दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 12 Oct 2017 18:25

"तुम खामोश बैठी रहो ।" रघुनाथ का लहजा इतना ठंडा था कि तबस्सुम के सारे जिस्म में ठंडी लहर लौड गई--कुछ ही देर बाद टेक्सी भकड -भरे इलाको से गुजर रही थी…एक लाल बती पर टैक्सी रूकी ॥॥॥



अखबार का एक हाॅकर चिला रहा था-------------'"पढिए-आज की ताजा खबर-सुपर रघुनाथ इकबाल नामक मिस्री निकला---वह अपनी पहली बीबी साथ घर छोड़कर भाग गया ।"




यह आवाज सुनकर रघुनाथ ने दांत पीसे ।


बोला…"इस हरामजादे एक अखबार खरीद लो तबस्सुम! !!"


तबस्सुम ने उंगली के संकेत से हाॅकर को अपनी तरफ बुलाया--हाॅकर दौडता हुआ कार के नजदीक आया-जिस समय तबस्सुम उससे अखबार. खरीद रही थी , उस बीच रघुनाथ ने अपना चेहरा झुकाए रखा।




हरी लाइट होते ही अन्य वाहनों की तरह टैक्सी भी चौराहा पार कर गई-----मुख्य पृष्ठ देखते ही तबस्तुम कह उठी------अरे-------अखबार मे तो आज़ भी तुम्हारा फोटो छपा है इकबाल ?"




“खबर पढो ।" रघुनाथ ने ड्राइविंग करते हुए कहा ।



समाचार उतनी असभ्य भाषा में बिल्कुल नहीं छपा था, जितनी कि अपने अखबार बेचने के लिए वह जाकर प्रयोग कर रहा था-कार दौडती रही-तबस्सुम ने समाचार उसे पढ़कर सुनाया----जो कुछ उसने पढकर सुनाया, उसे संक्षेप में यूं कहा जा सकता है कि-कल के अखबार में तीसरे पृष्ट पर छपे विज्ञापन में रात तक की सभी घटनाएं विस्तारपूर्वक दी गई थी-बस आगे लिखा गया था कि पुलिस रघुनाथ उर्फ इकबाल-तबस्सुम और अहमद को खोज रही है-पूरे शहर की नाकेबन्दी कर ली गई है…राजनगर से बाहर निकलने बाली हर सड़क-हर साधन पर पुलिस की क्रड्री नजर है !!


दिलबहार होटल के कमरा नम्बर सात सौ बारह को सील कर दिया गया है ।




रघुनाथ का फोटो और तबस्सुम तथा अहमद का हुलिया अखबार में छापकर जनता से अपील की गई थी कि---इन तीनों में से कोई भी किसी को कहीं दिखे तो तुरन्त पुलिस को सूचित्त करे-----समाचार में किसी का पक्ष नहीं लिया गया था।



घटना को हैरतअंगेज और रहस्यमय बताया गया था ।


संक्षेप में रघुनाथा-की जीवनी भी छापी गई थी ।



तबस्सुम, ने अखबार को तह क्रंरंफे अपने घुटनों पर रखा ही था कि-वह यह देखकर-चौक पडी कि अभी-अभी टैक्सी जिस बंगले की चारदीवारी में प्रविष्ट हुई है उसके दरवाजे पर गृहमंत्री लिखा था।

गृहमंत्री महोदय उसे देखते ही कह उठे-"अ...आप-मिस्टर रघुनाथ?"



"क्षमा किजिए---मेरा नाम इकबाल है !"



" हा--- हम वह हैरतअंगेज समाचार पढ़ चुके हैं-बैठिए ।"



रघुनाथ लम्बी-चौडी मेज के इस तरफ पडी पंक्तिबद्ध दस-बारह कुर्सियों में से एक पर बैठ गया ।



तबस्सुम उसके साथ ही थी, जो कि चुपचाप उसके बराबर वाली सीट पर बैठ गई-----


गृहमंत्री महोदय ने ध्यान से तबस्सुम को देखा और बोले-इनका -नाम शायद----।"



"तबस्तुम है ।"



" हां अखबक्रर में शायद यही छपा है----बड़ा ही विचित्र वाक्य हुआ है आपके साथ-पढ़कर बहुत अजीब-सा लगा----पता नही अचानक ही अपना. परिचय बदल जाने पर आप तो , कैसा महसूस कर रहे होंगे-मंगर आपकी यू मुजरिमों की तरह भाग जाने की क्या जरूरत थी ?"



