आग के बेटे / vedprkash sharma

shabi
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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by shabi » 04 Sep 2017 08:25

Agli kadi ka intezar hai mitra jaldi kariye

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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 04 Sep 2017 17:01

shabi wrote:
04 Sep 2017 08:25
Agli kadi ka intezar hai mitra jaldi kariye
ye lo dost update next post me hi
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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 04 Sep 2017 17:02

किंतु तभी उसके दिमाग में प्रश्न उठा, आखिर ये शरारत उसी के साथ क्यो की जा रही है ?


कहीं इस छोटी-सी घटना के पीछे कोई बड़ा रहस्य तो नहीं? उसके दिमाग ने उत्तर दिया कि सभव है ऐसा ही हो क्योकि आग के बेटों के उस पत्र से स्पष्ट होता हे कि अपराधी कछ विचित्र-स्री आदतों का स्वामी है ।


कही अपराधी उसे छका तो नहीं रहा ? न जाने क्यों उसके दिमाग में यह बात घर कर गई कि हो न हो, ये हरकत कोई बहुत बडा रहस्य हे ।


अभी सोच ही रहा था कि इस बार किसी ने अपनी सपूर्ण शक्ति लगाकर चुटी काटी-इतनी शक्ति से कि विजय तिलमिला कर रह गया लगभग चीखा…"अबे ओ. . .भाई, कौन है बे ?"



" लेकिन जो भी था, वह उसके पास से गायब था । एक बार को तो विजय की खोपडी. घूम गई ।।



उसके बोलने के ढग पर उसके आसपास खडे लोग उसे बिचित्र-सी निगाहों से देखनें लगे ।



विजय ने मुखों की भाति चेहरा बनाया और शुतुरमुर्ग की भाति अपनी गर्दन लम्बी करके इधर-उधर देखने लगा । लोग मुस्कराकर रह गए ।



वैसे इस बार विजय पूर्णतया सतर्क था ! अब वह पता लगाना चाहता था कि आखिर ये हरकत है किसकी और उसका अभिप्राय क्या है , तभी वह चौंक पडा I



वास्तव में इस समय. उसे यहां जिस चेहरे कै दर्शन हुए-उसे देखकर वह बुरी तरह से चौक पडा । as लोगों की टार्गों के बीच से होता हुआ उसकी ओर आ रहा था. । वास्तव मे इस चेहरे की यहा इस समय उपस्थिति आश्यर्य थी ।


विजय चकरा-सा गया । आखिर उसने उसे मेकअप में मीं पहचान लिया ?



विजय के मन में इस प्रश्न की उत्पत्ति हुई और मन ने उत्तर मे यही कहा कि आखिर ये लडका है क्या ? वह उसके निकट आया और अभी चूटी काटने ही वाला था

कि विजय चीखा-"अबे ओ हरामखोर की औलाद कौन है तू ?"


" डैडी को गाली दी तो मैं आपकी दाढी पकडकर लटक जाऊगा-आप मुझे नहीं पहचानते-मैं विकास हू I" लगभग ग्यारह वर्षीय वह लडका शरारत-भरे लहजे में बोला l

विजय चकराकर रह गया ।


आखिर ये लडका उसे पहचान कैसे गया ? इस समय वह ऐसे मेकअप में था कि अच्छे-से-अच्छा पारखी भी उसे पहचान न सकता था. किंतु ग्यारह वर्षीय यह छोकरा I एक बार फिर विजय सोचने पर....मजबूर हो गया कि विकास खतरनाक शैतान है I यह तो उसे पता था कि अलफासे ने उसे न सिर्फ खतरनाक कार्यो मेँ दक्ष कर दिया था बल्कि दहकते शहर नामक केस का हीरो भी विकास ही था कितु विजय को पहचानना एक भिन्न और आश्वर्यपूर्ग बात थी l


विकास......!!!!



