Thriller गहरी साजिश

Post Reply
adeswal
Pro Member
Posts: 3143
Joined: 18 Aug 2018 21:39

Re: Thriller गहरी साजिश

Post by adeswal »

‘‘वो ऐसा करना अफोर्ड नहीं कर सकता था। क्योंकि होश में आते ही चौहान को ये समझते देर नहीं लगती कि मंदिरा ने उसकी विस्की के साथ कोई छेड़खानी की थी। फिर मंदिरा के जरिए उसे डॉक्टर की खबर लग जाना क्या बड़ी बात थी। ऊपर से वो गायकवाड़ साहब को दुबई से दिल्ली बुला चुका था। वो एक ऐसा मौका था जो दोबारा चाहकर भी वो हासिल नहीं कर सकता था। ऐसे में उसने अपनी योजना को या तो उसी रोज अंजाम तक पहुंचाना था या फिर हमेशा के लिए सबकुछ भूल जाना था।‘‘
‘‘भूलना उसे गवारा नहीं था, लिहाजा अपने प्लान पर अमल करते हुए उसने मंदिरा की हत्या कुछ इस ढंग से कर दी ताकि वो किसी वहशी का काम लगे, किसी होमीसाइडल का काम लगे। कत्ल से पहले वो मंदिरा की गर्दन की कोई रग दबाकर उसे बेहोश कर चुका था, इसलिए उस काम में डॉक्टर को किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। ऊपर से जरा लाश की हालत पर गौर करें आप लोग, जिस तरह की दुर्गति लाश की गई थी, वो कोई आदमखोर ही कर सकता था। किसी आम आदमी के वश की बात वो हरगिज नहीं थी। मगर किसी डॉक्टर के लिए इंसानी जिस्म की चीर-फाड़ रोजमर्रा का काम होता है, इसलिए वो उस काम को बेहिचक अंजाम दे पाया था।‘‘
‘‘आगे चलकर मकतूला की स्टडी से कुछ ऐसे सूत्र बरामद हुए जो ये बताते थे कि कत्ल किए जाने से पहले वो मेज के पीछे अपनी चेयर पर बैठी हुई थी। ये वो खास बात थी जिसने चौहान की बेगुनाही का यकीन दिलाने में अहम रोल अदा किया था।‘‘
‘‘ऐसा भी क्या हाथ लग गया वहां से?‘‘ चौहान बोला।
‘‘मंदिरा की लाश से रूबरू होने और पुलिस के यहां पहुंचने के बाद जब मैं तुम्हारे फ्लैट पर पहुंचा तो मैंने तुम्हारी उस वक्त की हालत देखी थी। समझ लो बस सांस ही चल रही थी तुम्हारी, उसके अलावा तुम्हारे जिस्म में कोई हरकत नहीं थी - ऐसे में तुम्हारा कालकाजी से साकेत तक पहुंच पाना ही असंभव था, कत्ल करना तो दूर की बात थी - इसके बाद भी अगर तुम किसी तरह वहां पहुंचने में कामयाब हो गये तो - पीछे जो कुछ वो तुम्हारे साथ करके आई थी, उसके मद्देनजर तो उसने तुम्हारे लिए अपने घर का दरवाजा ही नहीं खोलना था। तुम ज्यादा जोर लगाते तो यकीनन वो पुलिस को कॉल कर देती - क्या ये क्या मानने वाली बात थी कि उसने बेखौफ होकर तुम्हे अपनी स्टडी में रिसीव किया और अपनी चेयर पर बैठी तुमसे बातें करती रही। यहां तक कि तुम मेज का घेरा काटकर उसकी तरफ पहुंच गये और उसे तुम्हारी नीयत पर शक तक नहीं हुआ।‘‘

‘‘इसकी क्या गारंटी की तब वो मेज के पीछे अपनी ईजी चेयर पर ही बैठी थी?‘‘
