पिशाच की वापसी

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SATISH
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पिशाच की वापसी

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लेखक:- अज्ञात/सतीश

भाइयो यह मेरी कहानी नही है अच्छी लगी तो पोस्ट कर रहा हु, अगर यह कहानी किसी और नाम से इस फोरम पर हो तो बता दे...सतीश


पिशाच की वापसी – 1

रात का अंधेरा काला साया, खामोशी से भरा, हल्की हल्की गिरती बारिश की बूँदें. एक पतली सी सड़क और उस सड़क के दोनों तरफ घना जंगल, बारिश की वजह से सड़क गीली हो चुकी थी, तभी उस सुनसान सड़क पे एक इंसान नज़र आया जो धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था.

काले अंधेरे के साये में वह आदमी धीरे धीरे उस सड़क पे आगे बढ़ रहा था, उसने ब्लैक कलर का लंबा सा कोट पहना हुआ था, गर्दन में मोटा सा मफ्लर, हाथों में ब्लैक कलर के ग्लव्स पहन रखे थे और बारिश से बचने के लिए उसने छतरी ली हुई थी.. सड़क गीली होने की वजह से एक अजीब सी आवाज़ उस आदमी के चलने की वजह से आ रही थी, अजीब सी आवाज़ … पकच..पकचह… पकचह……पकचह, उस जगह पे इतनी शांति थी की वह इंसान इस आवाज़ को साफ साफ सुन पा रहा था, अचानक वह आदमी चलते चलते रुक गया और उसने अपनी गर्दन पीछे की तरफ घुमाई, उस इंसान ने आधे चेहरे पे कपड़ा बाँध रखा था, उसकी आँखों से देख के ऐसा लग रहा था मानो वह कुछ ढूँढ रहा हो, धीरे धीरे उसने अपने हाथ से चेहरे पे पहना मास्क हटाया, लेकिन पीछे देखने का कोई फायदा नहीं मिल रहा था क्यों की पीछे सिर्फ़ अंधेरा था और कुछ नहीं, उस आदमी ने फिर से अपनी नज़रे सामने की और की फिर वह सामने चलने लगा.

बारिश अब काफी धीमी हो चुकी थी, और ठंडी हवा धीरे धीरे चलने लगी, वह आदमी चलते चलते कभी अपने लेफ्ट देखता तो कभी राइट, उसके चेहरे पे हल्की सी घबराहट दिखाई दे रही थी.

माहौल ही कुछ ऐसा था, काला अंधेरा, सुनसान जगह, जहाँ सिर्फ़ एक इंसान के अलावा कोई ना हो ऐसे में अगर इंसान डरा हुआ हो तो ये पल काफी होता है किसी की भी दिल की धड़कने तेज करने के लिए, यही हुआ इस इंसान के साथ भी, आगे तो वह धीरे धीरे बढ़ रहा था पर उसके दिल की धड़कने उसके चलने से कई ज्यादा गुना तेज चल रही थी.

“11 बज गये, मुझे जल्दी पहुंच के सारेी बात अच्छे से बतानी पड़ेगी"
उसने टाइम देखते हुए अपने आप से कहा और बोलते हुए फिर आगे बढ़ने लगा की तभी उसे ऐसा आभास हुआ मानो उसके पीछे कोई हो और उसके साथ साथ उसके पीछे चल रहा हो, उस आदमी की दिल की धड़कने और तेज हो गयी, चेहरे पे घबराहट की लकीरें और फैल गयी, उसके माथे की शिकन फैल गयी, उसकी साँसें तेज चल रही थी, पर फिर भी वह चले जा रहा था, लेकिन कुछ ही सेकेंड वह आगे चला था की वह रुक गया, क्यों की उसके दिमाग और उसके मन से अभी तक वह डर नहीं गया था, उस अभी तक लग रहा था की कोई उसके पीछे चल रहा है, वह रुकते ही पीछे घूम गया और एक बार फिर से उस काले अंधेरे में देखने की कोशिश करने लगा, लेकिन जब उसे लगा की कोई नहीं है वह वापिस घूमके चलने लगा.

धीरे धीरे चल रही हवा तेज होने लगी, हवा चलने की वजह से पेड़ों की आवाज़ ने उस जगह को खामोशी से बाहर निकल लिया.

