Incest मर्द का बच्चा

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josef
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Incest मर्द का बच्चा

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मर्द का बच्चा


रघुवीर सिंग- दादा
ज्योति सिंग,- दादी ( अब नही रही)

इनके चार लड़का दो लड़की है.

अनिल सिंग- बड़े काका.
ऋतु सिंग- बड़ी काकी.

इनको दो लड़की ऑर एक लड़का है.

सोनम- बी.ए फाइनल मे है.
रोमा- बी.ए मे गई है इस बार.

राघव- आर्मी मे है.

सुनील सिंग- मझले काका.
राज्ञी सिंग- मझली काकी.

इनकी दो लड़की है.
मीनू- रोमा के साथ बी.ए फर्स्ट एअर मे है.
रानी- 12 का एग्ज़ॅम दिया है.

रवि सिंग- छोटे काका.
सालनी सिंग- छोटी काकी.

इनको एक लड़की है.

गौरी- अभी 12 का एग्ज़ॅम दिया है रानी के साथ.

राम सिंग- पापा
काजल सिंग- माँ

इनके एक लड़की एक लड़का है.

कोमल- 12 मे है.

ललित - (लल्लू)- 8थ तक पढ़ा है एक हादसे मे इसके सर पर चोट लग गई थी. कभी पागल लगता है तो कभी इस से अच्छा इंसान इस धरती पर नही होगा. ऐसा लगता है. कोमल ऑर लल्लू दोनो जुड़वा है.


दिव्या सिंग- बड़ी बुआ.
दीपक सिंग- बड़े फूफा.

एक लड़की एक लड़का है इन्हे.

रूही- 10थ मे है.

राजू- 8थ मे है.

दीक्षा सिंग- छोटी बुआ.
दिनेश सिंग- छोटे फूफा.
इनको कोई संतान नही है.

संध्या का समय था. लल्लू नदी किनारे बैठा हुआ एक टक नदी के पानी को देख रहा था जिस मे छोटी छोटी मछलियाँ एक समूह मे इधर उधर भटक रही थी ऑर वही तीन चार बगुले उन मछलियो को अपनी चोच मे पकड़ पकड़ कर खाए जा रहे थे.

सूर्य महराज अब दूर छितिज मे छुपने वाले थे. परो की छाया लंबी हो गई थी. ये इशारा था सब को कि अब अपने घरो की ओर चले जाओ. अब अंधेरा होने वाला है.

लेकिन लल्लू इन चीज़ो से बेख़बर वही नदी किनारे बैठा हुआ था.

" लल्लू ओ लल्लू…" दूर से कोई लड़का चिल्लाता हुआ इधर नदी किनारे आ रहा था.

" अबे कब से तुम्हे ढूँढ रहा हूँ. कहाँ खोया हुआ है. तुम्हारे दादा जी तुम्हे बुला रहे है." एक दुबला पतला सा लड़का लल्लू के पास आ कर बोला.

" क्यूँ ढूँढ रहे है. मैं क्या खो गया हूँ."

लड़का- ये तो जा कर अपने दादा से पूछना. आज फिर तुम ने गंगा ताई की बेटी राधिया को तंग किया है ना. गंगा ताई आई थी शिकायत ले कर तुम्हारे घर.

लल्लू- बेहेन्चोद, उसकी बुर मारनी बेटी आज आम के बाग मे कलुआ से चुदवा रही थी. मैं बोला मुझे भी चोदने दे तो बोलती है कि मुझे नही देगी तो मैने कलुआ को मार कर भगा दिया इसी लिए शिकायत कर रही होगी.

लड़का- वो मुझे नही पता. चल घर चल. अंधेरा होने वाला है.

लल्लू उठ खड़ा हुआ ऑर उस लड़के के साथ गाँव की ओर चल दिया.

गाँव मे कही कही स्ट्रीट लाइट जल रही थी तो कही गाँव के आवारा लड़के फोड़ दिए थे क्योंकि उन्हे अपने माल के यहाँ रात को छुप कर जाने मे परेशानी जो होती थी इन लाइट्स से. अब अंधेरा हो गया था.

लल्लू नल से हाथ पैर धो कर दालान पर आ गया जहा उसके तीनो चाचा उसके पापा ऑर दादा जी के साथ बैठ कर बाते कर रहे थे.

पापा- आज फिर तुम राधिया को तंग कर रहे थे. तुम बहुत परेशान करते हो मुझे. किसी दिन मे तुम्हे तुम्हारे मामा के यहाँ छोड़ आउन्गा. समझ ले.

