दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 14 Sep 2017 19:59

रघुनाथ… को लगा कि वह आसानी से उसके इस सवाल का जवाब नहीं देगी--एकाएक ही वह तबस्सुम के पीछे देखकर वहुत ही सामान्य स्वर में कह उठा-----" अरेतुम यहां?"



तबस्सुम ने तेजी से घूमकर पीछे देखा और बस----इसी क्षण रघुनाथ ने विजय जैसी फुर्ती दिखाई थी-किसी गुरिल्ले की तरह झपटकर उसने रिवॉल्वर के दस्ते का बार _ कनपंटी पर किया !"



एक चीख के साथ लहराकर तबस्सुम फर्श पर गिरने ही बाली थी कि जाने किस भावना के वशीभूत रघुनाथ ने उसे बांहों में सम्भाल लिया-तराशे हुए नग्न जिस्म के स्पर्श ने रघुनाथ के होश उडा दिए।



उस वक्त तो वह कांप ही उठा, जब अनजाने मे उसकी उंगलियां तबस्सुम के कठोर वक्षस्थल से स्पर्श हुई ।


दिल-बहार होटल के पीछे संकरी गली में खड़े अशरफ से विजय यह मालूम कर चुका था कि रघुनाथ अभी तक सात सौ बारह से बाहर नहीं निकला है…गली मे पर्याप्त अंधेरा था और
विजय गन्दे पानी के उस पाइप की तरफ बढा, जो कि होटल की छत तक चला गया था।




एकाएक बुरी तरह चौककर अशरफ फुसफुसाया------" व.......विजय !"



"क्या बात है प्यारे झानरोखे !"



"ऊपर देखो।"




ऊपर देखते ही विजय के होंठ सीटी बजाने के से अन्दाज में सुकड़ गए--सातवी मंजिल की एक खुली हुई खिड़की से एकं इंसानी साया पाइप पर झूल गया-----उंसके कन्धे पर बेहोश अवस्था में एक अन्य जिस्म था ।



विजयं बुदबुदा उठा----" ओह---अपना तुलाराशि तो पूरा जेम्स बॉंण्ड बन गया है ।"



" क्या करना है विजय है ?"



" कुछ नहीं करना है प्यारे-तेल देखो और तेल की घार देखते रहो----तुमने कहा था कि बूढा अहमद खान कमरे में नहीं है, इसका सीथा-सा मतलब है कि अपना तुलाराशि तबस्सुम को कन्धे पर डाले उत्तर रहा है-------अंधेरे में छुप जाओ-----देखना है कि अपना तुलाराशि कितना ऊंचा उड रहा है ।"



वे अत्थेरे में छुप गए ।



तबस्सुम को कन्धे पर डाले रघुनाथ पूरी सावघानी के साथ नीचे उत्तर रहा था…वह गली में पहुंचा---विजय औरं अशरफ के पास से गुजार गया…वे उसके पीछे हो लिए------गली से बाहर निकलकर रघुनाथ ने तबस्सुम का बेहोश जिस्म जीप की पिछली गद्दी पर डाला!!!!



स्वयं ड्राइविंग सीट पर बैठा और एक झटके के साथ जीप आगे बढ गई!



उसके साथ ही एक ऐसी कार स्टार्ट हुई थी , जिसकी ड्राइविंग सीट पर विजय और उसकी बगल में अशरफ बैठा था ।



पीछा जारी हो गया !



कुछ देर तक जीप भीड़-भरे इलाकों से गुजरती रही-फिर एक सुनसान-मार्ग पर पहुंच गई-वहां पहुँचते ही जीप की गति आश्चर्यजनक रूप से बढ गई-मजबूरन विजय को भी अपनी कार की रफ्तार बढानी पड्री-सड़क पर ऱघुनाथ की जीप या विजय की कार ही थी--सामने की तरफ से आने वाला इक्का-दुक्का वाहन उनके समीप से_ गुजार जाता--जीप-और कार के बीच एक निश्चित अन्तराल वना हुआ था-जीप की गति आश्चर्यजनक रूप से बढती ही चली गई एक्सीलेटर पर दबाव डालते हुए विजय बुदबुदाया-“ये साले अपने तुलाराशि को हो क्या गया हे?"




“अरे !" अशरफ चोंक पड़ा-"जीप लहरा रही है विजय !"



स्वयं विजय की पेशानी पर चिन्ता की लकीरें उभर आई---- सचमुच जीप सडक पर बूरी तरह लहरा रही थी…जैसे ड्राइवर के क्रट्रोल से बाहर हो गई हो…जबड़े भीचकर विजय एक्सीलेटर पर दबाव बडाता ही चला गया ।



सूनी सड़क पर जीप अब लहराने लगी थी, मानो बिना किसी ड्राइवर के ही दौड्री चली जा रही हो ।




और फिर…उनके देखते-ही-देखते जीप तेजी से झटककर एक पेड़ की जड़ से जा टकराई-एक कर्णभेदी विस्फोट के साथ जीप उल्टी और भक्क से आग लग गई! !

चर्र-र्र…र्र….।



ब्रेकौं की तीव्र चरमराहट के साथ कार जलती हुई जीप से थोडी आगे जाकर जाम हो गई-------एक साथ कार के अगले दोनों दरवाजे खुले एक से अशरफ ने और दूसरे से विजय ने सडक पर जम्प लगा दी----आंघी-तूफान की तरह से जलती हुई जीप की तरफ़ लपके ।




पेड़ की जड़ में घुसी जीप धू धू करके जल रही थी------विजर्य जल्दी से चीखा----अपना ओवरकोट उतारो प्यारे--जल्दी करो !"




