Diler mujrim ibne safi

Masoom
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Re: Diler mujrim ibne safi

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‘‘ख़ुफ़िया पुलिस.....!’’ वह इस तरह बोला जैसे कोई ख़्वाब में बड़बड़ाता है। ‘‘लेकिन क्यों...आखिर आप मुझसे क्यों मिलना चाहते हैं?’’

‘‘मैं तुम्हें परेशान करना नहीं चाहता, लेकिन तुम अगर मेरे सवालों का सही-सही जवाब दोगे तो फिर तुम्हें डरने की ज़रूरत नहीं। क्या तुम कल रात निशात नगर, डॉक्टर शौकत की कोठी पर गये थे?’’ फ़रीदी ने यह सवाल बहुत ही सादगी से पूछा। लेकिन इसका असर किसी बम के धमाके से कम न था। नेपाली तेज़ी से उछल पड़ा। फ़रीदी को अब पूरा यक़ीन हो गया।

‘‘नहीं-नहीं...!’’ वह कँपकँपाती हुई आवाज़ में चीख़ा।

‘‘तुम सफ़ेद झूठ बोल रहे हो...’’

‘‘मैं वहाँ क्यों जाता...नहीं...यह झूठ है...पक्का झूठ।’’

‘‘इससे कोई फ़ायदा नहीं मिस्टर...!’’ फ़रीदी बोला। ‘‘मैं जानता हूँ कि कल रात तुम डॉक्टर शौकत को क़त्ल करने गये और उसके धोखे में सविता देवी को क़त्ल कर आये। अगर तुम सचमुच बता दोगे तो मैं तुम्हें बचाने की कोशिश करूँगा, क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम्हें वहाँ किसी दूसरे ने क़त्ल करने के लिए भेजा था।’’

‘‘आप मुझे बचाने की कोशिश करेंगे।’’ वह बेबसी से बोला। ‘‘ओह, मेरे ख़ुदा...मैंने भयानक ग़लती की।’’

‘‘शाबाश! हाँ, आगे कहो।’’ फ़रीदी नर्म लहजे में बोला। सर्कस का मैनेजर उन्हें हैरत और ख़ौफ़ की नज़रों से देख रहा था।

नेपाली इन्स्पेक्टर फ़रीदी के इस अचानक हमले से पहले ही हथियार डाल चुका था। उसने एक बेबस बच्चे की तरह कहना शुरू किया...‘‘जी हाँ...मैं ज़रूर बताऊँगा। मगर मैं ब़ेकसूर हूँ। आपने कहा कि आप मुझे बचा लेंगे। उसने मुझे पचास हज़ार रुपये पेशगी दिये थे और क़त्ल के बाद पचास हज़ार रुपये और देने का वादा किया था। उफ़! मैंने क्या किया...उसका नाम...हाँ, उसका नाम है...अर्र..र्र...हा...उफ़...!’’ वह चीख़ कर आगे की तरफ़ झुक गया।

‘‘वह देखो...!’’ सार्जेंट हमीद चीख़ा।

किसी ने तम्बू के पीछे से नेपाली पर हमला किया था। ख़ंजर तम्बू के कपड़े की दीवार फाड़ता हुआ उसकी पीठ में घुस गया था। वह स्टूल पर बैठे-बैठे दो-तीन बार तड़पा और फिर देखते-ही-देखते फ़र्श पर जा गिरा।

‘‘हमीद...बाहर...बाहर...देखो, जाने न पाये।’’ इन्स्पेक्टर फ़रीदी ग़ुस्से में चिल्लाया।

चीख़ की आवाज़ सुन कर कुछ और लोग भी भागे आये। सब ने मिल कर क़ातिल को तलाश करना शुरू किया, लेकिन बेकार...मैनेजर घबराहट की वजह से बेहोश हो गया।

कोतवाली ख़बर पहुँचा दी गयी...थोड़ी देर बाद कई कॉन्स्टेबल और दो सब-इन्स्पेक्टर मौक़ा-ए-वारदात पर पहुँच गये।

इन्स्पेक्टर फ़रीदी को वहाँ देख कर उन्हें सख़्त हैरत हुई। फ़रीदी ने उन्हें सारा हाल बता दिया। मृतक के इक़रार-ए-जुर्म का गवाह मैनेजर था, इसलिए मैनेजर का बयान हो रहा था। इन्स्पेक्टर फ़रीदी और सार्जेंट हमीद का वहाँ रुकना समय नष्ट करने जैसा था, इसलिए दोनों वहाँ से रवाना हो गये।

उनकी कार तेज़ी से निशात नगर की तरफ़ जा रही थी।

‘‘क्यों भई, रहा न वही...चालीस रुपये वाले जासूसी नावेल वाला मामला?’’ फ़रीदी ने हँस कर कहा।

‘‘अब तो मुझे भी दिलचस्पी हो चली है।’’ हमीद ने कहा। ‘‘लेकिन यह तो बताइए कि आपको यक़ीन कैसे हुआ था कि वही क़ातिल है?’’

