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Adultery शीला की वासना की आग

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josef
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Adultery शीला की वासना की आग

Post by josef »

शीला की वासना की आग



५५ साल की शीला, रात को १० बजे रसोईघर की जूठन फेंकने के लिए बाहर निकली... थोड़ी देर पहले ही बारिश रुकी थी। चारों तरफ पानी के पोखर भरे हुए थे... भीनी मिट्टी की मदमस्त खुशबू से ठंडा वातावरण बेहद कामुक बना देने वाला था। दूर कोने मे एक कुत्तिया... अपनी पुत्ती खुद ही चाट रही थी... शीला देखती रह गई..!! वह सोचने लगी की काश..!! हम औरतें भी यह काम अगर खुद कर पाती तो कितना अच्छा होता... मेरी तरह लंड के बिना तड़पती, न जाने कितनी औरतों को, इस मदमस्त बारिश के मौसम में, तड़पना न पड़ता...

वह घर पर लौटी... और दरवाजा बंद किया... और बिस्तर पर लेट गई।

उसका पति दो साल के लिए, कंपनी के काम से विदेश गया था... और तब से शीला की हालत खराब हो गई थी। वैसे तो पचपन साल की उम्र मे औरतों को चुदाई की इतनी भूख नही होती... पर एकलौती बेटी की शादी हो जाने के बाद... दोनों पति पत्नी अकेले से पड़ गए थे.. पैसा तो काफी था... और उसका पति मदन, ५८ साल की उम्र मे भी.. काफी शौकीन मिजाज था.. रोज रात को वह शीला को नंगी करके अलग अलग आसनों मे भरपूर चोदता.. शीला की उम्र ५५ साल की थी... मेनोपोज़ भी हो चुका था.. फिर भी साली... कूद कूद कर लंड लेती.. शीला का पति मदन, ऐसे अलग अलग प्रयोग करता की शीला पागल हो जाती... उनके घर पर ब्लू-फिल्म की डीवीडी का ढेर पड़ा था.. शीला ने वह सब देख रखी थी.. उसे अपनी चुत चटवाने की बेहद इच्छा हो रही थी... और मदन की नामौजूदगी ने उसकी हालत और खराब कर दी थी।



ऊपर से उस कुत्तीया को अपनी पुत्ती चाटते देख... उसके पूरे बदन मे आग सी लग गई...

अपने नाइट ड्रेस के गाउन से... उसने अपने ४० इंच के साइज़ के दोनों बड़े बड़े गोरे बबले बाहर निकाले.. और अपनी हथेलियों से निप्पलों को मसलने लगी.. आहहहह..!! अभी मदन यहाँ होता तो... अभी मुझ पर टूट पड़ा होता... और अपने हाथ से मेरी चुत सहला रहा होता.. अभी तो उसे आने मे और चार महीने बाकी है.. पिछले २० महीनों से... शीला के भूखे भोसड़े को किसी पुरुष के स्पर्श की जरूरत थी.. पर हाय ये समाज और इज्जत के जूठे ढकोसले..!! जिनके डर के कारण वह अपनी प्यास बुझाने का कोई और जुगाड़ नही कर पा रही थी।

"ओह मदन... तू जल्दी आजा... अब बर्दाश्त नही होता मुझसे...!!" शीला के दिल से एक दबी हुई टीस निकली... और उसे मदन का मदमस्त लोडा याद आ गया.. आज कुछ करना पड़ेगा इस भोसड़े की आग का...

शीला उठकर खड़ी हुई और किचन मे गई... फ्रिज खोलकर उसने एक मोटा ताज़ा बैंगन निकाला.. और उसे ही मदन का लंड समझकर अपनी चुत पर घिसने लगी... बैंगन मदन के लंड से तो पतला था... पर मस्त लंबा था... शीला ने बैंगन को डंठल से पकड़ा और अपने होंठों पर रगड़ने लगी... आँखें बंद कर उसने मदन के सख्त लंड को याद किया और पूरा बैंगन मुंह मे डालकर चूसने लगी... जैसे अपने पति का लंड चूस रही हो... अपनी लार से पूरा बैंगन गीला कर दिया.. और अपने भोसड़े मे घुसा दिया... आहहहहहहह... तड़पती हुई चुत को थोड़ा अच्छा लगा...


आज शीला.. वासना से पागल हो चली थी... वह पूरी नंगी होकर किचन के पीछे बने छोटे से बगीचे मे आ गई... रात के अंधेरे मे अपने बंगले के बगीचे मे अपनी नंगी चुत मे बैंगन घुसेड़कर, स्तनों को मरोड़ते मसलते हुए घूमने लगी.. छिटपुट बारिश शुरू हुई और शीला खुश हो गई.. खड़े खड़े उसने बैंगन से मूठ मारते हुए भीगने का आनंद लिया... मदन के लंड की गैरमौजूदगी में बैंगन से अपने भोंसड़े को ठंडा करने का प्रयत्न करती शीला की नंगी जवानी पर बारिश का पानी... उसके मदमस्त स्तनों से होते हुए... उसकी चुत पर टपक रहा था। विकराल आग को भी ठंडा करने का माद्दा रखने वाले बारिश के पानी ने, शीला की आग को बुझाने के बजाए और भड़का दिया। वास्तविक आग पानी से बुझ जाती है पर वासना की आग तो ओर प्रज्वलित हो जाती है। शीला बागीचे के गीले घास में लेटी हुई थी। बेकाबू हो चुकी हवस को मामूली बैंगन से बुझाने की निरर्थक कोशिश कर रही थी वह। उसे जरूरत थी.. एक मदमस्त मोटे लंबे लंड की... जो उसके फड़फड़ाते हुए भोसड़े को बेहद अंदर तक... बच्चेदानी के मुख तक धक्के लगाकर, गरम गरम वीर्य से सराबोर कर दे। पक-पक पुच-पुच की आवाज के साथ शीला बैंगन को अपनी चुत के अंदर बाहर कर रही थी। आखिर लंड का काम बैंगन ने कर दिया। शीला की वासना की आग बुझ गई.. तड़पती हुई चुत शांत हो गई... और वह झड़कर वही खुले बगीचे में नंगी सो गई... रात के तीन बजे के करीब उसकी आँख खुली और वह उठकर घर के अंदर आई। अपने भोसड़े से उसने पिचका हुआ बैंगन बाहर निकाला.. गीले कपड़े से चुत को पोंछा और फिर नंगी ही सो गई।

सुबह जब वह नींद से जागी तब डोरबेल बज रही थी "दूध वाला रसिक होगा" शीला ने सोचा, इतनी सुबह, ६ बजे और कौन हो सकता है!! शीला ने उठकर दरवाजा खोला... बाहर तेज बारिश हो रही थी। दूधवाला रसिक पूरा भीगा हुआ था.. शीला उसे देखते ही रह गई... कामदेव के अवतार जैसा, बलिष्ठ शरीर, मजबूत कदकाठी, चौड़े कंधे और पेड़ के तने जैसी मोटी जांघें... बड़ी बड़ी मुछों वाला ३५ साल का रसिक.. शीला को देखकर बोला "कैसी हो भाभीजी?"

गाउन के अंदर बिना ब्रा के बोबलों को देखते हुए रसिक एक पल के लिए जैसे भूल ही गया की वह किस काम के लिए आया था!! उसके भीगे हुए पतले कॉटन के पतलून में से उसका लंड उभरने लगा जो शीला की पारखी नजर से छिप नही सका।



"अरे रसिक, तुम तो पूरे भीग चुके हो... यहीं खड़े रहो, में पोंछने के लिए रुमाल लेकर आती हूँ.. अच्छे से जिस्म पोंछ लो वरना झुकाम हो जाएगा" कहकर अपने कूल्हे मटकाती हुई शीला रुमाल लेने चली गई।

"अरे भाभी, रुमाल नही चाहिए,... बस एक बार अपनी बाहों में जकड़ लो मुझे... पूरा जिस्म गरम हो जाएगा" अपने लंड को ठीक करते हुए रसिक ने मन में सोचा.. बहेनचोद साली इस भाभी के एक बोबले में ५-५ लीटर दूध भरा होगा... इतने बड़े है... मेरी भेस से ज्यादा तो इस शीला भाभी के थन बड़े है... एक बार दुहने को मिल जाए तो मज़ा ही आ जाए...

रसिक घर के अंदर ड्रॉइंगरूम में आ गया और डोरक्लोज़र लगा दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

शीला ने आकर रसिक को रुमाल दिया। रसिक अपने कमीज के बटन खोलकर रुमाल से अपनी चौड़ी छाती को पोंछने लगा। शीला अपनी हथेलियाँ मसलते उसे देख रही थी। उसके मदमस्त चुचे गाउन के ऊपर से उभरकर दिख रहे थे। उन्हे देखकर रसिक का लंड पतलून में ही लंबा होता जा रहा था। रसिक के सख्त लंड की साइज़ देखकर... शीला की पुच्ची बेकाबू होने लगी। उसने रसिक को बातों में उलझाना शुरू किया ताकि वह ओर वक्त तक उसके लंड को तांक सके।

"इतनी सुबह जागकर घर घर दूध देने जाता है... थक जाता होगा.. है ना!!" शीला ने कहा

"थक तो जाता हूँ, पर क्या करूँ, काम है करना तो पड़ता ही है... आप जैसे कुछ अच्छे लोग को ही हमारी कदर है.. बाकी सब तो.. खैर जाने दो" रसिक ने कहा। रसिक की नजर शीला के बोबलों पर चिपकी हुई थी.. यह शीला भी जानती थी.. उसकी नजर रसिक के खूँटे जैसे लंड पर थी।

शीला ने पिछले २० महीनों से.. तड़प तड़प कर... मूठ मारकर अपनी इज्जत को संभाले रखा था.. पर आज रसिक के लंड को देखकर वह उत्तेजित हथनी की तरह गुर्राने लगी थी...

