आग के बेटे / complete

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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 04 Sep 2017 17:06

लगभग आधे घटे बाद एक निर्जन स्थान पर वह जीप मिल गई और मिल गया विकास, जो बेहोश जीप की पिछली सीट पर पड़ा हुआ था, किन्तु' अघेड़ गघे के सिर से सींग की भांति गायब था । रहस्यमय अधेड वास्तव में सबके लिए एक रहस्य ही बनकर रह गया था । "


जब बिकास को होश आया तो उसने कोई विशेष बात न बताई--सिर्फ इतना बताया कि उस अधेड ने उसके गले, की नस दबाकर बेहोश कर दिया । उसके बाद वह न जाने कहां चला गया ।



इस घटना ने समस्त राजनगर को चौंकाकर रख दिया क्योकि रैना के अपहरण कै स्थान पर विकास का अपहरण हुआ था लेकिन वह भी अधूरा पुलिस इस पहेली को न सुलझा सकी ।। पुलिस यह भी नहीँ जानती थी कि उनको विकास के द्वारा अप्रैल फूल बना दिया गया था क्योकि उन्हें ऐसा कोई पत्र प्राप्त न हुआ था-जैसा विजय ने बिकास को लिखने को कहा था ।


यह एक अन्य रहस्य-भऱी बात थी।

विकास इस समय विजय की कार की डिक्की में था । कार विद्युत गति से अनजाने लक्ष्य की ओर अग्रसर थी । आज रविवार होने कै नाते बिकास के कालेज का अवकाश था-अतः वह ~ विजय से मिलने उनकी कोठी पर पहुचा । उस समय विजय कही जाने की तैयारी कर रहा था । विकास के दिमाग का शरारती कीडा कुलबुलाया -अत वह स्वय को छिपाकर अपने झकझक्रिए अकल की प्रत्येक हरकत देखनें लगा । "


विजय विकास की उपस्थिति से एकदम अनभिज्ञ था ।


अत वह मस्ती मे सीटी बजाता हुआ--ऊंगली मे क्रार की चाबी घुमाता हुआ गैरेज तक आया । गैराज से कार निकालकर चला, किन्तु इसका क्या किया जाए कि विकास तव तक कार की डिक्की मे स्वय को सुरक्षित कर चुका था

और तब से अब तक वह डिक्की में था । कार विद्युत गति से फर्राटे भरती हुई निरंतर अग्रसर थी । कार का लक्ष्य क्या है ? इस बात से विकास बिल्कुल अनभिज्ञ था किंतु' वह भी मस्त बैठा था…सास लेने के लिए उसे पर्याप्त वायू की प्राप्ति होती रहे इसलिए उसने डिक्की में एक झिरी उत्पन्न कर दी W आख सटाकर कभी कभी वह बाहर का दृश्य भी देख लेता था । इस समय जब उसने देखा तो अनुभव किया कि कार किसी सुनसान सडक पर दोड रही है क्योकि इस सडक पर आवागमन अत्यधिक कम था । कभी कोई भूला-भटका वाहन गुजर जाता ।निश्चित तो विकास कुछ. नहीं कह सकता था, किन्तु' इतना अनुमान उसने अवश्य लगा लिया था कि कार लगभग तीस मिनट पश्चात थम गई । कुछ देर तक विकास शात बैठा रहा ।


और फिर डिक्की से बाहर झाका । अवसर अच्छा था…अत डिक्की से निकलकर एक ओर को रेग गया । न जाने इस समय उसके दिमाग में यह कौन-सा क्रीडा कुलबुला रहा था । उसने देखा । जहा कार खडी थी…उसके दाई ओर एक विशाल और सुदर कोठी थी । उसने झाडियों से छुपकर देखा कि विजय उसी कोठी की तरफ बढा । उस कोठी के मेन गेट पर एक पठान चौकीदार स्टूल पर बैठा था ।


विजय उस चौकीदार के निकट गया बोला…" क्यों प्यारेलाल-क्या प्रोफेसर हेंमत अदर हैं ।"


"यस सर !" पठान ने स्टूल से खडे होकर' उत्तर दिया ।


"उनसे मिलाने का क्या लोगे ?" विजय मुस्कराकर मूड में बोला ।



"अरे वल्ला…हम रिश्वत नहीं लेता है ।” वह पठान थरथरम्बी-सी आवाज में बोला---""आइए, मेरे साथ आइए ! यह समय उनका मेहमानों से मिलने का ही है !”