"वही बताने या अगर यू कहा जाए कि मैं आपके पास विशेष लोगों की शिकायते लेकर आया; हूं---- उम्मीद है गृहमंत्री के नाते आप सुनेंगे ।"



"क्यों नही----कहिए ।"

"मैं इकबाल हू-----हालांकि मैं ये महसुस नहीँ करता कि मैं कभी रघुनाथ भी था-किन्तु सबके कहने और अखबारों में लिखे होने के कारण मानता हू कि मैं करीब इकत्तीस 'साल' रघुनाथ रहा-जिस तरह इकबाल को प्यार करने वाले हैं, उसी, तरह रघुनाथ को भी प्यार करने वाले.हो सकते है-------वे नहीं चाहते कि मैं इकबाल बनकर अपनों के नजदीक और उनसे दूर हो जाऊं ।"




" उनका ऐसा न चाहना स्वाभाविक है ।"



"मगर इसके लिए वे कानून तो अपने हाथ में नहीं ले सकते ?"



गृहमंत्री महोदय बोले…“कानून तो, किसी भी हालत में किसीको अपने हाथ मे लेने का हक नही है !"


"लेकिन वे लोग ऐसा ही कर रहे हैँ-इसी वजह से मुझें भागना पड़ा ।"



"कौन लोग?"



" इंस्पेक्टर जनरल ठाकुर साहब-उनका सुपुत्र और उसके चमचे ।"



" हम समझे नहीँ!"



"अखबार में यह नहीं छपा है कि सुपर रघुनाथ के धर में मुझे 'कैद` करके किस तरह रिवॉल्वर की नौक पर स्वयं को रघुनाथ ही कहने के लिए बाध्य किया गया।"



"क्या ठाकुर साहब ने भी…?"



"उन्होने कम-उनके सुपुत्र ने ज्यादा !"



“आप जो भी कहना चाहते हैं, साफ-साफ़ कहै ।



रघुनाथ ने सारी घटना विस्तार से बल्कि थोड्री बढा-चढाकर भी बताई…ओर बोला-----"अब यह फैसला अदालत करेगी कि मैं इकबाल, बनकर इनके साथ रहू …या रघुनाथ बनकर उनके साथ-----यह फैसला करने वाले ठाकुर साहब कौन होते हैं----------उन्होंने मुझे बरगलाने की कोशिश की ।"



"हो सकता है कि आपको समझाना चाहते हों ।"



"मैं बालिग हू और अपना अच्छा-बूरा सोच-सकता हू।"

एक क्षण चुप रहे गृहमंजी महोदय, फिर बोले…"जव तुम रघुनाथ थे तो हम स्वंय भी तुमसे कई बार मिले है, उसी आधार पर तुम्हारे लिए हमारी व्यक्तिगत राय ये है कि तुम्हें दोनो के ही साथ रहना चाहिए-ताकि किसी को दुख न हो ।"


" मुमकिन है कि मैं ऐसा ही करता, लेकिन...।"

" लेकिन क्या !"



"सबसे पहली बात तो वे है सर कि मैं व्यक्तिगत स्तर पर हैं न तो आपसे कोई राय लेने आया हे न. ही बात करने-आप सिर्फ गृहमंत्री है और मैँ आपके पास शिकायत और फरियाद लेकर आने वाला साधारण नागरिक------मेरी गुजारिश है कि आप इसी स्तर पर मुझे सुने।”


"जरूर-"कहिए !"



"एक हत्या हो गई है-उस हत्या की रिपोर्ट करना चाहता हू---- हालांकि रिपोर्ट सम्बन्धित थाने में की जानी चाहिए परन्तु मुझे शक है कि पुलिस उस हत्या की -छानबीन पूरी ईमानदारी के साथ नहीं करेगी-----इसलिए यह रिपोर्ट या कम्पलेण्ट मैं सीधी एपसे कर रहा हुँ।"



"पुलिस पर आपकी सन्देह क्यों है"'



“क्योंकि हत्यारा आई-जी पुलिस का बेटा हो सकता है ।"



"य...ये आप क्या कह रहे हैं?" गृहमंत्री महोदंय उछल पडे ।



" जिसकी हत्या हुई है, उसकी मृत्यु स्वयं आई.जी के लिऐ भी लाभप्रद है ।"



. "ये आप-----किसकी हत्या हो गई है?"



रघुनाथ ने एक झटके से कहा---"मेरे अब्बा…यानी अहमद खान की ।"




"न.......नही---!"' स्वंय गृहमंत्री महोदय के चेहरे पर भूचाल-सा 'नजर आया ।
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 12 Oct 2017 18:26

रघुनाथ कहता ही चला गया-"तमी तो कहता हू कि वे लोग कानून अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहे है ।"



"हम पूरी वारदात सुनना चाहते हैं ।"

सब कुछ बताने के बाद रघुनाथ ने कहा---------अहमद खान चूंकि मिस्र से आए थे और उन लोगों के अलावा भारत में उनका किसी से दोस्ती या दुश्मनी का रिश्ता नहीं था----------उन लोगों के अलावा न तोकिसी को उनका कत्ल करने की जरुरत ही है, न ही कोई वज़ह-भाऱतं में सिर्फ वे लोग उनके दुश्मन हैं----मैं स्पष्ट शब्दों में कह रहा हूं कि मेरा पुरा शक उन्हें लोगो पर है ।"



"उनमें से विशेष किस पर !'