‘‘यक़ीन कहाँ, सिर्फ़ शक था, लेकिन मैनेजर से बातचीत करने के बाद कुछ-कुछ यक़ीन हो चला था कि साज़िश में किसी दूसरे का हाथ ज़रूर था। मैं यह भी सोच रहा था कि क़त्ल के सिलसिले में अपनी ग़लती का एहसास हो जाने के बाद ही से उसकी हालत ख़राब हो गयी थी। यही वजह थी कि खेल के वक़्त उसका हाथ बहक रहा था और अब उसे शायद उस आदमी का इन्तज़ार था, जिसने उसे क़त्ल के लिए बहकाया था। इस ग़लती की जवाबदेही के ख़याल ने उसे और भी परेशान कर रखा था। इन्हीं सब चीज़ों को मद्देनज़र रख कर मैंने ख़ुद पहले उसके तम्बू में जाना ठीक नहीं समझा। मैनेजर को अन्दर भेज कर मैं जाली से उसके हाव-भाव देखने लगा। जाली से तो तुम भी देख रहे थे।’’

‘‘बहरहाल, आज से मैं आपका पूरा-पूरा शागिर्द हो गया।’’ हमीद ने कहा।

‘‘क्या कहा, आज से...क्या पहले न थे?’’ फ़रीदी ने हँस कर पूछा।

‘‘नहीं, पहले भी था।’’ हमीद ने जवाब दिया और दोनों ख़ामोश हो गये। इन्स्पेक्टर फ़रीदी आगे के लिए प्रोग्राम बना रहा था।

फाटक पर कार की आवाज़ सुन कर डॉक्टर शौकत बाहर निकल आया था। इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने सारी कहानी उसे बता दी।

फिर फ़रीदी ने शौकत के कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा। ‘‘तुम्हारा असली दुश्मन अब भी आज़ाद है और वह किसी वक़्त भी तुम्हें नुक़सान पहुँचा सकता है। इसलिए अब भी तुमको सावधानी की ज़रूरत है। मैं कोशिश करूँगा कि असली मुजरिम को बहुत जल्दी गिरफ़्तार करके क़ानून के हवाले कर दूँ।’’

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क़ातिल की नयी चाल


इन्स्पेक्टर फ़रीदी को अफ़सोस था कि सरकारी तौर पर वह इस केस का इंचार्ज नहीं हो सकता था। अभी उसकी छुट्टी ख़त्म होने में दो महीने बाक़ी थे। उसे इस बात का भी ख़याल था कि दूसरे क़त्ल के बाद से इस मामले में उसकी दख़लअन्दाज़ी का हाल अफ़सरों को ज़रूर मालूम हो जायेगा, जो किसी तरह मुनासिब नहीं था। लेकिन उसे इसकी परवाह न थी। नौकरी की परवाह उसे न पहले कभी थी और न ही अब थी। यह नौकरी वह शौक़िया कर रहा था, वरना वह इतना दौलतमन्द था कि इसके बग़ैर भी अमीरों की-सी ज़िन्दगी ग़ुजार सकता था।

दूसरी वारदात के अगले दिन सुबह जब वह सो कर उठा तो उसे मालूम हुआ कि चीफ़ इन्स्पेक्टर साहब का अर्दली बहुत देर से उसका इन्तज़ार कर रहा है। पूछने पर पता चला कि चीफ़ साहब अपने बँगले पर बेसब्री से उसका इन्तज़ार कर रहे हैं और पुलिस कमिश्नर साहब भी वहाँ मौजूद हैं। फ़रीदी का माथा ठनका। लेकिन फ़ौरन ही उसने बेकार के ख़यालों को अपने ज़ेहन से निकाल फेंका और नाश्ता करने के बाद चीफ़ साहब के बँगले की तरफ़ निकल पड़ा।

‘‘हैलो फ़रीदी।’’ चीफ़ साहब ने उसको देखते ही तपाक से कहा। ‘‘हम लोग तुम्हारा ही इन्तज़ार कर रहे थे।’’