विजय मुस्कराया और पठान कै साथ चल दिया । इधर विकास दबे पाव स्वय को छुपाता उनके पीछे चल दिया ।
तब जबकि वे एर्क गेलरी मे पहुचे। पठान विजय' से बोला…"इस कमरे में साहब हैं ।" उसका सकेत पास वाले कमरे की ओर था I


" ठीक है ।" विजय ने कहा और कमरे की ओर बढ गया ।


पठान वापस लौटने लगा-विकास नै फुर्ती और चुस्ती के साथ स्वयं को छिपा लिया l मस्ती मेँ झूमता हुआ पठान उसके निकट से निकल गया, किन्तु उसकी नजर विकास पर नहीं पडी. I उसके गुजरने के बाद विकास ने झाककर विजय. की ओर देखा जो उस, कमरे की घटी बजा रहा, था । तभी दरवाजा खुल गया-विजय की आवाज़ विकास के कानों तक पहुची' ।


…"गुड मार्निंग प्रोफेसर साहब I."


…"अरे. . विजय बेटे, तुम. . .तुम आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए ?" बिकास के कान मे प्रोफेसर हेमत के ये शब्द पड़े तो अवश्य, किंतु' वह हैमत को देख नहीं सकता था I तभी प्रोफेसर हेमत आगे बोले…-"अरे खड़े क्यो हो ? आओ, अंदर आओ !"


बिकास के देखते-ही-देख़ते विजय मुस्कराता हुआ कमरे..... में दाखिल हो गया । उसके अदर प्रविष्ट होते ही विकास सावधानी के साथ अपने स्थान से हटा और फुर्ती के साथ दरवाजे ' तक पहुंचकर उसने ‘की' होल’ में आख लगा दीं। अदर का सीमित दृश्य वह स्पष्ट देख रहा था । उसने देखा. .. l


प्रोफेसर हेमत का ऊपरी शरीर अभी नग्न ही था…वे अपनी शर्ट पहन रहे थे । जिसकी वे अभी बाह ही पहन पाए थे । हेमत की पीठ को वह, स्पष्ट देख सकता था l अगले ही पल हेमत ने शर्ट पहनी । फिर हेमत का स्वर विकास के कानो से टकराया ।


-"'कहो , ठाकुर के क्या हाल है ?" प्रोफेसर हेमत विजय से कह रहा था' I


~'"उनके हालं तो आप ही मुझसे बेहतर जान सकते है-बैसे इन आग के बेटों ने सभी के हाल खस्ता कर रखै हैं I” विजय की मुस्कराती-सी आवाज़ ।।

विकास 'की छोटी बुद्धि ने उनकी बातो का यही परिणाम निकाला कि प्रोफेसर हेमत उसके दादाजी यानी बिजय के पिता शहर के इस्पेक्टर जर्नल के पुराने मित्र हैं तभी तो उन्होंने मिलते ही ठाकुर साहब के. हाल पूछे । उसके कान अभी भी अदर ही लगे हुए थे-प्रोफेसर हेमत कह रहे थे…"ओह I तो अब समझा कि तुम यहा किसलिए आए हो ?"


--“ समझ गए ?" बिजय भी मुस्कराकर बोला ।

विकास उनके वार्तालाप का एक-एक शब्द सुन रहा था ।


"यही कि तुम मेरे पास अपने मतलब से आए हो । और वह मतलब यह हे कि तुम आग के बेटों के विषय मे कुछ जानना चाहते हो ।" प्रोफेसर हेमत हसते. हुए बोले ।


" आप ठीक समझे…वास्तव में मै इसीलिए आपके पास आया हू।" -लेकिन मैं तुम्हे इस तरह कुछ भी नही बताने बाला ।" हेमत बोला……'"पहले तुम्हें चाय पीनी होगी उसके बाद इस विषय पर बातें होंगी l”


-""चाय तों हम भी पिएगे अंकल I" विकास की इस आवाज ने उन दोनों को चौंका दिया । विजय की आखे एक बार फिर आश्वर्य से फैल गई । उसे लगा कि किसी दिन यह लडका उसके लिए भयानक खतरा बन सकता है । उसके मुख से अनायास ही निकला-"तुम ?”


