दूध ना बख्शूंगी/ complete

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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:51

जाने किस झुंझलाहट में विजय ने स्टेयरिंग पर बहुत जोर से घूंसा मारा-----दाई तरफ का ट्रेफिक इस वक्त चौराहे पार गुजर रहा था-----------एकाएक ही विजय की नजर रघुनाथ की किराए वाली कार पर पड्री-----वह दाई तरफ के ट्रैफिक के-साथ चौराहा पार करके विजय के ठीक सामने वाली सडक पर मुडना चाहती थी ।



"विजय को जाने क्या हुआ कि, उसने एक झटके से गाडी गियर में डाली-----फिर लाल बत्ती के बावजूद विजय की कार अर्जुन के तीर की तरह सर-र्र र्र से रघुनाथ की कार की तरफ़ लपकी ।




अभी कोई कुछ समझ भी नहीं पाया था कि 'ध्रड़ाम' ।



एक कर्णभेदी विस्फोटा हुआ विजय की कार का अगला हिस्सा ठीक रघुनाथ की कार के बीच में जा टकराया---रधुनाथ की कार के इस दिशा के दोनों पहिए हवा में उठे…दूसऱी तरफ के दोनों पहियों पर कार विपरीत दिशा में कुछ दूर तक धिसटती चली गई----फिर उलट गई ! और उलटते ही एक और पलटा खाकर कार सीधी हो गई ।



रघुनाथ की कार का बीच का हिस्सा पिचक गया था ।

विजय की कार के बोनट ने मुंह फाड़ दिया----------मुह फाडे कार फिर रघुनाथ की कार की तरफ बढी, मगर इस बार रघुनाथ की कार ने भी बडी तेजी से दोड़कर अपना स्थान छोड दिया है !




कुछ आगे बढकर सम्भली-घूमी और इस बार वह कार भी आक्रामक रुख अपनाकर विजय की कार की तरफ लपकी विजय की कार ने कन्नी काटी, मगर फिर भी कारें टकरा ही गई !!




इसके बाद----!



खुले-चौराहे पर कारों का युद्ध का बडा ही अजीब और रोमांचकारी दृश्य उपस्थित हो गया ॥


-चौराहे पर उन दो कारों के अतिरिक्त कुछ नहीं था…हर वाहन अपनी-अपनी दिशा में खड़ा उस रोगटे खड़े कर देने वाले दृश्य को देख रहा था ।



मानो एक साथ, हर तरफ की सिर्फ लाल बत्ती ही आंन हो उठी हो ।




घुम घूमकर कारे एकं दूसरे से टकरा रहीं थीं…धमाके गूंज रहे थे--दोनों की ही बॉंडियां बुरी तरह-पिचक गई थी-य-देखने बाले दिल थामे उस भयानक दृश्य को देख रहे थे ।



फिर एंक बार ॥॥॥


रघुनाथ की कार दूर तक लुढ़कती चली गई---------जब रुकी तब सीधी खड़ी थी…पर उसमें आग लग चुकी थी----कार के सीधी होते ही उसके दो दरवाजे एक साथ खुले--एक में से स्वयं रघुनाथ ने बाहर जम्प लगाई, दूसरे से तबस्सुम ने…. तबस्सुम का हाथ पकड़कर रघुनाथ ने चौराहा पार करने के लिए एक तरफ़ को दोड़ना शुरू कर दिया-------
लेकिन अभी वे मुश्किल से पांच कदमं ही दौड सके थे कि….....




विजय की कार ने उनका रास्ता रोक लिया ।




बौखलाए से वे ठिठक गए…पलक झपकते ही कार का दरवाजा खुला और उनके सामने प्रकट होकर विजय किसी जिन के समान खडा था !




रघुनाथ कह उठा-----'त.......तुम?”



“हां---- मै ।” कहने के साथ ही विजय, ने उछलकर एक जबरदस्त घूंसा रघुनाथ के जबड़े पर मारा-------मुँह से चीख निकली, पैर जमीन से उखड़ गए----हवा में लहराकर वह दुर-सड़कं पर जा गिरा ।



कुछ दूर तक घिसटता चला'गया रघुनाथ! !!!!!




रुका-अपनी तरफ़ से काफी जल्दी सम्भलकर खड़ा होगया , लेकिन विजय ने झपटकर दोनों हाथो से उसका गिरेबान पकड़ लिया…दांत भीचकर गुर्राया-----"तुम भले ही तुलाराशि सही-भले ही रैना बहन के सुहाग सही, लेकिन तुम्हें बेजबान मोन्टो की एक-एक बूंद का हिसाब देना है होगा रघुनाथ ------मरते समय अपने ऊपर हुए जुल्म का बदला लेने का वचन भी जो किसी से नहीं ले सकता था…उसी मोन्टो की कसम-------- उसकी चिता के साथ ही तुम्हें भी जलाकर राख कर दिया जाऐगा !"