‘‘गारंटी है - नीलम बोली - मंदिरा को यकीनन तब बेहोश किया गया जब वो स्टडी में मेज के पीछे अपनी चेयर पर बैठी थी। क्योंकि बेहोश होकर जब वो आगे को गिरी तो उसका माथा मेज के किनारे से टकराकर घायल हो गया - वहां खून के निशान अभी भी मौजूद हैं - मेज और चेयर के बीच की दूरी ज्यादा होने की वजह से उसका बेहोश शरीर मेज पर टिके रहने की बजाय नीचे गिर गया। जिसे डॉक्टर ने दूसरी तरफ पहुंचकर घसीटकर बाहर निकाला था। ये बात भी स्टडी टेबल के निचले हिस्से के मुआयने से साबित हो चुकी है।‘‘
‘‘मंदिरा और सुनीता की हत्या में एक और खास बात थी, जो दोनों लाशों की हालत एक जैसी होने के बावजूद भी ये साबित करती थी कि दोनों हत्याओं के दौरान कातिल की मानसिकता जुदा थी - मैं वार्तालाप का सूत्र दोबारा अपने हाथ लेता हुआ बोला - पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर का कहना था कि मंदिरा की बॉडी को बहुत नपे-तुले अंदाज में नोंचा-खसोटा गया था, जबकि सुनीता गायकवाड़ के शरीर पर पूरी बर्बरता के साथ वार किये गये थी। उसकी वजह जरूर ये रही होगी कि मंदिरा को लेकर डॉक्टर के मन में कोई फीलिंग नहीं थी, जबकि दूसरी हत्या करते वक्त उसकी नफरत, उसके भीतर का जुनून उभरकर सामने आ गया था, इसलिए वहां पर उसने पूरी हैवानियत दिखाई थी।‘‘
‘‘बहरहाल मंदिरा की हत्या के बाद डॉक्टर ने चौहान की वर्दी में लगी नेम प्लेट उसकी मुट्ठी में दबाकर अपनी ओर खींचा तो वो फटकर मंदिरा की मुट्ठी में दबा रह गया। इसके बाद डॉक्टर ने वहां चौहान के जूते पहनकर - जो कि वो चौहान के घर से ही पहनकर आया हो तो कोई बड़ी बात नहीं थी - कुछ निशान छोड़े, जूतों के तले में जानबूझकर खून लगाया फिर यूनीफार्म को भी सामने की तरफ से मंदिरा के खून से रंगा। इसके बाद उसने पुलिस जांच में फक्चर डालने के लिए गोल्ड फ्लैक के दो सिगरेट सुलगाये, एक मकतूला के होठों के बीच लगाकर उसपर लिपस्टिक के दाग कायम किये, उसके बाद दोनों सिगरेट उसने खुद पिये और अधजले टुकड़े फेंककर वहां से चलता बना। जरूर उस वक्त वो हाथों में दस्ताने पहने था जिसकी वजह से घटनास्थल पर कहीं भी उसके फिंगरप्रिंट बरामद नहीं हुए।‘‘
‘‘वहां से डॉक्टर सीधा कालकाजी पहुंचा। तब या तो गायकवाड़ साहब के फ्लैट का दरवाजा इत्तेफाकन खुला था या फिर उसने बेल बजाकर दरवाजा खुलवाया और जबरन भीतर दाखिल हो गया। वहां भी उसने मकतूला को पहले कोई नपा-तुला वार करके बेहोश कर दिया फिर किसी दरिंदे की तरह उसे नोंचना-खसोटना शुरू कर दिया। उस काम से फारिग होकर उसने वहां भी चौहान की वर्दी को मकतूला के खून से रंगा और बाहर निकलकर चौहान के फ्लैट में दाखिल हो गया। जहां चौहान के कपड़े उतारकर उसे खून से रंगी वर्दी पहनाई और इमारत से बाहर निकलकर कहीं छिपकर खड़ा हो गया।‘‘
‘‘फिर क्या हुआ?‘‘