~ “यस अंकल I मै यानी विकास-आप मुझे हर जगह देखकर हैरान क्यों हो जाते हैं ?” उछलता हुआ विकास उनके निकट आ गया । प्रोफेसर हेमत तो अभी कुछ समझ भी न पाए थे-अत वह मुह बाए उस गोरे…चिटटे सुदर लडके को देख रहे थे ओर कुछ समझने का प्रयास कर रहे थे ।


"मियां दिलजले I” विजय अपने आश्चर्य पर काबू पाते हुए बोला----- "तुम प्रगट ही ऐसी जगह होते हो कि बिना आश्चर्य किए यह बात कंठ से नीचे नहीं उतरती कि तुम यहा हो सकते हो !!!"

"आप तो बेकार में आश्चर्य करते है अकल-मैं तो आपको सिर्फ एक दिलजली सुनाने आया था I यहा आकर चाय की बात सुनी तो हमने भी चाय पीने के लिए कह दिया ।" शब्द कहते समय मानो विश्व की समस्त मासूमियत सिर्फ विकास के मुखडे पर ही आकर एकत्रित हो गई थी ।


बिकास का मुखडा इतना मासूम था कि बिजय. के होठों पर भी मुस्कान आ गई ।वह प्रोफेसर से बोला ।


"इसे पहचाना आपने प्रोफेसर ?” उसका सकेंत विकास की ओर था ।


"नहीं तो भाई…कौन है हम इसे नहीं पहचाने I" प्रोफेसर हेमत कुछ उलझ-से गए I



" आप पहचानते भी कैसे ? आप कभी इसकी बर्थ-डे पर नहीं आए…वर्ना.. अधिकांश-भारतीय ही नहीं-विश्व के अधिकांश लोग इसे पहचानते हैं ।" बिजय ने कहा ।



"अरे कही ये रघुनाथ का लडका विकास तो नही है ??” प्रोफेसर हेमत ने जैसे उसे एकदम पहचान लिया ।



"ठीक पहचाना अकल I" विजय बोला…" यह वही शेतान हे अब देखिए ना…मुझें मालूम भी नही और यह मेरी डिक्की में बैठकर यहा तक आ गए ।" विजय विकास को घूर रहा था ।



"अरे अकल!" विकास भी आश्चर्य के साथ बोला-"आप तो जानते हे कि मैं आपकी कार की डिक्की में था I”



“तुम्हारा अक्ल हूं वेटे ।" मुस्कराते हुए विजय ने कहा ।


विजय के उपरोक्त वाक्य पर न सिर्फ हेमत और विकास ने ठहाका लगाया बल्कि स्वय बिजय भी हस दिया । ठहाका लगाने कै बाद हसते हुए प्रोफेसर हेमन्त बोले-" अब याद आया I ऐसा लग रहा था , तुम्हें कही देखा हो अब पहचान लिया…तुम्हारा फोटो मैंने कईं बार अखबार मे देखा था ।"
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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

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shabi
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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by shabi » 14 Sep 2017 13:53

Mitravar jaldi post kariye

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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 14 Sep 2017 19:31

ये शब्द प्रोफेसर हेमत बिकास… से कह रहे थे-" मेरे ख्याल से मर्डरलैड को और वहा की राजकुमारी जैक्सन को, जो कि विश्व के लिए खतरा बन चुकी थी, तुम्ही ने समाप्त किया था I”


-~-“ओह यस दादा जी । ठीक पहचाना I” विकास उछलता हुआ बोला-"अब क्या आप चाय नहीं पिलाएगे' ?"


विकास की इस बात पर विजय और हेमत दोनों ही हस दिए-उसके बाद हेमत ने अपने नौकर को चाय लाने का आदेश दिया ।


चाय आने तक विकास अपनी, चटपटी बातो से उनको हसाता रहा ।


कुछ समय बाद चाय आ गईं…चाय की चुस्की लेता हुआ विजय प्रोफेसर हेमत की ओर देखता हुआ बोला-"क्यो प्रोफेसर-आपके ख्याल में ये आग के बेटे है क्या ??""