वह आदमी कुछ बड़बड़ाते हुई आगे बढ़ रहा था, उसके चेहरे पे घबराहट अभी तक बननी हुई थी..

"कौन है"
अचानक वह चलते चलते रुक गया और एक दम से चिल्ला पड़ा,
“कौन है"
इधर उधर देखते हुए वह फिर से एक बार चिल्लाया. लेकिन कुछ नहीं था, हवा के चलने की वजह से वहां पेड़ों के पत्ते हिल रहे थे और उसके अलावा कुछ नहीं.

उस आदमी ने अपने चेहरे को अपने हाथों से सहलाया,

"क्या हो गया मुझे, ये सब सिर्फ़ उन सब चीज़ों की वजह से हो रहा है जो 2 दिन से में सुन रहा हूँ, देख रहा हूँ, ये सब उसी का असर है"

अपने आप से कहते हुए एक बार फिर वह चलने लगा और कुछ सोचने लगा ….


दूसरी तरफ……

घर के हॉल में बहुत से आदमी ज़मीन पे बैठे थे और आपस में बातें कर रहे थे, उनकी आवाज़ से उस हॉल में अजीब सा शोर गूँज रहा था की तभी..

"अरे साहब आ गये"

एक आदमी हाथ जोड़ के खड़े होते हुए बोला, उसके साथ में सभी खड़े हो गये.

उन सब के सामने एक आदमी खड़ा था जो देखने में करीब 30-35 साल का नॉर्मल सा इंसान लग रहा था, गर्म कपड़े पहन रखे थे, वह सीधा चलता हुआ आया और कुर्सी पे आकर बैठ गया.

"छोटू ज़रा आग को थोड़ा और बड़ा दे, ठंड कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी है"

उस आदमी ने अपने नौकर से अपनी वज़नदार आवाज़ में कहा, और फिर सामने सभी को देखने लगा.

"जी साहब, लकड़ियाँ पीछे वाले कमरे में है, में अभी लेकर आता हूँ"

बोल के वह निकल गया.

“आप लोग खड़े क्यों है बैठ जाइये"

उस आदमी ने सामने खड़े लोगों को बैठने के लिए कहा, सभी ज़मीन पे बिछे कार्पेट पे बैठ गये.

"कहिए ऐसी क्या जरूरी बात करनी थी जो आप सब यहाँ तक आए वह भी इस ठंड में"

"हम वहां काम नहीं कर सकते"

एक आदमी थोड़ा गुस्से में खड़े होते हुई बोला.

“काम नहीं कर सकते पर क्यों, क्या वजह है"

कुर्सी पे बैठे आदमी ने जवाब बड़ी नर्मी से दिया.

"वजह नहीं पता आपको, पिछले 2 दीनों में क्या क्या हुआ है वहां उसके बारे में आपको कुछ नहीं पता है,या फिर पता होते हुए भी हमसे छुपाने का नाटक कर रहे हैं"

फिर से वह आदमी थोड़ी ऊंची आवाज मैं बोला.

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Re: पिशाच की वापसी

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पिशाच की वापसी – 2


"देखो मुझे कुछ नहीं पता है, तुम क्या कहना चाहते हो साफ साफ बताओ"

नर्मी से एक बार फिर से जवाब आया.

"ये चुप हो जा, बडे साहब से बात करने की तुझे तमीज है की नहीं"

दूसरे आदमी ने उसका हाथ पकड़ के उसे कहा.

"माफ करना साहब, जवान खून है जोश में थोड़ा ऊंचा बोल गया, ये नहीं ध्यान रहा की मजदूर और मालिक में बहुत फर्क होता है"

उस आदमी ने सामने हाथ जोड़ के माफी माँगी

"कोई बात नहीं, तुम ये सब छोड़ो और ये बताओ आख़िर क्या हुआ है, जो तुम सब इतने घबराए हुए लग रहे हो मुझे”

"बात ही कुछ ऐसी है साहब की जिसे सुन और देख के घबराहट की लहर हम सभी के शरीर में दौड़ रही है"
उस आदमी ने थोड़ी धीमी आवाज़ में कहा, उसने आगे कहना शुरू करा और कहते कहते उसके चेहरे के भाव बदलने लगे.

"जिस जगह पे हम काम कर रहे हैं साहब, वहां कुछ बहुत गलत चीज़ है, कोई है जो हमें काम करने देना नहीं चाहता, कोई है जो हमें चेतावनी दे रहा है वहां से चले जाने की"

“कोन है वह"?

