वापसी : गुलशन नंदा

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rajsharma
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Re: वापसी : गुलशन नंदा

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रात के तीन बज रहे थे। सर्वत्र सन्नाटा छाया हुआ था। केवल रणजीत अपनी कोठरी में लेटा जाग रहा था। अली अहमद बाथरूम के दरवाजे पर मुसल्ला बिछाए झुका हुआ तस्बीह फेर रहा था। अचानक धीरे से बाथरूम का दरवाजा खुला और सुरंग खोदने वाले साथी ने इशारे से बताया कि सुरंग तैयार हो गई है। अहमद ने इस पाकिस्तानी पहरेदार की ओर देखा कि थोड़ी फासले पर उसकी ओर पीठ के खड़ा बीड़ी पी रहा था और फिर एकाएक खड़े होकर नमाज़ की नीयत बांधते हुए जोर से ‘अल्लाह हू अकबर’ कहा। रणजीत उसी संकेत की प्रतीक्षा में था। आवाज सुनते ही वहाँ से पानी का डिब्बा लेकर अपने कमरे से निकला और इधर-उधर देख कर तेजी से बाथरूम घुस गया।

तभी पहरेदार पलटा और अहमद बे वक्त नमाज पढ़ते देख कर चौंक पड़ा। वह तेजी के साथ उसके पास आया और बोला, “यह इतनी रात में नमाज़ पढ़ने का कौन सा वक्त है।”


अली अहमद ने कोई उत्तर नहीं दिया और निरंतर नमाज़ पढ़ते रहा। तभी बाथरूम में कुछ आहट सुनकर पहरेदार को कुछ संदेह हुआ और वह बाथरूम की ओर झपटते हुए हुए बोला, “कौन है अंदर? खोलो दरवाजा…वरना मैं दरवाजा तोड़ दूंगा।”

अंदर से कोई उत्तर न पाकर उसने दरवाजा खटखटाना शुरू कर दिया। तब भी उत्तर ना मिलने पर उसने पूरी ताकत से दरवाजे पर जोरदार ठोकर मारी। दो ही ठोकरों से दरवाजे धड़ाक से खुल गया। पहरेदार ने लपक कर बाथरूम में घुसना चाहा, लेकिन अहमद शीघ्रता से उछलकर उसे दबोच लिया। दोनों में हाथापाई होने लगी। अहमद उसकी बंदूक छीन लेना चाहता था। अहमद की पकड़ से छूटने की खींचातानी में पहरेदार का हाथ बंदूक के घोड़े पर पड़ गया..एक धमाका हुआ और वह या अल्लाह कहता हुआ लड़खड़ा कर अहमद जमीन पर गिर गया। उसके सीने से खून का फव्वारा छूट पड़ा। पूरे कैंप में खलबली मच गई। पाकिस्तानी अफसर और सिपाही आवाज की ओर लपकने लगे।

धमाके की आवाज सुनकर रणजीत समझ गया कि अब कुशल नहीं है। उसे जल्दी सुरंग से बाहर निकल जाना चाहिए। मैं तेजी से उस टेढ़ी-मेढ़ी तंग और अंधेरी सुरंग में सांप की तरह रेंगने लगा। उसके मुँह, नाक और कानों में मिट्टी भर गई। कई जगह बदन छिल गया, लेकिन उसे साहस नहीं छोड़ा और वह सुरंग के दूसरे सिरे पर पहुँचने में सफल हो गया। सुरंग के अंदर से ही उसने तारों भरे आसमान की ओर देखा और भगवान का शुक्र बनाया। वो खुशी से उन्मुक्त सोच रहा था कि कुछ ही क्षण में वह पाकिस्तानी कैद से आजाद हो जायेगा और अपने देश में पहुँचकर रशीद को पकड़वा देगा…कितना बड़ा छल किया था इन लोगों ने उससे… उसके बाद ही कैदियों के तीन जत्थे जा चुके थे, लेकिन वह कोठरी में पड़ा सड़ रहा था और व्यर्थ प्रतीक्षा कर रहा था कि उसे भिजवा दिया जायेगा…! लेकिन अब…अब स्वतंत्रता उसके सामने है…बस दो कदम और…

और फिर, उसने अपना सिर सुरंग से बाहर निकाला ही था कि उसे अपने पास ही सुरंग के मुँह पर चार-पांच भारी फौजी बूट दिखाई दिए…तभी एकाएक कई हाथ एक साथ उसकी गर्दन पर पड़े और गंदी गालियों की बौछार के साथ उसे घसीट का सुरंग से बाहर निकाल लिया गया।

“तुमने मेरे हमशक्ल को मेरे स्थान पर हिंदुस्तान भेज कर मेरे वतन को धोखा दिया है… मेरी माँ से… मेरे दोस्तों से और मेरी मोहब्बत से छल किया है…वह सब को धोखा देगा…इतना बड़ा फरेब…भाई के बहाने घर बुलाकर उसने मुझे धोखा दिया… मेरा हर भेद ले लिया…मैं…मैं उसे मार डालूंगा…मार डालूंगा उसे।”

रणजीत सेल के बाहर खड़े पाकिस्तानी अफसरों को चिंगारियाँ उगलती आँखों में देखता हुआ पागलों की भांति चिल्लाया जा रहा था। अफसर मुस्कुरा-मुस्कुरा कर उसके पागलपन का आनंद उठा रहे थे।

“घबराओ नहीं…” एक पाकिस्तानी अफसर व्यंग्य से बोला, “अभी डॉक्टर आता ही होगा…तुम्हारा मिजाज़ ठीक कर दिया जायेगा।”

उसी समय एक सिपाही डॉक्टर को लेकर वहाँ पहुँच गया। वही व्यंग्य उड़ाने वाला अफसर डॉक्टर से बोला, “डॉक्टर! आज उसका पागलपन कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। कमबख्त ने चीख-चीख कर नाक में दम कर रखा है। कोई ऐसा इंजेक्शन दीजिए कि दो-चार दिन के लिए तो फुर्सत मिल जाये।”

“यस.. यस…!” कहते हुए डॉक्टर ने बैग से सीरिंज निकाली और उसमें दवाई भरकर पास खड़े हुए सिपाहियों से कहा, “ज़रा मजबूती से पकड़ लो इसे!”


