आग के बेटे / vedprkash sharma

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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 04 Sep 2017 17:03

बात ही ऐसी थी कि रघुनाथ कापकर रह गया ! उसकी इतनी बडी. जिदगी में शायद. ही ऐसी बिचित्र और भयानक घटना घटी हो-जैसी अब उसके सामने थी । उसके माथे पर पसीने की वूदें उभर आई थीं । एक… ही पल में बाल कुछ इस प्रकार ,अस्त-व्यस्त हो गए कि ऐसा लगा मानो उसके किसी प्रिय का देहात हो गया हो I उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस गभीर स्थिति मे करे भी तो क्या. . .? रघुनाथ ऐसा आदमी न था, जो साधारण घटना से घबरा जाए अथवा उसमे सोचने-समझने की शक्ति न रहे, किंतु इस घटना ने वास्तव में उसके हाथ…पेर. . फुला दिए । उसकी समझ मे नहीँ आया कि आखिर आग के बेटों को उससे भला व्यक्तिगत रूप से क्या दुश्मनी हो सकती है । उसने अपने पीले पड़े हुए शुष्क अधरों पर जीभ फेरी, परेशानी की स्थिति मेँ गालो पर हाथ फेरा और फिर उसकी आखें उस लाल कागज पर जम गई…जो उसे अभी कुछ समय पूर्व ही प्राप्त हुआ था । उसकी परेशानी का कारण यही कागज़ था ।


परेशानी की हालत मे उसने माथा थाम लिया और फिर उन अक्षरों को पढने लगा…जो टाइप किए हुए थे । जैसे जैसे वह उस कागज को पढता गया…वेसे-बैसे उसकी आखो' से चिता झाकने लगी-होंठों की शुष्कता मे चार चांद लग गए, माथे पर पसीने की बूदों में वृद्धि, हो गई ।



हालाँकि इस समय उसने वह कागज पांचबी अथवा छठी बार पढा. था-किन्तु न जाने क्यों वह कापकर रह जाता ।


रघुनाथ ने घडी देखी और फिर कुछ निश्चय करके फोन विजय से मिलाकर बोला----" हैलो ! मै रघुनाथ बोल रहा हू।"


……"कौन मेघनाथ ? अरे. भईं कलियुग में मेघनाथ. कहां से आ गया ?"


दूसरी और से विजय जानबूझकर शरारत कर रहा है-यह आभास पाकर रघुनाथ बुरी तरह से झुझलाकर बोला "विज़य! मै रघूनाथ बोल रहा हूं।"



"अरे भाई बड़े विचित्र आदमी हे…आप । अभी-अभी आप कह रहे थे कि आप मेघनाथ हे और अब अपने-आपको बैद्यनाथ बता रहे है । भाई, बैद्यनाथ नाम का मेरा कोई दोस्त नहीं है I”



-"बिजय, गंभीर हो जाओं…मेरी बात सुनो ।" इस समय रघुनाथ की विचित्र-सी स्थिति हो गई थी । उसे इस समय विजय का मजाक, बहुत ही बुरा लगा था ।



…"अच्छा--प्यारे तुलाराशि बोल रहे हैं ।".विजय चहककर बोला…"प्यारे तुलाराशि-क्या आज सुबह-सुबह झकझकी सुनने का मूड बन गया है ? हम जानते थे रघु डार्लिग कि एक…न-एक दिन तुम हमारी झकझकिर्यों की महानता का महत्त्व समझोगे¸ औंर वह तुम्हारी रातो की नीद छीन लेगी तभी तो आज़ सुबह-सुबह हमें फोन मारा हे, लेकिन घबराओ नहीं प्यारे-हम तुम्हें निराश नहीं करेगे । अत: तुम्हारी सेवा मे एक महान औंर नबीन झकझकी पेश है ।"


इससे पूर्व कि रघुनाथ कुछ बोले, विजय ने सम्पूर्ण भाषण दे डाला । वह सास लेने के लिए थमा और इससे कि वह झकझकी की एक भी पंक्ति सुनाए…रघुनाथ शीघ्रता से बोला !!


"विजय. . मुझे आग के बेटों का पत्र मिला है ।"


" अवश्य मिला होगा प्यारे । हां तो हमारी यह महान झकझकी ये है ।” कहते हुए बिजय ने झकझकी बाकायदा मिक्सी धुन पर गाकर सुनाई ।


"राजेश खना हंस रहे, डिम्पल के संग।
ये नजारे देखकर, अंजू रह गई दंग I
अंजू रह गई दंग I तैश उसकै बाप को आया ।
इतना सुन लोग. बोले, ये कैसा कलियुग आया ।”


बिजय, प्लीज, गंभीर हो जाओं, स्थिति. बहुत गभीर है I” रघुनाथ गिडगिडाया.. ।।

" गभीर तो आज तक हमारा बाप मी नहीँ हुआ तुलाराशि ।" विजय उसी प्रकार बोला…"वैसे तुम सुनाओ हमारे यार आग के बेटों का क्या सदेश है ??"


"विजय उन्होंने इस बार व्यक्तिगत रूप से मुझे धमकी दी है । पता नहीं उन्हें मुझसे क्या शत्रुता है ? उन्होंने मुझें अब भयानक चैलेज दिया है ।"

"'अबे प्यारे तुलाराशि-बको भी क्या चैलेंज दिया ?"


"विजय उन्होंने तुम्हारी भाभी का अपहरण करने की धमकी दी है I”



~ “ क्या रैना भाभी ?" वास्तव मे विजय चोंक पडा l


“ हां विजय I” रघुनाथ के लहजे… मे परेशानी स्पष्ट झलक रही थी "उन्होंने इस बार व्यक्तिगत रूप से मुझे चैलेंज दिया है, उनका कहना है कि ठीक दस बजे आकर वे रैना को ले जाएगे।"



"लेकिन प्यारेलाल क्यों ? तुमसे अथवा रैना भाभी से उन्हें क्या शत्रुता हो सकती है ??"



"मेरी समझ मे कुछ नही आ रहा है विजय-तुम्ही… सोचो कि अब क्या किया जाए ?"


" खैर प्यारे…तुम वो पत्र सुनाओ, जिसमे वह धमकी दी गई है !"



रघुनाथ की आखें फिर उस कागज पर जम गई…शुष्क होंठों पर जीभ फेरी और पत्र पढना प्रारम्भ किया l


बिजय ध्यानपूर्वक सुन रहा था ।


प्यारे रघुनाथ,


आप लोगों नै हमें, हमारे पहले कार्य में सहयोग दिया । सर्वप्रथम इसके लिए आप लोगों को धन्यवाद । हम आशा करते है कि आप लोग हमें हमारे जनकल्यान के प्रत्येक कार्य में इसी तरह सहयोग देते रहेगे।


आखिर तुम भी पुलिस के एक जिम्मेदार अधिकारी हो । अतः तुम भी जनकल्याण के पक्षपाति तो हो ही ।

हम जानते हैं कि तुम अपनी बीबी रैना सै बहुत अधिक प्यार करते हो यह प्यार इतना बढ गया हैं `कि तुम कभी-कभी रैना कै प्यार में अपने कर्तव्यों को भी भूल जाते हो जबकि ज़नकल्याकारिर्यों की दृष्टि में ये लेशमात्र भी ठीक नहीं हैं । किसी के व्यक्तिगत प्यार के लिए कोई अपने कर्तव्य को भूल जाए, यह बात जनकल्याणकारीयो की दृष्टि में तनिक भी उपयुक्त नही । अतः तुम- अपना सम्पूर्ण ध्यान अपने कर्तव्य ही की रख सको इसलिए हम तुम्हारी पत्नी रैना की ठीक दस बजे लेने आ रहे हैं, फिर रैना तुम्हें कभी नही मिलेगी , ताकि तुम जीवनपर्यत अपना ध्यान अपने कर्तव्यों पर केंद्रित कर सको और जन कल्यान कै जीते रहो I

अच्छा अब ठीक दस बजे मुलाकात होगी । आशा है हमारी जनकल्याण की भावनाओं को समझोगे और हमारे कार्य में बाधा उत्पन करने कै स्थान पर हमें सहयोग प्रदान करोगे। I


आप ही के दोस्त जनकल्याणकारी।

आग के बेटे ।।।



" ओह । ये बात है प्यारे तुलाराशि ।" विजय बोला ।


--"विजय, देखो नौ बज चुके हैँ-उनके द्वारा दिए गए चैलेंज मे सिर्फ एक घंटा शेष रह गया हैं l शीघ्रता से सोचो, क्या किया जाए ?" परेशान रघुनाथ बोला । ..



