दूध ना बख्शूंगी/ complete

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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 17 Nov 2017 23:13

तभी गुलफाम बोला…"क्या आप खुद वहीं जा रहे है मास्टर?"


"मजबूरी है प्यारे-----हमें नहीं पता कि उसने अशरफ आदि को यहाँ कर रखा है-हमें उम्मीद है कि वह पुलिस है भाग कर सीधा बहीं जाएगा, अत: संयोग से वहीं तक पहुंचने का जो यह एक मौका मेरे हाथ लगा है-इसे खो नहीं सकते----क्या एक मिनट के अन्दर किसी मोटरसाइकिल का प्रवन्ध हो सकता है?”

"क्यों नहीं मास्टर ! " कहकर गुलफाम एक ही छलांग मे कमरे से बाहर निकल गया
मोटरसाइकिल ठीक फुटपाथ पर बैठकर पालिश कर रहे टिंकू के सामने रोकी----------खुद को पॉलिश करने ने व्यस्त दर्शाते हुए टिंकू ने विजय की तरफ देखा--विजय ने एक नजर सडक के पार रघुनाथ की कोठी पर डाली-----मोटरसाइकिल स्टैंण्ड पर खडी की !


जूता स्टैण्ड पर रखा !


हाथ का जूता एक तरफ ऱखकर स्टैण्ड पर रखे विजय के जूते पर ब्रुश मारना शुरू कर दिया-----बिजय ने थोड़ा नीचे झुककर बहुत धीमे स्वर में पूछा-----"क्या अभी तक पुलिस यहां नहीं पहुंची-है?"



"नहीं मास्टर!''



"ओह-लो प्यारे----बह आ गई बारात ।" विजय ने दाई तरफ से आरहे पुलिस जीपों के काफिले को देखकर जल्दी'से कहा-----चक्कर शुरू होने वाला है प्यारे-लो, इसे अपनी जेब में डाल लो।"



कहने के साथ ही विजय ने एक शुगर क्यूब जैसी चीज उसकी गोद में डाल दी है उसे देखकर टिंकू बोला…"ये क्या. है मास्टर?"



"जेब मे डाल लो प्यारे -----यह तुम्हें हर मुसीबत से बचाएगी------इसकी मौजूदगी मे तुम्हें किसी किस्म की फिक्र करने की जरूरत नही है ----भले ही अनाडीपन से दिलजले का पीछा करो !"



" मै समझा नही मास्टर ?"



" बारात बहुत करीब आ गई है प्यारे---------समझाने क समय नही है----- यदि उन्होंने मुझे देख लिया तो अपने दिलजले से पहले मुझे दबोच लेंगे-----बिकास का पीछा तुम ही करोगे !" कहने के तुरन्त बाद उसने मोटरसाइकल स्टैण्ड से उतारी--किक मारी और पुलिस है वहाँ पहुंचने से पहले ही विपरीत दिशा में दौड्र लियां------जाते जाते उसने टिंकु को शुगर क्यूब उठाकर जेब में डालते देख लिया थे !!!!

...........

विकास ब्रेकों की चरमराहट से ही समझ गया कि उसकी कोठी के लॉन में एक साथ कई पुलिस जीपे रुकी हैं-अगले ही पल भारी बूटों की आवाज उसके कमरे की तरफ आई------- अभी ,वह उछलकर खडा हुआ ही था कि कमरे में दनदऩाते हुए ठाकुर साहब प्रविष्ट हुए-उनकै साथ डी.एस.पी. जैसी रैक के कई अफ्सर थे-----अन्दर आते ही जब उन सबने एक साथ रिवॉल्वर निकालकर उस पर तान दिए तो विकास बौखला गया----वह पुलिस की इस फुर्ती और हरकत का मतलब न समझ सका ।





खुद को जल्दी से संभालकर उसने पूछा----------“क्या बात है नानाजी ?"



"वनने की कोशिश मत करो विकास !" ठाकुर 'साहब गुर्राये !



बिकास की आंखें सुकडी, बोला-----"क्या मतलब?"



"कानून अपने हाथ में लेने का हक किसी को नहीं है।"



"म...मगऱ…मैंने किया क्या है?"




"सीधी तरह बता दो कि तबस्सुम कहा है ?"



"त...तबस्सुम?”




"हां-जिसे तुम पुलिस लॉकअप से किडनैप कर लाए हो ।"



विकास चकरा गया-----"आम्र क्या कह रहे हैं----तो पुलिस हैडक्वर्टर गया भी नहीं!"




" बको मत-तुम् हथेली पर सरसों जमाने की कोशिश कर रहे हो !'