“पकड़ने की क्या ज़रूरत है?” रणजीत ने आगे बढ़ते हुए सिपाहियों को हाथ के संकेत से रोकते हुए कहा, “तुम मुझे बेहोश ही करना चाहते हो ना…लो कर दो बेहोश। लेकिन याद रखो, यूं तो मेरे बदन को बेकाबू कर दोगे. लेकिन मेरी आत्मा को नहीं सुला सकोगे। कभी ना सुला सकोगे।”

यह कहते हुए रणजीत ने अपनी बांह डॉक्टर के सामने कर दी। डॉक्टर ने तेजी से दवाई का भरा सीरिंज उसकी बाहों में खुबो दिया। फिर सीरिंज निकालकर उसकी बांह सहलाता हुआ बोला, “शाबाश…लेट जाओ!”

रणजीत वहीं बैठ गया। उसके सिर में चक्कर सा आने लगा और फिर उसके लेटते ही उस पर गशी छाने लगी।

उधर रात का अंधेरा बढ़ता जा रहा था और रणजीत का मस्तिष्क अंधेरे में गोते खा रहा था उसे यों अनुभव हो रहा था, जैसे वह किसी भारी पत्थर से बंधा हुआ समुद्र की गहराई में उतरता जा रहा हो…एक अजीब सी दुनिया में।

आधी रात के समय मेजर रशीद तंबू का पर्दा हटाकर अंदर प्रवेश हुआ, तो उसके मस्तिष्क को अचानक एक जोरदार झटका लगा…एक सुंदर लड़की हाथों में लाल गुलाब के ताजा फूलों का गुलदस्ता लिए उसकी प्रतीक्षा कर रही थी…पूनम को पहचानने उससे कोई भूल नहीं हुई।

“पूनम.. तुम…इतनी रात गये?” उसने रणजीत के स्वर की नकल करते हुए कहा।

“क्या करती…सुबह तक प्रतीक्षा नहीं कर सकती…तुम मेरी मनौतियों से इतने दिनों बाद लौटे हो।” पूनम ने कहा और भरपूर प्यार से उसकी ओर देखती हुई खड़ी हो गई।

“मुझे तो छुट्टी नहीं मिली…वरना सीधा तुम्हारे पास ही आता।” रशीद ने कहा और आगे बढ़कर उसके कंधों पर हाथ रखना चाहा, तो पूनम झट उसके पैरों में झुकती हुई बोली, “ठहरिये…पहले मैं अपने देवता के चरणों में यह फूल चढ़ा दूं।”

रशीद ने हाथ पकड़ते हुए उसे उठा लिया और अपने निकट खींचते हुए बोला, “नहीं पूनम…प्यार के इन फूलों का अनादर ना करो…इन्हें तो मैं सीने से लगा कर रखूंगा।” और वह फूलों को चूमने लगा।

“कहिए…कभी भूल से भी मुझे याद किया था आपने?” पूनम ने मुस्कुराते हुए पूछा।

“यह क्या कह रही हो…पाकिस्तानी कैट के अंधेरों में बस एक तुम्हारी याद ही तो जुगनू थी.. तुम्हारी कल्पना ही सहारा था और तुम्हारा प्यार ही पूजा…मैं सोते जागते हर समय मैं तुम्हें अपने पास पाता था…दिल में.. आत्मा में…।”

“जानते हो ऐसा क्यों होता था?”

“क्यों?”

“मैं भी पाकिस्तान गई थी।”

“पाकिस्तान…! क्या कह रही हो?” वह आश्चर्य से उछल पड़ा।

“आप इस तरह चौंक क्यों पड़े? आदमी के शरीर पर पहरा बिठाया जा सकता है… उसे कहीं आने जाने से रोका जा सकता है…लेकिन आत्मा पर कोई पहरा नहीं बैठा सकता..।”

वह बोलती रही और रशीद प्यार भरी दृष्टि से से निहारता रहा।

“क्यों…विश्वास नहीं आया क्या?” पूनम उसकी आँखों में देखते हुए पूछ बैठी।

“नहीं पूनम…मैंने कई बार सच में तुम्हें अपने बहुत निकट अनुभव किया था… बहुत ही निकट। पर शायद यही कारण था कि दुश्मन की कठोर कैद को मैं खुशी से झेल गया। तुम्हीं ने मुझे इस योग्य बना दिया था कि हर पल सरल हो गया। कोई दुख दर्द ना रहा।”

“लाओ…तुम्हारे भी दुख मैं अपने सीने में भर लूं…भूल जाओ अपने जीवन की सारी कड़वाहटें…देखो…मैंने तुम्हारी उन अंधेरी राहों में दीपक जला दिए हैं…पुरानी सब बातें भूल जाओ।”

कहते-कहते पूनम ने अपना सिर रशीद के सीने पर रख दिया और हल्की-हल्की सिसकियाँ लेकर उसकी बाहों में मचलने लगी। रशीद ने अवसर से लाभ उठाया और पूनम की उभरी हुई भावनाओं का वैसे ही उत्तर देने लगा। उसने धीरे-धीरे पूनम की पीठ को सहलाना आरंभ कर दिया। पूनम की व्याकुलता बढ़ने लगी और वह उसकी छाती से अपना चेहरा रगड़ने लगी। रशीद ध्यानपूर्वक उसके दिल की धड़कनों को सुनने लगा…उसके गदराये हुए वक्ष का स्पर्श और बालों की भीनी-भीनी सुगंध उसे दीवाना बना दे रही थी…उस पर एक पागलपन सा सवार होने लगा और वह अनायास पूनम से लिपट गया…”
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(शिद्द्त - सफ़र प्यार का ) ......(प्यार का अहसास ) ......(वापसी : गुलशन नंदा) ......(विधवा माँ के अनौखे लाल) ......(हसीनों का मेला वासना का रेला ) ......(ये प्यास है कि बुझती ही नही ) ...... (Thriller एक ही अंजाम ) ......(फरेब ) ......(लव स्टोरी / राजवंश running) ...... (दस जनवरी की रात ) ...... ( गदरायी लड़कियाँ Running)...... (ओह माय फ़किंग गॉड running) ...... (कुमकुम complete)......


