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Thriller Hindi novel अलफांसे की शादी

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Masoom
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Re: Hindi novel अलफांसे की शादी

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उसका चेहरा ही ऐसा था जिसे देखकर किसी भी अच्छे-खासे व्यक्ति के जिस्म में मौत की तरंगें नाच उठें—मुर्दे जैसा पीला और निस्तेज चेहरा, झुकी हुई लम्बी मूंछें, फ्रेंचकर दाढ़ी, छोटी किन्तु बेहद चमकीली आंखें, जिस्म की एक-एक हड्डी स्पष्ट चमक रही थी।
पुराने पाठक इस हुलिए से ही समझ सकते हैं कि वह कौन है?
हां, अपने नए पाठकों के लिए मुझे यहां उसका नाम जरूर लिखना पड़ेगा—इस पतले-दुबले और लम्बे व्यक्ति का नाम सिंगही है!
जी हां, सिंगही!
उपरोक्त पंक्ति में शायद ‘व्यक्ति’ लिखकर मैंने भूल की है—सिंगही को व्यक्ति नहीं, शैतान लिखना चाहिए—इस युग का सबसे बड़ा शैतान।
अपराध जगत का बेताज बादशाह माना जाता है उसे। उसका केवल एक ही ख्वाब है, विश्व विजय करना—एक ही लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वह भयंकर से भयंकर अपराध करता है और उसका एक ही लक्ष्य है—दुनिया को जीतना, सारी दुनिया पर अपनी एकछत्र हुकूमत कायम करना—भले ही इसके लिए उसे कुछ भी करना पड़े। अनेक बार वह अपने लक्ष्य के करीब तक पहुंच चुका है—परन्तु हरेक बार अपनी हल्की-सी चूक या दुर्भाग्य के कारण उसे असफल रह जाना पड़ा—फिर भी, उसने कभी शिकस्त स्वीकार नहीं की—प्रत्येक पराजय के बाद मुहम्मद गौरी की तरह उसने फिर से असीम शक्ति समेटकर दुनिया पर आक्रमण किया है।
सिंगही के दिमाग में केवल विनाशकारी बातें ही आया करती थीं, वह स्वयं वैज्ञानिक था और दूसरे वैज्ञानिकों के साथ मिलकर ऐसे-ऐसे आविष्कार करता, जिनके बूते पर दुनिया में विध्वंस फैला सके—दुनिया को अपने कदमों मैं झुका सके।
इस वक्त वह अपने गुप्त अड्डे की प्रयोगशाला में मौजूद था, चारों तरफ प्रयोग डेस्कें और वैज्ञानिक उपकरण नजर आ रहे थे—सिंगही के सामने एक अन्य बूढ़ा व्यक्ति खड़ा था, हुलिए से ही वह व्यक्ति कोई वैज्ञानिक नजर आता था।
वैज्ञानिक सरीखे व्यक्ति ने अभी-अभी पूरे सम्मान के साथ कहा था—“खादनाशक दवा तैयार है महामहिम!”
“क्या तुम हमें उसका प्रयोग दिखा सकते हो?” सिंगही का आवाज ऐसी थी मानो सदियों पहले मर चुके किसी व्यक्ति के मुंह से निकली हो।
“बेशक महामहिम!”
“चलो!” कहने के साथ ही सिंगही आगे बढ़ गया, ऐसा लगा जैसे अचानक ही कोई लाश कब्र से निकलकर चल पड़ी हो, वैज्ञानिक उसके पीछे था। चलते हुए ही सिंगही ने कहा—“अगर तुम सचमुच ‘खादनाशक’ दवा बनाने में कामयाब हो गए हो प्रोफेसर बाटले तो हम वादा करते हैं कि विश्व सम्राट बनने पर तुम्हीं को अपना मंत्री नियुक्त करेंगे।”
“आप इस दुनिया के सबसे उदार व्यक्ति हैं महामहिम!” उसके पीछे बढ़ते हुए प्रोफेसर बाटले ने पूरे सम्मान के साथ कहा।
पांच मिनट बाद ही वे एक ऐसे हॉल में पहुंच गए, जहां हॉल के बीचोबीच लोहे के एक बहुत बड़े स्टैण्ड पर दस फीट का वर्गाकार लोहे का कढ़ाव रखा था, कढ़ाव में करीब एक फुट की गहराई में मिट्टी भारी हुई थी और उस मिट्टी में गेहूँ के हरे-हरे बाल उगे हुए थे—संक्षेप में यह कह देना काफी है कि वह दस फीट का वर्गाकार, गेहूं की फसल से लहलहाता कृत्रिम खेत था—बालों में कसे गेहूं करीब-करीब पूरी तरह पक चुके थे।
दाईं तरफ स्टैण्ड पर परखनली झूल रही थी, नली में कोई गाढ़ा-सा तरल पदार्थ था।
उसने एक बटन दबाकर स्क्रीन ऑन की।
स्क्रीन पर एक गुफा का मुंह उभर आया, वह सिंगही के इसे अड्डे का मुख्य द्वार था—दार पर विशेष वर्दी में दो सशस्त्र व्यक्ति मुस्तैदी से खड़े नजर आ रहे थे—सिंगही उन्हीं को देखता हुआ कृत्रिम खेत के समीप आ गया। उधर से हाथ में परखनली लिए प्रोफेसर बाटले खेत के समीप आ गया, बाटले ने हाथ लम्बा किया और बोला—“देखिए!”
परखनली में भरा द्रव्य उसने खेत में डाल दिया।
फिर वे दोनों ही उत्सुक और दिलचस्प निगाहों से खेत की ओर देखने लगे और उनके देखते-ही-देखते खेत की मिट्टी काली पड़ती चली गई, बिल्कुल उसी तरह जैसे कोयले का चूरा हो—बीस मिनट गुजरते-गुजरते खेत में खड़े गेहूं के हरे-भरे बाल सूखकर पीले पड़ने लगे और दस मिनट बाद ही मुरझाकर काली मिट्टी में गिर पड़े।
“ग...गुड, वैरी गुड बाटले।” सिंगही की आंखों में जबरदस्त चमक थी।
“सारी फसल नष्ट हो गई है महामहिम!” बाटले का स्वर खुशी के कारण कापं रहा था।
“हम देख रहे हैं—हा....हा...हा...हम देख रहे हैं प्रोफेसर!” कहने के साथ ही सिंगही पागलों की तरह ठहाका लगा उठा, ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई मुर्दा हंस रहा हो, ठहाकों के बीच वह कहता ही चला गया—“तुमने कमाल कर दिया बाटले—सचमुच—कमाल कर दिया तुमने!”