“मिस्टर विजय पर ।"



" ओह! कहीं ऐसा तो नहीं कि. .. ।"


“मैं आपको लिखित एप्लीकेशन दूंगा-उन्ही लोगों से मुझे अपनी बीबी यानी तबस्सुम की जान का खतरा है--.इतने नीचे भी गिर है कि मुझे भी कल्ल कर दें-यदि हम दोनों में से किसी को कुछ हो जाए तो उसका जिम्मेदार उन्ही लोगों को समझा जाए ।”



"कहीँ यह आपका वहम तो नहीं?"



"विल्कुल नहीं ।"



"आपको और कुछ कहना है?''



“रात मैं कोई जुर्म करके नहीं भागा था, बल्कि एक तरह से अपनी और अपने अब्बा की जान बचाकर ही भागा था, किन्तु फिर भी हमारे लिए सारे शहर की नाकेबन्दी इस तरह की गई है, जैसे हम भगोड़े हों--अखबार में हमारे फोटो और हुलिए छापकर हमे देखते ही पुलिस को सूचित कर देने का ऐलान जनता में कुछ इस तरह किया गया है, जैसे कि हम कोई बैक रांबरी करके भागे हों…यह सब कुछ यदि उनकी ताकत का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है----वे आईजी. हैं…ताकतवर है-सारी पुलिस उनकी हे…इसलिए यह दरख्वास्त लेकर मुझे आंपके पास आना पड़ा-मुझे पुलिस के एक-एक के सिपाही से खतरा है----अतः मेरी हिफाजत और मदद के इन्तजाम किए जाएं ।"


" आपको पूरी हिफाजत की जाएगी ।"



"रहा यह मसला कि मुझे रघुनाथ बनकर उनके साथ रहना है या इकबाल बनकर तबस्सुम के साथ, यह मेरे सोचने की है बात है----बालिग हूं और मुझे कोई भी किसी व्यक्ति विशेष के साथ रहने के लिए बाध्य नही कर सकता-----मै वही रहुगा, जहां मेरी इच्छा होगी----हा , रैना अदालत के जरिए अपना पति जरूर मांग सकती है-वह मांगे--परन्तु कानून की परिधि में रहकर वे कुछ भी करें-----------मुझे कोई आपत्ति नही है--परन्तु यदि ठाकुर साहब ने अपनी समस्या से निपटने के लिए अपने पद का उपयोग किया-या किसी भी माध्यम से हमेँ नुकसान पहुचाने की कोशिश की गई तो वह अपराध ही होगा ।"


"'बेशक होगा?" "



"उम्मीद करता' हु कि आईजी. साहब को आप अपनी तरफ से'सचेत कर देगे और................... और मेरे अब्बाजान के हत्यारे की 'तलाश अपने किसी विश्वसनीय और योग्य जासूस से कराएंगे ताकि मुझे जल्दी-से-ज़ल्दी न्याय मिल सके ।"



“आपने जो कहा है, उसे लिखकर दे दीजिए ।"

"य...यस सर…मैं सब कुछ समझ गया हू सर-----------सचमुव वह हमारी घरेलू समस्या है, मगर पुलिस का प्रयोग सिर्फ इसलिए किया गया,~क्योकि हमें उनके भारत से निकल जाने का खतरा था !"




"मैंने आपको सब बता दिया है ।" दूसरी तऱफ से व गृहमंत्री ने कहा----एप्लीकेशन के नीचे उसने इकबाल के नाम से ही हस्ताक्षर, किए हैं, अत: इकबाल की कंप्पलेण्ट हमारे पास है---------उचित यहं होगा कि आप सोच--समझकर कदम उठाएं ।"



' "यस सर ! "


दूसरी, तरफ से सम्बन्ध बिच्छेद होते ही ठाकुर साहव ने रिसीवर रख दिया !



उनके चेहरे पर पसीना उभर आया था !


दिमाग सांय-सांय कर रहा था------------------गृहमंत्री महोदय की बात सुनने के बाद उनकी समझश्रे नहीं आ रहा था कि क्या करें।





अचानक ही फोन की घण्टी पुन: घनघना उठी ।


ठाकुर साहब ने अनमने ढंग से रिसीवर उठाया और बोले -----" हैलो !"