‘‘अब उसे इंतजार था गायकवाड़ साहब के वहां पहुंचने का जिनके बारे में वो निश्चिंत था कि छह बजे से पहले ये वहां नहीं पहुंचने वाले। आखिरकार ये पूर्व निर्धारित वक्त पर वहां पहुंचे तो वो मोटरसाइकिल पर सवार होकर एक पीसीओ पर पहुंचा, जहां से उसने इन्हें फोन किया और इनके मुंह से घटना की बाबत जाना। फिर डॉक्टर ने सलाह दी कि इन्हें फौरन घटनास्थल से कूच कर जाना चाहिए वो भी बिना किसी सामान के ताकि वहां से निकलते वक्त किसी की निगाह इनपर ना पड़े जो कि सूटकेस के साथ खिसकने में पड़कर रहनी थी। इन्होंने बगैर आगा-पीछा सोचे उसकी सलाह पर अमल किया और जाकर एक होटल में बुक हो गये। आगे पुलिस ने जब इनको दुबई के इनके ऑफिस में फोन किया तो ऑपरेटर ने इनके निर्देशानुसार वो कॉल इनके मोबाइल पर ट्रांसफर कर दी जिसपर बात करते वक्त इन्होंने यही जाहिर किया कि ये तब दुबई में थे।‘‘
‘‘अंकुर रोहिल्ला के कत्ल की नौबत क्योंकर आई?‘‘
‘‘बताया तो था, उसने डॉक्टर को मंदिरा के फ्लैट में दाखिल होते देख लिया था, लिहाजा बाद में वो पुलिस को डॉक्टर के बारे में बता सकता था। भले ही वो डॉक्टर को बाई नेम नहीं पहचानता था मगर उसका हुलिया तो बयान कर ही सकता था। बाद में जब पुलिस कत्ल से संबंधित लोगों से उसका आमना-सामना कराती तो उसने डॉक्टर को झट से पहचान लेना था।‘‘
‘‘अगर ऐसा था तो डॉक्टर ने फौरन उसका कोई इंतजाम क्यों नहीं कर दिया। उसका कत्ल तो दो दिन बाद हुआ था, इतने वफ्ते में तो वो सौ बार पुलिस को कातिल के बारे में बता सकता था।‘‘
‘‘इस बारे में मेरा अपना अंदाजा ये है कि डॉक्टर को अंकुर रोहिल्ला तक पहुंच बनाने में इतना वक्त लग गया। डॉक्टर के घर की तलाशी लेने पर मुझे वहां से एक बंगले का नक्शा मिला था, जो मेरा दावा है कि अंकुर रोहिल्ला के बंगले का था। लिहाजा वो नक्शा उसने एमसीडी के दफ्तर से या किसी और सोर्स के जरिये हांसिल किया हो सकता है। उस काम में भी उसे वक्त लगा होगा। फिर डॉक्टर के लिए फौरन उसका कत्ल कर देना भी जरूरी नहीं था क्योंकि वो जानता था कि अंकुर रोहिल्ला को नहीं पता था कि वो कौन था। लिहाजा उसके बताये हुलिए के आधार पर अगर पुलिस किसी को गिरफ्तार करती तो वो गायकवाड़ साहब थे, क्योंकि उस वक्त वो एक ऐसी बिग लगाये हुए था जिसके बाल तांबें की रंगत के थे जो कि इस केस से संबंधित लोगों में इनके अलावा किसी के नहीं हैं, ऊपर से कद-काठ के लिहाज से भी ये डॉक्टर के बराबर ही दिखाई देते हैं।‘‘
‘‘फिर भी, अंकुर क्यों अपनी जुबान बंद किये था।‘‘
‘‘इसकी दो वजह हो सकती है, पहली ये कि उसे एहसास तक नहीं हुआ कि जिस व्यक्ति को उसने मंदिरा के फ्लैट में घुसते देखा था वो मंदिरा का हत्यारा हो सकता था। दूसरी वजह ये थी कि वो किसी भी हाल में खुद का नाम मंदिरा के साथ जुड़ना अफोर्ड नहीं कर सकता था। जरा उसकी स्थिति पर गौर करो, वो ना सिर्फ मंदिरा का रजिस्टर्ड पति था बल्कि उसके पेट में पल रहे बच्चे का बाप भी था और दूसरी तरफ वो एक करोड़पति बिजनेस