Adultery शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

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007
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Re: शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

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लगभग 5:00 बजे शहनाज की नींद खुली तो उसे खुद पे शर्म भी आई और आश्चर्य भी हुआ की ये क्या हो गया है आज उसे? वो बाथरूम जाकर नहा ली और फिर फ्रेश होकर वसीम के आने का इंतजार करने लगी।

आज रात को खाना खाते वक़्त शहनाज वसीम से राज चाचा के बारे में पूछी की- "राज चाचा अकेले क्यों रहते हैं, इनका परिवार कहाँ गई?"

वसीम को भी ज्यादा कुछ पता था नहीं तो जो मोटा मोटी पता था उसने बताया की "काफी साल पहले एक आक्सिडेंट में इनकी बीवी की मौत हो गई थी और इसने दूसरी शादी नहीं की और बच्चे बाहर रहते हैं..”

शहनाज को अपने स्वाभाव के अनुसार राज पे उसे दया आने लगी की एक इंसान इतने साल अकेले कैसे गुजार रहा है और ऐसे में अगर कोई मेरी जैसी लड़की उसके सामने रहेगी तो वो भला खुद को कैसे रोक पाएगा? पुरुष के जिश्म की जरूरतें होती हैं और राज चाचा ने इतने सालों पे अगर खुद पे काबू किया तो ये तो बहुत बड़ी बात है। ये तो सरासर मेरी गलती है की मैं ही इनकी परेशानी का सबब हूँ"

शहनाज फिर वसीम से पूछी- "इन्होंने दूसरी शादी क्यों नहीं की। इन्होंने पहली पत्नी के मर जाने के बाद भी दूसरी शादी नहीं की...*

वसीम हँसते हुए बोला- "मुझे क्या पता जान की इन्होंने दूसरी शादी क्यों नहीं की? लेकिन नहीं की और अकेले ही अपनी जिंदगी गुज़ार रहे हैं..."

शहनाज की नजरों में अब राज का कद और ऊंचा हो गया। अगले दिन शहनाज एक बजे के पहले काफी उधेड़बुन में थी। अपने दिमाग में चल रही जंग की वजह से वो अपनी पैंटी ब्रा छत पे सूखने तो दे दी थी लेकिन अब क्या करे वो डिसाइड नहीं कर पा रही थी। कभी वो सोच रही थी की पैंटी ब्रा वापस नीचे ले आती | फिर कभी सोचती की मेरी पैंटी ब्रा को हाथ में लेने और उसपे अपना वीर्य गिराने से अगर राज चाचा को संतुष्टि मिलती है तो मैं इसमें खलल क्यों डालूं? कहीं ऐसा ना हो की ये चीज भी छिन जाने से वो अपसेट हो जाएं। अकेले इंसान के मन में बहुत सारी बातें चलती रहती हैं। इसीलिए जो वो कर रहे हैं करने देती हूँ। मैं सोच लूँगी की मुझे पता ही नहीं है, और मैं उनके सामने जाऊँगी ही नहीं ।

शहनाज यही सब काफी देर से सोच रही थी वो जो कर रहे हैं उन्हें करने देने में ही उनकी भलाई है। और उन्हें थोड़े ही पता है की मुझे पता है। आह्ह... कितनी अच्छी खुश्बू आती है लेकिन उससे पता नहीं कल क्या हो गया था मुझे। मैं अब ऊपर जाऊँगी ही नहीं और देर से अपने कपड़े उठाकर लाऊँगी तब तक वीर्य सूख गया होगा। फिर वो सोचने लगी की उन्हें तो पता ही नहीं है की मुझे उनकी हरकत के बारे में पता है। तो उन्हें अपना मजा लेने देती हूँ और मैं अपना मजा लेती हूँ। उन्हें वीर्य गिराकर सुकून मिलता है और मुझे सूँघकर चाटकर सोचते-सोचते एक बजने वाले थे।

