दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:30

खण्डहर के बाद से ही विजय रघुनाथ और तबस्सुम का पीछा कर रहा था-तबस्सुम ओंर रघुनाथ ने होटल 'सम्राट' में एक कमरा लिया था…विजय ने पता लगा लिया था कि उम्हें . , पचास नम्बर का कमरा मिला है-----कुछ देर तक वे अपने कमरे में आराम करते रहे थे।





किर कमरे मे ही लंच गया।



स्वयं-विजय ने भी हाँल में बैठकर लंच लिया।





वे चार बजे अपने होटल से बाहर निकले-कार में बैठकर रवाना हो गए------अपनी कार में इस वत्त भी विजय उनका पीछा कर रहा था------उस वक्त विजय की खोपडी घूम गई, जब उसने रघुनाथ की कार को कचहरी के अन्दर दाखिल होते देखा ।



काफी दिमाग' घुकाने के बाद भी विजयं यह नहीँ सोंच सका कि वे कचहरी कूयो गए हैं?

सुबकती हुई रैना ने विकास को सारी बाते विस्तारपूर्वक बता दीं।




सुनकर जहाँ विकास का चेहरा कठोर हो गया, वहीं धनुषटंकार ने भी अन्धाधुन्ध शराब पीनी शुरू कर दी-हालांकि है गुस्से के कारण लडके का सारा जिस्म कांप रहा था, परन्तु स्वयं को संयत रखकर उसने कहा…"म..........मगर मम्मी-आप इस तरह रो क्यों रही हैं?"




"तुमसे तुम्हारे डैडी छिन गए विकास !"



" नही---।” विकास ने दृढ़ता के साथ कहा---------“मैं इस तरह उन्हें नहीँ छिनने दुंगा !"



रोती हुई रैना ने कहा…"कोई कर भी क्या सकता है?"




"चाहे जो करना पड़े मम्मी-विकास की मां होकर रो रही हो तुम…रो मत मां-ये तूने सोच कैसे लिया कि कोई भी ऐरे-गैरे आकर डैडी को इकबाल बनाकर हमसे छीनकरं ले जाएगे-यदि वे इकबाल हैं भी तो हमारे रघुनाथ भी हैँ…मेरे डैडी और तुम्हारे पति भी हैं।"

"चाचाजी ने बताया कि कानूनन उन पर उन्हीं का हक बनता है !"



" तुम भूल मां-----क्या तुम भूल गई तुम्हारा विकास ऐसे कानून को नहीं मानता, जो किसी पर जुल्म करे--दुनिया का कोई भी कानून डैडी को हमसे नहीं छीन सकता और यदि ऐसा हुआ तो दुनिया-भर की कानून की किताबों मे आग लगा दूंगा…तेरा बेटा दुनिया की सारी अदालतों को जलाकर राख कर देगा मां…त..तुम.......तुम…! "


आगे कहता-कहता विकास रुक गया ।



पोर्च में कोई कार रुकी थी-दो--तीन लम्बे कदमों के साथ वह दरवाजे पर पहुंचा-वहां से पोर्च साफ चमकता था-कार मे से उसने रघुनाथ और तबस्सुम को निकलते देखा ।


उसने घूमकर कहा…"डेडी आ रहे है । "



सोफे पर बैठी रैना जल्दी से खडी हो गई…साड्री के पल्लू से आंसू पोछे--------धनुषटंकार इसतरह सम्भलकर बैठ गया, जैसे को महत्वपूर्ण काम करना हो, तबस्सुम का हाथ पकड़े रघुनाथ तेज कदमों के साथ इसी तरफ आ रहा था ।


विकास के समीप पहुँचते ही वह ठिठका ।




पूरी श्रद्घा के साथ विकास चरण स्पर्श करने के लिए झुका-रघुनाथ शीघ्रता से दो कदम पीछे हट गया…जिस वक्त सुर्ख चेहरा लिए विकास सीधा हो रहा था, उस वक्त रघुनाथ ने पूछा-“कौन हो तुम?"



"विकास ।




“ओह !" रघुनाथ के चेहरे पर व्यंग्य और खिल्ली उड़ाने बाले भाव पैदा गए…"तो तुम हो बिकास-हमारा बेटा होने का दावा करने बाले--खूबसूरत हो अच्छा कद है----ठाकुर साहव को मेरे अब्बाजान के हत्यारे के रुप में तुम्हारे जैसे-ही कद के किसी व्यक्ति की तलाश है।"




"क्या मतलब डैडी?"



"कुछ नहीँ…रांस्ता छोड़ो-मुझे तुम्हारी मा से मिलना है ।"



विकास एक तरफ हट गया-कमरे में कदम रखते ही रघुनाथ को बुरी तरह चौंककर पीछे हट जाना पड़ा ॥॥॥

कारण अचानक ही थनुषटंकार का उसके चरणों में गिर पडना था-----रघुनाथ अभी कुछ समझ भी नहीं पाया था कि धनुषटंकार चरण स्पर्श करने के बाद एक ही जम्प में सोफे की पुश्त पर जा बैठा ।



तबस्सुम और रघुनांथ उसे हैरतअंगेज दृष्टि से देखते रहे ।



एकाएक रघुनाथ ने कहा-“ये बन्दर कौन है ?”


बन्दर शब्द कहने का मजा चखाने के लिए अभी धनुषटंकार उछलने ही वाला था कि विकास ने जल्दी से कहा…"नहीँ मोन्टो डेडी ने अनजाने में कहा है !'



धनुषटंकार रुक गया ।



रघुनाथ ने कहा…“काफी समझदार बंदर है ।"



"आप उसे बार-बार बन्दर न कहें-वह चिढ़ता है--उसका नाम मोन्टो है और यदि आप उसे इसी नाम से पुकारे तो अच्छा होगा ।" विकास ने कहा ।



रैना चुपचाप खडी सब कुछ देख-खुन रही थी-वह एक शब्द भी नहीं बोली थी-----जैसे गूगी हों-हां, अन्दर से फूट पड़ने वाली रुलाई को रोकने की कोशिश में रह-रहकर उसका
चेहरा जरूर बिगड़ने लगता था !'''