"तुझे ठंड लग रही है शायद... रुक में चाय बनाकर लाती हूँ" शीला ने कहा

"अरे रहने दीजिए भाभी, में आपकी चाय पीने रुका तो बाकी सारे घरों की चाय नही बनेगी.. अभी काफी घरों में दूध देने जाना है" रसिक ने कहा

फिर रसिक ने पूछा "भाभी, एक बात पूछूँ? आप दो साल से अकेले रह रही हो.. भैया तो है नही.. आपको डर नही लगता?" यह कहते हुए उस चूतिये ने अपने लंड पर हाथ फेर दिया

रसिक के कहने का मतलब समझ न पाए उतनी भोली तो थी नही शीला!!

"अकेले अकेले डर तो बहोत लगता है रसिक... पर मेरे लिए अपना घर-बार छोड़कर रोज रात को साथ सोने आएगा!!" उदास होकर शीला ने कहा

"चलिए भाभी, में अब चलता हूँ... देर हो गई... आप मेरे मोबाइल में अपना नंबर लिख दीजिए.. कभी अगर दूध देने में देर हो तो आप को फोन कर बता सकूँ"

तिरछी नजर से रसिक के लंड को घूरते हुए शीला ने चुपचाप रसिक के मोबाइल में अपना नंबर स्टोर कर दिया।

"आपके पास तो मेरा नंबर है ही.. कभी बिना काम के भी फोन करते रहना... मुझे अच्छा लगेगा" रसिक ने कहा

शीला को पता चल गया की वह उसे दाने डाल रहा था

"चलता हूँ भाभी" रसिक मुड़कर दरवाजा खोलते हुए बोला

उसके जाते ही दरवाजा बंद हो गया। शीला दरवाजे से लिपट पड़ी, और अपने स्तनों को दरवाजे पर रगड़ने लगी। जिस रुमाल से रसिक ने अपनी छाती पोंछी थी उसमे से आती मर्दाना गंध को सूंघकर उस रुमाल को अपने भोसड़े पर रगड़ते हुए शीला सिसकने लगी।

कवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतल और मेघदूत में जैसे वर्णन किया है बिल्कुल उसी प्रकार.. शीला इस बारिश के मौसम में कामातुर हो गई थी। दूध गरम करने के लिए वो किचन में आई और फिर उसने फ्रिज में से एक मोटा गाजर निकाला। दूध को गरम करने गेस पर चढ़ाया.. और फिर अपने तड़पते भोसड़े में गाजर घुसेड़कर अंदर बाहर करने लगी।


रूम के अंदर बहोत गर्मी हो रही थी.. शीला ने एक खिड़की खोल दी.. खिड़की से आती ठंडी हवा उसके बदन को शीतलता प्रदान कर रही थी और गाजर उसकी चुत को ठंडा कर रहा था। खिड़की में से उसने बाहर सड़क की ओर देखा... सामने ही एक कुत्तीया के पीछे १०-१२ कुत्ते, उसे चोदने की फिराक में पागल होकर आगे पीछे दौड़ रहे थे।

शीला मन में ही सोचने लगी "बहनचोद.. पूरी दुनिया चुत के पीछे भागती है... और यहाँ में एक लंड को तरस रही हूँ"

सांड के लंड जैसा मोटा गाजर उसने पूरा अंदर तक घुसा दिया... उसके मम्मे ऐसे दर्द कर रहे थे जैसे उनमे दूध भर गया हो.. भारी भारी से लगते थे। उस वक्त शीला इतनी गरम हो गई की उसका मन कर रहा था की गैस के लाइटर को अपनी पुच्ची में डालकर स्पार्क करें...

शीला ने अपने सख्त गोभी जैसे मम्मे गाउन के बाहर निकाले... और किचन के प्लेटफ़ॉर्म पर उन्हे रगड़ने लगी.. रसिक की बालों वाली छाती उसकी नजर से हट ही नही रही थी। आखिर दूध की पतीली और शीला के भोसड़े में एक साथ उबाल आया। फरक सिर्फ इतना था की दूध गरम हो गया था और शीला की चुत ठंडी हो गई थी।


रोजमर्रा के कामों से निपटकर, शीला गुलाबी साड़ी में सजधज कर सब्जी लेने के लिए बाजार की ओर निकली। टाइट ब्लाउस में उसके बड़े बड़े स्तन, हर कदम के साथ उछलते थे। आते जाते लोग उन मादक चूचियों को देखकर अपना लंड ठीक करने लग जाते.. उसके मदमस्त कूल्हे, राजपुरी आम जैसे बबले.. और थिरकती चाल...

एक जवान सब्जी वाले के सामने उकड़ूँ बैठकर वह सब्जी देखने लगी। शीला के पैरों की गोरी गोरी पिंडियाँ देखकर सब्जीवाला स्तब्ध रह गया। घुटनों के दबाव के कारण शीला की बड़ी चूचियाँ ब्लाउस से उभरकर बाहर झाँकने लगी थी..

शीला का यह बेनमून हुस्न देखकर सब्जीवाला कुछ पलों के लिए, अपने आप को और अपने धंधे तक को भूल गया।

शीला के दो बबलों को बीच बनी खाई को देखकर सब्जीवाले का छिपकली जैसा लंड एक पल में शक्करकंद जैसा बन गया और एक मिनट बाद मोटी ककड़ी जैसा!!!


"मुली का क्या भाव है?" शीला ने पूछा

"एक किलो के ४० रूपीए"

"ठीक है.. मोटी मोटी मुली निकालकर दे मुझे... एक किलो" शीला ने कहा

"मोटी मुली क्यों? पतली वाली ज्यादा स्वादिष्ट होती है" सब्जीवाले ने ज्ञान दिया

"तुझे जितना कहा गया उतना कर... मुझे मोटी और लंबी मुली ही चाहिए" शीला ने कहा

"क्यों? खाना भी है या किसी ओर काम के लिए चाहिए?"

शीला ने जवाब नही दिया तो सब्जीवाले को ओर जोश चढ़ा

"मुली से तो जलन होगी... आप गाजर ले लो"

"नही चाहिए मुझे गाजर... ये ले पैसे" शीला ने थोड़े गुस्से के साथ उसे १०० का नोट दिया

बाकी खुले पैसे वापिस लौटाते वक्त उस सब्जीवाले ने शीला की कोमल हथेलियों पर हाथ फेर लिया और बोला "और क्या सेवा कर सकता हूँ भाभीजी?"

उसकी ओर गुस्से से घूरते हुए शीला वहाँ से चल दी। उसकी बात वह भलीभाँति समझ सकती थी। पर क्यों बेकार में ऐसे लोगों से उलझे... ऐसा सोचकर वह किराने की दुकान के ओर गई।

बाकी सामान खरीदकर वह रिक्शा में घर आने को निकली। रिक्शा वाला हरामी भी मिरर को शीला के स्तनों पर सेट कर देखते देखते... और मन ही मन में चूसते चूसते... ऑटो चला रहा था।


एक तरफ घर पर पति की गैरहाजरी, दूसरी तरफ बाहर के लोगों की हलकट नजरें.. तीसरी तरफ भोसड़े में हो रही खुजली तो चौथी तरफ समाज का डर... परेशान हो गई थी शीला!!

घर आकर वह लाश की तरह बिस्तर पर गिरी.. उसकी छाती से साड़ी का पल्लू सरक गया... यौवन के दो शिखरों जैसे उत्तुंग स्तन.. शीला की हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रहे थे। लेटे लेटे वह सोच रही थी "बहनचोद, इन माँस के गोलों में भला कुदरत ने ऐसा क्या जादू किया है की जो भी देखता है बस देखता ही रह जाता है!!" फिर वह सोचने लगी की वैसे तो मर्द के लंड में भी ऐसा कौनसा चाँद लगा होता है, जो औरतें देखते ही पानी पानी हो जाती है!!

शीला को अपने पति मदन के लंड की याद आ गई... ८ इंच का... मोटे गाजर जैसा... ओहहह... ईशशश... शीला ने इतनी गहरी सांस ली की उसकी चूचियों के दबाव से ब्लाउस का हुक ही टूट गया।


कुदरत ने मर्दों को लंड देकर, महिलाओं को उनका ग़ुलाम बना दिया... पूरा जीवन... उस लंड के धक्के खा खाकर अपने पति और परिवार को संभालती है.. पूरा दिन घर का काम कर थक के चूर हो चुकी स्त्री को जब उसका पति, मजबूत लंड से धमाधम चोदता है तो स्त्री के जनम जनम की थकान उतर जाती है... और दूसरे दिन की महेनत के लिए तैयार हो जाती है।

शीला ने ब्लाउस के बाकी के हुक भी खोल दिए... अपने मम्मों के बीच की कातिल चिकनी खाई को देखकर उसे याद आ गया की कैसे मदन उसके दो बबलों के बीच में लंड घुसाकर स्तन-चुदाई करता था। शीला से अब रहा नही गया... घाघरा ऊपर कर उसने अपनी भोस पर हाथ फेरा... रस से भीग चुकी थी उसकी चुत... अभी अगर कोई मिल जाए तो... एक ही झटके में पूरा लंड अंदर उतर जाए... इतना गीला था उसका भोसड़ा.. चुत के दोनों होंठ फूलकर कचौड़ी जैसे बन चुके थे।