" सोचने की आवश्यकता है प्यारे तुलाराशि । साले लगता है तुम वास्तव मे अब असली सरकारी सांड नहीं रहे हो । अत: आग के बेटे अच्छा ही कर रहे है ।"


"प.....प्लीज, मजाक नहीं ।"



" खैर प्यारे-ये बताओ तुम्हें ये पत्र मिला कैसे ??"


" सुबह सोकर उठा ही था कि मैने इसे अपनी मेज पर रखा पाया । यह मेज पर पेपरवेट से दबा रखा था I"


" तो ठीक है प्यारे लाल----अब आग कै बेटों की प्रतिक्षा करो !" दूसरी ओर से विजय ने कहा और तुरत ही फोन रख दिया । ~


फोन रखने की आवाज़ रघुनाथ को ऐसी लगी जेसे किसी. . ने उसके सीने मे हथोडा मार दिया हो । हाथ मे रिसीवर लटकाए ~ वह बुत-स्रा खडा रहा । वह जानता था कि मुसीबत मे अपने भी पराए हो जाते हैं-तभी तो विजय' ने भी समय की गभीरता को बिना समझे ही मजाक मे उड़ा दिया । उसे लगा जेसे इस समय वह बिल्कुल अकेला हो । उसे. लगा कि जैसे वह आग के बेटों को रोक न सकेगा । अभी वह रिसीवर हाथ मेँ लिए विचारों में ही खोया हुआ था कि एकाएक चौंक पडा । .


…" क्या बात है ? आज़ आप सुबह-सुबह किसे फोन कर रहे हैं ?"


"ऐ ! ” रघुनाथ चौक पडा । उसने सामने खडी रैना को देखा जो हाथ मे चाय लिए खडी थी ।


वह स्वय को सभालता हुआ बोला…'"किसी को नहीं किसी को भी तो नहीं !" कहते हुए उसने तुरत ही रिसीवर को रख दिया और मुस्कराने का असफल प्रयत्न किया ।



"अरे !" रैना उसके हाथ मे दबे आग के वेर्टों के -पत्र की ओर सकैत करते बोली-" ये आपके हाथ मे क्या है ? औ इसका रग तो लाल है । क्या बात है ? आप परेशान लग रहे है ?"


" कुछ नहीं यू ही जरा-लाओ तुम चाय दो ।" रघुनाथ ने बात को टालने का प्रयास किया ।


किंतु रैना की नजरों से छुप न सका उसने चाय मेज पर रखी और रघुनाथ की ओर बढती हुई बोली…"पति नहीं आप हर बात मुझसे क्यो छिपाते हैं ? दिखाइए, क्या है ये ??"



"कुछ नहीं तुम्हारे मतलब की चीज नहीँ हे ये । लाओ चाय दो ।"


रघुनाथ पीछे हटता हुआ बोला ।

'रैना भी भला इस प्रकार कहा मानने बाली थी । कुछ समय तक तो दोनों मे छीना…झपटी होती रही अत मे रेना पत्र

लेने में कामयाब हो गई I



रघुनाथ माथा. पकडकर पंलग पर बैठ गया I
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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 04 Sep 2017 17:03

रैना ने पत्र पढना, आरम्भ किया ।


पढते-पढते, उसकी विचित्र-सी हालत हो गई । उसका मुख पीला पड… गया I उसकी आखों मे भय झाक्रने लगा । नजरे उठाकर उसने सामने लगे घंटे को देखा-जो सवा नौ बजने का सकेत कर रहा था।।

रैना के माथे पर भी पसीने की बूदों का साम्राज्य हो गया ।


कुछ सोचकर वह फोन की तरफ बढी तथा नंबर रिग करने लगी तो रघुनाथ बोला…"क्या करने जा रही हो किसे फोन कर रही हो ?”



"ठाकुर साहब को I" गभीरता के साथ रैना बोली ।


न जाने क्यो रघुनाथ चुप रह गया…वह कुछ भी कह न सका ।।



इधर रैना ने ठाकर साहब सै सबघ स्थापित होने पर कहा-"हैलो ! पिताजी मैं रैना बोल रही हू।"


" अरे रैना बेटी-आज सुबह-ही-सुबह कैसे ?"


--"पिताजी आपके अपराधियों ने हमें भयानक चैलेज़ दिया है ।" रैना का स्वर भयभीत था ।


"क्या मतलब ? कैसे अपराधी किसको' चैलेंज?" ठाकुर साहब चौंके I


"आग कै बेटों का चैलेज-" हमारे लिए I" रैना ने फिर कहा और उसके बाद उसने समूचा पत्र फोन पर ठाकुर साहब को सुना दिया ।



सुनकर ठाकूर साहब भी स्तब्ध रह गए I उनकी समझ मे नहीं आया कि ये आग के बेटे आखिर क्या हे ? इनका अखिर उद्देश्य क्या है?? किंतु फिर भी वे स्वय पर सयम पाकर बोले।


"घबराने की क्रोई बात नहीं है वेटी इस बार आग के बेटे किसी भी कीमत पर अपने अभियान मे सफल नहीं हो सकेंगे । इस बार भयानक ढग से उनका सामना किया जाएगा I घबराओ मत I रघुनाथ कहा है उसे फोन दो । " I

तब…जबकि फोन पर रघुनाथ बोला तो ठाकुर साहब बोले…"रघुनाथ बडे शर्म की बात है कि पुलिस के इतने बडे अधिकारी होते हुए भी छोटी-सी परेशानी से घबरा गए । ध्यान रहे…इस बार आग के बेटे किसी भी क्रीमत पर सफ़ल नहीं हो सकते । इस बार टैकों से उनका सामना किया जाएगा ।"


"ओके सर I" रघुनाथ ने स्वय को सयत किया और अलर्ट होकर कहा ।



उसके बाद ।।


र्सिंर्फ । पद्रह मिनट के अदर-अदर यह समाचार समस्त राजनगर में विद्युत-तरंगों` की 'भाति० प्रसारित हो गया । एक बार फिर समस्त राजनगर पर आतक का साम्राज्य था । सुनते ही सबका रुख रघुनाथ की कोठी होता , आग के बेटों के साथ इस बार पुलिस का चेलेजं भी प्रसारित किया गया था जिसमेँ कहा गया था कि इस बार किसी भी कीमत पर आग कै बेटे अपने अभियान में सफल नही होंगे । इस बार आग के बेटों का स्वागत मौत करेगी । अगले पद्रह मिनटों में पाच टैकों ने न सिर्फ रघुनाथ की कोठी को घेर लिया बल्कि अन्य सडकों. पर भी तीन अन्य टैंक आग के बेटों का स्वागत करने हेतु तत्पर थे ।सेना के जवान टॉमीगनों से लैस थे , राजनगर के सागरीय तट पर न सिर्फ अनेकों स्टीमरों का जाल था, बल्कि सागर के गर्भ मे नेवी के विख्यात जहाजों द्वारा सचालित अनेकों पनडुबियों का सुदृढ. जाल फैला हुआ था । ताकि आग के बेटों का अत तक स्वागत किया जा सकै । वास्तव में इस बार वे अपने प्रयासो में सफलता अर्जित न कर सकेंगे, क्योकि वास्तव में इस बार उनका स्वागत मोत करेगी ।

घडी की सुइया निरंतर बढ रही थीं । लोग दस बजने की प्रतीक्षा कर रहे थे । ऐसे समय मे एक इसान के मुख पर विचित्र-सी शरारतपूर्ण मुस्कान थी ।।



★★★★★

उस रहस्यमय और विचित्र नकाबपोश के आगमन पर कई परिबर्तन एक साथ हुए थे । वहा उपस्थित समस्त इसान आदर के साथ झुक गए ।


समस्त हाल का प्रकाश मानो सिमटकर बस उस विचित्र नकाबपोश के जिस्म मे समाता चला जा रहा था ।


