Fantasy मोहिनी

Post Reply
User avatar
Dolly sharma
Pro Member
Posts: 2787
Joined: 03 Apr 2016 16:34

Re: Fantasy मोहिनी

Post by Dolly sharma »

जब मुझे होश आया तो मैं एक तट पर पड़ा था। यह एक झील थी जिसका जल एकदम निर्मल और स्वच्छ था। मनोरम पहाड़ियों से घिरी एक खूबसूरत झील। दूर-दूर तक किसी आदम जात का पता नहीं।

मेरी समझ में नहीं आया कि मैं कहाँ हूँ। खुले आसमान पर सूरज चमक रहा था जिसकी भरपूर किरणें मुझ पर पड़ रही थीं। गुजरी हुई बातें एक भयानक ख्वाब की तरह महसूस होती थीं। वह कौन सी भूमि थी जहाँ मैंने इतना समय व्यतीत किया था ?

और अब मैं कहाँ आ गया हूँ ?

मैं उठ खड़ा हुआ और फिर आँखें फाड़-फाड़कर चारों तरफ देखने लगा। यह जगह मेरे लिए बिल्कुल अजनबी थी। एक बार फिर मैं अपने जीवन की तन्हाइयों में भटकने के लिए अनजान राहों पर खड़ा था।

“अलख निरंजन!” अचानक एक आवाज वातावरण में गूँजी और मैंने चौंककर उस ओर देखा जिधर से आवाज गूँजी थी। एक साधू वहाँ इस प्रकार अवतरित हुआ जैसे आकाश से उतर आया हो।

मैंने गौर से साधू को देख कर तुरन्त ही साधू जगदेव को पहचान गया। एक मुद्दत के बाद साधू जगदेव के दर्शन हुए थे। मेरे जीवन में चंद व्यक्तित्व ऐसे भी आये थे जो मेरे लिए रहस्य बने रहे। साधू जगदेव भी उन्हीं उलझी हुई गुत्थियों में से एक था।

“महाराज!” मैंने चौंककर कहा।

“मोहिनी का सपना टूट गया बालक ?” साधू जगदेव ने कहा। “और जान लिया कि वह क्या चीज है ? एक जमाना था बालक जब तुम्हें अनेक पवित्र शक्तियाँ वरदान में प्राप्त हुई थीं। परन्तु तुम्हारे सिर से मोहिनी का नशा न उतरा और तुम अपने मार्ग से भटककर भावनाओं के भँवर में फँसकर रह गये।
तुमने उस देवी कुलवन्त का मान भी तोड़ दिया। याद है तुम्हें कि तुमने कितने घर उजाड़े हैं ? कितने जीवन बर्बाद किये हैं ? कुलवन्त भी उनमें से एक थी जिसका जीवन तुमने छीना है।”

“महाराज...!” मैं कराह उठा। “तुम भी जहर बो रहे हो महाराज ? तुम भी तो मुझे मझधार में छोड़कर चले गये थे। जिस समय हरी आनन्द ने मुझे एड़ियाँ रगड़ने के लिए विवश कर दिया था, मैंने तुम सबको पुकारा था; परन्तु कोई मेरी सहायता के लिए नहीं आया। उस वक्त सिर्फ मोहिनी ही थी जिसने मेरी प्राणों रक्षा की थी। न सिर्फ प्राण रक्षा, बल्कि मेरे दुश्मन का भी खून चाट लिया था। क्यों महाराज, आप ही ने तो मुझसे कहा था कि मैं अधर्मियों के नाश के लिए पैदा हुआ हूँ। उन ढोंगी तांत्रिकों के लिए जो समाज और धर्म के नाम पर एक कोढ़ हैं। हरी आनन्द क्या ऐसा नहीं था ?”