“एक एकड़ खेत को तबाह करने के लिए एक औंस ही काफी है महामहिम!”
“व...वैरी गुड प्रोफेसर—हम तुमसे बहुत खुश हैं—अब तुम्हें यह दवा बहुत अधिक मात्रा में बनानी है, इतनी अधिक मात्रा में कि हम सारी दुनिया में होने वाली, अगले सीजन की गेहूं की समूची फसल को नष्ट कर सके—हा...हा...हा...अगले सीजन की गेहूं की सारी फसल नष्ट हो जायगी—सारी दुनिया में एक भी व्यक्ति के लिए गेहूं का एक दाना भी नहीं होगा—हा...हा...हा...और जब दुनिया को यह मालूम पड़ेगा कि ऐसा सिंगही ने किया है तो दुनिया सिंगही के कदमों में आ गिरेगी—हा...हा....हा...इस बार दुनिया को सिंगही की महानता स्वीकार करनी ही होगी।”
“उतनी मात्रा में दवा तैयार होने में अभी समय लगेगा महामहिम!”
“कितना समय?”
“करीब छह महीने!”
“हमें फिक्र नहीं है, छह महीने इन्तजार कर सकते हैं। तुम अपने काम में जुट जाओ प्रोफेसर—इस दवा के अलावा दुनिया को झुकाने के लिए हमें और भी बहुत-सी तैयारियां करनी होंगी, वे सब तैयारियां करने में हमें भी करीब इतना ही समय लग जाएगा।”
“लेकिन जब दुनिया में कहीं गेहूं होगा ही नहीं महामहिम, तब भला आप अपनी अधीनता स्वीकार कर लेने वाले व्यक्तियों या राष्ट्रों को जीवित कैसे रख सकेंगे?”
“उसकी तुम फिक्र मत करो, इन छह महीनों में हमें ऐसी संभावनाओं पर गौर करके उनका हल निकालना है, वह हम कर लेंगे।”
अभी सिंगही का वाक्य समाप्त हुआ ही था कि—
“ऐ, कौन हो तुम—इधर कहां बढ़े चले आ रहे हो, वहीं रुक जाओ वरना गोली मार दूंगा।” यह कड़ाकेदार आवाज हॉल में गूंज उठी—सिंगही और बाटले ने एक साथ चौंककर स्क्रीन की तरफ देखा।
वह आवाज टी.वी. सैट से निकलकर ही इस कमरे में गूंजी थी।
कैसे कैसे परिवार Running......बड़े घरों की बहू बेटियों की करतूत Running...... मेरी भाभी माँ Running......घरेलू चुते और मोटे लंड Running......बदनसीब रण्डी ......बारूद का ढेर ......Najayaz complete......Shikari Ki Bimari complete......दो कतरे आंसू complete......अभिशाप (लांछन )......क्रेजी ज़िंदगी(थ्रिलर)......गंदी गंदी कहानियाँ......हादसे की एक रात(थ्रिलर)......कौन जीता कौन हारा(थ्रिलर)......सीक्रेट एजेंट (थ्रिलर).....वारिस (थ्रिलर).....कत्ल की पहेली (थ्रिलर).....अलफांसे की शादी (थ्रिलर)........विश्‍वासघात (थ्रिलर)...... मेरे हाथ मेरे हथियार (थ्रिलर)......नाइट क्लब (थ्रिलर)......एक खून और (थ्रिलर)......नज़मा का कामुक सफर......यादगार यात्रा बहन के साथ......नक़ली नाक (थ्रिलर) ......जहन्नुम की अप्सरा (थ्रिलर) ......फरीदी और लियोनार्ड (थ्रिलर) ......औरत फ़रोश का हत्यारा (थ्रिलर) ......दिलेर मुजरिम (थ्रिलर) ......विक्षिप्त हत्यारा (थ्रिलर) ......माँ का मायका ......नसीब मेरा दुश्मन (थ्रिलर)......विधवा का पति (थ्रिलर) ..........नीला स्कार्फ़ (रोमांस)
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Re: Hindi novel अलफांसे की शादी

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स्क्रीन पर इस वक्त पहरेदारों के अतिरिक्त एक तीसरा व्यक्ति भी नजर आ रहा था, शायद उसी को देखकर एक पहरेदार ने उपरोक्त चेतावनी दी थी—अपरिचित यानी तीसरे व्यक्ति ने हाथ ऊपर उठा लिए, गन संभाले एक पहरेदार उसकी तरफ बढ़ा।
सिंगही और बाटले दिलचस्प निगाहों से उस दृश्य को देख रहे थे। पहरेदार ने गन की नाल आगन्तुक की छाती पर रखी और पूछा—
“कौन हो तुम?”
“मेरा नाम गोंजालो है!” हाथ ऊपर उठाए व्यक्ति ने कहा।
“यहां क्या कर रहे हो?”
“मुझे महामहिम सिंगही से मिलना है।”
आगन्तुक का यह वाक्य सुनकर सिंगही की आंखों में उलझन के भाव उभर आए, जबकि पहरेदार ने चौंककर कहा—“जान बचाना चाहते हो तो भाग जाओ यहां से, यहां कोई सिंगही नहीं रहता।”
“महामहिम से जाकर कहो कि मुझे अलफांसे ने भेजा है।”
“कौन अलफांसे?” पहरेदार ने पूछा—जबकि अलफांसे का नाम सुनते ही सिंगही की आंखों में एक विशेष चमक उभर आई थी, गोंजालो ने कहा—“महामहिम से जाकर कह दो, वे मुझे खुद बुला लेंगे।”
इससे पहले कि पहरेदार आगन्तुक से कुछ कहे, सिंगही लम्बे-लम्बे दो ही कदमों में स्क्रीन के करीब पहुंचा तथा एक बटन पर उंगली रखकर बोला—“मोलार्ड!”