" ओह, समझा ।"' विकास के जेहन में एक धमाका-सा हुआ-मेरी-धमकी से घबऱाकर गुरु ने यह चाल चली है--वह चाहते हैं कि मैं पुलिस- चंगुल फंस जाऊं ताकि अशरफ
आदि महफूज रहे-उनकी कोठी, गुप्त भबन और, राजनगर जलकर राख न हो जाएं।"


"क्या-बकवास कर रहे हो ?"
ठाकुर साहव का वाक्य मानो उसने सुना ही नहीं, लाल आंखें शुन्य में टिकाए-सपाट चेहरे वाला विकास जहरीले स्वर मैं कडकडाता ही रहा-----“मैं समझता हूँ गुरू-आखिर मैं भी आपका शिष्य हूं--------जानता हू कि अपना काम निकालने के लिए आप किस-किस तरह के हथकंडे इस्तेमाल कर सकते हैं ।"




ठाकुर साहव बोले-आगे बडो शर्मा--विकस को हथकडी पहना दो !"




"नही !" चीखकर विकास पीछे हटा।




शर्मा ठिठका, ठाकुर साहब बोले-तो बताओ तबस्सुम कहा है ?"




"वह विजय गुरू रहे होंगे नानाजी-----मैंने उनके चन्द सथियों को मार डालने की धमकी दी है------मेरी धमकी से डर गए है--------------वे मुझें इस डर से पुलिस के चंगुल में फंसा देना चाहते है कि कही मै धमकी पुर्ण ना कर दू !'



"क्या मतलव?"




" लाॅकअप से तबस्सुम को ले जाने वाले मेरे मेकअप में विजय गुरु होगे ।"




“हम तुम्हारी इस बकवास में फंसने वाले नहीं हैं-----रूक क्यों गए शर्मा…आगे बडो ।"




शर्मा ने अभी एक ही कदम बढाया था कि बिजली-सी कौधी-----विकास का जिस्म हवा में ठीक किसी धनुष से छोडे गए तीर की तरह सनसनाया-----पिछले लाॅन में खुलने बाली वन्द खिडकी के शीशे से टकराया---------------खनखनाकर शीशा बिखरा ।।।



विकास पार! !



"'धांय...धांय!" कई रिवॉल्वर गरजे-----मगर देर को चुकी थी-----ठाकुर साहब चीख पडे…“रोको उसे-जाने न पाए पाजीं-शर्मा तुम पीछे पहुंचो-लान मे !"

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कदचित् पुलिस को यह उम्मीद नहीं थी कि यहां इतनी जल्दी ऐसे हालात वन जाएंगे, जैसे जेल से निकलकर कोई कैदी भाग रहा हो !


इसीलिए जब तक सम्मले तब तक विकास अपनी कार में सवार होकर कोठी की न सिर्फ चारदीवारी पार कर गया था, बल्कि सड़क पर एक तरफ को दौढ़ चुका था ।




दुसरे अफसरों के साथ ही ठाकुर साहब भी जीपों की तरफ लपके-अभी वे जीपों तक पहुंचे भी नहीं थे, कि-"धांय... धांय...धांय...धांय !"


किसी अज्ञात दिशा से अन्धाघुन्ध फायरिंग होने लगी ।


सभी हड़बड़ागए ।
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 18 Nov 2017 18:12

इस फायरिंग ने सभी को चौका दिया था, क्योंकि ऐसी हरकत करने वाले एकमात्र यानी विकास को उन सभी ने कार लेकर बाहर निकलते देखा था ।



बडी तेजी से हरेक ने पोजीशन ले ली ।


पर वे फाॅयर किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि लाॅन में खडी पुलिस जीपो पर हुए थे----जीपों के लगभग सभी पहिए बैठ गए थे-ठाकुर साहब ने यह ताड़ लिया था कि फायरिंग कोठी की दूसरी मंजिल के एक कमरे से हुई है-उन्होंने उस कमरे की खुली खिड़की की तरफ देखा ।



जेहन मे दो नाम गूंजे रैना और मोन्टो ।



विकास के अतिरिक्त कोठी में सिर्फ वही दो हो सकते हैं---नि:सन्देह यह सोचकर मोन्टो यह काम कर सकता है कि पुलिस विकास का पीछा न कर सके-फिर दिमाग में बड़ी तेजी यह सवाल कौंधा कि क्या रैना भी ऐसाकर सकती है--पहले क्षण दिमाग में -जवाव उभरा----नही ।"



अगले ही क्षण ठाकुर साहब ने सोचा…क्यों नहीं----रैना अपने बेटे को पुलिस के चंगुल से भाग निकलने का मौका देने के लिए ऐसा क्यों यहीँ कर सकती-जरूर कर सकती है---!




जिस बहन ने अपने बेटे से पति के हत्यारे भाई की लाश मांगी हो, वह ऐसा जरूर कर सकती है।
यह विचार दिमाग में आते ही उनका चेहरा कठोर हो गया, हाथ में दबा रिवॉल्वर उस खिड़की की तरफ़ तानकर चीखे ----" कौन है उस ऊपर वाले कमरे मे…सामने आए ।"



सभी की दृष्टि उस कमरे की खुली खिड़की पर चिपक गई ।



ठाकुर साहब एक ही जम्प बाॅलकनी के नीचे पहुच गए-तेजी से भागे-----दूसरी मंजिल पर पहुचे----कमरे में कदम रखा, किन्तु कमरा एकदम खाली था ।