ओवरकोट उतारते हुए अशरफ ने पूछा-"क्या करना चाहते हो?"



"अपने तुलाराशि को जलकर भस्म होने से पहले ही निकालना है ।" कहने के साथ ही उसने अशरफ से ओवरकोट छीनकर सिर ढापते हुए कहा।



"व......विजय-----तुम---!"




अशरफ ने उसे रोकना चाहा-मगर वह जलती. जीप की तरफ लपका-----जडवत्-सा खड़ा अशरफ विजय को उल्टी पडी जल रही जीप के अन्दर दाखिल होते देखता रहा-विजय भभकती हुईं आग के अन्दर गुम हो गया…अशरफ के सारे चेहरे पर पसीना उभर आया-यह पहला मौका नहीं रा, जबकि उसने विजय को अपने किसी साथी को बचाने के लिए इस तरह मौत के मुह मे घुसते देखा हो?




दो मिनट बाद आग की लपटों में घिरा एक साया जीप से बाहर कुदा-अपने जिस्म से ओवरकोट उतारकर उसने दूर फेंक दिया!!!!



आग की लपटें भी उस ओवरकोट के साथ ही दूर होगई ।




विजय ने उसके नजदीक पहुंचकर हांफ़त्ते हुए कहा…“जीप में कोई नहीं है.प्यारे!"



अशरफ उछल पड़ा-----“ऐसा कैसे हो सकता है?"


"ऐसा ही है प्यारे--" विजय ने जल्दी से कहा-उन्हें जीप के आसपास तलाश करो ।"



फिर-----वे दोनों दौड़कर जलती हुई जीप के दूसरी तरफ़ पहुचे----जिस पेड़ से जीप टकराई थी, उससे करीब पाचं गज दुर जख्मी अवस्था में रघुनाथ बेहोश पड़ा था ।।।

उसके सिर, चेहरे और जिस्म के अन्य कई भागों से खून बह रहा था।



विजय ने जल्दी से कहा…“मैं इसे लेकर चलता हू प्यारे -झानझरोखे…तुम सुन्दरी को तलाश करों ।"



"ओ.के. ।" अशरफ ने कहा---उसकी इस स्वीकृति से पहले ही रघुनाथ को कन्धे पर लादकर विजय अपनी कार की तरफ़ दौड चुका था ।

कालबेल की आवाज पर दरवाजा खोलते ही रैना चौक पडी----------"ये क्या हुआ विजय भईया-आपकी यह हालात और-अरे-ये तो जख्मी हैं-बेहोश भी---क्या हुआ है ?"




कुछ विशेष नहीं रैना बहन !" प्रविष्ट होते विजय ने कहा ।




" क.......कुछ क्यों नहीं---ये तो बुरी तरह जख्मी है-क्या हुआ है ?"



"सिर्फ एक्सीडेण्ट ।"
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 14 Sep 2017 20:00

“एक्सीडेण्ट?"



“ड्राइविंग आती नहीं और जीप ऐसे तेज चला रही था, जैसे उसे हवाई जहाज बना देना चाहता हो…एक पेड से टकरा बैठा ।" कहने के साथ ही उसने रघुनाथ के जिस्म क्रो पलंग पर लिटा दिया ।




रैना दौड़कर रघुनाथ के करीब पहुंची-कांम्ते हाथ उसके रक्तरंजित चेहरे पर घुमाती हुई डबडबाइं आंखों से बोली--------" हे ,
भगवान-मेरे सुहाग की रक्षा करना ।"




बिना कुछ कहे विजय ने आगे बढकर डॉक्टर का नम्बर डायल किया-फोन करने के बाद वह बैड के समीप आता हुआ बोला…"मैंने फोन कर दिया है रैना बहन--कुछ ही देर बाद डॉक्टर आ जाएगा ।"



"म.......मगर-----ये हुआ कैसे भइया?"



"ये होटल दिलबहार के रूम नम्बर सात सौ बारह में गया था। "



रैना उछल पडी-----"व.......वहां-----क्यों?"



"वह तो यहीं जाने, लेकिन जहाँ तक मेरा ख्याल है…उनंसे मिलकर यह अपने तरीके से अपने दिमाग की उलझन दूर करना चाहता था-र-कमरे में यह काफी देर तक रहा-नहीं कहा जा सकता कि वहां, इसकी क्या बातें हुई, परन्तु जब यह कमरे से बाहर निकला तो इसके कंधे पर बेहोश तबस्सुम थी ।"


विजय संक्षेप में सब कुछ बताता चला गया ।



सुनने के बाद रैना ने पूछा…"अब तबस्सुम कहां है?"