“यस महामहिम!” स्क्रीन पर पहरेदार चौंकता हुआ नजर आया।
“इस आदमी को रूम नम्बर इलेविन में ले आओ।”
“ओ.के. महामहिम!” पहरेदार ने पूरे सम्मान के साथ कहां।
¶¶
“तो तुम्हारा नाम गोंजालो है और तुम्हें अलफांसे ने यहां भेजा है।”
सिंगही ने अपने सामने बैठे आगन्तुक की आंखों में आंखें डालकर ये शब्द कहे।
“जी हां!” गोंजालो ने बहुत ही संक्षिप्त-सा जवाब दिया।
“तुम्हें कैसे पता लगा कि हम यहां मिलेंगे?”
“यहां का पता मास्टर ही ने दिया था।”
“ओह!” सिंगही के मुंह से निकला, वह जानता था कि अलफांसे के शिष्य सारी दुनिया में फैले हुए हैं और वे सभी अलफांसे को ‘मास्टर’ कहते हैं। एक पल चुप रहने के बाद उसने अगला सवाल किया—“तुम कहां रहते हो?”
“साइबेरिया में।”
“तो क्या अलफांसे आजकल साइबेरिया में है?”
“जी नहीं, मास्टर आजकल लंदन में हैं—उन्होंने वहीं से मुझे एक पत्र डाला, पत्र के साथ एक सीलबन्द लिफाफा भी था—मेरे नाम लिखे गए पत्र में मास्टर ने यहां का पता लिखने के बाद लिखा है कि मैं सीलबन्द लिफाफा आप तक पहुंचा दूं—मास्टर ने यह भी लिखा है कि आप तक पहुंचने के लिए मुझे उनके नाम का प्रयोग करना है।”
जाने क्या सोचते हुए सिंगही की छोटी-छोटी आंखें सिकुड़कर गोल हो गईं, बोला—“वह सीलबन्द लिफाफा कहां है?”
आगन्तुक ने जेब से एक बड़ा-सा लिफाफा निकालकर सिंगही की तरफ बढ़ा दिया—सिंगही ने लिफाफा लिया। पहले उसे उलट-पलटकर बहुत ही गौर से देखा। उसके समीप बैठे बाटले की निगाहें भी लिफाफे पर ही स्थिर थीं। संतुष्ट होने पर सिंगही ने लिफाफा खोल लिया।
लिफाफे के अन्दर से एक पत्र और कार्ड निकला।
कार्ड पर दृष्टि पड़ते ही सिंगही चौंका और फिर उसे पढ़ता चला गया, पूरा कार्ड पढ़ते-पढ़ते उसके चेहरे पर हैरत के असीमित भाव उभर आए थे, उसके मुंह से बरबस ही निकल पड़ा—“अलफांसे शादी कर रहा है?”
“जी हां, ऐसा ही एक कार्ड मास्टर ने मुझे भी भेजा है।”
सिंगही ने जल्दी से पत्र की तहें खोलीं, पत्र अलफांसे ने ही लिखा था, सिंगही व्यग्रतापूर्वक उसे पढ़ने लगा-
प्यारे सिंगही,
“मैं जानता हूं कि इस पत्र के साथ मिले कार्ड को देखकर तुम चौंक पड़ोगे—इस वक्त तुम्हारे चेहरे पर हैरत के असीमित भाव होंगे—वाकई मेरे हर परिचित के लिए यह सूचना हैरतअंगेज है कि मैं शादी कर रहा हूं—तुम कठिनता से ही इस सच्चाई पर विश्वास कर पाओगे, परन्तु तुम्हें इस अविश्वसनीय सच्चाई पर विश्वास करना ही चाहिए, क्योंकि मैं सचमुच शादी कर रहा हूं।
अपने फैसले पर मैं खुद भी उतना ही चकित हूं, जितने तुम होगे, परन्तु इर्विन से मिलने के बाद चाहकर भी इस फैसले के अलावा कुछ और न कर सका—यूं समझो कि अब मैं अपने अपराधी जीवन की भागदौड़ से तंग आ गया हूं—मैंने इंग्लैण्ड की नागरिकता स्वीकार कर ली है, बाकी जीवन इर्विन के साथ शान्ति से गुजारना चाहता हूं।
अगर मैं तुम्हें अपनी शादी की सूचना न भेजता तो बाद में शिकायत करते, इसलिए साइबेरिया में स्थित अपने एक शार्गिद के हाथों ये लिफाफा भेज रहा हूं—गोंजालो को विदा कर देना, यकीन रखो—गोंजालो कभी किसी को तुम्हारे इस ठिकाने का पता नहीं बताएगा।
अगर चाहो तो कार्ड के मुताबिक शादी के दिन लंदन पहुंच जाना!
—तुम्हारा अलफांसे!
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Re: Hindi novel अलफांसे की शादी

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इसमें शक नहीं कि पत्र पढ़ने के बाद सिंगही का दिमाग चक्करघिन्नी की तरह घूम गया था—यह सूचना उसके लिए दुनिया का नौवां और सबसे महान आश्चर्य थी—फिर भी उसने स्वयं को नियंत्रित किया और गोंजालो को वहां से विदा किया।
कार्ड को उसने कई बार पढ़ा और अचानक ही बड़बड़ा उठा—“कमाल है, अलफांसे शादी कर रहा है!”
“इसमें इतने आश्चर्य की क्या बात है महामहिम?” एकाएक बाटले ने पूछा।
“क्या मतलब?”