अचानक वातावरण में एक मोटरसाइकिल के स्टार्ट होने की आवाज गूंजी ।



ठाकुर साहब तेजी से खुली हुई खिड़की पर झपटे कोठी की बाउन्ड्री से बाहर सड़क पर उन्होंने एक मोटरसाइकिल को तेजी से दौड़कर विपरीत दिशा में जाते देखा-एक ही पल में -
उन्होंने रिवॉत्वर सीधा करके फायॅर कर दिए ।



परन्तु सवार रिवॉल्वर की रेंज से बाहर हो चुका था ।



" अरे-वह तो शायद विजय है !" ठाकुर साहब जोश में चीख पड़े---" उसका पीछा करो ।"



ऐसा आदेश देते वक्त जोश में है यह भूल गए थे कि पुलिस के पास पीछा करने का कोई साधन शेष नहीं बचा है !



यह विचार दिमाग में आते ही वे झुंझला उठे-खिडकी पर लगभग लटककर चीख पड़े---"शर्मा-वायरलेस पर शहर में गश्त कर रहीं पैट्रोल कारों को उनकी जानकारी दो-आदेश दो कि उनमें से एक भी बचकर न निकल पाए।"



आदेश होते ही शर्मा वायरलेस जीप पर झपटा।

ठाकुर साहब भागते हुए कमरे से बाहर निकले-रह-रहकर वे रैना और मोन्टो को पुकार रहे थे-मगर उत्तर में कहीं से कोई आवाज सुनाई न दी-उस वक्त तो उनके दिमाग में सैकडों प्रश्न चकराने लगे थे, जब पूरी कोठी छान मारने पर भी उन्हें कहीं मोन्टो या रैना न मिल सके।


सारी कोठी खाली पडी थी ।

विकासं की कार सुनसान पडी सडक पर उडी चली जा रही थी-----गति विकास की जिन्दगी के समान ही तेज थी, फिर भी लडके की दृष्टी रह…रहकर 'बेक-व्यू-मिरर' पर पड़ती ।



एक मोटरसाइकिल अब भी उसे नजर आ रही थी ।


कोठी से भागते ही बिकास ने ऐसे ऊटपटांग रास्ते अपनाए थे कि यदि पुलिस पीछा या वायरलेस की मदद से उसे घेरने की कोशिश करे तो धोखा खा जाए-उस वक्त उसका पूरा ध्यान खुद ,को पुलिस की निगाहों से ओझल कर लेने की तरफ था ।


मोटरसाइकल सवार की तरफ वह ध्यान नहीँ दे पाया… था ।




मगर अव वह महसूस कर रहा था कि यह मोटरसाइकिल उसकी कोठी के बाहर से ही निरन्तर उसके पीछे है-भीड़-भरी सडकों पर तो वह कई बार मिर्र से ओझल भी हुई थी, किन्तु सूनी सड़क पर तो वह बराबर मौजूद रहीँ थी ।



विकास को यकीन हो गया कि मोटरसाइकिल सवार उसका पीछा कररहा है ।



बडी तेजी से उसके जेहन में यह सवाल उठा कि वह कौन हो सकता है?



इस वक्त तीन किस्म के लोग उसका पीछा कर सकते हैं--"पुलिस-उस कथित मुजरिम का कोई आदमी , जिसका दिमाग इस सारे वखेड़े के पीछे काम कर रहा है या विजय का आदमी ।




उसे शीघ्र ही कहीं शरण लेनी थी------ज्यादा सोचने-समझने का समय नहीं था…वह जानता था कि अगर वह ज्यादा देर तक राजनगर की सडकों पर चकराता रहा तो शीघ्र ही उसे पुलिस की पैट्रोल कार इस तरह घेर लेगी कि वह ऐडी…चोटी का जोर लगाने के बावजूद भी निकल नहीं सकेगा ।



काफी देर से वह यह सोच रहा था कि पीछा करने वाले का क्या करे?
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 18 Nov 2017 18:12

एक बार यह विचार दिमाग में आया कि फिलहाल वह इसे डाँज देकर निकल जाए-----------तभी उसने सोचा कि ऐसा करने पर यह रहस्य रहस्य ही रह जाएगा कि वह किसका आदमी है-पहली बार इस मोटरसाइकिल सवार के रूप में उसके सामने ऐसा कोई व्यक्ति आया है, जिसका सम्बन्ध उसके तीन दुश्मनों में से किसी एक से निश्चय ही है----अतः इसे हाथ से नही निकलने देना चाहिए !!!



विकास ने आश्चर्यजनक ढंग से एकदम ब्रेक लगा दिए!