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Re: वापसी : गुलशन नंदा

Post by rajsharma »

“नहीं, पूनम नहीं…यह धोखेबाज कपटी है। यह तुम्हारा प्रेमी नहीं…पूनम ये तुम्हारा रणजीत नहीं।”

एक चीख के साथ रणजीत की आँखें खुल गई। वह फर्श पर बिछी चटाई पर लेटा था। उसने यह भयानक सपना देखा था और वह आँखें फाड़े शून्य में देख रहा था। उसकी चीख सुनकर पाकिस्तानी संतरी उसकी कोठरी तक आया और सीखचों के बाहर से बोला, “क्या शोर मचा रखा है?”

“कुछ नहीं…मैं एक डरावना सपना देख रहा था।” रणजीत ने हांफते हुए कहा।

“सिपाहियों के सपनों से डरते हो? उंह भारत का वीर सिपाही है।” संतरी ने व्यंग्य से कहा और मुँह में ही कुछ बढ़ाता हुआ वहाँ से चला गया।

रणजीत ने अंधेरे में उसे गायब होते देखा। उस की सांस अभी तक फूली हुई थी। दिल धड़क रहा था और बदन पसीने से तर था, जैसे मीलों यात्रा तय करके आ रहा हो।

श्रीनगर के ऑफिसर्स मेस रणजीत के कैद से सकुशल लौट आने की खुशी में आज एक विशेष पार्टी का प्रबंध किया गया था। स्टेशन कमांडर और अन्य स्थानीय यूनिटों के कई अफसर भी इस पार्टी में आमंत्रित थे। कुछ सुंदर रमणियाँ भी जगमगाती साड़ियाँ पहने, कश्मीरी शॉल ओढ़े पार्टी की शोभा बढ़ा रही थीं। कुछ यू.एन.ओ. के प्रेक्षक अफसर भी आमंत्रित थे। रशीद कैप्टन रणजीत का रूप धारण की बड़ी योग्यता से अफसरों से घुल-मिलकर बातें कर रहा था।

कर्नल बेल्लीअप्पा ने चीफ गेस्ट का स्वागत करते हुए कैप्टन रणजीत की प्रशंसा में कुछ शब्द कहे और उसके सकुशल, स्वस्थ लौट आने की खुशी में टोस्ट पर चीयर्स हुआ। इस अवसर पर अफसरों के दिल से संदेह को दूर रखने के लिए रशीद ने भी हाथ में विहस्की का एक जाम उठा लिया और फिर विवशत: इस जहर को होंठो तक ले ही जाना पड़ा।

दौर चलने लगे…चेहरे दमकने लगे…हँसी के फव्वारे छूटने लगे। वेटर घूम-घूम कर विहस्की के जाम और स्नेक्स मेहमानों को देने लगे। रशीद को रणजीत के पुराने दोस्तों ने घेर लिया और नशे की तरंग में उन्होंने उस पर प्रश्नों की बौछार कर दी। पाकिस्तानी कैदी के नाते वे उसके अनुभव और विचार जानने के लिए उत्सुक थे। रशीद ने बहुत संभलकर इन प्रश्नों के उत्तर दिये। एक अफसर के प्रश्न का उत्तर देते हुए मैं बोला, “भई तो मानना ही पड़ेगा कि जंगी कैदियों के साथ उनका व्यवहार बुरा नहीं था, जेनेवा के नियमों का पूरा पालन हुआ है।”

“लेकिन हमने तो सुना है, कई कैंपों में काफी जुल्म हुए…अफसरों और जवानों को मारा पीटा गया…भूखों रखा गया…अपमानजनक व्यवहार हुये।” मेजर सिंधु ने रशीद को चमकती आँखों से घूरकर पूछा।

“थोड़ी बहुत मजहबी तंग नज़री तो हर इंसान में होती है…लड़ाई में तो ऐसी भावनाओं को खासतौर से हवा दी जाती है। इसी कारण से कुछ घटनायें हो जाती हैं।”

“और हमारे जवानों की बहादुरी के बारे में उनकी क्या विचार है?” कैप्टन राणा ने जरा जोश में आकर पूछा।

इससे पहले की रशीद इस प्रश्न का उत्तर दे, लेफ्टिनेंट रामआसरे गरज़दार आवाज़ में बोल उठा, “यह तो हमारा दुर्भाग्य था, जो इस समय सीज़फ़ायर हो गया, वरना अब तक हमारे फौजी लाहौर में तिरंगा गाड़ चुकी होती। पैटर्न टैंक, अमेरिकन मिसाइल और सेबर जेट का जादू तोड़ कर रख दिया था भारतीय जवानों ने।”

“सियालकोट, लाहौर, सरगोधा और करांची की बमबारी याद रखेंगे पाकिस्तानी नस्लें।” कहीं और से नशे में डूबी आवाज आई।

न जाने कितनी आवाज और प्रश्नों ने रशीद के मस्तिष्क पर एक साथ आक्रमण किये। अपने देश का यह खुला अपमान उसके मन को सहन न था। लेकिन अपने उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए उसने अपने भावों को रोका और संभलते हुए धैर्य से बोला, “वे तो यह कहते हैं कि उन्होंने हिंदुस्तानी फौज को हराकर घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। उनके पास भारत में ज्यादा हथियार हैं.. उनकी फौज हमारी फौजों से बढ़कर ताकतवर है।”

“अरे जाओ…ताकतवर है…” मेजर सिंधु ने अपने गिलास में और विहस्की उड़ेलते हुए कहा, “अगर सरकार सीजफ़ायर स्वीकार करके हमारे हाथ न रोक देती, तो हम उनका सारा घमंड तोड़ कर रख देते।”

तभी कर्नल बेलीअप्पा ने बीच में आते हुए कहा, “नाउ लीवर इट ब्वॉयज.. ये लड़ाई तो चलती रहेगी। जब युद्ध नहीं होता, फिर की तैयारी होती है..इसी तैयारी को राजनीति में शांति कहते हैं और इसी शांति के नाम पर चीयर्स…बॉटम अप प्लीज….!”

