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Adultery शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

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Re: Adultery शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

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राज को बहुत मजा आया। बरसों से किसी ने उसे इस तरह नहीं जगाया था। वो आँखें खोलकर शहनाज को देखा तो मेकप के बाद शहनाज और हसीन लग रही थी। वो शहनाज को देखता ही रह गया की शहनाज गई।

राज ने नजरें नीची कर ली और उठकर बैठ गया।
शहनाज उस रूम से निकलकर अपने रूम में गई और वसीम को भी जगाई। दोनों जाग कर बाहर आ गये और सोफे पे बैठ गये। शहनाज दोनों को मार्निंग चाय सर्व की।

राज के कप उठाते ही राज का हाथ थोड़ा हिला ।

शहनाज तुरंत ताना मारी- “संभाल कर राज जी , जमीन पे मत गिराइए..

राज समझ गया की रांड़ क्या बोल रही है? लेकिन वो सिर झुकाए चाय पीने लगा।

नाश्ता करके वसीम और राज अपने-अपने कम पे चले गये और शहनाज सोचने लगी की क्या किया जाए? अब वो और देर नहीं करना चाह रही थी। उसने सोच लिया की आज दोपहर में उसे राज से बात कर ही लेनी है, क्योंकी कल सनडे है। कल वसीम घर में रहेंगे तो फिर बात नहीं हो पाएगी। अब उसकी हिम्मत बहुत बढ़ गई थी। शहनाज दोपहर का इंतजार करने लगी। दोपहर में जब राज घर आया, तब तक शहनाज मन बना चुकी थी।

राज घर आया तो उसने आज भी शहनाज का दरवाजा अंदर से ही बंद देखा उसे आज बुरा नहीं लगा क्योंकी उसे 100 फीसदी यकीन था की आज शहनाज उसके पास जरूर आएगी। वो अपने रूम में गया और लुंगी गंजी पहनकर बाहर आ गया।

शहनाज टाइम का अंदाजा लगाकर थोड़ी देर बाद छत पे चली आई। राज अभी शहनाज की पैंटी को हाथ में लिया ही था की शहनाज वहाँ पहुँच गई।

शहनाज राज जी ये क्या कर रहे हैं आप?”

राज ने ऐसी आक्टिंग की जैसे हड़बड़ा गया हो- "कुछ नहीं। ये तो बस नीचे गिर गया था तो उठा दे रहा था..."

शहनाज राज की हड़बड़ाहट देखकर मुश्कुरा दी। वो नहीं चाहती थी की उसके देख लेने से राज अपराधी महसूस करे। मुश्कुराती हुई शहनाज बोली - "मुझे सब पता है की रोज आप मेरी पैंटी के साथ क्या करते हैं? मुझे ये भी पता है की आज सुबह आपने क्या किया है?"

राज चुपचाप नजरें झुकाए खड़ा था। वो ये सब भाषण के लिए तैयार था। तभी तो वो अपनी चाल को और आगे बढ़ाता और शहनाज उसमें राज की पालतू कुतिया बनने के लिए अपने आपको फँसाती ।

शहनाज राज के करीब आते हुए बड़े प्यार से और समझाने के लहजे में बोली- “मुझे पता है राज जी की आप बहुत अरसे से अकेले हैं और मैंने यहाँ आकर आपकी सोई तमन्नाओं को जगा दिया है। मुझे आपके बारे में कुछ पता नहीं था इसलिए मैं जैसे रहती थी वैसे ही हमेशा रहती रही। मुझे पता है की हर मर्द को जिश्म की अपनी जरूरतें होती हैं, भला मैं क्या करती ? मेरी क्या गलती की मैं खूबसूरत हूँ? मैं बचपन से ऐसे ही कपड़े पहनती आई हूँ। लेकिन जब से मुझे आपकी हालत पता चली है मैं खुद को आपके सामने लाने से बचती रही..."

