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Romance दो कतरे आंसू

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Masoom
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Re: Romance दो कतरे आंसू

Post by Masoom »

सुषमा पागलों की तरह कम्पाउंड में चक्कर काट रही थी।
अचानक एक टैक्सी गेट के सामने आकर रुकी और उसमें से दो चीखें गूजीं- “मम्मी!”
“मम्मी!”
“डॉली! दीप!” सुषमा पागलों की तरह दोनों बांहें फैलाकर चिल्लाई।
डॉली और दीपू टैक्सी से उतरे और दौड़कर मां के सीने से जा लिपटे और बिलख-बिलखकर रोने लगे।
सुषमा रोती जा रही थी और उन्हें चूमती जा रही थी।
“हमें क्षमा कर दो मम्मी।”
“मेरे बच्चो! मेरे जिगर के टुकड़ो।”
अचानक गेट के पास से खुश्क आवाज सुनाई दी, “आ गए तुम्हारे जिगर के टुकड़े तुम्हारे पास?”
“कृष्ण-!” सुषमा चीख उठी।
बच्चे चीखकर मां से लिपट गए।
सुषमा ने दोनों को जल्दी से अन्दर की ओर धकेलते हुए कहा- “अन्दर भाग जाओ और अन्दर से दरवाजा बन्द कर लो।”
और फिर उसने झपटकर दरवाजे की चटकनी लगा दी।
“क्या बात है? अब यहां क्या लेने आए हो?” सुषमा ने गुर्राकर कहा।
“अपनी पच्चीस लाख की हुंडी।”
“कैसी हुंडी?”
“दोनों बच्चों को मुझे दे दो। इन्हें महेश के हवाले करने के बाद मुझे पच्चीस लाख रुपये मिल जायेंगे।”
“नहीं। अब मैं तुम्हारा साया भी बच्चों पर नहीं पड़ने दूंगी। तुम्हें रुपये मिल जायेंगे।”
“बच्चे मिल जाने के बाद रुपये रुपये देता है।” कृष्ण ने चाकू निकालकर कहा, “बच्चों को मेरे हवाले कर दो, वरना तुम्हारी गर्दन काटकर फेंक दूंगा?”
“मुझे भले ही मार डालो, लेकिन बच्चे तुम्हें कभी नहीं मिलेंगे।”
“मान जा सुषमा। क्यों अपनी जिन्दगी से खेल रही है?”
“मैं कहती हूं,चले जाओ यहां से.... वरना चौकीदार आते ही तुम्हें गोली मार देगा।”
कृष्ण झपटकर आगे बढ़ा- और उसने खचाक् की आवाज के साथ चाकू सुषमा के पेट में उतार दिया। सुषमा की एक तेज चीख गूंज उठी।
फिर उसने पेट पकड़े-पकड़े कहा- “मेरे बच्चों, दरवाजा मत खोलना।”
फिर वह धीरे-धीरे नीचे बैठ गई। उसने पेट में धंसा हुआ चाकू नहीं निकाला था जिसकी वजह से खून रुका हुआ था।
तभी एक जोरदार चीख गूंजी- “सुषमा!”
कृष्ण ने घबराकर देखा। महेश अन्दर आ रहा था।
कृष्ण ने उसे देखते ही छलांग लगाई। लेकिन महेश ने बाज की तरह झपटकर उसकी टांग पकड़ी थी। वह धड़ाम से जमीन पर जा गिरा।
महेश ने हांफते हुए कहा, “कुत्ते! आज तूने एक दुनिया उजाड़ दी। तब तू यहां से जिन्दा नहीं जा सकता।”
फिर उसके घूंसे, ठोकरें और लातें कृष्ण पर बरसने लगे।
गेट पर भीड़ जमा हो गई। उस भीड़ में सबसे आगे प्रदीप था। उसके पीछे शंकर, प्रकाश, संध्या, रजनी और उनके बच्चे थे।
संध्या और रजनी चीखकर सुषमा के पास आ गईं।
प्रकाश, शंकर और प्रदीप भी महेश के साथ कृष्ण की पिटाई करने लगे। थोड़ी-सी देर में ही कृष्ण इतना घायल हो गया कि उसमें आंखें खोलने और हिलने-डुलने तक की ताकत न रही।
महेश ने उसका गला पकड़ लिया और उसे दबोचने लगा।
“रहने दो महेश बाबू। इस पापी के खून से अपने हाथ अपवित्र मत करो। कानून इसे खुद ही निबट लेगा।”
महेश उसे छोड़कर सुषमा के पास आ गया।
दरवाजा खोलकर दीपू और डॉली भी बाहर आ गए। और मां से लिपटकर बिलख-बिलखकर रोने लगे।
प्रदीप ने रोते हुए कहा- “दीदी, हम तीनों भाई बहनों के लिए तुमने जो कुछ किया, शायद ही दुनिया की कोई बहन कर सकती। उसका जो बदला हम लोगों ने दिया, वह भी शायद कोई नहीं देगा। तुमने तो हमें अपने पापों का प्रायश्चित करने का मौका तक भी नहीं दिया दीदी।”
“सुषमा के होंठों पर मुस्कराहट बिखर गई। उसने धीमे से कहा, “प्रदीप भैया तुम सब लोग मेरे पास हो, इससे बड़ी भाग्यशाली मौत भला किसे-मिल-सकती है।”
महेश की आंखों से आंसू बह रहे थे। उसने कांपते हाथों से सिन्दूर की डिबिया और मंगल-सूत्र निकाला और भर्राई हुई आवाज में बोला- “सुषमा, जीवन भर तुमने मुझे पराया ही रखा। अब जाते-जाते कम-से-कम इन बच्चों को एक बाप का साया तो दे दो।”
सुषमा ने दर्द भरी मुस्कराहट के साथ गर्दन हिला दी। महेश ने कांपते हाथों से उसकी मांग में सिन्दूर भरा और मंगल-सूत्र उसके गले में पहना दिया।
सुषमा ने एक हाथ बढ़ाकर महेश के पांव छुए और फिर उसकी गर्दन एक ओर लुढ़क गई।
एक साथ कई चीखें गूंज उठीं।
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kamdev99008
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Re: Romance दो कतरे आंसू

Post by kamdev99008 »

महान बनने के लिए बेवकूफ बनने वालों की कहानी है ये
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