मैन की बेटी से शादी का ख्वाब देख रहा था। ऐसे में अगर वो पुलिस की नजरों में आ जाता तो पुलिस उसका आगा-पीछा टटोले बिना नहीं रहती और तब उन्हें ये पता लग जाना कि अंकुर रोहिल्ला मंदिरा का कानूनी पति था, महज वक्त की बात होती। ऐसे में उसकी शादी तो खटाई में पड़ जानी थी। लिहाजा उस बाबत उसने चुप्पी अख्तियार करने में ही भलाई समझी। ऊपर से मंदिरा उसके रास्ते का वो कांटा थी जो भविष्य में उसे बहुत डैमेज कर सकती थी, वो अपनी शादी का हवाला देकर उसे ब्लैकमेल तक कर सकती थी। ऐसे में मंदिरा का चैप्टर क्लोज हो जाना तो उसके लिए किसी खुदाई मदद की तरह था। फिर वो क्यों अपनी हालत आ बैल मुझे मार वाली बनाता! लिहाजा उसने अपनी जुबान बंद रखी।‘‘
‘‘वो बिना सिक्योरिटी गार्ड की निगाहों में आये, अंकुर रोहिल्ला के बंगले में घुसने में कैसे कामयाब हो गया।‘‘
‘‘सॉरी, इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं है।‘‘
adeswal
Pro Member
Posts: 3143
Joined: 18 Aug 2018 21:39

Re: Thriller गहरी साजिश

Post by adeswal »

‘‘शुक्र है! - इतनी देर से खामोश बैठी शीला ने आखिर अपनी चुप्पी तोड़ी - कोई तो ऐसी बात है जो इस शेरलॉक होम्स को नहीं मालूम! वरना मैं तो सोच रही थी कि पुलिस को मुजरिम का रिमांड लेने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। उससे पूछताछ में अपना वक्त जाया करने की बजाय पुलिस सीधा तुम्हारी बातों के आधार पर एक बयान तैयार करके उसपर मुजरिम के साइन कराकर कोर्ट में पेश कर देती और जज साहब भी जब ये सुनते कि वो तुम्हारी डिटेक्टिव रीजनिंग है, तो बिना ट्रायल ही उसे तुरत-फुरत में फांसी पर लटकाने का हुक्म सुना देते। जहां साइड में एक बड़ा सा बोर्ड भी लगा होता जिसपर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा होता - फेमश पीडी विक्रांत गोखले उर्फ बकवास वाला के सौजन्य से!‘‘
मैंने घूर कर उसे देखा! वो परे ताकने लगी।
‘‘इस केस में सबसे अहम बात ये रही कि कत्ल करने से पहले हर बार डॉक्टर ने मामले को उलझाने के लिए एक बलि का बकरा तैयार किया। अंकुर रोहिल्ला के कत्ल में उसने मुकेश सैनी को बकरा बनाया और मिस्टर शाह के हवाले से फोन करके ऐन कत्ल के वक्त इसे बंगले में बुला लिया - कहकर मैं सैनी से मुखातिब हुआ - बताओ भई, सब लोग बेकरार हैं तुम्हारी अक्लमंदी की कहानी सुनने को।‘‘
उसने बताया, सारी बात अक्षरसः दोहरा दी।
‘‘रंजना चावला - महीप शाह बोला - डॉक्टर ने उसे क्यों मारा?‘‘