-एकाएक ही रघुनाथ उसकी तरफ़ घूमकर बोला-“मैं तुम से हीँ कुछ बाते करने आया था ।"



"ज, .. जी ।"



"क्या तुम¸ मेरी पत्नी बनी रहता चाहती हो?"


चौके हुए अन्दाज में रैना ने उसकी तरफ देखा, बोली-- "मैं इस सवाल का अर्थ नहीं समझी नाथ…-पत्नी तो मैं आपकी हू ही ।"




"मैं नहीं जनता----मगर तुम कह रही हो---------तुम्हारा बेटा कह रहा है--सारा राजनगर यही कह रहा है, इसीलिए मानता हू कि तुम मेरी पत्नी हो---मै. हां या ना में ज़वाब चाहता हु----- यह पूछा है कि क्या तुम भविष्य में भी मेरी पत्नी वनी रहना चाहती हो?"




"पत्नी के लिए पति के चरणों के अलावा जगह ही कहां है ?"




"इसका मतलब बनी रहना चाहती हो ?"


रैना चुप रही ।



रघुनाथ ने आगे कहा…"भविष्य में मेरी पत्नी बनी रहने के लिए तुम्हें मेरी एक शर्त मंजूर करनी पडेगी।"



" किसी भी पत्नी को हजार शर्ते भी मंजूर हो सकती है ।"



"मेरी पहली पत्नी यानी तबस्सुम को तुम्हारे बराबर के बल्कि उससे भी ज्यादा अधिकार प्राप्त होंमे ।"



" न.......नाथ !" रैना का स्वर कांपा ।




"ड.. .डैडी!" विकास की चीख से सारी कोठी झनझना उठी।



“अपने बेटे से कहो कि वह चुप रहे-मैं तुमसे बात कर रहा हू औऱ एक समझदार बेटे को मां-बाप के बीच में बोलने का कोई हक नहीं है।"




"मुझे पूरा हक है डैडी?" दहाड़ता हुआ विकास उसके सामने आ गया----"अ................आप----आखिर हो क्या गया है आपको आप समझते क्यों नहीं?"




"तुम बीच में से हटते हो या नहीं?"



अभी विकास ने कहने के लिए मुंह खोला ही था के रैना बोल पडी----" डैडी ठीक कह रहे हैं विकास-तुम्हें मां-बाप के बीच में नही बोलना चाहिए-हट जाओं बेटे!"



"म........मगर मा!'




रैना का कठोर स्वर---" मेरा हुक्म है विकास?"
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:31

“उफ्फ !" झुंझलाहट में लड़के ने दाएं हाथ का मुक्का बाईं हथेली पर मारा--म.....मां-तुम------उफ्फ-----अब मुझे यह सब सुनना पडेगा----मां का इतना अपमान?"



वह बीच में से हट गया ।




कई क्षण के लिए कमरे में गहरी खामोशी छा गईं-तब रघुनाथ ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा------" जबाब दो-----क्या तुम्हें मेरी शर्त मजूर है?"



तबस्सुम की तरफ देखती हुई रैना ने घुणात्मक स्वर मैं कहा…"नहीँ ।"



रघुनाथ के होंठों पर मुस्कान उभरी, वोला--------मै जानता था कि तुम्हारा यही जवाब होगा ।"



"क्या मतलब?”



रघुनाथ ने अपनी लेब से एक की कागज निकाला और रैना की तरफ़ उछालता हुआ बोला-"ये लो-ये मेरी उस दरख्वास्त की कापी है, जो मैं अभी-अभी अदालत में देकर आया हू।”




"क्या है इसमें?"




"इस एप्लीकेशन के जरिए तुमसे डाइवोर्स मांगा गया है ।"




"त.......तलाक !" रैना के कंठ एक चीख-सी निकल गई---. व आँखों के सामने अंधेरा-सा छा गया-उस तरफ़ खडे विकास ने कसकर ज़बड़े और मुट्ठियां भींच ली ।



कसमसाकर मोन्टो अपने हाथ में दबा पब्बा दूर कोने में दे मारा-उस तरफ कांच बिखर गया…रैना दांत भीचक़र गुर्राई क्यों आप मुझसे तलाक लेना चाहते हैं?"



रघुनाथ ने आराम से कहा…“वह एलीकेशन मैं अदालत में दे चूका हू ,जो तुम्हारे हाथ में है-दो या तीन दिन में अदालत का नोटिस भी यहां पहुंच जाएगा !"



“जब आपने सब कुछ कर दिया है तो यहां क्यों आए थे ?"



"अपनी शर्त रखने-हालांकि जानता था कि उस शर्त को तुम स्वीकार कहीं करोगी--------फिर भी यह शर्त बता देना मैंने अपना फर्ज समझ-अपने मजब के मुताबिक मैं कानूनन दो यां उससे ज्यादा पत्नियां रख सकता हु----तबस्सुम -को जरूर रखुंगा-तबस्सुम को इसमें कोई आपत्ति नहीं कि तुम भी हमारे साथ रहो----- -तुम ही को इससे आपत्ति है, अत: तुम्ही से तलाक लेना पडेगा ।"



“आप इस बाजारू लडकी से मेरी तुलना कर रहे है?" रघुनाथ गुर्रा उठा-“ये बाजारू नहीं है रैना-तुमसे पहले मेरी बीबी है ।"




"मैं कभी ख्वाब में भी नहीं सोच सकती थी कि आप इतने पतित हो सकते हैं…इतने नीचे भी गिर सकते हैं ।"



" मुझे अपने सवाल का जवाब चाहिए ।"



" आदमी किसी कुतिया की सुन्दरता को देखकर-----!'


"रैना-----!" रघुनाथ दहाड उठा---"यदि तुमने फिर तबस्सुम को गाली दी तो !"