शीला ने चुत के होंठों पर छोटी सी चिमटी काटी... दर्द तो हुआ पर मज़ा भी आया... इसी दर्द में तो स्वर्गिक आनंद छुपा था.. वह उन पंखुड़ियों को और मसलने लगी.. जितना मसलती उतनी ही उसकी आग और भड़कने लगी... "ऊईईई माँ... " शीला के मुंह से कराह निकल गई... हाय.. कहीं से अगर एक लंड का बंदोबस्त हो जाए तो कितना अच्छा होगा... एक सख्त लंड की चाह में वह तड़पने लगी.. थैली से उसने एक मस्त मोटी मुली निकाली और उस मुली से अपनी चुत को थपथपाया... एक हाथ से भगोष्ठ के संग खेलते हुए दूसरे हाथ में पकड़ी हुई मुली को वह अपने छेद पर रगड़ रही थी। भोसड़े की गर्मी और बर्दाश्त न होने पर, उसने अपनी गांड की नीचे तकिया सटाया और उस गधे के लंड जैसी मुली को अपनी चुत के अंदर घुसा दिया।

लगभग १० इंच लंबी मुली चुत के अंदर जा चुकी थी। अब वह पूरे जोश के साथ मुली को अपने योनिमार्ग में रगड़ने लगी.. ५ मिनट के भीषण मुली-मैथुन के बाद शीला का भोसड़ा ठंडा हुआ... शीला की छाती तेजी से ऊपर नीचे हो रही थी। सांसें नॉर्मल होने के बाद उसने मुली बहार निकाली। उसके चुत रस से पूरी मुली सन चुकी थी.. उस प्यारी सी मुली को शीला ने अपनी छाती से लगा लिया... बड़ा मज़ा दिया था उस मुली ने! मुली की मोटाई ने आज तृप्त कर दिया शीला को!!

मुली पर लगे चिपचिपे चुत-रस को वह चाटने लगी.. थोड़ा सा रस लेकर अपनी निप्पल पर भी लगाया... और मुली को चाट चाट कर साफ कर दिया।

अब धीरे धीरे उसकी चुत में जलन होने शुरू हो गई.. शीला ने चूतड़ों के नीचे सटे तकिये को निकाल लिया और दोनों जांघें रगड़ती हुई तड़पने लगी... "मर गई!!! बाप रे!! बहुत जल रहा है अंदर..." जलन बढ़ती ही गई... उस मुली का तीखापन पूरी चुत में फैल चुका था.. वह तुरंत उठी और भागकर किचन में गई.. फ्रिज में से दूध की मलाई निकालकर अपनी चुत में अंदर तक मल दी शीला ने.. !! ठंडी ठंडी दूध की मलाई से उसकी चुत को थोड़ा सा आराम मिला.. और जलन धीरे धीरे कम होने लगी.. शीला अब दोबारा कभी मुली को अपनी चुत के इर्द गिर्द भी भटकने नही देगी... जान ही निकल गई आज तो!!


शाम तक चुत में हल्की हल्की जलन होती ही रही... बहनचोद... लंड नही मिल रहा तभी इन गाजर मूलियों का सहारा लेना पड़ रहा है..!! मादरचोद मदन... हरामी.. अपना लंड यहाँ छोड़कर गया होता तो अच्छा होता... शीला परेशान हो गई थी.. अब इस उम्र में कीसे पटाए??

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josef
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Re: Adultery शीला की वासना की आग

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शाम के पाँच बज रहे थे... धोबी का लड़का कपड़े देने आया था.. उसे देखकर शीला का दिल किया की उसे पटाकर ठुकवा ले.. पर उसका सुककड़ शरीर देखकर शीला की सारी इच्छाएं मर गई। जाते जाते वह पापड़तोड़ पहलवान भी शीला के बबलों को घूर रहा था। शीला भी भूखी नागिन की तरह उसे देख रही थी... फिर उसने सोचा की यह २० साल का लौंडा भला कैसे बुझा पाएगी मेरी चुत की प्यास!!!

शीला को चाहिए था एक मजबूत मर्द.. ऐसा मर्द जिसके बोझ तले शीला पूरी दब जाए... जो बिना थके शीला के भोसड़े की सर्विस कर सके... पर ऐसा मर्द कहाँ मिलेगा.. यह शीला को पता नही था

दिन तो जैसे तैसे गुजर जाता था... पर रात निकालनी बड़ी मुश्किल थी। इतने बड़े मकान में वह अकेली... पूरी रात करवटें बदल बदल कर बिताती थी।

५५ वर्ष की अधेड़ उम्र की शीला की कामेच्छा अति तीव्र थी। ऊपर से उसके पति मदन ने उसे ऐसे ऐसे अनोखे आसनों में चोदा था की अब उसे सीधे साधे सेक्स में मज़ा ही नही आता था। रोज रात को वह मादरजात नंगी होकर.. अलग अलग स्टाइल में मूठ मारकर सोने की कोशिश करती। पर जो मज़ा असली लोडे में है.. वह अगर गाजर, ककड़ी या शक्करकंद में होता तो लड़कियां शादी ही क्यों करती!!!

स्त्री का जन्म तभी सफल होता है जब मस्त लंड उसकी चुत में जाकर भरसक चुदाई करता है। मूठ मारना तो मिसकॉल लगाने जैसा है.. कोशिश तो होती है पर सही संपर्क नही होता...

सुबह ५ बजे, फिरसे डोरबेल बजी और शीला की आँख खुल गई। खुले स्तनों को गाउन के अंदर ठूंस कर, एक बटन बंद कर वह दूध लेने के लिए बाहर आई। दरवाजा खोलते ही उसका मूड खराब हो गया। आज रसिक की पत्नी दूध देने आई थी।




"क्यों री, आज दूध देने तू आ गई? तेरा मरद नही आया?" शीला ने पूछते तो पूछ लिया फिर उसे एहसास हुआ की इसका दूसरा अर्थ भी निकल सकता था। गनीमत थी की वह गंवार औरत को ज्यादा सूज नही थी वरना जरूर पूछती की आपको दूध से मतलब है या मेरे मरद से!!!

"वो तो पास के गाँव गया है.. नई भेस खरीदने.. ग्राहक बढ़ते जा रहे है और दूध कम पड़ रहा है... साले जानवर भी चालक बन गए है... जितना खाते है उस हिसाब से दूध नही देते है.. " दूधवाले की पत्नी ने कहा

शीला हंस पड़ी "क्या नाम है तेरा?"

"मेरा नाम रूखी है" उसने जवाब दिया



शीला ने सर से लेकर पैर तक रूखी का निरीक्षण किया... आहाहाहा इन गांवठी औरतों का रूप गजब का होता है..!! शहर की पतली लौंडियो का इसके रूप के आगे कोई मुकाबला ही नही है... ज़ीरो फिगर पाने के चक्कर में.. आजकल की लड़कियों के आम सुखकर गुटलियों जैसे बन जाते है। और नखरे फिर भी दुनिया भर के रहते है। असली रूप तो इस रूखी का था.. उसके बबले शीला से बड़े और भारी थे.. असली फेटवाला दूध पी पी कर रूखी पूर्णतः तंदूरस्त दिख रही थी। उसकी छाती पर लपेटी छोटी सी चुनरी उन बड़े स्तनों को ढंकने में असमर्थ थी। गेंहुआ रंग, ६ फिट का कद, चौड़े कंधे, लचकती कमर और घेरदार घाघरे के पीछे मदमस्त मोटी मोटी जांघें.. झुककर जब वह दूध निकालने गई तब उसकी चोली से आधे से ज्यादा चूचियाँ बाहर निकल गई..


शीला उस दूधवाली के स्तनों को देखती ही रह गई.. वह खुद भी एक स्त्री थी... इसलिए स्तन देखकर उत्तेजित होने का कोई प्रश्न नही था.. पर फिर भी इस गाँव की गोरी की सुंदरता शीला के मन को भा गई। ध्यान से देखने पर शीला ने देखा की रूखी की चोली की कटोरियों पर सूखा हुआ दूध लगा हुआ था.. शीला समज गई.. की उसके स्तनों में दूध आता है.. उसने थोड़े समय पहले ही बच्चे को जनम दिया होगा!! दूध के भराव के कारण उसके स्तन पत्थर जैसे सख्त हो गए थे... उन्हे देखते ही शीला को छूने का दिल किया. वैसे भी शीला १ नंबर की चुदैल तो थी ही..!!

लंड के लिए तरसती शीला.. रूखी का भरपूर जोबन देखकर सिहर गई.. उसका मन इस सौन्दर्य का रस लेने के लिए आतुर हो गया.. और योजना बनाने लगा..

कहते है ना... की प्रसव से उठी हुई और बारिश में भीगी हुई स्त्री के आगे तो इंद्रलोक की अप्सरा भी पानी कम चाय लगती है..!!

"रूखी.. मुझे तुझसे एक बात करनी है.. पर शर्म आ रही है... कैसे कहूँ?" शीला ने पत्ते बिछाना शुरू किया

"इसमें शर्माना क्या? बताइए ना भाभी" रूखी ने कहा

"तू अंदर आजा... बैठ के बात करते है.. "

"भाभी, अब सिर्फ दो चार घरों में ही दूध पहुंचना बाकी है.. वो निपटाकर आती हूँ फिर बैठती हूँ.. थकान भी उतार जाएगी और थोड़ी देर बातें भी हो जाएगी"

"हाँ.. हाँ.. तू दूध देकर आ फिर बात करते है... पर जल्दी आना" शीला ने कहा

"अभी खतम कर आई.. आप तब तक चाय बनाकर रखिए" रूखी यह कहती हुई निकल गई

चाय बनाते बनाते शीला सोच रही थी.. की अगर रूखी के साथ थोड़े संबंध बढ़ाए जाए तो उसके बहाने रसिक का आना जाना भी शुरू हो जाएगा... और फेर उससे ठुकवाने का बंदोबस्त भी हो पाएगा... एक बार हाथ में आए फिर रसिक को गरम करना शीला का बाये हाथ का खेल था.. एक चुची खोलकर दिखाते ही रसिक का लंड सलाम ठोकेगा..