घबराकर मोटरसाइकिल सवार ने भी ब्रेक लगाए, परन्तु कार और मोटरसाइकिल के ब्रेकों में जमीन-आसमान का अन्तर होता है- गाडी तो थोडी आगे जाकर जाम हो गई, जबकि
मोटरसाइकिल लड़खड़ाती हुई कार के काफी निक़ट तक चली आई ।



विकास ने रिवॉल्वर निकालकर उसके अगले टायर पर फायर किया ।


टायर के परखच्चे उड़ गए--मोटरसाइकल उछलकर जा गिरी----टकी फटी-पेट्रोल गर्म इंजन पर गिरा और 'फ़क्त' से आग लग गई, किन्तु टिंकू यह सब कुछ होने से पहले ही मोटरसाइकल से कूद चुका था-वह सडक से उठकर तेजी से एक तरफ भाग क्या है ।




कार से बाहर निकलकर विकास गर्जा-"रुक जाओ--- वरना गोली मार दूंगा।"


वह नहीं रूका ।



विकास ने उसके भागते कदमों पर गोली चला दो ।


अचूक लक्ष्य ।


टिंकू के कंठ से एक चीख निकली-लड़खंड़ाकर वह मुंह के बल सडक पर गिरा !!!!!


हाथ में रिवॉल्वर लिए लम्बा लड़का लम्बे-लम्बे कदमों के साथ उसकी तरफ़ दोड़ा-----जिस वक्त टिकु पुन: खड़ा होकर भागने की कोशिश कर रहा था , उस वक्त विकास उसके सिर पर पहुँच गया-----झपटकर उसने टिंकू का गिरेबान पकडा और … जबडे पर रिवाॅल्बर का दस्ता दे मारा ।



एक जबरदस्त चीख…चेहरे का भूगोल बिगड गया ।



इस बार जब वह सड़क पर गिरा बेहोश हो चुका था !




पहले विकास ने जांच की कि वह सचमुच बेहोश हुआ है या नाटक कर रहाहै !


आश्वस्त होने कै बाद उस ने टिंकू के जिस्म को रुई के बबुए की तरह उठा कर कन्धे पर डाला ओंर रिवाॅल्बर जेब मे रखकर कार की तरफ बढ गया----सडक पर पडी धू धू करके जल रही मोटरसाइकिल के समीप से गुजरते वक्त बुरा-सा मुंह बनाया-----बेहोश टिकु को कार की पिछली सीट पर डाला।



कार एक झटके सेआगे बढ़ गई।
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एक होटल के केबिन मे बैठे विजय की आंखें मेज पर रखी छोटी सी "विराम गडी' पर टिकी हुई थी…बह विराम घडी किसी वस्तु की दिशा और दूरी बता रही थी ॥



हरी सुई दिशा बता रही थी और लाल रंग की सूई दूरी ।


हरी सूई दक्षिण दिशा में लगभग स्थिर-सी हो गई थी,

जबकि लालल सुई निरन्तर गतिशील थी-विजय ध्यान से उसे देख रहा था---अब दस किलोमीटर से आगे निकलनी शुरू हो गई थी-------जाने क्या मिलाने के लिए उसने रिस्टबॉंच पर नजर डाली ।



एकाएक केबिन के बाहर से पदचार्पो की ध्वनि उभरी ।


विजय ने जल्दी से विराम घडी पर हथेली रख ली…घड्री इतनी छोटी थी कि वह छुपकर रह गई…वेटर' ने मेज पर कॉफी रखी और पर्दा व्यवस्थित करता हुआ चला गया ।




अब घडी पर दृष्टि टिकाए विजय कॉफी सिप करने लगा--अभी वह आधी काॅफी भी सिप नहीं कर पाया था कि लाल सूई रूकी गई-वह सत्रह किलोमीटर के निशान पर स्थिर हो गई थी-------विजय ने रिस्टवॉच में समय देखा ।

विराम घड्री उठाकर जेब में डाली और फिर कॉफी खत्म करने के अन्दाज में लम्बे-लम्बे घूंट भरने लगा…शीघ्र ही उसने मग खाली करके मेज पर रखा-एक बार फिर जेब से विराम घडी निकालकर देखी और उठ खड़ा हुआ ।
॥॥॥॥॥॥॥

विकास की कार सीधी पुराने 'मांडल की उस इमारत के पोर्च में रुकी----वह बाहर निकला-------पिछली सीट से टिंकू का बेहोश जिस्म उठाकर कंधे पर डाला और इमारत के द्वार की
तरफ़ बढ़ गया-------दरवाजे पर इस वत्त भी ताला लटका हुआ था, जिसे विकास ने जेब से चाबी निकालकर खोला ।
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 18 Nov 2017 18:13

गेलरी पार करके वह अभी एक कमरे में पहुंचा ही था कि हाथ में रिवॉल्वर लिए मोन्टो सामने आ गया-----इस वक्त वह किसी भी किस्म के खतरे का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रहा था, किन्तु विकास को देखते ही उसने रिवाॅल्बर जेब मे डाल लिया।



"कहो मोन्टो सब ठीक है न?”



सांकेतिक भाषा में जवाब देने के बाद मोन्टो ने उसी भाषा में यह पूछा, कि ये किसे उठा लाए…बिकास ने कहा…"फिलहाल इसे एक कुर्सी से बांघकर होश में लाना है !"



मोन्टो फुर्ती से सारे प्रबन्ध करने लगा।




जिस वक्त रेशम की डोरी की मदद से कुर्सी पर बँधे टिंकू को होश आ रहा था, तब तक विकास उसे बता चुका था कि वह इसे क्ति हालातों में यहाँ लाया है ।




टिंकू ने आंखें खोली ही थी कि विकास ने झपटकर दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकड लिया-----गुर्राया-----"बोलो कौन हो तुम और मेरा पीछा क्यों कर रहे थे ?"