राज फिर भी चुप रहा।

शहनाज फिर आगे बोली- "फिर मैंने सोचा की इस तरह दूर रहकर मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकती। एकलौता उपाय था की हम इस घर से चले जाते, और इसके लिए मैंने वसीम से बात भी की। लेकिन उसने कहा की तुरंत दूसरा घर कहाँ मिलेगा और उसने बात को टाल दिया। अब ये संभव नहीं था की यहाँ रहते हुए आपसे दूर रह पाऊँ। कपड़े मुझे छत पे ही देने होते सूखने के लिए ।

किसी ना किसी तरह आपकी नजर मुझपे पड़ती ही, आप मेरी आवाज भी सुनते ही। तब सिर्फ एक उपाय था की फिर आपसे छुपने से आपकी मदद नहीं होगी, बल्कि खुलकर आपके सामने आना होगा...."

शहनाज सांस लेने के लिए रुकी और फिर बोलना चालू की- "मैं कई बार सोची की आपको बोलूं, आपकी मदद करूँ लेकिन आप मेरी तरफ देखते ही नहीं हैं। मैं आपको कितना हिंट दी, कितनी तरह से कोशिश की की आप मुझे देखें, मेरे से बातें करे। लेकिन अकेले में तो आप बहुत कुछ कर लेते हैं, लेकिन सामने तो नजर भी नहीं उठाते। तब जाकर फाइनली मैंने सोचा की आज आपसे खुलकर बातें कर ही लूँ..."
चक्रव्यूह ....शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें....उसकी गली में जाना छोड़ दिया
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Re: Adultery शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

Post by 007 »

अब राज के बोलने की बारी थी- "तो क्या करूँ मैं बोलो। सालों से मैं अपनी वीरान जिंदगी को अपनी तन्हाई के साथ गुजर रहा था। सब कुछ ठीक चल रहा था की अचानक तुम सूखी धरती पे पानी की फुहार बनकर यहाँ आ जाती हो। तुम्हारे जैसी खूबसूरत लड़की एक ऐसे मर्द के सामने आ जाती है जो कई सालों से अकेला है, तो उसके अरमान नहीं जागेंगे क्या? अरे तुम तो ऐसी हो की कोई भी तुम्हें देखकर खुद को ना रोक पाए, लेकिन मुझे खुद को रोकना पड़ा। देखो खुद को। तुम हूर अप्सरा को मात देने वाली हसीना हो और मैं बदसूरत। तुम दूध से भी गोरी हो और मैं बिल्कुल सांवला । तुम्हारी छरहरी काया किसी मुर्दे में भी जान डाल सकती है और मैं मोटा और तोंद निकला हुआ। तुम अपनी कमसिन उम्र में हो और मैं बुढ़ापे की ओर जाता हुआ एक हारा हुआ इंसान । तुम किसी और की अमानत हो और मैं किसी का घर नहीं उजाड़ना चाहता तो मुझे यही रास्ता नजर आया की मैं तुमसे दूर रहने की कोशिश करूँ, और फिर भी खुद को रोक नहीं पाया तो अकेले में ऐसा किया। मुझे माफ कर दो। आगे से ऐसा कुछ नहीं करूँगा मैं, चाहे कुछ भी हो जाए ...

राज अपनी बात खतम करने के बाद अपने रूम की तरफ चल पड़ा, जैसे वो अपनी बात पे अब कायम रहना चाहता है। वो इंतजार कर रहा था की शहनाज पीछे से आकर उसे पकड़ लेगी। शहनाज राज को पीछे से पकड़ी तो नहीं लेकिन उसके सामने जरूर आ गई।

शहनाज बोली “तो आपने मुझसे कभी बात क्यों नहीं की? मुझसे बात करते हँसी मजाक करते तो शायद आप राहत महसूस करते। मैंने तो कितनी बार कोशिश की। मुझे आपके दर्द का अंदाजा है। तभी तो जब आपने बात नहीं की तो मैं ही आ गई बेशर्म बनकर आपसे बात करने। राज जी , मैं आपकी मदद करना चाहती हूँ। अब मैं क्या करूँ की मैं इतनी खूबसूरत हूँ?"