रसिक के लंड का विचार आते ही शीला की जांघों के बीच उसकी मुनिया फिर से गीली होने लगी... खुजली शुरू हो गई.. किचन के प्लेटफ़ॉर्म के कोने से अपनी चुत दबाकर वह बोली "थोड़े समय के लिए शांत हो जा तू.. तेरे लिए लंड का इंतेजाम कर ही रही हूँ.. कुछ न कुछ जुगाड़ तो करना ही पड़ेगा" रूखी को सीढी बनाकर रसिक के लंड तक पहुंचना ही पड़ेगा!!

क्या करूँ... क्या करूँ.. वह सोच रही थी... रूखी अभी आती ही होगी

उसका शैतानी दिमाग काम पर लग गया.. एक विचार मन में आते ही वह खुश हो गई... "हाँ बिल्कुल ऐसा ही करूंगी" मन ही मन में बात करते हुए शीला ने एक प्लेट में थोड़ा सा दूध निकाला और अलमारी के नीचे रख आई.. अब इंतज़ार था रूखी के आने का!!

थोड़ी ही देर में रूखी आ गई... शीला ने उसे अंदर बुलाया और मुख्य दरवाजा बंद कर दिया।

"कहिए भाभी, क्या काम था?" रूखी ने पूछा

५-५ लीटर के कनस्तर जैसी भारी चूचियों को शीला देखती ही रही..



शीला ने संभालकर धीरे धीरे बाजी बिछाई

"रूखी, बात दरअसल ऐसी है की आँगन में रहती बिल्ली ने ३ बच्चे दिए है... बड़े ही प्यारे है.. छोटे छोटे... अब कल रात किसी कमीने ने गाड़ी की पहिये तले उस बिल्ली को कुचल दिया" शीला ने कहा

"हाय दइयाँ.. बेचारी... उसके बच्चे अनाथ हो गए.. " भारी सांस लेकर रूखी ने कहा

"अब में उस बिल्ली के बच्चों के लिए दूध रखती हूँ... पार वह पी ही नही रहे... भेस का दूध उन्हे कैसे हजम होगा? अभी दो दिन की उम्र है बेचारों की.. "

"माँ के दूध के मुकाबले और सारे दूध बेकार है भाभी.. बोतल का दूध पियेंगे तो मर जाएंगे बेचारे" रूखी ने करुणासभर आवाज में कहा

"इसीलिए आज भगवान ने तुझे भेज दिया... अब मुझे चिंता नही है.. वह बच्चे बच जाएंगे" शीला ने कहा

"वो कैसे?" रूखी को समझ नही आया

"देख रूखी... तेरी छाती से दूध आता है... अगर तो रोज अपना थोड़ा थोड़ा दूध निकालकर देगी... तो वह बिचारे बच जाएंगे.. नही तो १-२ दीं में ही मर जाएंगे... और पाप तुझे लगेगा.." शीला की योजना जबरदस्त थी

"अरे, उसमें कौन सी बड़ी बात है!! मुझे तो इतना दूध आता है की मेरे लल्ला का पेट भर जाने के बाद भी बच जाता है"


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josef
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Re: Adultery शीला की वासना की आग

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"अरे, उसमें कौन सी बड़ी बात है!! मुझे तो इतना दूध आता है की मेरे लल्ला का पेट भर जाता है फिर भी बचता है। कभी कभी तो लल्ला पीते पीते सो जाता है... और छाती पूरी खाली न हो जाए तो इतना दर्द होता है की कपड़ा रखकर दबाकर दूध निकालना पड़ता है... लल्ला का बाप अगर जाग रहा हो तो वो भी थोड़ा बहुत चूस लेता है" इतने कहते ही रूखी शरमा गई

"आप चिंता मत करो भाभी, में वैसे भी दिन में कई दफा यहाँ से गुजरती हूँ.. आते जाते एक कटोरी में दूध निकाल दूँगी... बेचारे उन नन्हें पिल्लों को ओर चाहिए भी कितना!!! दो तीन घूंट में तो उनका छोटा सा पेट भर जाएगा.. लाइये कटोरी.. ये तो बड़े पुण्य का काम है... अब छाती में इतना दूध बनता ही है तो फिर इस्तेमाल करने में भला क्या हर्ज??"

इतना कहते ही रूखी ने अपने ब्लाउस के दो हुक खोल दिए... शीला दो घड़ी देखती ही रह गई... बड़े बड़े पके हुए नारियल जैसे बोबलों में से एक स्तन रूखी ने बाहर खींचा... दूसरी तरफ का दूध से भरा हुआ थन भी आधा बाहर लटक गया... देखते ही शीला के भोसड़े में खुजली शुरू हो गई।

शीला भागकर किचन से कटोरी लेकर आई और कटोरी को रूखी के स्तन के नीचे रख दिया। रूखी ने निप्पल को दबाया पर दूध नही निकला

"अरे भाभी, पता नही आज क्यों दूध नही निकल रहा? वैसे तो रोज, दबाते ही फव्वारा छूट जाता है..."

"आएगा रूखी... थोड़ा इंतज़ार तो कर!!"

"भाभी, आप दबाकर देखो... शायद दूध निकले"

शीला जबरदस्त उत्तेजित हो गई.. पर उसने थोड़ा सा नाटक किया..

"मुझे तो शर्म आती है रूखी"

"क्या भाभी, इसमे भला कौनसी शर्म? आपने भी तो अपने बच्चों को दूध पिलाया ही होगा ना!!"

"हाँ, वो बात तो सही है तेरी... पर उसे भी बहोत वक्त हो गया न रूखी..."

"जल्दी निकालिए न भाभी" कहते हुए रूखी ने शीला का हाथ पकड़कर अपने दूध से भरे स्तन पर रख दिया।

आहह... पत्थर जैसा सख्त और कडा स्तन!! उसे छूते ही शीला की चुत का दूध टपकने लगा..कुछ देर के लिए तो शीला रूखी के स्तन को बस सहलाती ही रही..

"सहला क्यों रही हो भाभी? दबाओ ना!!" रूखी ने कहा

शीला रूखी की बगल में बैठ गई.. और धीरे धीरे रूखी के स्तन को दबाने लगी.. शीला ने ब्लू फिल्मों में कई बार लेस्बियन द्रश्य देखे थे... और दो साल से, अपनी पति की गैर-मौजूदगी में उसकी हालत खराब हो गई थी... जैसा आपने पहले पढ़ा ही है

बिना रूखी की अनुमति के शीला ने उसका दूसरा स्तन भी चोली से बाहर निकाल दिया... रूखी की निप्पल पर दूध की बूंद उभर आई...


"आया आया दूध... अब निकलेगा... और दबाइए भाभी पर जरा धीरे से.. दर्द हो रहा है... और ध्यान से... कहीं इसकी पिचकारी आपकी साड़ी पर ना गिरे.."

रूखी ने अपनी आँखें बंद कर ली। शीला अब स्तनों को दबाने के साथ साथ खेल भी रही थी। रूखी की बंद आँखें देखकर वह समझ गई की वह भी उत्तेजित हो गई थी।

शीला ने पूछा "क्या हुआ रूखी? आँखें क्यों बंद कर दी? बहोत दर्द हो रहा है क्या?"

"नही नही भाभी... अमम कुछ नही.. "

"नही, पहले तू बता... आँखें क्यों बंद कर दी?" शीला अड़ी रही

"वो तो.. ही ही ही.. जाने भी दीजिए न.. आप समझ रही है फिर भला क्यों पूछ रही हो?"

"सच बता... मजा आ रहा है.. अपने पति की याद आ रही है... है ना..!!"

"वो तो भाभी... काफी महीनों के बाद किसी के हाथ ने छातियों को छुआ.. तो थोड़ा बहोत तो होगा ही ना!"

"क्यों? तेरा मरद दबाता नही है क्या?"

"क्या बताऊँ भाभी!! वो तो पूरा दिन खेत में काम करके ऐसा थक जाता है की रात होते ही घोड़े बेचकर सो जाता है.. कभी कभी जब छाती में ज्यादा दूध भर जाएँ और में उन्हे जगाऊँ तो थोड़ा बहोत चूस लेते है... बस इतना ही"

"पर मरद जब दबाता है तब मजा तो बहोत आता है... है ना!!"

"वो तो है... आप भी कैसा सहला रही हो.. क्या क्या याद आ गया मुझे" रूखी ने शरमाते हुए कहा

"रूखी, मेरा पति दो सालों से देश के बाहर है.. मुझे याद नही आता होगा.. सोच जरा!!"

"याद तो आपको जरूर आता होगा भाभीजी"

"रूखी, में तेरा दूध चखकर देखूँ? मैंने कभी खुद का दूध भी कभी नही चखा था.. पता नही कैसा स्वाद होगा इसका?"

"थोड़ा सा मीठा मीठा लगता है भाभी"

शीला जानबूझकर यह सारी बातें कर रही थी ताकि रूखी को गरम कर सके... और फिर वह अपना दांव खेल पाएं

रूखी की आँखें फिर से लगभग बंद हो गई.. तभी शीला ने रूखी की सख्त निप्पल को अंगूठे और उंगली के बीच दबाकर मसल दिया..