विकास, विजय के दोस्त रघुनाथ का लडका था । यह लडका अत्यंत खतरनाक बन गया था । इस अल्पायु मेँ ही अलफासे ने उसे गजब के हैस्तअगेज कारनामे सिखा दिए थे ।


. विजय को लगा कहीं ये खतरनाक लडका यहा उसकी पोल ही न खोल दे । अत वह तुरत भीड में से निकलकर एक ओर को चला गया । , . विकास के मासूम से अधरों पर शरारतपूर्ण मुस्कान थी और वह विजय के पीछे…ही-पीछे बाहर आया l


भीड से अलग आकर विजय उसकी और मुडकर बोला-"'क्यों वे दिलजले तुम यहा कैसे ?"


" अंकल सच बताऊ या झूठ ?"' विकास बोला ।

" देखो मिया दिलजले , तुम्हारी हरकते लम्बी होती जा रही हैं । पहले नेकर का नाडा बाघना सीखो…तब ऐसे खतरनाक स्थानों पर आया करो ।"



. . "अकल मैं पैट पहनता हूं जिसमेँ नाडा नहीं पेटी होती हैं ।"




विजय ने घडी देखी…दो बजने मे सिर्फ पाच मिनट शेष थे । अत इस समय वह विकास को यहा से खिसकाने के लिए उससे बिना उलझे बोला…"तुम यहां क्या आए हो बेटे ?"



.…" आपको दिलजली सुनाने ।"


…""अवे ओ ।" विजय अभी कछ कहने ही जा रहा था कि ठहर गया और स्वयं ही बात बदलकर बोला…"लेकिंन तुमने हमें पहचाना कैसे ?"



" लो ये भी कोई कठिन काम था झकझकिए अक्ल मैं आपको दिलजली सुनाने आपकी कोठी पर गया था । वह्य देखा तो पाया कि आप शीशे के सामने बैठे ये श्रृंगार कर रहे हैं । मेरे देखते ही-देखते आपने ये नकली दाढी-मूछे लगाई और यहा आ गए । मैं आपके पीछे पीछे था ।"



विजय विकास के मासूम प्यारे-प्यारे चेहरे को देखता ही रह गया । उसे बिश्वास नहीँ हुआ कि इतनी अल्पायु का किशोर इतनी विलक्षण बुद्धि रख सकता है । वह इतना खतरनाक हो सकता हे…जितना कि बिजय था ।


विजय को कुछ विचित्र-सा लगा ।


विकास को इतना जीनियस देखकर उसे विचित्र-सी खुशी का अहसास हुआ । विकास की एक-एक हरकत ऐसी थी कि जो विजय के मन मे घर कर जाती । विकास को वह भारत का ही नहीँ-बल्कि विश्व का सर्वोत्तम जासूस बनाने का दृढ निश्चय कर चुका किन्तु इस समय विकास को यहा देखकर न जाने I क्यों उसे कछ मानसिक परेशानी हुई । तभी वह विकास से कुछ कहने ही जा रहा था कि चौंक पडा ।
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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 04 Sep 2017 17:02

अचानक बेंक की तरफ से तगडे शोर की उत्पत्ति हुई और फिर समस्त वातावरण भयभीत चीखों से भर गया । भागीत हुई भीड का रेला उसी ओर आया ।

उसने विकास को सभालने के लिए बहां निगाह मारी-जहां विकास था, किंतु उस समय बिजय की आखें आश्चर्य से फैल गई जब उसने पाया कि विकास रूपी छलावा अपने स्थान से गायब है । बिजय को लगा कि यह लडका छलावा तो नहीं I आसपास उसे कही बिकास नज़र नहीं आया ! भागती हुई भीड का रेला उसके अत्यत निकट आ गया था । लोगों की भयभीत चीखें वातावरण पर अपना प्रभुत्व जमाएं
थीं I विजय ने फिलहाल अपना मस्तिष्क विकास से हटाकर उस
ओर लगा दिया I . .