राज बोला- “और चिंगारी को हवा दूं। देखता भी नहीं हूँ तब भी तो इतना मुश्किल है, अगर बात करता या हँसी मजक करता तो शायद तुम्हें पकड़ ही लेता." राज अब अपने घर के अंदर आ गया। बाहर बात करने का काम हो चुका था।

शहनाज भी राज के पीछे-पीछे उसके रूम में आ गई। आज वो रुकना नहीं चाहती थी।

शहनाज आज वो अधूरी बात नहीं छोड़ना चाहती थी। बहुत हिम्मत जुटाकर वो आई थी और उसने फैसला किया हुआ था की अब राज को तड़पने नहीं देना है। शहनाज राज के सामने आती हुई बोली- "तो पकड़ क्यों नहीं लिए। मैं तो आपको कितनी हिंट दी, कितने इशारे दिए। पकड़ लीजिए ना, उतार लीजिए अपने अरमान लेकिन इतने परेशान नहीं रहिए.." ऐसा बोलते हुए शहनाज राज के गले लग गई।

शहनाज की चूचियां राज के सीने से दबने लगीं, कहा- "राज जी मैं आपको तड़पता नहीं देख सकती..."

राज का जी चाहा की वो भी शहनाज को कस के अपनी बाहों में दबा ले। लेकिन अभी खेल पूरा नहीं हुआ था। राज पीछे हटता हुआ बोला- "नहीं, ये मैं नहीं कर सकता। मैं वसीम के साथ चीटिंग नहीं कर सकता की उसकी गैर हिजिरी में मैंने उसकी हसीन बीवी के साथ जिस्मानी संबंध बनाए। नहीं शहनाज मुझसे ये गुनाह मत करवाओ..."

शहनाज भी और आगे आ गई और फिर से राज से चिपक गई "कोई पाप नहीं कर रहे आप राज जी । मैं अपनी मर्ज़ी से आपके पास आई हूँ। मेरी वजह से आपकी ये हालत हुई तो मेरा फर्ज़ बनता है आपकी मदद करने का। मुझे अपना फर्ज़ पूरा करने दीजिए राज जी " कहकर शहनाज राज से कसकर चिपक गई और उसकी छाती को चूमने लगी।

राज अभी भी पीछे हटना चाह रहा था, लेकिन अब उससे ऐसा हो ना सका। वो बस खड़ा रहा।

शहनाज अब पागल हो रही थी। उसे राज से ये उम्मीद नहीं थी। उसने सोचा था की वो राज को खुद को आफर करेगी तो वो मना नहीं कर पाएगा और फिर धीरे-धीरे उससे बात करके उसकी फीलिंग्स को हल्का करेगी। अपने जिश्म को पूरी तरह पेश करना तो आखिरी हथियार होता। लेकिन राज पे अभी तक बाकी अस्त्र-शस्त्र का असर तो हुआ ही नहीं था। लेकिन शहनाज आज फैसला करके आई थी की वो कुछ भी करेगी लेकिन राज को अब और नहीं तड़पने देगी। उसने फिर से सोच लिया की कुछ भी करना पड़े तो वो करेगी। कुछ भी मतलब
कुछ भी।

शहनाज- “मुझे देखिए राज जी , मुझसे बातें कीजिए, जैसी चाहे वैसी बातें कीजिए, जो भी सोचते हैं वो बोलिए। अपने आपको रोकिए मत, अपनी भड़ास बाहर निकालिए। तभी आप खुद को हल्का कर पाएंगे..."

राज के लिए बड़ा मुश्किल वक़्त था।

शहनाज अपनी पकड़ को थोड़ा ढीला की और अपने आँचल को हटाकर जमीन पे गिरा दी "आप मेरे जिश्म को देखना चाहते हैं तो देखिए। आप मुझसे गंदी बातें करना चाहते हैं तो करिए। बाहर निकालिए अपनी भड़ास अंदर ही अंदर मत घुटिए राज जी मुझसे आपका तड़पना नहीं देखा जाता ...