" आपका पीछा?" टिंकू ने अनभिज्ञता जाहिर की ।



' आपको गलतफहमी हुई है-----मि आपका पीछा नहीं..; ।" वाक्य पूरा होने के पहले ही 'भड़ाक' से उसके चेहरे पर विकास का घूंसा पड़ा-----टिंकू के कंठ से एक चीख निकली------कुर्सी उलटने ही वाली थी कि विकास ने झपटकर उसके साथ बंधे टिकु के लम्बे बाल पकड़ लिए…र्टिंकू झूलता-सा रह गया, जबकि विकास कह रहा था---"इसपे शक नहीं कि तुम मेरा पीछा कर रहे थे और जब पीछा कर ही रहे थे तो मैं दाबे के साथ कह सकता हूं कि मेरा नाम भी जानते होगे और मेरा नाम जानने वाला हर शख्स जानता है कि विकास जब अपने चंगुल में फंसे किसी व्यक्ति की जुबान खुलबाता है तो चमडी तक उधेड़ लेता है-----------आज तक मुझें एक व्यक्ति ऐसा नहीं मिला है, जिसकी जुबान मेरे चंगुल में फंसने के वाद बन्द रही हो--बोलो---सीधी तरह सब कुछ बताते हो या पहले चमडी उथड़वाना पसन्द करोगे?"



"मैं नहीं जानता कि आप कौन है और क्या कह रहे है !"



बस-----अपने मुंह से टिंकु के लिए यह, वाक्य निकालना मानो गजब हो गया-एक नही विकास के लगातार देर सारे प्रहार उसे सहने पड़े------चीख के बाद चीखें ही गूंजती चली गई-------------सारा चेहरा खून से लथपथ हो गया-----किंसी जुनूनी के समान विकास उसे मारता चला गया ।



यहाँ तक कि वह बेहोश हो गया !




विकास के घुटने की अन्तिम चोट से कुर्सी पीछे-उलट गई---- तभी उसकी जेब से एक शुगर क्यूब जैसी चीज़ है निकलकर फर्श पर लुढ़कती चली गई ।।।




विकास के साथ ही मोन्टो की दृष्टि भी उस पर जम गई ।

विजय मोटरसाइकिल को सुनसान इलाके में स्थित पुराने मांडल की इमारत के सामने से गुजारता चला गया----हां,, इसी समय में उसने इमारत के पोर्च में खडी विकास की कार जरूर देख ली थी----आधा फर्लाग के करीब निकल आने के बाद उसने मोटरसाइकिल रोकी ।



उसे खींचकर समीप वाली झाडियों में डाला और खुद पैदत ही सड़क छोड़कर खेतों में से होता हुआ इमारत के पिछले भाग की तरफ बढ़ गया…इस वक्त वह बिल्कुल मस्त नजर आ रहा था, तभी तो दोनों हाथ पंतलून की जेब में डाले सीटी बजाता चला जा रहा था ।



अपनी यह मुद्रा उसने-पदयात्रा की समाप्ति यानी कोठी के पीछे जाकर ही तोडी------------इमारत तीन मंजिली थी, किन्तु इस तरफ कहीं भी कोई, गन्दे पानी का पाइप नजर नहीं आ रहा था ।



'उसने अजीब से ढंग से मुंह पिचकाया।



फिर कोई ऐसा स्थान ढूंढने लगा, जहां से वह किसी कमरे की खिड़की तक पहुच जाए-----------कोशिश करने पर उसे दाई तरफ शीघ्र ही ऐसा स्थान मिल गया------एक जंगला था-जंगले के ऊपर उसका लेटर शेड…शेड के ऊपर दूसरी मंजिल की बाल्कनी------बाल्कनी के नीचले भाग मे बहा लोहे का मोटा छल्ला लटक रहा था ।।।


-हालांकि किसी साधारण व्यक्ति के लिए इस रास्ते 'से चढ़ना असम्भव. की सीमा तक कठिन था, किन्तु इस किस्म के कामों का अभ्यस्त विजय थोड़े से परिश्रम के बाद ही दूसरी मंजिल की बालकनी में पहुच गया ।

उसने सभी खिड़की और दरवाजों परं दबाव डाला ।। बे अन्दर से बन्द थे-किस्मत से उसे एक ऐसी खिडकी मिल गई, जिसके किवाड़ अन्दर की तरफ खुलते चले गए।



चौखट पार करके वह निशब्द गैलरी में कूद गया ।


गैलरी सुनसान पडी थी।




विजय का रिवॉल्वर जेब से निकलकर हाथ में आ गया…एक-एक नजर उसने गैलरी में दोनों तरफ डाली----फिर रिवॉल्वर सम्भालकर एक तरफ़ बढ़ गया-उसके कान हल्की सी आवाज को भी सुनने के लिए पूरी तरह तैयार थे-चारों तरफ गहरी खामोशी छाई थी और जाने क्यों अब यह खामोशी रहस्यमय-सी महसूस होने लगी थी…।