कुर्सी पे बैठे आदमी ने भी धीमी आवाज़ में पूछा..

"शायद कोई शैतान है साहब, क्यों की एक शैतान ही ऐसे काम कर सकता है”

"कैसे काम की बात कर रहे हो तुम, क्या हुआ है वहां”

"मौत, मौत हुई है वहां, वह भी कोई आम मौत नहीं साहब, दर्दनाक मौत"

मौत का नाम सुनते ही कुर्सी पे बैठे आदमी की आँखें बड़ी हो गयी, मानो उसे बहुत बड़ा झटका दिया हो अभी..

“मौत, शैतान, क्या बोल रहे हो रघु तुम, मुझे अभी तक कुछ समझ नहीं आया, आख़िर हुआ क्या है मुझे साफ साफ क्यों नहीं बता रहे हो तुम लोग"

इस बार थोड़ी ऊंची आवाज़ में कहा.

एक पल के लिए वहां शांति हो गयी, रघु भी चुप था, कुर्सी पे बैठा आदमी और ज़मीन पे बैठे सारेे आदमी रघु की तरफ देख रहे थे और रघु अपनी बात को कहने के लिए शब्द ढूँढ रहा था.

आख़िर उसने कहना शुरू किया……….

"साहब कल की बात है जब हम सब वहां काम के लिए पहुंचे ………."

रघु ने आगे बताना शुरू किया….

सुबह का समय, अच्छा ख़ासा दिन निकल रहा था, सूरज ने उस जगह पे अपनी अच्छी छाप छोड रखी थी.

खुली जगह, जगह की हालत काफी बिगड़ी हुई थी, और शायद तभी उस बड़ी सी जगह पे शोर हो रहा था, काम होने का शोर.

काफी सारे आदमी वहां लगे हुए थे काम में, कोई पेड़ काट रहा था तो कोई एक तरफ खुदाई कर रहा था, कोई मिट्टी उठा उठा के ट्रक में डाल रहा था, सब अपना काम कर रहे थे, कोई उस आधे घने जंगल में काम कर रहा था, जहाँ काफी कम पेड़ बचे थे, तो कुछ लोग एक कुछ खुदायी का काम कर रहे थे …

ये सब करते हुए सुबह शाम में कब बदली पता ही नहीं चला, एक एक कर के उस जगह से सारे आदमी जाने लगे, उस जगह पे चल रहा शोर, धीरे धीरे कम होने लगा, लेकिन अब भी कोई था जिसने उस जगह पे अपना काम जारी रखते हुई उस शोर को बना रखा था …

ककचह…….ककचह……ककचह…….ककचह……..ककचह……….ककचह… ककककचह……..ककककचह……ककककचह……कककचह……ककचह….. लगातार एक के बाद एक प्रहार ज़मीन पे करता हुए एक मजदूर अपने काम में लगा हुआ था, मिट्टी खोदते खोदते उसका आधा शरीर इस वक्त उस गढ्ढे में था जो वह खोद के बना चुका था..

"अरे कालू टाइम हो गया है"

थोड़ी दूर से एक आदमी चील्लाया

"हाँ पता है बस 5 मिनट दे, इसे पूरा कर लू"

चील्लाते हुए उसने एक बार फिर ज़मीन पे जब मारा तो इस बार मिट्टी की नहीं किसी और चीज़ की आवाज़ आई.

कालू ने उस जगह पे दुबारा मारा तो फिर वही आवाज़ आई, फिर वह झुका और उसने अपने हाथ से उस जगह की मिट्टी हटाने लगा, जैसे जैसे उसने मिट्टी हटानी शुरू की वैसे वैसे उसकी आँखों के सामने उसे कुछ चमकता हुआ नज़र आने लगा…

मिट्टी हटते ही उसके सामने चमकदार चीज़ आ गयी, जो सूरज की रोशनी में और ज्यादा चमक रही थी, कालू के चेहरे पे बड़ी सी मुस्कान आ गयी जब उसने उस चमकती चीज़ को देखा, फिर उसने धीरे धीरे अपने हाथ उस चीज़ की तरफ बड़ाये, धीरे धीरे वह हाथ उस चीज़ पे पहुंच रहे थे

"अरे चल भी शाम होने को आई, घर जाते जाते देर हो जायेगी"

फिर से दूर से एक आदमी की चिल्लाने की आवाज़ आई.