::
राज को अब खुद को रोकना जरुरी नहीं था। अब उसे शहनाज की प्यास बढ़ानी थी। उसने शहनाज को अपनी बाहों में जकड़ लिया और उसकी नंगी पीठ को सहलाने लगा। राज ने शहनाज के चेहरे को ऊपर उठाया और उसके रसीले होठों को चूमने लगा। वो पागलों की तरह शहनाज को चूम रहा था और उसके बदन को सहला रहा था जैसे नदी का बाँध टूट गया हो आज ।

शहनाज अपनी जीत मानकर राज का पूरी तरह साथ दे रही थी। शहनाज भी राज की गंजी को ऊपर कर दी और उसकी लुंगी को खोलकर गिरा दी। राज नीचे से नंगा था। शहनाज भी उसकी पीठ और गाण्ड को सहला रही थी।

राज ने एक पल के लिए शहनाज के होठों को छोड़ा और फिर से चूसने लगा। वो शहनाज की जीभ को चूस रहा था। ये सब नया अनुभव था शहनाज के लिए और उसका जिश्म पिघलता जा रहा था ।

राज ने शहनाज के होठों को छोड़ा और गाल गर्दन पे किस करता हुआ बोला- “हाँ शहनाज... मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ, तुम्हें छूना चाहता हूँ, चूमना चाहता हूँ, मैं तुम्हें चोदना चाहता हूँ, मसलना चाहता हूँ, चाहता हूँ की वैसे चोदूं जैसे एक रंडी को चोदा जाता है लेकिन कोई गलत नहीं करना चाहता...'

शहनाज भरपूर साथ दे रही थी राज का। उसने अपनी साड़ी की गाँठ को खोल दिया तो साड़ी नीचे गिर पड़ी। शहनाज ने पेटीकोट का नाड़ा भी खोल दिया और वो भी शहनाज के कदमों में जा गिरी। 23 साल की शहनाज अब पैंटी और ब्लाउज़ में थी और 50 साल का राज सिर्फ गंजी में ।

शहनाज- “तो देखिए ना, चूमिए, चूसिए, मसलिए, चोदिए मुझे रंडी की तरह चोदना चाहते हैं तो रंडी की तरह चोदिए। मैं आपके लिए रंडी बनने को भी तैयार हूँ। आपसे बात करने के लिए और आपको दिखाने के लिए रंडी बनी ही तो घूमती हूँ आजकल आपके आगे-पीछे..” कहकर शहनाज अपने ब्लाउज़ का हुक खोलने लगी।

शहनाज खुद से अपने कपड़े इसलिए उतार रही थी की राज को शर्मिंदगी का सामना ना करना पड़े। राज को ये ना लगे की उसने गलत किया है। शहनाज ब्लाउज़ का हुक खोल दी और अब उसकी ब्रा चूचियों को कैद किए दिख रही थी। शहनाज राज के लण्ड को हाथ में लेना चाहती थी लेकिन वो ऐसा कर नहीं पाई। उसे शर्म आ रही थी।
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Re: Adultery शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

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राज फिर से शहनाज के होठ चूम रहा था और शहनाज के ब्लाउज़ और ब्रा को ऊपर उठा दिया और बाहर आ चुकी नंगी चूचियों को मसलने लगा। दोनों को करेंट जैसा लगा। राज कस के चूचियों को मसलने लगा।

शहनाज आहह... करती हुई राज के लण्ड को पकड़ ली "उफफ्फ ... देखने में जितना बड़ा लगता है ये तो उससे बहुत बड़ा है। ये चूत में जा पाएगा क्या?"