‘‘मंदिरा के मोबाइल की वजह से! जो कि इत्तेफाकर कत्ल के दो-तीन दिन बाद उसके हाथ लग गया। ऐसे में जब उसने मोबाइल को खंगालना शुरू किया तो एक ऐसी रिकार्डिंग उसके हाथ लग गई जिसे सुनकर उसने अंदाजा लगाया कि हो ना हो उस रिकार्डिंग में उसकी बहन का आखिरी वार्तालाप कातिल के साथ हो रहा था। जिसे सुनकर वो इतनी उतावली हुई कि उसने केस से संबंधित सभी लोगों को फोन करके उनकी आवाज सुननी शुरू कर दी। ये अंदाजा लगाने के लिए कि वो आवाज किसकी आवाज से मैच करती थी। ऐसी ही एक काल उसने गायकवाड़ साहब को भी की, जब इनकी आवाज कातिल के आवाज से मैच नहीं हुई तो उसने इन्हें मोबाइल की बरामदगी के बारे में बताते हुए ये भी कह सुनाया कि यूं वो मोबाइल में मौजूद आवाज को चेक करने की कोशिश कर रही थी कि वो आवाज किसकी थी।‘‘
‘‘काल डिस्कनैक्ट होने के बाद किसी वक्त इनके पास घोस्ट फोनकर्ता - जो कि अब हम जानते हैं कि डॉक्टर खरवार था - की काल आई तो इन्होंने मोबाइल से संबंधित सारी बात उसे कह सुनाई, आखिर इनकी निगाहों में वो इनका तारनहार था। इन्हें कत्ल के केस में लपेटे जाने से बचाने की कोशिश कर रहा था।‘‘
‘‘इनके मुंह से सारी बात सुनने के बाद यकीनन डॉक्टर के होश फाख्ता हो गये होंगे! उसने आनन-फानन में रंजना चावला का कत्ल करने का फैसला कर लिया। आखिर अब तक वो तीन हत्याओं को सफलता पूर्वक अंजाम दे चुका था, लिहाजा हौसला तो बढ़ना ही था। यहां हमें डॉक्टर की सूझ-बूझ की तारीफ करनी पड़ेगी! भले ही उसने रंजना के कत्ल का प्लान आनन-फानन में बनाया था, फिर भी वो एक की बजाय दो बलि के बकरे तैयार करने में कामयाब हो गया। उसने रजनीश अग्रवाल को मंदिरा का वकील बनकर फोन किया और उसे बताया कि मंदिरा चावला अपनी वसीयत में उसके पिता के नाम का जिक्र करके गई है, जिसके अनुसार उसे एक लाख रूपये मिलने थे। जबकि मुकेश सैनी को फोन करके ये झांसा दिया कि वो कोई बीमा कराना चाहता था, इसलिए येे ठीक चार बजे उसके बताये पते पर पहुंच जाए। जो कि बाद में मंदिरा चावला के आवास का पता निकला था। ये अलग बात थी कि उसकी ये स्कीम बैक फायर कर गई। रजनीश अग्रवाल वहां वक्त पर पहुंच नहीं पाया और मुकेश सैनी वहां पहुंचकर भी वापिस लौट गया था।
कहकर मैंने उन्हें रजनीश अग्रवाल और कथित वकील के बीच हुए वार्तालाप के बारे में बता दिया। फिर मुकेश सैनी ने अपने साथ घटित हुआ तमाम किस्सा बयान किया।
‘‘यहां मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहता हूं - मैं महीप शाह से मुखातिब हुआ - रंजना के कत्ल के वक्त तुम वहां क्या कर रहे थे।‘‘
‘‘हुआ यूं कि उसने जब मुझे बताया कि मंदिरा का मोबाइल उसके हाथ लग गया है जिसमें कातिल के साथ उसका आखिरी वार्तालाप रिकार्ड है, तो सस्पेंस का मारा मैं वो आवाज सुनने को इतना उतावला हो उठा कि उसी वक्त मोटरसाइकिल उठाकर साकेत के लिए रवाना हो गया। वहां पहुंचकर जब मैंने बाहर एक कार खड़ी देखी तो मुझे समझते देर नहीं लगी कि उस वक्त कोई और भी वहां मौजूद था। लिहाजा उससे मिलने का अपना प्लान मैंने मुल्तवी कर दिया और वापिस लौट गया।