“था...।” साधू जगदेव ने अपना त्रिशूल हवा में उछाला। “उसके अलावा भी बहुत से हरी आनन्द थे और हैं जिसके सर्वनाश के लिए हमने तुम्हें नियुक्त किया था। इसलिए तुम्हें वह शक्तियाँ दान मिली थीं। कुलवन्त ने पूरे सौ महापुरुषों का जाप करके उनकी शक्तियाँ तुम्हारे लिए हासिल की थीं, परन्तु मूर्ख आदमी...पापियों की श्रेणी में वे लोग कब आते थे, जिन्हें तुमने अपनी हवस का शिकार बनाया ? हरी आनन्द को पाने के लिए तुम इतने पागल हो गये कि तुम्हें इसका ख्याल ही न रहा कि कौन निर्दोष है, कौन पापी ? बब्बन अली की बहनों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था ? और क्या तुम्हें वह नारियाँ याद हैं जो तुम्हारी हवस का निशाना बनीं थीं ? तुमने अपने को स्वयं पाप के दलदल में डालकर अपनी शक्तियों का नाश किया। और हरी आनन्द इसीलिए तुम्हें छकाता रहा ताकि तुम क्रोध में आकर इसी तरह अपने होश गँवाते रहो और तुम्हें वरदान में मिली शक्तियों का विनाश होता रहे। बोलो राज ठाकुर! क्या अब भी तुम्हारी आँखें नहीं खुलीं ? तुमने तो मोहिनी के साथ बहुत से सुन्दर सपने सजाये होंगे। परन्तु तुमने उसकी बर्बाद होती दुनियाँ को भी देख लिया होगा। हजारों लोग वहाँ आग के लावे में बह गये। कौन है उन निर्दोषों की मौत का जिम्मेदार ?”

“हाँ...हाँ महाराज, मैं उन सबका जिम्मेदार हूँ। मैं पापी हूँ और अब मुझे किसी की सहायता की जरूरत नहीं। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिये। बस मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिये।”

“जरूर छोड़ दूँगा। लेकिन चीनी फौजें तुम्हें तुम्हारे हाल पर नहीं छोड़ सकतीं। जिस जगह तुम मौजूद हो, इसके चारों तरफ उनकी सेनाएँ फैली हुई हैं। यही वह स्थान था जहाँ मोहिनी का मन्दिर था और उन्होंने एक बड़ी तबाही देखी है। जब उस पहाड़ पर जलजला आया था और वह आग का पहाड़ प्रलय बनकर फट पड़ा था। तुम बच गये कुँवर राज। यह तुम्हारे हक में अच्छा न हुआ। अगर तुम उस रक्त के तालाब में न कूद गये होते तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित थी। पर होनी को कौन टाल सकता है।”

जगदेव कोई पहुँचा हुआ साधू था। पहले भी मैंने उसके अनगिनत चमत्कारों को देखा था। मेरी तो समझ में कुछ नहीं आता था। अगर यही वह जगह है जहाँ मोहिनी का मन्दिर था तो फिर वह सब कुछ कहाँ अदृश्य हो गया ? उस सारी दुनियाँ का कोई चिह्न यहाँ नजर नहीं आता था।

“यह रक्त का वही तालाब राज, जो अब शांत झील बन गया है और वह सब बुरी आत्मायें थीं जो मोहिनी के मन्दिर की देखभाल करती थीं। वह सब मोहिनी के इँसानी शरीर के साथ-साथ जल गयीं। तुम जमीन के बहुत गहरे हिस्से में थे जहाँ तालाब में सुरक्षित थे। ऊपर पहाड़ फट पड़ा था और उसने चारों तरफ तबाही फैलाई थी। निरन्तर सात दिन तक तबाही। कुछ लोग अपनी जानें बचाकर भागे। उनमें से अधिकाँश चीनियों के हाथों मारे गये और जो शेष हैं, उन्हें चीनियों ने कैद कर लिया। उन्हें यह तो पहले ही ज्ञात हो चुका था कि जंग किसकी वजह से शुरू हुई। वे मृत लोगों की लाशों में भी तुम्हें खोज रहे हैं और एक दो रोज बाद इस पहाड़ी पर भी आ जायेंगे। बोलो राज ठाकुर, अब तुम चीनियों से जान बचाकर भागोगे ?”