"मैं इंस्पेक्टर प्रभाकर बोल रहा हू सर! "



"कहो ।”



"हमने एक टैक्सी में जाते सुपर साहब और तबस्सुम को अपनी गिरफ्त में ले लिया है ।"




"ओह ।" यह शब्द स्वयं ही उनके मुंह से निकल पडा--------फिर कुछ देर के लिए वे सोच में पड़ गए, गृहमंत्री के 'शब्द' उनके कानों में गूंज रहे थे…उन्होंने स्पष्ट कहा था कि रघुनाथ का इकबाल वन जाना आपका घरेलू मामला है, अत: इसमे अपने पद अथवा पुलिस का दुरुपयोग न करे ।

दूसरी तरफ़ प्रभाकर ने पूछा-“स..सर! "





"यस! " ठाकुर साहब चौंके, फिर सम्भलकृर बोले-"क्या इस वक्त वह तुम्हारे आस-पास है !"



"जी हा ।"



"उसेसे हमारी बाते कराओ ।"



कुछ ही देर बाद दूसरी तरफ़ रघुनाथ की आबाज उभरी-"इकबाल हीयर ।"




"'रधुनाथ९ !"



"लगता हे-अभी तक गृहमंत्री महोदय से आपकी बाते नहीं हुई हैं ।" कटु स्वर ।



"हमारी बाते हो चुकी है रघुनाथ, लेकिन इंस्पेक्टर को फ्ता नहीं था-उसने पुराने आदेशो के मुताबिक ही तुम्हें गिरफ्तार कर लिया…हमें अफसोस है ।"



"तो मैं रिसीवर इन्हें देता हूं---नए आदेश दीजिए ।"



"वह तो हम दे ही देंगे, बल्कि इकबाल के रूप में तुम पूरी तरह आजाद हो----तुम्हें कोई पुलिस नहीं पकडेगी------मगर----!"



“मगर क्या ?"




"भले ही तुम खुद को रघुनाथ मानो,, परन्तु पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट अभी तक हो-सबूत के लिए तुम्हारे जिस्म पर इस वक्त भी सरकारी वर्दी है---- हम आई-जी है----तुम्हारे अफसर और उसी नाते हम तुम्हें आदेश देते हैं कि तुरन्त आफिस आकर हमसे मिलो ।”



‘में यह आदेश मानने से इंकार करता हू' ।"



"म. ..मिस्टर एस.पी.!" ठाकुर साहब गुर्रा उठे ।


“मैं एस. पी. नहीं हं !"



"तुम एस. पी. हो… यदि तुमने, इस हुक्म की फौरन तामील न् की तो हम जानते हैं कि एक अनुशासन तोडने वाले पुलिस अफसर को किस तरह अपने सामने लाकर खड़ा करना है !"



"तो सुनो ठाकुर-मै आ रहा हू…अपने इंस्पेक्टर से कहो कि हमे छोड़ दे !"

ठाकुर साहब के आदेश पर आँफिस में प्रविष्ट होते ही रघुनाथ ने जोरदार सेल्यूट दिया और सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया-----------अपनी कुर्सी पर बैठे ठाकुर साहब अभी कुछ कहने ही बाले थे कि आँफिस में तबस्सुम दाखिल हुई---उसे देखते ही जाने क्यों ठाकुर साहब का चेहरा तमतमा उठा----वे हलक फाड़कर चिल्ला उठे----"तुम्हें इस आफिस में किसने आने दिया?"



“तबस्तुम मेरे साथ है ।" रघुनाथ ने कहा !



"हमने तुम्हें किसी के साथ नहीं बुलाया था ।"



“मैं आपके हुक्म का गुलाम नहीं हूं।"



ठाकुर साहब हलक फाड़कर चीख पडे…रघुनाथ! "



"आप भूल रहे हैं कि मैं-इकबाल हूं ।"



"इस में तुम एस.पी. हो-सिर्फ एस.पी.……ओर हम तुम्हारे अफसर है---हमारा आदेश है कि इस कूडे के ढेर को इस आँफिस से उठाकर बाहर फेक दो ।"




"मैं आपका आदेश मानने से इंकार करता हूं -और ये रहा मेरा इस्तीफा ।" कहने के साथ ही जेब से इस्तीफा निकाल कर रघुनाथ ने ठाकुर साहब के सामने मेज पर डाल दिया-----एक
नजर उन्होंने इस्तीफे को देखा,, फिर चौके हुए अन्दाज में रघुनाथ की तरफ!
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 12 Oct 2017 18:27

रघुनाथ का चेहरा इस वक्त किसी पत्थर के कोयले की तरह काला----खुरदरा-सख्त और ऊबड़-खावड़ महसूस हो रहा था !