वह एक और को हट गया और उधर देखा…जिघर से लोग चीखते हुए भाग रहे थे I उधर देखते ही बिजय बुरी तरह चौंक पडा। आश्चर्य से उसकी आखे सिकुड गई । वह उस ओर देखता ही रह गया । उसे ऐसा लगा वह जो देख रहा हे-वह स्वप्न मात्र है । वास्तव में इस समय विजय जो देख रहा था…वह उसी तरह मुर्खतापूर्ण बात थी जैसे ये सोचना कि आकाश गिर जाए ।


कुछ ऐसा ही दृश्य उसके सामने था जिस पर वह कदापि विश्वास नहीँ कर सकता था । वह इस बात पर तो बिश्वास कर सकता था कि हिमालय अपने स्थान से हिल गया…किन्तु इस दृश्य को सत्य नहीं मान सकता था, किंतु दृश्य कठोर यथार्थ के रूप में उसके सामने था ।


क्षण-प्रतिक्षण उसकी आखें हैरत से फैलती जा रही थी । दृश्य जितना स्पष्ट होता जाता, उसकी आखें उसी अनुपात मे हेरत से फैलती चली जाती थीं । वास्तव में था यह हेरत्तअगेज दृश्य । उसे अपने रोंगटे खडे होते हुए महसूस हुए । भयानक दृश्य उसने देखा । उस दृश्य को. देखकर लोग उससे भयभीत होकर न सिर्फ चीखने-चिल्ताने लगे थे, बल्कि अपनी-अपनी रक्षा हेतु भाग लिए थे I विजय को भी मानना पड़ा कि प्रस्तुत दृश्य मोत से भी भयानक औरं खतरनाक है ।


सबसे पहले उसने बदहवास-सी भागती… भीड़ के उस मार धुआं उठता देखा, जिसे देखकर एक ही क्षण में भीड काई की तरह फ़ट गई और प्रस्तुत दृश्य को देखकर विजय की आखें हैरत से फैल गई ।

उसके सामने आग के बेटे थे ।


वास्तव मे ये 'आग के बेटे' थे ! .



ये लगभग दस जीवित हाड़-मास के इसान थे-किंतु आश्चर्च की बात ये थी कि उनके सपूर्ण जिस्म आग की लपटों में घिरे हुए थे । समस्त जिस्म. से आग लपलपा रही थी-मानो किसी ने उनके जिस्मों पर पेट्रोल छिडककर आग लगा दी हो । उनके जिस्मों से लपलपाती हुई भयकर अग्निशिलाऐं धधक रही थीं।


लपटे कुछ इस प्रकार ऊंची उठ रही थीं मानो दस होलिया एक साथ जल रही हों । उनके जिस्मो से ज्वलित अगारे धरती पर गिरते जा रहे थे ।


भयकर अग्निशिलाऐं ऐसे लपलपा रही थी मानो गधक की अग्निशिलाएं जल रही हौं ।


उनका सपूर्ण जिस्म भयकर किस्म की लपलपाती आग की लपटों में था ।


इससे भी आगे आश्चर्यजनक ये था कि आग की लपटों में घिरे हुए वे आग के बेटे निरंतर. रिजर्व बैक की और बढ.. रहे थे ! लोगों को न सिर्फ आश्चर्य हो रहा था, बल्कि बदहवास हो गये थे । ये बात न सिर्फ उनके दिमाग से बाहर थी, हेरतअगेज भी थी कि इस. बुरी तरह आग की लपटों में लिपटे हुए इंसान जीवित भी रह सकते हैं । वे न सिर्फ जीवित थे, बल्कि मस्त हाथी की तरह झूमते हुए अपने लक्ष्य की और वढ़ रहे थे ।



मैदान साफ हो चुका था । पी.ए.सी. वाले विचित्र-सी परेशानी और कश्मकश में फंस गए थे । यह तो वे जानते ही थे कि उ'न्हें किन्हीं विशेष अपराधियों से टकराने के लिए बुलाया गया है, किन्तु उन्हें ऐसी आशा कदापि नहीं थी कि अपराधी इस विचित्र ढग के होगे l



स्वयं विजय को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे । अपने स्थान पर खड़ा विजय सामने के भयानक दृश्य को देख रहा था ।