“अगर मौत आनी ही है महाराज तो चीनियों के हाथों ही मारा जाऊँगा।”

“वे तुम्हें मारेंगे नहीं राज। मौत तो तुम्हारे भाग्य में लिखी ही नहीं है। वे तो तुमसे अमरत्व का रहस्य जानना चाहेंगे। वे जानना चाहेंगे कि एक ज्वालामुखी फटने के बावजूद भी तुम किस तरह बच गये।और मोहिनी का वह मन्दिर कहाँ विलीन हो गया। तुम यही कहोगे न कि तुम्हें कुछ नहीं मालूम, लेकिन तुमने अभी यातनायें देखी कहाँ हैं।”

“लेकिन तुम क्यों यह सब सुनाने आये हो महाराज ? तुम्हारा मुझसे अब सम्बंध ही क्या रहा है ?”

“पुराने रिश्ते याद आ गये तो मैं कैलास पर्वत से इधर निकल आया। यह देखने कि मोहिनी को पाकर तुमने क्या खोया और क्या पाया ?”

“ठीक है महाराज, अब तुमने जान लिया कि मैंने क्या पाया और क्या खोया है तो मेहरबानी करके मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।”

“मैं तुम्हें इस तरह छोड़कर नहीं जाऊँगा। कुछ कर्तव्य मेरे भी शेष हैं। मैं जानता हूँ कि इन विषम परिस्थितियों में तुम मौत को गले लगाने से न हिचकोगे। लेकिन अभी तुम्हारा जीवन शेष है। तुम्हें प्रायश्चित करना है। जिन लोगों का तुमने अपमान किया है, उनके लिए तुम्हारा प्रायश्चित आवश्यक है। और इससे पहले कि कोई जादुई शक्ति या असुर शक्ति तुम्हें दूसरी राह पर ले जाए और तुम्हें चीनियों के हाथों न पड़ने दे, मैं यहाँ आया हूँ। मेरा एकमात्र उद्देश्य यही है कि तुम्हें यहाँ से न जाने दूँ।” इतना कहकर साधू जगदेव ने तेजी के साथ मेरे चारों तरफ एक घेरा त्रिशूल से खींचा और फिर त्रिशूल वहीं गाड़ दिया।
User avatar
Dolly sharma
Pro Member
Posts: 2787
Joined: 03 Apr 2016 16:34

Re: Fantasy मोहिनी

Post by Dolly sharma »

“अब तुम्हें कोई भी असुर शक्ति इस घेरे से निकालकर नहीं ले जा सकती, और न ही तुम अपनी इच्छा से इस घेरे को तोड़कर बाहर निकल सकते हो। इस घेरे को केवल इँसान तोड़ सकता है। ऐसा इँसान जिस पर किसी के जादू का असर न हो और सिवाय चीनियों के इस क्षेत्र में आएगा भी कौन ? अच्छा ठाकुर, मैं चलता हूँ। मेरा कर्तव्य पूरा हुआ।”

जगदेव जिस तरह प्रकट हुआ था, उसी तरह अदृश्य हो गया। और एक बार फिर मेरे चारों तरफ वीराना छा गया। कुछ देर तक तो मैं ठगा सा वहीं खड़ा रहा फिर जैसे कुछ सुध आयी और मैं उस घेरे के पास पहुँच गया जो जगदेव ने खींचा था। परन्तु घेरा पार करते समय मेरे पाँव इतने भारी हो गये कि उठाए न गये और मैं समझ गया कि असीम शक्तियों के स्वामी जगदेव ने मुझे उस घेरे में कैद कर लिया है।