"ओह्ह भाभी... पता नही आज क्या हो रहा है मुझे!!!" रूखी ने शीला की जांघों पर हाथ रखते हुए कहा

शीला के शरीर को किसी ने दो सालों से छुआ नही था... शीला की जिस्म की आग भड़क गई.. उसने रूखी की निप्पल को पकड़कर खींचा

"ऊई माँ... भाभी.. दुखता है मुझे" रूखी ने कहा

शीला की हथेली रूखी के दूध से भर गई.. उस दूध को शीला ने रूखी के गालों पर चुपड़ दिया... जैसे दोनों हाथों से रंग लगा रही हो.. गाल पर नाक पर होंठ पर... पूरे चेहरे पर उसने रूखी के दूध को मल दिया.।

पिछले चार महीनों से दबी हुई रूखी की चुत की खुजली की स्प्रिंग, इसके साथ ही उछल पड़ी

उसने शीला से कहा.. "भाभी, आप दूध चखना चाहती थी तो... चखिए ना..!!"

शीला समझ गई... की रूखी उसे अपने स्तन चूसने का खुला निमंत्रण दे रही थी.. पर शीला एक नंबर की मादरचोद है.. वह ऐसे अपने पत्ते खोलने वालों में से नही थी

शीला ने रूखी के गालों पर लगे दूध को अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया... शीला की गरम जीभ का स्पर्श अपने गालों पर होती ही रूखी बेकाबू होने लगी। उसने शीला के सिर को पकड़ लिया और फिर "आहह आहहह ओह्ह ओह्ह" करते सिसकियाँ भरने लगी।

"रूखी, तू भी मेरे दबा दे" शीला ने फुसफुसाते हुए रूखी के कानों में कहा

"ओह भाभी... मन तो मेरा कर रहा था पर आपसे कहने में शर्म आ रही थी" कहते ही रूखी ने शीला के गाउन में हाथ घुसाकर उसके मम्मों को पकड़ लिया

कुछ महीनों पहले ही हुई डिलीवरी के कारण.. रूखी भी काफी महीनों से बिना चुदे तड़प रही थी... उसने शीला के दोनों बबलों को दबाते हुए अपने चूतड़ को.. नीचे सोफ़े पर रगड़ना शुरू कर दिया... इतनी तेज खुजली होने लगी थी उसे... शीला सब समझ गई.. और अब वह दोनों अपनी भूख और आग को शांत करने में मशरूफ़ हो गई।

शीला अब खड़ी हो गई... और उसने अपना गाउन उतार दिया... और मादरजात नंगी हो गई। शीला के गोरे गदराए बदन को रूखी देखती ही रह गई।

"रूखी, में दो साल से भूखी हूँ.. मुझसे अब ओर रहा नही जाता... आहहह" कहते ही शीला ने झुककर रूखी के होंठों को एक गाढ़ चुंबन दे दिया।


"भाभी, आहहह... मुझे भी... आहह.. कुछ कुछ हो रहा है.. हाये.. मर गई.."

शीला ने रूखी का हाथ पकड़कर अपनी बिना झांटों वाली बुर पर रख दिया.. "ओह रूखी... इसके अंदर आग लगी हुई है.. ऐसा लग रहा है जैसे ज्वालाएं निकल रही है.. कुछ कर रूखी.. आहहह"

रूखी ने शीला की कामरस से गीली हो चुकी चुत पर हाथ फेरा.. दूसरे हाथ से उसने शीला के कूल्हों को चौड़ा कर उसकी गाँड़ के छेद पर उंगली फेर दी.. और शीला को अपनी ओर खींच लिया.. और बोली

"भाभी... मेरे भी कपड़े उतार दो न!!"

शीला को बस इसी पल का इंतज़ार था.. उसने तुरंत रूखी की चोली के बचे-कूचे हुक निकाल कर उतार दिया... और उसकी चुनरी घाघरा भी उतरवा दिया.. और रूखी को सम्पूर्ण नंगी कर दी..

शीला ने रूखी को अपनी बाहों में कसकर जकड़ लिया.. दोनों औरतें... हवस में इतनी लिप्त हो गई की शीला अपनी चुत पर रूखी की कडक निप्पल को रगड़ने लगी... और रूखी, शीला के स्तनों को चाटते हुए निप्पल को चूसने लगी।

"भाभी, अब और बर्दाश्त नही होगा.. बहोत दिन हो गए है.. अपनी उँगलियाँ डाल दीजिए अंदर.. ओह ओह्ह.. भ.. भाभी.. ऊई माँ... पता नही क्यों आज इतनी चूल मची हुई है अंदर!! रहा ही नही जाता.. हायय..." रूखी तीव्रता से अपनी चुत को शीला के स्तनों पर रगड़ते हुए उल-जुलूल बकवास कर रही थी।

शीला भी... रूखी की चुत में दो उँगलियाँ डालकर अंदर बाहर कर रही थी... साथ ही वह रूखी की मांसल जांघों को अपनी मुठ्ठी से नोच रही थी। रूखी भी अब शीला के स्तनों पर टूट पड़ी.. इस हमले से शीला बेहद उत्तेजित हो गई.. कूदकर अपने दोनों पैर उसने रूखी के कंधों के इर्दगिर्द लगा दिए.. और वहीं लेट गई.. शीला का भोसड़ा रूखी के मुंह के करीब आ गया।

रूखी कुछ समझ सके उससे पहले शीला ने अपना तपता हुआ भोसड़ा रूखी के मुंह पर दबा दिया.. अब रूखी के पास उसे चाटने के अलावा ओर कोई विकल्प नही था। उसकी जीभ काम पर लग गई और शीला के गुलाबी भोसड़े को चाटने लगी। चाटते चाटते रूखी ने अपने चूतड़ों को एक फुट ऊपर कर दिया... शीला समझ गई की रूखी भी उसकी तरह झड़ने की कगार पर थी। शीला ने रूखी की चुत में एक साथ चार उँगलियाँ घोंप दी.. और रूखी का क्लिटोरिस मुंह में लेकर अपनी जीभ से ठेलने लगी..

"ऊई.. भाभी... हाँ बस वहीं पर... वैसे ही करते रहिए.. याईईई... मसल दो मेरे बेर को.. हाँ वहीं पर.. हाय.. बहोत खुजली हो रही है.. आज तो चबा चबा कर मेरे जामुन को चूस लो भाभी... ऐसा मजा तो पहले कभी भी नही आया... हाय भाभी... ऊई माँ.. में गई भाभीईईईईई... !!" कहते हुए रूखी थरथराने लगी और झड़ गई

शीला भी कहाँ पीछे रहने वाली थी!! उसने भी रूखी के मुंह पर चुत रखकर अपनी टंकी खाली कर दी..

दोनों औरतें काफी वक्त तक ऐसे ही पस्त पड़ी रही

"मज़ा या गया भाभी... कितने दिनों से कुछ करने का मन कर रहा था... पर क्या करती!! कीससे कहती!!" रूखी ने कहा

"रूखी, तेरा जोबन तो इतने कमाल का है... तेरा पति तुझे नंगी देखकर जबरदस्त गरम हो जाता होगा!!"

"भाभी, शुरू शुरू में तो वह दिन में तीन बार, मेरी टांगें चौड़ी कर गपागप चोदता था... पर जब में पेट से हो गई.. तब से उसने चोदना बंद कर दिया.. बच्चा हुए इतने महीने हो गए फिर भी अब तक हरामी ने नीचे एक बार ठीक से हाथ तक नही फेरा है"

ऐसे ही बातचीत करते रहने के बाद रूखी चली गई। उसके साथ हुए इस मजेदार संभोग को याद करते करते शीला ने रात का खाना खाया और सो गई। बिस्तर पर लेटकर आँखें बंद करते ही उसे रूखी के मदमस्त गदराए मोटे मोटे स्तन नजर आने लगे... आहह.. कितने बड़े थे उसके स्तन... उसकी नंगी छातियों के उभार को देखकर ही मर्दों के कच्छे गीले हो जाएँ.. नीलगिरी के पेड़ के तने जैसी उसकी जांघें.. बड़े बड़े कूल्हें.. भारी कमर.. आहह.. सबकुछ अद्भुत था... !! हालांकि गंवार रूखी को ठीक से चुंबन करना नही आता था.. और वह चुत चाटने में भी अनाड़ी थी.. यह बात शीला को खटकी जरूर थी.. हो सकता है लंड चूसने में माहिर हो.. पर क्या रूखी ने कभी लेस्बियन अनुभव कीया होगा पहले? वैसे तो शीला के लिए भी यह प्रथम अनुभव था.. पर उसने ब्लू फिल्मों में ऐसे कई द्रश्य पहले देखे हुए थे.. तो उसे प्राथमिक अंदाजा तो था ही.. हो सकता है रूखी ने भी कभी ऐसी फिल्में देखी हो..उसके पति ने उसे इतनी बार ठोका है तो मोबाइल में बी.पी. भी दिखाया ही होगा..


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josef
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Re: Adultery शीला की वासना की आग

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ऐसे ही बातचीत करते रहने के बाद रूखी चली गई।

उसके साथ हुए इस मजेदार संभोग को याद करते करते शीला ने रात का खाना खाया और सो गई। बिस्तर पर लेटकर आँखें बंद करते ही उसे रूखी के मदमस्त गदराए मोटे मोटे स्तन नजर आने लगे... आहह.. कितने बड़े थे उसके स्तन... उसकी नंगी छातियों के उभार को देखकर ही मर्दों के कच्छे गीले हो जाएँ.. नीलगिरी के पेड़ के तने जैसी उसकी जांघें.. बड़े बड़े कूल्हें.. भारी कमर.. आहह.. सबकुछ अद्भुत था... !!



हालांकि गंवार रूखी को ठीक से चुंबन करना नही आता था.. और वह चुत चाटने में भी अनाड़ी थी.. यह बात शीला को खटकी जरूर थी.. हो सकता है लंड चूसने में माहिर हो.. पर क्या रूखी ने कभी लेस्बियन अनुभव कीया होगा पहले? वैसे तो शीला के लिए भी यह प्रथम अनुभव था.. पर उसने ब्लू फिल्मों में ऐसे कई द्रश्य पहले देखे हुए थे.. तो उसे प्राथमिक अंदाजा तो था ही.. हो सकता है रूखी ने भी कभी ऐसी फिल्में देखी हो..उसके पति ने उसे इतनी बार ठोका है तो मोबाइल में बी.पी. भी दिखाया ही होगा..