रघुनाथ ने संभलकर कहने की कोशिश की-"वं.,.वह जानवर...!"



विजय के सिर की टक्कर "भड़ाक' से उसकी नाक पर पडी…वातावरण में रघुनाथ की बिलबिलाहटयुक्त चीख गूंजती चली गई…उसकी नाक फट गई थी------सारा चेहरा खून से पुत गया-बह्र सडक पर पड़ा. चीख रहा था, जबकि विजय गुर्रया--------------"उससे बड़े जानवर तो तुम हो तुलाराशी !"



फिर-विजय पर मानो खून सवार था--------------वह बराबर आक्रामक रुख अपनाए था, जबकि रघुनाथ की सारी शक्ति उसके वारों से खुद को बचाने की असफल कोशिश में ही जाया हो रही थी--------------चौराहे पर ऐसी जबरदस्त फाइटिंग हो रही थी कि देखने बालों ने किसी फिल्म मे भी नही देखी थी ।



एक तरफ़ खडी तबस्सुम थरथर कांप रही थी ।

रैना ने दूर ही से देख लिया कि वाहनों की जबरदस्त भीड ने सारा रास्ता ब्लॉक कर रखा है-----कार की तो बात ही दूर---किसी साइकिल तक के पार निकल जाने की जगह तक नहीं थी--विवश रैना को भीड के इस सिरे पर कार रोकनी पडी--पहले उसने सोचा था कि ये सब वाहन रैड लाइट के कारण रूके पड़े हैं, मगर जल्दी ही उसका भ्रम टूट गया ।


हऱ कोई अपने वाहन के ऊपर खड़ा चौराहे की तंरफ देख रहा था !



रैना ने भी ऐसा ही किया और जब उसने चौराहे का दृश्य देखा तो दहल उठी-अपनी कार के बोनट पर खडी वह वहीं से चीख पडी…"र...रूकी जाओ विजय भइया?"




भीड ने चौंककर उसकी तरफ देखा।



किन्तु विजय ने मानो वह आवाज सुनी ही नहीं।



रैना कार से कूदी----भीड़ ने काई तरह फटकर उसे जगह दी------चीखती-चिल्लाती वह वाहनों के बीच में से गुजरती हुई चौराहे पर पहुँची ।


वह बार-बार विजय को रुक जाने के लिए कहती हुई विजयं और रघुनाथ की तरफ बढी…दिजय ने पलटकर उसकी तरफ़ देखा ।



इसी क्षण--रघुनाथ ने उछलकर एक फ्लाइंग किक उसके सीने पर जड़ दी----पहली बार विजय अपने मुंह से चीख निकालता हुआ सडक पर जा गिरा…रघुनाथ सम्भाला-अवसर मिलते ही वह अपनी जेब से रिवॉल्वर निकाल चुका था-रैना उसकी तरफ वढ़ रही थी ।



उसने हैना पर भी रिवॉल्वर तान दिया ।



ठिठककर रैना चीख पडी------"आप क्या कर रहे हैँ…क्या बेवकूफी हे…आप विजय भइया को सब कुछ बता क्यों नहीं देते कि...........!"



विजय की ठोकर ने रघुनाथ को उठाकर दूर फेक दिया ।
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:52

मगर रघुनाथ ने अपने हाथ में दबे रिवॉल्वर को नही निकलने दिया-सड़क पर गिरते ही उसने विजय पर फाॅयर किया--विजय फूर्ती से हवा में उछलकर स्वयं..को बचा गया… रघुनाथ ने एक ही क्षण बाद रिवॉल्वर घुमाकर रैना पर फाॅयर कर दिया। परन्तु-विजय पहले ही रैना को एक तेज धक्का दे चुका था ।



एक चीख के साथ रैना लड़खड़ाकर सड़क पर गिरी-गोली हवा में सन्नाकर रह गई, लेकिन रघुनाथ ने दूसरे फाॅयर के लिए रिवॉल्वर सीधा किया-इस बीच अपनी जेब रिवॉल्वर निकाल कर विजय चीख पड़ा-"रुक जाओ रघुनाथ-बरना... ।"



"धांय..धांय !"' एक साथ दो फायर !



पहला रघुनाथ के रिवॉल्वर से-दूसरा विज़य के । रघुनाथ का निशाना चूक गया था, यानी रैना को गोली नहीं लगी, परन्तु विजय का निशाना चूकने का तो कोई मतलब ही नहीं था-दहकता हुआ अंगारा रघुनाथ के दिल में जा
धंसा-एक मर्मान्तक चीख गूंजी-जिस्म उछला-रिवॉल्वर वहीं रह गया--उछलकर जिस्म जव सडक पर गिरा तो--- !"