" फिलहाल कुछ नहीं पता ।"

रैना शायद अमी भी अपने किसी सवाल का जवाब चाहती थी, मगर तभी कमरे में डॉक्टर भटनागर ने प्रवेश किया-वे दोनो ही खडे हो गए-बैड के समीप एक कुर्सी डाल दी गई----
भटनागर अंपने काम में लग गया…रघुनाथ को ज्यादा चोटें नहीं लगी थीं ।।।


सिर्फ सिर पर ही एक गहरा ज़ख्स था…उसी का खून उसके सारे चेहरे पर पुत गया था…बेण्डेज के बाद भटनागर ने उसे दो-तीन इन्वेक्शन लगाए और फिर बोला----"पन्द्रह मिनट बाद इन्हें होश आ जाना चाहिए।"




धड़कते दिल से तीनों ने पन्द्रह मिनट गुजारे---..सोलहवां मिनट था, जबकि उन्होंने रघुनाथ की पलकों में हत्का सा कम्पन महसूस किया ।



"..न.........नाथ…!” भर्राए स्वर में कहकर रैना अभी उसकी तरफ बढी ही थी कि भटनागर ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया…रघुनाथ ने धीरे-धीरे आंखें खोली।।।


निश्चल पड़ा कुछ देर तक वह सूनी-सी आंखों से छत को घूरता रहा…चेहरे पर ऐसे भाव उभरे जैसे वह दिमाग पर यह सोचने के लिएं जोर डाल रहा हो कि वह कहां है-एकाएक डॉक्टर भटनागर ने उस पर खुलकर पुकारा---" मि. रघुनाथ !"



उसने पलटकर भटनागर की तरफ देखा, बोला----"आप कौन है ।"




"आपने मुझे नहीं पहचाना !" भटनागर हल्के से मुस्कूराए----"आपका फेमिली डॉक्टर !"



"र रहीम चाचा ?" डॉक्टर भटनागर चौक पडे-----"र----रहीम चाचा…कौन रहीम ?"




"नहीं-आप डाॅक्टर अंकल तो नहीं हैं कौन है आप?"




विजय की आंखें अजीब-ही गोलाई में सुकढ़ती चलीं गई !



रैना हक्की बक्की-सी, रघुनाथ को देख रही थी…उमकी समझ में अभी तक कुछ नहीं आया था-जबकि चकराए से मिस्टर भटनागर ने पूछा…“आप कौन से डॉक्टर अकल की वात कर रहे हैं-----मैं हूं भटनागर ।"

"म. .मैं कहा हुं---?" अजीब से-अन्दाज में रघुनाथ ने चोरों तरफ देखते हुए पूछा-आप लोग कौन हैं------- तबस्सुम कहां है…तबस्सुम-!" कहने के साथ ही वह एक झटके से उठ बैठा ।


बौखलाए से डाँक्टर भटनागर कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए---बिजय एकदम आगे, बढकर बोला…" तुम, कौन हो प्यारे-बोलो,क्या नाम है तुम्हारा?"



“इकबाल ।"




रैना के कंठ से चीख निकल पडी।


रघुनाथ ने चौंककर उसकी तरफ देखा-कई क्षण तक बस देखता रहा…बोला कुछ नहीं, फिर वह रैना के चेहरे से दृष्टि हटाकर बिजय से बोला…“ आप लोग कौन है---मेरे अब्बा-अम्मी कहां हैं…तबस्सुम…?”




“क्या तुम्हारा एक्सीडेण्ट हुआ था?" उसकी आखों मे झाकंते हुए विजय ने पूछा।



" हां !"



"किस चीज से?"



“सामने से बिगडा हुआ एक सांड आ रहा था-ड्राइवर ने गाडी उससे बचाने की बहुत कोशिश की मगर एक पेड से टकरा गई-मैं बेहोश हो गया----"आप कौन है-तबस्सुम कहा है ?"




" तबस्सुम तुम्हारी कौन है?"



" उससे मेरा निकाह हुआ है ।"



" य....ये आप क्या कह रहे हैं नाथ?" रैना पागलों के समान चीख पडी--" आप इकबाल नहीं है…आपका नाम रघुनाथ है-जब आपका एक्सीडेंट हुआ तब आप कार में नही----जीप में थे ।"




"आप कौन हैं?"




"हैं-आप मुझे नहीं जानते…मैं रैना हूं…रैना ।"




"कौन रैना?"


"आपकी पत्नी नाथ…मैं आपकी पत्नी हूं।"




"म......मेरी पत्नी इतनी वडी-नही-नहीं--------मेरी बीबी तो तबस्सुम है-वह तो अभी सिर्फ चार साल की है--इमामुद्दीन चाचा कहते है कि वह पैदा ही मेरे लिए हुई है ।"

"हे भगवान्-इन्हें क्या हो क्या?" रैना अजीब से अंदाज में कह उठी ।।



विजय ने रघुनाथ से पूछा-“ कब की बात कर रहे हो प्यारे ?"




" बस-दो-चार दिन पहले की ही ।"



"तुम्हारी उम्र क्या है?"



" अभी कुछ ही दिन पहले तो मेरी बारहवीं सालगिरह मनाई गई है !"



"बारहवीं सालगिरह-वहाँ सामने शीशा लगा है-ज़रा उस शीशे में अपनी शक्ल तो देखो।”



रघुनाथ ने'किसी आज्ञाकारी बंच्चे की तरह पालन किया…शीशे मे शक्ल देखते ही वह बुरी तरह चौंककर उछल पडा----"अरे-ये मेरे चेहरे को क्या हुआ…म. . .मैं इतना बड़ा कैसे हो गया?"




"तुम इकबाल -नहीं मेरी जान…रपुंनाथ हो ।"




" रघुनाथ-----कौन रघुनाथ?"



"जरा शीशे में जिस्म पर मौजूद वर्दी देखो प्यारे--तुम राजनगर के पुलिस सुपरिटेण्डेट हो-बडे-वडे- काम किया करते हो तुम…सारा पुलिस विभाग तुम्हारी वाह-वाह किया करता है ।"




शीशे में देखकर रघुनाथ एक बार फिर चौंक पड़ा, बोला---" स.....सचमुच------मगर मैं रघुनाथ कैसे हो सकता हू------सुपरिटेण्डेण्ट कैसे हो सकता हूं…ये मेरी शक्ल…मैं इतना बड़ा कैसे हो गया----ये सब क्या नाटक है…मैँ तो सिर्फ बारह साल का हू।"




"तुम्हें चिमटे खींचकर लम्बा कर दिया गया है प्यारे !"