सपूर्ण हॉल में धुंध…सी छा गई । समस्त प्रकाश उस रहस्यमय . .नकाबपोश ने अपने अदर जब्त कर लिया था l वह एक लबा-चौडा और गोल हॉल था-जिसमे लगभग बीस खतरनाक किस्म के व्यक्ति खडे थे । उपस्थित समस्त व्यक्तियों के जिस्म पर एक-से ग्रीन व चुस्त लिबास थे I सबके सिरों पर लाल केप थी । वे हाँल में अपने-अपने स्थानों पर शात खडे थे । हाल के स्टेज पर वह विचित्र नकाबपोश प्रकट हुआ था ।



जिसके जिस्म पर कैसा लिबास है यह तो अघिक प्रकाश होने कै कारण कुछ स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था किंतु फिर भी उस नकाबपोश के नकाब के कुछ कण ऐसे थे जो सुनहरे थे यानी उसके जिस्म पर सुनहरे लिबास के साथ एक सुनहरा नकाब भी था । एक नजर मेँ वह इंसान न लगकर सिर्फ इसानी आकृति ही प्रतीत होता था क्योकि उसका सपूर्ण जिस्म प्रकाश से जगमगा रहा था I उसके सारे जिस्म पर अनेकों बल्ब लगे हुए थे वे भिन्न-भिन्न रगों के थे तथा जगमगा रहे थे । सिर्फ चेहरे वाला भाग अंधकार में विलुप्त था, किंतु नकाब पर किसी अत्यत चमकीले पदार्थ से 'आग के बेटे' शब्द लिखा गया था । उसके सपूर्ण' जिस्म पर बल्ब जगमगा रहे थे । उसके आगमन पर हाँल में उपस्थित सभी लोग आदर¸के साथ झुक गए । उन सभी के सीने पर वही आग के बेटे लिखा हुआ था ।



कुछ समय तक हाल मेँ मौत जैसा सन्नाटा छाया रहा ।

अचानक हाॅल मे विचित्र-सी भिनभिनाहट के साथ कुछ शब्द गूंजने लगे-"आग के बेटे आग की देबी को सलाम पहुचाते है ।ये शब्द उस रहस्यमय नकाबपोश के मुख से निकले थे जिसके आगमन पर अन्य सभी आग के बेटे एक बार फिर आदर के साथ झुक गए ।


उसके बाद रहस्यमय नकाबपोश की भिनभिनाहट फिर गूंजी…"वेटा नबर जर्फीला सेशन ।”

…'"यस महान आग के स्वामी ।" हाल मेँ उपस्थित एक .इसान आगे बढकर बोला…जिसको शायद जर्फीला सेशन नबर से सबोघित किया था ।


"क्या तुमने राजनगर मे उडता समाचार सुना ?”


आग के स्वामी की भिनभिनाहट ।


"'सब कछ आश्चर्यजनक है…महान आग के स्वामी ।" जर्फीला सेशन बोला I


"हम लोगों ने रघुनाथ के यहा ऐसा कोई भी पत्र नहीं ~ भेजा जिसकी चर्चा समस्त राजनगर में फैली हुई है । जिस समाचार के फैलने पर भारतीय सेना का जाल बिछा हुआ है । वे शायद आग के बेटों से टकराना चाहते है लेकिन हम आग
कै बेटे जनकल्यत्माकारी है । अत: व्यर्थ की मार-काट पसद नहीं करते और वैसे भी वह धमकी हम लोगों ने नही दी है । अगर वास्तव में रैना के अपहरण… का हमारा इरादा होता तो हम लोग वहा अवश्य जाते और सारे इंतजाम भला हमे क्या हानि पहुचा सकते थे किन्तु जब यह धमकी हमने दी ही नहीं तो फिर हम व्यर्थ ही क्यो उनसे टकराए । आग के स्वामी के ये शब्द सारे हाल में गुजे ।



"लेकिन महान स्वामी ।" जर्फीला सेशन आदर के साथ बोला;-- "ये बात तो हमारे लिए भी आश्चर्यजनक है कि हमारे नाम से ये धमकी आखिर दी किन लोगों ने है ? उनका उद्देश्य क्या है ? उन लोगों ने भी अपने-आपको आग के बेटे ही क्यों कहा ?"

" नंबर जर्फीला सेशन ।" आग का स्वामी अपनी बिशेष आबाज में बोला "यही तो एक गुत्थी है-जिसको सुलझाने. मे तुम्हें अपने पाच साथियों के साथ साधारण कपडों मे रघुनाथ नाथ की कोठी पर जाकर दस बजे देखना है कि आखिर ये धमकी किसने और किस उद्देश्य से दी है ?"


"जैसी आज्ञा महान स्वामी…हम वह्म जाएगे I” जर्फीला सेशन बोला I



. . उसके बाद स्टेज से ‘आग का स्वामी' विलुप्त हो गया ।


उसके जात्ते ही समस्त हाँल में प्रकाश जगमगा उठा । जर्फीला सेशन अपने साथियों का चुनाव करने लगा ।

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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 04 Sep 2017 17:04

यह दूसरी बात है कि विजय ने फोन पर रघुनाथ की बात को मजाक में उडा दिया था जबकि हकीकत यह थी कि बिजय आग के बेटों का चेलेंज सुनकर चिंतित हो उठा । वास्तव में आग के बेटों द्धारा दिया. गया ये चैलेंज बडा विचित्र था । बिजय की समझ नही आ रहा था कि आग के बेटों की व्यक्तिगत रूप से रघुनाथ अथवा रैना से क्या शत्रुता हो सकती है ? कुछ देर तक वह सोचता रहा।।


अभी वह बिस्तर मे ही था कि रघुनाथ का फोन मिला । कुछ सोचकर वह उठा और अपने प्राइवेट रूम में पहुँचा तथा फोन पर नबर रिग करके पवन के रूप में भर्राए-से स्वर में . बोला… " हैलो मिस आशा I"


"यस चीफ! " दूसरी और से आशा का एकदम सतर्क स्वर सुनाई दिया ।



"शहर में उडता समाचार तुम तक पहुच गया होगा ?" विजय पवन कै भर्राए स्वर में बोला ।।


"यस सर रैना भाभी के आहरण की धमकी वाला समाचार !"

" तुम तुरत अन्य एजेंटों' को भी आदेश दें दो…वे फौरन रघुनाथ की कोठी पर पहुच जाएं । इस बार किसी भी कीमत पर आग के बेटे सफल नहीं होने चाहिए ।"


-"ओके सर ।" दूसरी ओर से आशा के शब्द सुनते ही विजय ने तुरत सबध'…विच्छेद कर दिया । फिर कुछ देर… तक खडा सोचता रहा और पुनः नबर रिग किए…दूसरी आरै से उसके पिता ठाकुर साहब की आबाज गूजी ।


" हैलो । कौन है ?"


, . . "'ठाकुर !" विजय पवन के-से भर्राए हुए स्वर मे बोला---" शहर में दो घटे के लिए कर्पयूं लगा दो I”



" जैसी आज्ञा सर ।" दूसरी ओर से पवन का भर्राया हुआ स्वर सुनकर ठाकुर साहब एकदम सतर्क हो गए । वे जानते थे कि भर्राई हुई ये आवाज़ स्रीकेट सर्विस के चीफ़ की होती है । उनके आदेश का पालन प्रत्येक कीमत पर किया जाता है क्योंकि सीक्रेट सर्विस भारत की सर्वोत्तम जासूसी सस्था हे । पद की दृष्टि. से पवन ठाकुर साहब से उच्व पदाधिकारी है । अत: प्रत्येक, आदेश का पालन करना उनका कर्तव्य है, किन्तु वह क्या जानते थे कि इसका वास्तविक अधिकारी उनका वही कुपुत्र है, जिसे उन्होंने आवारा, गुडा, बदचलन जैसी… अनेकों उपाधियों से सम्मानित करके घर से निकाल रखा हे l वे क्या जानते थे अपने उसी बदचलन बेटे की वास्तविकता ।

विजय ,ने तुरंत सबध-विच्छेद कर दिया । उसे पूर्ण विश्वास था कि अजले कुछ ही क्षणों में उसके आदेशानुसार कर्फ्यू लगा दिया जाएगा l


वह शीघ्रता से तैयार होने लगा और अगले पाच मिनटों में उसकी कार तीव्र वेग से रघुनाथ की कोठी की ओर जा रही थी । वह लापरवाही से सीटी बजाता हुआ कार ड्राइव कर रहा था । इस समय उसने कोई मेकअप नहीं किया था । वह अपनी वास्तविक सूरत मे छैला बना हुआ. था ।

. ठीक पांच मिनट पश्चात विजय रघुनाथ कौ कोठी पर पहुचाI


तभी पुलिस जीपे कर्फ्यू की घोषणा करती हुईं उधर आ निकली ।

लोगों की भीड छंटने लगी-जो लोग नहीं. गए उन्हे सख्ती के साथ सेना ने कट्रोल किया । विजय ने अभी कोठी में कदम रखा ही था कि बिकास दौडते हुए उसके निकट आया और लगभग चीखा-"नमस्ते I झकझकिए अकल ।"


" नमस्ते प्यारे दिलजले ।" विजय मुस्कराता हुआ बोला--- "ये क्या कबाडा फैला रखा है ?"