ठाकुर साहब के जिस्म पर मौजूद हजारों मसामो ने एक साथ पसीना उगल दिया--------नजर तबस्सुम पर पडी तो तबस्सुम ने धीमे से मुस्कराकर उनके तन-बदन में आग लगा दी…जाने क्यों ठाकुर साहब की आंखें भरती चली गई, वे कह उठे----" य......ये आखिर तुम्हें हो क्या गया है रघुनाथ ?"



"मैं रघुनाथ नहीं हूं।”




" जानते ही-हमने तुम्हें यहां क्यों बुलाया है?"



"मैँ नहीं जानना चाहता ।"



कसमसाते हुम ठाकुर साहब एक झटके के साथ कुर्सी से खड़े हो गए…उसे घूरते हुए बोले…"तुमने गृहमंत्री से हमारी शिकायत की-------यह कहा कि हमने कानून अपने हाथ में लिया है-----पुलिस का दुरुपयोग किया है--------तुम्हें यह मैं शक है कि हमारे नेतृत्व में अहमद खान के मर्डर की छानबीन ईमानदारी से नहीं होगी, क्योंकि उसका हत्पारा विजय हो सकता है--" उफ…हमारे बेदाग कैरियर पर यह दाग भी तुम्ही को लगाना था रघुनाथ-जाओ, अहमद खान मर्डर केस की जिम्मेदारी हम तुम्हें सौंपते हैं-तहकीकात करो----वह चाहे जो हो-----विजय या हम----उसे पकडकर कानून के हवाले करने को काम हम तुम्हें सौंपते हैं ।"




"आप मेरे इस्तीफे को भूल रहे हैं।"



“क्या तुम उस मर्डर केस की छानबीन करने के लिए तैयार नहीं हो?"



"कम-से-कम, आप जैसे अफसर के आदेश मैं नहीं सुन सकता ।"



ठाकुर साहब कसमसाकर' रह गए…इस वक्त उनकी ऐसी इच्छा हो रही थी कि अपने बाल नोच ले-सिर दीवार में दे मारें…उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि उनके सामने खड़ा होकर रघुनाथ कभी ऐसे लफ्ज बोलेगा-अपना स्वर नियंत्रित रखने की भरपूर चेष्टा करते हुए उन्होंने पूछा-"क्या तुम्हारा आखिरी फैसला है?”



"बेशका"



" एक बार फिर सोच लो !"




" इस पद पर तो क्या-मैं एक क्षण भी इस आफिस मैं में खडा रहना नहीं चाहता ।"



ठाकुर साहब ने कठोर स्वर में कहा-"तुम्हारा इस्तीफा मंजूर कर लिया गया है-----सरकरी रिवॉल्बर---परिचय-पत्र और बैल्ट उतार दो ।"



रघुनाथ एक पल के लिए भी नहीं हिचका ।
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:29

किसी जमाने के शिकारगाह और आज के खण्डहर के चारों तरफ़ भारी बूट-खाकी वर्दी और लाल निशान की टोपियों वाले ही नजर आरहे थे-वहुत-सी पुलिस जीपे खडी थी वहां और उस कमरे के इर्द-गिर्द,, जिसमे अहमद की लाश पडी थी, ठाकुर साहब---रघुनाथ और तबस्सुम के अतिरिक्त फोटोग्राफर तथा फिगर प्रिंटस विभाग के लोग थे ।




रघुनाथ औरे तबस्सुम उनसे पहले ही यहा पहुंच चुके थे।



ठाकुर साहब को देखते ही रघुनाथ ने व्यंग्यपूर्वक पूछा था-“आप क्यों आए हैं यहा?'



" घटना की तहकीकात करने ।"


“खूब-बेटा करे और बाप इन्वेस्टीगेशन-हत्पारा जरूर पकडा जाएगा ।"



"ये सरकारी वाम है मिस्टर इकबाल, यदि आप इसमें टांग अडाएगे तो अच्छा नहीं होगा----ठीक है कि कत्ल आपके अब्बा का हुआ है-गृहमंत्री महोदय के सामने आप अपना सन्देह भी व्यक्त कर चुके है----------वह सब साधारण नागरिक की हैसियत से आपका अधिकार था, परन्तु बिना किसी प्रमाण के न तो आप किसी को कातिल ही कह सकते है और न किसी जांच करने बाले पर शक कर सकते हैं ।"



"चलिए आपने मुझे इकबाल तो माना, लेकिन.. . ।"




" लेकिन ----?"


" मैंने गृहमंत्री महोदंय से कहा था कि इस मुर्डर केस की छानबीन वे किसी..........!"


"आप प्रशासन से सिर्फ रिक्वेरट क़र सकते हैं------मजबूर नहीं कर सकते----हम सिर्फ इतना जानते है कि उन्होंने हमे इस केस की छानबीन के बारे में कुछ नहीं कहा है, अंत: यह हमारे अधिकार क्षेत्र में है कि हम यह जिम्मेदारी किसे सौपे ।"



रघुनाथ ने फिर व्यंग्य किया-----" और आपने यह जिम्मेदारी-स्वयं ही ओंढ़ली?"