शहनाज अचानक उठी और जाकर चाट में स्टोररूम में छिप गई। उसकी सांसें तेज चल रही थी और दिल जोरों से धड़क रहा था।

तय वक़्त पे राज घर आया और रूम का दरवाजा खोलकर अंदर चला गया। शहनाज की धड़कन और तेज हो गई। उसकी सांस लेने की आवाज भी लग रहा था जैसे बाहर जा रही हो। राज लुंगी और गंजी पहनकर रूम से बाहर आ गया। फिर से उसने पैंटी ब्रा को उठा लिया और चूमता हुआ स्टोररूम के दरवाजा के सामने खड़ा हो गया। उसने लुंगी को साइड करके लण्ड को बाहर निकाला और आगे-पीछे करने लगा। आज शहनाज को और अच्छे से लण्ड के दर्शन हो रहे थे। राज के लण्ड और शहनाज के बीच में बस एक डेढ़ मीटर का अंतर होगा।

शहनाज के हिसाब से राज का लण्ड बहुत ही ज्यादा लंबा, काला, बहुत ही मोटा था और सामने से पूरा सुपाड़ा चमकता हुआ उसे दिख रहा था।

राज फुल स्पीड में मूठ मार रहा था और शहनाज वीर्य के बाहर आने का इंतजार कर रही थी। उसे डर भी लग रहा था और मजा भी आ रहा था। राज के लण्ड ने पिचकारी की तरह तेज धार के साथ सफेद गाढ़ा वीर्य छोड़ दिया, जिसे राज ने ब्रा के दोनों कप में भर दिया और फिर तुरंत ही पैंटी को लण्ड पे दबाकर उसे भिगोने लगा। जब उसका लण्ड शांत हो गया तो उसने हमेशा की तरह शहनाज की पैंटी ब्रा को उसकी जगह में टांग दिया और रूम बंद करता हुआ अंदर चला गया।

शहनाज के लिए अब एक लम्हा भी गुजारना मुश्किल हो रहा था। वो सोची की राज चाचा तो अंदर चले गये और अब 3:00 बजे बाहर आएंगे और दुकान जाएंगे। मैं कपड़े अभी ले जाऊँ या आधे घंटे बाद क्या फर्क पड़ता है ? पसीने से तरबतर हो चुकी थी शहनाज । किसी तरह उसने 5 मिनट गुजारे और फिर स्टोररूम से बाहर आकर ऐसे छत पे आई जैसे नार्मली नीचे से अपने कपड़े ले जाने के लिए आई हो। शहनाज चुपचाप धीरे-धीरे करके अपने कपड़े उठाई और नीचे भागी ।

राज रूम के अंदर से उसे कपड़े उठाते और नीचे ले जाते हुए देख रहा था और उसके चेहरे पे मुश्कान फैल गई। ऐसी शातिर मुश्कान जो शिकारी को तब होती है जब उसका शिकार चारा खाने लगता है।

शहनाज दौड़ती हुई नीचे आई और बाकी सारे कपड़े को टेबल पे फेंकी और पैंटी ब्रा को देखने लगी। पैंटी अलग- अलग जगह से भीगी हुई थी, लेकिन ब्रा के दोनों कप वीर्य से चिप चिप कर रहे थे। शहनाज वीर्य को सूँघने लगी और तुरंत ही नंगी हो गई।
उसने वीर्य से भरे ब्रा को अपने चूची से चिपका लिया। शहनाज सोफे पे सीधा लेट गई और पैंटी को सूँघने चाटने लगी और फिर उसी पैंटी को पहन ली। फिर उसने ब्रा को चूचियों से अलग किया। शहनाज की गोरी-गोरी गोल मुलायम चूचियां वीर्य लगने की वजह से चमक रही थीं। शहनाज ब्रा को अपने चेहरे पे रख ली और पैंटी को नीचे करके चूत में उंगली करने लगी।