शीला के भोसड़े में नए सिरे से आग लग गई.. ऐसे ही विचारों में उसकी आँख लग गई.. और तब खुली जब डोरबेल बजने की आवाज सुनाई दी..

वह जाग गई.. "आज रसिक आया हो तो अच्छा.. " मन में सोचते हुए उसने दरवाजा खोला। सामने रसिक ही खड़ा था..

"कैसे हो रसिक?" पतीली में दूध डाल रहे रसिक को चौड़ी छाती को भूखी नज़रों से घूरते हुए शीला ने कहा। वह सोच रही थी की अभी यहीं रसिक उसे पकड़कर चोद दे तो कितना मज़ा आएगा!!

"आपने फिर फोन नही कीया मुझे, भाभी?" रसिक ने पूछा

"अरे में भूल ही गई मेरे काम में.. अंदर आ रसिक.. बैठ थोड़ी देर.. " शीला ने न्योता दिया

"नही भाभी.. अभी और बहोत घरों में दूध देने जाना है.. टाइम पर नही पहुंचता तो सब चिल्लाते है.. " रसिक ने कहा

शीला ने झुककर अपने गोरे गोरे मम्मों का जलवा दिखाकर रसिक को थोड़ी देर वहीं रुकने पर मजबूर कर दिया।

"भाभी अब में जाऊँ?" थोड़ी देर की चुप्पी के बाद रसिक ने कहा

"सुबह जल्दी निकला करो तुम.. तो यहाँ पर थोड़ी देर बैठकर आराम कर सकेगा" शीला ने कहा

"वो तो ठीक है भाभी... पर कहाँ सुबह सुबह आपकी नींद खराब करूँ!! आप भी पूरा दिन काम कर के थक जाती होगी"

शीला सोच रही थी... की मेरी थकान उतारने के लिए ही तो तेरी जरूरत है!! क्या हकीकत में ये रसिक इतना नादान है!! तभी रूखी को चोदता नही है..

शीला के मदमस्त बबले देखकर रसिक का लंड मेंडक की तरह कूदने लगा था जो शीला ने देख लिया। वह सोच रही थी की कल तो ये रसिक जल्दी आए या न आयें.. पर अभी चुत के अंदर जो आग लगी है, उसका में क्या करूँ? कैसे बुझाऊँ??

उसने कहा.. "रसिक, तू जल्दी आ जाया कर.. नींद का क्या है.. वो तो में दोपहर में पूरी कर लूँगी.. और वैसे भी मुझे रात को ठीक से नींद आती नही है"

"क्यों भाभी, भैया की बहुत याद आती है?"

"याद तो आती ही है..." कहते हुए शीला ने मदहोश होकर अंगड़ाई ली.. स्लीवलेस गाउन में से नजर आती उसकी गोरी काँखों को देखकर रसिक के लंड ने बगावत कर दी।

"भाभी, थोड़ा पानी मिलेगा? सुबह सुबह साइकिल चला कर गला सुख गया है"

शीला तुरंत किचन से पानी का ग्लास भरकर ले आई.. और रसिक को देते वक्त उसके हाथ को अच्छे से छु लिया.. रसिक भी शीला के हाथों को छूकर मस्तराम बन गया..

रसिक का लोडा उसके पतलून में तंबू बनाकर फुँकार रहा था.. पानी पीकर ग्लास लौटाते हुए उसने फिर से शीला के हाथ को जानबूझकर छु लिया।

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शीला की चुत में सुरसुरी होने लगी थी। उसने बाहर दोनों तरफ देखा.. चारों तरफ घनघोर अंधेरा था.. उसने यह मौका हड़प लिया.. और रसिक का हाथ पकड़कर खींचते हुए घर के अंदर ले गई और उससे लिपट पड़ी।

"आहह रसिक.. ऐसे क्यों खड़ा है.. मुझे कुछ कर ना.. कब तक ऐसे अनाड़ी बना रहेगा? कुछ समझता ही नही है तू तो..!!"

रसिक भी आखिर मर्द था.. उसने शीला के न्योते का स्वीकार करते हुए उसे कमर से जकड़ लिया.. आगोश में भरकर दबा दिया.. दो जवान धड़कनें एक हो गई.. शीला के भूखे स्तन रसिक की छाती से दब कर चपटे हो गए.. उन कडक बबलों का गरम स्पर्श अपनी छाती पर महसूस होते ही, रसिक दूध बेचना भूल गया.. वह अपने हाथों से शीला के भूखी जिस्म की भूगोल का मुआयना करने लगा...

रसिक की पतलून के ऊपर से ही शीला ने उसका लंड पकड़ लिया और दबाते हुए बोली

"रसिक.. यह तो खूँटे जैसा मोटा बन चुका है.. इसे इस हालत मे लेकर कहाँ घूमेगा तू!!"

"ओह भाभी... आपको देखकर ही यह ऐसा मोटा बन गया है" रसिक ने कराहते हुए कहा

"फिर देर किस बात की है रसिक... टूट पड़ मुझ पर और रौंद दे मुझे, हाय... "

"भाभी, आपका ये जोबन...कितना जबरदस्त है"

शीला ने रसिक के पतलून में हाथ डाल दिया और उसके नंगे राक्षस जैसे लंड को पकड़ लिया। उसने रसिक के होंठ पर अपने होंठ रख दिए और मस्त कामुक तरीके से चूसने लगी। पतलून के अंदर लंड को आगे पीछे कर हिलाते हुए अपने स्तनों को रसिक की छाती पर रगड़ने लगी। रसिक भी शीला के नितंबों पर हट्ठ फेर रहा था।

शीला अब घुटनों के बल बैठ गई.. और पतलून की चैन खोलकर रसिक के लंड को बाहर निकाला। रसिक के विकराल लंड को देखकर शीला पानी पानी हो गई। सोच रही थी की ये लंड है या ओएनजीसी की पाइपलाइन!!!! इतना बड़ा... !!!! बबुल के तने जितना मोटा.. उसका सुपाड़ा एकदम लाल था.. टमाटर जैसा.. जैसे अभी शेर शिकार कर आया हो और उसका मुंह खून से लथपथ हो ऐसा डरावना लग रहा था.. पर शेर कितना भी खूंखार क्यों न हो.. शेरनी भला उससे थोड़े ही डरती है!!


शीला को अब डर के बदले रसिक के लंड पर बेशुमार प्यार आ रहा था.. उसने बड़े ही प्यार से उसके लंड को चूम लिया..

"आहहह भाभी" अपने लंड को थोड़ा सा धक्का देते हुए रसिक ने शीला के मुंह में डाल दिया.. लगभग ४ इंच जितना!! शीला रसिक का लंड चूसने लगी और उसके बोलबेरिंग जैसे अंडकोशों को अपने हाथ से सहलाने लगी। रसिक के लंड की सख्ती से शीला इतनी उत्तेजित हो गई की अपना मुंह फाड़कर जितना हो सकता था उतना लंड अंदर लेने लगी और आखिर लंड के मूल तक पूरा अंदर लेकर रही।


दो साल की प्यास को आज बुझाने के लिए शीला पूर्णतः तैयार थी। पति की गैरमौजूदगी में उसने बीपी में देखे हुए लंड चुसाई के सारे सीन का अनुभव काम पर लगा दिया था.. इसके परिणाम स्वरूप रसिक "आहह ओहह" करते हुए कराह रहा था। रसिक के लिए यह बिल्कुल ही नया अनुभव था। उसकी गंवार पत्नी रूखी ने कभी उसका लंड नही चूसा था। इस प्रथम अनुभव को रसिक और लंबा खींच नही सका.. सिर्फ दो ही मिनट में उसने शीला के मुंह में अपनी सारी मर्दानगी को उंडेल दिया।



शीला का पूरा मुंह रसिक के गरम लावारस जैसे वीर्य से भर गया। उसे यह जरा भी अंदाजा नही था की रसिक इतने जल्दी झड जाएगा। शीला की प्यास बुझती इससे पहले तो रसिक ठंडा हो गया!! रसिक ने तुरंत अपना लंड शीला के मुंह से निकाला और पेन्ट में रखकर चैन बंद कर दी और बोला

"आज तो मज़ा आ गया भाभी, कल और जल्दी आऊँगा.. आज देर हो गई है"

"रसिक, तेरा काम तो हो गया पर मेरा क्या? मेरी कश्ती तो किनारे पर आकर डूब गई!!" उदास शीला ने कहा "कुछ भी कर पर आज मुझे चोद कर ही जाने दूँगी.. भाड़ में गया तेरा दूध पर ऐसे मुझे तड़पती हुई छोड़कर मत जा" रोने जैसी शक्ल हो गई शीला की

रसिक दुविधा में आ गया.. अब क्या करें!!

"एक काम करता हूँ भाभी.. में दूध देकर सिर्फ १० मिनिट में आता हूँ, ठीक है ना!!" रसिक ने अपना कनस्तर उठाते हुए कहा

"मुझसे अब एक सेकंड भी बर्दाश्त नही होगा.. अभी के अभी चोद मुझे" कहते हुए शीला ने रसिक का हाथ खींचा और उसे बिस्तर तक ले गई और धक्का देकर लेटा दिया। तुरंत उसने अपना गाउन उतारा और नंगी हो गई... फिर रसिक पर भूखी शेरनी की तरह टूट पड़ी..