"क्योकि यह कल्ल हमारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा. पर धब्बा वन गया है ।" कहने के बाद उन्होंने 'लाश वाले कमरे की तरफ पहला कदम बढाया ही था कि उनकी नजर खण्डहर में दाखिल होते विजय पर पडी !!!




विजय को देखते ही रघुनाथ की आंखें सिर्फ उसी पर चिपक गई----चेहरा कठोर होता चला गया----ज़वड़े भीच गए…आंखें सुर्ख…सारे जिस्म में एक अजीब सा तनाव उत्पन्न हो गया था…जिस वक्त रघुनाथ बार-बार अपनी मुट्ठियां कस और खोल रहा था, उस वक्त ठाकुर साहब ने विजय से मूछा-----“तुप यहाँ क्यों आए हो?”



"कबड्डी खेलने ।" विजय के चेहरे पर मासूमियत थी ।




ठाकुर साहब ने उससे उलझना ठीक नहीं समझा-------विजय की हरकतों और बातों से वे वहुत ज्यादा उत्तेजित हो जाया करने थे और इस वक्त .वे अपने मस्तिष्क को संतुलित रखकर घटनास्थल का निरीक्षण करना चाहते थे, अत: बोले-----"तुम उस कमरे में नहीं घुसोगे ।"





"क्यों नहीं घुसेंगे?" विजय ने अजीब-से स्वर में पूछा ।।।



विना कोई जवाब दिए ठाकुर साहब बारहदरी पार करते हुए तेज कदमों के साथ कमरे की तरफ बढ गए ॥॥॥



ऊट की तरह गर्दन लम्बी किए विजय ने अपने चेहरे पर मूर्खतापूर्ण भाव उत्पन किए।।



और मुंह चला-चलाकर भेंस की तरह जुगाली करने लगा-इसी बीच उसकी नजर रघुनाथ और उसंकी बगल मैं खडी तबस्सुम पर पड़ी ।


वे दोनों ही उसे देख रहे थे-बल्कि रघुनाथ तो उसे देखकर भुनभुना रहा था ।।

जव विजय से न रहा गया तो वह किसी शायर के से अन्दाज में कहा उठा…“यूं घूर'-घूर के न देख हसीना-----मेरा दिल फड़कता है और आता है पसीना ।"



रघुनाथ एकदम किसी गोली की तरह झपटा-----इससे पहले स्वयं विजय की समझ में कुछ आए रघुनाथ ने दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकडा और पागलों की तरह झंझोड़ता हुआ चीख पड़ा-"'हरामजादे-कुत्ते-मैं तुझे जिन्दा नहीं छोडुगा ।"



कमरे की तरफ़ बढते ठाकुर साहब ठिठके---घूमे।।


बौखलाए से अन्दाज में विजय कह रहा था-“अमां-------मगर प्यारे----!"



" तुने ही मेरे अब्बा को कत्ल किया है-कमीने-मै तुझसे खून की एक-एक बूंद का बदला लुगा ।"


वह'चीख रहा था-तबस्सुम अलग करने की चेष्टा कर रही थी, जबकि बडी तेजी से दौड़कर ठाकुर साहब उनके नजदीक आए और चीखकर बोले---"ये क्या बदतमीजी है----------- रघुनाथ-छोडो उसे ।"



परन्तु-उसका गिरेबान पकड़े रघुनाथ पागलों की तरह चीखे चला जा रहा था।



अंत में विवश होकर' ठाकुर साहब ने सिपाहियों को आदेश दिया----आगे बढकर चार पुलिस वालों ने रघुनाथ को विजय से अलग किय----ररघुनाथ उनकी गिरफ्त में अभी तक कसमसा रहा था, जबकि विजय किसी मूर्ख के समान अपनी कमीज में पडी सलवटों को दुरुस्त करने में 'व्यस्त-था।


रघुनाथ को घूरते ठाकुर साहब 'चीखे-"यदि तुमने कानून अपने हाथ में या कार्यवाही में किसी तरह का गतिरोध उत्पन्न, करने की कोशिश की तो हम तुम्हें गिरफ्त मे भी ले सकते है !"
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:29

"मुझे तो गिरफ्त में लिया ही जाएगा----उसे नहीं, जिसने हत्या की है, क्योंकि वह तुम्हारा बेटा... ।"


”खामोश! " ठाकुर साहब हलक फाढ़कंर चिल्ला उठे…“यदि तुमने बार-बार हमारी ईमानदारी पर कीचड उछाला. तो अच्छा नही होगा…यदि तुम्हारे पास इस नालायक को हत्यारा साबित करने का कोई सबूत है तो, पेश करो-विना सबूत के तुम्हें किसी पर हमला करने का हक नही है !"