"दुगी-हजारबार दूंगी…ये कुतिया है----कमीनी है-कुतिया है-मेरे सुहाग को ।"



" रैना-!" चीखने के साथ ही रघुनाथ ने रैना को थप्पड मारने के लिए हाथ हवा में उठाया ही था विकास ने उसे हवा में ही पकड़ लिया------दांत पीसते हुए बिकास ने कहा----" ब.....बस---बहुत हो गया डैडी-----हाथ पीछे रखो-----म...मां कसम-यदि मां पर उठा तो काटकर फेंक दुंगा-एक गाली भी मुंह से निकाली , तो इसके गर्भ से जन्मा जुबान के टुकड़े-टुकड़े कर देगा !"




रघुनाथ कांप क्या ।



जबकि----"तड़ाक !"



रैना के हाथ का भरपूर थप्पड विकास के गाल पर पड़ा ।



"म…मां-!" लडका चीख पड़ा ।



बिफरी हुई रैना दहाडी-“क्या बोला रे तूने-त...तू…इनके हाथ तोड़ देगा-इनकी जुबान काटेगा-क्या इसी दिन के लिए तुझे पैदा किया था कम्बख्त--तू कौन होता है हमारे बीच में बोलने वाला इन्हे रोकेगा---इन्हें तो तेरी मां की चमडी तक उघेड़ का हक है।”




" म-मा-मा-----तुम !"



"छोड---छोड़े दे कमीने ।" दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकडकर रैना हिस्टीरियाई अन्दाज में चीख पडी-"इनका हाथ छोड़ दे-मेरी नजरों से दूर हो जा-----चला जा यहां से ।”




फफक-फफकर रोते हुए लड़के ने वह हाथ छोड़ दिया, जो उसकी मां की तरफ उठा था…दौड़कर एक कोने में दीवार से जा लिपटा विकास-----दीवार में मुंह. छुपाकर उसने इतनी जोर-जोर से घूसे मारे, कि सारी दीवार कांपती हुई-सी महसूस हुई जबकि रघुनाथ ने कहा---“मैं इस नाटक से प्रभावित नहीं हो सकूंगा।"

“आप जाइए----" रैना र्ने हाथ जोड़कर कहा----जहां भी, जिस हाल में आप खुश रह सकें, रहैं-आपकी खुशी ही मेरी सबसे वडी दौलत है--जो कुछ मैंने तबस्सुम बहन को कहा, वह सब तो मैं खुद हू-मेरी तरफ़ से आप आजाद है !"



"चलो तबस्सुम !" रघुनाथ ने तबस्सुम का हाथ पकडा और दरवाजे की तरफ़ कदम बढाए ही थे कि मोन्टो सोफे से कूदकर सीधा दरवाजे के बीचोबीच जा खडा हुआ ।


जेब से रिवॉल्वर निकल लिया था उसने ।



रघुनाथ और तबस्सुम ठिठके, जबकि रैना बोली---" हट जा मोण्टो----जाने दे इन्हें ।"



मोन्टो ने इंकार में गर्दन हिलाई ।



“क्या कहा-तू मेरा कहना नहीं मानेगा ।"




मोन्टो का वहीअन्दाजा !



"तुम दोनों बहुत बिगड गए हो-जिद्दी हो गए हो---- तुम्हें मेरी कसम है मोन्टो-और तुम्हें भी विकासं-तुम इनके रास्ते मे कोई अड़चन नहीं डालोगे-इन्हें जाने दो ।"



झुंझलाकर मोन्टो ने रिवॉल्वर का रुख छत की तरफ किया और जाने किस जुनून में लगातार ट्रेगर दबाता ही चला गया…



छहों गोलियां, छत में धंस गई…फिर उसने झुंझलाकर रिवॉल्वर सामने वाली दीवार में दे मारा-----सामने से हटा और अपना सिर दीवार में मारने लगा ।



यह थी कुछ भी न कर पाने के कारण मोन्टो की झुंझलाहट ।



रैना तड़प उठी…रोती हुई दौड़कर वह मोन्टो के पोस पहुची-उसे गोद में उठाकर बोली---------"नहीँ रे…नही मोन्टो--ऐसा नहीं करते-यदि तुम भी न रहे तो मैं किसके सहारे रहुगी ?"

उधर कोने में खडा विकास कसमसा रहा था । मोन्टो के हटते ही तबस्सुम को साथ लिए रघुनाथ दरवाजे की तरफ बढ़ गया-अभी करीब नहीं पहुंचा था कि उसे फिर ठिठक कर रुक जाना पड़ा-इस बार दरवाजे पर विजय प्रकट हुआ था, बड़े ही व्यंग्यात्मक अंदाज में ताली बजाता हुआ वह कह रहा था…" वैलङन तुलाराशि---वैलडन !"



"तुम यहां भी पहुच गए !" रघुनाथ गुर्राया ।


"हम तो जिन्न हैं मेरी जान-ज़हाँ चिराग धिसा जाता है, हम वहीं हाजिर हो जाते हैं ।"




"तुम मेरे रास्ते से हटते हो या नही !"



" बिल्कुल हटते हैं सरकार !" विजय एक तरफ हटकर किसी सेवक की सी मुद्रा में बोला…“जाइए खुदा आपको महफूज रखे-बड़े ही पाक रास्ते पर जा रहे है आप ।" रघुनाथ आगे बढकर दरवाजा पार कर गया, जबकि विजय ने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की…हां, ऊंची आवाज में उसने कहा-----------"
इस कमरे में ऐसी ऐसीं हस्तियां मोजूद है प्यारे तुलाराशि कि यदि भगवान भी चाहे तो अपने स्थान से हिल में नहीं सकता, मगर तुम जा रहे हो…सिर्फ उसी की वजह से, जिसे तुम ने तलाक दिया है !”