वह सीढियों के सिरे पर पहुंचा----सीढियां सीधी ग्राउण्ड फ्लोर के हाॅल में जाकर खत्म होती थी-सीढियां उतरने के लिए अभी उसने पहला कदम बढाया ही था कि अपने पीछे से हल्की-सी आहट का अहसास पाकर विद्युतीय गति से घूमा, परन्तु घूमते हुए विजय के कुल्हे पर एक चमकदार बूट की जबरदस्त ठोकर पडी-बिजय का बैलेंस बिगडा-गिरा और फिर सीढियों पर लुढ़कता ही चला गया, किन्तु अपने हाथ से उसने रिवॉल्वर नहीं निकलने दिया।

हाल के फर्श पर पहुंचते ही उसने रिवॉल्बर बाला हाथ घूमाया -रुख अभी संढियों के शीर्ष तरफ घूमा ही था कि------" धांय !"



विजय के हाथ से रिवॉल्वर निकलकर दुर जा गिरा। हाथ झनझना उठा-हाथ को अजीब से अन्दाज में झटकते हुए विजय ने ऊपर देखा-सीढियों के शीर्ष यानी सबसे ऊपर बाली सीढी पर विकास खड़ा था।


हाथ में रिवॉल्वर' लिए ।
नाल सै अभी तक धुआं निकल रहा था---------विजय ने देखा कि बिकास के चेहरे पर इस वक्त दूर-दूर तक सिर्फ नफरत ही नफरत थी----------उसके चेहरे-का गोरा रंग बिल्कुल काला नजर आ रहा था-आंखें यूं भभक रही थी, जैसे अंगारे हो----उसके एक हाथ में रिवॉल्वर था और दूसरे हाथ की मुट्ठी कसी हुई थी…बार-बार फूलते-पिचकते जबडों के मसल्स स्पष्ट चमक रहे वे----इस वक्त विकास का ऐसा रूप विजय के सामने था कि एक बार को तो विजय जैसे व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी में भी सिहरन-सी दौड गई…सारा जिस्म झुरझुरा गया अगले ही पल सम्भलकर बोला--------------" ये क्या बात हुई प्यारे------बादे के मुताबिक हमारी कुश्ती तो आज रात दस बजे होनी थी न?"




एक सीढी उतरते हुए विकास ने कहा-----" मगर आपको मरने की जल्दी थी ।"



“वह कैसे प्यारे ?"



"खुद को बहुत ज्यादा चालाक समझते हैं न आप-मेरे मेकअप में तबस्सुम को उडा ले गए…सिर्फ इसलिए कि पुलिस मेरे पीछे पड जाए-आपने सोच लिया था कि पुलिस से बचने के लिए मैं वहीं-शरण लूगा, जहाँ अशरफ आदि को कैद किया गया हे…सचमुच आप बहूत चालाक हैं गुरु-अपने एक आदमी को ऐसे अनाडीपन से मेरा पीछा करने का हुक्म दिया, है जिससे कि मैं ताड जाऊं कि मेरा पीछा हो रहा है-आप जानते थे कि पीछा करने वाले को कब्जे में करके यहाँ ले आऊंगा----------------उसकी जेब में शुगर क्यूब की शक्ल मे एक छोटा, मगर शक्तिशाली ट्रान्समीटर डाल दिया दिया-------जिसका सम्बन्ध एक विराम घड्री से था और अपनी योजना के मुताबिक आप बिराम घडी की मदद से यहां तक पहुंच गए ।"


'तो तुम सव कुछ समझ गए प्यारे?"


"तभी पहले से ही यहां आपके स्वागत का प्रवन्ध था।"


"कम चालाक तुम भी नहीं हो!" .


व्यंग्यभरी मुस्कान--------“आखिर शिष्य किसका हू ?"



"लेकिन -------!"

"माफ करना गुरु--सामने पहुँचते ही चरण स्पर्श न करने की गुस्ताखी कर बैठा हूं-ये लीजिए !” कहने के साथ ही उसने ट्रिगर दबा दिया-गोली सीधी विजय के चरणों के समीप फर्श में धंस गई ।



बिजय उछला।



“डरो नहीं गुरु-बिकास के पिता का हत्यारा इतनी आसान मौत नहीं मर सकता।"
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 18 Nov 2017 18:13

तभी वहां एक अन्य फायॅर की आवाज गूंजी------यह दूसरी गोली थी, जो उसके चरणों के समीप फर्श में जा धंसी------यह गोली विकास के रिवॉल्वर से नहीं चली थी, इसलिए फुर्ती से घूमकर उस तरफ़ देखा-----रिवॉल्बर एक रोशनदान पर बैठे मोन्टो के हाथ में था-उसे देखते ही विजय कह उठा----"ओह-तुम भी यहीं हो प्यारे…राहू-केतू-मगर तुम यहाँ क्यों…लटके हुए हो गान्डीव प्यारे!"