“मेरे ख्याल से किसी की शादी होना कोई विशेष घटना तो नहीं है।”
सिंगही के होठों पर बड़ी ही अजीब-सी मुस्कान दौड़ गई, बोला—
“तुम ऐसा केवल इसलिए कह रहे हो प्रोफेसर, क्योंकि तुम अलफांसे को जानते नहीं हो।”
“मैं समझा नहीं महामहिम!”
“ये कार्ड अलफांसे के हर परिचित के लिए दुनिया का नौवां आश्चर्य है।”
“मैं अब भी नहीं समझा।”
“तुम समझ भी नहीं सकते प्रोफसर, दरअसल इस बात को समझने के लिए अलफांसे के कैरेक्टर को समझना बहुत जरूरी है और उसके कैरेक्टर को शायद सही ढंग से वे भी नहीं समझ सकते जो उसे बचपन से जानते हैं, शायद हम भी नहीं समझ पाए हैं—तभी तो यह कार्ड हमें चकित किए हुए है!”
“पता नहीं आप क्या कह रहे हैं महामहिम?”
“छोड़ो बाटले, तुम केवल इतना ही समझ लो कि यह सूचना पश्चिम से सूर्य उगने जैसी है— अलफांसे उन लोगों में से एक है जिसकी वजह से मैं आज तक विश्व सम्राट नहीं बन सका।”
प्रोफेसर बाटले कुछ देर तक चकित निगाहों से सिंगही की तरफ देखता रहा, फिर बोला—“मैं पहली बार आपके मुंह से किसी की प्रशंसा सुन रहा हूं महामहिम!”
“अलफांसे है ही प्रशंसा के काबिल—अब जरा सोचो, किसी को हमारे इस गुप्त अड्डे की जानकारी नहीं है, हम स्वयं भी इसी भ्रम के शिकार थे, परन्तु ये कार्ड जाहिर करता है कि अलफांसे से हम छुपे हुए नहीं हैं।”
“उसे कैसे पता लग गया महामहिम कि आप यहां हैं?”
“कह नहीं सकते और उसकी ऐसी ही विशेषताओं के कारण हमें मानना पड़ता है कि अलफांसे एक बहुत ही अजीबो-गरीब हस्ती का नाम है, वह बहुत चालाक है प्रोफेसर—कोई नहीं कह सकता कि वह कब, किस मकसद से, क्या चाल चल जाए—यह कार्ड और उसके पत्र की एक-एक पंक्ति अविश्वसनीय है, हमें पता लगाना होगा कि शादी की इस सूचना में कितनी सच्चाई है।”
¶¶
उसके जिस्म पर किसी हंस के से रंग का लिबास था। बेदाग, सफेद लिबास—आंखों पर गहरे काले लैंसों का चश्मा, हाथ में एक छड़ी लिए वह हीरों से जड़े एक ऊंचे सोने के बने सिंहासन पर बैठा था, उसके पैरों के समीप एक बकरा बैठा था—एकदम सफेद बकरा।
समीप ही एक उससे भी ऊंचा सिंहासन था, उस सिंहासन पर एक बूढ़ी औरत का स्टैचू था—सफेद लिबास वाले युवक का कद सात फीट था, इस हृष्ट-पुष्ट, आकर्षक और गोरे चिट्टे युवक का नाम था—वतन और कदमों में बैठे बकरे का नाम—अपोलो!
वतन—चमन का राजा, सिंगही जैसे मुजरिमों के सरताज का शिष्य—चमन नाम का यह छोटा-सा देश कभी अमेरिका का गुलाम था, इस युवक ने खुद चमन को अमेरिका के पंजे से आजाद कराया था। अब उसका देश एक मान्यताप्राप्त देश था।
दुनिया के सभी देशों के लिए आदर्श था चमन !
चमन, अपोलो, वतन, उसके सफेद लिबास, काले चश्मे, छड़ी और बूढ़ी औरत के स्टैचू के बारे में विस्तार से जानने के लिए तो आपको ‘वेतन’ और ‘गुलिस्तां खिल उठा’ नाम के उपन्यास पढ़ने पड़ेंगे, मगर हां, संक्षेप में हम यहां अपने नए पाठकों को इतना जरूर बता सकते हैं कि वतन मूल रूप से भारतीय है, उसके पिता भारतीय ही थे—उन्होंने चमन का एक लड़की से विवाह किया और चमन में ही बस गए। वतन का जन्म यहीं हुआ।
तब चमन गुलाम था—अकेला वतन चमन की आजादी के किए जूझा, संघर्ष के उसी दौर में वह सिंगही का शिष्य बना, वतन अहिंसा का पुजारी है—हिंसा को नापसन्द करता है, वह सिंगही का शिष्य जरूर है, सिंगही के लिए उसके मन में असीम श्रद्धा भी है परन्तु उसके हिंसा में विश्वास और विनाशकारी प्रवृत्ति के कारण उससे नफरत करता है। बचपन में ही उसे अपने माता-पिता और युवा बहन की लाश और उनमें गिजगिजाते कीड़े देखने पड़े थे—उन लाशों से उठती सड़ांध के बीच रहना पड़ा था—तभी से उसे हिंसा से घृणा हो गई।
उसके हाथ में जो छड़ी है उसमें हड्डियों का बना एक मुगदर है, उसके माता-पिता और बहन की हड्डियों से बना मुगदर—इसी मुगदर से उसने अपने परिवार के हत्यारों से बदला लिया था— आज भी वह हर जालिम को इसी मुगदर से सजा देता है।
कड़े संघर्ष के बाद उसने अपने मुल्क को आजाद करा लिया-आज वह चमन का राजा है—चमन की जनता का प्रिय—दीन-दुखियों का रहनुमा—चमन में जगह-जगह बॉक्स लगे हैं, चमन का कोई भी नागरिक अपनी शिकायत लिखकर इन बॉक्सों में डाल सकता है।
दरबार प्रतिदिन लगता है।
सारे बॉक्स वतन के सामने खोले जाते हैं। इस वक्त भी दरबार में वे ही बॉक्स खोले जा रहे थे कि राष्ट्रपति भवन के एक कर्मचारी ने आकर सूचना दी—“एक आदमी आपसे मिलना चाहता है महाराज!”