शहनाज पागलों की तरह कर रही थी। वो उठकर बैठ गई और पैंटी को उतार दी और ब्रा को पहन ली। फिर वो ब्रा के ऊपर से चूची मसलती हुई चूत में उंगली करने लगी। चूत ने पानी छोड़ दिया और शहनाज शांत हुई।

दौड़कर नीचे आने और पैंटी ब्रा पे लगे वीर्य को सूँघने चाटने की हड़बड़ी के चक्कर में शहनाज अपने घर का दरवाजा बंद करना भूल गई थी।

शहनाज के नीचे आने के दो मिनट बाद राज अपने कपड़े पहनकर चुपचाप नीचे आ गया और छुप कर शहनाज को देखने लगा। वैसे तो उसे शहनाज को देखने के लिए मेहनत करना पड़ता लेकिन दरवाजा खुला होने की वजह से वो पर्दे की आड़ में सब कुछ लाइव देख रहा था। शहनाज के ढेर होने के बाद राज मुश्कुराता हुआ अपने रूम में चला गया। शिकार दाना चुग चुका था और अब बस शिकार करने की देरी थी।

अपने रूम में आकर राज नंगा हो गया और बेड पे लेटकर शहनाज के हसीन जिश्म के सपने देखने लगा की कितना मजा आएगा इस कमसिन काली को चोदने में? कितना मजा आएगा जब ये अपनी टाँगे फैलाकर मेरा मूसल लण्ड अपनी टाइट चूत में लेगी? आहह.. कितना मजा आएगा जब मैं कुतिया बनाकर इसकी गाण्ड मारूँगा? बहुत दिनों तक सस्ती रंडियों को चोदकर लण्ड को शांत किया है, अब वक़्त आ गया है की मेरे इस लण्ड को मस्त माल मिले। मुझे शहनाज को अपनी रंडी बनाना है और इसे दिन रात चोदते रहना है।
चक्रव्यूह ....शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें....उसकी गली में जाना छोड़ दिया

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Re: शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

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(^%$^-1rs((7)
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Re: शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

Post by 007 »

रंडी को क्या लगता है मुझे पता नहीं की वो स्टोररूम में छिपकर मुझे देख रही थी। इसलिए तो पूरा लण्ड उसके सामने कर दिया था मैंने मजा तो तब आएगा मेरी रंडी शहनाज, जब मेरा लण्ड तेरे हाथ में होगा और तू उसे चूसकर उसका वीर्य सीधा अपने मुँह में लेगी।

थोड़ी देर बाद शहनाज उठी तो फिर से उसे अपने आप पे गुस्सा आ रहा था। लेकिन आज का गुस्सा कल से कम था। इन 24 घंटों में उसके दिमाग में बहुत उथल-पुथल मची हुई थी और शहनाज अपने फेवर में अपने मन को समझा चुकी थी। शहनाज नहाने जाने लगी तो उसकी नजर दरवाजे पे पड़ी जो खुला था। उसका मुँह खुला रह गया, क्योंकी वो अब तक नंगी ही थी। हे भगवान् मैं पागल हो गई हूँ। ऐसे दरवाजा खोलकर मैं नंगी घूम रही हूँ और क्या-क्या कर रही हूँ। कहीं किसी ने देखा तो नहीं? फिर वो सोचने लगी की अभी भला कौन आएगा क्योंकी मुख्य दरवाजा तो बंद ही था और राज चाचा तो 3:00 बजे नीचे उतरते हैं। वो रिलैक्स हो गई और दरवाजा बंद करके नहाने चली गई।

वसीम के आने के बाद आज फिर शहनाज और वसीम का टापिक राज ही था। बातें करते-करते शहनाज राज के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाह रही थी। इसलिये वसीम से पूछी "राज चाचा इतने साल अकेले रहे कैसे? क्या इन्हें औरत की कमी महसूस नहीं होती होगी, तुम तो एक हफ्ते में पागल हुए जा रहे थे..."