" पता नही अंकल कोई बता नहीं रहा कि बात क्या है…आप ही बताइए न अकल ?"



"अबे ओ मिया दिलजले तुम्हें और न पता हो ?” विजय एक प्यार-भरा चपत बिकास के प्यारे कपोल पर मारता हुआ बोला I



तभी रघुनाथ उनके निकट आकर बोला…"विजय फोन पर तुमने मेरी बात को मजाक समझा था फिर अब......!"


" ये समय-समय की बात है प्यारे तुलाराशी तुम ये बताओ भाभी कहा है ?” विजय आंख मारता हुआ बोला l



तभी रघुनाथ ने विकास से कहा--- "तुम अदर जाओ बिकास!!


विकास महाशय मुह लटकाए अदर क्री और रेगे I बिकास के चले जाने के पश्चात रघूनाथ धीरे से बिजय के कान में बोला---" विकास को इस बारे मे कुछ नहीं बताया गया हे l वह बार-बार पूछ रहा है कि इस बार आग के बेटे यहां क्या करने आ रहे है ? किंतु वास्तविकता उसे किसी ने नहीं बताई है। आखिर बच्चा ही तो है…रैना समझदार होकर घबरा रही है तुम भी विकास से कुछ न कहना I"


"प्यारे तुलाराशि I" बिजय मुस्कराता हुआ बोला-…"वास्तविकता पूछो तो भगबान से जरा-सी भूल हो गई I इस साले विकास को भूल से तुम्हारा लडका और हमारा भतीजा वना दिया । वास्तव में यह हमारा और तुम्हारा बाप है और रही सही कसर उस साले लूमड़ ने पूरी का दी । मैं देख रहा हूं कि तुम घबरा रहे हो लेकिन दावे से यह कह सकता हूं कि विकास यह जानने के बाद भी नहीं घबराएगा क्योकि उसका गुरु ही साला लुमड है ।"



. . "लेकिन फिर भी विजय-…विकास हमारे लिए तो बच्चा ही है I"



"खैर ठीक है । तुम ये बताओ भाभी कहा है ?"


"अदर वाले कमरे में ।" रघुनाथ घडी देखता हुआ बोला जिसमेँ दस बजने में पाच मिनट शेष थे I तभी रघुनाथ के दिमाग को तीव्र झटका लगा । विजय ने उसके चेहरे के भावो . मे परिबर्तन स्पष्ट देखा था-औंर उस समय वह' चौके बिना न रहा सका जब रघुनाथ का रिवाॅल्बर एक झटके के साथ होलस्टर से निकलकर उसके हाथ में आ गया और वह उसे विजय की ओर तानकर कडे स्वर मेँ गुर्राया । ~


"ठहरो इसकी क्या गारंटी है कि तुम बिजय हो ?!" अगले ही पल बिजय के अधरों पर मुस्कान बिखर गई I


अजीब-से लहजे मे वह बोला-"इसकीं क्या गारटी है कि तुम हमारे प्यारे तुलाराशी . हो ?"



"बको मत l" रघुनाथ सख्त स्वर में गुर्राया तथा विज़य क्री आखों मे झांका---

. "इन बेकार को बातों में समय गवाने के स्थान पर समय का सदुपयोग करोगे तो अधिक बुद्धिमानी होगी प्यारे । वेसे खुशी हुई कि तुम काफी सतर्कता बरत रहे हो । ध्यान रखो आग के बेटे किसी के मेकअप मे नहीं बल्कि आग की लपटों में लिपटे हुए होंगे !"

तत्पश्चात रघुनाथ ने पूरी तसल्ली कर ली कि सामने. खडा व्यक्ति वास्तव में विजय के अतिरिक्त कोई नहीं है तो विजय को रैना का कमरा बता दिया । मुस्ककराता हुआ विजय रैना के कमरे की ओर बढ गया ।

रैना का कमरा भीतर से बद था-जिसमेँ रैना के साथ पाच सेना के जबान उपस्थित थे । उसने कमरा खुलवाया और अंदर प्रबिष्ट हुआ ।


उसे देखते ही रैना उठी और बोली ----" बिज़य भैया I" अभी रैना आगे कुछ कहने ही जा


"अरे भाभी हमारे होते घबरा रही हो…अरे हम आ गए हैं ठाकुर के पूत । हम साले इन आग कै बेटों को छठी का दूध याद दिला I" विजय ने यह शब्द कछ इस प्रकार सीना अकडाकर कहे थे कि पांचो मिलिट्री वालों के साथ स्वय रैना भी बिना मुस्कराए न रह सकी थी ।।



तभी कमरे में विकास प्रविष्ट हुआ और बोला… "हेलो अंकल…यहा घर क्या हो रहा है ? अगर आप नहीं बताना चाहते तो मत बताइए…लेकिन अंकल एक नई बनाई हुई दिलज़ली तो सुनिए !"


"विकास तुम हमेशा शैतानी......!"



"औफ्फो भाभी...." विजय बीच मे ही बोला---"तुम्हें किस मूर्ख ने यह अधिकार दिया कि तुम चाचा-भतीजे के बीच में बोलो । क्यों मिया दिलजले…हम ठीक कह रहे हैं न ?”


अतिम शब्द विजय ने विकास को ओर देखकर कहे थे, इससे पूर्व कि विकास कुछ कहे रैना बोली ।


"तुम इस शैतान को सिर पर चढाते जा रहे हो भैया ।"


"घबराओ नहीं भाभी हमारा सिर भी बहुत ऊचा है, वहा तक पहुचने के लिए तो अभी दिलजले को बहुत पापड बेलने पडेगें I हा तो मिया दिलजले पेश करो अपनी दिलजली और जला दो हमारा दिल । ऐसा जलाना कि आग की लपटें निकलने
लगें किंतु धुंआ नहीं l” बिजय विकास की और देखकर बोला ।


-"हा तो अकल-" ये मैं अपना फर्ज समझता हूं क्रि बिना कर्ज एक दिलजली अर्ज करू । हा तो मैं जौ सुनाता हू उसे ध्यान से सुनो क्योंकि ये दिलजली सप्रेटा घी में तली हुई है । विकास कै कहने के ढग पर विजय बिना मुस्कराए न रह सका ।

जबकि विकास इस बात से बेखबर अपनी दिलजली कुछ इस प्रकार सुना रहा था ,



" एक बार छिड़ गई जंग, चुहो और मच्छरो मे भारी

आकाश कांप गया -- धरती डगमगाई सारी

दोनों ओर ही थे , योद्धा एक से एक भारी !

दुंदुभी बजी--- युद्ध की हो गई तैयारी ।

चुहो में आतक फैला , सैना घबराई सारी ।

क्योंकि मच्छरो में थे, बहादुर छाताधारी ।

इतना सब कुछ देख, धबराए सब नर नारी ।

चुहे थे बेचारे शाकाहारी , मच्छर मासाहारी ।

मच्छरो ने शुरू कर दी , जोरदार बमबारी,

चुहों की सैना घबराई, क्या करती घुडसबारी ।

बच्चों. में आतक़ फैला , चिल्लाई चुहिया सारी,

एक एक मरने लगे---चुहे सब बारी बारी ।

देखकर आया क्रोध, चुहे कै सरदार को ।

आगे बढ़कर ललकारा मच्छरों कै बाप को I

मच्छर बोले ले आओ अपने हिमालयी साँप को,,

किन्तु सरलता सै नही छोडते चुहे भी मैदान को ।

अणुबम डाला मच्छरो ने , सोचा यह बाजी ले गया ।

लेकिन चुहो का सरदार बम को मुँह मे ले गया ।

ली हाजमे की गोली , बम को हजम कर गया ,

दैखकर करिश्मा मच्छरों का सरदार बेहोश होगया ।

फिर क्या था चुहे रूक गए जाते-जाते,,

बम मुह में लैकर गोली सी हजम कर जाते ।

अगर नही भागते मच्छर तो बही मारे जाते ।

रखे रह गए बही सब, उनके छाते वाते !"

