बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Jemsbond
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:08

‘शाबाश! इसके बाद हम अग़ली कविता से इस खेल को आगे बढ़ाएंगे. उससे पहले कुक्कील तुम पूरी कविता को कक्षा को पढ़कर सुनाओे...'
‘जी!' कुक्कीम ने खड़े होते हुए कहा और कॉपी से कविता को सुनाने लगी-
गुटका खाकर थूकें लाला
मुंह है या फिर गंदा नाला
जमकर खाया पान मसाला
हुआ कैंसर पिटा दिवाला
काले धंधे जैसा काला
पानमसाला...पानमसाला
धोती-कुर्ता सने पीक से
मुंह में ग़टर छिपाए लाला
माथा पीट रही लालाइन.
अभी वक्त है संभलो लाला
आई अक्लत कसम फिर खाई
अब न छुएंगे पान मसाला.
‘यह पूरी कविता तैयार हुई...अब हम नई कविता पर काम करेंगे. क्योंे बच्चो , तैयार हो.'
‘जी! बच्चोंई ने अपना उत्साकह दिखाया. सहसा निराली खड़ी होकर एक लड़के की ओर इशारा करते हुए बोली-
‘गुरु जी, मैंने मलूका को कई बार पानमसाला खाते हुए देखा है. यह अपने पिताजी की जेब से पैसे चुराकर पानमसाला खरीदता है.' बद्री काका पहले से ही उस लड़के को बड़े ध्या‍न से देख रहे थे. जिस समय दूसरे बच्चे कविता ग़ढ़ने में उत्सा ह दिखा रहे थे, वह
गुमसुम और अपने आप में डूबा हुआ था.
‘क्यों मलूका, क्या निराली सच कह रही है?'
‘जी!' मलूका अपराधी की भांति सिर झुकाए खड़ा हो ग़या.
‘तो इस कविता से तुमने कोई सीख ली?'
‘मैं कसम खाता हूं कि आज के बाद गुटका और पानमसाला को हाथ तक नहीं लगाऊंगा.' मलूका ने वचन दिया. उस समय उसके चेहरे पर चमक थी. वह उसके पक्केन इरादे की ओर संकेत कर रही थी. बद्री काका समेत सभी विद्यार्थियों के चेहरे खिल उठे.
‘गुरु जी, निराली की अम्मा पानमसाला बेचती है. टोले के ज्याथदातर बच्चेी वहीं से खरीदते हैं.' एक बच्चेी ने निराली की ओर देखकर शिकायत की.
‘निराली की मां ही क्योंा, टोले में तो और भी कई दुकानें हैं, जहां पानमसाला और गुटका बेचे जाते हैं.' सदानंद ने निराली को संकट से उबारने के लिए उसका साथ दिया. कुछ पल विचार करने के पश्चाेत बद्री काका ने कहा-
‘जो बच्चेर गुटका और पानमसाला खाते हैं, वे तो दोषी हैं ही. वे दुकानदार भी कम दोषी नहीं हैं जो मामूली लाभ के लिए उनकी बिक्री करते हैं. दोष उन माता-पिता का भी है जो बच्चोंह को इनसे होने वाले नुकसान की जानकारी नहीं देते या खुद भी इन व्योसनों के शिकार हैं.'
‘गुरु जी, मैं अपनी मां से कहूंगी कि गुटका और पानमसाला अपनी दुकान से न बेचें.' निराली ने पूरी कक्षा को आश्वाुसन दिया.
‘जैसे तेरी मां सभी काम तुझसे पूछकर करती है?' एक बच्चेा ने कटाक्ष किया, निराली सकुचा ग़ई. मग़र उसका इरादा और भी दृढ़ हो ग़या.
‘मां मेरी बात को कभी नहीं टालती. और यह बात तो मैं मनवाकर ही रहूंगी.' निराली ने जोर देकर बोली. उसके स्वदर की दृढ़ता और आत्मनविश्वांस देख सभी दंग़ रह ग़ए. खासकर टोपीलाल. वह कुछ देर तक निराली पर नजर जमाए रहा. फिर अचानक उसको कुछ याद आया-
‘मग़र टोले के बाकी दुकानदारों का क्याा होगा. उन बड़ों को कैसे रोका जाएगा, जो खुद इन गंदी आदतों के शिकार हैं.'
‘यह एक गंभीर समस्या है. इस पर हम आगे विचार करेंगे.' बद्री काका बोले.