ठीक किसी पागल की-सी अवस्था में विकास दीवार पर घुंसे बरसाए जा रहा था-साथ ही चीख भी रहा था-विजय ने भी उसे ऐसी अवस्था में कभी नहीं देखा था-----विकास की जिन्दगी में शायद यह ऐसा पहला ही अवसर आया था, जबकि वह बहुत कुछ करना चाहकर भी कुछ नहीं कर सका था---जिनमें ताकत हो------जो तूफान का मुह मोड सके-----नदियों के रास्ते बदल दे-वे जब मजबूर हो जाए तो इसी तरह झुंझलात्ते हैं, ,जैसे बिकास झुझला रहा था ।


अपना सिर दीबार मे दे-देकर मारने लगा वह ।


" व----विकास!" रेना उसके हाथ और मस्तक से बहते खून को देखकर तड़प उठी ।



दीवानों की तरह बिकास के समीप जाकर बोली-----" मुझ पर और जुल्म मत कर बेटे!"




"म.......मां!" वह घूमा !!!!!!!!!
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:31

" जुल्म तो मुझ पर हुए है-------डैडी तुम्हें तलाक देकर चले गए मैं कुछ भी न कर सका-धिक्कार है मुझ पर…ये हाथ किस काम के मां…,इन्हें तोड दूंगा ।" कहने बाद घूमकर वह फिर दीवार में घुंसे मारने लगा ॥॥॥



दीवार पर खून कीं बहुत-सी लकीरे बह गई ।



रैना चकराई और धड़ाम से फर्श पर गिरी ।




"रैना बहन! " अभी तक शांत खडा विजय चीखता हुआ उसकी तरफ़ लपका-मोन्टो स्वयं उछलकर उसके पास पहुच गया !



धड़ाम की आबाज सुनकर विकास भी चौक कर घूमा '।



वह पागलों की तरह कह उठा…“क्या हुआ मां को?"


“तुम बेवकूफ़ हो दिलजले-ऐसे समय पर जबकि तुम्हें रैना बहन को सम्भालना चाहिए-इन्हें धीरज और सहारे की जरुरत है, उल्टे तुम औरतों की तरह चीख-चीखकर इन्हें अपना खून दिखा रहे हो।”

" हां------मै औरत हूं गुरु……मैं कायर हूं---------बुजदिल-------डरपोक----- अपना खून मैं इसलिए दिखा रहा था कि देखो-विकास का खून सफेद हो गया है ।”



" ऐसा क्या हो गया, जो तुम इस तरह------------- ।"

"एक खूबसूरत लड़की विकास की आंखों के सामने उसकी मां के सुहाग छीनकर ले गई गुरु और विकास कुछ भी न कर सका---------जिसे तुम तुफानों का मुंह मोड़ देने वाला कहते थे, वह आज अपनी मां की हिफाजत न कर सका ।"



" इसमें हम कर ही क्या सकते हैं दिलजले?"



"'हां अंकल-सच-हम कुछ भी नहीं कर सकते-------हां-हां-आप भी कुछ नहीं कर सकते---------जिन पर मुझे नाज था…जिनकें में मैं यह सोचा करता था कि दुनिया का कोई भी काम उनकी पहुच से दूर नहीं हैं-----बे भी कुछ न कर सके.....…और मैं. ..मैं लखनऊ से यह सोचकरु चला था गुरु कि राजनगर पहुंचते ही मैं सारी स्थिति पर नियन्त्रण कर लूगा-----मगर कुछ भी तो नही कर सका--------------हा हा हा जब गुरु ही मिट्टी का माधो बने खडे रहे तो -चेला क्या करता?"



"हर काम चीखने-चिल्लाने…भावुक हो जाने या ताकत से नहीं होता प्यारे?"



"आप तो दिमाग से काम करते हैं न…आपने अमी तक समस्या हल क्यों नहीँ करली?"




"हालात ही ऐसे नहीं'हे?"



"सब हालात ठीक हो जाएंगे गुरू !" एकाएक किसी विचार के दिमाग में आते हीँ विकास उठा-"मुझे अपने ही ढंग से काम करना पडेगा ।"

“क्या करना चाहते हो?” "



"बस-----दो मिनट तक उस नागिन का गला दबाए रखने से समस्या हल हो-जाएगी ।"



चौंकते हुए विजय ने कहा--"क्या तुम तबस्सुम की बात कर रहे हो?"




"'सारे झगडों की जड़ वही तो है ।"




" इस विचार पर हम भी गौर कर चुके है प्यारे------यदि हमें ‘लगता कि सिर्फ तबस्सुम को खत्म कर देने से समस्या हल हो जाएगी तो यह काम हम वहुत पहले कर चुके होते ।"



“क्या मतलब ?"



"क्या तबस्तुम के मरने से अपना तुलाराशि ठीक हो जाएगा-----क्या वह यह कहने लगेगा कि वह इकबाल नहीं, रघुनाथ हे…हमारे लिए समस्या तबस्सुम नहीं, तुलाराशी है पहले-उसकी वह याददाश्त है, जो लौट आई है ।"





"भले ही डैडी इकबाल बने रहें, परन्तु उससे वे मम्मी को तलाक तो नहीं देंगे--------------------तलाक तो सिर्फ उसी की वजह से दे रहे हैं न-जब वही न रहेगी तो... ।"



" तुम्हारी गलतफहमी है बेटे?"



“ये मेरी सहीफहमी है गुरु !"




"यदि तबस्सुम को कुछ हो गया तो अपना तुलाराशी नागिन की हत्या का बदला वाला नाग वन जाएगा-वह पहले हमारे या रैना बहन के प्रति इतना कठोर नहीं था-अहमद की हत्यां ने उसे चोट खाया हुआ जख्मी सांप वना दिया है--अहमद के मौत के कारण ही वह हमसे टक्कर लेने के लिए खुलकर मैदान में आ गया है ।"



"ये आप क्या कह रहे हैं----अहमद की हत्या?"



" हा !"



"किसने की?"



"अमी तक पता नहीं लगा है, मगर उसका शक मुझ पर है-विशेष रूप से मुझ पर, क्योंकि उसके ख्यात से अहमद की मृत्यु से हमारे अलावा किसी को कोई लाभ नहीं था ।"




"म----मगर-अहमद की हत्या किसने और क्यों कर दी ?"