" विजय. I." हेमत ने गभीर स्वर में कहा-"जिस दिन से आग के बेटे देखे गए हैं अथवा जिस दिन से इनका ~ आतक राजनगर मे फैला है. . .उसी दिन से मै एक वैज्ञानिक होने के नाते उनके विषय में काफी सोच रहा हूं । मैँ ये सोच रहा हूं कि-आखिर ये आग के बेटे लपलपाती हुई भयानक आग में जलते क्यों नहीं. . .जीवित कैसे रहते हैं ? ये सब क्या रहस्य है? अभी तक किसी परिणाम व निश्या पर पहुचने में असमर्थ हू ! किन्तु पूर्ण आशा करता हू कि शीघ्र ही मै इस रहस्य की तह तक पहुच जाऊंगा l वेसे मैने आशिक रूप से सफलता भी अर्जित. की है, किंतु अभी विश्वास कै साथ नहीं कह सकता, कि जौ प्रयोग मैँ कर रहा हू-वह एकदम सही हे I”


"यह आंशिक सफलता क्या है प्रोफेसर ?"' विजय ने प्रश्न किया ।


विकास इस समय एक गभीर बालक की भाति उन दोनों का वार्तालाप सुन रहा था…कितु न जाने कभी…कभक वह प्रोफेसर हेमंत की ओर एक विशेष दृष्टि से देखता . . .ऐसी दृष्टि से जैसे हैमत से पहले जन्म की शत्रुता रही हो I

"वह सफलता तुम्हें मै अभी नहीं बता सकता ।" हेमत्त' बोला-- "अभी सयम रखो । कल नही तो परसो तक मैं इस रहस्य तक पहुच ही जाऊगा ओर सारे विश्व को बता दूगा-आग कै बेटों को परास्त करने का वैज्ञानिक आविष्कार भी कर लूंगा-ताकि ये आग के बेटे अब अघिक समय तक आतक न फैला सकै । यह मैं विश्वास करता हू ।" प्रोफेसर हेमंत ने बताया ।


विजय जानता था कि अधिकाश वेज्ञानिक तब तक अपने रहस्य को किसी को नहीं बताते-जब तक कि वे अपने अविष्कार को पूर्ण नहीं कर लेते I अत वह चुप रह गया । चाय का अतिम घूंट लेकर उसने कहा ।


"अच्छा तो प्रोफेसर मैं अब परसों आऊगा I”


"मैँ आशा करता हू कि परसो तुम्हें मेरी सफलता पर हर्ष होगा ।" हेमत गभीर स्वर में बोला ।


--"'अब आप ही लोग बात करते रहेंगे अथवा मैं भी भाग ले सकता हू ?" विकास ने खाली कप मेज पर रखते हुए कुछ इस प्रकार कहा कि विजय और हेमत हसे बिना न रह
सके किंतु अगले ही पल बिकास अपनी प्यारी मासूम-स्री आखों से हेमत को खूखार तरीके से घूरता हुआ बोला---"मै तुम्हें पहचान चुका हूं--बूढे उसके इस वाक्य पर दोनों इस प्रकार उछले कि मानो बिच्छू ने डक मार दिया हो । विजय को विकास की इस बेहूदगी पर अत्यधिक क्रोध आया. . हेमंत ¸का चेहरा भी कनपटी तक लाल हो गया । वास्तव मे यह विकास की अत्यत ही बेहूदगी-भरी हरकत थी । इतनी बेहूदगी-भरी कि बिजय विकास को कभी माफ नहीं कर सकता था I प्रोफेसर से बोलने का भला ये क्या
ढग था ??? इससे पूर्व कि उन दोनों में से कोई कह सके l


विकास ने एक अव्यत. अश्लील हरकत की ।


उसने कहा ।।



"टमाटर की तरह ,लाल क्यों हुए जा रहे हो बूढे, तुम्हें मैं पहचान चुका हूं।"


"विकास......! '" विजय सख्ती के साथ बोला…"यह क्या बेहुदगी है ?"

वास्तव मे अब वह विकास को क्षमा नही कर सकता था ।


अब बिकास की हरकते इतनी बढती. जा… रही, थी कि उन्हें क्षमा नहीं किया जा सकता था ।


प्रोफेसर का क्रोध भी सातवें आसमान पर पहुचा-वे लगभग अपनी पूरी शक्ति से चीखे ।


"यह क्या बदतमीजी I"


" तुम खुद को विजय अंकल से छुपा सकतें हो बूढे लेकिन मै तुम्हें अच्छी तरह पहचान चुका हू I" विकास उसी प्रकार हेमत को घूरता हुआ बोला I


"विकास I" विजय कठोर शब्दों में चीखा…" अब तुम्हारी हरकत हद से अधिक बढती जा रही है जानते हो ये कौन हो......!"