"तू चल में आ रहा हूँ"

कालू ने गर्दन घुमा के कहा और फिर उस चमकदार चीज़ को देखने लगा, और अपने हाथ को उस तरफ ले जाने लगा, आख़िर उसने उस चमकदार चीज़ को अपने हाथों से पकड़ा और उठा लिया, जैसे ही उसने उस उठाया ……….

"आआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआ……….."

एक दर्दनाक आवाज़ ने उस जगह को घर लिया…….

ककचह…….ककचह……ककचह…….ककचह……..ककचह……….ककचह… ककककचह……..ककककचह……ककककचह……कककचह……ककचह….. लगातार एक के बाद एक प्रहार ज़मीन पे करते हुए एक मजदूर अपने कम में लगा हुआ था, मिट्टी खोदते खोदते उसका आधा शरीर इस वक्त उस गढ्ढे में था जो वह खोद के बना चुका था..

"अरे कालू टाइम हो गया है"

थोड़ी दूर से एक आदमी चिल्लाया,

"हाँ पता है बस 5 मिनट दे, इसे पूरा कर लू"

चील्लाते हुए वह एक बार फिर काम में लग गया.

जैसे ही उसने दुबारा खोदना स्टार्ट किया, अचानक ही वहां के वातावरण में बदलाव होने लगा,धीरे धीरे हवा के शोर ने वहां कदम रख लिया, एक तरफ कालू मिट्टी हटा के गढ़ा खोदने में लगा हुआ था, दूसरी तरफ हवा आवाज़ करते हुए तेज चलने लगी.

"अचानक से इतनी हवा"
दूसरा आदमी जंगल से बाहर निकल रहा था, उसे भी उस ठंडी हवा का एहसास होने लगा, उसने अपने शरीर पे हाथ बाँध लिए जिससे वह हवा से बच सके.

ककचह … कककच…. कालू अपने काम में लगा हुआ था, गढ्ढा गहरा होता जा रहा था, हवा भी तेज होती जा रही थी.

"अरे. का…लू.. चल आजा"

उस दूसरे आदमी ने कपकपाते स्वर में कहा, उसे अपने बदन पे वह ठंडी हवा अब चुभने लगी थी, उसका शरीर कांप रहा था, उसने अपनी नज़रे आसमान की तरफ की, तो उसने पाया की धीरे धीरे ढलता सूरज नीले बादलों में खोता जा रहा था, नीले घने बदल आगे की तरफ बढ़ने लगे.

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पिशाच की वापसी – 3


“हाँ बस हो गया, आया"

बोलने के लिए कालू रुका और फिर उसने हाथ उप्पर उठाकर ज़मीन पे दे मारा, लेकिन इस बार मिट्टी की आवाज़ नहीं किसी और चीज़ की आवाज़ आई, कालू कुछ सेकेंड ऐसे ही खड़ा कुछ सोचता रहा, उसने एक बार फिर हाथ उठाया और उस जगह पे दुबारा मारा तो फिर वही आवाज़ आई, आवाज़ से उसके चेहरे पे थोड़ी शिकन आ गयी, वह झुका और हाथ से मिट्टी को हटाने लगा, जैसे जैसे उसने मिट्टी हटानी शुरू की वैसे वैसे उसकी आँखों के सामने उस कुछ चमकता हुआ नज़र आने लगा…

इधर वह आदमी आसमान में देख रहा था, जहाँ अभी साफ मौसम था अब वहां घने नीले बादलों ने उस जगह पे क़ब्ज़ा कर लिया था, हवा भी जोरों से चल रही थी, ये सब देख के उस आदमी की शकल पे थोड़ी सी घबराहट उभर आई थी.