‘गुरु जी अग़ली कविता शुरू करें?' एक लड़के ने कहा. इसपर बद्री काका मुस्कजरा दिए-
‘जरूर! लेकिन अब समय हो चुका है. हम सप्ता ह में एक दिन बालसभा के लिए तय रखेंगे. अग़ले सप्तारह आज ही के दिन ऐसी ही बालसभा होगी. उसके लिए मैं एक पंक्तित दे रहा हूं. उस पंक्तिख के आधार पर आपको पूरी कविता लिखनी है. जिस विद्यार्थी की कविता उस बालसभा में सबसे अधिक पसंद की जाएगी, उसको पुरस्काधर मिलेगा.
पंक्तिल है-
‘जी...!' बच्चोंो का स्व र गूंजा.
‘नशा करे दुर्दशा घरों की...!'
‘गुरुजी मैं इसे आगे बढ़ाऊं?' टोपीलाल ने हाथ उठाकर पूछा.
‘अभी नहीं, अग़ले सप्तााह, पूरी कविता सुनाना.' बद्री काका ने आश्वाधसन दिया. इसके बाद छुट्‌टी की घोषणा कर दी ग़ई. जाने से पहले उन्होंाने सभी बच्चोंू को अपनी ओर से उपहार देकर विदा किया.
मन में कुछ करने का, ग़ढ़ने का उत्साथह हो तो सृजन व्यरक्तिन के चरित्र की विशेषता बन जाता है.
सृजन की मौलिकता अनिवर्चनीय आनंद की सृष्टि़ करती है.
निराली ने उसी रात अपनी मां से गुटका और पानमसाला बेचने को मना कर दिया. मां पहले तो उसकी बात सुनती रही, फिर एकाएक उखड़ ग़ई-
‘मैं अपने सुख के लिए थोड़े ही बेचती हूं. लोग़ खरीदने आते हैं. ग्राहकों में कुछ बच्चेर भी होते हैं. मैं न दूं तो वे जिद करते हैं, कुछ के तो मां-बाप भी इसके लिए पैसे देते हैं. उन सबकी खुशी के लिए रखना ही पड़ता है.'
‘खुशी कैसी! इससे तो बच्चोंह का नुकसान ही होता है.' निराली ने तर्क किया.
‘यह तो उनके मां-बाप को समझाना चाहिए!'
‘कल से तुम ऐसे बच्चों को मना कर देना.' निराली ने दबाव डाला.
‘मुझे दो पैसे बचते हैं तो क्यों छोड़ूं! और जिनको लत है, वे बाज थोड़े ही आएंगे. मैं नहीं रखूंगी तो वे दूसरी दुकान से खरीदेंगे. फिर ये सब चीजें खाने के लिए ही तो उनके मां-बाप उन्हेंत पैसे देते हैं.'
‘कुछ भी हो, आगे से तुम यह पाप अपने सिर पर नहीं लोगी.' निराली आदेशात्मेक मुद्रा में थी. जैसे किसी बच्चेू को समझा रही हो. उसकी जिद के आगे मां को अंततः झुकना ही पड़ा. निराली को लगा कि अब वह कक्षा में सिर उठाकर प्रवेश कर सकेगी.
टोपीलाल समेत सभी बच्चों को प्रतीक्षा थी कि सप्ताोह जल्दीप पूरा हो. बालसभा का दिन आए. उन्हेंं लग़ता था कि उस दिन सबकुछ उलट-पलट जाता है. गुरुजी, गुरुजी नहीं रहते. न उस दिन उनका कहा हुआ सर्वोपरि होता है. बालसभा में तो जो भी नया कर दे, ग़ढ़ दे वही महत्त्वपूर्ण मान लिया जाता है. गुरु जी समेत सब उसकी तारीफ करने लग़ जाते हैं.
टोले में उस बालसभा की चर्चा हर बच्चेद ने अपनी तरह से, अपनी जुबान में की. जिसका उन बच्चोंन पर ग़हरा असर पड़ा जो अभी तक पाठशाला जाने से बच रहे थे.
परिणाम यह हुआ कि अग़ले दिन से ही पाठशाला में नए विद्यार्थियों का आना आरंभ हो ग़या. बच्चों के माता-पिता पर भी असर पड़ा. वे खुद अपने बच्चोंह को लेकर बद्री काका के पास आने लगे-
‘गुरु जी, हमारी जिंदगी तो जैसे-तैसे कट ग़ई. अब इस बच्चेग का जीवन आपके हाथों में है. इसको संवारने की जिम्मेरदारी अब आपकी है.'