"उस हत्या ने ही तो इन साधारण घटनाओं को ओंर ज्यादा उलझा दिया है-----समस्या सिर्फ यह नहीं है प्यारे दिलजले कि अपना तुलाराशि रैना बहन को तलाक दे गया…समस्या ये है कि आखिर ये चुक्कर क्या है…अहमद को किसने और क्यों मार डाला----मारने वाले को क्या फायदा हुआ…क्या यहीं कि रघुनाथ हमारे खिलाफ भडक गया है-यदि हां तो रघुनाथ को कौन और क्यों भड़का रहा हे…जरूर इन घटनाओँ के पीछे कोई है-उस तक पहुचने के लिए हमें सारी वारदातों पर बहुत ही बारीकी से मनन करना पडेगा-----------कही ऐसा तो नहीं है अपना तुलाराशि किसी बहुत बडे अपराधी की साजिश का शिकार हो ?"



विकास चुप रह गया…सघृमुच विजय ने उसे सोचने पर विवश कर दिया था ।



"हमारा सबसे पहला काम रैना बहन को होश में लाना है-----उसके बाद विचार करेगे प्यारे कि हमारा अगला कदम क्या हो !"




मगर-विकास के चेहरे पर ऐसे भाव थे, जैसे वह अगले क़दम के बोरे में सोच चुका हो ।


विकास ने अपने दाएं हाथ का अँगूठा 'सम्राट' होटल के पचास नम्बर कमरे के बाहर लगे स्विच पर रख़ दिया-अन्दर कहीं तोता बोला--अंगूठा हटाकर विकास दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा करने लगा…इस वक्त वह अकेला ही था, यानी घनुषटंकार भी उसके साथ नहीं था ।"



दो मिनट बाद ही दरवाजा खुला।


विकास की दृष्टि तबस्सुम पर पडी---- देखते ही तबस्सुम. चौकी और मुह से जैसे बरबस ही वाक्य निकल गया--"त... तुम यहाँ क्यो आए हो।। "



"डैडी से भिलने !"


"यहां तुम्हारे कोई डैडी नहीं रहते है ।" कहने के तुरन्त बाद



उसने दरवाजा बन्द करना चाहा, किन्तु लडके ने अपनी टांग बीच में अड़ा दी…साथ ही तबस्सुम को पीछे की तंरफ एक तेज धक्का देकर वह कमरे में दाखिल हो गया ।

पीछे की तरफ़ लड़ख़ड़ाती हुई तबस्सुम के कंठ से चीख निकल गई ।



तभी वहां रघुनाथ की आवाज गूजी----"क्या हुआ तबस्सुम-----कौन है?"



विकास एकदम समझ गया कि वह आवाज बाथरूम के अन्दर से आई है-----घबराई हुई तबस्सुम ने जल्दी से कहा--"ये है इकबाल-विकास---।"




परन्तु उसका वाक्य समाप्त होने तक चीते की-सी फुर्ती के साथ झपटकर विकास ने बाथरूम का दरवाजा कमरे की तरफ़ से बोल्ट कर दिया…तबस्सुम कमरे से बाहर निकलने के लिए दरवाजे की तरफ़ भागी, मगर विकास उससे पहले ही झपटकर वहां पहुंच था ।




उसने दरवाजा बन्द करके-अन्दर से चटकनी चढा दी ।



बाथरुम के अन्दर से रघुनाथ दरवाजा पीटने के साथ ही चिल्ला रहा था…"तबस्सुम-दरवाजा खोलो-----दरवाजा तुमने बाहर से क्यों बन्द कर दिया हे…कौन है?"



रघुनाथ ने शायद तबस्सुम का पहला वाक्य नहीं सुना था ।


बाथरुम के अन्दर फव्वारा चल रहा था-एकाएक ही भयभीत तबस्सुम अपनी पूरी ताकत से चीख पडी-"ये बिकास है इकबाल-----इसी ने दरवाजा बन्द किया है ।"




"व विकस-यह यहां क्यों आया है…दरवाजा खोलो?" कहने के साथ ही रघुनाथ दरवाजे को बुरी तरह झंझोड़ने लगा-----तबस्सुम बाथरूम के दरवाजे की तरफ लपकी-मगर विकास इस बार भी बहाँ उससे पहले पहुच गया था ।



विकास को सामने देखकर तबस्सुम एकदम ठिठक गई----सांसे धौकनी के समान चल रही थी----आखो में आतंक के भाव--------विकास का चेहरा कठोर होने के बाद भयानक होता चला गया-भयभीत हिरनी के समान तवरसुम पीछे, हटी ॥॥॥॥॥

लाल आंखों से घूरते हुए विकास ने उसकी तरफ कदम बडाया ।



तबत्सुम ने थूक निगला ।
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:32

रघुनाथ बराबर दरवाजे को झंझोढ़ रहा था-----साथ ही चीख भी रहा था, किन्तु विकास तो जैसे उस आवाज को सुन ही नहीं रहा था और डर के मारे तबस्सुम की जीभ तालू से जा चिपकी थी ।



वह पीछे हट रही थी-----विकस उसकी तरफ़ वढ़ रहा… था !