‘‘मुझे ज़रा देर हो गयी।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘इस वक़्त एक अहम मामले पर बातचीत करने के लिए आपको तकलीफ़ दी गयी है।’’ पुलिस कमिश्नर ने अपना सिगार केस उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा।

‘‘शुक्रिया।’’ फ़रीदी ने सिगार लेते हुए कहा। ‘‘फ़रमाइए।’’

‘‘मिस्टर फ़रीदी...चौबीस घण्टे के अन्दर इस इलाक़े में दो वारदातें हुई हैं। उनसे आप बख़ूबी वाक़िफ़ हैं।’’ पुलिस कमिश्नर साहब ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा। ‘‘और आप यह भी जानते हैं कि ट्रांसफ़र हो कर यहाँ आये हुए मुझे सिर्फ़ दस दिन हुए हैं। ऐसी सूरत में मेरी बहुत बदनामी होगी। सिविल पुलिस तो बिलकुल नाकारा है और मामला बहुत पेचीदा है। क्या ऐसा हो सकता है कि आप अपनी बाक़ी की छुट्टियाँ फ़िलहाल कैन्सिल करा दें और इसका ज़िम्मा मैं लेता हूँ कि क़ातिल का पता लग जाने के बाद मैं आपको दो की बजाय चार महीने की छुट्टी दिला दूँगा। यह मेरी दोस्ताना राय है। इससे अफ़सरी और महकमे का कोई ताल्लुक़ नहीं।’’

‘‘जी, मैं हर वक़्त और हर ख़िदमत के लिए हाज़िर हूँ।’’ फ़रीदी ने अपनी आरज़ू पूरी होते देख कर कहा।

‘‘बहुत-बहुत शुक्रिया।’’ पुलिस कमिश्नर साहब इत्मीनान की साँस ले कर बोले। ‘‘कल रात आप अपना बयान दे कर चले आये थे। इसके बाद नेपाली के तम्बू की तलाशी लेने पर चालीस हज़ार रुपये के नोट बरामद हुए, जो उसकी हैसियत से कहीं ज़्यादा थे। इन रुपयों के अलावा कोई और चीज़ ऐसी न मिल सकी, जिससे उसके क़ातिल का पता लग सकता। बहरहाल, सविता देवी के क़ातिल के सुराग़ का सेहरा तो आप ही के सिर है। लेकिन अब उसके क़ातिल के क़ातिल का पता लगाना बहुत ज़रूरी है और यह काम सिवा आपके और कोई नहीं कर सकता। मैंने कल रात ही ये दोनों केस डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन के ज़िम्मे कर दिये हैं अब इसके आगे का प्रोग्राम आपको चीफ़ इन्स्पेक्टर बतायेंगे।’’

‘‘और मैं तुमको इस केस का इंचार्ज बनाता हूँ।’’ चीफ़ इन्स्पेक्टर साहब ने, जो अब तक दोनों की बातें ग़ौर से सुन रहे थे, आगे कहा। ‘‘इसके काग़ज़ात दस बजे तक तुम्हें मिल जायेंगे।’’

‘‘यह तो आप जानते हैं कि मैं शुरू ही से केस की तफ़तीश कर रहा हूँ,’’ इन्स्पेक्टर फ़रीदी ने कहा, ‘‘और मैंने इस सिलसिले में अपना काम करने का तरीक़ा भी ढूँढ लिया है। लेकिन आपसे यह गुज़ारिश है कि आप यही ज़ाहिर होने दें कि मैं छुट्टी पर हूँ और यह मामला अभी तक डिपार्टमेंट ऑफ़ इनवेस्टिगेशन तक नहीं पहुँचा है।’’

‘‘तो इस केस में भी तुम अपनी पुरानी आदत के मुताबिक़ अकेले ही काम करोगे?’’ चीफ़ इन्स्पेक्टर पुलिस ने कहा। ‘‘यह आदत ख़तरनाक है।’’

‘‘मुझे अफ़सोस है कि कुछ कारणों के चलते मैं यह ज़ाहिर नहीं करना चाहता हूँ और मुझे यही तरीक़ा अपनाना पड़ेगा। अच्छा, अब इजाज़त चाहता हूँ।’’

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इन्स्पेक्टर फ़रीदी के घर पर सार्जेंट हमीद उसका इन्तज़ार कर रहा था। उसकी आँखों से मालूम हो रहा था जैसे वह रात भर न सोया हो। फ़रीदी के घर पहुँचते ही वह बेताबी से उसकी तरफ़ बढ़ा।

‘‘कहो.... ख़ैरियत तो है?’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘तुम कुछ परेशान से मालूम होते हो।’’

‘‘कुछ क्या...मैं बहुत परेशान हूँ।’’ हमीद ने कहा।

‘‘आखिर बात क्या है?’’