लल्लू- मैने कुछ नही किया है. ये सब उस राधिया का ही किया धरा है. वो फिर आज अपने आम के बाग मे गंदा काम कर रही थी. तो मैने भगा दिया वहाँ से. इस लिए वो मेरा शिकायत ले कर आई होगी.

josef
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दादू- जा आँगन मे जा. कुछ खाना खा ले. कितनी बार बोला है तुम्हे अकेला घर से बाहर ना जाया कर. लेकिन तू मानता ही नही.

लल्लू वहाँ से आँगन मे आ गया.

प्यास लगी थी तो आँगन मे लगे नल पर पानी पीने गया तो वहाँ ऋतु काकी बैठ कर अपनी बड़ी सी गान्ड निकाले मूत रही थी.

लल्लू- यहाँ ये क्या कर रही हो काकी. कोई ऑर आ गया होता तो. ये सब बाथरूम मे किया करो.

ऋतु काकी- बाथरूम का बल्ब फ्यूज़ हो गया है. वहाँ अंधेरा है.

लल्लू- तो उजाले मे किस को दिखाना है ये गोरी मटकी.

ऋतु काकी- चुप कर पागला. कुछ भी बोलता रहता है. कोई सुन लेगा तो क्या बोलेगा. यहाँ क्यूँ आया है.

लल्लू- पानी पीने आया था.

ऋतु काकी- तो पी ले पानी ऑर जा यहाँ से.

लल्लू- सारा पानी तो नीचे गिरा दिया. अब कहाँ से पीऊंगा.

ऋतु काकी- हाय्यी रामम्म.. कैसा लड़का है ये. थोड़ी सी भी लाज शरम नही है. तो क्या तू वो गंदा पानी पीता.

लल्लू- वो तो अमृत है. उसके लिए ही तो महाभारत ऑर रामायण हुआ है.

ऋतु काकी- भाग मुआ यहाँ से नही तो बहुत मारूँगी.

लल्लू- लेकिन डंडा तो मेरे पास है काकी. तुम कैसे मारोगी. तुम तो बस मरवाने के लिए बनी हो.

ऋतु काकी बड़बड़ाती हुई हाथ पैर धो कर वहाँ से निकल गई.

मुआ पता नही कैसा है. हमेशा गंदी बात करवा लो. सब कहते है पागल है लेकिन बातों से तो अच्छे अच्छे की पसीना निकलवा दे.

लल्लू नल से पानी पी कर अंदर आ गया जहा उसकी तीनो चाची ऑर मा बैठी खाना बनाने की व्यवस्था कर रही थी.

माँ- कहाँ था तू अब तक. क्या किया है आज फिर राधिया के साथ.

लल्लू- मैने किया नही बस बोला था कि मुझे भी करने दे.

मा- क्या नही किया. ऑर क्या बोला करने देने को.

लल्लू- वो कलुआ के साथ करवा रही थी तो मैं बोला कि मुझे भी करने दे लेकिन नही करने दिया तो मैने कालूआ को मार कर भगा दिया.

माँ--मुआ मर जा, जा कर कही. लल्लू की माँ खाना बनाने क लिए जो लकड़ी रखी थी उस मे से एक मोटा लकड़ी उठा कर मारती हुई बोली.

लल्लू चुप चाप खड़ा मार ख़ाता रहा.

अंत मे लकड़ी टूट गई.

माँ- इसे तो मार का भी कोई फ़र्क नही पड़ता है. पता नही सरीर किस चीज़ का बना हुआ है. ( अपने आप से बड़बड़ाती टूटी लकड़ी फेक कर बैठ गई.)

माँ- जा जाकर सब के साथ पढ़ने बैठ. कुछ दिमाग़ मे घुसेगा.


लल्लू- मुझे भी कोई पढ़ा दो. माँ बोली है.

कोमल- मेरा पढ़ाई हो गया अब इन लोगो को बोल पढ़ा देंगे. ( हँसती हुई कोमल दीदी बोली.)

सोनम- भाई आ गया तो अब मेरा भी पढ़ाई हो गया. ( वो भी अपनी किताबें समेटती बोली)

रोमा- आ आज मैं पढ़ाती हूँ तुम्हे. यहाँ मेरे पास बैठ.

लल्लू रोमा के पास जा कर बैठ गया. कोमल ऑर सोनम दोनो इन दोनो को देख कर हस रही थी.

josef
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Re: मर्द का बच्चा

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रोमा- बता आज क्या क्या किया है.