"क...क्या मतलब?"

विजय ने घूमकर मेज से आज का अखबार उठाया----उसका प्रथम पृष्ठ खोलकर उसकी तरफ बडाता हुआ बोला…"इसे पढो----इंसमेँ छपे फोटो को देखो----इसमे गप नहीं छपती ।"

अखबार देखते ही वह कह उठा----अरे-ये तो हिन्दुस्तानी अखबार है!"



"तुम इस वक्त हिन्दुस्तान में ही हो प्यारे ?"



"म...मगर मैं तो मिस्री हूं------मैं यहां कैसे---?"



“पहले अखबार पढो ।"



पढने के बाद रघुनाथ ने कहा-----'ये तो किसी रघुनाथ'फी तारीफ से भरा पड़ा । आप कहते है कि मैं रधुनाथ हूं-इसमें छपे फोटो की शक्ल भी मुझसे मिलती है----मगर मैं रघुनाथ नही हू ,नही, मै इकबाल हूं…मेरी ये शक्ल भी नकली है ।"



"तोताराम दम्पति के हत्यारे को तुम्ही ने गिरफ्तार किया था !




" ऐसा कैसे हो सकता है-मैं तो बेहोश था ।"




"इसका मतलब ये हुआ प्यारे कि तुम्हें कुछ भी याद नहीं----तोते की तरह ए-बी-सी-डी तुम्हें शुरू से रटानी पडेगी----तुम तो एक दम निल हो गये हो !"




"मैं समझा नहीं कि आप क्या कह रहे हे?"
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 14 Sep 2017 20:00

" समझ जाओगे प्यारे तुलाराशि---ओंह-मगर अब तो तुम्हारी राशि ही बदल गई है…"अच्छी तरह से याद कर लो--- तुम्हारा नाम सिर्फ रघुनाथ है-----पुलिस में सुपरिटेण्डेण्ट हो तुम-ये रैना बहन तुम्हारी बीबी है-हम तुम्हारे दोस्त-विकास नाम का तुम्हारा एक लड़का भी है ।"



"म-----मेरा लडका?"




"हां प्यारे-लड़का भी ऐसा जो आते ही तुम्हें सबकुछ याद दिला देगा-आओ, उस कमरे में चेले.-----वहां तुम्हें उसके फोटो दिखाऊँगा ।"

रघुनाथ किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह उसके साथ चल दिया---बिजय ने आंखों से रैना और डॉक्टर भटनागर को वहीं रुकने का संकेत दिया…रघुनाथ को लेकर बह भीतरी कमरे में चला गया---कुछ ही देर-बाद दौड़ता हुआ विजय कमरे के बाहर निकला-----फुर्ती के साथ उसने घूमकर दरवाजा बन्द करके बाहर से बोल्ट कर. दिया----रैना और भटनागर ने चकित दृष्टि से यह सब कुछ देखा था, जबकि दूसरी तरफ़ से दरवाजा पीटता हुआ-रघुनाथ कह रहा था…“ये आप क्या कर रहे है--आपने मुझे बन्द क्यों कर दिया !"



"फिलहाल आराम करो प्यारे?"



विजय के निकट पहुंचकर हड़बड़ाई सी रैना ने कहा…"'य. ..ये इन्हें क्या हुआ भइया-----ये कैसी बाते कर रहे है-----कुछ भी याद क्यों नहीं रहे है----हममे है किसी को ये पहचान क्यों नही रहे हैं ?"



"क्यों डॉक्टर-आपके ख्याल से अपने तुलाराशि को क्या हुआ है?”



"म मुझे लगता है सुपर साहब अपनी याददाश्त गंवा बैठे है !"




"गवा नहीं बैठा डाँक्टर, बल्कि वह सब कुछ उसे याद आ गया है, जो भूल गया था ।"




"क्या मतलब?" भटनागर चकरा उठा !



“जो याददाश्त भूल जाते हैं, वः अपने नाम की जगह कोई दूसरा नाम लेकर यह नहीं कहते कि मैं वह हूं बल्कि होश में आते ही यह पूछते हैं कि मैं कौन हूं…दरअसल, बारह वर्ष की आयु का इकबाल नाम का एक लड़का एक दुर्घटना का शिकार होकर अपनी _याददाश्त गवा बैठा था…वक्त ने उसे रघुनाथ बना दिया---------तव से आज तक वह सिर्फ रघुनाथ बना रहा----- उसे बिल्कुल याद नहीं रहा कि वह इकबाल है ।"





" ओह! ! ! शायद आज की दुर्घटना से उसकी याददाश्त वापस आ गई है।”





" हां !" विजय बोला-----" आपसे सिर्फ यह पूछना है कि क्या ऐसाहो सकता है?"




"जरूंर हो सकता है ।"




रैना ने जल्दी से पूछा-“तो क्या अब उन्हें कभी याद नहीं आएगा कि वे रघुनाथ हैं !"