" नाइस---वैरी नाइस।” विजय ने ताली बजाई---- साहब ने घूरकर उसे देखा !!!!

बडी मुश्किल से विजय की मूर्खतापूर्ण हरकतों और रघुनाथ के गुस्से पर काबू पाया गया-तब कहीं ठाकुर साहब लाश बाते कमरे में पहुंचे-सबसे पहले उन्होंने दूर ही से खडे होकर बड़ी ही तीक्ष्ण दृष्टि से लाश और कमरे की स्थिति का निरीक्षण किया ।




इस वक्त लाश पर मक्खियां काफी अधिक सख्या मे भिनभिना रही थी----ठाकुर साहव धूल-भरे फ़र्श पर पैरों कै निशान तलाश करने लगे !!




कमरे में तीन व्यक्तियों के पैरों के निशान थे ।


ठाकुर साहब ने सावधानी से बैठकर अपनी उंगली से उन निशानों को नापा-तीसरे निशान को नापने पर उनकी आखों में आश्चर्य के हल्के से माव उत्पन्न हुए।



फिर वे खुद को फर्श पर बने निशोनों से बचाते हुए ताश की तरफ बढे…समीप पहुंचे-मक्खियां भिनभिनाकर उडी… ।।



ठाकुर साहब ने जेब से रूमाल निकलकर नाक और मुह पर रख लिया-लाश के दाई तरफ लम्बे पैरों के निशान थे-बाई तरफ पहले किस्म के दोनों निशान ।




धूल पर ऐसे निशान भी उसी तरफ़ थे, जैसे किसी ने वहाँ घुटने टेके हों ।



ठाकुर साहब लाश के समीप अपने पंजों पर बैठे…झुककर बहुत ही ध्यान से जख्म को देखा----फिर बिखरे हुए खुन पर उगली का सिरा रगड़ा-थोड़ा-सा खून उंगली पर लग गया ।




वे उठे-सारे कमरे की स्थिति का निरीक्षण करते सावधानी के साथ दरवाजे की तरफ वंढे-इस बीच रूमाल जेब में डाल लिया था---------- क्योंकि लाश से अभी इतनी बदबू नहीं उठी थी कि सारा कमरा ही बदबू से भर जाए ॥॥॥॥॥
हां लाश के समीप पहुंचने पर बदबू का अहसास जरूर होता था ।


'दरवाजे पर पहुंचते ही जाने क्यों चौंककर ठिठक गए । एक लम्बी सांस खींची-आखो में चमक उमरी और फिर वे चौखट को किसी शिकारी की तरह जगह--जगह से सूघने लगे-चौखट का ऊपरी सिरा उनके सिर से कोई एक फुट ऊचा था…ज़ब अपनी एड्रियाँ ऊपर उठाकर ठाकुर साहब ने उसे सूघा तो उनके नथुने फ़ड़फड़ा उठे ।



दूसरा _हाथ ऊपर किया।



उंगली चौखट के ऊपरी चौखटे पर रगडी और उसी उंगली को सूघते हुए वे बारहदरी में आ गये------फिगर प्रिंन्दस विभाग और फोटाग्राफर को उन्होंने अपना काम करने की इजाजत दी-स्वयं उस तरफ बढ गए,, जिधर रघुनाथ-विजय और तबस्सुम खडे थे ।

वे तीनों ही प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी तरफ देख रहे थे , जबकि ठीक रघुनाथ के सामने पहुंचकर ठाकुर साहव ने कहा-----“वह चाकू दीजिए, जो आपने लाश मे से निकाला है।।




" क...क्या मतलब?" रघुनाथ बौखला गया ।




"हम तुमसे सिर्फ वह चाकू मांगं रहे हैं, जिससे हत्या हुई है ।"




"म...मगर वह चाकू-!"



“क्या आपने नहीं निकाल?"



"न...निकाला है-सर आपको कैसे मालुम?"




“कमरे में सिर्फ तीन व्यक्तियों के पदचिन्ह हैं-तुम्हारे ,, तबस्तुम के और हत्यारे के-तुम लाश के बाई तरफ़ घुटने टेककर बैठे भी थे-तुम्हारी पतलून पर घुटनों के स्थान पर अभी तक कमरे की धूल लगी हैं।"



रघुनाथ ने अपने घुटनों की तरफ़-देखा और फिर चेहरा ऊपर उठाकर बोला-“इससे यह कहां पता लगता है कि मैंने लाश में से चाकू निकाला था----चाकु तो मांस्ने के बाद हत्यारा
भी निकालकर अपने साथ ले जा सकता है।"


" ऐसा हुआ नहीं है ।"


" अ......आप कैसे कह सकते हैं?"