‘लेकिन इसके लिए पुस्तजकें, कॉपी, कलम, बस्ताब...आप देख ही रहे हैं कि मैं तो अधनंग़ फकीर हूं. मेरे पास आमदनी का कोई साधन तो है नहीं.' बद्री काका मुस्कलराकर कहते. उस समय उनका मुख्यख ध्येकय होता बच्चेन के माता-पिता को आजमाना, उसकी शिक्षा के प्रति गंभीरता को परखना. एक बालसभा इतनी असरकारक हो सकती है, इसकी उन्होंाने कल्प्ना भी नहीं की थी. उसकी सफलता ने उन्हें उन सब विचारों पर अमल करने का अवसर दिया था, जिनके बारे में वे अभी तक सिर्फ सोचते ही आए थे.
‘मेरे बच्चेत के लिए कॉपी, कलम और किताबों के ऊपर जो खर्च होगा, उसको मैं खुद उठाऊंगा.' बच्चे का पिता कहता.
‘हम दोनों मेहनत-मजदूरी करेंगे, लेकिन इसकी पढ़ाई में हीला न आने देंगे. आपकी फीस भी हम हर महीने भिजवाते रहेंगे.' बच्चेज की मां यदि साथ होती तो कुछ ऐसा ही आश्वा सन देती.
‘भिजवाना कैसा, मैं खुद देकर जाऊंगा...!' बच्चेत का पिता बीच में ही टोक देता.
‘फीस इतनी आवश्यतक नहीं है. अपनी ऋद्धा से पाठशाला के नाम जो भी तुम देना चाहो, उससे हमारा काम चल जाएगा. नकद न हो तो दाल-चावल, नमक-आटा कुछ भी, जो बच्चोंस के नाश्तेग के काम आ सके.'
जिस संस्थाा की ओर से बद्री काका काम कर रहे थे, उसके पास ऐसे कार्यक्रमों के लिए धन की पर्याप्तस व्यतवस्थाक थी. फिर भी यह मानते हुए कि मुफ्त में प्राप्त वस्तुस अक्स्र उपेक्षित मान ली जाती है, बद्री काका चाहते थे कि बच्चोंस के माता-पिता उनकी शिक्षा के लिए कुछ न कुछ अवश्यु खर्च करें. जिससे शिक्षा के प्रति उनकी गंभीरता बनी रहे. संस्थाम पर कम से कम आर्थिक बोझ पड़े. लोग़ स्वा.वलंबी बनें. इसलिए सप्ताभह या महीने के बाद उनकी पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चोंप के अभिभावक जो भी चीज लाते उसको वह खुशी-खुशी रख लेते थे.
भेंट में मिली हर वस्तुब का रिकार्ड रखा जाता. इसके लिए बद्री काका ने टोपीलाल को एक कॉपी दी हुई थी. जिसमें वस्तुम का नाम और उसकी मात्रा को चढ़ दिया जाता. उस कॉपी में निकाली ग़ई मात्रा भी दर्ज की जाती, उसे हर सप्तामह प्रौढ़ शिक्षा में आए अभिभावकों के सामने प्रस्तुएत किया जाता था.
अभी तक वे प्रायः उपेक्षित ही होते आए थे. उन्हेंव लग़ता था कि वे सिर्फ सुनने-सहने के लिए बने हैं. घर के बाहर उनकी राय किसी काम की नहीं है. इसलिए प्रारंभ में जब
बद्री काका ने चंदे का हिसाब-किताब बताना शुरू किया तब उन्हें बहुत विचित्र लगा था-
‘हिसाब-किताब के बारे में हम जानकर क्यात करेंगे?' एक दिन बद्री काका चंदे का हिसाब सामने रख रहे थे, तब एक मजदूर ने सकुचाते कहा.
‘आपका पैसा है, उसका हिसाब भी आप ही को रखना चाहिए.'
‘हम पढ़े-लिखें हों तब ना हिसाब रखें.'
‘इसीलिए तो मैं यहां आया हूंं कि आप पढ़-लिखें. ताकि जितना जरूरी है, उतना हिसाब तो रख लें.' इन बातों का बड़ों पर भले ही कोई प्रभाव न पड़े. पर बच्चे- उनसे खूब प्रेरणा लेते थे.