"आपकी हत्या करने में मोन्टो मेरी कोई मदद नहीं करेगा गुरू !"



"क्यों प्यारे?"



नीचे उतरते हुए विकास ने कहा-----" उसे समझा दिया गया है ।"



.'"हो सकता है कि उसकी समझ में न आया हो प्यारे?" विजय ने अजीब-सा मुह बनाया ।




उसकी बात पर ध्यान न देकर विकास घीरे-धीरे बराबर सीढियां उतरता हुआ बोला----------" मै जानता हू कि आप यहाँ मेरी कैद से अशरफ आदि को निकालने का मकसद लेकर आए थे यह निश्चय कर चुका हू गुरु कि आने वाले चन्द क्षणों बाद या तो मैं जिन्दा रहूगा या आप…ये मैं नहीं कह सकता कि आप ही मरेंगे या मैं, इसलिए बता रहा हु---यदि मैं मर जाऊं तो जहां आप खड़े हैं, वहां से दाई तरफ एक गैलरी है-गैलरी में तीसरा कमरा आपके काम का है-उसमें एक स्विच बोर्ड लगा है-----------बोर्ड का ऐक स्विच ऑन करने पर आपकी भेंट अपने साथियों से हो जाएगी ।"



"बताने के लिए शुक्रिया प्यारे? '

"मुमकिन है कि आप मर जाएं, इसलिए उससे पहले आप से अपने चन्द सवालों का जवाब चाहूंगा !"



"ज़रूर प्यारे?"



" अपने डैडी क्यों मारा ?"



" हमारी जानकारी में वह मोन्टो के बाद रैना बहन को मी गोली मारने वाला था !"



"उन्हे रोकने के लिए आप सिर्फ उनकी टांग में मैं गोली मार सकते थे…ठीक इस तरह !”



कहने के साथ ही लड़के ने ट्रिगर दबा दिया------'धांय' की एक जोरदार आवाज के साथ रिवॉल्वर से एक शोला लपककर विजय की बाई टांग में घुटने के नीचे धंस गया ।





बिजय कंठ से एक चीख निकली-चकरधिन्नी की तरह वह घूमा और फिर 'धड़ाम' से फर्श पर गिर गया-----आखे फैल गई उसकी------------सचमुच उसने विकास से एकदम इतनी बेरहमी की उम्मीद नहीं की थी, इसी वजह से वह संग आर्ट का प्रदर्शन करके गोली से न वच सका।"



उसी रफ्तार से नीचे उतरता हुआ विकास गुर्रा रहा था------"जो बात मैं कहना चाहता हू वह शायद अब आपकी समझ में अच्छी तरह आ गई होगी-------बोलो गुरू-------मेरे सवाल का जवाब दो…उन्हें रोकने के लिए आखिर आपने उनकी टांग में गोली क्यों नहीं मार दी?”



"उस वक्त जल्दी में हम यह नहीं सोच सके !"




'धांय !'




इस बार शोला विजय की दाई टांग पर झपटा था, विजय न सिर्फ रबर के किसी बबुए की तरह उछलकर खुद को बचा गया, बल्कि अब वह फर्श पर एक ही टांग पर फुदक भी रहा था-------उसी मुद्रामे सीढियां उतरते हुए विकास ने कहा------------"ये मैं नहीं मान सकता गुरु-"



"क्यों नहीं मान सकते प्यारे?"




"क्योंकि जानता हूं कि आप कठिन-से-कठिन हालातों मैं भी अपने दिमाग से नियन्त्रण नहीं खोते हैं------मै ऐसा नही मान सकता कि आप नियंत्रण खो सकते हैं !"



"अब इस बात का तो मेरे पास कोई जवाब नहीं है प्यारे !"

"मेरे पास है ।"



"क्या?"



"धांय-धांय !"



इस बार-निकास का रिवॉल्वर एक साथ दो बार गर्जा------ एक ही पैर पऱ किसी बन्दर के समान उछलकर विजय न सिर्फ स्वयं को बचा गया, बल्कि पलक झपकते ही उसने फर्श पर पड़ा अपना रिवॉल्वर उठाकर फायॅर भी झोंक दिया-----विजय के रिवाॅल्बर से निकलकर दहकती हुई बुलेट सीधी विकास के रिवॉल्वर की नाल में आ फंसी-------विकास ने ट्रेगर दबाया, लेकिन कोई गोली बाहर नहीं निकली--अगले ही पल उसने रिवॉल्वर ही खींचकर विजय के हाथ में दबे रिवॉल्वर पर मारा ।




आपस में गुथे-से दोनों रिवॉल्वर फर्श पर जा गिरे। सभी सीढियां तय करने के बाद विकास नीचे पहुंच चुका था-एक भी शिकन नहीं थी उसके चेहरे पर…पत्यर कोयले की तरह काला-सख्त एवं खुरदरा चेहरा-आंखों में सिर्फ
हिंसा, जबकि विजय इस वक्त भी अपने एक पैर पर फुदक रहा था-उसके जख्म से खून की बूंदे टपक रही थी, परन्तु उनकी परवाह किए विना विजय विकास के हर आक्रमण का
मुकाबला करने के लिए तैयार था !