"ये जो भी हैं अंकल लेकिन इनका जो रूप मैं पहचान गया हूं उसे आप नहीं जानते । क्यों बे बूढे मैं ठीक कह रहा हू ना ?” एक बार फिर विकास ने वही वेहूदगी-भरे शब्द बोले I
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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 14 Sep 2017 19:34

अपना इतना अपमान प्रोफेसर हेमत सहन न कर सकै । उनका क्रोध सातवें आसमान पर जा पहुंचा और विकास को पकडने के लिए वे उस पर झपटे किन्तु तभी बिकास ने अपनी . पैंट की जेब से न जाने क्या चीज निकाली और अपनी छोटी और गोरी हथेली कै बीच में फसाकर प्रोफेसर हेमत' के सामने अपनी हथेली कर दी । हथेली पर मौजूद वस्तु को बिजय न देख सका ।


किन्तु अगले क्षण उसने जो परिवर्तन महसूस किया उससे उसकी भी आखे आश्वर्य से फैल गईं ।


प्रोफेसर. हेमत ने विकास की हथेली देखी । उसकी हथेली के बीच एक स्टार फंसा हुआ था । यह कोई विशेष स्टार नहीं था बल्कि साधारण सिगरेट के पैकेट के कागज को काटकर एक स्टार की शक्ल दे दी गई थी । प्रोफेसर हेमत ने बिकास की हथेली के बीच फसा वह स्टार देखा और एकदम ठिठक गया I उसकी आखे स्टार पर जमी रह गई । स्टार क्रो देखते ही हेमत की आखें आश्चर्य से फैलती चली गई । क्षणमात्र में उसकी आखों' में मौत के भय की परछाइयां तैरने लगीं ।

उसका सुर्ख चेहरा एकदम हल्दी की भाति पीला पडता चला गया । भय से हेमत थरथर कापने लगा । उसके होंठ फडफडाने लगे--- स्थिति ऐसी हो गई…मानो उसे कोई भयानक यातनाएं दी जा रही. हो । न जाने इस स्टार में ऐसी क्या बात थी कि हेमत भयभीत होकर न सिर्फ कापने लगा…बल्कि गिडगिडाने लगा । …""प्लीज़...प्लीज. . इसे मेरे सामने से हटा लो ।"



…,…""हा…हा…हा ।।" एकाएक विकास ने पागलो की भांति कहकहा लगाया और बोला…"क्यो बूढे. . .मैं पहचान गया' न तुम्हें.....अब बोलो-तुम्हारा' क्या किया जाए ?"


…""नही. . . नहीं l.” प्रोफेसर… गिडगिडाया.."ये मेरे सामने से हटा तो ।"


लेकिन विकास ने उछलकर उसे चिढाया. ।


प्रोफेसर इस प्रकार डर रहा था मानो शेर के सामने कोई बुजदिल और निहत्था व्यक्ति ! हेमत' की हालत वास्तव में ही बडी अजीब थी ।


विजय..!


वह अलग आश्चर्य के सागर में गोते लगा रहा था । उसकी, समझ मेँ नहीं' आ रहा था कि यह सब क्या है. . .? इतना अनुमान तो वह लगा ही चुका था कि हेमत' का कोई ऐसा रहस्य है जिससे वह परिचित नहीं है और किसी तरह विकास जान गया है । वह हेमत की स्थिति मे परिवर्तन स्पष्ट महसूस कर रहा था। मानो साक्षात मौत उसके सामने खडी. हो । विजय भी यह भी न देख पाया कि विकास की हथेलियों के बीच आखिर. है क्या ? लेकिन वह इतना अनुमान लगा सकता था कि विकास के हाथ में कोई ऐसी वस्तु अवश्य हे जिसका हेमत के जीवन से गहरा सबध है । उसे तो आश्चर्य हो रहा था विकास पर, आखिर लडका, है क्या ? आखिर वह हेमंत के किसी रूप से कैसे परिचित हो गया…जबकि वह उनसे पहली बार मिल रहा हे l



विजय की समझ मे कुछ नहीं आया । उसकी समझ में नहीं. आया कि हेमत इतना घबरा क्यों रहा है ? ये विकास आखिर हे क्या ? उसकी समझ में नहीं आ रहा था ।।

प्रत्येक कदम पर उसे विकास एक नए रूप में नजर आता । रूप भी ऐसा जो रहस्यपूर्ण होता ।

हैरतअंगेज होता !

आखिर ये लडका बना किस मिट्टी का. है ?


. विजय जितना उसके विषय में सोचता, उतना ही उलझता. जाता । जब उसकी समझ में नही आया कि यह चक्कर क्या है तो उसने फिर अपना ध्यान उस ओर लगाया ।


विकास अभी तक प्रोफेसर हेमत को परेशान कर रहा था । हेमत उसी प्रकार भय से थर-थर क्राप रहा था । एकाएक वह उछला औंर विकास की और झपटता हुआ चीखा । "विकास ये क्या बदतमीजी है ?”


