर आए । उसके बाद अपने आदमियो को बुलाकर बिर्गेजा ने सविता को बाहर भेजा और फिर अदर से दरवाजा बद करके वह सग्राम की और घूम गया और अत्यत गभीर स्वर मे बोला ।


". . क्या तुम वास्तव मेँ इटरनेशनल अपराधी हो ?”



“क्या मतलब…इसमे सदेह क्या है ?" सग्राम बुरी तरह चौंककर बोला ।


…"'तुम फर्ज को अधिक महत्व देते हो अथवा भावनाओं को ?” ब्रिगेंजा का अगला रहस्यपूर्ण प्रश्न ।


"तुम कहना क्या चाहतें हो…मैं तुम्हारा मतलब … नहीं. समझ पा रहा हू।"


"मैं सिर्फ अपने प्रश्नों` का सक्षिप्त उत्तर चाहता हूं। I सीधा उत्तर दो कि तुम फर्ज और भावनाओं में से किसे सर्वोपरि मानते हो ?" ब्रिगेंजा इस समय अत्यधिक गभीर स्वर में बाते कर रहा था ।


"कोई भी व्यक्ति जो फर्ज को भूलकर भावनाओ मेँ बहता होगा…इटरनेशनल अपराधी नहीं बन सकता और स्पष्ट-प्ता उत्तर यह है कि मेरे सिद्धातों की सूची में सर्वोपरि फर्ज है-उसके बाद भावनाएं ।" संग्राम का गभीर उत्तर ।


"वेरी गुड !" ब्रिगेजा प्रशसनीय स्वर मे बोला-"मुझे तुमसे यही आशा थी अब मेरी बात ध्यान से सुनो ।"


ब्रिगेंजा ने अपनी बात कुछ इस प्रकार सुनाई-"ये लडकी जिसे
तुमने बहन बनाया है यानी सविता हमारे गिरोह की प्रगति के लिए एक अत्यत ही आवश्यक मोहरा है । जेसा कि तुमने सुना…उसके पिता हेमत भारत के. एक बडे वैज्ञानिक हैं । तुम जानते हो कि आग के बेटों का समस्त खेल विज्ञान पर आधारित है । सविता कै ज़रिए हमे एक बड्रा वैज्ञानिक हेमंत्र प्राप्त ही सकता है।"


सग्राम ब्रिगेजा कै कुछ ही शब्दों से उसका अभिप्राय समझ गया ।

किंतु उसके चेहरे के भावों.. में. किसी. प्रकार का परिवर्तन न आया वह ब्रिगेजा की आखो मे घूरता हूआ बोला ।


"वास्तव में मुझें तुमने काफी दुबिधापूर्ण स्थिति मे फसा दिया है । तुम्हारे किसी काम के. बीच में न तो मुझे आना चाहिए और न ही मैं आ सकता हू…किन्तु तुमसे मैं व्यक्तिगत रूप ~ से इतना जरूर कहूंगा कि सविता पर कोई बुरी नजर न डाले । वेसे तुम और तुम्हाग दल जैसे कार्य करना चाहे-उसमें मैं बाधा डालने की न तो शक्ति रखता हू और न ही डालूगा ।"



"वेरी गुड I" ब्रिगेंजा खुश होकर बोला…"मानता हू कि तुम वास्तव में इटरनेशनल अपराधी हो…प्रारभ में तुम्हें चीफ के पास आखों पर पट्टी बाघकर चलना होगा ये हमारा कानून है I"


इसके उत्तर में संग्राम मुस्कराकर बोला "मैं जानता हू-अक्सर ऐसे दलों का यह प्रथम कानून होता है ।"

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लगभग एक ही साथ सग्राम और सविता की आखो से पटिट्या हटाई गई I उन्होंने स्वयं को एक विशाल गोल हॉल मेँ पाया। उनकें चारों तरफ़ लगभग तीस शक्तिशाली इसान ग्रीन कपडे पहने हुए खड़े थे । कुछ देर तक तो वे दोनों अपने चारों ओर का निरीक्षण करते रहे । फिर उन दोंनों की निगाह सामने ब्रिगेंजा पर स्थिर हो गई जो मुस्करा रहा था ।



कुछ देर तक वे उसे देखते रहे, फिर वे आपस में एक-दूसरे को देखने लगे I



सविता तो बेचारी सहमी-सी थी । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसे घर पहुचाने का प्रोगाम स्वय अधेड ने क्यो त्याग दिया और उसके साथ ये उपन्यासों जैसी घटनाएं क्यों हो रही हें ।