सहसा वह चौका.. .उसने देखा ।

अचानक उसके पिता…'शहर के आईजी--ठाकुर साहब आग के बेटों के सामने आ डटे । बिजय देख चुका था कि ठाकुर साहब के चेहरे पर. भयानक भाव उभर आए हैं-जो इस बात का प्रमाण थे कि वे कोई भयानक निर्णय ले चुके हे' । इस समय विजय ने अपना कदम आगे बढना उचित न समझा । अत वही खडा रहकर सब कुछ देखता रहा I


ठाकुर साहब आग के बेटों के सामने रिवाल्वर तानकर खडे हो गए और चीखे…"इन्हें चारों ओर से घेर लिया जाए ! "


पी.ए.सी बदहबास तो हो ही चुके थे किंतु आदेश का उन्होने तुरत पालन किया I क्षण-मात्र मे आग के बेटे पी.ए.सी के वृत्त में कैद थे किंतु आग के बेटे मस्त हाथी थी की भाति झूमते हुंए अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर थे । मानो इस घेराव से उन्हें सरोकार ही न हो । . . उनके ठीक सामने ठाकर साहब खडे थे I



आग के बेटे आगे बढते रहे --- ठाकुर साहब भी मानो अडिग चट्टान थे । वे जितने निकट आते जाते…उसी अनुपात मे ठाकुर साहब के चेहरे की भयानकता मे चार चाद लगते जाते थे । तब…जबकि वे अत्यत निकट आ गए, ठाकुर साहब बोले…"ठहरो नहीं तो भून दिए जाओगे" ।"



किन्तु ऐसा लगता था जैसे वे सभी बहरे हो I

ठाकुर साहब की आवाज का लेशमात्र भी प्रभाव उन पर न हुआ । वे उसी प्रकार बढ रहे थे I


विजय इस दृश्य को देख रहा था किंतु सिर्फ देख ही रहा था ।


'आग कै बेटे' निरंतरं आगे बढ रहे थें । ठाकुर साहब चीख-चीखकर चेतावनी दे रहे थे…जिसका उन पर कोई भी प्रभाव नहीं पड रहा था…अलबत्ता ठाकुर साहब कै क्रोध में निःसंदेह वृद्धि होती जा रही थी




अत' मे तब-जबकि वे इतने निकट आ गए कि ठाकुर साहब को उनके जिस्मों से लपलपाती आग की ऊष्मा मिलने लगीं तो ठाकुर साहब चीखे

" फायर !"


"रेट. . .रेट. . रेट. . . ! "


आदेश के साथ ही पी ए सी वालो की गनों ने अपने भयानक जबडे खोल दिए । लपलपाते हुए भयकर आग के शोले आग के बेटों की ओर बढे । वे दहकते हुए जिस्मो से टकराए भी किन्तु उस समय विजय को आश्चर्य नहीं हुआ जब बेचारी गनों की गोलियां बिना कोई जौहर दिखाए शहीद हो गई । उसे पहले ही उम्मीद थी कि आग के बेटे इन आम हथियारो के बस मे आने वाले नही है बल्कि इनका अत करने के लिए दिमागी पेंर्चों को खटखटाना पडेगा । .

परिणाम देखकर ठाकुर साहब को जहा थोडा आश्चर्य हुआ-वही पी ए सी के जबान तो भौंचक्कै रह गए । आग के बेटे ठाकुर साहब के अधिकाधिक निकट आ गए थे । इत्तऩे निकट कि उन्हें अपना जिस्म जलता-सा प्रतीत होने लगा तो वे तुरत वहा से हट गए ।


उसके बाद ।


क्रम इसी प्रकार चलता रहा । ठाकुर साहब बार…बार आग के बेटों को खतरनाक लहजे और शब्दों मेँ चेतावनी देते रहे, किंतु जब उसका लेशमात्र` भी प्रभाव न देखते तो उन्हें स्वयं यह महसूस होता कि उनकी चेतावनी खोखली है । अनेक बार . गने गरजती किंतु परिणाम वही ढाक के तीन पात I अत में सदर दरवाजे से होते हुए आग की लपटों में लिपटे आग के बेटे बैंक के अदर चले गए। पुलिस का चक्रव्यूह उनको लेशमात्र भी हानि पहुचाने मे असफल रहा ।


ठाकुर साहब का क्रोध सातवें आसमान पर पहुच गया किंतु वह कर ही क्या सकते थे ? . , .