“उसे अन्दर क्यों नहीं लाया गया?” सिंहासन पर बैठे वतन ने पूछा।
“क्योंकि वह चमन का नागरिक नहीं है महाराज!”
“फिर कहां का है?”
“इंग्लैण्ड का।”
“अपने आने की वजह क्या बताता है?”
“कहता है कि वजह आप ही को बताएगा, उसने आपसे सिर्फ इतना कहने के लिए कहा है कि उसे अलफांसे ने भेजा है।”
“अलफांसे!” कहने के साथ ही वतन सिंहासन से एक झटके के साथ खड़ा हो गया, अपोलो नाम का बकरा भी उसके साथ ही खड़ा हो गया था, अपोलो की गरदन में घण्टियों वाली माला पड़ी हुई थी।
घण्टियां टनटना उठीं।
टनटनाहट के साथ पहले अपोलो और उसके पीछे वतन सिंहासन की सीढ़ियां उतरकर हॉल में पहुंचे—और फिर तेजी के साथ हॉल के द्वार की तरफ बढ़ गए—प्रतीक्षा-कक्ष में एक अंग्रेज मौजूद था।
वतन को देखते ही अंग्रेज ससम्मान खड़ा हो गया।
“आपको अलफांसे गुरु ने भेजा है?”
“जी हां!”
“तो आप यहां क्यों बैठे हैं, आइए!”
“मेरा काम आप तक सिर्फ यह कार्ड पहुंचा देना है।” कहते हुए अंग्रेज ने अपने कोट की जेब से कार्ड निकालकर वतन को दे दिया—वतन ने लिफाफे से निकालकर कार्ड देखा, पढ़ते वक्त वतन के चेहरे पर बुरी तरह चौंकने के भाव उभरे, मुंह से अनायास ही निकाला—
“अलफांसे गुरु शादी कर रहे हैं!”
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अपनी कोठी के लॉन में खड़े सुपर रघुनाथ और रैना आकाश की तरफ देख रहे थे, उनकी दृष्टि आकाश में परवाज करती हुई एक छोटी-सी चिड़िया पर स्थिर थी—हां, दूर से देखने पर वह चिड़िया ही नजर आती थी, परन्तु वास्तव में वह एक छोटा-सा विमान था।
‘पिट्स’ विमान!
इस वक्त वह आकाश में काफी ऊंचाईं पर परवाज कर रहा था, अचानक ही पिट्स ने एक लम्बा गोता खाया और फिर बहुत ही तेजी से नीचे की तरफ गिरा—जब एक बार उसने गिरना शुरू किया तो धरती की तरफ गिरता ही चला गया—जैसे उड़ते हुए किसी पक्षी के पंख कट गए हों।
जख्मी पक्षी जैसे गिर रहा हो।
देखते-ही-देखते विमान इतना नीचे आ गया कि रैना और रघुनाथ उसके रंग को भी स्पष्ट देख सकते थे—वह सुर्ख रंग का, बड़ा ही खूबसूरत, छोटा-सा पिट्स था—उसे नीचे गिरता देखकर रैना का चेहरा सफेद पड़ गया, एक ही पल में उसके चेहरे पर ढेर सारा पसीना उभर आया। उसने जल्दी से रघुनाथ के कन्धे पर हाथ रखा और डरी-सी, उत्तेजित अवस्था में बोली, “प...प्राणनाथ!”
ड...डरो नहीं रैना!” रघुनाथ ने अपने दाएं हाथ से बाएं कन्धे पर मौजूद पत्नी के हाथ को थपथपाते हुए सान्त्वना देने की कोशिश की—जबकि वास्तविकता यह थी कि स्वयं रघुनाथ का दिल बेकाबू होकर बुरी तरह से धड़क रहा था, उसके चेहरे पर भी हवाइयां उड़ रही थीं। पिट्स अभी संभला नहीं था और उसके गिरने के अनुपात में ही रघुनाथ के कन्धे पर रैना के हाथ की पकड़ सख्त पड़ती चली गई, इस बार वह बुरी तरह घबराए हुए स्वर में कह उठी—“अरे, कहीं विमान में कोई खराबी तो नहीं आ गई है स्वामी?”
“द...देखती रहो रैना, वह संभाल लेगा!” रघुनाथ ने कहा और उसी क्षण—पिट्स को एक बहुत तेज झटका लगा—इस झटके के साथ ही रैना के कंठ से चीख निकल गई—जबरदस्त चीख के साथ वह रघुनाथ से लिपट गई थी, उसे बांहों में जकड़े रघुनाथ इस वक्त भी लाल रंग के उस खूबसूरत पिट्स को ही देख रहा था—पिट्स अब काफी नीचे था और रघुनाथ की कोठी का चक्कर लगा रहा था, रैना रघुनाथ के सीने में मुखड़ा छुपाए अभी तक कांप रही थी। रघुनाथ के चेहरे पर छाया तनाव कम हुआ, बोला—“पगली, कुछ नहीं हुआ है—देखो वह ठीक है।”
उससे यूं ही लिपटी रैना ने पिट्स की तरफ देखा। रैना का चेहरा अभी तक पीला जर्द पड़ा हुआ था। पिट्स थोड़ा ऊपर उठा, अचानक ही उसने किसी कबूतर के समान हवा में कलाबाजी खाई, थोड़ा-सा नीचे गिरा और फिर एक झटका खाकर संभल गया।
“उफ्फ!” रैना कह उठी—“आप उसे रोकते क्यों नहीं?”
“वह किसी की सुनता कहां है?”
“आप उसे सख्ती से मना कीजिए, मुझे तो बहुत डर लगता है।”
“तुमने भी तो कई बार उसे समझाया है, क्या उसने ध्यान दिया?”