रसिक के शरीर के ऊपर सवार होकर उसने पागलों की तरह उसके शर्ट को नोच कर फाड़ दिया.. और उसकी खुली छाती पर यहाँ वहाँ चूमने लगी। उसने रसिक के दोनों हाथों को पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिया और उससे मसलवाने लगी। रसिक के मुरझाए लंड पर अपनी गरम चुत को घिसने लगी। चुत का स्पर्श होते ही रसिक का लंड थोड़ी थोड़ी हरकत करने लगा पर पूरी तरह से टाइट नही हुआ। फिर भी शीला ने उस आधे मुरझाए लंड को अपने गरम सुराख पर रख दिया और पागलों की तरह कूदने लगी।


शीला का यह रौद्र स्वरूप देखकर रसिक के होश उड़ गए.. क्या करना उसे पता ही नही चल रहा था.. शीला के नंगे मम्मे उसकी उछलकूद से ऊपर नीचे हो रहे थे.. स्तनों की उछलकूद से अंदाजा लग रहा था की शीला कितनी रफ्तार से उसे चोद रही थी। को स्त्री इतनी उत्तेजित भी हो सकती है यह रसिक ने कभी सोचा नही था।


शीला के ताजमहल जैसे सुंदर नंगे जिस्म को देखकर रसिक भी उत्तेजित होने लगा.. उसका लंड सख्त हो गया.. शीला के भोसड़े में लंड की साइज़ बढ़ते ही.. उसे भी दोगुना मज़ा आने लगा और वह और उत्तेजित होकर कूदने लगी..

आखिर शीला की नाव किनारे पर पहुँच ही गई.. उसके भोसड़े से कामरस का झरना बहने लगा.. ऑर्गजम होते ही उसने रसिक के लंड को अजगर की तरह चारों तरफ से गिरफ्त में ले लिया... अपनी चुत की मांसपेशियों से उसने लंड को ऐसा दबोचा जैसे उसे फांसी देने जा रही हो।

शीला अब रसिक की बालों वाली छाती पर ढल गई.. रसिक का लँड़, शीला की चुत की गर्मी को और बर्दाश्त नही कर सका और सिर्फ १५ मिनिट के अंतराल में दूसरी बार झड़ गया..

शीला की माहवारी कब की रुक चुकी थी इसलिए गर्भ ठहरने का कोई प्रश्न ही नही था। दो साल से प्यासी उसकी चुत की धरती पर अमृततुल्य वीर्य की बूंदें पड़ते ही उसका रोम रोम पुलकित हो गया। रसिक के लंड से चुदकर वह धन्य हो गई।

सांसें नियंत्रित होते ही शीला ने चूमकर रसिक को कहा "क्या करती रसिक? मुझसे बर्दाश्त ही नही हो रहा था इसलिए... "

"वो तो ठीक है भाभी पर आपने मेरा शर्ट फाड़ दिया.. अब में कैसे दूध देने जाऊँ??" रसिक ने कहा

रसिक की फटी हुई कमीज देखकर शीला शर्म से लाल हो गई.. "रुको में तुम्हारे भैया को कोई शर्ट लाकर देती हूँ.. " अलमारी से तुरंत एक शर्ट निकालकर उसने रसिक को दीया।

"बहोत देर हो गई आज" कहते हुए रसिक ने शर्ट पहन लिया और भागा

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रसिक की फटी हुई कमीज देखकर शीला शर्म से लाल हो गई.. "रुको में तुम्हारे भैया को कोई शर्ट लाकर देती हूँ.. " अलमारी से तुरंत एक शर्ट निकालकर उसने रसिक को दीया।

"बहोत देर हो गई आज" कहते हुए रसिक ने शर्ट पहन लिया और भागा ​


इस तरफ शीला सीधे बाथरूम में चली गई.. गीजर चालू कर वह नहाने बैठ गई। दो साल के बाद आज उसके भोसड़े की भरजोर चुदाई हुई थी इसलिए थोड़ा दर्द हो रहा था.. पर बहोत अच्छा लगा उसे.. साले का लंड क्या मस्त था.. बस थोड़ी सी ओर ट्रैनिंग देनी पड़ेगी.. फिर एक जबरदस्त चुदाई मशीन में तब्दील हो जाएगा रसिक!! मदन के लंड से दोगुना था रसिक का लंड!! शीला अपनी बुर पर साबुन मलते हुए रसिक के मूसल के विचारों में खो गई।

शीला का भोंसड़ा रसिक का लंड पाकर खिल सा गया था। पिछले दो सालों से लंड की गर्मी के बगैर, बेचारा उसका भोंसड़ा मुरझा सा गया था। पूरा दिन सुबह की चुदाई की यादों में ही गुजर गया... शाम के साढ़े पाँच बजे रूखी आई। शीला और रूखी दोनों बातें करने में व्यस्त हो गए।

बातों बातों में शीला ने रूखी का पल्लू हटा दिया... और उसकी चोली के बटन खोलकर एक चुचे को बाहर निकाला... और उसकी निप्पल को चूसते हुए दुग्धपान करने लगी... दूध पीना बीच में ही रोककर उसने रूखी की ओर देखा.. अपने होंठों से दूध की बूंदें पोंछते हुए शीला ने कहा

"रूखी, तेरा मरद आज सुबह मुझे चोदकर गया" छिनालों जैसी मुस्कान के साथ शीला ने कहा

एक पल के लिए चोंककर​ रूखी मुस्कुराई और बोली "कोई बात नही भाभी.. मैंने भी मेरे मरद के दोस्त जीवा से संपर्क बना लिया है.. वो न सही तो उसका दोस्त ही सही.. वैसे आपको चुदवाने में मज़ा तो आया न!!"

"बहोत मज़ा आया.. दो साल बाद असली लंड को हाथ में पकड़ने का मौका मिला... तेरे पति का लंड तो काफी तगड़ा है री" शीला ने शरमाते हुए कहा

"अरे भाभी, आपने मेरे यार जीवा का लंड नही देखा इसलिए मेरे मरद का लंड बड़ा लग रहा है.. जीवा का लंड तो... क्या बताऊँ आपको.. गधे के लंड जितना मोटा और तगड़ा.. अंदर घुसाकर मेरी मुनिया को ऐसे ठोकता है साला.. अंदर चुत में हंगामा मच जाता है" रूखी की आँखें बंद हो गई और वह जीवा के लंड के सपनों में खो गई।

रूखी शीला की चिकन जांघों पर हाथ फेरकर मजे लेते हुए बोली "भाभी आपका शरीर तो कितना गोरा और चिकना है.. सच कहूँ भाभी तो मुझे अभी जीवा से चुदवाने का बहुत मन कर रहा है "

"तो बुला ले उसे यहाँ.. तुम दोनों अंदर के रूम में अपना कार्यक्रम करते रहना... और में छुप कर देखूँगी.." शीला ने अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा ​


"क्या सच में उसे यहाँ बुलाया सकती हूँ भाभी? पर कहीं रसिक को पता चल गया तो.. वो तो मुझे जिंदा गाड देगा" रूखी को डर लगा

"उसकी चिंता तू मत कर... मुझ पर छोड़ दे.. तू बुला ले जीवा को यहाँ" शीला ने रूखी का होसला बढ़ाते हुए कहा। वास्तव में जिस तरह रूखी ने जीवा के लंड का ब्यौरा दिया था.. शीला भी उस मुश्टंडे लंड को देखना चाहती थी...

रूखी ने अपने मोबाइल से जीवा को फोन लगाया... जीवा से बात की और शीला के घर का पता और दूसरे दिन मिलने का समय उसे बता दिया। अब शीला जीवा का लँड देखने के लिए बेकरार हो चली थी। ​


"भाभी, आपको भी जीवा का लंड देखना है?" रूखी ने जैसे शीला के मन की बात पढ़ ली। बिना कुछ कहे शीला ने हाँ कहते हुए गर्दन हिलाई

"आप उस खिड़की के पीछे छुप जाना.. में कैसे भी करके जीवा को उस तरह घुमाऊँगी जिससे की आपको उसका लंड दिख जाए" रूखी ने कहा

"ठीक है रूखी... अभी मैं सोच रही हूँ की रसिक को फोन करूँ.. उसने मुझे फोन करने के लिए कहा था.. तू भी सुन की तेरा पति कैसे बात करता है" शीला ने शैतानी मुस्कान के साथ कहा

"हाँ हाँ भाभी.. लगाइए फोन" उत्सुकता वश रूखी ने कहा

शीला ने रसिक को फोन लगाया.. रसिक के फोन उठाने का इंतज़ार करती हुई शीला के स्तन रूखी मसल रही थी

"अभी रिंग जा रही है... और रूखी.. तू जरा धीरे धीरे दबा... रसिक से बात चल रही हो तब जोर से मत मसलना... वरना मेरी चीख निकल जाएगी और उसे पता चल जाएगा.. " तभी रसिक ने फोन उठाया " हैलो" शीला ने कहा

"अच्छा हुआ भाभी आपने फोन किया... मैं आपको ही याद कर रहा था" रसिक ने कहा

"अच्छा!! क्या याद कर रहे थे?" शीला ने शरारत करते हुए पूछा ​


"भाभी, आपने जिस तरह मेरा मुंह में लिया था.. मज़ा आ गया.. रूखी तो कभी मेरा चूसती ही नही है" स्पीकर फोन पर यह सुनकर रूखी को गुस्सा आ गया

"रसिक, मुझे अभी चुदवाने का मन कर रहा है.. आ जा घर पर अभी" शीला ने कहा

"नही आ सकता भाभी... अभी खेत पर हूँ.. " रसिक ने कहा

"पर रसिक.. मुझसे रहा ही नही जाता... क्या करूँ?"