~सडक पर अब भी दहकते शोले बिखरे पडे थे।


विजय अभी कोई उपाय सोच ही रह्य था कि बुरी तरह से चौका । उसकी नजर छलावे पर पडी ।



हां…उसे छलावा ही क़ह सकता था । वास्तव में यह शेतान था…अल्पायु का खतरनाक शेतान I

वह विकास के अतिरिक्त कोई न था जिसे देखकर विजय चौंका था । वह सिर्फ विकास के चेहरे से नही चौका था ।



वास्तव में वह चौंका था विकास की हरकत से । उसकी समझ मेँ नहीं आया कि आखिर लडका. चाहता क्या हे ? आखिर विकास उसे कितनी बार आश्चर्य कै सागर में गोते लगवाएगा ।



विजय को लगा कि अगर यह लडका इसी तरह मोत के भयानक जबडों में छलाग लगाता रहा तो किसी दिन मौत कै जबड़े उसे अपने आगोश में ले लेगे ।


उसे गुस्सा आया अलफासे पर…जिसने विकास को इन खतरनाक खेलों में दक्ष किया था । इस अल्पायु में भला इतना खतरनाक लडका बनाने की क्या
तुक है ?
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Re: आग के बेटे / vedprkash sharma

Post by 007 » 04 Sep 2017 17:03

वास्तव में विकास की इस हरकत से चौंकने वाला सिर्फ विजय ही न था, बल्कि ठाकुर साहब और रघुनाथ के साथ-साथ अन्य पी.ए.सी. के जवान भी थे I


रघुनाथ और ठाकुर साहव के लिए सर्वप्रथम तो चौंकने का कारण विकास की यहां उपस्थिति ही थी । उससे भी अधिक थी विकास की हरकत ।



उनके देखते-ही-देखते विकास किसी भूत की भाति भागता हुआ आग कै बेटों के पीछे बैंक में प्रविष्ट हो गया । उसे देखते ही ठाकुर साहब और रघुनाथ के मुह' से निका
ला ।


" विकास.......!"


किन्तु वह खतरनाक छलावा बैंक के अंदर प्रविष्ट हो चुका था l



एक ही पल मे विजय ने निश्चय कर लिया । वह जान गया कि विकास 'मौत के जबड़े ने जम्प लगा चुका है।

अत: वह भी विघुत गति से झपटा और देखते-ही-देखते वह भी बैंक में समा गया ।


उसके पीछे ठाकुर साहब और रघुनाथ भी झपटे थे, किंतु वह जानता था कि दोनों में से कोई भी उसे पहचान न पाया है…वे केवल विकास की रक्षा हेतु मौत कै मुह में आ रहे हैं ।


बिना उनकी चिता किए वह अदर प्रविष्ट हो गया ।


अदर का दृश्य देखते ही एक बार बिजय को फिर चौक जाना पडा. ।


आग के बेटे उसी हालत में कैश की ओर बढ रहे थे और बिकास तेजी से फर्श पर रेंगता हुआ एक और बढ़ रहा था I

अभी तक विजय समझ नहीं पाया था कि आखिर ये लडका चाहता क्या है ?


उसने भी सिर्फ इतना किया कि वह रिबॉंल्बर निकालकर विकासंके पीछे रेंगने लगा । ताकि विकास के किसी मुसीबत मे फस जाने पर वह. उसकी रक्षा कर सके, लेकिन न जाने उसे क्यो ऐसा लगा कि विकास कोई साधारण लडका नहीं है, अवश्य ही उसे विधाता ने कोई बिशेष शक्ति प्रदान की है । उसकी समझ मे नहीं आ रहा था कि ये छटंकी सा लडका आग के बेटो का बिगाड क्या. लेगा ? आखिर वह रेगकर करना क्या चाहता हे ? बिकास का लक्ष्य क्या हे ? विजय जितना, विकास के विषय में सोचता-वह सिर्फ उलझकर रह जाता।


आग के बेटे उनसे लापरवाह थे । आग की लपटे अब भी लपलपाकर ऊपर उठ रही थी । शोले अब भी गिर रहे थे ।


. विजय तेजी से रेंगता हुआ विकास के निकट पहुचा और फुसफुसाया "क्यों बे मिया दिलजले क्या इरादे ?”