पार्टी समाप्त हुई, तब आधी रात हो चुकी थी। हाल अभी तक जगमगा रहा था। लड़ाई के ब्लैक आउट के बाद यह उजाला बड़ा भला लग रहा था। अधिकांश लोग घरों को लौट गए थे। जो बच गए थे, वे इस आशा से बार-बार घड़ी की दुनिया देख रहे थे कि शायद समय की गति रुक जाए और वह इसी उन्माद में सारी दुनिया से बेखबर अनंत काल तक यहीं बैठे रहे।

रशीद दोस्तों की नज़रों से बचता हुआ मैस से बाहर आ गया। आसमान में घटाओं ने समा बांध रखा था। वातावरण काफ़ी ठंडा हो गया था। डललेक का किनारा शांत और सुनसान था। डल का पानी एक विशाल काली चादर प्रतीत हो रहा था। वह सुनसान सड़क पर धीरे-धीरे पैदल चलने लगा। उसका यूनिट अधिक दूर नहीं था।

अभी कुछ दूर ही चला था कि पीछे से अचानक एक जीप गाड़ी आकर उसके पास रुक गई। रशीद चौंककर खड़ा हो गया और तिरछी दृष्टि से जीप के ड्राइवर को देखने लगा। ड्राइवर ने जेब से सिगरेट निकाला और लाइटर से जलाया। रशीद यह देखकर चौंक पड़ा कि सिगरेट जलाने से पहले ड्राइवर ने दो बार लाइट जलाकर बुझाया था। यह हिंदुस्तान में पाकिस्तानी जासूसी का विशेष संकेत था। फिर भी अपनी संतुष्टि के लिए वह जीप गाड़ी के पास जाते हुए बोला, “कौन सा सिगरेट पीते हो?”

“फाइव…फाइव…फाइव” ड्राइवर ने धीरे से कहा।

“जीप का नंबर?”

“एक्स फाइव…फाइव…फाइव…एक्स 555।” ड्राइवर ने कहा और साथ ही जेब से एक कार्ड निकाल कर रशीद के हाथ में रख दिया। कार्ड पर भी एक्स 555 लिखा हुआ था।

रशीद ने अभी संदेहमयी दृष्टि से ड्राइवर को देखा, तो वह झट बोल उठा, “किसी को शक ना होजाये, मेजर जल्दी लिफ्ट ले लीजये।”

रशीद झट उचककर ड्राइवर के साथ वाली सीट पर आ बैठा। ड्राइवर ने गाड़ी चला दी और धीमे स्वर ने बोला “आपके आने से पहले हमें हिदायत मिल गई थी कि आप पहुँचने वाले हैं और आपकी हर मुमकिन मदद की जाये।”

“यहाँ पर एक्स ट्रिपल फाइव का इंचार्ज कौन है?” रशीद ने कुछ सोचते हुए पूछा।

“आपको हर रात होटल ओबराय पैलेस में मिल सकता है।”

“नाम?”

“जान मिल्ज़…एंग्लो इंडियन है…और उसके साथ एक लड़की रहती है रुखसाना, जिससे वह शादी करने वाला है।”

“तुम्हारा नाम और ठिकाना?”

“शाहबाज…मेजर सिंधु का ड्राइवर।”
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थोड़ी ही देर में गाड़ी वहाँ पहुँच गई, जहाँ रशीद रहता था। उसके नीचे उतरने से पहले ड्राइवर ने दबी आवाज में कहा, “इस वक्त तो आपको बस यही इत्तला देनी थी कि किसी भी मदद की ज़रूरत हो, तो हम हाजिर हैं खिदमत के लिये।”

रशीद ने हाँ में गर्दन हिला दी और गाड़ी से नीचे उतर गया। शाहबाद से तुरंत गाड़ी स्टार्ट कर दी और रशीद कुछ देर वहीँ जीप को अंधेरे में गुम होता देखता रहा।

जॉन मिल्ज़ और रुखसाना का नाम मन में दोहराता रशीद अपने कमरे में दाखिल हुआ। वह अर्दली को पुकारता हुआ आगे बढ़ा, परन्तु काएक चौंककर वह वहीं खड़ा हो गया। सामने मेज पर ताजा गुलाब के फूलों का बड़ा-सा गुलदस्ता रखा था। रशीद धीरे-धीरे मेज के पास आया और ध्यानपूर्वक गुलदस्ते को देखने लगा। फूलों के साथ एक कागज का पुर्जा पड़ा था।

“मेरे रणजीत!

तुम सकुशल लौट आये, यूं लगा, जैसे मेरे जीवन में बहार लौट आईं।

मैं आज ही कमला आंटी के साथ कश्मीर आई थी और आते ही तुमसे मिलने आ गई, लेकिन पता चला तुम मैस में हो और बहुत देर बाद लौटोगे। कल तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी। चश्मा शाही के नंबर 4 टूरिस्ट लॉज में सुबह दस से ग्यारह बजे तक।”

तुम्हारी पूनम

रशीद ने कांपते होठों से पूनम का नाम दोहराया। एक बार फिर उस संक्षिप्त संदेश को पढ़ा। उसका दिल जोर से धड़कने लगा। पूनम के साथ मुलाकात के विचार से नहीं बल्कि इस कड़ी परीक्षा से…। सैनिक जीवन उससे बड़ी-बड़ी विपदाओं का सामना किया था, किंतु रंरणजीत की पूनम से मिलने की कल्पना से ही उसके हाथ पांव कांपने लगे थे। डर इस बात का था कि कहीं इस प्रेम के नाटक में वह पकड़ा ना जाये। अगर पूनम को आभास भी हो गया कि वह उसके रणजीत का डुप्लीकेट है, तो उसकी सारी योजना पर पानी फिर जायेगा।

तभी’ किसी आहट ने चौंका दिया और वह उछलकर अपनी जगह पर घूम गया। सामने उसका नौकर रसूल खड़ा था और उसके हाथ में फूलों का गुलदस्ता देखकर वह लड़खड़ाते हुए बोला, “साहब वह आई थीं आपसे मिलने।”

“कौन?”

“एक लड़की।”

“कुछ कह भी गई है?”