"आप यहाँ खेर पर या जाओ भाभी.. यहाँ कोई नही है... खेत में छोटा स कमरा बना है और उसमे खटिया भी है"

"खेत में भला तूने खटिया क्यों रखी है तूने? रूखी को वहाँ ले जाकर चोदता है क्या?" शीला ने पूछा

"रूखी मिले तो रूखी... और ना मिले तो सूखी.. में तो यहाँ खेत में काम करने आती मज़दूरनों को भी चोद देता हूँ" रसिक ने ताव में आकर कहा "और वैसे उस रूखी को बच्चों से फुरसत ही कहाँ मिलती है कभी.. "

"गजब का खिलाड़ी है रे तू रसिक.. " शीला ने हंसकर कहा

"खिलाड़ी मैं नही.. मेरा लंड है भाभी। इसे रोज चुत चाहिए.. अब घर में नही मिलती तो बाहर से लाकर भी इसे खुश रखना पड़ता है"

"तुम्हें तो बाहर मिल जाती है.. मुझ जैसी का क्या? में कहाँ जाऊँ?"

"आपको कहीं जाने की जरूरत नही है.. दोपहर के समय मेरे खेत पर आ जाइए.. रसिक का लंड आपकी सेवा में हाजिर रहेगा"

शीला हंसने लगी और कुछ नही बोली

"एक बात पूछूँ भाभी.. क्या आप रूखी को आपके जैसा लंड चूसना सीखा देंगे?" रसिक ने पूछा

"वो तो मैं कैसे सिखाऊँ उसे.. उसके सामने अगर तेरा लंड चुसूँगी तो वो कैसे सह लेगी भला"

"वो तो मुझे भी पता है भाभी पर आप ही कुछ करो ना!! रूखी एक नंबर की गंवार अनपढ़ है... " रसिक ने शिकायती स्वर में कहा

"जैसे तुम मर्दों को लंड चुसवाना अच्छा लगता है वैसे ही हम औरतों को अपनी पुत्ती चटवाना बहुत पसंद होता है यह तो पता है ना तुझे!! तो क्या कभी तूने रूखी की चुत को चाटकर उसे खुश किया है?" शीला ने वेधक सवाल पूछा ​


"क्या भाभी आप भी... वहाँ भला कौन चाटता है!!" रसिक ने हँसते हुए कहा

"बहनचोद सुबह तो बड़ी मस्ती से चुसवाया था तब कितना मज़ा आया था तुझे... एक मिनट में ही मेरे मुंह में मलाई गिरा दी थी.. वैसे ही हम औरतों को अपनी चुत चटवाने में मज़ा आता है" शीला ने कहा

"अरे भाभी... क्या कहूँ.. आपने सुबह जिस तरह मेरा लंड चूसा था... उसे याद करते हुए मैंने सुबह से पाँच बार मूठ मार दी.. मेरा हाथ भी दर्द करने लगा है.. लगता है आज क्रोसिन लेनी पड़ेगी... इतनी बार पानी निकालने के बावजूद लंड फिर खड़ा हो गया है.. क्या करूँ बताइए" रसिक ने कहा

"आजा घर पर.. और मेरी गांड में डाल दे.. तेल लगाकर तैयार रखती हूँ" शीला ने चुटकी लेते हुए कहा

"क्या भाभी... गांड में भी कोई डालता है भला" अबुद्ध रसिक ने कहा

"क्यों नही डाल सकते.. घर पर आ तुझे सब सिखाती हूँ"

"आप तो जबरदस्त हो भाभी... रूखी अगर आपके जितनी माहिर होती तो मुझे इन मजदूरनों के गंदे भोसड़े चोदने नही पड़ते... कुछ सिखाओ आप उसे भाभी" रसिक ने कहा

"रसिक, मुझे तो एक साथ दो मर्द चोदे ऐसा भी बहुत पसंद है.. कभी तू अपने किसी दोस्त को लेकर घर आजा... सब साथ में मजे करेंगे."​


"सच में भाभी!! मेरा एक दोस्त है रघु.. उसकी बीवी कुएं में गिरकर मर गई थी.. तब से बेचारा चुत के लिए तड़प रहा है.. अगर आप कहों तो कल हम दोनों सुबह दूध देने आपके घर आयें??" रसिक के मन में लड्डू फूटने लगे

"हाँ तो आ जा.. मैं तो सामने से बुला रही हूँ... पर जरा जल्दी आना ताकि पूरा वक्त मिलें.. मुझे आराम से चुदवाना है.. हड़बड़ी में मज़ा नही आता" शीला ने कहा

"भाभी हम सुबह ४ बजे आ जाएंगे.. चलेगा ना!!" उत्साहित रसिक ने कहा

"पर घर पर रूखी से क्या कहेगा की इतनी जल्दी कहाँ जा रहा है?

"उसकी चिंता आप मत करो.. उसे बता दूंगा की खेत में पानी देने जा रहा हूँ "

"फिर ठीक है.. कल सुबह ४ बजे... पक्का ना!!:

"एकदम पक्का भाभी... आप बस लगाने के लिए तेल तैयार रखना" रसिक ने हँसते हुए कहा

"तू एक बार आ जा.. सब तैयार ही है" शीला ने कहा

"ठीक है भाभी, रखता हूँ" रसिक ने फोन काट दिया

फोन रखकर शीला ने रूखी के विशाल गुंबज जैसे स्तनों को दबाया और कहा "तू जीवा को आज रात यहाँ बुला ले.. पूरी रात वो यहाँ रहेगा.. सुबह जैसे ही रसिक यहाँ आएगा.. में जीवा को तुरंत तेरे घर भेज दूँगी.. ठीक है!!"

"वाह भाभी... गजब तरकीब ढूंढ निकाली आपने.. बड़ी उस्ताद हो" रूखी ने तारीफ करते हुए कहा

"रूखी, मैं अपने दिमाग और चुत दोनों का उपयोग कर सोचती हूँ " अपने सर पर उंगली रखकर हँसते हुए शीला ने कहा

रसिक कल भाभी के घर चला जाएगा... उसके जाते ही जीवा अपने पास आ जाएगा इस सोच से ही रूखी की चुत से बूंदें टपक पड़ी। पर वह ये नही जानती थी की शीला ने एक ही रात में तीन तीन लंड से चुदवाने का प्रबंध कर लिया था!!

रूखी ने लगभग १ घंटे तक शीला के साथ मस्ती की.. और फिर अपने घर के लिए निकल गई। जीवा के साथ रात बिताने के खयाल से ही वह रोमांचित हो गई थी। अब तो रसिक भी उसका कुछ नही बिगाड़ पाएगा.. क्योंकी उसकी पोल भी खुल चुकी थी। अब तक वह जीवा के साथ रिक्शा में हाइवे पर जाती.. और वहीं जितना हो सकता था उसके मजे लेती.. वो भी डरते डरते की कहीं कोई आ न जाए... उसमे उसे जरा भी मज़ा नही आता था.. जीवा का मोटी लौकी जैसा भारी लंड को वह किसी भी डर के बिना अपनी चुदासी चुत में लेना चाहती थी.. और अब उसे अपना सपना सच होता दिखाई दे रहा था

जीवा की हरएक हरकत को याद करते करते रूखी अपने घर की ओर जा रही थी... जीवा का खयाल आते ही उसके दूध से भरे हुए उरोज ओर फूल गए.. और उसके हर कदम के साथ उछलने लगे..

इस तरफ शीला... अपने दिमाग को खुद ही शाबाशी दे रही थी.. काश ये रूखी पहले मिल गई होती..!! दो दो साल से भोसड़े में गाजर मुली और ककड़ी डालकर चुत को सब्जीमंडी ना बनाना पड़ता..!! उसे ताज्जुब यह हो रहा था की आज से पहले उसे रसिक के बारे में खयाल क्यों नही आया?? वो तो कलमुँहा रोज दूध देने आता ही था!! ​

शीला जब भी चौराहे से गुजरती तब सारे बूढ़े उसके स्तनों को टिकटिकी लगाकर देखते.. पूरा मोहल्ला उसे ठोंकने के लिए बेकरार था.. सब जानते थे की उसका पति २ सालों से विदेश था.. और तब से वह अपने बिस्तर में करवटें बदलती रही थी.. काफी लोगों ने कोशिश भी की थी.. जब भी वह कुछ सामान खरीदने जाती तब किराने की दुकान वाला हलकट उसके बोबलों को खुलेआम ताकता रहता.. मादरचोद साला!! और सबके सामने उसे देखते हुए अपने लंड को मसलने लगा था.. यह तो गनीमत थी की उसके साथ अनुमौसी भी थे वरना वह हरामज़ादा शीला पर टूट ही पड़ता.. और वो कॉर्पोरेटर का लड़का.. होली के दिन रंग लगाने के बहाने शीला के दोनों स्तनों को मसल गया था.. भड़वा साला!!

शीला को चुदने के लिए लंड का इंतेजाम करना कोई बड़ी बात नही थी.. उसके एक इशारे पर कई सारे मर मिटने को तैयार बैठे थे.. पर उसे डर था समाज का.. आज तक शीला ने बड़े ही विश्वास के साथ अपने आप को काबू में रखा था.. पर यह कमबख्त बारिश ने पूरा काम बिगाड़ दिया... इस मौसम में शीला का भोसड़ा बेकाबू हो गया.. और फिर रूखी और रसिक ने इस आग में पेट्रोल डालने का काम किया.. चलो, जो कुछ भी हुआ ठीक ही हुआ...!!​



लंड को चुत की और चुत को लंड की जरूरत तब से पड़ती आई है जब से मानवजात का इस पृथ्वी पर अवतरण हुआ.. शीला बस यही खयालों में थी की कब रात हो और जीवा का मूसल जैसा लंड देखने को मिले!! शीला की पुत्ती में फिर से खाज होने लगी..
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