वसीम हँस दिया और बोला- "जिसके पास तुम जैसी हसीन बीवी हो वो एक हफ्ते क्या एक दिन में ही पागल हो जाएगा। मैं बहुत खुशनशीब हूँ की तुम्हारे जैसी खूबसूरत लड़की मेरी बीवी है ..."

अब हँसने की बारी शहनाज की थी। वो हँसती हुई बोली- “इतनी भी खूबसूरत तो नहीं हूँ..

वसीम ने उसे पीछे से पकड़ लिया और बोला- “तुम माल हो, मस्त माल... गोरा चिकना बदन तुम्हारी चिकनी पीठ, फिसलती हुई कमर और गौरी मुलायम छाती को देखकर मेरा लण्ड कई बार टाइट हो जाता है। मैं तुमसे दूर होकर तो पागल हो ही जाऊँगा.. "

ऐसी तारीफ सुनकर शहनाज गई। रात को शहनाज वसीम को बोली- "कल हम राज चाचा को अपने यहाँ खाना खिलाएंगे, रात में। तुम कल उन्हें बोल देना। जो इंसान इतने सालों से अकेला है, खुद से सब कुछ कर रहा है, उसे हम कभी कभार लंच या डिनर तो खिला ही सकते हैं। वैसे भी वो हमारा मकान मालिक है और जब से हम आए हैं, तब से एक बार भी हमने उन्हें अपने घर नहीं बुलाया है...

अपने पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों से अच्छे रिश्ते बनाना, मिलना जुलना, खाना खिलाना शहनाज और उसकी परिवार की आदत में शुमार था। लेकिन जब से शहनाज यहाँ आई थी तो वो अपने आप में और अपने मेहमानों में ही बिजी थी। कभी वो वसीम के साथ घूमने चली गई थी तो कभी उसके पेरेंट्स या वसीम के पेरेंट्स यहाँ आ गये थे। राज का हिंदू होना भी एक वजह था।

वसीम बोला- “क्या बात है, आजकल राज चाचा का ज्यादा ही ख्याल रखा जा रहा है?" उसने शरारती मुश्कान के साथ ये कहा था।

लेकिन शहनाज डर गई और अंदर से डर भी गई थी। वो बोली- “क्या तुम भी कुछ भी बोल देते हो। कहाँ वो 50-55 साल का आदमी और कहाँ मैं?"

शहनाज सोते समय बेड पे आने से पहले अपनी नाइटी को ढीला कर ली और वसीम से सटकर लेट गई। वसीम के लण्ड में थोड़ी हलचल मच गई। दोनों रोज सेक्स नहीं करते थे। कभी कभार तो एक सप्ताह 15 दिन भी हो जाता था। लेकिन आज शहनाज मूड में थी। वसीम उसे किस करते हुए उसका बदन सहलाने लगा। शहनाज ने खुद को नंगी होने दिया और वसीम के नंगे होने का इंतजार करने लगी। वो अच्छे से करीब से वसीम का लण्ड देखने लगी। उसे लगा की ये तो किसी बच्चे का लण्ड है।

राज का लण्ड उसकी नजरों के सामने घूम गया। वसीम का लण्ड राज के लण्ड का आधा भी नहीं होगा और उसके सामने बिल्कुल पतला था। वसीम का लण्ड स्किन से ढका हुआ था। वो हाथ में लेकर सहलाने लगी और स्किन को पीछे खींचकर सुपाड़े को बाहर करने लगी तो वसीम को दर्द होने लगा और उसने मना कर दिया।

शहनाज उठकर बैठ गई और लण्ड को दोनों हाथों में लेकर सहलाने लगी। शहनाज के इस रूप को देखकर वसीम सर्प्राइज़्ड था। अब तक शहनाज सेक्स में वसीम का बस साथ देती थी, वो भी कभी कभार और आज तो खुद लीड कर रही थी। दो दिन पहले भी शहनाज ने पहल की थी, लेकिन आज तो उसने हद ही कर दी थी।