मैं घेरे के भीतर ही सिर थामकर बैठ गया। मेरा सब कुछ मुझसे छिन गया था। कितनी अजीब बात थी कि जिस पर मोहिनी मेहरबान हो और जिसे मोहिनी ने विश्व-सम्राट बनाने की ठानी हो, वह इस तरह अदृश्य दीवारों में कैद अपने भाग्य पर आँसू बहा रहा था। कोई उसके पास नहीं। दूर-दूर तक कोई नहीं। भयानक तन्हाईयाँ हैं। और न पाँवों में जंजीरें हैं, न हाथों में बेड़ियाँ, न कोई पहरेदार है और न ही दीवारों का घेरा है; परन्तु मैं कैदी हूँ।

एक ऐसा कैदी जो न जी सकता है, न मर ही सकता है। वहाँ कोई पत्थर भी न था, जिससे मैं अपना सिर फोड़ लेता।

कहाँ थी मोहिनी ? कहाँ थी वह नन्ही-मुन्नी हसीनों-जमील और कहाँ थी विश्व की वह महान सुन्दरी जिसके दर्शन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था ? उसकी अनगिनत बेशुमार शक्तियाँ अब कहाँ थीं ? वह आत्मायें कहाँ थीं, जो मोहिनी की गुलाम थीं ?कुछ भी न था। सिर्फ धुआँ था, मेरी जिंदगी का धुआँ।

जिस तरह कोई सुनहरा ख्वाब टूटता है, वैसा ही मेरे साथ हुआ था। मैं वास्तविक संसार में था और इसीलिए जिंदा था कि मुझे प्रायश्चित करना है, और यह प्रायश्चित मेरे जीवन में क्या-क्या रंग दिखायेगा, मैं न जानता था।

दिन छिप गया।रात आयी तो ठंडी हवाओं का जोर भी बढ़ गया। सूरज की गर्मी से मुझे दिन भर मौसम की सर्दी का आभास न हो पाया था; परन्तु रात होते ही मौसम की शीतलता ने मेरा बुरा हाल कर दिया।न बिछौना था, न ओढ़ना। दूर बहुत दूर बर्फ़ की बुलन्द चोटियों की सफेदी अब भी नजर आती थी। मैं ठंड से ठिठुरने लगा। रात बीतते-बीतते मेरा बुरा हाल हो गया। मेरे दाँत बज रहे थे। एक-दो बार झपकी सी आयी। फिर मैंने एकाध बार उस घेरे के गिर्द कुछ परछाईंयाँ मँडराते देखीं; परन्तु उसे मैं अपनी नजरों का धोखा ही समझता था। यह सफेद परछाईंयाँ थीं। धुंधली-धुंधली, जैसे कुहासे ने तस्वीरें बनायी हों। वह कुहासा भी हो सकता था क्योंकि सवेरा होने तक कुहासे की चादर तन गयी थी।

अब हर तरफ सफेद-सफेद कुहासा था। उस कुहासे के सिवा कुछ भी नजर नहीं आता था। एक बार मेरे दिमाग में आया कि अगर मेरे पाँव घेरे के पास पहुँचकर भारी हो जाते हैं तो क्यों न मैं रेंगकर उस घेरे को पार करूँ। और मैंने ऐसा किया भी, परन्तु तब भी वही हाल रहा। शरीर ही पत्थर बन गया। मैं काँपता थर्राता अपनी जगह बैठ गया। कोहरा तरह-तरह की तस्वीरें बनाकर गुड़-मुड़ हो रहा था। सूरज नहीं निकला था। मेरा ख्याल था कि सूरज की गर्मी से थोड़ी राहत पा लूँगा और दिन को थोड़ा चैन से सो सकूँगा। प्यास भी बड़ी शिद्दत से लग रही थी। परन्तु न तो सूरज निकला, न पानी मिला। भूखे पेट तो खैर मैं रह सकता था; परन्तु प्यास और ठंडक का मुकाबला करना बड़े धैर्य की बात थी।