“काफ़ी देर तक बैठी इंतज़ार करती रही…मैंने चाय के लिए पूछा, लेकिन इंकार कर दिया। बस यह पत्र को छोड़ कर चली गई।”

“ठीक है…जाओ, जल्दी से एक कप कॉफ़ी बना लाओ।”

“अभी लाया हुजूर!” यह कहते हुए रसूल बाहर निकल गया।

रशीद ने उन फूलों को सुनना और सामने रखी फूलदान में लगा दिया। उसने वर्दी का कोर्ट उतारकर कुर्सी पर बैठा। सहसा कोट की जेब में से रणजीत का लाइटर निकल कर फर्श पर गिर पड़ा। इसी लाइटर में पूनम की आवाज भरी हुई थी। रशीद ने वह लाइटर उठा लिया और उसे जलाकर पूनम की रिकॉर्डिंग आवाज सुनने लगा। वह कह रही थी – “तुम जा रहे हो रणजीत….मुझे प्रतीक्षा का लंबा समय देकर…लेकिन याद रखना, इस समय का हर क्षण मुझे प्रिय होगा क्योंकि इन क्षणों में मेरा मन अपने प्रीतम की प्यार की माला जपेगा। मुझे विश्वास है कि तुम सकुशल लौट आओगे और जब लौटोगे, तो मुझे अपनी प्रतीक्षा में आँखें बिछाए पाओगे।

उस रात में जाने कितनी बार रसहीद ने बिस्तर पर लेटे-लेटे पूनम की आवाज को सुना। लेकिन जब भी वह इस अजनबी लड़की की कल्पना करता, सलमा का चेहरा उभरकर उसके सामने आ जाता। वह सलमा, जो सीमा पार उसकी याद में खोई उसकी कुशलता की दुआयें मांग रही होगी।
(7)
कड़कड़ाते हुए घी में छांय से प्याज पड़ी और शुद्ध घी की महक रसोई में फैल गई।

सलमा पसीना पसीना होते हुए भी बड़ी लगन से खास लखनवी ढंग के पकवान बनाने में व्यस्त थी।

“हाय अल्लाह! आप तो पसीने से सराबोर हुई जा रही हैं बीबी। हटिये…मैं पका लूंगी।” नौकरानी नूरी ने सलमा के हाथ से कड़छी पकड़ते हुए कहा।

“नहीं नूरी…यह पंजाबी नहीं, लखनवी खाने हैं…ज़रा भी नमक मिर्च कम ज्यादा हो जाये, आग में कसर रह जाये, तो बिल्कुल बेमज़ा हो जाते हैं। मैंने लखनवी मुंत्तनजन और बिरयानी पकाना अपनी फूफी जान से सीखा था। लेकिन भाई…खुदा लगती बात यह है कि इतनी मेहनत के बाद भी उनके जैसा मुत्तंजन अब तक नहीं पका सकती। हालांकि खुदा झूठ ना बुलवाये, सैकड़ों बार मुत्तंजन पका चुकी हूँ, मगर वह बात कहाँ…!” सलमा ने मुँह पर आई बालों के लटों को बायें हाथ से सिर की ओर झटकते हुए कहा और फिर खाना पकाने में लग गई।

तभी दरवाजे पर एक तांगा आकर रुका और एक बड़े मियां खसखस से दाढ़ी रखे, शेरवानी और चौड़ी मुहरी का पायजामा पहने तांगे से उतरते दिखाई दिये। सलमा ने रसोई की खिड़की से देखा और “हाय अल्लाह अब्बा जान!” कहती हुई कड़छी नूरी के हाथ में थमाकर दरवाजे की ओर भागी। लेकिन इससे पहले कि वह उन्हें बाहर जाकर मिलती, उनके अब्बा जान मियां वसीम बेग स्वयं अपना थोड़ा सा सामान उठाये अंदर आ गये।

सलमा ने लपककर उनकी अटैची ले ली और ख़ुश होकर उनसे बोली – “अस्सलाम आलेकुम अब्बा जान…आप अचानक बगैर इत्तला कैसे आ गये?”

“अरे भाई, दम लेने दो…फिर बताता हूँ…क्या बला की गर्मी है यहाँ लाहौर में।” मिर्ज़ा साहब ने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा।

“अरे नूरी जल्दी से शरबत बना कर ले आ।” सलमा ने बाप को सोफे पर बैठा दिया और बोली – “अब्बा जान! यहाँ गर्मी पड़ती है, बहुत है।”

“गर्मी तो अपने लखनऊ में भी पड़ती थी…लेकिन उमस नहीं होती थी। यहाँ तो दम घुटता हुआ सा महसूस होता है।” यह कहते हुए मिर्ज़ा साहब ने शेरवानी उतार कर खूंटी पर टांग दी और संतोष से बैठकर बातें करने लगे।

इतने में नूरी शीशे के जग में शरबत रूहअफ़ज़ा ले आई।

“आहा..!” रूहअफ़ज़ा देखते ही मिर्ज़ा साहब की बांछे खिल गई। गिलास में जग से शरबत उड़ते हुए वह बोले – “रूहअफ़ज़ा को देखते ही दिलो-दिमाग में ताज़गी का अहसास होने लगता है। मैं तो डर रहा था कि कोई अंग्रेजी शरबत ना हो। अजब ना नामानूस सी खुशबू होती है उन शरबतों में।” यह कहते हुए उन्होंने एक और गिलास चढ़ा लिया।

“शरबत से ही पेट न भर लीजिये अब्बा जान…खाने का वक्त हो रहा है…फिर आप कहेंगे, बस भाई, आज खाना नहीं खाया जाता।” सलमा ने गिलास उनके हाथ से लेते हुए नूरी को संकेत किया कि बाकी बचा हुआ शरबत वापस ले जाये।

नूरी शरबत लेकर वापस चली गई, तो सलमा ने कहा -“बहुत दिनों बाद आये हैं आप, अब मैं दो हफ्ते से पहले आपको करांची वापस न जाने दूंगी।”

“दो हफ्ते..!” मिर्ज़ा साहब ने चौंकते हुए कहा – “अरे भाई मैं तो तुम्हें अपने साथ तुम्हारी फूफी जान के यहाँ ले जाने के लिए आया हूँ।”