‘‘कल रात तक़रीबन एक बजे मैं आपके घर से रवाना हुआ। थोड़ी दूर चलने के बाद मैंने महसूस किया कि कोई मेरा पीछा कर रहा है। पहले तो ख़याल हुआ कि कोई राहगीर होगा, लेकिन जब मैंने अपना शक दूर करने के लिए यूँ ही बेमतलब गलियों में घुसना शुरू किया तो मेरा शक यक़ीन की हद तक पहुँच गया, क्योंकि वह अब भी मेरा पीछा कर रहा था। ख़ैर, मैंने घर पहुँच कर ताला खोला और किवाड़ बन्द करके उसकी झिरी से झाँकता रहा। मेरा पीछा करने वाला अब मेरे मकान के सामने खड़ा दरवाज़े की तरफ़ देख रहा था। फिर वह आगे बढ़ गया। मैं दबे पाँव बाहर निकला और अब मैं उसका पीछा कर रहा था। इस क़िस्म का पीछा कम-से-कम मेरे लिए नया तजरुबा था, क्योंकि पीछा करते-करते पाँच बज गये। ऐसा मालूम होता था जैसे वह यों ही आवारागर्दी करता फिर रहा है।

‘‘मुझे अफ़सोस है कि मैं उसका चेहरा न देख सका, क्योंकि उसने अपने चेस्टर का कॉलर खड़ा कर रखा था और उसकी नाइट कैप उसके चेहरे पर झुकी हुई थी। तक़रीबन पाँच बजे वह बॉटम रोड और बेली रोड के चौराहे पर रुक गया। वहाँ एक कार खड़ी थी। वह उसमें बैठा और कार तेज़ी से उत्तर की तरफ़ रवाना हो गयी। वहाँ उस वक़्त मुझे कोई सवारी न मिल सकी। इसलिए तीन मील पैदल चल कर आ रहा हूँ। रात से अब तक मैंने शायद पन्द्रह मील का चक्कर लगाया होगा।’’

‘‘तुम्हारी नयी कहानी तो बहुत दिलचस्प रही।’’ फ़रीदी कुछ सोचते हुए बोला।
फिर वह थोड़ी देर तक तो चुप रहा। उसकी आँखें इस तरह धुँधला गयीं जैसे उसे नींद आ रही हो। फिर अचानक उनमें एक तरह की वहशियाना चमक पैदा हो गयी और उसने एक ज़ोरदार क़हक़हा लगाया।
‘‘क्या कहा तुमने!’’ फ़रीदी बोला। ‘‘वह बॉटम रोड के चौराहे से उत्तर की तरफ़ चला गया?’’

‘‘जी हाँ।’

‘‘और तुम्हें शायद मालूम न होगा कि इसी चौराहे से अगर तुम दक्खिन की तरफ़ चलो तो पन्द्रह मील चलने के बाद तुम राजरूप नगर पहुँच जाओगे। अब मुझे यक़ीन हो गया है कि क़ातिल का सुराग़ राजरूप नगर ही में मिल सकेगा। देखो, अगर वह सचमुच तुम्हारा पीछा कर रहा होता तो तुम्हें इसका एहसास तक न होने देता। उसने जान-बूझ कर ऐसा किया ताकि तुम उसके पीछे लग जाओ और वह उसी चौराहे से दक्षिण की तरफ़ जाने की बजाय उत्तर की तरफ़ जा कर मेरे दिल से उस ख़याल को निकाल दे कि असली मुजरिम राजरूप नगर का रहने वाला है। ओह मेरे ख़ुदा, तो इसका मतलब है कि वह नेपाली के क़त्ल के पहले से हम लोगों के क़रीब रहा और उसने मैनेजर के दफ़्तर में भी हमारी बातचीत सुनी; वहीं राजरूप नगर की बात आयी थी। अख़बार में तो इसका कोई हवाला नहीं था...मुजरिम मामूली दिमाग़ का आदमी नहीं मालूम होता। क्या तुम उसका हुलिया बता सकते हो।’’

यह तो मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मैं उसका चेहरा नहीं देख सका।’’ हमीद ने कुछ सोच कर कहा। ‘‘लेकिन ठहरिए, उसमें एक ख़ास बात थी जिसकी बिना पर वह पहचाना जा सकता है। उसकी पीठ पर बड़ा-सा कूबड़ था।’’