‘‘बहरहाल! - मैं वार्तालाप का सूत्र एक बार फिर अपने हाथों में लेता हुआ बोला - हकीकतन रजनीश अग्रवाल को की गई वो आखिरी कॉल ही डॉक्टर की गिरफ्तारी की वजह बनी। क्योंकि उसने जिस दुकान से वो कॉल की थी, वहां बैठा लड़का अपनी उम्र से कहीं ज्यादा सयाना निकला। उसे ना सिर्फ डॉक्टर की मोटरसाइकिल का नंबर याद रह गया बल्कि उसने ये भी ताड़ लिया था कि वो उस वक्त हथियार बंद था। आगे सूरज सिंह नाम के उस लड़के ने वो तमाम जानकारी हमें दे दी, जिसके बिना पर बतौर कातिल, शैतान की पहली औलाद डॉक्टर उमेश खरवार की गिरफ्तारी संभव हो पाई। वरना तो उसकी तरफ किसी का ध्यान तक नहीं जाना था।‘‘
‘‘एक सवाल मेरा भी है।‘‘ नीलम तंवर बोली।
‘‘पूछो!‘‘
‘‘तुम्हारे बताये अनुसार डॉक्टर ने स्टडी की खिड़की से रंजना को गोली मारी थी, साथ ही उसने वहां चार्जिंग पर रखे मोबाइल पर भी एक गोली दाग दी थी, ताकि यूं अगर उसके भीतर कोई रिकार्डिंग मौजूद थी तो वो नष्ट हो जाती, ठीक!‘‘
‘‘ठीक!‘‘
‘‘अब मेरा सवाल ये है कि उसे क्या सपना आया था कि मंदिरा का मोबाइल और रंजना चावला दोनों उस वक्त स्टडी में मौजूद थे। जो वो नाक की सीध में चलता हुआ सीधा स्टडी केे पीछे वाली खिड़की तक जा पहुंचा! जवाब इस बात को ध्यान में रखकर देना कि रंजना चावला, स्टडी में सिर्फ मोबाइल लेने के लिए गई थी। यानि थर्टी सेकेंड भी इधर-उधर हुआ होता तो वो वापिस ड्राइंगरूम में पहुंच गई होती जहां कि तुम मौजूद थे।‘‘
‘‘उस बारे में मेरा अंदाजा ये है कि पहले डॉक्टर का इरादा मेन गेट से भीतर दाखिल होकर रंजना का कत्ल करने का रहा होगा। मगर वहां पहुंचने पर जब उसे मेरी कार मकान के सामने खड़ी दिखाई दी - जिसे यकीनन वो पहचानता था - तो उसने अपनी योजना में थोड़ा बदलाव किया और स्टडी के पीछे वाली गली में घुस गया। जिसके बारे में वो मंदिरा के कत्ल वाले दिन से ही जानता था। वहां पहुंचकर उसने रिवाल्वर के दस्ते से प्रहार करके खिड़की का कांच तोड़ दिया। आगे उसका इरादा कुछ देर वहां रूककर वापिस चले जाने का रहा हो सकता है। मगर तभी बदकिस्मती की मारी रंजना मोबाइल लाने के लिए स्टडी में दाखिल हुई और यूं डॉक्टर का काम आसान हो गया।‘‘
‘‘चलो मान ली तुम्हारी बात! मगर दो गोलियां चलाने के बाद भी उसे ये गारंटी कैसे हो सकती थी कि उसने जो मोबाइल तोड़ा था वो मंदिरा का ही था ना कि रंजना का, ना कि काले चोर का।‘‘
‘‘कोई गारंटी नहीं थी, मगर उस वक्त वहां से खिसक जाने के अलावा उसके पास कोई चारा भी तो नहीं था। ऐसी गारंटी मकान में दाखिल होकर वहां की तलाशी लेने से हो सकती थी। मगर उसे मालूम था कि भीतर मैं पहले से ही कुंडली मारे बैठा था।‘‘
‘‘और तुम कोई ऐसी तोप थे जिसपर रिवाल्वर की गोलियों का कोई असर नहीं होता। या डॉक्टर को तुम्हारा इतना लिहाज था कि वो तुम्हारा कत्ल करने की हिम्मत अपने भीतर नहीं जुटा पाया था।‘‘
‘‘ऐसा तो खैर नहीं था।‘‘
‘‘फिर!‘‘