“क्यों?” सलमा ने प्रश्नसूचक दृष्टि से देखते हुए पूछा।

“क्यों क्या….मैं हज के लिए रवाना होने ही वाला था कि रशीद मियां का खत पहुँचा कि वह किसी सरकारी काम पर बाहर जा रहा है और तुम पीछे घर में अकेली हो। इसलिए तुम्हें लेने चला आया। मालूम होता है, इस साल भी ख़ुदा को हज करवाना मंजूर नहीं है। लखनऊ में था, तभी से इरादे कर रहा हूँ और हर साल कोई ना कोई रुकावट आ पड़ती है। देखो कब बुलाते हैं सरकारे-दो-आलम अपने आस्ताने पर।” मिर्ज़ा साहब ने ठंडी सांस लेते हुए कहा।
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(शिद्द्त - सफ़र प्यार का ) ......(प्यार का अहसास ) ......(वापसी : गुलशन नंदा) ......(विधवा माँ के अनौखे लाल) ......(हसीनों का मेला वासना का रेला ) ......(ये प्यास है कि बुझती ही नही ) ...... (Thriller एक ही अंजाम ) ......(फरेब ) ......(लव स्टोरी / राजवंश running) ...... (दस जनवरी की रात ) ...... ( गदरायी लड़कियाँ Running)...... (ओह माय फ़किंग गॉड running) ...... (कुमकुम complete)......


साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
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Re: वापसी : गुलशन नंदा

Post by rajsharma »

सलमा जब बोल उठी – “आप हज करने चले जाइये। मेरी फ़िक्र न कीजिये।”

“तुम्हें अकेली छोड़कर?”

“अकेले क्यों? नूरी है…खानसामा है…और पास-पड़ोस वाले सभी हमदर्द हैं…मैं यहाँ बड़े आराम से रहूंगी। फूफीजान पर ख्वाह-म-ख्वाह बोझ पड़ेगा।”

“लाहौल विला कुव्वात! इसमें बोझ की क्या बात है? तुम्हारी अम्मी के मरने के बाद उन्होंने तुम्हें अपनी औलाद की तरह पाला है। तुम उन पर बोझ बन सकती हो?” मिर्ज़ा साहब ने कुछ गंभीर होकर कहा। फिर थोड़ा रुक कर बोले – “और फिर तुम तो आप उनकी सगी भतीजी हो। हम लखनऊ वाले तो अजनबी मेहमानों की खातिर तवाजो में जिस्मो जान एक कर देते हैं। मगर तुम क्या जानो जाने आलम पिया के लखनऊ की तहजीब को? तुमने तो पाकिस्तान म आँखें खोली है। अल्लाह अल्लाह क्या लोग थे, क्या शांति थी, क्या वजजा थी उनकी…मुँह खोलते थे, तो फूल झड़ते थे…दुश्मन को भी ‘आप’ ‘जनाब’ कहकर पुकारते थे। मज़ाल है कि कोई नमुनसिब हर्फ़ भी ज़बान से निकल जाये। बच्चे जवान बूढ़े सभी तहजीब और शांति के सांचे में ढले हुए थे हाय –

“वह सूरतें खुदाया किस देश बस्तियाँ हैं,

अब जिनके देखने को आँखें तसरतियाँ है।“

मिर्ज़ा साहब ने शेर पढ़कर एक गहरी सांस ली और सलमा सहानुभूति भरी दृष्टि से उनकी ओर देखती बोली – “अब्बा जान! आप लखनऊ को किसी वक्त भूलते भी हैं या हर वक्त उसी की याद में खोये रहते हैं?”

“बेटी! अपने वतन को कोई कभी नहीं भूलता और फिर लखनऊ जैसे वतन को…जहाँ का हर मोहल्ला-कूचाय वाहिष्ट से कम नहीं था… हर गोशा रश्के चमन था। हज़रत यूसुफ अलै-अस्सआलम मिस्र में बादशाही करते थे और कहते थे कि इस अजीब शहर से मेरा छोटा सा गाँव कितना बेहतर था…और मैं तो लखनऊ छोड़कर आया हूँ बेटी… अमनो-सुकून का गहवारा, शेरो अदब का गुलिस्तां, तहजीबो तमद्दन का मस्कन…और यहाँ आकर मुझे क्या मिला…आये दिन की अफ़रातफरी…हंगामे…शिया सुन्नी फसादात…सिंधी हिंदुस्तानी झगड़े…हुकूमतों की बार-बार तब्दीलियाँ….हिंद पाक जंगें…, बमबारी, तोपों की घन गरज…खून खराबा…सच पूछो तो ऊब गया हूँ। जी चाहता है कि पर लग जायें और मैं यहाँ से उड़कर फिर लखनऊ पहुँच जाऊं। ना यहाँ वह आबोहवा है न वह जौक शौक…हर चीज अजनबी-अजनबी सी लगती है।”

दोनों बाप बेटी कितनी देर तक बातचीत करते रहे, इसका उन्हें अनुमान ना हो सका। वह चौंक तब, जब नूरी ने आकर सूचना दी कि खाना तैयार हो गया है। सलमा उठते हुए बाप से बोली – “चलिए आज आपको लखनवी मुंत्तजन और बिरयानी खिलाती हूँ। आपको लखनऊ बहुत याद आ रहा है ना। इत्तेफाक़ से आज मेरा भी इन्हीं खानों के लिए जी चाहा। मुझे क्या मालूम था कि मेरे प्यारे अब्बा जान आ रहे हैं और मैं उनके लिए बना रही हूँ। चलिए हाथ मुँह धो लीजिए। तब तक नूरी खाना मेज पर लगा देगी।” और फिर वह बाप को बाथरूम की ओर ले जाती हुई ऊंची आवाज में नूरी से बोली – “अरी नूरी ज़रा जल्दी से मेज पर खाना लगा दे।”

नूरी ने जल्दी-जल्दी मेज पर खाना सजा दिया। मिर्ज़ा साहब जब हाथ मुँह धोकर मेज के सामने आये, तो खानों की सुगंध पर फड़क उठे और बोले – “सुभान अल्लाह! यह मेरे लखनऊ की खुशबू है…दुनिया वालों को यह खाने कहाँ नसीब?” और मेज़ पर बैठकर बिस्मिल्लाह कहकर खाने पर टूट पड़े। लेकिन फिर अचानक उन्हें कुछ ध्यान आया और हाथ रोकते हुए बोले – “अरे हाँ….तुम्हें पूछना ही भूल गया कि रशीद मियां खान और कितने दिन के लिए गए हैं। खत में तो उन्होंने कुछ लिखा ही नहीं था।”