‘‘अमाँ छोड़ो भी...कूबड़ कोट के नीचे बहुत-सा कपड़ा ठूँस कर भी बनाया जा सकता है। अगर वह सचमुच कुबड़ा होता तो तुम्हें पीछे आने की दावत ही न देता।’’

‘‘वल्लाह, आपने तो जेम्स बॉण्ड के भी कान काट लिये।’’ हमीद हँस कर बोला।

‘‘तुमने फिर वही जासूसी नावेलों के जासूसों के हवाले देने शुरू कर दिये।’’ फ़रीदी ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा।

‘‘सच! मैं मज़ाक नहीं उड़ा रहा हूँ।’’
ख़ैर, हटाओ....मैं इस वक़्त राजरूप नगर जा रहा हूँ।’’

‘‘यह आपने बहुत अच्छा किया कि आप अकेले राजरूप नगर जा रहे हैं। मैं रात भर नहीं सोया।’’

‘‘अगर तुम सोते भी होते तो भी मैं तुम्हें अपने साथ न ले जाता, क्योंकि तुम छुट्टी पर हो और मैंने अपनी छुट्टियाँ कैन्सिल करा दी हैं और यह केस सरकारी तौर पर मुझे दिया गया है।’’

‘‘कब से...?’’ हमीद ने हैरान हो कर पूछा।

‘‘अभी-अभी...!’’ फ़रीदी ने जवाब दिया और सारी बात बता दी।

‘‘तो फिर वाक़ई आप अकेले जायेंगे?’’ हमीद ने कहा। ‘‘अच्छा, यह तो बताइए कि आपने अपने काम करने का तरीक़ा सोच लिया है?’’

‘‘बिलकुल...!’’ फ़रीदी ने जवाब दिया। ‘‘कल रात मैंने तुम्हारे जाने के बाद ही राजरूप नगर के सिलसिले में बहुत-सी जानकारी हासिल की है। जैसे कि राजरूप नगर नवाब साहब वजाहत मिर्ज़ा की जागीर है और नवाब साहब बहुत ज़्यादा दिमाग़ी तौर पर बीमार हैं; मुझे यह भी मालूम हुआ है कि वे तक़रीबन पन्द्रह रोज़ से दिन-रात सो रहे हैं या दूसरे शब्दों में यह कहना चाहिए कि बेहोश हैं। उनके फ़ैमिली डॉक्टर की राय है कि सिर का ऑपरेशन कराया जाये। लेकिन उनका इलाज इस समय कर्नल तिवारी कर रहे हैं, जो पुलिस हस्पताल के इंचार्ज हैं, और वे ऑपरेशन के ख़िलाफ़ हैं। इस सिलसिले में जो दूसरी बात मालूम हुई है, वह यह है कि नवाब साहब के कोई औलाद नहीं है; उनके साथ उनका सौतेला भतीजा और उनकी बेवा बहन अपनी जवान लड़की के साथ रहती है। मुझे जहाँ तक पता चला है कि नवाब साहब ने अपनी जागीर के सिलसिले में अभी तक किसी प्रकार का कोई वसीयतनामा नहीं लिखा है। क्या यह मुमकिन नहीं कि उनकी बेवा बहन या सौतेले भतीजे में से कोई भी, इस जायदाद के लालच में, यह ख़्वाहिश नहीं रख सकता कि नवाब साहब होश में आने से पहले ही मर जायें? हो सकता है कि उसी मक़सद के तहत दिमाग़ी बीमारियों के मशहूर डॉक्टर शौकत को क़त्ल करा देने की कोशिश की गयी हो? महज़ इस डर से कि कहीं नवाब साहब उससे इलाज न करवाने लगें, क्योंकि उनका फ़ैमिली डॉक्टर ऑपरेशन पर ज़ोर दे रहा था।’’ फ़रीदी इतना कह कर ख़ामोश हो गया।

‘‘आपकी दलील में दम है।’’ हमीद बोला। ‘‘लेकिन आपका वहाँ अकेला जाना ठीक नहीं।’’

‘‘तुम मुझे अच्छी तरह जानते हो कि मैं अपने तरीक़े से काम करने का आदी हूँ; वह भी बिलकुल अकेला।’’ फ़रीदी ने हँस कर कहा। ‘‘और फिर तुमने अभी हाल ही में एक इश्क़ किया है। मैं तुम्हारे इश्क़ में गड़बड़ नहीं पैदा करना चाहता। वापसी में तुम्हारी महबूबा के लिए एक अँगूठी ज़रूर लेता आऊँगा। अच्छा, अब तुम नाश्ता करके यहीं सो रहो और मैं चला।’’



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