वसीम शहनाज के ऊपर आ गया और लण्ड को चूत पे रगड़ते हुए अंदर डालने लगा। शहनाज वसीम के लण्ड को चूमना चाहती थी, उसके वीर्य की खुश्बू लेना चाहती थी, लेकिन वसीम तब तक उसके ऊपर आ चुका था। वसीम ने लण्ड अंदर डाल दिया और 8-10 धक्के लगाते ही उसके लण्ड ने पानी छोड़ दिया। शहनाज को तो समझ में ही नहीं आया की हुआ क्या है? वो तो अभी तक शुरू भी नहीं हुई थी की वसीम का खेल खतम हो गया। वसीम बगल में हो गया और करवट बदलकर सो गया।

शहनाज अपनी प्यासी चूत लिए रात भर करवट इधर से उधर बदलती रहीं ।

दिन में शहनाज फिर से दोपहर का इंतजार कर रही थी। अब उसके मन में कोई वंद नहीं चल रहा था। उसने खुद को समझा लिया था की राज कई सालों से अकेला है और मैंने उसकी सोई ख्वाहिशों को जगा दिया है, जिसे वो छिपकर मेरी पैंटी ब्रा पे उतारता है। मुझे उससे उसकी खुशी नहीं छीननी है और मैं उसके वीर्य को सूँघकर चाटकर खुश हो रही हूँ। उसे नहीं पता की मुझे पता है तो दोनों अपना-अपना मजा ले रहे हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

वो अपने वक़्त पे एक बजे से कुछ पहले स्टोररूम में जाकर छिप गई। राज आया और आते वक़्त ही शहनाज की पैंटी ब्रा को देखता गया, जिसे शहनाज ने आज और अच्छे से फैलाया हुआ था। शहनाज चाहती थी की राज को जो सुख मिल रहा है वो अच्छे से मिले। उसने ट्रांसपेरेंट पैंटी ब्रा को छत पे टंगा था।
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Re: शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

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रोज की तरह राज रूम से लुंगी गंजी में आया और शहनाज की पैंटी ब्रा को उठाकर स्टोररूम के दरवाजा के सामने खड़ा हो गया। आज शहनाज कल की तरह तेज सांस नहीं ले रही थी और न ही आज उसकी धड़कन तेज थी। राज ने आज अपनी लुंगी को नीचे गिरा दिया और नीचे से पूरा नंगा हो गया और मूठ मारने लगा।

शहनाज का मुँह खुला का खुला रह गया। राज के लण्ड को इतने साफ से देखकर उसकी धड़कन बढ़ गई। 10 मिनट तक राज पैंटी और ब्रा को चूमता चाटता रहा और लण्ड को आगे-पीछे करता रहा। उसने अपने लण्ड से ऐसे वीर्य गिराया की शहनाज को साफ-साफ वीर्य निकलता दिख रहा था। शहनाज की पूरी पैंटी गीली कर दी राज ने। फिर वो अपने लुंगी को पहनकर पैंटी ब्रा को टांग दिया और रूम में जाकर दरवाजा बंद कर लिया।

राज के लिए भी इंतजार करना अब मुश्किल हो रहा था। वो जानता था की शहनाज उसके सामने छिपकर उसके लण्ड को देख रही है, और अगर वो स्टोररूम के दरवाजे को खोल दे तो शायद शहनाज खुद को चुदवाने से रोक नहीं पाए। लेकिन वो कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था। वो शहनाज को पर्मानेंट रंडी बनाना चाहता था अपनी। अपनी रखैल अपनी पालतू कुतिया बनाना चाहता था जो उसके इशारे पे नाचे । बड़े शिकार को फँसाने के लिए उसे अच्छे से चारा डालकर अच्छे से इंतजार करना होगा और वो कोई गलती नहीं करना चाहता था। वो दरवाजा के पीछे से देखने लगा।