सलमा ने उनकी बात का उत्तर देने से पहले क्षण भर के लिए सोचा और फिर बाप की प्लेट पर नींबू के अचार का एक टुकड़ा डालते हुए धीरे से बोली – “आप तो जानते हैं अब्बा जान…वह फौजी अफसर हैं और फौजी लोग अपनी बीवी तक को नहीं बताते कि वह कहाँ और क्यों जा रहे हैं, अल्लाह जाने इस वक्त कहाँ होंगे।”

रशीद ने टैक्सी से झांककर देखा। पहाड़ी के आंचल में छोटे-छोटे सुंदर बंगले बिखरे हुए थे। उससे टैक्सी वाले को वहीं रुकने के लिए कहा और किराया चुकाकर नीचे उतर पड़ा, फिर वह शाही चश्मे के टूरिस्ट लॉज की खोज में आगे चल पड़ा।

लॉज की दीवारों पर खुदे नंबरों को पड़ता हुआ वह नंबर चार की ओर बढ़ने लगा। उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी। किसी अज्ञात डर से उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई। विचारों में खोया वह वहाँ पहुँच गया। लॉज के अंदर जाने से पहले वह एक पल के लिए रुका और उसने जेब से पूनम की तस्वीर निकाल कर देखी। एक बार फिर वह विचार आप उसके मस्तिष्क में आया कि अगर पूनम के मन में उसके प्रति संदेह उत्पन्न हो गया, तो वह क्या करेगा। उसका शरीर कांप उठा।

दरवाजे के पास पहुँचकर उसने दस्तक दी। एक कश्मीरी खानसामा बाहर आया और इससे पहले कि वह उससे कुछ पूछता, वह खुद ही बोल पड़ा – “आप कप्तान साहब है न…कप्तान रणजीत?”

“हाँ!”

“मेम साहब तो कब से आपका इंतज़ार कर रही हैं।”

“कहाँ है पूनम?” रशीद ने अंदर आकर थरथराती आवाज में पूछा।

“वह सामने बगीचे में।” खानसामा ने उधर संकेत किया, जहाँ एक पेड़ के नीचे कुर्सी बिछाये एक सुंदर लड़की बैठी स्वेटर बन रही थी।

पूनम की तस्वीर को जीते जागते रूप में देखकर उसका दिल धड़कने लगा। उसने खानसामा से नज़र मिलाई, जिसके चेहरे पर एक शरारत भरी मुस्कुराहट छिपी हुई थी। रशीद झट पलटा और पूनम की ओर हो लिया।

पूनम के पास पहुँचकर वह ठिठक कर सोचने लगा कि उसे किस नाम से पुकारे। पता नहीं रणजीत उसको कैसे संबोधित करता था। मन ही मन यह निर्णय करके कि उसको पूनम ही कहकर पुकारना उचित होगा, वह आगे बढ़ा। घास पर सूखे पत्तों में हल्की-सी चरमराहट उत्पन्न हुई और पूनम ने झट पलट कर देखा। रणजीत को सामने देखकर बेचैनी से वह कुर्सी से उठी और स्वेटर उसके हाथों से नीचे गिर पड़ा। रशीद ने झुककर स्वेटर उठा लिया और पूनम की ओर बढ़ाता हुआ मुस्कुरा दिया। पूनम ने थरथराते होठों से पुकारा – “रणजीत!”

“हाँ पूनम… तुम्हारा रणजीत!” रशीद में अपने कोट का कॉलर ठीक करते हुए कहा।

“विश्वास नहीं हो रहा।” वह थोड़ा पास आते हुए बोली।

“किस बात का?”

“तुम मेरे सामने खड़े हो।” वह उसे सिर से पैर तक निहारते हुए बोली।

“तुम्हारी पूजा सफल हुई। जो दिये, तुमने मेरी प्रतीक्षा में जलाये थे, उनके प्रकाश के सहारे में तुम तक चला आया।”

“जाइए बातें ना बनाइए। आज दस दिन हो गए आपको ये हुये, मिलने तक नहीं आये।”

“खबर तो भिजवा दी थी ना!”

“इतनी कठोर प्रतीक्षा की कीमत केवल एक खबर से चुकाना चाहते हैं?”

“नहीं पूनम एक बंदी सिपाही जो दुश्मनों की दया से छूट कर आया हो, वह तुम्हारी प्रतीक्षा कीमत क्या चुका सकेगा!”

“यह कैसी बेतुकी बातें कर रहे हैं?”

“बेतुकी नहीं…वास्तविकता है। किसी से नज़र मिलाने को जी नहीं चाहता। क्या-क्या उम्मीदें लेकर गया था युद्ध में? कैसे-कैसे योजनायें बनाई थी, लेकिन सब।” कहते कहते रशीद का गला भर आया और वह आगे कुछ ना कह सका।

पूनम प्यार से उसे देखती है बोली – “युद्ध और प्रेम में तो वह होता ही है।”

“हाँ पूनम…हाँ…बस तुम्हारे प्रेम का सहारा था, जिसने मेरे विश्वास को मजबूत रखा…आशाओं के दिये नहीं बाद बुझने दिये। जब कभी उदास होता था, तुम्हें याद कर लेता था। तुम्हारी मधुर आवाज मेरी कैद के अंधेरों को उजालों में बदल देती थी।”

यह कहते हुए रशीद के पूनम का दिया हुआ सिगरेट लाइटर जेब से निकालकर ऑन कर दिया और पूनम की आवाज को उसके कानों तक ले गया। पूनम ने अपनी आवाज सुनने के बाद अचानक पूछ लिया – “लेकिन आपकी आवाज को क्या हुआ?”
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Re: वापसी : गुलशन नंदा

Post by rajsharma »

रशीद क्षण भर के लिए इस प्रश्न पर घबरा गया, किंतु झट अपने आप को संभाल कर बोला – “कैद की कठोरता, खाना-पीना गले पर भी प्रभाव पड़ता है था। कितने दिनों तक तो बीमार रहा। अब तुम्हारे पास आया हूँ, सब ठीक हो जायेगा।”

“यहाँ कब तक रहना होगा?”

“एक महीना। तभी जाकर छुट्टी मिलेगी। हाँ पूनम…तुम माँ से भी मिलने गई कभी? कैसी है वह?”