"अरे याद क्यों नहीं आएगा रैना बहन !" डॉवंटर से पहले विजय बोल पड़ा-------"उसके तो बाप को भी सब कुछ याद करना पड़ेगा-----हमे उसकीं याददाश्त के आंन-ओंफ के स्विच का पता लग गया है-सिर में है-जहाँ चोट लगी है-पहले एक्सीडेण्ट से वह आँफ हो गया था----इस एक्सीडेण्ट से ऑन हो गया----उस स्विच को फिर आँफ़ होना होगा -भले हो उसके लिए हमें एक और एक्सीडेण्ट
करना पृड़े ।"


रैना रो पडी ।



" अरे----तुम रोती क्यों हो रैना बहनं?"



“म...मेरी तो कूछ समझ में नहीं आ रहा है भइया-जाने आप क्या कह रहे है !"



"अपने भाई पर भरोसा रखो रैना बहन !" विजय थोड़ा गम्भीर हो रया----- " अपने तुलाराशि को मैं कुछ और नहीं बनने दूंगा-तुम फिक्र मत करो----फिलहाल मैं जा रहा हूं--------कुछ ही देर वाद लौटकर आऊंगा-----सब ठीक हो जाएगा---तुम वह दरवाजा मत खोलना ।"



रैना आंसुओं से भीगा चेहरा ऊपर उठाकर उस तरफ देखने लगी ।



सांत्वना देने के से अन्दाज में विजय उसका कंधा थपथपाकर बाहर निकल गया ।

"'लेकिन सर-अखिर रघुनाथ वहां गया ही क्यों था?" सव कुछ सुनने के बाद हैरत में डूबे ब्लैक बाॅय ने पूछा ।



“वह किसी को बताकर नहीं गया था…कहा नहीं जा सकता कि कमरे में तबस्सुम से उसकी क्या बाते हुई-सोचा था कि होश में आने पर पूछेंगे, लेकिन उसके होश में आने ने तो हमारे ही होश गुम कर दिए हैं-जब उसे यही याद नहीं कि वह रघुनाथ है तो उसे यह कैसे बाद होगा कि वहां वह क्या सोचकर गया था-खैर, शायद तबस्सुम से कुछ पता लगे…अपने झानझरोखे का फोन आया?"




“नहीं सर !'



अभी उसने ऐसा कहा ही था कि मेज पर रखे टेलीफोन की घण्टी घनघनाने लगी…हाथ बढ़ाकर विजय ने रिसीवर उठाया, बोला-----" पवन हीयर ।"



“ वह लड़की मिल गई है सर !"



"कहां से?”



“दुर्घटनास्थल से एक किलोमीटर पीछे वह झाडियों में बेहोश पडी थी-ऐसा लगता है जैसे कि किसी ने उसे दुर्घटना होने से पहले ही जीप से बाहर फेक दिया था।"



विजय' ने एक पल कुछ सोचा, फिर बोला…"उसे लेकर सुपर रघुनाथ के घर पहुंचो---कुछ देर बाद विजय भी वहाँ पहुंचेगा, लेकिन उसके वहां पहुंचने से पहले तुम्हें तबस्सुम को होश में लाने की कोशिश करने के अलावा कुछ नहीं करना है।" कहने के साथ ही उसने सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया ।।।



फिर ब्लेक क्बयाॅ से बोला--“अपनी गोगिया पाशा से सम्बन्थ स्थापित करों प्यारे-उसे आदेश दो कि वह अपने स्थान पर मौजूद रहे और बूढे अहमद खान को देखते ही अपनी गिरफ्त में ले ले----अहमद को लेकर वह तुरन्त अपने तुलाराशि की कोठी पर पहुंच जाए ।"



ब्लैक वॉय ने ट्रांसमीटर पर आशा से-सम्बन्ध स्थापित किया,बोला----"क्या अहमद खान होटल-लौट आया है?"



" जी हां !"



"उसे तुरन्त अपनी गिरफ्त में लेकर रघुनाथ की कोठी पर पहुंच जाओ!" पवन की आवाज में कहने के-बाद ब्लेक बाॅय ने तुरन्त समन्ध-विच्छेद कर दिया----तब उसने विजय 'से कहा-----"ल.. लेकिन सर-अब आखिर आप करना क्या चाहते हैं !"




" फिल्लहाल यह तो मैं खुद भी नहीं जांनता प्यारे?"



“क...क्या मतलब सर?"




उठते हुए विजय ने कहा-"वैसे ऊपर से देखने पर मामला सीधा-सादा नजर आ रहा है, मगर कुछ बाते ऐसी भी हैं,जो हमें रहस्यमय लग रही हैं।"



" जैसे?"



" अभी-अभी अपने झानझरोखे ने बताया कि तबस्सुम को किसी ने दुर्घटनास्थल से एक किलोमीटर पहले ही जीप से बाहर फेंक दिया था…सबसे पहला सवाल उउठता है-किसने---दुसरा सवाल है क्यों…क्या फेकने वाले को मालूम था कि कुछ देर बाद जीप दुर्धटनाग्रस्त होने बाली है?"



ब्लेक बाॅय के नेत्र सिकुड़ते चले गए ।




" दुसरी रहस्यमय बात हमने तब देखी जबकि हम अपने झानझरोखे के साथ कार में बैठकर तुलाराशि की जीप का पीछा कर रहे थे…हमने देखा कि सुनसान सडक पर पहुचते ही जीप विना किसी वजह के अचानक ही वहुत तेज और अन्धाधुन्ध भागने लगी-----हम दावे के साथ कह सकते हैं कि उतनी तेज और ऊटपटांगं गाडी अपना तुलाराशि नहीं चला
सकता ।"



"क्या आप यह कहना चांहते है कि ड्राइविंग़ सीट पर कोई और था ?"