-विकास निरन्तर उसकी तरफ़ बढ़ता हुआ बोला---------“मेरी मां ने आपकी लाश मांगी है गुरू-------उन्हे इस बात से मतलब नहीं कि उसमें थोड़ा बहुत खून हो या नहीं-+++----खून का हिसाब मुझे चुकाना है…डैडी के खून की एक-एक बूद का बदला लूगा मैं ।"



" उसके लिए हम तैयार हैं प्यारे, लेकिन. . !'



लड़का ठिठका, बोला-------“लेकिन क्या?"




"उससे पहले हम उस मुजरिम... ।"

मगर-विजय का वाक्य पूरा होने से पहले ही विकास ने ठीक किसी चीते की तरह उछलकर विजय पर जम्प लगा दी---विजय सही समय पर किसी फिरकर्नी के समान घूम गया---------- झोंक में विकास 'मुंह के बल फर्श पर गिरा-बिज़य झपटकर उस पर जम्प लगा दी और अगले ही पल उसके मजबूत हाथों में विकास की गर्दन थी -विजय जानता था कि यदि बिकास को मौका दे दिया गया तो फिर वह चूकेगा नहीं------------विकास के ऊपर पडा वह उसकी गर्दन दबाता ही चला गया ।



विकास छटपटा उठा ।




चेहरा सुर्ख पड़ता चला गया------------------------आंखें और जीभ उबल पडी-चेहरे और आंखों की एक…एक नस स्पष्ट चमकने लगी थी------हाथ-पैर सुन्न-से पड़ते चले गए----------गर्दन के आर-पार खून का दौरा एकदम रुक गया -विकास अपने हार्थों से अपने ऊपर से धकेलने की भरपूर चेष्टा कर रहा था, किन्तु कामयाब न हुआ---विकास को लगा कि अब वह कभी इस फौलादी पकड़ से मुक्त न हो सकेगा----फिर भी, अन्तिम कोशिश के रूप में उसका दायां पैर विजय की बाई टांग पर सरसरा रहा था ।




फिर विकस के बूट की नोक विजय के जख्म पर स्थिर हो गई ।



एक ही झटके में उसने नोक जख्म में घुसेड़ दी।



विजय के मुंह से मर्मान्तक चीख निकली-क्षण-मात्र के लिए उसकी पकड विकास की गर्दन पर ढीली पड़ी और विकास ने पूरी बेरहमी के साथ सिर की टक्कर विजय के नाक पर मारी ।




एक विलबिलती--सी चीख के साथ विजय दूर जा गिरा । विकास किसी 'रबर' के बबुए की तरह उछलकर खडा हुआ-------------फिर उसकी लम्बी टांग चली-----वूट की ठोकर विजय के जिस्म पर यूं पडी जैसे बह विजय का जिस्म नहीं, बल्कि फुटबॉल हो ।




एक बार जब विकास हावी हुआ तो उसने सांस न लिया… बिजय को मारता ही चला गया वह-यहां तक कि विजय जब अन्त में फर्श पर गिरा तो वह हिला तक नहीं निश्चल पड़ा रह गया…मुंह से कोई आबाज भी नहीं .निक्ल रही थी---स्थिर-सा खड़ा विकास, उसकी तरफ देख रहा था------एकाएक ही लड़के की आंखें भरती चली गई । अजीब से स्वर में बोला---"नहीँ गुरु--सिर्फ बेहोश होने से काम नहीं चलेगा-मां ने आपकी लाश मांगी है--उनके कदमो में आपकी लाश ही ले जाकर डालूगा मै !"

आंखों उबलते हुए आँसू फर्श पर गिरे।



हाथ में रिवॉल्वर लिए खड़ा-सा मोन्टो विकास को रोता हुए देख रहा था…विकास उसी मुद्रा में आगे वढा-बिजय के समीप जाकर झुका हाथों से उसका गिरेबान पकडा लडके ने…ज़बरदस्ती उठाकर उसके ढीले-डाले शरीर को अपने सामने-खड़ा करके बोला-----"पानी लाओ मोन्टो-इन्हें होश में लाना है न तो विकास के पिता के हत्यारे की मौत इतनी आसान हो सकती है और न ही विकाश के गुरु इतनी आसानी से मर सकते हैं--- संघर्ष करना होगा-यदि विजय गुरु यूं मर गए तो लोग कहेंगे… ।"



"आ-एह-ई--ई---ई-" विकास के मुह से निकलने वाले आगे के शब्द एक दर्दनाक और लम्बी चीख में बदल गए--हुआ यूं कि जिसे विकास ने बेहोश समझा था , एकाएक ही उसके दाएं पेर का घुटना बिजली की सी गति से उसकी जांघों के जोड पर पड़ा-प्रहार इतना सख्त और अप्रत्याशित था कि बिलबिलाता हुआ विकास झुका-तभी--------!"




विजय का दुहत्थड़ उसकी गुद्दी पर पड़ा ।




विकास का चेहरा फ़र्श से जा टकराया !
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