राज ने शहनाज को खड़े-खड़े ही गोद में उठा लिया और बेड पे गिरा दिया। शहनाज बेड पे सीधी लेट गई और राज ने भी अपनी गंजी को उतार दिया और शहनाज के ऊपर लेट गया। वो शहनाज की चूची चूसता हुआ उसके गोरे चिकने बदन को सहला रहा था। उसने शहनाज के ब्रा के हुक को खोल दिया और बाउज़ ब्रा को उतार दिया। शहनाज अब ऊपर से नंगी थी। राज शहनाज के पेट जाँघ को सहला रहा था और चूचियों को चूस और मसल रहा था। राज ने शहनाज की पैंटी को भी नीचे खींच लिया तो शहनाज ने कमर उठाकर राज की हेल्प कर दी। शहनाज की पैंटी भी उतर गई और उसे भी राज ने नीचे फेंक दिया। शहनाज और राज पूरी तरह नंगे थे और राज शहनाज के दोनों पैरों के बीच ने बैठकर उसकी चिकनी रसीली चूत को चाट रहा था। राज दोनों हाथों से
शहनाज की चूत को फैला रहा था और जीभ को छेद के अंदर डालकर चूस रहा था।

"
राज - “आहह.... मेरी रानी, क्या रसीली चूत है तेरी क्या खुश्बू है, आहह.... मजा आ जाएगा इसे चोदकर मेरी रंडी..."

शहनाज को बहुत मजा आ रहा था। ये सब पहली बार हो रहा था उसके साथ। वो अपनी कमर उठाकर राज का चेहरा अपनी चूत पे दबा रही थी राज की उंगली चूत के अंदर थी और उसने अपनी उंगली में गरम पानी की धार को महसूस किया। रंडी शहनाज झड़ चुकी थी। शहनाज हाँफ रही थी।

अब शहनाज की बारी थी। वो उठी और राज को बेड पे लिटा दी और उसकी छाती को चूमती हुई पेट और जाँघ को सहलाने लगी। फिर शहनाज ने राज के लण्ड को फिर से हाथ में ले लिया। अब वो लण्ड को देख भी रही थी

और सहला भी रही थी। राज के लण्ड के आगे वसीम का लण्ड सच में बच्चा था। शहनाज लण्ड पे हाथ आगे- पीछे कर रही थी और कटे हुए स्किन को और चमकते हुए सुपाड़े को देख रही थी।

राज शांत सा लेटा हुआ था। उसकी चाल का अगला कदम आ गया था। लेकिन वो लालच में रुका हुआ था की शहनाज उसके लण्ड को मुँह में लेगी।

शहनाज ने सुपाड़े पे किस की तो उसे वही खुश्बू आई, जिसकी वो दीवानी थी। शहनाज उस खुश्बू को अच्छे से सूँघते हुए सुपाड़े पे जीभ लगाई और चाटी । शहनाज को अपना मुँह बड़ा सा खोलना पड़ा और वो राज के मूसल लण्ड के सुपाड़े को मुँह में लेकर चूसने लगी।

जितना मजा शहनाज को आ रहा था, उससे ज्यादा मजा राज को आ रहा था। लेकिन अब वक़्त आ गया था शहनाज को रोकने का। राज ने शहनाज को खुद से अलग किया और खड़ा हो गया।

शहनाज चकित सी उसे देखती रही की उससे कुछ गलती हो गई क्या?

राज ने अपनी लुंगी को लपेट लिया और गंजी पहनता हुआ शहनाज को बोला- “शहनाज तुम जाओ यहाँ से ये गलत है और मैं ये नहीं कर सकता। अपने कपड़े पहनी और चली जाओ यहाँ से, प्लीज..."

शहनाज अभी भी चकित ही थी- "क्या हुआ राज जी । मुझसे कुछ गलती हो गई क्या? पहली बार लण्ड चूस रही हूँ, इसलिए ठीक से चूसना नहीं आया होगा। अब मैं ठीक से करूँगी। आइए.."