पिट्स पर ही नजरें गड़ाए रघुनाथ ने कहा। रैना कुछ जवाब न दे सकी—पिट्स अब भी कोठी का चक्कर लगाता हुआ बार-बार हवा में कलाबाजियां खा रहा था, दोनों की नजरें अभी पिट्स पर जमी हुई थीं कि एक कार कोठी के लॉन में दाखिल हुई, रैना छिटककर रघुनाथ से अलग हो गई।
वे दोनों ही पहचानते थे, कार विजय की थी।
कार रुकी और दरवाजा खोलकर विजय चहकता हुआ बाहर निकाल—“हैलो प्यारे तुलाराशि, ये सुबह-सुबह लॉन में कौन-सी फिल्म का प्रणय दृश्य फिल्माया जा रहा है?”
“त....तुम?” उसे देखते ही रघुनाथ भड़क उठा, “सुबह-सुबह तुम यहां क्यों आए हो?”
“हाय-हाय!” हाथ नचाता हुआ विजय उसकी तरफ बढ़ा—“हमें देखते ही तो तुम इस तरह भड़कते हो प्यारे जैसे छतरी को देखकर साली भैंस भड़कती है, अबे हम मेहमान हैं और सुबह-सुबह जब किसी के घर में मेहमान आता है तो...।”
“मैं पूछता हूं तुम यहां क्यों आए हो?” उसकी बात बीच में ही काटकर रघुनाथ गुर्रा उठा।
“अपनी रैना बहन के हाथ के बने आलू के असली घी में तले हुए लाल-लाल परांठे खाने!”
“मेरे घर को होटल समझ रखा है क्या तुमने?” रघुनाथ भड़क उठा—“आंख खुली, मुंह उठाया और परांठे खाने सीधे यहां चले आए—कोई परांठा-वरांठा नहीं मिलेगा, यहां से फूटते नजर आओ।”
“देखा रैना बहन?” अचानक ही विजय ने अपनी सूरत रोनी बना ली—“ये घोंचू हमारी कितनी बेइज्जती खराब करता है, अब तुम्हीं कहो—क्या हमें बहन के घर के आलू के परांठे भी नहीं मिलेंगे?”
अभी तक किंकर्तव्यविमूढ़-सी खड़ी रैना को जैसे होश आया, वह संभलकर बोली, “नहीं-नहीं, आप रोते क्यों हैं भइया, इनकी तो आदत ही ऐसी है—मैं तुम्हें परांठे बनाकर खिलाऊंगी।”
“हां-हां, इसे खूब सिर पर चढ़ाओ—गाजर का हलवा बनाकर खिलाओ इसे।” रघुनाथ भड़का।
जवाब में विजय ने उसे ठेंगा दिखाने के साथ ही मुंह से खूब लम्बी जीभ बाहर निकालकर भी चिढ़ाया। उसी पोज में विजय उसे चिढ़ाने वाले अन्दाज में कह रहा था— “ऊं....ऊं...ऊं!”
“अबे, मुझे चिढ़ाता है साले!” कहने के साथ ही रघुनाथ विजय पर झपटा, जबकि एक ही जम्प में विजय अपना स्थान छोड़ चुका था, विजय आगे-आगे दौड़ रहा था— रघुनाथ उसके पीछे।
विजय ने उसे रैना के चारों तरफ अनेक चक्कर कटा दिए थे।
लाख चाहकर भी रैना अपनी हंसी न रोक पा रही थी। खिलखिलाकर हंस रही थी वह—सारे लॉन में उसकी खिलखिलाहटें गूंज रही थीं, विजय को पकड़ने के चक्कर में रघुनाथ की सांस फूल गई।
हवा में पिट्स अभी तक कलाबाजियां खा रहा था।
“अब रहने भी दीजिए, आप भी विजय भइया के साथ बच्चे बन जाते हैं।” बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोककर रैना ने रघुनाथ से कहा।
रघुनाथ रुक गया और सांसों को नियन्त्रित करने की चेष्टा करता हुआ बोला—“हां-हां, ये तो अभी-अभी पैदा हुआ है—तुम हमेशा इसी का पक्ष लेती हो रैना, इसे तुम्हीं ने सिर पर चढा रखा है।”
“तुमने वह कहावत नहीं सुनी प्यारे तुलाराशि कि सारी खुदाई एक तरफ, जोरू का भाई एक तरफ!”
“अगर तुम किसी दिन मेरे हत्थे चढ़ गए विजय तो मैं सारी कहावतें तुम्हें अच्छी तरह समझा दूंगा।” रघुनाथ की सांस अभी तक फूल रही थी—“जरा ऊपर देखो!”
“ऊपर क्या है प्यारे?”
“विकास को तुम्हीं ने बिगाड़ा है, देखो जरा कैसे-कैसे खतरनाक खेल खेलने लगा है वह?”
विजय ने पिट्स की तरफ देखा, बहुत निचाई पर उसने अभी-अभी एक कलाबाजी खाई थी— कलाबाजी खाते समय पिट्स इतना नीचे था कि एक बार को तो विजय जैसे व्यक्ति का दिल भी धड़क उठा—मगर शीघ्र ही स्वयं को नियन्त्रित करके बोला—“क्या उसे अपना प्यारा दिलजला चला रहा है?”
“हां और उसके साथ ही विमान में धनुषटंकार भी है, पिछले कुछ ही दिनों से उन्हें यह शौक चर्राया है, विकास फ्लाइट पर निकलकर हवा में यही खतरनाक खेल खेलता है।”
“म...मगर प्यारे, इसमें बुराई क्या है?”
“लो, सुन लो अपने लाड़ले भइया की बात!” रघुनाथ ने रैना से कहा—“इसे इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती!”
विजय ने रैना की तरफ देखा, जबकि रैना एकाएक ही गम्भीर हो गई थी, बोली—“ये ठीक कह रहे हैं भइया, विकास का ये खेल मुझे अच्छा नहीं लगता, डर लगता है—वह तुम्हारी बात मान जाएगा भइया, तुम्हीं उसे यह खतरनाक खेल खेलने से रोको न?”