उसमें कोई हरकत नहीं थी…बिल्कुल निश्चल पड़ा रहा ।



हाथ में रिवाॅल्वर लिए विजय ठगा-सा खड़ा था…रैना मानो अचानक ही किसी संगमरमरी मूर्ति में बदल गई-आंखें फाड़े वे दोनों सड़क पर पड़े रघुनाथ के जिस्म को देख रहे थे, जख्म से गाढा-लाल और गर्म खून तेजी से बह रहा था… सारी सड़क रंगती चली गई ।



चारो तरफ भयावह खामोशी' छा गई, जबकि.............



"स, ..स्वामी!” उस खामोशी के बीच रैना की चीख अंधेरे में अग्निशिखा के समान उभरी-वह दोड्री-----करीब पहुंची----ठोकर लगी----------लहराकर वह ठीक रघुनाथ के जिस्म पर जा गिरी----- फुर्ती से उसने रघुनाथ की नब्ज टटोली-स्पन्दनहीन------------अगले ही क्षण रैना की दहाड------“न...नही !"




ठगे से खडे विजय के हाथ से रिवॉल्वर’ छूटकर सडक पर गिर गया।"




“स. . .स्वामी.…स्वामी!" दहाड़कर रैना ने अपनी दोनों कलाइयों को सड़क पर दे मारी--------खनखनाकर चूडियाँ टूट गईं ! चारों तरफ कांच झनझनाया--लाश के चारों तरफ़ चूडियों के दुकड़े बिखर गये------रैना का रुदन देख लोगों के रोगटे खडे हो गये --------------जिन्दगी में पहली बार विजय ने अपनी टांगों मे हल्का-----सा कम्पन महसूस किया ।



उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक ही इतनी तेजी से यह क्या हो गया…अभी ठीक से वह कुछ सोच भी नहीं पाया था कि अचानक ही रघुनाथ की लाश के पास रुदन करती हुईं रैना उसकी तरफ. देखकर चीख पडी----ये तूने क्या कर दिया कमीने…...इन्हें मार डाला-----अपनी बहन का सुहाग उजाड दिया?"



अर्द्धविक्षिप्त सी रैना चीखती हुई उसकी तरफ़ बढी ।



विजय हिला तक नहीं ।




समीप पहुचते ही रैना ने दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकडा-बुरी तरह झंझोड़ती हुई चीखी-हरामजादे----कमीने---- ये तूने क्या किया---------बोल-बोल !"



"म...मगर रैना बहन-इसने हमारे मोन्टो को… ।"

"वह झूठ था-गलत था-मोन्टो नहीं मरा है कुत्ते!" रैना पागल-सी चीख पडी…"वह इनकी चाल थी---वह इकबाल भी नही बने थे----- एक्सीडेण्ट के बाद कुछ भी नहीं हुआ था इन्हें ।"



“क. .क्या?" विजय के पैरों तले से धरती खिसक गई ।




“मोन्टो जिन्दा है।"




बौखलाकर विजय चीख पड़ा-----"न...नहीँ!"



"म.......मगर तुने इन्हें मार डाला---खुद को सबसे ज्यादा चालाक समझता था न तू…इनकी छोटी-सी चाल को नहीं समझ सका…मुजरिमों तक पहुचने के लिए ही ये इकबाल बने थे-अपने पद से इस्तीफा देना---. तलाक देना…मोन्टो को मारना-सब एक चाल थी मुजरिमो तक पहुंचने के लिए इनकी चाल !"





"न-नहीं-नहीं!" विजय मानो सचमुच पागल हो गया-- "त.. .तुला राशि चाल नहीं चल सकता-म..मै घोखे मे नहीं आ सकता--ये गलत है-रैना बहन-ये गलत है ।"



"ये...यह ठीक है कुत्ते-----म.....मगर तूने मेरा सुहाग उजाड दिया ।" कहने के साथ रैना-उसका गिरेबान छोड़ेकर सडक पर पडे रिवॉल्वर पर झपटी-पलक झपकते ही उसने रिवॉल्बर उठाया -------और सिंहनी के समान गुराई-“म...मैं तुझे जिन्दा न ... ।"




" र-रैना-मेरी बात नो सुनो रैना बहन !"



"अपनी नापाक जुबान से मूझे बहन मत कह कुत्ते-मत कह ।" कहने के बाद थरथराती हुई रैना ने अन्धाधुन्थ फायरिंग शुरू कर दी-------मगऱ संग आर्ट का माहिर विजय ठीक किसी बन्दर की तरह उछत्त-उछलकर खूद को बचा गया-रिवॉत्वर पूरा खाली हो गया------इसके बावजूद रैना ने जब विजय को सामने खड़े देखा, तो उसने रिवॉल्वर ही खीच मारा------विजय झुका !॥॥॥



रिवॉल्वर उंसके सिर के ऊपर से गुजर गया।



यहीं क्षण था, जबकि वातावऱण मे पुलिस सायरन की आवाज गूंज उठी----विजय बौखला गया…सचमुच उसकी समझ में यह नहीं आया कि ये सब क्या हो गया हे-इतनी तेजी से और इतनी महत्त्वपूर्ण घटनाओं ने घटकर सचमुच उसे हड़बड़ा दिया था------------विजय की जिन्दगी का ऐसा शायद यह "पहला ही" अवसर था, जबकि वह इतनी बूरी तरह से चकराया ! ! !