आज राज के अंदर गये हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे की शहनाज स्टोररूम से बाहर आई और अपने कपड़े समेट कर नीचे चली गई। उसने दरवाजा को अच्छे से लाक कर लिया और बाकी कपड़ों को टेबल पे फेंक कर पैंटी को अपने चेहरा पे रख ली और नंगी हो गई। पैंटी में लगा वीर्य उसके चेहरा को भिगोने लगा और उसकी खुश्बू उसके सीने में भरने लगी। शहनाज नंगी होकर रोज की तरह चूत में उंगली करने लगी और वीर्य को चाटने लगी।

राज नीचे आया था लेकिन दरवाजा बंद होने की वजह से वो वापस चला गया था। उसने सोचा की देखने के लिए इतना मेहनत क्या करना।

चूत से पानी निकालने के बाद शहनाज नंगी ही सो गई और शाम तक नंगी ही अपना काम करती रही। राज के वीर्य की खुश्बू ने उसके अंदर की काम ज्वाला को प्रज्वल्लित कर दिया था। वसीम के आने से पहले वो नहाकर फ्रेश हो गई और शाम के दावत की तैयारी करने लगी।

शाम में वसीम आया तो पता चला की उसने राज को अब तक इन्वाइट ही नहीं किया है। शहनाज उससे झगड़ने लगी की मैं इतनी तैयारी कर रही हूँ और तुमने गेस्ट को इन्वाइट ही नहीं किया। वसीम ने तुरंत ही राज को काल किया। वसीम सोचने पे मजबूर हो गया की शहनाज आजकल राज में कुछ ज्यादा ही इंटेरेस्ट ले रही है। कहीं सच में दोनों के बीच कुछ है तो नहीं? उसके दिमाग में बहुत कुछ चलने लगा और उसके लण्ड में हलचल होने लगी की उसकी 23 साल की जवान और बेहद हसीन बीवी एक 50-55 साल के गैर मर्द के चक्कर में है।

राज के पास वसीम का फोन आया की आपका आज रात का खाना हमारे घर पे ही होगा। राज ने दावत कबूल किया और मुश्कुरा उठा। अब वो दिन दूर नहीं था जब शहनाज जैसी मस्त हसीन औरत उसके लण्ड के नीचे होने वाली थी। राज के मन में आगे का पूरा प्लान बन रहा था। उसका शिकार अब उसके पंजे से ज्यादा दूर नहीं था।
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Re: शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

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शहनाज ने राज को डिनर पर बुलाया

शहनाज ने राज पे दया दिखाते हुए ये दावत रखी थी की वो अकेले रहते हैं इतने सालों से और खाना भी खुद बनाते हैं, तो हम हफ्ते में एक बार तो उन्हें अपने यहाँ खिला ही सकते हैं। शहनाज की सोच अब ये बन गई थी की उनके मन में मेरे लिए अरमान हैं, तो मैं उन्हें पता नहीं लगने दूँगी की मुझे पता है और उनकी हेल्प करूँगी। उन्हें मुझे देखना पसंद है तो वो घर आएंगे तो अच्छे से देख सकेंगे, खुलकर बातें कर सकेंगे। इस तरह उन्हें शायद आराम मिले।

शहनाज को क्या पता था की जो बीमारी राज को है ये उसका इलाज नहीं है, बल्कि उस मर्ज़ को और आगे बढ़ाने का उपाय है। शायद पता भी हो लेकिन उसने अपने मन को यही समझा लिया था की वो इस तरह राज की मदद कर रही है।