लल्लू- पहले पढ़ा तो दे.

रोमा- यही तो है तेरा पढ़ाई. पहले देखे तो सही तुम्हारा याददाश्त कितनी तेज है. बता अब राधिया के साथ क्या किया.

माँ- क्या कर रही है तुम लोग. इसे यहाँ पढ़ने भेजा था या रामायण सुनाने. चल तू ये सब तुम्हे नही पढ़ाई करने देंगे. ( लल्लू की माँ काजल सब को डाट कर लल्लू को वहाँ से ले जाती बोली.)


कोमल- माँ बड़ी तेज है. भाई को ले कर भाग गई.

सोनम- अरे बाप रे. फिर तुम्हारे पापा का क्या होगा. सुना है भाई का बड़ा मोटा ऑर लंबा है.( सोनम रोमा ऑर कोमल तीनो हँसने लगे सुन कर.)

कोमल- चुप रंडी. कभी ले कर देखी है क्या.

सोनम- हाय्यी.. ऐसी नसीब कहाँ. अपने किस्मत मे तो उंगली करना ही लिखा है.


ऋतु काकी- पढ़ाई हो गई तुम लोगो की तो चलो खाना बनाने मे मदद करो.


फिर सब मिल कर खाना बनाने मे लग गये.

रागिनी काकी- लल्लू जा सब को दालान से बुला ला. बोलना खाना खाने चलो.

सलिनी काकी- मीनू, रानी बेटा सब के लिए बैठने का चादर लगाओ.

लल्लू दालान मे जा कर सब को खाने को बुला लाया तब तक आँगन मे मीनू ऑर रानी जो की राज्ञी की बेटी है वो चादर ऑर पानी लगा दी.

दादू के साथ तीनो काका ऑर पापा आ कर बैठ गये खाने पर.

सभी बहनो ने मिल कर खाना परोश दिया.

लल्लू भी साथ मे बैठ गया था.

मर्द लोगो का खाना हो जाने के बाद घर की सभी महिला एक साथ खाना ले कर खाने बैठ गई.

खाना खाने के बाद लड़किया जूठा बर्तन उठा कर नलका पर जा कर धो आई ऑर रशोई मे सारे बर्तन रख दी.

फिर सभी अपने कमरे मे जा कर सो गये.

लल्लू पहले दालान पर सोता था लेकिन जब से उसे चोट लगी है तो अब वो आँगन मे ही एक खटिया पर सोता है. गर्मी ज़्यादा हो तो फिर छत पर या ठंड ऑर बरसात मे घर मे सोता है.

आधी रात मे आँगन मे लाइट बंद था या लाइट चली गई थी.

एक साया लल्लू की खाट के पास आया. कोई औरत लग रही थी.

खाट के पास आ कर वो चारो ओर पहले एक बार देखी कि कही कोई उठा तो नही है फिर आहिस्ता से वो लल्लू की खाट के पास आ कर
उस पर झुक गई.

लल्लू खाट पर पीठ के बल लेटा हुआ था.

एक बनियान ऑर नीचे धोती लपेटे वो गहरी नींद मे सो रहा था.

वो साया खाट पर झुका हुआ अपना हाथ बढ़ा कर कुछ टटोल रहा था.

वो साया खाट पर बैठ गया ऑर लल्लू की धोती को उठा कर उपर कर दी कमर तक.
नीचे लल्लू कुछ नही पहने हुए था.

वो साया लल्लू के डंडे को हाथ बढ़ा कर पकड़ ली.
वो डंडा उस साए के हाथ मे पूरा नही आ रहा था.

फिर उस साए ने अपने दूसरे हाथ से भी उसे पकड़ कर उस डंडे पर उपर नीचे चलाने लगा.

फिर वो साया एक हाथ हटा कर अपनी कमर के नीचे कुछ करने लगा ऑर एक हाथ से जल्दी जल्दी लल्लू के डंडे को उपर नीचे करने लगी.

करीब 5-7 मिनिट्स बाद वो साया उस डंडे पर झुक कर उसे अपने मूह मे लेने लगी लेकिन लल्लू का डंडा था ही बड़ा मोटा. वो उस साए के मूह मे आया ही नही. तो उपर के हिस्से को ही मूह मे ले कर उस पर जीभ चलाने लगी ऑर नीचे अपनी कमर के पास भी जल्दी जल्दी हाथ चलाने लगी.

कोई 5 मिनिट्स बाद लल्लू झटके खाने लगा.