"अवे ओं मिया दिलजले l अब अपनी बोलती पर ढक्कन लगा लो । हम कुछ कह नहीं पा रहे हैं तो तुम अपनी दिलजली को राजकपूर की फिल्मी को भाति लम्बी करते जा रहे हो ।" विजय हाथ उठाकर बोला ।

अन्य सभी विकास की दिलजली पर मुस्करा उठे । रैना भी मुस्कराए बिना न रह सकी I
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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 04 Sep 2017 17:05

अब दस बजने मे केवल दो मिनट ही शेष थे । शहर पर पूरी तरह कर्पयूं लग चुका था । सेना का सुदृढ जाल फैला हुआ था । सभी जिज्ञासा के साथ आग के बेटों के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे l विजय स्वय रैना के पास बैठा था । वह पूर्णतया सतर्क था l बाहर ठाकुर साहब पूर्णतया सतर्क थे I सागर में नेवी का पनडुब्बी जाल, राजनगर मेँ सेना का चक्रव्यूह । सभी को प्रतीक्षा थी-आग के बेर्टों की।



ठीक दस बजे ।


एक विचित्र हरकत की बिकास ने ।


एक_ ऐसी विचित्र हरकत, जिससे विजय भी भौचक्का रह गया । वह विकास के उस भोले…भाले और मासूम चेहरे क्रो ताकता ही रह गया । विजय का मुख इस समय आश्चर्य के साथ खुला हुआ था । उसके लिए विकास एक बार फिर पहेली बन. . गया । . . हुआ यह कि दस बजते ही विकास ने विजय के कान मे रहस्यमय ढग से फुसफसाकर कहा ।


. . " अंकल आग के बेटों को गिरफ्तार करा सकता हूं I”


विकास के मुख से उपरोक्त शब्द सुनकर विजय को अपनी खोपडी घूमती-सीं प्रतीत` हुईं । उसकी समझ में नहीं आया कि यह लडका क्या कह रहा है और इसके कहने का तात्पर्य क्या है ? वह तो विकास के मासूम-से मुखडे को ताकता ही रह गया ।।



उसके गुलाबी अधरों पर गजब की रहस्यमय मुस्कान नृत्य कर रही थी । इतनी रहस्यपूर्ण कि विजय को ऐसा लगा कि विकास इंसान न होकर कोई फरिश्ता तो नहीं ! अवाक-सा .खडां कुछ देर तक वह विकास को ताकता रहा फिर स्वय पर सयम पाकर बोला…"क्या मालूम है…क्या बक रहे हो ?"

"मेरे साथ आओ अंकल I" विकास ने उसी प्रकार रहस्यमय ढग से कहा' और दरवाजे की तरफ़ बढ, गया । विजय, विकास को इस प्रकार देख रहा था, मानो वह ससार के समस्त आश्चर्यो से बडा आश्चर्य देख रहा हो । वह यह भी निर्णय नहीं कर सका कि विकास यह सब किसी शरारत के अतर्गत कह रहा है अथवा वास्तव में वह आग के बेटों का कोई रहस्य जानता है । वह कुछ निर्णय लेने मे असफल रहा किन्तु फिर वह उठ खडा हुआ और विकास के पीछे चल दिया । पीछे से रैना ने टोका…"क्या बात भैया…इस शरारती ने कान में क्या कहा ??"


"कुछ नहीं भाभी l" विजय बोला------- "लगता है इस साले दिलजले को समझने कै लिए हमे भी दूसरा जन्म लेना पडेगा । " कहता हुआ विजय बाहर आ गया ।



विजय द्वारा कहा वाक्य बिकास के कानों में पडा जिसे सुनकर उसके होंठ शरारत से मुस्करा उठे-वह मुडा नहीँ बल्कि लान में होता हुआ कोठी के पिछवाडे की ओर चला । विजय के दिमाग में न जाने क्या-क्या विचार आ रहे थे कितु वह चुपचाप उसका पीछा करता रहा I विकास दिन-पर-दिन उसके लिए एक पहेली बनता जा रहा था I विकास बाथरूम मे घुस गया और सकैत से विजय को भी अदर आने क्रो कहा । विजय के लिए विकास की प्रत्येक हरकत रहस्यपूर्ण बनती जा रही थी I उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि विकास चाहता क्या है ? बिना कुछ बोले वह भी बाथरूम में प्रविष्ट हो गया l



बाथरूम में पहुचते ही बिजय बोला-"क्या बात है . दिलजले…ये तुम क्या कर रहे हो ?"



"अकल मेरे बिचार से आज यहा आग के बेटे अवश्य आएगे ।" विकास उसी प्रकार रहस्य-भरे शब्दों में बोला ।


"देखो मिया दिलजले i” विजय विकास क्रो घूरता हुआ बोला- "यह समय शरारत का नहीं है । जल्दी से बोलो क्या कहना चाहते हो ?? सभी. जानते हैं कि आज यहा आग के बेटे अपने चैलेंज को पूरा करने के लिए जरुर आएंगे । इसमें नई बात क्या है ?"

"कैसा चैलेंज अंकल…कहीँ आप मम्मी के विषय मे तो बाते नहीं कर रहे हैं ।" अजीब गभीरा के साथ बिकास अत्यत रहस्यमय ढग से बोला ।



विकास के इस वाक्य पर विजय के दिमाग को तीव्र झटका लगा I वह जान गया कि विकास सब जानता है । स्वय को सभालने क्री कोशिश करता हुआ वह बोला-"तो तुम सब कुछु जानते हो ?" . .



" अकल ध्यान है-आज क्या है ??” विकास अपने लहजे में उसी प्रकार रहस्य उत्पन्न किए बोला ।



"सोमवार हे लेकिन इससे क्या मतलब है तुम्हारा?"



" विकास की प्रत्येक बात बिजय के लिए एक रहस्य थी ।


" आज तारीख क्या है ?"



"पहली !!! लेकिन आखिर तुम्हारा मतलब क्या है ??’” विजय इस बार झुझला गया ।



“महीना I” विकास के होंठो पर अजीब-सी एक रहस्य-भरी मुस्कान थी ।



-"अप्रैल..... अरे...... !" विजय बुरी तरह चौंककर बोला…" पहली अप्रैल !" उसके मस्तिष्क मे धमाका-सा
हुआ ।



उसने विकास की शरारत-भरी मुस्कान देखी ।


उसकी खोपडी जेसे चक्कर काटने लगी ।।


-"कैसा बनाया फर्स्ट अप्रैल ।" विकास शरारत के साथ बोला ।



"क्या मतलब ? कैसा अप्रैल फूल? ?” विजय की आखें आश्चर्य से फैल गई ।

"यस अक्ल । मम्मी के अपहरण का पत्र आग के बेटों ने नहीं…मैंने पापा की मेज पर रखा. था ताकि उनको अप्रैल फूल बना सकू लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि इतने सारे लोग इस चक्कर में आ गए और कोई भी कुछ न समझ सका----

आप भी नहीं अंकल-आप तो अपने-आपमें इतने बडे जासूस बनते हो । कहों कैसा रहा मेरा मजाक? ?" बिकास ने चहककर रहस्योद्घाटन किया ।।