"'लाश के सीने और फर्श पर बिखरे खून की दो पर्ते है…नीचे वाली पर्त सूख चुकी है, यानी वह खून तब निकल जबकि कल्ल किया गया-लाश में जितनी बदबू है उससे जाहिर है कि कत्ल रात एक बजे के आस-पास ही हो गया था…तब का निकला खून फ़र्श पर जम चुका है-उसकै उपर खून की दुसरी गीली पर्त बताती है कि वह खून जख्म से सुबह निकला और खून दुबारा निकलने का एकमात्र कारण लाश में धंसे चाकू को निकाला जाना हे-तुम बाई तरफ थे-बाई तरफ़ ही खून की चन्द बूंदे पडी हैँ…बूंदे बताती हैं कि वे थोडी ऊपर से गिरी---------जाहिर है कि वे खून की से लथपथ चाकू के -फल से फिसल कर गिरी होंगी और फिर तुम्हारे मस्तक पर उसी खून का टीका ।"




“ओह !" रघुनाथ खून के टीके को तो बिल्कुल भूत ही गया था ।



"चाकू दीजिए ।"


रघुनाथ ने चुपचाप जेब से चाकू निकालकर उसे पकड़ा दिया…वे बन्द चाकू को उलट-पुलटकर, ध्यान से देखते हुए बोले-अपनी मूर्खता से तुमने इस पर से हत्यारे की उंगलियों के निशान मिटा दिए ।"



रघुनाथ चुप रहा !



ठाकुर साहब ने उसके मस्तक पर लगे लहू के टीके को देखते हुए कह्म-“टीका तुम्हारे जुनून और उत्तेजना का प्रतीक है…ज़रूर इसे लगाते वक्त अपने अब्बाजान के हत्यारे से बदला लेने की कसम खाई होगी----ये पागलपन होता है और कच्ची भावुकता का शिकार होकर व्यक्ति कानून अपने हाथ में लेता हुआ कोई भयानक भूल कर बैठता है-अतः मैं तुम्हें मैं तुम्हदे चेताबनी देता हू कि अपने को नियन्त्रण में रखना ।”



"आपने मुझे चेतावनी देने के लिए ही घटनास्थल 'का निरीक्षण किया है या अपराधी का भी कुछ पता लगा सके हैं?" रघुनाथ ने पुन: व्यंग्य किया ।



जले-भुने ठाकुर साहब बोले-----“फिलहाल मैं तुम्हे हत्यारे का नाम नहीं बता सकता, क्योंकि यह इतना बदतमीज था कि कहीं भी अपना नाम लिखकर नही गया !"


रघुनाथ झेप-सा गया ॥॥॥



जबकि ठाकुर साहब कहते ही चले गए…“हां-यह दावा जरूर कर सकते है कि कम-से-कम यह कत्ल उसने बिल्कुल नहीं किया है, जिस पर तुमने अपना शक प्रकट किया था ।"




] विजय को घूरते हुए रघुनाथ` ने पूछा…"ऐसा दावा आप किस आधार पर कर रहे हैं?"




“हत्यारा दस नम्बर के जूते पहनता है------------जबकि विजय के जूते का नम्बर सिर्फ आठ है…जूते भी वह देसी नहीं, बल्कि विदेशी पहनता है…यकीनन उसका कद सात फुट है, और आज के युग में सात फुट का व्यक्ति पाया जाना बड़ा मुश्किल काम है----इस कद के दुनिया में ज्यदा व्यक्ति नहीं हैं, अत: हत्यारे को ढूंढने में उतनी दिक्कत नहीं होनी चाहिए-हत्यारा अपने सिर जबरदस्त खुशबूदार तेल लगता है-यह तेल भी देसी नहीं है ।"





“क्या आप यह कहना चाहते है कि हत्यारा भारतीय नहीं है !"



"क्यों नहीं हो सकता-वह सिर्फ जूते और तेल ही विदेशी इस्तेमाल करता है और कमाल की बात ये है कि ये दोनों ही चीजे अमेरिकी है---------जूते अमेरिका की प्रसिद्ध शूज कम्पनी
इंगोलिये के वने हैं और तेल "प्राइडिट आंयल' के नाम से तो सारे अमेरिका में मशहूर है ।"




“इन सब बेकार बातों से क्या होगा?"

"लम्बे पैरों वाला-ऐसा सात फूटा व्यक्ति बहुत दिन तक हमारी नजरों से न छुप सकेगा जो कि
प्राइडिट ओंयल का प्रयोग करता हो ।" कहने के बाद ठाकुर साहब तेज कदमों के साथ वहां से चले गए ॥॥॥॥॥॥॥


शाम के चार बज रहे थे।
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