अचानक तबस्सुम सोफे के कोने से टकराई-मुंह से एक चीख निकंती----लड़खेड़ाई--मगर गिरने से पहले ही सात फूटे ने गोरिल्ले की तरफ झपटकर उसकी गर्दन पकड ली---विकास के दोनों हाथ उसकी पतली--नाजुक-सुराहीदार और सुन्दर गर्दन पर कस गए।



”न...नही--------नहीँ-----!" भसमीत तबस्सुम सिर्फ यहीँ कहे सकी थी कि उसकी आवाज दब गई---------शब्दों के स्थान पर सिर्फ गैं-गैं की आवाज निकल रही थी-क्योंकि उसकी गर्दन पर लड़के की पकड़ बढ गई थी…वह दांत भीचकर मुर्रा रहा था---------------- "हरामजादी-कमीनी-मैं इसी क्षण तेरा खेले खत्म कर दूंगा-----न तू रहेगी और न डैडी मम्मी को तलाक देगे।”


रघुनाथ अब दरवाजा तोड़ने की कोशिश करने लगा था।



जबकि विकास गुर्रा रहा था-----"यदि बचना चाहती है तो बोल…वता, ये सब क्या चक्कर है-यह रहस्यमय जीप-एक्सीडेण्ट कैसे हुआ-----तु एक्सीडेण्ट से एक किलोमीटर पहले ही जीप से कैसे बाहर पहुच गई-बोल-अहमद खान की हत्या किसने की है और क्यों की है?"



तबस्सुम का चेहरा सुर्ख पड़ने तगा-झील-सी गहरी नीली आंखें बाहर को उबल पडी----------गले और चेहरे की एक-एक नस उभरकर स्पष्ट चमकने लगी थी--जीभ लम्बी होकर किसी कुतिया की जीभ की तरह बाहर लटक गई-जवकि विकास गुर्राए चला जा रहा था ।




जल विन मछली के समान छटपटा रही थी वह ।



बाथरुम के अन्दर से रघुनाथ बन्द दरवाजे पर भयानक प्रहार कर रहा था ॥॥॥॥


एकाएक ही सोफे की तरफ ले जाकर विकास ने उसकी गर्दन से हाथ हटा दिए-लडखड़ाकर वह धम्म से सोफे पर गिरी------अभी वह नियंत्रित भी नहीं हो पाई थी कि विकास ने जेब से लम्बा चाकू निकालकर 'खटाक्' से खोल लिया ।




चमकदार लम्बा फल ठीक तबस्सुम के चेहरे के सामने लहरा रहा था।



तबस्सुम को काटो तो खून नहीं-----सारा चेहरा पीला जर्द पड़ गया------आखो में खौफ और चेहरे पर दुनिया-भर का आतंक नाच उठा-विकास अपने पहले मकसद यानी तबस्सुम को आतंकित करने में कामयाब हो गया था॥॥

-----उसके मनकमस्तिष्क परे अपना भय बढाने के लिए उसे झपटकर दाएं हाथ से तबस्सुम के सोने के तार जैसे सुनहरी बाल पकड लिए…बाल पकडकर उसे बेरहमी के साथ ऊपर उठाता हुआ बोला…“तुझें अपनी खूबसूरती पर नाज है न नागिन----"इसी खूबसुरती के बल पर तू मां से उसका सुहाग छीनने निकली थी न--------ये चाकु एक ही झटके से तेरे चेहरे से नाक अलग कर देगा… फिर सोच कि तू कितनी खूबसूरत लगेगी!"




"न......नहीं!" वह आतंकित भाव से चीख पडी ।




"तो बोल-ये सब क्या चक्कर चल रहा है---------- सबके पीछे कौन है ?"


तबस्सुम के कुछ जबाब देने से पहले ही कमरे मे 'भडाक' की एक जोरदार आवाज गूजी------- -बाथरूम का दरवाजा चौखट से अलग होकर कमरे के फर्श पर आ गिरा…तबस्सुम को छोड़कर विकास अपनी तरफ से काफी तेजी से घूमा------मगर तब तक गुर्राते हुए रघुनाथ की ठोकर उसके चाकू बाले हाथ पर पडी----- चाकू हाथ से निकलकर दूर जा गिरा ।।।




. "म…मैँ तुझे जिन्दा नहीं छोडूंगा कुत्ते !" रघुनाथ दहाड़ा ।



विकास ने देखा-उसके डैडी के पर सचमुच खून सवार है-उनका सारा वदऩ गीला था-------जिस्म पर सिर्फ एक अण्डरवियर था---------चेहरे पर नफरत और आग लिए वह उसकी तरफ बढ़ रहा था ।



पीछे हटते हुए विकास ने कहा-----" ड...डैडी मेरी बात तो सुनिए!”



"हरामजादे------मुझें अपना डैडी कहता है !" कहने के साथ ही रघुनाथ ने उछलकर’उसके चेहरे पर एक घुसा जड़ दिया------घुंसा इतना जबरदस्त था कि विकास के पैर-जमीन से उखड़ गए…हचा में लहराकर वह फर्श पर जा गिरा-तुरन्त ही खडा होकर बोला…“आप समझते क्यों नहीं डैडी…आप किसी बहुत बड़े षड्यन्त्र क शिकार हो गए हैं--- ये लडकी. . . ।"



"फ़ड़ाक !" विकास के पेट में ठोकर पडी ।



एक चीख के साथ वह लड़खड़ाया, सम्भला, फिर बोला, , . परन्तु रघुनाथ के वार ने उसे फिर चीखने पर विवश कर दिया--------रघुनाथ पर खून सवार था…जुनूनी हो उठा था वह, जबकि विकास उसे समझाने की कोशिश कर रहा था । रघुनाथ उसे मारता ही चला गया, मगर लड़के ने उस पर एक भी वार नहीं किया, करता भी कैसे? वह पुत्र था ।



पिता होश में न थे…स्वयं को उसका पिता समझ ही न रहे थे वे ।



हालांकि बडों का आदर-सम्मान करने वाले को विकास कहते हैं, परन्तु ऐसी बात भी नहीं कि विकास ने उन पर कभी हाथ 'ही न' उठाया हो, जिनके चरण छूता है-----जब उस पर पागलपन का दौरा सवार होता है तो सब कुछ भूल जाता है--किन्तु वह दौरा लड़के पर सिर्फ तभी पड़ता है, जबकि सामने वाले ने हमला उसके मुल्क पर किया हो-या सामने वाला होशोहवास में गलत तरफ़ जा रहा हो ।