रहस्योंद्धाटन ऐसा था कि विजय की आखे' हैरत से फैल रह गई । वह भोले और मासूम मुखडे वाले इस मासूम विकास को देखता रह गया जिसने कितना गभीर मजाक किया था । उसकी समझ में नहीं आया कि ईश्वर ने इसे इतनी बुद्धि आखिर दे कहा से दी ? कितना भयानक और गभीर मजाक किया था विकास ने । एक ही क्षण में विकास के इस मजाक के परिणाम घूम गए-रघुनाथ और रैना की परेशानी I समस्त सरकारी महकमे का ही नहीं, बल्कि नेवी और सेना का हरकत में आना, राजनगर में भयानक आतक और कर्फ्यू , सीक्रेट सर्विस का हिल जाना…सभी का कारण था यह मजाक । क्या अप्रैल फूल बनाने का विकास को यहीँ तरीका मिला उसका तो सिर ही चकरा गया था । मजाक I कितु इतना गभीर' ? नही उसने ऐसा मजाक कभी नहीं किया । विजय को लगा कि इस मजाक का परिणाम भी अत्यत भयानक होगा । लोग इसे सिर्फ मजाक में उडा देंगे. ..? नहीं, इस घटना से जनता भडक उठेगी । फिर सरकार से मजाक करने का किसी भी नागरिक को कोई अधिकार नहीं' है और मजाक भी इतना भयानक-जिससे सपूंर्ण भारत सरकार कांप कर रह गई है । हो सकता है लोग विकास के प्रति भडक… उठें। विजय के दिमाग मे क्षण मात्र मे अनेको विचार घूम गए । उसने सामने खडे विकास को देखा, जो अभी भी मुस्करा रहा था l विजय को तरस आया बालक' विकास की बुद्धि पर । वह जानता था कि विकास ने वह हरकत कर दी जो उसके दिमाग में उपजी । उसका भयानक परिणाम वह नहीं जानता I वह नहीं जानता कि उसने कितना भयानक खतरनाक कार्य कर दिया है ।

विजय ने उसकी मुस्कान देखी और बोला---- "तो इसका मतलब यह है कि यहा आग के बेटे नहीं आएगे !"

" क्यों नही आऐगे--- आवश्य आऐगे ।।" विकास दृढता से बोला ।


"क्या बकबाँस कर रहे हो ?" विकास के उत्तर पर विजय न सिर्फ झुझला गया, बल्कि क्रोधित भी हो गया । वह विकास को लगभग फटकारते हुआ बोला-"मतलब वह कागज तुमने मेज पर रखा था तो आग के बेटे क्यो आएगे?"


विकास एक बार फिर शरारत के साथ मुस्कराया और बोला…"अकल मेरा पत्र लिखकर रखना सिर्फ अप्रैल फूल बनाना ही न था, वल्कि एक चाल चलना भी था I यह समझो, बो कहावत है ना एक पथ दो काज ।।।"


"क्या मतलब? " विजय एक बार फिर उछलकर रह गया ।



"मतलब ये अंकल कि वह पत्र रखकर मैंने अप्रैल फूल तो बनाया ही…साथ ही आग के बेटों को यहा आने के लिए बाध्य का दिया ।" उसी प्रकार मुस्कराता हुआ विकास कहता चला गया ।



"तुम ये आखिर क्या बक रहे हो ?” .

" अकल…आपके दिमाग मे इतनी सी बात नही आ रही । आप ही सोचिए जब ये खबर आग के बेटों तक पहुचेगी कि किसी ने चैलेंज दिया है तो वे चौंककय ये जानने का प्रयास नहीं करेगे कि जब ये चैलेंज हमने नही दिया तो किसने दिया है ? और वे ये जानने यहां अवश्य आएगे !"



. विकास की बात सुनकर विजय के दिमाग में फिर घंटियां-सी गुनगुनाने लगीं I वह फिर विकास को घूरता ही रह गया । उसकी समझ में नहीं आया . कि आखिर विकास को भगवान ने इतनी बुद्धि कहां से दे डाली? वास्तव में उसे लगा कि विकास जो कुछ कह रहा हैं वह सत्य है । आग के बेटे ये जानने के लिए यहा अवश्य आएगे कि ये धमकी किसने दी लेकिन फिर विजय अटककर रह गया ।

उसने विकास से पूछा …-"'लेकिन तुम्हारा उन्हें बुलाने का अभिप्राय क्या है ?"

"वाह अकल…जिन्होंने रिजर्व बैंक का खजाना खाली कर दिया । जिनकी खोज में पुलिस परेशान हे…उन्हें यहा बुलाना क्या आसान काम है ?”


"लेकिन तुम पहचानोगे कैसे कि आग के बेटे हैं कौन?" बिजय ने प्रश्न किया ।


"मेरे ख्याल से कर्पयूं में आम आदमी हमारी कोठी के आसपास नहीँ आएगे I" विकास ने कहा और विजय एक बार फिर बिकास के मुखडे को ताकता रह गया I उसे लगा जैसे वास्तव मेँ विकास ठीक कह रहा था । उसे कदम-कदम पर विकास के दिमाग का लोहा मानना पड़ रहा था l उसने समय की गंभीरता को समझा । वह जानता था कि अगर यह समय उसने विकास की बुद्धि पर आश्चर्य करने. में निकाल दिया तो स्थिति गभीर हो सकती है । दूसरी ओर यदि आग के बेटे आए भी होंगे तो वे भी निकल जाएगे ।


उसने सोचा, जब ये भयानक खतरा विकास ने पैदा कर ही दिया है तो क्यों न वह इस समय का लाभ उठाए ? अत वह विकास से बोला ।


"देखो मिया दिलजले अब मेरी बात ध्यान से सुनो ।" विजय ने उसे समझाया…“तुमने जो कुछ किया है उसका परिणाम कितना भयानक है यह तुम नहीं जानते । अब तुम एक काम करो वह यह कि वेसा ही कागज टाइप करो और . उस पर लिखो…कैसा रहा फ़र्स्ट अप्रैल......और इससे अधिक एक शब्द भी न लिखना-बर्ना मिया दिलजले छठी का दूध याद आ जाएगा । ध्यान रहे नीचे अपना नाम नही लिखना है ओर न ही किसी अन्य को बताना हैं कि ये हरकत तुम्हारी थी । ध्यान रहे किसी किसी भी कीमत पर कोई यह न जान सके कि यह तुम्हारी हरकते हैं ।" . .


"क्यों अकल? ”


"बेटे दिलजले जो कह रहा हूं अब चुपचाप उसे करो I वरना अपने प्यारे तुलाराशि भी दूढते फिरेंगे कि उनके सुपुत्र महोदय किधर गए ।"

उसके बाद विजय ने वडी बारीकी
से विकास की सब कुछ समझाया और बाथरूम से बाहर भेज दिया ।


अब उसका इरादा इस अवसर से कुछ लाभ उठाने का था…ब्रात उसके दिमाग में भी बैठ गई थी कि आग के बेटे इस कोठी के आसपास ही होंगें निश्चित रूप से । अत उसने बाथरूम के द्वार क्रो देखा-जो कोठी के पीछे एक अत्यत ~ पतली गदी और अघकारयुक्त गली में खुलता था । जहा यह दरवाजा खुलता था-उसको अगर गली न कहकर 'आवचक' कहा जाए तो अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि गली हमेशा मैलयुक्त रहती थी और एक तरफ से बद भी थी । अत वहा कभी कोई व्यक्ति' नहीं जाता था । उसने सोचा क्यों न वह गुप्त रूप से इसी मार्ग से निकले और फिर ध्यान से देखे क्रि कोठी . के आसपास कोई सदिग्ध व्यक्ति तो नहीं है । यह बिचार कर अपने विचार को कार्यान्वित करने हेतु दस्वाजा खोलने के लिए चिटकनी की ओर हाथ बढाया ही था क्रि चोक. पडा । उसके कानो में फसफुसाहट-भरा स्वर टकराया ।


"दस बजकर दस मिनट हो गए हैं अभी तक कोई आया नहीं है ।" यह आवाज दरवाजे के पार गदी गली से आ रही थी । बिजय ने दरवाजे से कान लगा दिए और ध्यान से सुनने लगा…एक अन्य स्वर ने पहली आवाज का जवाब दिया । जवाब फुसफुसाहट के साथ कुछ इस प्रकार दिया गया ।


…" पता नहो क्या चक्कर है ?"


"मेरी समझ में नहीं आ रहा कि जब यह धमकी हम लोगों ने नहीँ दी तो फिर किसने दी ?"