कोहरे ने ठंड को और भी बर्फीला बनाकर रख दिया था।जब प्यास बहुत बढ़ गयी तो मैं पागलों की तरह इधर-उधर फिरने लगा। मैं जानता था कि मैं एक झील के पास हूँ, परन्तु वह झील अब मुझसे कोसों दूर थी। कितनी अजीब बात थी कि जिसके घर में गंगा बहे वह प्यासा रहे। फिर मुझे ध्यान आया कि कुहासे के कारण धरती कुछ नम हो चली है। वहाँ घास थी और शायद ही कोई इस बात पर यकीन करें कि मैं घास की नमी चाट-चाटकर प्यास बुझाने का प्रयत्न करने लगा। परन्तु यह नमी ऊँट के मुँह में जीरे जैसी बात थी। प्यास फिर भी न बुझी, परन्तु तनिक राहत सी मिल गयी। कुहासे के कारण अब कुछ भी दिखायी देना बन्द हो गया था।

वह दिन भी ठिठुरते बीता। अधिक थकान के कारण और जागती आँखों की पीड़ा ने सोने का बहाना बनाया। मैं घुटनों में सिर छिपाए सो गया। कितनी देर सोया यह तो पता नहीं; आँख तब खुली जब मैंने शरीर पर सर्द फुहार सी महसूस की।

मैं चौंककर उठ बैठा। बारिश! चूँकि मैं बहुत प्यासा था इसलिए उस वक्त मुझे बड़ी खुशी हुई कि कुदरत ने मेरी सुन ली थी। चाहे वह पानी वर्षा का ही था, परन्तु प्यास तो बुझ ही सकती थी। मैंने ऊपर मुँह उठाकर खोल दिया। थोड़ी देर तक तो पानी की बूँदें टपकती रहीं फिर अचानक जब मुझे कँपकँपी महसूस हुई तो ख्याल आया कि मैं भीग गया हूँ।

हे मेरे भगवान! अगर पानी यूँ ही सर्द फुहारों के साथ बरसता रहा तो मेरा क्या होगा ? जगदेव ने मुझे भयंकर यातना के घेरे में छोड़ दिया था! मैं चीखने लगा। कभी पागलों की तरह जगदेव को पुकारता तो कभी मोहिनी को; परन्तु कौन वहाँ मेरी सुनने वाला था ? फिर उस समय तो मेरी दहशत और भी बढ़ गयी जब बर्फबारी शुरू हुई।

घेरे से बाहर निकलने की मैंने एक आखिरी कोशिश की। हवा में छलांग लगाकर घेरा पार करना चाहा, परन्तु घेरे से बाहर निकलने से पूर्व ही किसी अदृश्य दीवार से टकराकर मैं पुनः अपनी कैदखाने की जमीन पर आ रहा।

अब मेरी हर उम्मीद टूट चुकी थी। डर मौत का नहीं था पर इस तरह तड़प-तड़प कर मरना मुझे गवारा न था। फिर थक-हार कर एक स्थिति ऐसी आयी जब मैं इस योग्य भी नहीं रहा कि अपनी जगह से हिल सकूँ।

मुझे मालूम नहीं था कि बर्फ का मौसम शुरू हो गया है; या यह बे-मौसम की बर्फबारी थी। बहरहाल बर्फ मुझ पर गिर रही थी और क्षण-प्रतिक्षण मैं उसमें फँसता चला जा रहा था। पहले मेरी कमर तक का भाग बर्फ में फँसकर दब गया। बदन पर भी किसी टीले की तरह बर्फ जमनी शुरू हो गयी। अब मैं शरीर का कोई भी अंग न हिला पा रहा था। मेरी आँखों के सामने सफेद अँधेरा फैलता जा रहा था। कब दिन हुआ, कब रात आयी, इसका आभास समाप्त हो चुका था। मेरी सोच भी आख़िर कब तक साथ देतीं ? उन्होंने भी मुझसे नाता तोड़ लिया। जाने कब तककितने अरसे तक मैं इँसान होकर बर्फ का बुत बना रहा।
या बर्फ के भीतर मेरी जिंदा कब्र बन गयी थी।
❑❑❑
User avatar
Dolly sharma
Pro Member
Posts: 2787
Joined: 03 Apr 2016 16:34