…"अभी ये रहस्य तो मैं आपको भी नहीं बताऊगा अंकल !"


विकास फुर्ती के साथ क्रभरे से बाहर हो गया । विजय ने भी फुर्ती का परिचय दिया और गैलरी से जब बाहर-आकर देखा…-विक्रास तेजी से भागता चला जा रहा था । वह-उसकै पीछे दौडा किन्तु वह उस समय आश्चर्यचकित रह गया जब . किसी जिन्न की भाति विकास को भागतें देखा । विजय उसके पीछे दौडा नहीँ…-वल्कि उसी स्थान पर खडा भागते विकास को देखता रहा ।


उसने देखा I

भागते हुए विकास को देखकर अचानक पठान चौकीदार उठ खडा हुआ और उसका रास्ता रोक लिया किन्तु उस समय उसको न सिर्फ आश्चर्य हुआ बल्कि उसका पहाड-सा जिस्म धडाम से धरा पर गिरा…-जब विकास की फलाइग किक आश्वर्यपूर्ण ढग से उसके चेहरे पर पडी. । वह पठान इस बालक
से कदापि इतनी खतरनाक हरकत की आशा नहीं करता था कितु इसका क्या किया जाए कि बिकास उसे घूल चटाता हुआ गजब की जपों कै साथ कोठी से बाहर हो गया । अगले ही पल-इससे पूर्व कि पठान उठे…विकास ने बिजय की कार स्टार्ट की और दूसरे ही पल विकास ने विजय की तरफ हाथ हिलाकर कहा ।

…"टाटा अंकल फिर मिलेगे ।"

और अगले ही कार तीव्र वेग से दौडती चली गई । पठान उठकर कार तक भागा भी । किंतु वह कर भी क्या सकता था I


विजय अपने स्थान पर खडा विकास के बारे में सोचता रहा l आखिर ये लडका. है क्या ?


तभी वह चौंका-आखिर वह कार कैसे ले लेगया, उसने तो ताला लगाया था । तभी उसने जेब टटोली…चाबी जेब से नदारद' मिली । एक बार फिर वह आश्चर्यचकित होकर रह गया । उसे. जरा भी आभास न हो सका था कि विकास उसकी जेब से चाबी कब खिसक्राकर ले गया । वह सोचता ही रह गया कि अलफासे ने विकास को कितने कामों में दक्ष कर दिया था । विकास को उसने कितना खतरनाक बना दिया था ?



वह वापस लौटा-उसने प्रोफेसर हेमत से काफी पूछा कि आखिर विकास के हाथों मेँ क्या था ? वह भयभीत क्यों हो गया ? आखिर ये रहस्य क्या है ? कितु हेमत ने.किसी भी बात का उतर नहीं दिया l



उसने सिर्फ विजय को अपनी कोठी से चले जाने के लिए कहा । विजय ने लाख प्रयास किया-कितु प्रोफेसर हेमत ने उसके किसी भी प्रश्न का उत्तरं नहीं दिया l निराश होकर विजय वहां से चला आया, किंतु उसके-दिमाग में इस बिचित्र केस की कई ऐसी गुत्थियां घूम रही थीं, जो रहस्य से परिपूर्ण थी l इन गुत्थियों के अतिरिक्त एक अन्य इसान उसके मस्तिष्क में था । वह था विकास । उसकी समझ मे नहीं आया कि आखिर ये लडका है क्या । वह शीघ्र ही कोठी पर पहुचना चाहता था ताकि विकास किसी रहस्य से पर्दा उठा सके ।


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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 14 Sep 2017 19:34

इस केस की प्रत्येक घटना विजय के मस्तिष्क. में एक रहस्य बनकर कुलबुला रही थी ।


उसके लिए सबसे पहला रहस्य तो वह लडकी. थी जो रिजर्व बेक के मेनेजर के पास आई और बाद में आग के बेटों का पत्र देकर धुआं बन गई ।

आखिर कौन थी लडकी. ? वह धुआं केसे बन गई ? उसका धुएं में परिवर्तित होने का रहस्य क्या है ?


आग के बेटे, आग क्री लपटों में भी रहते हुए भी जीवित कैसे रहते है ?