उसके पिता स्वयं को नहीं जानते थे।



ऐसे पिता से वह पिटता रहा-पर वापस हमला नहीं किया…जब उसने ऐसा महसूस किया कि रघुनाथ उसे जीवित छोड़ने के मूड में ही नहीं है------तो इस बार रघुनाथ के जम्प लगाते ही वह अपने स्थाने से हट गया ।।



रघुनाथ झोक में मुंह के बल फर्श पर जा गिरा।


विकास जल्दी से बाहर निकलने लिए दरवाजे पर झपटा ।।।


सम्भलते ही रघुनाथ भी उसके पीछे लपका था , मगर उससे पहले ही न सिर्फ़ चटकनी गिराकर विकास दरवाजे के पार निकल गया था , बल्कि दरवाजा पुन: बन्द करके उसने बाहर से बन्द कर दिया था'।



इस तरफ से दरवाजे का हैण्डिल पकड़कर रघुनाथ ने सारा दरवाजा पुरी तरह झंझोढ़ ड़ाला-बाथरूम् में हुए फव्वारे का पानी कमरे में बहने लगा था ।



दूर-एक कोने में खडी तबस्सुम अभी तक उस लम्बे, . लड़के के डर से सूखे पत्ता बनी हुई थी

कमरा नम्बर पचास के आस-पास गेलरी में भीड लगी हुई थी-होटल के लगभग सभी कर्मचारी और इस समय कमरों मे रह रहे लोगों की भीड थी वह-----उन्हीं के बीच पुलिस के जवान भी थे, जो भीड़ को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे थे ।




यह चर्चा आम थी कि कोई कमरा नम्बर पचास में जाकर वहां ठहरे यात्रियों को बूरी तरह पीट गया । यह भी कि वह तो कमरे में रह रहे लोगों ने उससे संधर्ष किया वरना तो वह उन्हें कत्ल करने आया था।



इस चर्चा से अन्य कमरों में ठहरे यात्रियों में असुरक्षा की भावना बढ़ रही थी।



यही वज़ह थी कि इस चर्चा से सर्वाधिक परेशान होटल का मैनेजर था---------वह स्वयं भी इंस वक्त कमरा नम्बर पचास में था---------उसके अतिरिक्त वहां दो इंस्पेक्टर और स्वयं ठाकुर साहब मौजूद थे ।



उन्हे अपना सारा बयान देने के बाद इस वक्त रघुनाथ चीख रहा था…“वह विकास था ठाकुरं-हजार बार कह चुका हू कि वह कुत्ता यहाँ हम दोनों का कत्ल करने आया था--उसने तबस्सुम की गर्दन दबाकर हत्या करने की कोशिश की… असफल होने पर उसने चाकू निकालकर हम पर हमला किया…चाकू और तबस्सुम की गर्दन से उगलियों के निशान लिए जाए ।"




ठाकुर साहब शांत स्वर में बोले----"हमने फिगर प्रिंटस विभाग को फोन कर दिया है ।"


"सिर्फ इसी से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसे गिरफ्तार कीजिए-----वह आपका नाती है ठाकुर---आपकी लड़की का लड़का-यदि आपने उसे गिरफ्तार करने में हिचक दिखाई-------- केस बनाने में झिझके तो मैं एक बार फिर गृहमंत्री से मिलूंगा ।"



“आपको उसकी जरूरत नहीं पडेगी ।"




"वाह-----ये भी खूब रही-नाती जख्म देता है और नाना उस पर नमक छिड़कने चला आता है-हम पर कातिलाना हमला हुआ है-यदि वह आज़ रात तक गिरफ्तार नहीं हुआ तो मैं सुबह गृहमंत्री से मिलूंगा ।”
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:33

"ये आपकी इच्छा है…आप चाहे जिससे मिले-मगर हम अपनी तरफ से आपको यकीन दिलाते हैं कि किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं किया जाएगा----न तो हमने पहले ही कभी
अपने कर्तव्य के रास्ते में किसी रिश्ते को आने दिया है और न ही आगे ऐसा हो सकेगा ।"


“ये तुमने क्या किया प्यारे दिलजले-तुम साले जब करोगे ऊट-पटांग हरकत ही करोगे ।" गुप्त भवन में बैठा विजय विकास को झाड पिला रहा था…“तुमसे कहा था कि अगला कोई भी कदम उठाने से पहले हमें हलात्तों के बारे में अच्छी तरह से सोचना है, लेकिन तुम थोड़ी देर-का सब्र न कर सके-बस पहुंच गए यहीं ।"


“ग...गुरु!"



"अजी गुरु से पहले तो तुम हो गए हो शुरू -मगर तुम्हारे शुरू होने का फायदा क्या निकला ?"



परेशान से विकास ने कहा…“आप मेरी बात तो सुन नहीं है रहे है अंकल! "



"बको----क्या सोचकर गए थे वहां?”



"मैं तबस्सुम को मारने नहीं गया था-सिर्फ उसके दिलो-दिमाग पर आतंक बैठाने गया था-उसमे मैं कामयाब भी हो गया था…सोचा था कि उसे आतंकित करके उससे अपने सवालों का जवाब ले लुगा…ऐसा होने वाला भी था कि डैडी बाथरूम का दरवाजा तोडकर कमरे में आ गए ।"


ये आतंक की राजनीति नहीं छोडोगे?



" ये तो काम करने का अपना-अपना तरीका है अंकल---गुपचुप काम करते हैं…ज़बकि मेरा विश्वास खुला खेल खेलने में है----सबसे पहले अपने दुश्मन के दिमाग पर अपने नाम और व्यक्तित्व के आतंक का राज्य स्थापित करता हू।"




"उससे हुआ क्या चुकन्दर?"



"अब नहीं हुआ तो आगे होगा अंकल-तबस्सुम के दिले-दिमाग पर मै छा चुका हुं----मुझे पूरा यकीन है इस बार मुझें अकेले में देखते ही किसी टेपरिकाॅर्डर की तरह शुरू हो जाएगी ।"



"खाक शुरू हो जाएगी ।"


"क्या मतलब गुरू?"