पुलिस सायरन की आवाजं ने दिमाग में बिजली की तरह सिर्फ एक ही विचार कौधा…"भाग विजय-भाग जा-तूने सुपर रघुनाथ की हत्या कर दी है----किसी बहुत ही बड़े और चालाक मुजरिम की साजिश का शिकार हो गया है तू-----भाग---भाग जा?





चीखती-चिघाडती रैना ने उसके चेहरे पर घूंसा जड़ दिया ।



एक चीख के साथ विजय लड़खड़ाया ।




उधर-वाहनों की भीड़ काई के समान फटी-एक 'जीप बड्री तेजी से चौराहे पर आकर सकी---पुलिस फोर्स के साथ उसमें से ठाकुर साहब कूदे-होलस्टर से रिवॉत्वर निकाला, विजय की तरफ तानकर गरजे…"हाथ ऊपर उठा लो विजय--यदि भागने के लिए एक कदम भी बडाया तो हम तुम्हें गोली मार-देगे!"



बोखलाया सा विजय उनक्री तरफ़ घूमा ।



रैना चीख पड्री-----"इसे मार डालो चाचा जी-इसने आपके को दामाद को गोली से उडा दिया है।"





"क...क्या?" ठाकुर साहब ने चौंककर रैना की तरफ देखा ।

यही वह क्षण था, जबकि विजय ने 'चीते की तऱह झपटकर न सिर्फ ठाकुर साहब से रिवॉल्वर छीन लिया, बल्कि किसी के कुछ समझने से पहले ही रिवॉल्वर उनकी कनपटी पर रखकर . . गुरर्रया-यदि कोई भी हिला तो मैं ठाकुर साहव को गोली मार दूगा-हटो, रास्ता दो ।"


ब्लेड की धार-सा सन्नाटा ।




ठाकुर साहब बिफर पड़े-----“यू ब्लडी फूल-ष्ट-ईडियट !"



"हिलो मत बापूजान! " विजय दात भीचकर गुर्राया-'"जौ अपनी वहन का सुहाग उजाड़ सकता है, उसके लिए बापूज्ञान . की खोपडी में छेद कर देना कठिन काम नहीं है।”



" यू चीट! " ठाकुर साहब कसमसा उठे…“तुम बच नहीं . सकोगे !"



"फिलहाल तो अपनी फिक्र कीजिए डैडी प्यारे!“ विजय ने कहा और फिर ठाकुर साहब को मार डालने की धमकी ही उसे रास्ता देती चली गई------ -ठाकुर साहब को लेकर वह एक पुलिस जीप में बैठा ड्राविंग सीट पर उसने ठाकुर साहब को बैठाया…स्वयं रिवॉल्वर सम्भाले उनके सिर पर सवार ।



जीप चौराहा पार करके एक तरफ को दौड़ गई ।

"जिस रास्ते से साहब की जीप चौराहे पर पहुची थी, उसी रास्ते से विकास की कार भी पहुंची-चौराहे का दृश्य देखते ही वह भौचक्का रह गया…रैना सडक पर पडे रधुनाय के जिस्म से लिपट-लिपटकर रो रही थी------------उसके पैर स्वयं ही ब्रेको पर जा ज़मे।
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:52

कार रूकी-----लम्बा लड़का कूदा ।



चीखा-' क्या हुआ मां?"



रैना ने एक झटके से चेहरा उठाकर उसकी तरफ़ देखा !



विकास अपनी मां के पौछे सिन्दूरी सूरज और सूनी कलाइयों को देखता रह गया------------रैना का सारा चेहरा आंसुओं में डूबा था।




बुरी तरह रो रहीँ री वह!



लम्बे लड़के का दिल बड्री जोर-जोर से धडक उठा-----जब न रहा गया तो पागलों की तरह चीख ही तो पड़ा जालिम--"क्या हुआ मां------------बोलत्ती क्यों नहीं-क्या हुआ डैडी को?"



रघुनाथ के खून में सने दोनों हाथ हवा में उठाकर रैना कह उठी-----"ख . .खून…तेरे डैडी का खून हो गया है विकास ये देख-ये-तेरे बाप का खून है !"



"न...नहों!" विकास के कंठ से वातावरण को दहला देने बाली चीख निकल गई---------------सुनकर दो कदम पीछे हटा वह…"चेहरा पसीने-पसीने हो गया------आखे हैरत के कारण फटी की फटी रह गई ।


जबकि, खुन से लथपथ हाथ लिए रैना खडी हो गई, …"ये सच है विकास-----खून झूठ नहीं बोलता--देख------आगे बढकर खुद ही देख मेरे लाल पिता के सीने में एक भी धड़कन नही है !"