राज दूसरी तरफ मुँह करके खड़ा था जैसे वो शहनाज के नंगे बदन को देखना नहीं चाहता हो। उसकी तरफ बिना देखे हुए राज बोला- “नहीं शहनाज, तुम अच्छे से चूस रही थी। कोई गलती नहीं की तुमने । लेकिन मैं गलत नहीं कर सकता। जितना मैंने किया उसके लिए मुझे माफ कर देना। तुम किसी और की अमानत हो। बीवी हो किसी और की। मैं दूसरे की बीवी के साथ छिपकर ऐसा नहीं कर सकता। ये बहुत बड़ा गुनाह है। तुम जाओ यहाँ
से..."

शहनाज चिड़चिड़ा गई की उसके जैसी खूबसूरत औरत उसके सामने खुद को पेश कर रही है और ये पागल इंसान मना कर रहा है। शहनाज का नंगा जिश्म पूरी तरह गरम था और वो अपनी चूत में राज का लण्ड लेने का इंतजार कर रही थी और ये पागल राज फिर से पुराने राग को गाने लगा था ।

शहनाज बेड से उठकर राज की तरफ आगे बढ़ने लगी। लेकिन राज ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया। वो
शहनाज की तरफ देख भी नहीं रहा था।

शहनाज खड़ी हो गई और उसे समझने के अंदाज में बोली- “आप कुछ गलत नहीं कर रहे राज जी । मैं खुद आपके पास आई, आपके बदन में सटी, खुद अपने कपड़े उतारी। आपने कोई गलत काम नहीं किया। मैं किसी और की बीवी हूँ तो क्या हुआ, आपके लिए बस एक रंडी हूँ। आप किसी और के बीवी को नहीं, एक रंडी के जिश्म को चूम रहे थे, आप वसीम की बीवी शहनाज को नहीं, अपनी शहनाज रंडी को चोदिए। इसमें कुछ गलत नहीं है। आपकी कोई गलती नहीं है...."
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Re: Adultery शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

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Re: Adultery शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

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शहनाज का जवाब तो लाजवाब था लेकिन अभी राज शहनाज को चोदने वाला नहीं था। अगर उसने अभी शहनाज को चोद लिया तो इसका मतलब उसे छुप-छुपकर शहनाज के जिश्म के मजे लेने होंगे। लेकिन वो तो शहनाज को अपनी पालतू कुतिया बनाना चाहता था। और इसके लिए शहनाज का प्यासी रहना जरूरी था ।

राज बिना शहनाज की तरफ देखे ही बोला- “तुम कुछ भी बोलो, लेकिन हम दोनों जानते हैं की ये गुनाह है।

T तुम अपने पति से छिपकर मेरे से चुदवाओगी तो वो भी गुनाह है। मैं तुम्हारे पति से छिपकर तुम्हें चोदूंगा ये गुनाह है। इसलिए मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो और जाओ। अपने कपड़े पहन लो और मुझे माफ कर दो जो मैंने किया तुम्हारे साथ। ये मेरी गलती थी की मैंने तुम्हारी पैंटी ब्रा को हाथ में लिया और तुम्हें सोच करके उसमे वीर्य गिराया। ये सच है की इस तरह मैं खुद को हल्का महसूस करता था, लेकिन ये मेरी गलती थी जो आगे से नहीं होगी। प्लीज तुम जाओ.."

शहनाज फिर बोली- “एक जवान औरत को नंगी करके प्यासी छोड़ देना भी गुनाह है। अब आपको मुझे चोदना ही होगा..."

राज ने कहा- "मुझसे गलती हुई, मुझे माफ कर दो, लेकिन अब मुझसे और गुनाह मत करवाओ..."

शहनाज समझ रही थी की राज की नजर में ये गलत है, पाप है। उसने खुद पे काबू पा लिया है। अब वो और तड़पेगा। इतना कुछ कर लेने के बाद वो बिना चोदे मुझे यहाँ से भेज तो देगा, लेकिन फिर पागल हो जाएगा। शहनाज फिर कुछ बोलने जा रही थी लेकिन राज ने उसे मना कर दिया। शहनाज जैसी सुंदरी पूरे समर्पण के साथ नंगी खड़ी थी, लेकिन राज उसे मना कर रहा था। ये राज की महानता भी शहनाज की नजरों में। लेकिन राज के लिए ये एक चाल थी। बड़े फायदे के लिए छोटे नुकसान टाइप का ।

