विधवा माँ के अनौखे लाल

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rajsharma
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Re: विधवा माँ के अनौखे लाल

Post by rajsharma »

शाज़िया जो अपनी दोनों की दोनों चुचिया नंगी अपनों चूत गांड सब नंगी किए अपनी टाँगे फैलाये उस हॉल की एक सीट पे बैठी थी और उसके हाथ अभी भी उसके दोनों बेटो के लंड पर थी ..............

उनकी सीट प्रोजेक्टर के बिलकुल पास थी अगर कोई दर्शक पीछे की और आता या देखता तो शाज़िया की पुरे मिलकियत के दर्शन उसे हो जाते.....जो की एक खुली तिजोरी के माफिक थी..........
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जीशान - माँ क्या हुआ कुछ बोलती क्यों नहीं हो.....और शाज़िया की चूत को हाथ में ले कर मसल देता है शाज़िया आँखे बंद किए अपनी कमर उठा कर आह करती है और कहती है

शाज़िया - नजर घुमा कर देखो कौन औरत ऐसे नंगी बैठी होगी यहाँ....आह जीशान छोड़ न दर्द हो रहा है....ऊँगली कर ले मगर उसे निचोड़ मत ना आह बेटा.....

जीशान फटाक से अपनी दो उंगलिया उसकी गीली चूत में घुसा देता है
शाज़िया चिहुक जाती है और अनीस अपनी माँ के कमर को हल्का सा ऊपर की और उठा कर अपनी दो उंगलिया उसकी गांड में घुसा देता है जिसे शाज़िया बर्दास्त नहीं कर पाती और उसके मुह से एक हल्की मगर थोड़ी तेज चीख निकल जाती है ...........वो तो गनीमत रही की किसी ने देखा नहीं वरना बहुत कुछ हो सकता था.....

अनीस की दोनों उंगलिया शाज़िया की ताज़ी ताज़ी फटी हुयी गांड में घुसी हुयी थी और उसके गांड के छल्ले ने उसे बहुत ही जोर से पकड़ रखा था...

जीशान - क्या करती हो माँ कितनी जोर से चीखी थोड़ा बर्दास्त किया करो मेरी माँ...और हस देता है

शाज़िया जो दर्द से बेहाल थी क्योकि उसकी चूत में दो ऊँगली और गांड में दो दो उंगलिया अपनी चुचिया खोले.....वो भी एक सिनेमा हॉल की सीट पे बैठी थी....कहती है जिसकी गांड नयी नयी तुम्हारे इस मुसल से फाड़ी गयी हो उसे हगने पर भी दर्द होता है यहाँ तो तूमने एक तरह से अपनी लंड के छोटी हमशकल ऊँगली घुसा दी है.....दर्द नहीं होगा तो क्या होगा मजा आएअगा.....आह अनीस निकाल ले न....बेटा

अनीस - माँ मजा भी आएगा रुको तो सही...और ऊँगली हिलाने लगता है हलाकि हिलाने में बन रहा नहीं था फिर भी वो हिलाए जा रहा था मगर शाज़िया दर्द से और बेहाल होते जा रही थी और इधर जीशान ने भी अपनी ऊँगली हिलानी शुरू कर दी थी शाज़िया उनके लंड से हाथ हटा लेती है और उन दोनों के हाथो को पकड़ लेती है मगर केवल नाम के लिए.....वो दोनों ऊँगली करते हुए दुबारा से उसकी चूची की चूसने लगते है जिससे शाज़िया का दर्द और मजा दोहरा हो जाता है और कुछ ही पालो में शाज़िया की चूत और गांड रिसने लगती है और इन दोनो की उंगलिया लपालप अंदर बाहर होने लगती है

शाज़िया लगातार अपनी कमर उठाये हुए थी और अपनी टांगो को फैला रही थी और दोनों के हाथो के उंगलियों को अन्दर तक ले रही थी कुछ देर में शाज़िया एक बार दुबारा झड जाती है ...और जोर जोर से हाफ्ते हुए वही सीट पे बेहाल पस्त हो के फ़ैल जाती है और वो दोनों अपनी माँ को ऐसे देख के रोमांचित हो रहे थे....
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(शिद्द्त - सफ़र प्यार का ) ......(प्यार का अहसास ) ......(वापसी : गुलशन नंदा) ......(विधवा माँ के अनौखे लाल) ......(हसीनों का मेला वासना का रेला ) ......(ये प्यास है कि बुझती ही नही ) ...... (Thriller एक ही अंजाम ) ......(फरेब ) ......(लव स्टोरी / राजवंश running) ...... (दस जनवरी की रात ) ...... ( गदरायी लड़कियाँ Running)...... (ओह माय फ़किंग गॉड running) ...... (कुमकुम complete)......


साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
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rajsharma
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Re: विधवा माँ के अनौखे लाल

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(^%$^-1rs((7)
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