वसीम भी राजी था की सही बात है, कभी कभार तो हमें राज जी को लंच या डिनर तो कराना ही चाहिए। वसीम भी खाना बनाने में अपनी बीवी की मदद कर रहा था। शहनाज बहुत अच्छी साड़ी पहनी थी और बड़े प्यार से सारा खाना बनाया था। उसकी ये साड़ी भी डिजाइनर ही थी जिसमें क्लीवेज और पीठ दिख रही थी। शहनाज लो-वेस्ट साड़ी ही पहनी थी। साड़ी का आँचल ट्रांसपेरेंट था जिससे शहनाज की नाभि और क्लीवेज साफ दिख रही थी। हालांकी ये कोई नई बात नहीं थी। शहनाज हमेशा ऐसे ही कपड़े पहनती थी।

फिर भी वसीम ने मजाक में शहनाज से कहा- "आज तो राज जी पे तुम बिजलियां गिराने वाली हो...

शहनाज भी मुश्कुरा दी। उसका इरादा तो यही था ।

राज अपने वक़्त पे घर आ गया और फ्रेश होकर वसीम के घर आ गया। राज ने सफेद कुर्ता पाजामा पहना था। दरवाजा पे नौ करते ही शहनाज दौड़कर दरवाजा खोली। वसीम टीवी देख रहा था और जितनी देर में वो उठता तब तक शहनाज दरवाजा खोल चुकी थी।

राज के ऊपर दरवाजा खुलते ही जैसे बिजली गिर पड़ी। शहनाज को देखकर उसके जिश्म में सिहरन हो गई। राज ने शहनाज को जब भी देखा था तो दूर से देखा था। इतने करीब से ये पहला मौका था उस हुश्न का दीदार करने का। शहनाज भी बिजली गिराने को तैयार ही थी।

ट्रांसपेरेंट साड़ी के अंदर से झांकता गोरा चिकना कमसिन बदन, माँग में सिंदूर, माथे पे लाल बिंदी, आँखों में काजल, होठों पे मरुन लिपस्टिक, गले में एक चैन क्लीवेज तक और मंगलसूत्र ब्लाउज़ के ऊपर, हुए

ब्लाउज़ के ऊपर से झांकती हुई चूचियां, गोरा चिकना पेट नाभि के नीचे तक, दोनों हाथों में पूरी चूड़ियां और पैरों में पायल शहनाज साक्षात अप्सरा लग रही थी। राज उसे देखता ही रह गया। उसे इस तरह की उम्मीद नहीं थी। उसका मन हुआ की अभी ही शहनाज को बाहों में भर ले और उसे चूमना स्टार्ट कर दे।

शहनाज जब मुश्कुराती हुई खनकती आवाज में- “आइए ना चाचाजी.." बोलती हुई दरवाजे के आगे से हटी तब राज झटके से होश में आया ।

राज "आँन्न्.. हाँन्..." बोलता हुआ अंदर आया ।

शहनाज अंदर जाती हुई वसीम को आवाज लगाई- “उठिए ना, देखिए राज जी आए हैं, आप कब से टीवी ही देख रहे हैं..."

राज पीछे से शहनाज की चमकती पीठ और कमर में हो रही थिरकन का मजा ले रहा था।

वसीम तब तक राज का स्वागत करने के लिए उठ चुका था और राज को बोला- “आइए अंकल, बैठिए, कैसे हैं?"

राज अब सम्हल चुका था और “सब बढ़िया आप सुनाइए ?” बोलता हुआ सोफे पे बैठ गया ।

वसीम और राज बातें करने लगे। तब तक शहनाज किचेन से एक ट्रे में पानी और कोल्ड ड्रिंक ग्लास में ले आई और राज को बड़े अदब से सर्व की। शहनाज के झुकते ही उसकी चूचियां ब्लाउज़ से बाहर निकल जाने को आतुर हो जाती थीं। राज और वसीम ने कोल्ड ड्रिंक और पानी ले लिया तो फिर शहनाज किचेन की तरफ वापस चल दी।
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