वो साया जितना मूह खोल सकती थी खोल कर उसके डंडे से निकले सारे अमृत रस को चाट गई ऑर अच्छे से चाट कर साफ कर दी डंडे को फिर धोती सही कर के वहाँ से अपने कमरे मे चली गई.

josef
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अपडेट 2.


गाँव में सहर की तुलना में सुबह जल्दी हो जाती है.

सुबह 4 बजे उठ कर गाँव के किसान अपने घरो से निकल पड़ते है अपने कंधे पर हाल ले कर खेत की ओर.
कोई खेत तैयार करने तो कोई बीज बोने.

लल्लू भी सुबह 4 बजे उठ गया.
एक जग पानी पी कर वो घर से बाहर आया तो उसके बड़े काका भी जाग गये थे.

काका- लल्लू आज खेत चलना. वहाँ बहुत काम पड़ा हुआ है. आलू निकालने है खेत से नही तो आलू खराब हो जायगा.

लल्लू- में उधर ही जा रहा हू काका. आप लोग भी आ जाइए.

लल्लू आगे निकल गया पहले नदी किनारे गये. वहाँ जा कर सुबह का नेचुरल कॉल से निपट कर फिर नदी में ही फ्रेश हुआ ओर जो कोई गाँव की औरते उधर आई थी अपनी अपनी मटका ले कर उन सभी को निहारता हुए खेत पहुचा.
तब तक खेत में तीनो काका ओर पापा भी आ गये थे.
सभी लोग मिल कर खेत से आलू निकालने लगे.

सुबह क 10 बजे क करीब.

लल्लू- काका, अब में जा रहा हू. मुझे भूख लगी है.

काका.- हा ठीक है बेटा. तुम खाना खा कर हमारे लिए भी ले आना.

लल्लू वहाँ से निकल कर गाँव की ओर चल दिया.
अभी आधे रास्ते ही आया था की आगे से राधिया सर पर टोकरी रखे आ रही थी.

लल्लू- आ रंडी आ. बड़ी खुजली मची है तेरी बुर में. आज बताता हू में.

जब राधिया पास आ गई तो लल्लू उसकी एक चुचि पकड़ कर ज़ोर से दबा दिया.


राधिया- हरामी साला, ये क्या कर रहा है.

लल्लू- रंडी, मेन्ने कल क्या किया था जो तेरी रंडी मा को मेरे यहाँ भेजा था.

राधिया- मेरा रास्ता छोड़ दे तो में कुछ नही कहूँगी नही तो आज मा क साथ में भी जाउन्गी तेरे यहाँ.

लल्लू- ओर जा कर क्या कहोगे की लल्लू ने अपना लुल्ली डाल कर छोड़ दिया खेत में. हा बता रंडी. ( लल्लू राधिया की दोनो चुचि पकड़ कर ज़ोर से दबाते हुए बोला.

राधिया- कमीना अपनी गड्रई बहनो का चुचि मसल ना. मेरे पीछे क्यू पड़ा हुआ है.

लल्लू- जब तू कालुवा से छुड़वा सकती है तो मेरे में क्या करे लगे है जो मुझ से भागती रहती है.

राधिया- मुझे मारना नही है. कालुवा का छोटा सा है जो मेरे उंड़र भी नही जाता लेकिन तेरा तो मेरे बर को फर कर मेरे मूह तक आ जगा.

लल्लू- आज तो बिना छोड़े में नही जाने दूँगा.
राधिया- में चिल्लौंगी.

लल्लू- पहले छोड़ने तो दे.

राधिया- मा, देखो ये क्या कर रहा है.

लल्लू- बेहन छोड़ इसे भी अभी आना था.

गंगू टाई- क्यू रे मुआ क्या कर रहा था मेरे बेटी क साथ.
लल्लू- में क्या कर रहा था. में तो पूछ रहा था की कल मेन्ने ऐसा क्या किया जो टाई को मेरे घर जाना पड़ा था.

गंगू टाई- कल भी तू ऐसे ही च्छेर रहा था मेरी बेटी को.

लल्लू- कल में च्छेर नही रहा था. पूछ अपनी बेटी से. कल क्या कर रही थी जब में इसके पास गया था.

राधिया- मा..में क्या कर रही थी. कुछ भी तो नही.

लल्लू- कालुवा से छुड़वा रही थी आम क बाग में. मेन्ने मार कर भगा दिया था कालुवा को ओर उल्टा मेरा नाम ही फाशा दी आ कर. वा रे दुनिया.