इधर कालू ने मिट्टी हटा दी और उसके सामने एक चमकदार चीज़ आ गयी जिसे देख के,कालू के चेहरे पे बड़ी सी मुस्कान आ गयी, फिर उसने धीरे धीरे अपने हाथ उस चीज़ की तरफ बड़ा ये, धीरे धीरे वह हाथ उस चीज़ पे पहुंच रहे थे, जा रहे थे और जैसे ही उसने उस चीज़ को छुआ,

कड़दड़… कड़कड़कड़…..कद्द्द्दद्ड…कड़कड़कड़……. वहां ज़ोरदार बिजली कड़कने लगी, बादलों की वजह से जो अंधेरा वहां हुआ था, अब बिजली की वजह से रोशनी हो रही थी, ये दृश्य देख के दूर खड़े आदमी की तो हालत बुरी हो गयी, उसका हलक सुख रहा था, और यही हाल कालू का भी था वह भी एक पल के लिए सहम गया इस अजीब सी बिजली की कड़कने की आवाज़ सुन के.

"अरे चल भी कालू, देख नहीं रहा, लगता है कोई बहुत बड़ा तूफान आने वाला है जल्दी कर मुझे बहुत घबराहट हो रही है"

वह आदमी जैसे तैसे कर के कांपती आवाज़ में चिल्लाया.

"हाँ हाँ बस हो गया"
कालू ने चिल्ला के कहा, और जिस चीज़ पे उसने अपना हाथ रखा हुआ था उस चीज़ को उठा लिया, जैसे ही उसने उसे उठाया, एक ज़ोरदार कड़कड़ाती हुई बिजली चमकी, जिसकी रोशनी में कालू का चेहरा और उसके हाथ में वह चीज़ भी चमक उठी.

दूसरी तरफ वह आदमी जंगल के बाहर खड़ा था, अचानक उस कुछ आभास हुआ,

"एका एक इतनी ठंड कैसे बढ़ गयी"

उसने अपने आप से कहा, और अपने हाथ मसलते हुई सामने देखने लगा और तभी उसकी आँखों के सामने एक बहुत ही अजीब वाक्य दिखाई दिया ….

सामने खड़े ट्रक पे धीरे धीरे बर्फ की कठोर चादर सी बिछने लगी, उसके देखते देखते ट्रक का शीशा बर्फ की कठोर चादर में अकड़ गया, ये देख के उस आदमी की सांस ही अटक गयी एक पल के लिए.शायद ये अभी कुछ नहीं था, तभी उसके कानों में कुछ अजीब सी आवाज़ पडी, वह फौरन पीछे घुमा और फिर जो उसने देखा उसके कदम खुद बीए खुद पीछे हटते चले गये, उसके सामना वाला पेड़ एका एक अजीब सी आवाज़ करते हुई ज़मने लगा, और यही हाल उसके बगल वाले पेड़ों का भी हुआ, बहुत ही अजीब और एक पल के लिए दिल दहला देने वाला दृश्य था उसके लिए, पर शायद अभी इसे भी ज्यादा होना बाकी था.

उधर कालू उस चीज़ पे से अच्छी तरह से मिट्टी हटा चुका था, और उस चीज़ को देख के उसके चेहरे पे एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी,

"सोने का लगता है, क्या पता कुछ और भी मिल जाए"

कालू की आँखों में लालच दिखाई दे रहा था.

उसने उस चीज़ को अपने कमर के अंदर अच्छे से फँसा लिया, और फिर मिट्टी हटाने लगा, कुछ ही सेकेंड हुए थे उसे मिट्टी हटाए की उसके चेहरे के भाव बदल गये, उसकी चेहरे की मुस्कान गायब हो गयी, माथे की शिकन बढ़ के गहरी होती चली गयी, और उसकी आँखें बिलकुल बड़ी होकर फटने को हो गयी और तभी बिजली की कड़कड़ने की आवाज़ में कालू की एक भयंकर चीख निकली ……. “आआआआआआआआआआआआ”

ये आवाज़ उस जगह पे एक पल के लिए गूँज उठी,

"ये तो कालू की आवाज़ है"
उस आदमी ने अपने आप से कहा,

"कालू, कालू,"

वह चीलाया, लेकिन फिर कोई आवाज़ नहीं आई,

"ये सब क्या हो रहा है, मुझे लग ही रहा था कोई गड़बड़ है, कालू क्या हुआ"

वह चीलाया पर कोई जवाब नहीं आया, फिर वह खुद ही जंगल के अंदर घुसने लगा.