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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 04 Sep 2017 17:05

रघुनाथ के पिछवाडे. वाली गली में दिन के सवा दस बजे भी अंधकार व्याप्त था । औंर जो प्रकाश था भी-उसे. कोठियों के धुएं ने घुघला बना दिया था-इस पतली-सी गली मे कोठियों के रोशनदान थे, जिनमें से धुआं निकलकर वातावरण को और . भी धुघला बना रहा था । यह धुआं घरों मे सुलगती अंजठियो के कारण था । अत: वातावरण लगभग. अधकारमय था कि किसी को महज ही देखना सभव न था ।।


वह एक बूढा आदमी था । यूं उसे बूढा भी नहीँ कहा जा सकता, उसे अधेड कहना अघिक उपयुक्त होगा, उसके… चेहरे पर चेचक के दाग थे…एक स्थान पर ऐसा चिह था…जैसे किसी दुर्घटना मे उसको काफी चोटे आई थीं । हल्की कटारीदार. . मूछें' उसके रोबीले चेहरे पर खूब फब रही थी I हल्की दाढीयुक्त उसका चेहरा धुंघ-सी में विलुप्त था I उसके जिस्म पर एक सफेद धोती और खद्दर का एक घुटनों तक लटकने वाला कुर्ता था । पैरो में जूतियां पहने वह अघकारयुक्त गली मे न जाने उद्देश्य से खडा. था I



एक बार उसने अपनी सीधी कलाई में. बंधी घडी, देखी , और मुंह बिचका दिया । कुछ देर तक वह यु ही शात' खडा, न . जाने क्या विचारता रहा । अचानक वह स्थान से हिला और गदी गली के अदर को बढने लगा । वह शायद. जानता. था कि आगे गली बद है तो वह चहलकदमी-सी कर रहा था । उसे अपने सामने का भाग अघिक स्पष्ट दिखाई दे रहा था क्योंकि बीच में धुआं तैर रहा था I अभी वह कुछ ही कदम आगे बढा था कि शिकारी कुत्ते की भांति उसके कान खडे होगए I


उसके कानों के पर्दों में गली कै अंदर से कुछ व्यक्तियों कै फुसफुसाहट की ध्वनि स्पष्ट सुनाई पड रही थी I वह सिर्फ फुसफूसाहट ही सुन पा रहा था ,

स्पष्ट कुछ भी सुनने ने वह असफल था । अलबत्ता वह इस धीमी फुसफुसाहट को सुनकर सतर्क होगया और एक गदी दीवार से पीठ टिकाकर धुए के पार घूरने का प्रयास करने लगा. । स्पष्ट कुछ भी देख नहीं सका _ किन्तु इतना उसने अवश्य अस्पष्ट-सा देखा कि छायाए दीवांर से पीठ टिकाए आपस में कुछ… बाते कर रही है , उसकी समझ में नहीँ आया कि ये छायाए कौन हैं ? अत हृदय में उनका परिचय जानने हेतु जिज्ञासा ने जन्म लिया ।


कुछ देर तक वह सास रोके विचारत्ता रहा और फिर पूर्ण सतर्कता . के साथ वह नि शब्द आगे बढा । कुछ दूर वह कोई भी ध्वनि उत्पन्न किए बिना दीवार के सहारे-सहारे छायाओं की ओर बढ गया । ये दूसरी बात है कि इस प्रयास मे उसका खद्दर का कुर्ता दीवारों के सहारे लगे पतनालो के कारण कीचड से लथपथ होगया -कितु' उसने इस ओंर लेशमात्र भी ध्यान नहीं दिया । उसकी आखें उन फुसफुसाती छायाओं पर ही जमी हुई थीं । अब वह उन छायाओं क्रो किसी हद तक स्पष्ट देख सकता था ।


ये तीन व्यक्ति थे…जो आपस में किन्ही बातों में व्यस्त थे । वे. क्या बाते कर रहे हैं । यह जानने के लिए वह चुपचाप अपने स्थान पर खडा रहा और अभी तक उनकी बाते सुनने का प्रयास कर ही रहा था कि सहसा वह चौक पडा । न सिर्फ चौका बल्कि उसे लेने-के-देने पड गए । ऐसा तो उसने स्वप्न में भी नहीँ सोचा था कि इन लोगों कै अतिरिक्त भी इस गली मे कोई अन्य उपस्थित हो सकता हे किन्तु उसने यही नही सोचा और यही चोट खा गया ।


अभी वह उनका कोई शब्द ध्यान से सुन भी नहीं पाया कि अचानक उस्रकै पीछे से किसी ने एक जोरदार ठोकर मारी और परिणामस्वरूप वह घडाम से कीचड-भरी गली मे मुह के बल गिरा और और दो-तीन इच कीचड पर रपटता वला गया ।


उन तीन छायाओं के लिए भी शायद यह घटना अचानक ही हुई थी । अत वे भी बुरी तररु चौक पडे किंतु उस समय उनकी आखों में हल्की-सी चमक उभर आई जब उन्होंने कीचड में मुह के बल पडे अधेड के पीछे अपने तीन साथियों पर दृष्टि डाली । पीछे वाले तीनों में से एक आगे बढकर बोला I


"जफ्रीला सेशन-ये बूढा गली में खडा आप लोगों की बाते सुनने का प्रयास कर रहा था ।"



अचानक I



वह सब हुआ जिसकी इन छहों मे से किसी को आशा न थी । उनके बिचार से तो यह बूढा कुछ इस बुरी तरह से कीचड मे गिरा था कि उसके लिए उठना शीघ्र ही संभब नहीँ था । उनकी आशा, के एकदम विपरीत वह अधेड बिजली की-सी गति से न सिर्फ उछला, बल्कि. उसने-बहुत-कुछ कर दिया । एक बिजली-सी कौधी । कीचड में पडा. अधेड छलावे कीं भांति उछला और पलक झपकते ही उसके हाथ मेँ दबी एक गुप्ती जर्फीला सेशन कें पेट मे धंस गई । इसके पूर्व कि कोई कुछ समझ . सके…खून का फवारा निकला-जर्फीला सेशन के कंठ से घुटी-घुटी-सी चीख निकल गई । समस्त गुप्ती उसके पेट में धस गई थी । तभी अन्यू पार्चों उस पर झपटे किन्तु वह बूढा भी कम शैतान नहीं था जैसे ही .वे उस पर झपटे उसने गुप्ती जर्फीला सेशन के पेट मे ही छोड दी और अपने स्थान से अलग हट गया । पाचो की स्थिति भिन्न और बिचित्र थो । कोई लडखडाकर कीचड में गिरा तो किसी ने दीवार में टकाकर मारकर खून निकाल लिया ।


उसके बाद I


अगले कुछ ही पलो मे गली मे भयानक उत्पात जारी हो गया । वह बूढा पाचो' से भिंड गया । किंतु वास्तविकता-यह थी कि पाच उस पर भारी .पड रहे थे । तभी रघुनाथ के बाथरुम का दरवाजा खुला, जो इस गदी गली में खुलता था और वहा से बिजय निकला । तभी इस नई परेशानी को देखकर वे छओ कुछ चकराए-किन्तु बूढे ने सर्वप्रथम स्वय पर काबू पाया ओर फिर उन पर पिल गया l

विजय को भी न जाने क्या सूझा कि वह लडाई में उस बूढे का साथ देने लगा । अब उन पाचो पर ये. दोनों भ्रारी पड रहे थे, क्योंकि ये दोनों कुछ विचित्र ढग से लड रहे थे । अभी इस उत्पात को कठिनता से एक ही मिनट व्यतीत हुआ था कि बिजय और वह बूढा आश्चर्यचकित रह गए ।


उनके मुख आश्चर्य से खुले रह गए, उनकी समझ में नहीं आया कि वे क्या देख रहे हैं ?