विकास सचमुच जल्दी से आगे बढा------सड़क पर पडी लाश के समीप बैठा-------------कलाई अपने हाथ में लेकर नब्ज देखी--------अगले ही पल चीखता हुआ कलाई छोडकर इस तरह उछल पड़ा, जैसे शक्तिशाली स्प्रिंग ने उसे उछाल दिया हो----उसका सारा जिस्म थरथरा उठा था-फटी-फटी-सी आंखों से वह सिर्फ रघुनाथ की लाश को देख रहा था-----वह यकीन नहीं कर पा रहा था कि उसके डैडी नही रहे !"


"व...बिकास--!" रैना ने पुकारा।



घूमकर कह उठा विकस-----"क.....किसने------ये-किसने-ये जुल्म किसने किया मां?"





" व-विजय ने?"



"ग.......गुरू ?" सारा जिस्म पसीने से नहा गया ।




"हां तेरे गुरु ने ।" रैना दांत भींचकर कह उठी-----"उसने-जच तेरा आदर्श हे-जो तेरी ताकत है-उसने, सामने पहुंचते ही तू जिसके चरण छूता है।"




“म...मगर ----!"



" बोल चुप क्यों हो गया--जुबान तालू से क्यों चिपक गई विकास…तेरा'वो जोश-तेरा वो चीख पडना । कहां चला गया----------कहता क्यों नहीं कि तू अपने पिता की मौत का बदला लेगा---लहू का टीका अपने मस्तक पर लगाकर ये कसम क्यों नहीं खाता कि तू अपने डैडी के हत्यारे को, चीर-फाड़कर सुखा देगा-------उसकी नंगी लाश गिद्धों के झुंड में डाल देगा?"



"म...मां!"



"ईसीलिए न-इसीलिए न कि------वह तेरा गुरु है?"

"'न...नहीँ मां…ऐसा मत कहो-पैदा करने वालों से बढकर तो कोई नहीं, मगर--ग...गुरु ने भी तो कुछ सोचा होगा-ये इकबाल बन-चुकै थे-------मोन्टो को मार डाला था इन्होंने ।"





"ये गलत है-----झूठ है----मोन्टो जिन्दा है------ये कभी इकबाल नही बने थे------बह सब कुछ एक चाल थी…मुजांरेम को धोखे _मे रखने के लिए ।"



" य.......ये तुम क्या कह रही हो मां ?"



"म.. मगर-विजय ने इन्हें सचमुच मार डाला…मैं मना करती रह गईं-रोकती रह गई------- लेकिने उस कमीने ने एकं न सुनी----उस पर तो खून सवार था---मेरी आखों के सामने उस कुत्ते ने मेरे सुहाग के परखच्चे उड़ा दिए ।”




"म---मां----!" विकास के जवड़े भिचते चले गए-आवाज थरथरा गई । "



रैना ने दुढ़तापूर्वक पुकारा…"व--- पिकास !"



" बोल मां।”



" तुने इसी गर्भ से जन्म लिया है न-तुझे यकीन है न तूने इसी कोख में पैर पसारे हैं?"



तड़प-तड़पकर कह उठा बिकास-"कैसी बात कर रही हो मां ?"



" मेरा एक कर्ज है तुझ पर ।"


"क.....कर्ज ?”



"हां-मेरा खून पिया है तूने-मेरे स्तनों से निकलने वाले दूध को पीकर सात फूटा बना है तू--------मेरा कर्ज तुझे लौटाना होगा विकस------मेरे दूध की एक…एक बूंद की कीमत देनी होगी तुझे-----बोल----लौटाएगा न मेरा कर्ज---- मेरे दूध को लजाएगा तो नही तू ?"



"व....विकास के खून का हर कतरा तेरे दूघ से ही तो वना है मां?" लडका बिलख पड़ा।




" तो जा अपने खून के एक-एक कतरे को राजनगर की सडकों पर बहा दे---अपने सुहाग का हत्यारा चाहिए विकास-----जिन्दा नहीं----हा मुर्दा----हा, चौककर पीछे क्यों हट गया--------विजय की लाश चाहिए…बोल-ला सकेगा----चुका सकेगा मेरे दूध का कर्ज ?"



"म.......मा!"

" क.......कांप गया-----हट गया न पीछे------इसीलिए, क्योंकि वह तेरा गुरु है------यदि यही' जुल्म किसी और ने किया होता---तो मै जानती हू कि आगे बढकर तु खुद ही कभी का यह कसम खा चुका होता-------म...मगर अब हिचक रहा है-----वो तेरा गुरु सहीं, लेकिन ये तेरा पिता था…मै तेरी मां हू----मेरे दूध की लाज तुझे रखनी होगी--मुझे विजय की लाश चाहिए+-----चला जा यहां से…यदि तू उसकी लाश लाकर मेरे कदमों में नहीं डाल सका तो मैं तुझें कभी अपना दूघ न बख्शूंगी ।"



“म...मां!"