दूसरों को प्रेरित करना भी एक कला है. जिसके लिए विचार एवं कर्म दोनों ही स्‍तर पर श्रेष्ठा बनना पड़ता है. प्रायः महान व्यिक्तिकत्व ही यह कर पाते हैं. लेकिन प्रेरणा लेना भी सबके लिए संभव नहीं. न यह छोटी बात है, न ओछी. क्योंाकि इसी से विचार और कर्म की परंपरा को विस्तालर मिलता है.
कभी-कभी अतिसाधारण कहे जाने वाले लोग़ भी असाधारण रूप से प्रेरित कर जाते हैं.
वह दिन बद्री काका जीवन में अविस्मिरणीय बन ग़या. पाठशाला की छुट्‌टी के बाद वे विश्राम कर रहे थे. तभी सामने से आती एक औरत पर उनकी निगाह पड़ी. तेज कदमों से से वह उन्हींा की ओर बढ़ी आ रही थी. वे खड़े हो ग़ए. करीब आने पर वह औरत ठिठकी और बद्री काका के सामने घूंघट निकालकर खड़ी हो ग़ई. बद्री काका उसको पहचानने का प्रयास करने लगे-
‘कुक्कीन आपकी पाठशाला में पढ़ने आती है, मैं उसी की मां हूं.'
‘हां..हां, बहुत समझदार है तुम्हाररी बेटी...!'
‘सब आप ही का प्रताप है. कुक्की् के पिता तो रहे नहीं. मैं ठहरी नासमझ जो उसके ब्याीह की जल्दी कर रही थी. वह तो भला हो आपका और टोपीलाल का, जो मेरी आंखें खोल दीं. नहीं तो अब तक कुक्कीह ससुराल में अपनी किस्म त को रो रही होती. भग़वान आप दोनों को लंबी उम्र दे,'
‘नहीं-नहीं, उस मासूम को इतनी जल्दीन ब्या ह में लपेट देना उचित न होगा. पढ़ने में बहुत ही होशियार है, तुम्हाररी बेटी . मौका मिला तो बहुत दूर तक जाएगी.' बद्री काका बीच ही में बोल पड़े, ‘मैं अपनी पाठशाला के कुछ बच्चोंी का दाखिला बड़ी पाठशाला में कराने की सोच रहा हूं. कुक्कीं भी उनमें से एक है. मेरी कोशिश होगी कि इस टोले के बच्चों की पढ़ाई का सारा खर्च वहां भी सरकार ही उठाए.'
‘कुक्की के बापू ने बड़े प्याचर से उसका नाम कुमुदिनी रखा था. बहुत भला आदमी था वह. अपनी बेटी को लेकर उसके ढेर सारे अरमान थे. मेहनती तो इतना था कि
चौदह-पंद्रह घंटे लगातार काम पर डटा रहता. अकेला दो आदमियों की बराबरी कर लेता था. कभी किसी से ऊंचा बोल नहीं बोला, पर न जाने कैसे वह बुरे आदमियों की सोहबत में पड़ ग़या. जुआ और शराब उसकी आदत में शुमार हो ग़ए. उसी ने हमें तबाह किया. उसी शौक के कारण एक दिन उसको जान से हाथ धोना पड़ा.'
कहते-कहते वह हुलकने लगी. मानों वर्षों पुराने दर्द को पूरी तरह खोल देना चाहती हो. बद्री काका असमंजस थे. समझ ही नहीं पा रहे थे कि उसे किस तरह तसल्लीह दें. कैसे समझाएं. उनके लिए तो उसके आने का कारण भी पहेली बना हुआ था. मग़र कुक्कीि की अम्माे को होश कहां. वह तो भावावेश में बस बोले ही जा रही थी. अपने घर, अपने जीवन-संघर्ष से जुड़ी बातें-
‘पिछले महीने मुझे कर्ज उठाकर भात भरना पड़ा. इसीलिए पाठशाला को कुछ दे नहीं पाई. इस महीने की कमाई उस कर्ज को चुकाने में उठ ग़ई. आप मेरे पिता समान हैं. कुक्कीद को अपनी बच्चीक की तरह पढ़ा रहे हैं. आपका एहसान मैं न भी मानूं तो भी पाठशाला का खर्च तो खर्च की ही तरह चलेगा. सिर्फ दुआ मांग़ने से तो घर-भंडार भरते नहीं...भात देकर लौट रही थी तो मेरी ननद ने थोड़े-से तिल बांध दिए थे. उन्हीं् के लड्‌डू बनाकर लाई हूं. आप इन्हेंो मेरी ओर से नाश्तेल के समय बच्चों़ में बांट देना. बहुत एहसान होगा आपका.'