Re: Fantasy मोहिनी

Post by Dolly sharma »

जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको नर्म बिस्तर पर पाया। मैंने धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को जगाने की कोशिश की तो अपने आपको जीवित पाया। हैरत की बात तो यह थी कि मैं जीवित था। अब हकीकत भी मेरे सामने खुल गयी थी कि मैं इतनी आसान मौत मरने वाला न था। जीवन के अँधेरों में भटकने वाला एक प्राणी था, जिसकी कोई मंजिल नहीं थी।

समय ने कितने खेल दिखाए थे। हर बार मौत की आरजू मेरे दिल में रह जाती और अब मुझे यकीन हो गया था कि मौत और जिंदगी पर इँसान का कोई बस नहीं।

मैं कहाँ था ? यह जानना सबसे पहले जरूरी था। पहली ही नजर में देखने से पता चल गया कि यह कोई फौजी कैम्प है। जिस खेमे में मैं था वहाँ दो बेड पड़े थे। दूसरा बेड खाली था। रेडक्रॉस के चिह्न को देखते ही मुझे पता चल गया कि मिलिट्री रेडक्रॉस का खेमा है। जिस तरह की बोतलें बेड के सिरहाने वाले स्टैंड पर टंगी थीं उससे पता चलता था कि मुझे ग्लूकोज़ चढ़ाया गया है। हालाँकि मैं बहुत कमजोरी महसूस कर रहा था, परन्तु था पूरे होश- ओ-हवास में।

काफी देर तक मैं बिस्तर पर पड़ा रहा। अतीत की घटनाएँ मेरे जेहन पर आँधियाँ चलाती रहीं और मैं उन आँधियों को सहता रहा। एक-एक घटना मेरे सामने चलचित्र की तरह घूम गयी।

न जाने कितना वक्त उसी तरह पड़े-पड़े बीत गया। फिर मैंने आहट सुनी। खेमे का पर्दा हिला और एक चीनी अन्दर प्रविष्ट हुआ। उसकी सैनिक वर्दी पर रेडक्रॉस का चिह्न स्पष्ट नजर आया था।

उसने सिर को जुम्बिश देकर मुस्कुराते हुए मेरा अभिवादन किया। जवाब में मैं भी मुस्कुरा दिया। उसके बाद वह अंग्रेजी जुबान में बोला–“आपका स्वास्थ्य अब कैसा है ?”

उसके व्यवहार और भाषा में बड़ी शालीनता थी।

“मैं ठीक हूँ।” मैंने उत्तर दिया और पूछा। “लेकिन मैं कहाँ हूँ ?”

“चाइनीज मिलिट्री कैम्प में।” उसने मेरे पास आकर मेरा चेकअप शुरू कर दिया। ब्लड प्रेशर चेक किया। थर्मामीटर से बुख़ार नापा,नब्ज़ देखी, फिर इत्मिनान से स्टूल पर बैठ गया।

रिपोर्ट बुक में कुछ लिखने के बाद वह बोला–“अब कोई खतरे की बात नहीं। आश्चर्य की बात है कि कोई इँसान बीस रोज तक बर्फ की समाधि में भी जीवित रह सकता है! परन्तु तिब्बत में ऐसे करिश्मों की कमी भी नहीं। आप जैसे महान पुरुषों ने ही इस धरती की गरिमा बनाये रखी है। अगर मैं फौजी डॉक्टर न होता तो फिलॉस्फर बनता और आपके जीवन पर रिसर्च करता। फिर भी मैं यहाँ खुश हूँ। खासे तजुर्बे हासिल कर रहा हूँ।”