" रैना आगे बढी-विकास के सामने पहुंची----खून से रंगे हाथ ऊपर उठाए----अंगूठे से विकास के मस्तक पर लहू का टीका लगाया, बोली…“मां का हर कर्ज तुझे चुकाना होगा-----दुध की हऱ बूंद का, हिसाब देना होगा---------तुझे दूध न बख्शूंगी तब तक-----जब तक कि मेरे सुहाग का हत्यारा खत्म नहीं होगा।"
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:52

"म...मां!" विकास के जिस्म का रोयां-रोयां खडा हो गया । लहराकर रैना ने दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकडा+----- फिर उसके-हाथ कमीज फाड़ते हुए नीचे की तरफ गए--------------विकास ने उसे सम्भालने की कोशिश की मगर--।



रैना धम्म से सडक पर.गिर पडी।



" म...मम्मी…-मम्मी !" विकास चीखता हुआ झुका, किन्तु रैना बेहोश हो चुकी थी---------लड़के की मुट्ठियां क़सती चली गई------- जवड़े भिच गए !


'तुम कानून के लम्बे हाथों से बचकर नहीं निकल सकोगे विजय!" जीप ड्राइव करते हुए ठाकुर साहव ने कहा------" बैसे भी ऐसे किसी मुजरिम को पुलिस पाताल से भी दूंढ़ निकालती है, जिसने किसी पुलिस अफसर की हत्या की हो…क्यों की कोशिश बेकार है---------आत्मसमर्पंण कर दो…मुमकिन है कि कानून तुम्हारे साथ उदारता बरते ।"




ठाकूर साहब की कनपटी पर रिवाल्बर रख विजय बोल'--.--- "जब शरीफ बच्चे कोई काम कर रहे होते हैं ,बापूजान बोलते नहीं है और इस वक्त' आप जीप चला रहे है ।"




"विजय !"




"वैसे भी-----मरने से पहलें अपना तुलाराशि सुपरिटेण्डेण्ट के पद से इस्तीफा दे चुका था।"




"व...वह- "




"बह रघुनाथ कम, इकबाल ज्यादा था-सच, मुझें बहुत दुख है कि वह मेरी गोली से मारा गया…खैर हम काफी दुर निकल आए हैं--आप एक काम करें 1”




" क्या?"




" अच्छे बच्चों की तरह चलती जीप से बाहर जम्प लगा दें।"



"क...क्या…?" ठाकुर साहब चौक उठे…“इतनी तेज जीप में से"'



"क्या करू बापु जान कानून के हाथ बहुत लम्बे है------क्योंकि -जीपं के रूकते ही बे हमारी गर्दन पर पहुंच सकते हैं-इसलिए कूदो--------शाबाश-आप तो'बबहुत अच्छे बच्चे हैं न…अच्छा, मैं गिनती गिनता हु-----------------आपको तीन पर कूद जाना है…बन-टू- थ्री-------!"

"मैं आ गया 'गुरु------यदि मर्द के बच्चे हो और अपनी कोठी के किसी कोने में भी हो तो सामने आओ…मैँ अपने पिता की मौत का बदला लेकर रहुगां------यदि आप मेरी आवाज सुन रहे हैं और फिर भी सामने नही आ रहे तो मैं दावा कर सकता हू कि आप किसी मर्द की औलाद नहीं हैं ।"



यूंही अनाप-शनाप चीखता हुआ विकास विजय की कोठी में दाखिल हुआ ।



जबाब में चारो तरफ सन्नाटा ही छाया रहा ।



लम्बे-लम्बे कदमों के साथ एक से दुसरे कमरे में पहुचता हुआ विकास चीख रहा था---------सामने आओ गुरु-यू चेहरा छुपाकर आप बहुत दिन तक बच नहीं सकेंगे।"




"क्या हुआ विकास बेटे?"



लडका बिजली के बेटे की तरह घूमा-कमरे के दरवाजे पर विजय का एकमात्र बूढ़ा नौकर पूर्णसिंह खडा था-कंधे पर अंगोछा डाले----------उसकी तरफ बढ़ते हुए विकास ने पूछा--------"क्या कुछ ही देर पहले यहाँ विजय गुरु आए थे पूर्णसिंह काका?"




"न...नही-तो बेटे------लेकिन क्यों----------तुम मालिक को इस तरह क्यों पुकार...?"




उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही विकास के दाएं हाथ की हल्ले-सी कराट पूर्णसिंह की कनपटी पर पड्री------उसके कंठ से चीख निकली और वह लड़खड़ाकर फर्श पर ढेर हो गया ।

उसे देखते ही'ब्लैक बॉंय सीट से लगभग उछल पड़ा------"व...विकास !"



"गुरु कहां हैं अंकल?"