"तुम इस भवन से निकलते ही मोटी-मोटी सलाखों के पीछे पहुंच जाओगे प्यारे !"



"मैं समझा नहीँ!"



"बुद्धि को खूंटी पर टागकर जो निकला करते हो तुम ।"



काफी देर से ब्लैक बाॅय चुप बैठा उनकी बातें ध्यान से सुन रहा था, एकाएक बोला---“यह बात मेरी समझ में भी नहीं आई कि आखिर विकास सलाखों के पीछे क्यों होगा?"



"तुम ही कौन-सा अपनी बुद्धि साथ लिए घूमते हो प्यारे काले लड़के !"



“पहेलियां छोडो अंकल----- साफ कहो।"

"‘तुम न सिर्फ उसके कमरे में अपना चाकू छोड़ आए हो, वल्कि तब की गर्दन और चाकु पर भी तुम्हारी उंगलियों के निशान होंगे----फस गए प्यारे --तुम पर सीधा तीन सौ सात का मुकदमा चलेगा-----तुम जेल में होगे और कम-से-कम तबस्सुम तुम्हें जेल में मिलने नहीं जाएगी ।"



विकास और बलैक वॉय सचमुच सोच में पड़ गए ।



तभी मेज पर रखे टेलीफोन की घण्टी घनघना उठी… रिसीवर ब्लैक बॉय ने उठाया और उसने पवन के से भर्राए हुए स्वर में बातें की-कुछ ही देर बाद रिसीवर बापस रखता हुआ वह बोला------"आपका का अनुमान अक्षरश सत्य निकल सर---कमाल हो गया ।"




_ "धोती फाड़कर किसी ने रूमाल तो नहीं कर दिया !"


"अशरफ का फोन था सर-उसने रिपोर्ट भेजी है कि तबस्सुम की गर्दन और चाकु की मूठ से मिलने वाले निशान विकास की उगलियों के हैं…पुलिस शिकारी कुत्तों की तरह सारे राजनगर में विकास को तलाश करती फिर रही है-विकास पर हत्या करने की कोशिश का इल्जमा है-यह मिशन स्वयं ठाकुर साहब ने अपने हाथ में लिया है--------वे विकास को गिरफ्तार करने के लिए पागल से हुए घूम रहे है----कई बार सुपर रघुनाथ की कोठी पर भी जा चुके है !'

विकास ने इस तरह गर्दन झुका ली, जैसे क्राकरीं तोडने से माहिर और शरारती बच्चे ने हजार बार की चेतावनियों के बावजूद अभी-अभी किसी शानदार' टी-सेट' को शहीद किया हो ।

विजय ने घूमकर एक बार विकास की तरफ़ देखा-फिर के ब्लैक बॉय से सवाल किया--"क्या इस सब बखेड़े की जानकारी रैना बहन को हो गई है !"



"इस बारे में अशरफ ने कुछ नहीं कहा सर! "


“हूं !' एक लम्बे हुंकारे के बाद विजय सोच…र्में गया, फिर एकदम विकास पर डपट पड़ा-----------"देख लिया खुला खेल फरक्काबादी का नतीजा-----यही होना था----------तुम समझते हो कि इस किस्म की उखाड-पछाड सिर्फ तुम ही कर सकते हो----हम नहीं कर सकते-हम चाहे तो तुमसे बेहतर ही कर सकते हैं प्यारे-मगर हम पहले ही उसके परिणामो के बारे में भी सोच लेते हैं----इतना कष्ट ही नहीं करते !"



जवाब में कुछ कहने के लिए विकास ने अभी मुंह खोला ही था कि ब्लैक बॉय ने कहा---"अब जो हो गया, उसपर अफसोस करने से क्या लाभ सर-हमें आगे की स्थिति पर बिचार करना चाहिए ।"



"वह तो करना ही पडेगा प्यारे!" बिजय बोला-----" सबसे पहला काम तो तुम यह करो कि अशरफ के द्वारा किसी अदालत से अपने दिलजले की अग्रिम जमानत करा तो---गृहमंत्री को फोन कर देना कि वह सम्बन्धित न्यायापीश को यह बता दे कि विकास एक जासूस है और तबस्तुम अपराधी…अपराधियों तक पहुंचते के लिए विकास को यह हरकत करनी पड़ी है, अतः राज को राज ही रखकर न्यायाधीश विकास की अग्रिम जमानत को मंजूर कर ले !"




" ठीक है सर !”




" अब समस्या यह रही कि हम इस अजीबोगरीब केस में अपना अगला कदम क्या उठाएं?"



"जी ।"



"दिलजले के इस अटपटे कदम ने सारी स्थिति ही उलट दी है !"

"इसका क्या मतलब सर?"



" इससे पहले स्थिति यह थी कि रघुनाथ को जो करने था, वह सब कुछ करके बैठ गया था, अतः अगला कदम हमारी तरफ से उठना था…दिलजला चाल चलकर अपना चास गंवा चुका है, अब चांस तुलाराशि का है-बह जरूर कोई-न-कोई चाल चलेगा-वस, उसकी अगली चाल का अध्ययन करके ही हमे आगे बढ़ना है।"



"मतलब?”



"फिलहाल यह देखना है कि अपना तुलाराशि क्या करता है ।"




"अजीब बात है सर---!" ब्लैक बॉय कह उठा…" दुश्मन के रूप में इस बार मैदान में हममें से ही एक है----हम सबका प्यारा-हम सबके लिए सम्मानित-हममें से कोई उस पर
हमला भी तो नहीं कर सकता।"





"यही तो चक्कर है प्यारे…इस बार दुश्मन बंहुत चालाक है !"




"क्या मतलब सर?"


“इतना ज्यादा चालाक कि बह अभी तक एक बार भी सामने नहीं आया है--------हमारे ही एक मोहरे को उठाकर वह अपने मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।”



“क्या आप यह कहना चाहते हैं सर कि सुपर रघुनाथ किसी चालाक अपराधी की साजिश का शिकार है ?"
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