"अभी हम स्पष्ट रूप से भी कहने की स्थिति में नहीं है प्यारे…मगर हां, इंन सब को मद्देनजर रखकर' हम यह दावा जरूर कर सकते है कि यह एक्सीडेणट रहस्यमय है ।"
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 12 Oct 2017 18:22

डॉक्टर भटनागर वहां सें जा चुका था।।


रैना ने रो - रोकर अपना बूरा हाल का लिया था-ज़ब बेहोश ततबस्सुम को लिए अशरफ वहाँ पहुचा तो रैना तबस्सुम को देखकर चौक पडी-------रैना को रोते देखकर अशरफ भी चौका था…दोनों, ने अपने साथ साथ घटी एक-दूसरे को सुनाई-----रैना की सुनने के बाद अशरफ स्वयं भी चकित रह गया, परन्तु रैना को सात्वना देने की उसने भरपूर चेष्टा की !!



रघुनाथ उसी कमरे में केद था।



कुछ ही देर बाद वहां विजय भी पहुंच गया !


उसने आते ही तबस्तुम को होश में लाने की प्रक्रिया जारी कर दी--तबस्सुम को ज्यदा चोट नहीं लगी थी-हां,चन्द खरोचे ज़रूर थीं।


उसका झीना-गाउन कई जगह भी फट गया था !


विजय के प्रयासों से वह होश में आते ही उछलकर खडी हो गईं--यह महसूस करते ही वह झेंप गई कि वह लगभग नग्नावस्था में है ।




विजय ने कहा…"अपने कमरे में ले जाकर इसे ढंग से कपडे पहना दो रैना बहन !"

स्वयं को उनके बीच पाकर तबस्सुम खुद चकित थीं…जब तक रैना उसे अपनी साडी और ब्लाउज़ पहनाकर कमरे में लाई, तब तक आशा भी अहमद को लेकर वहाँ पहुच चुकी थी ।



आशा ने अहमद को अपने रिवॉल्वर से कवर कर रखा था ।



तबस्सुम को देखते ही अहमद चौंककर कह उठा…"अरे बहूरानी-तू यहां?"




"अ.......आप----?' तबस्सुम के मुंह से सिर्फ यही एक लपज निकला ।



अहमद विजय और रैना कौ देखकर कह उठा-"आप दोनों तो वही हैं न, जो सुबह होटल में पुलिस की वर्दी पहनकर आए थे?"



"हां प्यारे ।” विजय बोला--तुम बूढे जरूर हो, लेकिन आखें अभी तक तेज हैं ।"




"'आप लोग हमेँ इस तरह पकडकर यहाँ लाने वाले होते कौन हैं?"



"हमारे चक्कर मे पडने वाला वही बन जाता है प्यारे, जो शिकारपुर में रहते हैं---हम काले चोर हैं--फिलहाल तुम ये बताओं कि तुमने जीप पेड़ में क्यो दे मारी?"




"ज....... जीप पेड़ में दे मारी-कौन-सी जीप?"




"वही, जिससे अपना तुलाराशि बेहोश तबस्सुम को लेकर चला था ।"




" त......तुलाराशि कौन?"



"तुम्हारा इकबाल ।"



"ह हमारा इकबाल--""मगर आपने तो बताया था कि वह मर गया है-क्या सचमुच इकबाल जिन्दा है-----:कहां है-प प्लीज, मुझें मेरे बेटे की एक झलक दिखा' दो।”




झपटकर विजय ने दोनों हाथो से उसका गिरेबान पकड लिया और दांत भीचकर गुर्राया------“ज्यादा नाटक करने की कोशिश मत करो प्यारे वरना एक ही झापड में सारे कसवल ढीले हो जाएंगे?"




"आप ये क्या का रहे है----मै भला क्या नाटक कर रहा हू !"

"यदि तुम नाटक नहीं कर रहे हो प्यारे-तो बताओं कि अपने होटल से गायब होकर तुम पूरे दो घण्टे कहां रहे और क्या करते रहे ?"




अहमद ने जबाब दिया…"मैं आई जी पुलिस ठाकुर साहब से मुलाकात करने उनके बंगले पर गया था ।"



समी उछल पड़े ।



विजय की तो बुद्धि चकराकर रह गई फिर भी काफी जल्दी उसने स्वयं को सम्भालकर कहा-----" तुम ठाकुर साहब से मिलने गए थे…क्यों?"




“उनसे अपने इकबाल के बारे में बात करने ।"



“इकबाल के बोरे में तुमने उनसे वया बातें की ?"



"वही सव कुछ जो आपसे की थीं…मैँने उन्हे यह भी बताया कि सुबह सुपरिटेण्डण्ट साहब हमारे पास आए थे-----वे सारी बाते भी उन्हें बताई-----जो आपने की री-कहने लगे कि मेरी जानकारी में रामनाथ नामक कोई आदमी ऐसा नहीं है, जिसकी लाश रेल की पटरी से मिली हो और जिसकी जिस्मानी खासियतें इस बच्चे से मिलती हों----मैंने कहा कि आपके सुपरिटेण्डेण्ट साहब तो वही कह रहे थे-वे बोले कि सुपरिटेण्डेण्ट साहब से बात करेंगे ।"


"जब तुम्हें हमने सब कुछ बता दिया था तो तुम वहां क्यों गए?”



" मुझे यकीन नहीं आया था कि आप अस ली पुलिस वाले है और आपने सच बोला है।"




" ओह----क्या तुमने उन्हें हमारे नाम बताए थे?"