वे अपने-आपको जनकल्याणकारी क्रिस आधार पर कहते हैं ?

सागर मे जाकर वे क्या और क्रिस प्रकार विलुप्त हो जाते हैं ?


बैक मे पखों के पास वह अचानक कैसे अचेत हो गया ?


उसके बाद उस गली में आग के पाच बेटे आश्चर्यपूर्ण ढग से कैसे मर गए ?

उन्हें मारने वाला तो कोई नज़र नहीं आया था-फिर उन पार्चों की हत्या-क्यो और किसने की ?


खद्दरधारी अधेड कौन था? उसका इस कैस से कितना गहरा सबंध है ? वह कौन है ?


आग के बेटों का साथी तो लगता नहीँ था फिर वह किस उद्देश्य से गली से उपस्थित था ? और सबसे अतिम रहस्या सबसे अघिक रहस्य-भरा और आश्चर्य से परिपूर्ण था---- वह यह कि प्रोफेसर हेमत की वास्तविक जिदगी क्या है ? विकास ने उसे क्या दिखाया था , वह वस्तु क्या थी ? उसे देखकर प्रोफेसर हेमत बुरी तरह से भयभीत होकर क्यों कापने' लगा ? उस वस्तु का रहस्य क्या है ? इत्यादि-इत्यादि अनेक रहस्यों… से भरे प्रश्न थे, जो उसके मस्तिष्क में रहस्य बने हुए थे l इनसे भी अघिक रहस्य उसके लिए बना हुआ था, वह ग्यारह वर्ष का खूखार लडका विकास ।

वास्तव मे विकास भी एक रहस्य ही था l कदम-कदम पर वह नए-नए रूपो में सामने आ रहा था I उसे याद आया, समस्त राजनगर कै साथ उसका भयानक मजाक और दूसरी और

प्रोफेसर हेमत के साथ घटी घटना ।


न जाने यह खतरनाक लडका_ प्रोफेसर हेमत' के जीवन में किस रहस्य तक कैसे पहुच' गया ? वास्तव मे विकास प्रत्येक घटना के साथ क्या रूप धारण करता जा रहा था और निरंतर विजय के दिल में इस. बिचार कौ दृढ़ करता जा रहा था कि वक्त आने पर विकास अपराधियों की मोत बन सकता है ।

वह अपराध जगत मेँ एक भय बन सकता है। इस समय विजय टैक्सी में बैठा रघुनाथ की कोठी की ओर बढ़ रहा था । उसका दिमाग तेजी से सोच रहा था । कुछ समझने के स्थान पर-वह उलझता ही जाता । सबसे अधिक उसके मस्तिष्क को यह अतिम धटना कचोट रही थी । आखिर विकास ने किस प्रकार प्रोफेसर हेमत को इतना… भयभीत. कर दिया ?


लगभग पैंतालीस मिनट… पश्चातं उसकी टैक्सी रघुनाथ की कोठी पर थमी I उतरकर बिल चुकाया और अदर गया । वैसे उसे कहीं भी अपनी कारं नजर नहीं आई, विकास उसे अदर नहीं मिला ।

रैना ने इतना ही बताया कि वह तुम्हारी ही कोठी पर गया है I विजय लोट गया। उसने रैना को कुछ नहीँ बताया ।


इन्हीं बातों मे उलझा विजय अपनी कोठी पर पहुचा-वह थोडा चौंका, क्योंकि उसकी कार वहीं ख़डी थी । उसके कदम स्वयं अपने कमरे की ओर -बढे ।

~'"आइए अंकल, आइए ।" उसके कमरे मे प्रविष्ट होते ही विकास की आवाज कमरे मे गुजी ।


विजय ने विकास को देखा तो देखता ही रह गया l विकास आराम से सोफे पर बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था । उसे. देखकर वह कुछ. विचित्र ढग से मुस्कराया और बोला ।



"अकल' । यहां आपकी प्रतीक्षा कर रहा था, इसलिए सोचा कि क्यों न भोलू से एक कप चाय बनवाकर पी जाए ।"


“ वो तो ठीक है प्यारे दिलजले ।" विजय मुस्कराकर उसके सामने वाले सोफे पर बैठता हुआ बोला--
" तुम्हारी हरकते अब हद से बाहर होती जा रही हैं-वो साला तुलाराशि दोष मुझे देगा I” ~ ~



" अंकल आप नहीं जानते प्रोफेसर हेमत को पर मै उसे पहचान गया ।" विकास का लहजा गभीर था ।