उसके, लिए इस समय एकमात्र सहारा उसका वह भाई ही था, जो इस समय भी उसी अधेड के रूप मे था । अत: उसने अपने भाई से हमेशा अपने साथ रहने की प्रार्थना की थी, जिसे अधेड के मेकअप के पीछे छुपे सग्राम ने सहर्ष स्वीकार कर लिया । सविता अपनी प्रत्येक परेशानी उसे इस प्रकार बताती मानो वे एक ही कोख के बचपन से साथ ही खेले हों I बताती भी क्यों नहीँ…जमाने की इस भीड मे, जहां आज प्रत्येक मर्द प्रत्येक औरत पर बाज की भाति झपटता है-ऐसे समाज र्में उसे सिर्फ यह अधेड ही पवित्र लगा. था उसे लग रहा था…जैसे यह अधेड ही सब कुछ है ।

सग्राम भी वास्तव में प्रत्येक पल उसके साथ था i न जाने क्यों उसे भी राक्षसों के बीच फसीं लडकी. से सहानुभूति हो गई थी ।


" कुछ समय पश्चात आप लोगों की भेंट मेरे चीफ से होगी ।" ब्रिगेजा ने कहा l



दोनों ही शात रहे । सविता ने अधेड की और देखा तो उसे मुस्कराते पाया । उ सीथी-सादी लडकी के दिमाग में कुछ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या चक्कर है. .

अब तो उसके लिए उसका. भाई भी रहस्य बनता जा रहा था । उसकी समझ में नहीं ~ आ रहा था कि इस कठिन परिस्थिति में भी वह मुस्करा रहा है ।


कमरे के अदर अकेले मेँ ब्रिगेजा और उसमें क्या बातें हुई हैं ?
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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 25 Sep 2017 14:23

अभी प्रत्येक व्यक्ति अपने निजी विचारों में उलझा हुआ .. था कि धीमे-धीमे चमचमाते हाल का प्रकाश मानो सिमटने-सा लगा…अंत में उस समय जबकि स्टेज पर विचित्र बल्बो वाले नकाबपोश के रूप में आग का स्वामी' प्रक्ट हुआ । हॉल में धुघला सा प्रकाश प्रसारित था । ऐसा प्रकाश जिसमें एक इसान दूसरे इंसान की सूरत पहचान सकता था ।


स्टेज पर उसके आगमन पर समस्त आग के बेटे श्रद्घा के साथ झुक गये सविता आश्चर्य के साथ सब कुछ देख रही थी…जबकि संग्राम के होंठों पर, अब भी एक विचित्र-सी मुस्कान थी ।


"बेटा नः गर्मीला सेशन ।” हॉल में रहस्यमय नकाबपोश का भर्राया हुआ स्वर गूजा ।



"यस महान स्वामी ।" ब्रिगेजा आगे बढता हुआ बोला ।



"मिस्टर सग्राम की सारी कहानी हम जान चुके हैं इन्हें अपने दल के समस्त नियम बता देना I”


"जैसी आज्ञा महान स्वामी l” ब्रिगेंजा बोला ।



"तुमने इस सविता नाम की लडकी. को यहां लाकर वास्तव में प्रशंसनीय कार्य किया है मिस्टर गर्मीला सेशन । वास्तव में यह लडकी हमारे दल को एक बडा मस्तिष्क दे सकती है I"


उसकी बात सुनकर सविता कुछ बोलने ही जा रही थी कि संग्राम ने आखो-ही-आखों में उसे चुप रहने का सकेंत किया ।


उन्होने सुना आग का स्वामी कह रहा था ।


"खैर --सबसे पहले मै आप लोगों को जासूसों के एक षडयत्र के पर्दाफाश का एक खेल दिखाता हू।" चीफ की आवाज हाल में गूंज रही थी । कुछ आग के बेटे तो वह खेल देख ही चुके हैं किंतु कुछ ने नही देखा हे । आज सभी के सामने इन जासूसों के षड्यंत्र का पर्दाफाश किया जाएगा और साथ ही सजा भी दी जाएगी ।"

समूचे हाॅल में सन्नाटा व्याप्त रहा । "