"मुझे मालूम नहीं थे ।"




कुछ कहने के लिए विजय ने अभी मुह खोला ही था कि घण्टी घनघना उठी-विजयं ने आगे बढकर रिसीवर उठा लिया, दूसरी तरफ से ठाकुर साहव की आवाज़ उभरी-----"हेलो ।"


विजय सम्भला---उसने तत्परतापूर्वक रघुनाथ की अबाज़ में कहा--" य यस सर !"


आशा और अशरफ के अतिरिक्त रेनां सहित सभी चौंककर चकिंत्त दृष्टि से उसकी तरफ देखते रह गए, जबकि दूसरी तरफ़ से ठाकुर साहब पूछ रहे थे----क्या तुम सुबह दिलबहार होटल के रूम नम्बर सात सौ बारह में किसी से मिलने गए थे रघुनाथ?”



"ज़...जीं-नही तो?” रघुनाथ की आबाज मे कहा ।



"क. क्या मतलब ? " ठाकुर साहब चौंक पड़े-“तुम वहां नहीं गए…क्या तुम्हें अच्छी तरह याद है?”



"मैं भला अपनी दिनचर्या कैसे मूल सकता हूं----मै वहां नहीं गया------फिर भला वहां मैं क्यों जाऊंगा सर ?"




" उस विज्ञापन के सिलसिले में...जो आज के अखबार में तिसरे पृष्ठ पर निकला है।"




"मेरा किसी विज्ञापन से क्या सम्बन्ध सर !"




"कमाल है-यदि तुम वहां नहीं गए तो वह यहां कैसे आ गया?”



"कौन सर! "




"मेरे पास एक व्यक्ति आया था जिसने अपना नाम अहमद खान बताया था।"




इसके बाद ठाकुर साहब वही सब कुछ बताते चले गए, जो अहमद कुछ ही देर पहले बता चूका था….सुनने के बाद विजय ने रघुनाथ के स्वर में कहा-“कमाल हैं सर-मै नहीं समझ सकता कि सुपरिटेण्डेण्ट की वर्दी में बहाँ कौन पहुच गया और वह उस आदमी से रामनाथ वाला झूठ बोलकर अपना क्या उल्लू सीधा करना चाहता था ।"
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Re: दूध ना बख्शूंगी/Vedprakas sharma

Post by 007 » 12 Oct 2017 18:22

"यदि वह तुम नहीं थे तो मामला सचमुच गम्भीर है रघुनाथ-कोई नकली सुपरिटेण्डेण्ट बना घूम रहा है--उसे पुलिस की गिरफ्त मे होना चाहिए ।"




"य…यस सर, लेकिन........!"



ठाकुर साहब जैसे रिसीवर रखते-रखते रूक गए हो--"लेकिन क्या?"



"मैं आपसे चन्द सवाल करना चाहता हू।"




“हमसे सवाल?''



"अहमद खान नाम का वह आदमी आपके-पास कितनी पहले आया था ?"

“करीब ढाई घण्टे पहले ।"



“कब गया सर ?"




ऊभी-केवल तीस मिनट ही गुजरे हैं ।"



"ओ के. सर'-थेंक्यू।" कहकर विजय ने रिसीवर रख दिया…उसने रिस्टबॉंच पर नजर डाली-रघुनाथ की जीप का . . एक्सीडेंट हुए अभी सिर्फ एक ही घण्टा गुजरा था…उसे स्वयं ही अपना यह अनुमान गलत साबित होता हुआ प्रतीत दिया कि जीप एक्सीडेण्ट अहमद का कोई हाथ था ।




कई -पल तक अपने स्थान पर खडा जाने वह क्या सोचता रहा-अब उसे अहमद से कोई भी प्रश्न करने का कोई औचित्य नजर नहीं आ रहा था-अत: उसकी तरफ़ कोई ध्यान दिए विना वह तबस्सुम की तरफ बढा-उसके नजदीक पहुंचकर बोला-जब तुम्हारे पास अपना,तुलाराशि पहुचा-तो उसने तुमसे क्या बातें की?"



"तुलाराशि नहीं, इकबाल कहिए ।"



“क्या मतलब?"



"उसने मुझसे कहा कि वे सभी जिस्मानी खासियत उसमें हैं, जो हम इकबाल में बताते हैं-----कहने के बाद उसने मुझे वे सभी खासियतें दिखाई भी थीं-मैं खुश होकर कहने लगी कि तुम ही इकबाल हो-बह नहीं माना--उल्टे यह कहने लगा कि उसे फंसाने के लिए हम कोई षडूयंत्र कर रहे हैँ…मैं उसे यह यकीन दिलाने की भरसक चेष्टा करती रही, जबकि वह मुझसे पूछता रहा कि हमारी साजिश क्या है…अंत में यह कहने के साथ ही उसने मेरे सिर पर रिवॉल्वर के दस्ते का वार किया कि मैं उसे इस तरह कुछ नहीं बताऊंगी, अत: वह मुझे टॉर्चर करने अपने साथ ले जा रहा हे…मैं बेहोश हो गईं-उसकै बाद मुझे यहीं होश आया है-मैं नहीं जानती कि इस बीच क्या हुआ…पै यहाँ कैसे पहुच गई ।"





विजय पुन: उलझकर रह गया-----वह किसी आशाजनक परिणाम पर न पहुच सका । "

इस वक्त दिमाग में यह बिचार भी उठा ,कि कहीं एक सामान्य एक्सीडेंट मे उसे व्यर्थ ही तो कोई रहस्य नजर नहीं आ रहा है--वेसे भी रघुनाथ की याददाश्त लौटने वाली घटना यह कहती थी कि ये सचमुच मुसीबत के मारे हैं------ फिलहाल उसके पास एक ही रास्ता था-----यह कि अहमद और तबत्सुम को अपने विश्वास में लेकर चले-उसने निश्चय किया कि ऐसा ही करेगा…इसी निश्चय के वशीभूत उसने कहा-----हमारा तुलाराशि और तुम्हारा इकबाल एक ही व्यक्ति है ।"



" अब आप स्वयं ही यह बात मान रहे है ?"