डॉक्टर एक नौजवान था और काफी खुशमिजाज था। वह मुझे कोई पहुँचा हुआ भिक्षु समझ रहा था।

“मेरा नाम ली संग है।” उसने अपना परिचय दिया। “और मेजर के रैंक पर हूँ। जिस सैनिक टुकड़ी ने आपको तलाश किया था, उसने आपको मृत घोषित किया था। वे इसलिए शव को उठाकर लाये थे क्योंकि वे परीक्षण के लिए आपको कोई नायाब वस्तु समझते थे। जिस जगह ज्वालामुखी फटा हो, जबरदस्त भूकम्प से पहाड़ियाँ ढह गयीं हों; जहाँ दूर-दूर तक जीवन शेष न रहा हो, वहाँ कोई भिक्षु बर्फ की समाधि में आसीन पाया जाए तो यकीनन वह एक नायाब खोज होती है। ऐसी हर चीज पीकिंग पहुँचाई जाती है। परन्तु जब आपको चेक करने का अवसर मिला तो मैंने देखा कि आपकी नब्ज और धड़कन तो बन्द थी परन्तु लहू में गर्मी थी। आपके शरीर का यह विरोधाभास बड़ा विचित्र था। मैंने ऐसे लोगों के बारे में सुना था जो धड़कन और नब्ज बन्द करके समाधि लगाकर महीनों तक जीवित रह सकते हैं। वे ऑक्सीजन के बिना जीवित रह सकते हैं। इसलिए मुझे यकीन हो गया कि आप जीवित हैं और किसी कारणवश आपको मूर्च्छा आ गयी है। और मुझे खुशी है कि मैंने अपनी बात को सफल कर दिखाया।”

चीनियों के बारे में जो मैंने भयानक कहानियाँ सुनी थीं, इस डॉक्टर ने मेरी सारी भ्रांतियाँ दूर कर दी।

“मेरे बारे में अब उनका क्या निर्णय होगा ?”

“शायद आपको पीकिंग के राजदरबार में सम्मानित किया जाए। निश्चित ही आप युद्ध बंदी तो हैं नहीं; न ही आपका सम्बंध तिब्बत के किसी बागी दल से है। और अगर उन्होंने युद्ध बंदी समझा तो मुझे बड़ा अफसोस होगा।”

“मुझे यहाँ कब तक रखा जायेगा ?”

“इसका फैसला कमांडिंग ऑफिसर करेगा, जो पाँच रोज बाद इस सप्ताह के अंत तक यहाँ पहुँच जायेंगे। उन्हें आपके बारे में सूचना दे दी गयी है और वह स्वयं आपसे मिलने यहाँ आ रहे हैं। इस युद्ध का ऑपरेशन उन्हीं के पास था...मेरा मतलब उस युद्ध से, जो तिब्बत के उस रहस्यमयी प्रदेश में लड़ा गया, जहाँ केवल आप अकेले जीवित बरामद हुए हैं।”

“तो क्या मेरी हैसियत यहाँ किसी कैदी के समान है ?”

वह कुछ खिसियानी हँसी हँसकर बोला–“लेकिन आपको किसी प्रकार का कष्ट नहीं होगा। कैदी वह होता है जिस पर निरंकुशता बरती जाती है। आप यहाँ आजादी से घूम फिर सकते हैं, परन्तु कैम्प की सीमा तक ही।”

“यह कैम्प किस जगह स्थापित है ?”

“गाप सोंग से आठ मील उत्तर में।”

मैंने फिर उससे कुछ नहीं पूछा। कुछ देर तक मुझसे बातें करने के उपरान्त वह चला गया।

❑❑❑
Post Reply