गंगू टाई- क...की..आ क्या कहा तुमने. क्या कर रही थी ये.
लल्लू- यकीन ना हो तो बोलो. में कालुवा को पकड़ कर लता हू उसी से पूछ लेना.

गंगू टाई- क्यू रे रंडी क्या कह रहा है ये. मुझे पहले से ही सॅक था इस पर. कई बार कालुवा को देख चुकी हू घर क पास मंडराता हुआ. चल आज घर तेरी बुर में बड़ी आग लगी है ना आज मिर्ची डालूंगी उस में.

गंगू टाई राधिया को छोटी से पकड़ कर घर की ओर मारती हुई ले गई.


लल्लू भी घूमता टहलता घर पहुच गया.
दालान पर नालका पर जा कर हाथ पैर धोया ओर आँगन आ गया.

लल्लू- मा ओ मा कहा हो. खाना दो जल्दी से भूख लगी है. फिर सब का खाना ले कर खेत भी जाना है.

ऋतु काकी- क्यू चिल्ला रहा है. नहा रही है तेरी मा.

लल्लू- कैसी हो काकी. अमृत पी कर कैसा लगा.

ऋतु काकी- का..को..कौन सा आम..अमृत. क..की..क्या बक रहा है.

लल्लू- कुछ नही खाना दो तुम.

ऋतु काकी खाना निकल कर दे दी.
लल्लू खाना ख़ाता हुआ ऋतु काकी को घूर रहा था ओर वो लल्लू से नज़रे चुरा कर झारू लगा रही थी आँगन में.

झारू लगते हुए झुकने से ऋतु काकी का मटका बहुत सुंदर लग रहा था.

josef
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लल्लू- आ.. कितना बड़ा है..

ऋतु काकी- क्या…
लल्लू- मटका..काकी…
ऋतु काकी- झारू दिखती हुई. देख रहा है इसी से मारूँगी.

लल्लू- क्या काकी कल भी कहा था. डंडा तो मेरे पास है. तुम तो बस मार खाने के लिए एक बार तैयार हो जाओ. जन्नत दिखा दूँगा.

ऋतु काकी- अपनी मा को दिखा जन्नत. उस में बहुत गर्मी है. बहुत दिन से इंतजार कर रही है जन्नत देखने की.

लल्लू- मेरा पहली बार होगा काकी. एक बार परक्तिसे करवा दे फिर तू जिस को कहेगी उसको जन्नत दिखा दूँगा.

ऋतु काकी- मूह पर हाथ रख कर. मुआअ मेरे पीछे ही पद गया है.

तब तक लल्लू का खाना हो गया ओर इधर काजल भी नहा कर आ गई थी.

इस समय काजल सिर्फ़ एक पेटीकोत अपने च्चती पर बाँध कर आँगन में सारी पहनने को आई थी.
लल्लू अपनी मा का ये गड्राया बदन देख कर उसका डंडा फंफना कर 90 डिग्री पर खड़ा हो गया.

काजल की चुचिया 2 -2 किलो की एक थी.
पेटीकोत तोड़ा पानी से भींग गया था तो वो कही कही से सरीर में चिपक गया था जहा सरीर का वो पूरा हिस्सा साफ दिख रहा था.
लल्लू मूह खोले अपनी मा क इस बेजोर हुसना को खा जाने वाली नज़रो से देखे जा रहा था.

ऋतु काकी- हाय्यी रामम्म ये तो अपनी मा को भी नही बकषेगा. लगता है अभी उसे 9 महीने के लिए पेट से कर देगा.

तभी रागिनी काकी नहाने को नालका पर बाल्टी ले कर निकली घर से.
बाल्टी की आवाज़ से लल्लू का ध्यान अपनी मा से भंग हुआ.

रागिनी काकी को देखा तो एक ओर झटका लगा उसे.
इस समय रागिनी काकी अपना ब्लाउस खोले सिर्फ़ सारी लपेट कर नालका पर जा रही थी.

लल्लू जो अब खाना खा कर उठाने वाला था वो फिर से बैठा रह गया.

लल्लू- काकी सब का खाना बंद दे जल्दी से. मुझे फिर खेत जाना है खाना ले कर.

ऋतु काकी झारू एक ओर रखती रसोई में जा कर सब के लिए खाना निकालने लगी.

इधर रागिनी काकी नालका पर नहाना चालू कर दी.
काजल कपड़े पहन कर घर क उंड़र चली गई.