इधर कालू गढ्ढे में से निकल के, भागने लगा, वह बोलना चाह रहा था पर उसके मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी, वह भाग रहा था, लेकिन जंगल खत्म नहीं हो रहा था, उधर वह आदमी उसके पास जाने की कोशिश कर रहा था, पर पहुंच ही नहीं पा रहा था, कालू पागलों की तरह भाग रहा था की तभी उसका पैर मुडा और वह नीचे गिर गया, ज़मीन पे गिर कर वह उठा और फिर भागने लगा, भागता रहा, लेकिन उस जंगल के बाहर का रास्ता ना मिला, वह भागता रहा, भागता रहा, अचानक उसका बैलेन्स फिर बिगड़ा और वह सीधे एक गढ्ढे में जा गिरा.

“आह"

उसके मुंह सी हल्की सी चीख निकली, गिरने की वजह से गढ्ढे में धूल फैल गयी, इसलिए कुछ सेकेंड वह कुछ नहीं देख पाया,


इधर वह आदमी अंदर घुसता चला जा रहा था, उसका दिल इस वक्त बुरी तरह से डरा हुआ था, अभी भी उसकी आँखों के सामने एक एक कर सारे पेड़ बर्फ की चादर को ओढे जा रहे थे, बड़ी मुश्किलों से वह आवाज निकाल पा रहा था
"कालू… कहाँ है"

वह कहता हुआ आगे तरफ रहा था.

“आख़िर मुझे रास्ता क्यों नहीं मिल रहा है"?

जब कुछ मिनट तक चलने के बाद भी उस आदमी को रास्ता नहीं मिला तो उसने अपने आप से कहा, वह फिर वहीं एक जगह खड़ा हो गया, और वहीं से वह कालू को आवाजें लगाने लगा.

जबकि, असल में उसके और कालू के बीच सिर्फ़ कुछ ही मीटर की दूरी थी, लेकिन ना दोनों एक दूसरे को देख पा रहे थे ना ही सुन पा रहे थे.

कालू गढ्ढे में गिरा हुआ था, जब वहां की धूल बैठ गयी तो उसने नज़रे उठा के इधर उधर देखा तो उसकी आँखें फट गयी, उसके बगल में उसी का वह समान रखा था, जहाँ वह थोड़ी देर पहले खुदाई कर रहा था, उसने फौरन अपने नीचे देखा जिसे देख के उसकी दिल की धड़कन बंद हो गयी, वह वहीं जम गया, वह कुछ कर पता उससे पहले, वह हवा में उप्पर की तरफ उड़ते हुई गढ्ढे से बाहर निकला और फिर ….

“आआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआआ"

एक चीख के साथ कालू जंगलों की गहराइयों में खोता चला गया, और इधर जो गढ्ढा खुदा हुआ था, उसमें अपने आप मिट्टी भरने लगी, इतनी तेजी सी मिट्टी भरने लगी की कुछ ही सेकेंड में वह गढ्ढा भर गया, और बिलकुल पहले जैसी ज़मीन हो गयी.

"ये तो कालू की चिल्लाने की आवाज़ है, हे भगवान क्या हो रहा है ये, कालू, कालू"

वह चिल्लाता हुआ इधर उधर देखने लगा और भागता हुआ जंगल की गहराई में खोता चला गया.

"कालू मिला की नहीं"?

कुर्सी पे बैठे आदमी ने बडे ही चिंता जनक स्वर में कहा

"नहीं साहब, कालू का कुछ नहीं पता वह कहाँ गया, अभी तक कुछ भी नहीं"

उस आदमी ने हल्की आवाज़ में कहा

कोई कुछ कह पाता उससे पहले,

“कडाअक्ककककक”,
एक आवाज़ हॉल में हुई, हॉल में बैठे सभी एक पल के लिए सहम गये, पर

"साहब लकड़ियाँ खत्म हो गयी है, बस इतनी ही मिली"

दरवाजे पे खड़े नौकर ने कहा.

“अच्छा ठीक है, कल याद से ले आना, अभी इसे जला दे"

कुर्सी पे बैठे आदमी ने राहत की सांस लेते हुए कहा.

"जी"
बोलते हुए वह लकड़ियाँ लेकर अपने काम में लग गया.

“वैसे वह आदमी जो कालू के साथ था, वह कहाँ है"?

बात को आगे बढ़ाते हुये उस आदमी ने कहा

"वह यहीं है साहब, ये रहा"
उस आदमी ने एक आदमी की तरफ इशारा किया, जिसने अपने चेहरे को आधा ढका हुआ था.



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