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बस दो और कदम
राह चलते मिले थे हम,
राहगीर बने साथ चले हम,
हाथ पकड़ कुछ कदम साथ चले हम,
एक मोड़ पर बदलते दिखे ये कदम !
राहें बदली बिछड़ गए ये कदम,
फिर किसी मोड़ पर दूर खड़े थे हम,
तुम्हारे इंतज़ार में रुक से गए थे ये कदम,
फिर पीछे से किसी ने हाथ पकड़ा और कहा बस दो और कदम !
बस दो और कदम,
सवाल था ये या था ये एक एहसास क्योंकि कुछ धुंधले से दिख रहे थे तुम,
मंज़िलें अलग थी और बढ़ रहे थे कदम,
ज़हन में सवाल था लेकिन विश्वाश था साथ बढ़ेंगे ये कदम,
मंज़िलें करीब आयी तब समझ आया ये सफर रेह गया है बस दो और कदम !
मंज़िलों का सुरूर नहीं था मुझे, चलना चाहता था बस दो और कदम,
इस सफर में हर वक़्त जीना चाहता था बस दो और कदम,
हर दूसरे कदम पर सोचा बस दो और कदम,
साथ रहा तो मौत से लड़लूंगा और कहूंगा बस दो और कदम,
ज्यादा कुछ नहीं बस मांग रहा हूँ दो और कदम,
सिर्फ दो और कदम !