‘‘फिर का जवाब मैं देता हूं - चौहान बोला - मेरे खयाल से रंजना चावला को शूट करते वक्त वो गोखले की हत्या का भी इरादा बना चुका था। तब जरूर उसे यकीन रहा होगा कि गोली चलने की आवाज सुनकर गोखले भागता हुआ स्टडी में दाखिल होगा। जहां डॉक्टर के लिए इसे शूट कर देना बायें हाथ का खेल होता। मगर वो इस महा कमीने जासूस के बारे में ये नहीं जानता था कि इसके लिये अपनी जान से बढ़कर दुनिया में कोई चीज अजीज नहीं थी। अपनी जान के आगे तो ये रंजना जैसी हजार को मरता हुआ देख सकता था। लिहाजा ये कमरे में घुसने की बजाय कातिल के स्टडी से बाहर निकलने का इंतजार करता रहा। ये बात तो इसे बाद में सूझी कि गोली खिड़की के बाहर खड़े होकर चलाई गई थी। नतीजा ये हुआ कि इसकी जान लेने का डॉक्टर का मंसूबा धरा का धरा रह गया। फिर कुछ क्षणों तक इसके स्टडी में दाखिल होने का इंतजार करने के बाद डॉक्टर वहां से फरार हो गया। जो कि उसकी मजबूरी थी, वो कत्ल करने के बाद मौकायेवारदात पर बने रहना अफोर्ड नहीं कर सकता था।‘‘
‘‘तो सही मौके के इंतजार में वो कहीं आस-पास छिपकर खड़ा हो सकता था, क्योंकि ये सुनिश्चित किये बिना तो उसको चैन नहीं मिलना था कि उसने मंदिरा का मोबाईल नष्ट कर दिया था।‘‘
‘‘हो सकता है उसने ऐसा किया भी हो। कत्ल के बाद वो कहीं आस-पास छिपकर मकान पर मुतवातर वॉच रख रहा हो। अगर ऐसा था तो यकीनन कत्ल के थोड़ी देर बाद उसने मुझे वहां पहुंचते देखा होगा, तब उसकी हिम्मत जवाब दे गई होगी और वो वहां से चलता बना होगा।‘‘
‘‘कैसा रहे अगर हम इस कहानी को यहीं समाप्त कर दें।‘‘ मैं अपना गिलास खाली करता हुआ बोला तो सभी ने मेरा अनुमोदन किया।
‘‘ग्रेट!‘‘ आखिरकार शीला के मुंह से निकल ही गया।
‘‘कौन मैं?‘‘
‘‘नहीं डॉक्टर! जिसने इतनी बड़ी साजिश को पूरी सफलता के साथ अंजाम देकर दिखाया। डॉक्टर वो कैसा था मैं नहीं जानती मगर उसकी दिमागी सूझ-बूझ के बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती।‘‘
बहरहाल डिनर के बाद सब लोग एक-एक करके वहां से विदा होने लगे।
सबसे आखिर में मैं, शीला, नीलम और गायकवाड़ एक साथ वहां से बाहर निकले। जाते-जाते गायकवाड़ एक लिफाफा मुझे इस हिदायत के साथ सौंप गया कि मैं उसके जाने के बाद ही उसे खोलूं।
मगर सस्पेंस बर्दाश्त नहीं हुआ, लिहाजा अभी वो सड़क तक पहुंचा ही था कि मैंने लिफाफा खोल लिया। भीतर से रैपिड इंवेस्टिगेशन के नाम से दो लाख का चैक बरामद हुआ - मेरा दिल वाह-वाह कर उठा - साथ में किसी डायरी से फाड़ा गया एक पेज स्टेपल किया हुआ था, जिसपर सिर्फ एक लाइन घसीटी गई थी, ‘जान से बढ़कर कोई चीज नहीं होती, वो तुमने मुझे वापिस लौटाई है, शुक्रिया।‘
☺ !! en !! ☺
chusu
Novice User
Posts: 666
Joined: 20 Jun 2015 16:11

Re: Thriller गहरी साजिश

Post by chusu »

sahi........................
Post Reply