“दो दिन की छुट्टी लेकर गई थी। बहुत दिनों से बुखार आ रहा था उन्हें। आपके आने की खबर सुनते ही अच्छी हो गई है। जानते हो, रेडियो पर तुम्हारा संदेश सुनकर वह कितनी खुश हुई। मंदिर में प्रसाद चढ़ाया, सारे मोहल्ले में मिठाई बांटी और तुम्हारे स्वागत के लिए सारे घर की सफाई करवाई। तब तुम्हारे आने की आस लगाये आँखें बिछाए बैठी हैं।”

“तब तो मेरे ना जाने से निराशा हुई होगी।”

“नहीं, बल्कि मुझे सांत्वना देती रही। किसी सरकारी काम में उलझ क्या होगा मेरा बेटा। आपने चिट्ठी तो लिख दी होगी?” पूनम ने रशीद का हाथ थामते हुए उसकी आँखों में झांका।

पल भर के लिए रसीद का दिल कांपा, लेकिन फिर उसने झट कहा – “नहीं पूनम! कुछ ऐसी व्यस्तता थी कि चिट्ठी भी नहीं लिख पाया। जब जाना होगा, तार दे दूंगा। अभी तो कुछ दिन छुट्टी मिलनी मुश्किल है।”

“क्यों? मैंने तो सुना है, जंगी कैदियों को लौट आने पर जल्दी छुट्टी मिल जाती है।”

“हाँ पूनम, तुम्हें ठीक सुना है। लेकिन मेरा केस कुछ अलग है।”

“वह क्यों?”

“अगले हफ्ते यहाँ यूएनओ और हमारे कुछ बड़े अफसरों की एक मीटिंग होने वाली है, जिसमें कुछ जंगी कैदियों से पूछताछ करेंगे। मुझे भी से रोक लिया गया है।”

“कहीं टाल तो नहीं रहे?” पूनम ने मुस्कुराकर पूछा।

“मैं भला ऐसा क्यों करूंगा? और फिर एक वचन भी तो दिया था।”

“क्या?”

“लड़ाई समाप्त होने पर दस दिन की छुट्टी लेकर हम एक साथ कश्मीर की सुंदर वादियों में रहेंगे।”

“ओह! तो याद है, वह वचन आपको!”

“इसी वचन को निभाने के लिए तो सुरक्षित, जीता जागता तुम्हारे सामने आ गया, वरना ना जाने कब किस दुश्मन की गोली का निशाना बन जाता।”

पूनम ने झट अपना हाथ उसके होठों पर रख दिया और बोली – “उई राम! कैसी बात जबान पर लाते हैं!”

पूनम की ठंडी उंगलियों ने रशीद के गर्म होठों को छुआ ही था कि उसके सारे शरीर में एक बिजली किसी लहर दौड़ गई। एक कंपन उसके बदन में हुई और एकटक वह उसे देखने लगा।

फिर जल्दी उसने अपनी भावनाओं को नियंत्रित किया और बात बदलने के लिए पूछ बैठा –

“तुम्हारी आंटी कहाँ है?”

“बाजार थक गई हैं। अभी लौट आयेंगी।”

“वे जानती है, मैं यहाँ हूँ?”

“हहाँ! इसलिए तो पापा को मना कर मुझे साथ लेकर यहाँ आई हैं।”

“पापा अब कैसे हैं?”

“दो-चार दिन ठीक रहते हैं, फिर वही दौरा…फिर ठीक…यही चक्कर रहता है। समझ में नहीं आता क्या करना चाहिए।”

“मेरी मानो तो उन्हें कुछ दिन के लिए किसी हिल स्टेशन पर ले जाओ।” रशीद ने कहा।

“असंभव! मैं तो एक दिन के लिए भी इस घर को नहीं छोड़ना चाहते।”

“दैट्स बेड लक! अच्छा पूनम अब मैं चलता हूँ।”

“अरे वाह!” पूनम न उसका हाथ पकड़ लिया – “यह क्या, अभी आये और अभी चल दिये। आंटी से नहीं मिलोगे?”

“फिर मिल लूंगा। असल में आज मुझे कमांडिंग ऑफिसर से मिलना है। अभी लंच से पहले वक्त लिया है।”

“फिर कब मिलेंगे?”

“जब तुम चाहो।”

“कल शाम?”

“ओके! लेकिन अबकी बार तुम्हें आना होगा।”

“कहाँ?”

“ओबेरॉय पैलेस होटल…शाम से रात के खाने तक तुम्हें मेरे साथ रहना होगा। जी भर कर बातें करेंगे।”

पूनम ने स्वीकृति में गर्दन हिला दी। इसके पहले की रशीद उससे जाने के लिए अनुमति लेकर उठ खड़ा होता, नौकर गरम-गरम कॉफी के दो प्याले ले आया। रशीद पूनम की आंटी की वापसी से पहले ही वहाँ से खिसक जाना चाहता था, लेकिन पूनम के आग्रह पर कॉफ़ी का प्याला लेकर पीने लगा।


जल्दी-जल्दी कॉपी के घूंट गले के नीचे उतारकर रशीद ने पूनम से विदाई ली और फिर टैक्सी की ओर बढ़ा। दरवाजे में खड़ी पूनम एकटक उसे देखने लगी। रणजीत की चाल में थोड़ी कंपन थी। पूनम को कुछ आश्चर्य हुआ, फिर ना जाने क्या सोचकर वह मुस्कुरा दी।

नौकर को कॉफी के खाली प्याले थमाकर ज्यों ही उसने फर्श पर पड़े उस अधूरे बुने हुए स्वेटर को बुनने के लिए उठाया, उसकी दृष्टि उन सूखे पत्तों के बीच जमकर रह गई, जहाँ कुछ देर पहले उसका रणजीत खड़ा था। पत्तों में आधी छिपी, कुछ सुनहरी की चमक रही थी। पूनम ने झुककर देखा। एक लॉकेट था, जिस पर उर्दू में अल्लाह खुदा हुआ था। पूनम आश्चर्यचकित उसे उठाकर देखने लगी। लेकिन इससे पहले कि वह लपककर रशीद से इस बारे में कुछ पूछती, रशीद की टैक्सी वहाँ से दूर जा चुकी थी।

यह लॉकेट पूनम के लिए पहेली बन के रह गया।
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