" म...मुझे नहीं पता, लेकिन...।"




" ऐसा नहीं हो सकता चीफ-ये नहीं हो सकता कि अम्पको गुरू का पता न हो---------------------राज़नगर की सारी पुलिस उन्हें दूंढ़ रही है-----राजनगर से बाहर निकलने बाला हर रास्ता बद का दिया गया है-----पुलिस से बचने के लिए वे सीधे यहीं आए होगे ।"


" यह तुम्हारा वहम है-------वे यहां नहीं आए------- मगर क्यो-------तुम उन्हें इस तरह क्यो पूछ------!"




" खामोश रहो चीफ !' गुर्राने के बाद एकाएक ही' विकास चीख पड़ा-"खामोश यदि आपने बनने की मैं 'कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा-------मै जानता हू कि आप सब कुछ जानते हैं-विक्रम, नाहर, परवेज, अशरफ या आशा में से किसी ने आपको रिपोर्ट जरूर भेज दी होगी--------ये हरगिज नहीं मान सकता कि इस कुर्सी पर बैठकर आप उससे अनजान हैं, जो हुआ है ।"



"त------तभी तो कह रहा हू-------वह ठीक नहीं है, जो तुम कर रहे हो ।"
कठोर स्वर--- ये मुझे आपसे नहीं पूछा चीफ कि क्या गलत और क्या सही है ।"



"फिर भी…यदि तुम बहको तो तुम्हें सही मार्ग बताना हमारा फर्जहै!'



"मुझे विजय गुरु चाहिए चीफ----बस !"




"ल......लेकिन क्यों?"



"क्योकि मेरी मां को उनकी -लाश चाहिए ।"




ब्लेक बाॅय कह 'उठा--------"तुम पागल हो गए हो क्या-उसे मारोगे, जिसने तुम्हें ताकत बख्शी ?"



“उसके लिए, जिसने दूध बक्शा ।"



"म.......मगर----वह तुम्हारे गुरु है-तुम्हारे आदरणीय है-------- उन्होंने कदम-कदम पर हमेशा तुम्हारी प्राणरक्षा की है-याद करों विकास-क्या तुम्हें याद नहीं कि उन्होंने तुम्हारे लिए ’क्या-क्या किया है?"




"याद है-सब कुछ याद है ।"



"तो फिर?" "



"उस सबका ये मतलब तो नहीं कि वे मेरे पिता की हत्य ही कर दे…मेरी मां की मांग में सिन्दूर की जगह खाक भर देने का अधिकार तो नहीं मिल गया उन्हें…वे मेरे-गुरु है, मगर वह मेरा पिता था चीफ, जिसकी लाश' चौराहे पर पड़ी रह गई-----वह मेरी मां है, जिसकी चूडियों का कांच सडक पर बिखर गया ।"




"म...मगर'-।'"
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 21 Oct 2017 15:53

"म...मां!" विकास के जिस्म का रोयां-रोयां खडा हो गया । लहराकर रैना ने दोनों हाथों से उसका गिरेबान पकडा+----- फिर उसके-हाथ कमीज फाड़ते हुए नीचे की तरफ गए--------------विकास ने उसे सम्भालने की कोशिश की मगर--।



रैना धम्म से सडक पर.गिर पडी।



" म...मम्मी…-मम्मी !" विकास चीखता हुआ झुका, किन्तु रैना बेहोश हो चुकी थी---------लड़के की मुट्ठियां क़सती चली गई------- जवड़े भिच गए !


'तुम कानून के लम्बे हाथों से बचकर नहीं निकल सकोगे विजय!" जीप ड्राइव करते हुए ठाकुर साहव ने कहा------" बैसे भी ऐसे किसी मुजरिम को पुलिस पाताल से भी दूंढ़ निकालती है, जिसने किसी पुलिस अफसर की हत्या की हो…क्यों की कोशिश बेकार है---------आत्मसमर्पंण कर दो…मुमकिन है कि कानून तुम्हारे साथ उदारता बरते ।"




ठाकूर साहब की कनपटी पर रिवाल्बर रख विजय बोल'--.--- "जब शरीफ बच्चे कोई काम कर रहे होते हैं ,बापूजान बोलते नहीं है और इस वक्त' आप जीप चला रहे है ।"




"विजय !"




"वैसे भी-----मरने से पहलें अपना तुलाराशि सुपरिटेण्डेण्ट के पद से इस्तीफा दे चुका था।"




"व...वह- "




"बह रघुनाथ कम, इकबाल ज्यादा था-सच, मुझें बहुत दुख है कि वह मेरी गोली से मारा गया…खैर हम काफी दुर निकल आए हैं--आप एक काम करें 1”




" क्या?"




" अच्छे बच्चों की तरह चलती जीप से बाहर जम्प लगा दें।"



"क...क्या…?" ठाकुर साहब चौक उठे…“इतनी तेज जीप में से"'



"क्या करू बापु जान कानून के हाथ बहुत लम्बे है------क्योंकि -जीपं के रूकते ही बे हमारी गर्दन पर पहुंच सकते हैं-इसलिए कूदो--------शाबाश-आप तो'बबहुत अच्छे बच्चे हैं न…अच्छा, मैं गिनती गिनता हु-----------------आपको तीन पर कूद जाना है…बन-टू- थ्री-------!"