लल्लू चुपके से उठ कर नालका पर चला गया.

वहाँ जा कर देखता है की रागिनी काका साबुन लगा रही है.
वो आँख बंद किए हुए अपने एक हाथ से नीचे से सारी उठा कर अपने बुर में रगर रगर कर साबुन माल रही थी.
लल्लू का तो देख कर बुरा हाल था.
बर बड़ी बड़ी काली झतो से ढाकी हुई थी.
रागिनी काकी की मोटी गोरी जंघे हाय्यी जान मारू थी.
तभी रागिनी काकी क हाथ से साबुन फिशन गया.
रागिनी काकी ऐसे ही सारी उठाए झुक कर नीचे साबुन ढूँढने लगी.
उसकी गोरी गोरी गंध ओर उसका सुर्ख छोटी खुलती ओर बंद होती छोटी छेड़ देख कर लल्लू को लगा की वो बिना कुछ किए ही झार जायगा.

तभी रसोई से बर्तन की आवाज़ आई. तो लल्लू घबरा कर वहाँ से निकल आया. लेकिन अभी उसका दिल भरा नही था.
उसकी धरकन बहुत तेज धारक रहा था.
वो इस बार अपने पैरो को चले हुए आवाज़ देते हुए बलके पर आया.

लल्लू- काकी अभी तक नहाई नही थी आप.

रागिनी काकी- नही बेटा. खाना बनाते बनाते लाते हो गया.

लल्लू- क्यू. आप क्यू बना रही थी. ये दीदी लोग कहा थी.

रागिनी काकी- अरे बेटा सब महारानी है. वो सब परोस में सदी है आज तो वहाँ सुबह से भाग गई है सालनी क साथ.

लल्लू- आप नहा लिए. या ओर नहाना है.

रागिनी काकी- देख ना बेटा. पीठ पर हाथ ही नही जाता वहाँ काफ़ी खुजली हो रही है पसीने क कारण.

लल्लू- दाँत निकल कर. में लगा डू साबुन आप की पीठ पर. ओर कोई तो है नही अभी यहाँ.

रागिनी काकी- हा बेटा ज़रा जल्दी से तू ही लगा दे.

लल्लू की तो लौटरी निकल पड़ी.
वो जल्दी से साबुन उठा कर काकी क पीठ पर मलने लगा पीछे से.
लल्लू साबुन मलते हुए कभी पीठ तो कभी कमर क पास जहा सारी ढीली हो कर नीचे आ गया था तोड़ा. वहाँ गंद क दोनो पाटो की लाइन दिख रहा था वहाँ मलने लगा.
फिर वो दोनो हाथो से काकी क कंधे को पीठ को ओर फिर हाथ को तोड़ा सा बगल से चुचि क उठान तक भी पहुचा कर च्छू लेता.
लल्लू को तो जैसे लग रहा था की आसमान में अर रहा है.

काकी- बस छोड़ दे बेटा हो गया. तुम ने बहुत मदद कर दी.
फिर काकी पानी डाल कर साबुन धोने लगी.
लल्लू हाथ धो कर वहाँ से आँगन में आ गया जहा ऋतु काकी उसे अजीब नज़रो से घूर रही थी.

ऋतु काकी- उसे अमृत पिला आया.

लल्लू- नही वो तो सिर्फ़ प्यारी काकी के लिए है.

ऋतु काकी- अरे वाहह ओर वो खुशनसीब प्यारी काकी कौन है.

लल्लू- वो आप को नही बताउन्गा. पहले उसे अमृत पिला दूँगा फिर आप को बताउन्गा.

ऋतु काकी- तो कब पिलाएगा उस प्यारी काकी को अमृत.

लल्लू- एक बार तो वो पी ली है आज रात लेकिन वो ऊपर से पी थी अबकी नीचे क मूह से पिलाउन्गा. तब आप को बताउन्गा.
मा घर से बाहर निकलते हुए.

मा- क्या बता रहा है अपनी प्यारी काकी को.

प्यारी काकी नाम सुन कर ऋतु ओर लल्लू दोनो घबरा गये.
ऋतु काकी- अरे कुछ नही. तुम्हे तो पता है इसका. ऐसे ही दिमाग़ खा रहा है मेरा.

मा- चल बाबू खाना तैयार है तेरा. सब खेत में इंतजार कर रहे होंगे. ले कर दे आ सब को.

लल्लू खाना ले कर ऋतु काकी को घूरता हुआ खेत पर चला गया.
वहाँ सब को खाना खिला दिया.

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