“अगर तुम कहती हो रैना बहन तो, ये...ये लो!” विजय धम्म से लॉन में पड़ी एक चेयर पर बैठ गया और बोला—“हम यहां जमकर बैठ गए हैं, दिलजला कभी तो फ्लाइट खत्म करके यहां लौटेगा, हम तब तक यहां से नहीं उठेंगे जब तक कि उसके कान उखाड़कर नाक की जगह और नाक उखाड़कर कान की जगह नहीं लगा देंगे, मगर ये सारा काम हम रिश्वत लेकर करेंगे।”
“रिश्वत?”
“आलू के परांठे।”
“मैं अभी बनाकर लाई!” कहने के साथ ही रैना मुड़ी और कोठी के ऊपर हवा में कलाबाजियां खाते पिट्स पर एक नजर डालकर अन्दर चली गई।
रघुनाथ अभी तक विजय को खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था, जबकि विजय ने किसी निहायत ही शरीफ आदमी की तरह उससे कहा—“बैठिए रघुनाथ जी!”
उसे आग्नेय नेत्रों से घूरता हुआ रघुनाथ उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया, बीच में लकड़ी की बनी एक लॉन टेबल पड़ी थी। टेबल के चारों तरफ कुल मिलाकर चार लॉन चेयर्स थीं। विजय ने दोनों कोहनियां मेज पर टिकाईं और थोड़ा झुकता हुआ बोला—“दिमाग लगाकर, बहुत ही गौर से सोचने की बात है रघुनाथ जी, जरा कल्पना कीजिए—जब हम दिलजले के नाक कान की जगह और कान नाक की जगह लगा देंगे तो देखने में वह कैसा लगेगा?”
“तुम ये बकवास बन्द नहीं करोगे?” रघुनाथ दांत पीसता हुआ गुर्राया।
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Re: Hindi novel अलफांसे की शादी

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“ये लो, बन्द कर दी।” कहने के साथ ही विजय ने हवा में इस तरह हाथ नचाने शुरू कर दिए जैसे किसी वस्तु को सेफ में रखकर उसका लॉक बन्द कर रहा हो, परन्तु लॉक बन्द करता-करता वह अचानक ही रुक गया और बोला—“ठहरो-ठहरो प्यारे तुना राशि, ये तो सब गड़बड़ हो गई—नाक एक होती है, कान दो होते हैं—फिर भला नाक कानों के स्थान पर कैसे लग सकती है?”
विजय की बकवास पर रघुनवाथ भुनभुनाता रहा, जबकि विजय अपना भरपूर मनोरंजन कर रहा था, उधर रैना किचन में परांठे बनाने की तैयारियां कर रही थी और उसका लाड़ला पिट्स में बैठा हवा में कलाबाजियां खा रहा था।
थोड़ी देर बाद पिट्स फ्लाइंग क्लब के एयरपोर्ट की तरफ चला गया—उस वक्त रघुनाथ का दिमाग बुरी तरह झन्ना रहा था, जब पहला परांठा टेबल पर आया, विजय परांठे पर इस तरह झपट पड़ा जैसे वर्षों से भूखा हो। रघुनाथ दांत पीस उठा था, जबकि रैना मुस्कराती हुई लौट गई।
¶¶
आलू के परांठों की वह दावत अभी चल ही रही थी कि किसी धनुष से छोड़े गए तीर की तरह सनसनाती हुई कार कोठी का मुख्य द्वार पार करके लॉन में आई और एक तीव्र झटके के साथ पोर्च में रुकी, उस वक्त रैना भी विजय और रघुनाथ के पास लॉन ही में थी।
कार की गति अत्यन्त तेज होने के कारण तीनों का ध्यान उस तरफ चला गया।
अभी उनमें से कोई कुछ बोल भी नहीं पाया था कि कार का दरवाजा एक झटके से खुला, पहले विकास और उसके पीछे धनुषटंकार बाहर निकला।
“हैलो अंकल!” विकास उसे देखते ही चहक उठा, “सुबह-सुबह परांठे उड़ाए जा रहे हैं!”
“तुम पिट्स उड़ा सकते हो प्यारे तो क्या हम परांठे भी नहीं उड़ा सकते?”
गुलाबी होंठों पर मोहक मुस्कान लिए लड़का आगे बढ़ा, सच्चाई ये है कि विजय एकटक उसे देखता ही रह गया, इस वक्त वह बेहद आकर्षक लग रहा था, कामदेव-सा सुन्दर। उसके साढ़े छह फीट लम्बे हृष्ट-पुष्ट सेब जैसे रंग के गठे हुए जिस्म पर काली बैल-बॉटम और हाफ बाजू वाला हौजरी का काला ही बनियान था, मजबूत बांहें स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थीं।
उसका चेहरा गोल था, गुलाबी होंठ, बड़ी-बड़ी गहरी काली आंखें, अर्ध-घुंघराले बालों वाला वह लड़का लम्बे-लम्बे कदमों के साथ नजदीक आया।
फिर, पूरी श्रद्धा से विजय के पैरों में झुका।
चरण स्पर्श करके अभी वह सीधा खड़ा हुआ ही था कि विजय ने कहा—“कुतुबमीनार बनने से कुछ नहीं होता प्यारे, ताजमहल बनो—किसी की मुहब्बत का बल्ब बनकर टिमटिमाओ!”
“क्या मतलब गुरु?”
मतलब बताने के लिए विजय ने अभी मुंह खोला था कि सूटेड-बूटेड धनुषटंकार ने पहले उसके चरण स्पर्श किए, फिर एक ही जम्प में विजय के गले में बांहें डालकर उसके सीने पर न केवल झूल गया, बल्कि दनादन उसके चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी-सी लगा दी।
“अ...अबे...अबे...छोड़ गाण्डीव प्यारे!” बौखलाया-सा विजय कहता ही रह गया, मगर धनुषटंकार अपना पूरा प्यार जताकर ही माना और विजय के सीने से कूदकर सीधा एक कुर्सी की पुश्त पर जा बैठा।
धनुषटंकार एक छोटा-सा सूट पहने था, गर्दन में टाई और पैरों में नन्हें-नन्हें चमकदार जूते—पुश्त पर बैठते ही उसने अपने कोट की जेव से ‘डिप्लोमैट’ का क्वार्टर निकाला, ढक्कन खोला और कई घूंट गटागट पीने के बाद ढक्कन बन्द करके पव्वा जेब में रख लिया।
रैना बलिहारी जाने वाली दृष्टि से विकास को देखे जा रही थी।
“तुम इस ऊंट को इस तरह क्या देख रही हो रैना बहन, परांठे लाओ!” विजय के कहने पर रैना की तन्द्रा भंग हुई और झेंपती-सी वह अन्दर चली गई!