"मैं आ गया 'गुरु------यदि मर्द के बच्चे हो और अपनी कोठी के किसी कोने में भी हो तो सामने आओ…मैँ अपने पिता की मौत का बदला लेकर रहुगां------यदि आप मेरी आवाज सुन रहे हैं और फिर भी सामने नही आ रहे तो मैं दावा कर सकता हू कि आप किसी मर्द की औलाद नहीं हैं ।"



यूंही अनाप-शनाप चीखता हुआ विकास विजय की कोठी में दाखिल हुआ ।



जबाब में चारो तरफ सन्नाटा ही छाया रहा ।



लम्बे-लम्बे कदमों के साथ एक से दुसरे कमरे में पहुचता हुआ विकास चीख रहा था---------सामने आओ गुरु-यू चेहरा छुपाकर आप बहुत दिन तक बच नहीं सकेंगे।"




"क्या हुआ विकास बेटे?"



लडका बिजली के बेटे की तरह घूमा-कमरे के दरवाजे पर विजय का एकमात्र बूढ़ा नौकर पूर्णसिंह खडा था-कंधे पर अंगोछा डाले----------उसकी तरफ बढ़ते हुए विकास ने पूछा--------"क्या कुछ ही देर पहले यहाँ विजय गुरु आए थे पूर्णसिंह काका?"




"न...नही-तो बेटे------लेकिन क्यों----------तुम मालिक को इस तरह क्यों पुकार...?"




उसका वाक्य पूरा होने से पहले ही विकास के दाएं हाथ की हल्ले-सी कराट पूर्णसिंह की कनपटी पर पड्री------उसके कंठ से चीख निकली और वह लड़खड़ाकर फर्श पर ढेर हो गया ।

उसे देखते ही'ब्लैक बॉंय सीट से लगभग उछल पड़ा------"व...विकास !"



"गुरु कहां हैं अंकल?"



" म...मुझे नहीं पता, लेकिन...।"




" ऐसा नहीं हो सकता चीफ-ये नहीं हो सकता कि अम्पको गुरू का पता न हो---------------------राज़नगर की सारी पुलिस उन्हें दूंढ़ रही है-----राजनगर से बाहर निकलने बाला हर रास्ता बद का दिया गया है-----पुलिस से बचने के लिए वे सीधे यहीं आए होगे ।"


" यह तुम्हारा वहम है-------वे यहां नहीं आए------- मगर क्यो-------तुम उन्हें इस तरह क्यो पूछ------!"




" खामोश रहो चीफ !' गुर्राने के बाद एकाएक ही' विकास चीख पड़ा-"खामोश यदि आपने बनने की मैं 'कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा-------मै जानता हू कि आप सब कुछ जानते हैं-विक्रम, नाहर, परवेज, अशरफ या आशा में से किसी ने आपको रिपोर्ट जरूर भेज दी होगी--------ये हरगिज नहीं मान सकता कि इस कुर्सी पर बैठकर आप उससे अनजान हैं, जो हुआ है ।"



"त------तभी तो कह रहा हू-------वह ठीक नहीं है, जो तुम कर रहे हो ।"
कठोर स्वर--- ये मुझे आपसे नहीं पूछा चीफ कि क्या गलत और क्या सही है ।"



"फिर भी…यदि तुम बहको तो तुम्हें सही मार्ग बताना हमारा फर्जहै!'



"मुझे विजय गुरु चाहिए चीफ----बस !"




"ल......लेकिन क्यों?"



"क्योकि मेरी मां को उनकी -लाश चाहिए ।"




ब्लेक बाॅय कह 'उठा--------"तुम पागल हो गए हो क्या-उसे मारोगे, जिसने तुम्हें ताकत बख्शी ?"



“उसके लिए, जिसने दूध बक्शा ।"



"म.......मगर----वह तुम्हारे गुरु है-तुम्हारे आदरणीय है-------- उन्होंने कदम-कदम पर हमेशा तुम्हारी प्राणरक्षा की है-याद करों विकास-क्या तुम्हें याद नहीं कि उन्होंने तुम्हारे लिए ’क्या-क्या किया है?"




"याद है-सब कुछ याद है ।"



"तो फिर?" "



"उस सबका ये मतलब तो नहीं कि वे मेरे पिता की हत्य ही कर दे…मेरी मां की मांग में सिन्दूर की जगह खाक भर देने का अधिकार तो नहीं मिल गया उन्हें…वे मेरे-गुरु है, मगर वह मेरा पिता था चीफ, जिसकी लाश' चौराहे पर पड़ी रह गई-----वह मेरी मां है, जिसकी चूडियों का कांच सडक पर बिखर गया ।"




"म...मगर'-।'"
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