"बेशक !"


"क्यों ?"


" घटना ही कुछ ऐसी हो गई है !"


" क्या घटना हो गई है ?"


"वह घटना बताने से पहले मैं तुम लोगों से एक समझोता करना चाहूगा ।"



_ "कैसा समझौता?"



"इकबाल तुम्हारे साथ सिर्फ बारह साल रहा था, इसी वजय से तुम्हें उससे इतनी मुहब्बत होगई कि आज इकत्तीस साल से तुम उसके लिए सारी दुनिया में मारे-मारे फिर रहे हो, तो क्या आप यह नहीं मानेंगे उसे भी उससे कुछ मुहब्बत हुईं होगी, जिनके साथ वह बीस-पच्चीस या तीस साल रहा ।



"जरूर हुई होगी ।"



"अगर बह उनसे एकदम जुदा हो जाए तो क्या उन्हें दुख नहीं होगा?"



"क्यों नहीं होगा?"


"क्या आप उन्हे दुख देगे ?"


एक पल के लिए सन्नाटा छा गया-----अशरफ रैना और आशा समझ नहीं पा रहे थे कि विजय क्या चाहता है, जबकि तबस्सुम और अहमद खान की आंखे मिली…तब तबस्सुम ने कहा----"हम समझे नहीं…अपना प्रयोजन यदि आप साफ भाषा में कहे तो अच्छा होगा ।"



"मेरा मतलब ये है कि आप उसे उन लोगों से जुदा नहीं करेगे, जो रघुनाथ समझकर उसे प्यार करते है।"


"उसे हमारे साथ मिस्र जाना होगा !"



"यही आप नंहीं करेगे !"


" क्यों ?"



"क्योंकि ऐसा, होने से उसी विरह की आग में कुछ और लोग सुलजते रह जाएंगे, जिसमेँ आज तक आप सुलग रहे थे ।"



"इसमें हमें क्या लेना-देना हे…वह हमारा इकबाल है ।"



"जब तक आप मुझसे यह समझोता नहीं करेगे, तब तक वह आपको नहीं मिलेगा !"



"आप उसे हमसे न मिलने देने वाले कौन होते है?”



एकाएक विजय का स्वरं कड़ा हो गया-----" हम काले चोर होते है !"



"काला चोर कौन?"



"उसके प्रति हमे तुम्हारी मुहब्बत देखकर सहानुभूति हो गई थी प्यारे-सोचा था कि ऐसा रास्ता निकल आए, जिससे तुम्हें तुम्हारा इकबाल भी मिल जाए और हमारा तुलाराशि भी हमारे पास रहे । लेकिन यदि तुम नहीं मान रहे हो-तो इकबाल कभी नहीं मिलेगा…वह हमेशा हमारा ही रहेगा-बल्कि किसी को यह ही पता नहीं लगेगा कि तुम मिस्र से भारत आने के बाद कहीं गुम हो गए ।




अहमद खान कह उठा……" हमें धमकी दे रहे हो?” '



"इन्हें पकड़ तो प्यारे झानझरोखे और मिस गोगिया पाशा?" विजय ने आदेश दिया---" हमने सोचा था कि सीधी उंगली से ही घी निकल जाएगा, लेकिन इन्होंने हमें उंगली टेढी करने के लिए विवश कर ही दिया ।"



आशा और अशरफ ने रिवॉत्वर निकालकर उनकी कापटियो पर रख दिए-विजय ने सचमुच यह निर्णय ले लिया था कि अब वह कभी रघुनाथ को इनके सामने नहीं पडने देगा-वह समझ चुका था कि रघुनाथ इनका इकबाल ही है ------किन्तु इनसे सहानुभूति रखने का सीधा मतलब था कि वह हमेशा के लिए अपने रघुनाथ को खो दे…ऐसा वह हरगिज नहीं होने दे सकता था।

"ले चलो इन्हें ।" तभी कमरे के अन्दर से रघुनाथ की आवाजं गूजी----"यदि मेरे पिता और पत्नी को कुछ हो गया मिस्टर विजय----, मैं तुम्हें जिन्दा नहीं छोडूगा ।



अचानक ही रघुनाथ की आवाज सुनकर सब चोंक पड़े । रैना कह उठी-" हे भगवान-इन्हें क्या हो गया है?”



"य ये-----आवाज इकबाल की ही है अब्बा हुजूर !" अधीर मन से तबस्सुम लगभग चीख पडी-----"हमरि इकबाल को इन्होंने उस कमरे मे केद-कर रखा है !"



“इकबाल !” चीखकर अहमद कमरे की तरफ दौड़ा, मगर बीच ही में उसके जबड़े पर विजय' का घुसा पड़ा तो वह उलट पड़ा-उसके कंठ से एक चीख निकली और उस चीख को सुनते ही दूसरी तरफ से बंद दरवाजे को झझोड़ता हुआ रघुनाथ चीख पडा । पागलो के समान तबस्सुम दरवाजे की तरफ दोडी ।
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