"आप भी आ गए अकल ?” बिकास उसी तरह रेंगता हुआ बोला ।


"यस बेटे लेकिन आखिर तुम चाहते क्या हो ?"


"अकल ये हाथ मे क्या है ?” बिकास विजय की बात का कोई उत्तर न देकर शरारत-भरे लहजे में बोला ।



"इसे रिवॉल्वर कहते है प्यारे दिलजले ।" बिजय हाथ में पकड़ी रिबॉंल्वर को हिलाता हुआ बोला ।



"ये कैसा रिवॉल्वर हे अंकल?"


बातों के बीच रेंगना निरंतर जाऱी था ।



" क्यों ?"



""इससे तो मुर्गा भी नहीं मरेगा ।" बिकास बोला ।


"चुप बे-शैतान कही का I” विजय मुस्कराता हुआ बोला ।



तभी रेगते हुए बिजय की नज़र बैंक क्री छत पर लगे पखों पर पडी ।

तुरत उसके दिमाग में एक बिचार आया क्यों न वह पंखे चला दे ।

शायद पखों की हवा से इसानों के जिस्मों मे लगी आग बुझ जाए । उसने उन्हे आंन करने के लिए स्विच को तलाश में निगाह इधर-उधर दोडाईं तो स्विच पर नजर पडते ही दग रह गया । इसलिए नहीँ कि स्विच में कोई विचित्र बात थी, बल्कि इसलिए कि विकास का रूख उसी ओर था । उसे एक बार फिर विकास. की बुद्धि का लोहा मानना पडा । न जाने; क्यों अब उसे . विकास के साहस, बुद्धि और. शक्ति देखकर प्रसन्नता होने लगी…तेजी से रेंगता हुआ वह बोला ।



"'क्यों प्यारे…तुम इस तरफ क्यो बढ़ रहे हो ?"



…""अकल, गर्मी लग रही है…-क्यो न पखे चला दे ?"



विजय समझ गया कि वास्तव मेँ यह लडका. ठीक समय पर ठीक सोच सकता है !



उसके बाद…जबकि विजय स्विचों तक पहुचा उस समय आग के बेटे पखों' के नीचे थे । उसने 'स्विच की ओर हाथ बढाया, किंतु उसी पल वह बुरी तरह चौका…न सिर्फ चोंक पड़ा, बल्कि अपना दिमाग घूमता-सा प्रतीत हुआ-उसे लगा कि जैसे वह हवा में तैर रहा है । वह स्वयं को सभाल न सका और धडाम. से लहराकर फर्श पर गिरा ।



विकास ने विजय का गिरना देखा और तुरत समय की गभीरता क्रो पहचाना गया और उस स्थान से दूसरी ओर रेंग गया ।।।



उसके बाद !



विकास कुछ भी न कर सका ।


ठाकूर साहब और रघुनाथ ने आकर उसे पकड लिया ।


देखते-ही-देखते ‘आग के बेटे' वापस लौटने लगे । पुलिस ने लाख प्रयास किए ।



प्रत्येक ने अपनी बुद्धि लडाई, किन्तु आग के बेटे किसी बात से प्रभावित न हुए ओंर न ही उन्होंने अपनी और से किसी की जान ली ।


शायद वास्तव में वे जनकल्याणकारी ही थे । हजारों लोगों के देखते-ही देखते आग के बेटे सागर के जल मे विलुप्त हो गए, किन्तु अपने पीछे छोड गए…भयाननक आतक और रिजर्व बैंक का खाली खजाना।



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