“बैठो प्यारे!” कहने के साथ ही विजय ने प्लेट में मौजूद परांठा खाना शुरू कर दिया।
खाली कुर्सी पर बैठते हुए विकास ने कहा—“आप कुतुबमीनार और ताजमहल का फर्क समझा रहे थे गुरु।”
“पहले तुम हमें उन कलाबाजियों के अर्थ समझाओ जो कुछ ही देर पहले कर रहे थे!”
“उनका भला क्या अर्थ हो सकता है?”
“ये नई बीमारी तुमने कब से पाल ली?
“उसी दिन से, जिस दिन इस बीमारी ने देश के एक बेटे की जान ली है!”
विजय चौंक पड़ा, परांठे से टुकड़ा तोड़ते विजय के हाथ रुक गए, बहुत ही ध्यान ने उसने विकास को देखा, लड़के के गुलाबी होंठों पर बड़ी ही प्यारी मुस्कान थी, विजय बोला—“हम समझे नहीं प्यारे!”
“आप समझकर भी नासमझ बन रहे हैं अंकल!”
“क्या तुम्हारा इशारा संजय गांधी की तरफ है?”
“बेशक!” विकास ने कहा—“जीने का यह नायाब और रोमांचकारी तरीका मैंने उसी से सीखा है, बल्कि मुझे तो यह कहने में भी कोई हिचक नहीं है अंकल कि इस मुल्क के हर युवक को उसके कैरेक्टर से जीने की प्रेरणा लेनी चाहिए—हमें सीखना चाहिए कि उसके जीने का अन्दाज क्या था?”
“बड़ी वकालत कर रहे हो प्यारे, युवा कांग्रेस के मेम्बर बन गए हो क्या?”
“मुझे दुख है गुरु कि मेरी बातों को आपने बहुत ही संकीर्णता से लिया है।”
“क्या मतलब प्यारे?”
“मैंने संजय गाधी की किसी राजनैतिक विचारधारा का जिक्र नहीं किया है अंकल, यदि मैं ऐसा करता तो आप मुझ पर कांग्रेसी होने या न होने का आरोप लगा सकते थे। मैं संजय की राजनैतिक सूझ-बूझ, नीतियों या विचारधारा का नहीं, बल्कि उस कैरेक्टर का जिक्र कर रहा हूं, जिसका राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं था—वह देश के प्रधानमन्त्री का बेटा था अंकल, किसी बात की कमी नहीं थी उसे, हर सुख, हर सुविधा उसके कदमों में रहती थी—उसके एक इशारे पर मनचाही हर वस्तु उसे प्राप्त हो सकती थी, क्या आप दुनिया के किसी एक भी ऐसे सुख का नाम बता सकते हैं जो उसे प्राप्त नहीं था?”
“नहीं!”
“तो क्या आप बता सकते हैं कि हर सुबह छह बजते ही वह अपना गद्देदार बिस्तर क्यों छोड़ देता था, पिट्स लेकर हर सुबह आकाश की ऊंचाइयों में परवाज करने की क्या जरूरत थी उसे—क्यों वह आकाश में कलाबाजियां खाने जैसा खतरनाक खेल खेला करता था?”
“पागल हो गया था वह!” रघुनाथ कह उठा।
विकास व्यंग्य से मुस्कराया, कुछ इस तरह जैसे रघुनाथ ने बहुत बचकानी बात कह दी हो, बोला—“कायर लोग बहादुरों को पागल ही कहते हैं डैडी, सोचने की बात है कि आखिर यह पागलपन चन्द लोगों पर ही सवार क्यों होता है? जवाब साफ है—सभी लोग बहादुर नहीं हो सकते, दुःसाहसी होना बहुत बड़ा दुःसाहस है—रोमांच की खोज में वही निकलते हैं जिन्हें मौत अपनी दासी नजर आती है, उन्हीं में से एक संजय था—दुःसाहसी, बहादुर, दिलेर और तेज रफ्तार वाला संजय!”
“मगर उसका अंजाम क्या हुआ?”
“वही, जिससे कायर डरता है और दिलेर जूझता है।”
“मैं तो कहता हूं कि इस ढंग से अपने जीवन के खतरे में डालकर वो बहुत ही बड़ी बेवकूफी करता था।”
“मैं कह ही चुका हूं डैडी कि आप जैसे लोग उसे बेवकूफी ही कहते हैं।”
“हम समझ रहे हैं प्यारे दिलजले कि तुम कहां बोल रहे हो?” एकाएक ही विजय पुनः वार्ता के बीच में टपकता हुआ बोला— “तुम यही कहना चाहते हो न कि वह दिलेर था, खतरों से खेलना उसकी प्रवृत्ति थी और ऐसी प्रवृत्ति बहादुर और रोमांचप्रिय लोगों में ही पाई जाती है?”
“शुक्र है आप समझे तो सही।”
“तुम्हारी बात अपनी जगह बिल्कुल सही है प्यारे, लेकिन अपने तुलाराशि की बात को भी जरा समझने की कोशिश करो, इनकी बातों में भी एक-दो नहीं, बल्कि कई मन वजन है।”
“मतलब?”
“वह मौत से आंख-मिचोली खेलने जैसा शौक था, माना कि ऐसा शौक किसी दिलेर व्यक्ति को ही हो सकता है, किन्तु ऐसा खेल कम-से-कम उन्हें नहीं खेलना चाहिए जिनकी जान कीमती हो।”
विकास ने रहस्यमय ढंग से मुस्कराते हुए पूछा—“आप संजय की जान को किस आधार पर कीमती मान रहे हैं?
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