……'"पहले ये बताओ कि ऐसा कागज टाइप करके मेज़ पर क्यों नहीं रखा-जैसा मैने कहा था ? "


"जिस कमरे मे टाइप रखी थी अंकल -बहां मिलिट्री का पहरा था I” विकास प्रत्येक बात का उत्तर न जाने क्यों गभीरता के साथ देता जा रहा था ।


इस समय उसके चेहरे पर मासूमियत थी मानो उससे अघिक भोला आज तक पैदा ही न हुआ हो ।


एक बार को तो विजय को उसका थोबडा देखकर क्रोध आया किंतु वह बोला ।


"खैर ये तो अच्छा हुआ…वहा हुई घटनाओं से पुलिस और जनता यही समझ रही है कि आग कै बेटों ने प्रयास किया था किन्तु सफल नहीं हुए, लेकिन तुम दूसरी बात का तो जवाब दो ।"


“वह क्या अंकल ?” बिकास के गुलाबी अधरों पर धीरे धीरे शरारत उत्पन्न होती जा रही थी ।


--“देखो, किसी प्रकार की शैतानी दिखाई तो बहुत पिटाई होगी I” बिजय विकास के चेहरे पर उत्पन्न चचलता के भाव पढ चुका था । अत चेतावनी-सी देकर बोला…"ये प्रोफेसर हेमत का क्या चक्कर है ?”


"ये चक्कर बडा प्यारा हे अकल l”


"बोलो क्या है ?” विजय कुछ डपटकर बोला ।

"अच्छा अकल I" विकास लाइन पर आता हुआ बोला---- "रहस्य कान में बताने वाला हे । हमारे और तुम्हारे अतिरिक्त अभी इस रहस्य से कोई परिचित नहीं होना चाहिए और आप जानते हैं कि दीवारों के भी कान होते हैं । अत: मैं आपके कान में बता सकता हूं I"

विजय को लगा कि लडका फिर कोई शरारत करने के मूड में हे । अत बिशेष दृष्टि से घूरते हुए बोला "अगर कोई शरारत.... ।"


"ओफ्फो अक्ल मैं शरारत नहीं करूंगा विकास विजय का वाक्य बीच में ही काटकर बोला-"आप कान इधर लाइए ।"


_ विजय रहस्य जानने के लिए अत्यधिक उत्सुक था l अत विवशता थी । उसने कान विकास के सामने कर दिया । विकास भी बडे अदाज के साथ आगे आया और अपना मुह बिजय के कान से सटाकर अत्यत ही धीमे स्वर में न जाने क्या फुसफुसाने लगा । लगभग दो मिनट तक उनकी यही स्थिति रही विकास निरंतर उसके कान में कुछ कहे जा रहा था । समय के साथ विजय की आखें हैरत से फ़टती जा रही थीं । उसकी आखों से अनत आश्चर्य झाकने लगा और जब विकास ने अपनी बात पूरी करके मुह हटाया तो उसे समय विजय गहन आश्चर्य में गोते लगा रहा था । वास्तव मे विकास ने जो कुछ बताया था वह हैरतअगेज था । वह निश्चय नहीं कर पा रहा था कि वह कैसे विकास की बातो का विश्वास करे किन्तु विश्वास करने के लिए बाध्य था , कुछ देर तक तो वह आश्चर्य के साथ विकास के मासूम मुखडे को देखता रहा फिर एकदम उसे कुछ होश आया I


विकास से कहा ।


"क्या वास्तव में यह सत्य है ?."


"एकदम सच है अंकल I" विकास बोला-"अगर सच न होता तो प्रोफेसर स्टार देखकर इस बुरी तरह से भयभीत क्यो होता ?"


"लेकिन, अगर ऐसा है तो केस भयानक मोड ले रहा है !" विजय सोचता हुआ बोला I I


" आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं I” विकास ने कहा ।

तभी विजय को जैसे होश आया । वह सभंला......उसे ध्यान आया कि वह बाते किससे कर रहा है ।


अगले ही पल उसने मुद्रा बदली और डपटकर बोला…"लेकिन तुम्हें इन बातो से, क्या मतलब? तुम अपनी पढाई में मन लगाओ ।"


"वाह अक्ल l" विकास भी मुस्कराता हुआ ही बोला----" पहले तो सारा रहस्य जान लिया और फिर हमें ही डाटते हो I”


विकास की बात का विजय से कोई सतोषजनक उत्तर न बन पडा I


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