उनके देखते ही-देखते पहले उन पाचों' में से एक के कठ से भयानक चीख निकली-ऐसी चीख मानो किसी ने उसे गोली मार दी हो । जबकि उसे किसी वे मारा नहीं था'। अभी वह आश्चर्य के सागर से निकल भी नहीं पाए थे कि उस समय तो उनके आश्चर्य मे चार चाद लग गए, जब दुसरा भी उसी प्रकार भयानक चीख कै साथ ढेर हो गया, इसके बाद तो जैसे सभी को भयानक बिमारी चढ गई ।

सभी चीखे और क्रीचड मे गिरखकर ठडे' हो गए । वहा सिर्फ वे दो ही जीवित थे । उन्होंने एक-दुसरे की तरफ देखा…जेसे पूछ रहे हों कि क्या तुम बता सकते हो कि ये सब कैसे मर गए? अभी वे एक… दूसरे को देख ही रहे थे कि' गली से बाहर उन्होंने मिलिट्री के जवानों मे कुछ हलचल-सी अनुभव 'की । इस हलचल के उत्पन्न होते ही उस समय बिजय की खोपडी घूम गई…ज़ब अधेड का एक शक्तिशाली घूसा उसके जबडे पर पडा । वह क्योंकि इस घूसे के लिए तैयार न था-अत धडाम से कीचड में जा गिरा । तभी उस अधेड ने उसकी पीठ पर एक जोरदार ठोकर रसीद की ।


विजय के कठ से एक चीख निकल गई । वह कराहकर एक ओर को पलट गया । तभी गली मे भारी जुतो की आवाजे गूर्जी-जो निरतर निकट आती जा रही थी । अचानक अधेड ने भयानक फुर्ती. का परिचय देते हुए रघुनाथ के बाथरूम में जम्प लगा दी । विजय भी फुर्ती के साथ उठा ओंर लपका किंतु उसी क्षण दरवाजा एक झटके से बद हो गया । तभी भागते हुए मिलिट्री के तीन जवान वहां पहुचे छः लाशों की देखकर चौंके…और अंगले ही पल उनकी टॉमीगने विजय की ओर तन गई, किंतु विजय शीघ्रता से बोला ।


"'अबे. . .अबे ठहरो प्यारे जवानो ! कहीं हमें ही खुदा को प्यारा न कर देऩा .इन छहों का हत्यारा तो सुपस्टिंडेट, की कोठी मे है…मेरे साथ आओ ।" ~


तभी ठाकुर साहब वहां आ गए । विजय को देखते ही बुरी तरह से चौंककर बोले…"तुम . .तुम यहां. . .?"


….""य. . .यस डैडी I.” विजय स्वयं को संभालकर बोला---" हत्यारा रघुनाथ की कोठी में गया हे-जल्दी कोठी को घेरकर उसे गिरफ्तार कीजिए l”



तत्पश्चात !


क्षणमात्र में ही पूरी कोठी में उस रहस्यमय अघेड़ व्यक्ति की तलाश होने लगी-अथिक देर नहीं लगी-शीघ्र ही वह अधेड, चमक गया,


किंतु' उफ् !


भयानक खतरा. . !


अधेड. व्यक्ति ने बाथरूम में प्रविष्ट होते ही फुर्ती के साथ दरवाजा अदर से बोल्ट कर दिया । एक क्षण' भी, उसने व्यर्थ नही’ किया…तुरंत ही उसने कोठी के अदर का बाथरूम का दरवाजा खोला…किन्तु दरवाजा खौलते ही विकास उसके सामने आ गया । एक क्षण कै लिए तो वह चौका और अगले ही पल उसने विकास को दबोच लिया । विकास ने कई हुनर दिखाए, किन्तु' उस व्यक्ति के सामने सब असफल सिद्ध हुए ।


अचानक अघेड़ ने रिवॉल्वर निकालकर बिकास कै माथे से सटा दी और धीमे, किंतु खतरनाक स्वर मे गुर्राया-" अगर एक लफ्ज भी मुह से निकाला तो गोली मार दुगा' ।"


विकास एकदम ढीला पड गया । उसका तना हुआ. जिस्म . एकदम साधारण स्थिति में आ गया ।


वह व्यक्ति बडी. फुर्ती से अपना कार्य कर रहा था l उसने तुरत ही विकास को कुछ इस प्रकार से उठा लिया कि विकास कोई हरकत न करे और रिवॉल्वर उसके सिर से सटाए वह फुर्ती के साथ कमरे से बाहर की ओर भागा ।

अभी वह कमरे से बाहर ही निकला था कि ठिठक गया । उसके सामने मिलिट्री के जवान थे । उसे देखकर ठिठकं वे भी गए, किंतु जब तक उनके हथियार तनते उससे पूर्व हीं अधेड फिर गुर्राया-" कोई गन न चलाए, वरना इस बच्चे की जान ले लूगा ।"


मिलिट्री के जवान ठिठक गए । उसके आदेश पा उन्हें हथियार डालने के लिए बाध्य होना पड़ा ।


इस बीच विकास ने भी निकलने का प्रयास किया था, किन्तु अधेड व्यक्ति आवश्यकता से कुछ अघिक ही चालाक था…जिसके सामने उनकी एक न चली। इस समय उस अधेड की आखों से चिगारियां निकल रही थी ।


तभी वहा विजय रघुनाथ और ठाकुर साहब इत्यादि आ गए I उन्होंने अभी कुछ कहना चाहा था क्रि अधेड की उगलियों की पकड रिवॉल्वर पर कुछ सख्त हो गई और भयानक स्वर में वह गुर्राया ।



"खबरदार ।। कोई न हिले वर्ना इस वच्चे की मौत.......!"



सभी ठिठककर रह गए । किसी का साहस न था कि विकास को इस तरह मौत के मुह में देखकर भी कोई गलत हरकत करने जैसी मूर्खता करे

अब सब ठिठक गए।


" सब अपने-अपने हथियाऱ गिरा दे I" उसने गुर्राकर गुर्राकर कडे शब्दों में चेतावनी दी । सभी उसकी आज्ञा-पालन करने के लिए बाध्य थे । अत: विजय, रघुनाथ और ठाकुर साहब सहित सबने हथियार डाल दिए l अधेड कै मौटे व काले हौठो पर विजयात्मक मुस्कान दौड गई ।

"मिस्टर !" वह विजय की और उन्मुख होकर बोला…"कहीं तुम विजय तो नहीँ हो ?" ~


"ठीक पहचाना प्यारे। हम ही विजय हैं, लेकिन इस बेहूदा हरकत और इन सवाल-ज़वाब का क्या मतलब और प्यारे खूसट मियां अंतिम बात ये कि तुम कौन हो ?"

विजय अजीब ढग से मुस्कराकर बोला . ।।



"तुमसे हिसाब बाद मे होगा । इस समय तो यहा से निकलना है I" अघेड़ विजय को घूरता हुआ बोला ।



…"'क्यों प्यारेलाल-कैसा हिसाब ?" विजय अभी आगे कुछ कहने ही जा रहा था कि वह फिर गुर्राया---"बको मत ! मुझे यहां से बाहर का रास्ता दिखाओ ।"


स्थिति कुछ ऐसी थी कि विजय कुछ भी करने में असमर्थ था । अत: उसे बाहर का रास्ता दिखाने लगा ।


ठाकुर साहब, बिजय, रघुनाथ ओर विकास इत्यादि के अतिरिक्त अन्य सभी अवसर की तलाश मे रहे…किन्तु वह अधेड आवश्यकता से अघिक चतुर और सतर्क था । तभी तो उसने किसी को कोई भी
अवसर नहीँ दिया और' अत में इतने सख्त पहरे के बावजूद भी वह एकं पुलिस जीप के निकट पहुच गया । जीप के निकट वह कुछ देर ठहरा औंर फिर चेतावनी-भरे लहजे में जोर से चीखा ।


" -~-अगर जीप के चलने मर किसी ने भी जीप पर फायऱ इत्यादि किया अथवा किसी अन्य ढग से मुझे रोकने का प्रयास किया तो मैँ इस बच्चे को लाश मे बदलने में जरा भी नहीं हिचकूगां ।"


वास्तव में अधेड व्यक्ति ने धमकी ही ऐसी दी थ्री कि कोई भी कुछ न कर सका । उसने स्वयं जीप स्टार्ट की और विद्युत गति से जीप रिक्त सडक पर दौडा दी । सभी बेबस-सी निगाहों से जीप के पिछले भाग को देखते रहे । जीप में एक रहस्यमय
अपराधी विकास को लेकर खतरनाक पहरा होते हुए भी फरार .
हो रहा था. .. विजय यह भी न जान सका कि यह अधेड था कौन ।।


उसके बाद !


. . तब-जबकि जीप आखो से ओंझल हो गई । पुलिस और मिलिट्री के ट्रांसमीटर और टेलीफोन घनघनाने लगे l समस्त राजनगर में यह खबर आग की तरह फैल गई, किन्तु कोई लाभ नहीं । जीप की खोज जोर-शोर से जारी हो गई ।
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