"मिस्टर दर्बीला सेशन I” आवाज गूंजी ।



--"यस महान स्वामी ।" एक अन्य इसान आगे बढकर आदर से बोला ।



"तुम तुरंत अपनी टोली के साथ बिकास बिजय और उस नाटे को हाल में ले आओ ।"


"ओके महान स्वामी ।" कहकर वह हाल के दाईं ओर बने दरवाजे की ओर बढा ।


उसके साथ उसके पांच साथी भी थे । सभी लोग उत्सुकता से उनके आगमन की प्रतीक्षा करते रहे I


अभी कठिनता से तीन मिनट ही व्यतीत हुए थे कि दर्बीला सेशन बदहवास-सा भागता हुआ हाल में प्रविष्ट हुआ-उसकॅ चेहरे पर हबाईया उड रही थीं । घबराया-सा वह बोला l



"महान स्वामी विजय कैद से फरार हो गया ।"



……"'क्या कहा ? विजय गायब हो गया ?" सभी के मुख से निकला-वास्तव में इन शब्दों ने हाल में विस्फोट का कार्य किया I सभी लोग हतप्रभ-से रह गए ।



आग का स्वामी खतरनाक ढग से गुर्राया ।



"नबर दर्बीला सेशन…तुम अपनी समस्त टुकडी के साथ विजय की कोठी तथा उन सभी स्थानों पर अपना जाल फैला दो…जहा वह जा सकता है I जैसे रघुनाथ की कोठी कोतवाली इत्यादि I"


"ओके सर ।" दर्बीला सेशन ने कहा और हॉल से बाहर निकला ।

इस बार उसके साथ दस साथी थे । उनके जाने के पश्चात नकाबपोश बडे, रहस्यमय स्वर मेँ बोला I

~-~“वह बेवकूफ शायद फरार होकर यह समझ रहा हे कि वह आग के बेटों का कुछ बिगाड लेगा-किन्तु उसे यह नहीं मालूम कि आग के बेटे तो उस महान शक्ति के तुच्छ सेवक हैं जिसके रहते वह आग के बेटों का कुछ नहीं बिगाड सकता । खैर छोडो । हमें कोई बिशेष चिता नहीं है I अब आप लोग जासूसों का चौका देने याला षड्यंत्र देखिए।" स्वामी बोला I

हॉल में विकास और नाटे को ले आया गया । वे दोनो चुपचाप आमने-सामने वाली कुर्सिंयों पर बैठ गए ।



तभी नकाबपोश की आबाज फिर गूजी ।



"मिस्टर ब्रिगेजा-इस नाटे का नकाब उतारो तो तुम्हें मालूम हो जाएगा कि जासूसों ने आग के बेटों के विरुद्ध कितनी गहरी साजिश का निर्माण किया था ? आप लोग इस नाटे का नकाब उतारने के बाद चौंके बिना न रह सकेंगे !"


इधर स्वामी के शब्द हॉल में गूज़ रहे थे उधर ब्रिगेंजा आज्ञा का पालन करता हुआ नाटे के निकट पहुचा और फिर स्याह नाटे का नकाब नोचने के लिए हाथ बढाया । स्वय ब्रिगेंजा का दिल धडका । अन्य लोगों की जिज्ञासा भी चरम सीमा पर पहुच गई । सभी जानना चाहते थे कि इस नकाब के पीछे कौन-स्रा शातिर छपा है ? और फिर उसने आग के बेटों के बिरूद्ध कौन-स्रा षडयत्र रचा हैं ?



और उस समय जबकि ब्रिगेंजा ने एक झटके के साथ नाटे का नकाब नोच लिया । हॉल मेँ उपस्थित आदमियों की भय-मिश्रित चीखे निकल गई । वे आश्चर्य के साथ उस नाटे को देखने लगे । खुद ब्रिगेंजा उसके चेहरे पर नज़र पडते ही इस प्रकार उछल पडा मानो उसे पैरों के नीचे से फ़र्श हट गया हो । कदम पीछे हटाकर वह गजब की हैरत के साथ बोला ।


" विकास !" वास्तव में वह नाटा विकास के अतिरिक्त अन्य कोई भी नहीं था । विकास के प्यारे अधरों पर इस समय गजब की शरारती मुस्कान थी । सभी व्यक्ति हैरत से कभी नाटे कै रूप मे बिकास को देखते और कभी सामने बैठे दूसरे बिकास को जो चुपचाप बैठा था ।
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