शहनाज बोली- ठीक है, मैं चली जा रही हूँ। अगर आपकी नजर में ये पाप है तो फिर अब मेरा यहाँ कोई काम नहीं। हम लोग ये घर खाली करके आज ही चले जाएंगे। हमें चाहे रोड पे रहना पड़े लेकिन हम यहाँ से चले जाएंगे। ना मैं रहूंगी और ना ही आपको परेशानी होगी। लेकिन मेरी बस आखिरी बात मान लीजिए। आपने मेरे साथ इतना कुछ किया तो अपना वीर्य मेरे सामने निकाल लीजिए। नहीं तो मुझे लगेगा की मेरा कुछ आपके सामने बाकी रह गया..."

राज कुछ नहीं बोला। शहनाज उसकी तरफ आगे बढ़ी तो राज ने उसे मना कर दिया।

शहनाज फिर बोली- "जब तक आप अपना वीर्य नहीं निकाल लेते, तब तक ना तो मैं अपने कपड़े ही यहाँ से जाऊँगी..” बोलती हुई शहनाज बेड पे बैठ गई।
पहनूँगी और ना

राज समझ गया की ये ऐसे नहीं जाएगी और इसमें उसके प्लान को कोई नुकसान तो नहीं ही होना था। राज
ने लुंगी को नीचे गिरा दिया और लण्ड सहलाने लगा। लण्ड में अभी कोई जान नहीं थी और वो बेजान मुर्दे की तरह लटक रहा था।

शहनाज खड़ी हो गई और बोली- “प्लीज मुझे करने दीजिए। आपने इतने दिनों तक मेरे नाम से मेरी पैंटी ब्रा पे अपना वीर्य गिराया है तो क्या मेरा हक नहीं की एक बार मैं उस वीर्य को गीराऊँ?"

राज कुछ बोलता इससे पहले ही शहनाज फिर से बोल पड़ी- "प्लीज इसे मेरी आखिरी इच्छा समझ लीजिए..."

राज कुछ नहीं बोला और शहनाज उसके नजदीक जाकर लण्ड को हाथ में ले ली। शहनाज का हाथ लगते ही मुर्दे में जान आ गई और लण्ड तुरंत ही फुल टाइट हो गया। ये शहनाज का आखिरी हथियार था की इस तरह शायद फिर से राज जज्बाती हो जाए और उसे चोद दे । शहनाज राज के नंगे जिश्म के साथ सटकर नंगी खड़ी थी। उसके बदन से रगड़ती हुई नीचे बैठी और लण्ड को चूसने लगी। शहनाज अपनी चूची राज की जाँघ में रगड़ रही थी और उसका लण्ड चूस रही थी।

राज को बहुत मजा आ रहा था। इतनी हसीन, कम उम्र की और अमीर लड़की वो भी नई-नवेली शादीशुदा मुस्लिम औरत उसके लण्ड को चूस रही थी। लेकिन अभी तो राज को शहनाज का बहुत मजा लेना था। राज का लण्ड
वीर्य गिराने वाला था। राज ने शहनाज को खुद से अलग किया और थोड़ा किनारे होकर जमीन पे अपना वीर्य गिरा दिया।

शहनाज वीर्य को अपने हाथ में लेना चाहती थी लेकिन राज ने उसे अपने जिश्म से दूर करके रोक दिया और वीर्य को जमीन पे गिरा दिया। वो तेज सांस ले रहा था।

शहनाज राज को साइड की और घुटने के बल चलती हुई वीर्य के पास पहुँची और झुककर अपने मंगलसूत्र को वीर्य में डुबो दी। फिर शहनाज अपनी 4 उंगलियों से वीर्य को उठाई और अपनी माँग में भर ली। वो राज को देखी जो उसे ही देख रहा था। शहनाज फिर एक उंगली में राज का वीर्य लगाई और बिंदी पे लगा ली।
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