उसका मंतव्यच समझते ही बद्री काका की आंखें भर आईं. पहली बार उन्हें अपने प्रयास की सार्थकता पर, अपने कार्य ऊंचाई पर ग़र्व हुआ. पहली बार ही जाना कि ग़रीबी भले ही मेहनतकश को तोड़कर रख दे, वह एहसान से कभी नहीं मरता.
‘पाठशाला का नियम है कि बच्चों से मिलने वाली हर वस्तुं का रिकार्ड रखा जाता है. रिकार्ड रखने का काम टोपीलाल का है. इस समय वह तो यहां है नहीं. इसलिए नियमानुसार तुम्हाारी भेंट कल ही स्वीरकार की जानी चाहिए. लेकिन इस समय मैं तुम्हेंी लौटाकर तुम्हावरी भावनाओं की अवमानना नहीं कर सकता. तुम लड्‌डू गिनकर रख जाओ. कल सुबह मैं उन्हेंह रिकार्ड में चढ़वा लूंगा.'
कुक्कील की अम्माउ ने लड्‌डू गिन दिए. वह जाने लगी तो बद्री काका बोले-‘सार्वजनिक जीवन जीते हुए मुझे पचास से अधिक वर्ष बीत चुके हैं. इस अवधि में बापू और विनोबा की स्मृरति के अलावा जीवन में जो कुछ अमूल्यस और स्मअरणीय है, उसमें तुम्हापरा यह उपहार भी सम्मिरलित है. यह घटना मैं कभी भुला नहीं पाऊंगा.' कुक्की की अम्माठ बिना कुछ कहे आगे बढ़ ग़ई. बद्री काका धुंधली आंखों से उसको जाते हुए देखते रहे. उसके ओझल होते ही उनकी निगाह सामने पड़े लड्‌डुओं पर टिक ग़ई.
निश्छ ल मन से दी ग़ई भेंट अमूल्यर होती है.
ऐसी भेंट जिसे मिले वह सचमुच बहुत भाग्यभशाली होता है.
उस दिन कुक्कीस की अम्माे को जाते देख बद्री काका यही सोच रहे थे. कुक्कीे के पिता की मौत नशे की लत के कारण हुई थी. बस्तीी के कई घर नशे के कारण बरबाद हो चुके हैं. हर साल लाखों जिंदगानियां नशे के कारण उजड़ जाती हैं. नशा मनुष्यक के शरीर को खोखला करता है, दिमाग़ को दिवालिया बनाता है. परिवारों को तोड़कर रख देता है. महात्माम गांधी नशे के विरुद्ध थे. जब भी अवसर मिला उन्हों ने नशे के विरुद्ध लोगों को चेताया. उन्हेंा उससे दूर रहने की सलाह दी.
बापू के विचारों की प्रासंगिकता तो आज भी है. हर युग़ में जब तक असंतोष है, अन्याोय है-तब तक तो वह रहेगी ही. बद्री काका सोचते जा रहे थे. वे इस दिशा में कुछ करना चाहते थे. कुछ ऐसा जो सार्थक हो. जिसको पूरा करने से मन को तसल्लीस मिले. बालसभा की कविता प्रतियोगिता को नशे पर केंद्रित करने के पीछे भी उनका यही उद्‌देश्य था.
कविता का विषय जानबूझकर नशे को चुना था. उन्हें इस बात की प्रतीक्षा थी कि बालसभा में बच्चेन नशे के विरुद्ध खुद को कैसे अभिव्यथक्तक करते हैं. उनकी अभिव्यबक्तिष उनकी बस्तीक और उनके अपनों पर कितनी असरदार सिद्ध होती है! कैसे वे उसको उसको और असरदार बना सकते हैं! वे सोच रहे थे कि बच्चोंा को अपने अभियान से कैसे जोड़ा जाए, ताकि उन्हेंर यह अभियान अपना-सा, अपने ही अस्तिोत्वो की लड़ाई जान पड़े. मग़र उनकी पढ़ाई का जरा-भी हर्जा न हो.
सप्तााहांत में बालसभा का दिन भी आ ग़या. कुक्की की मां द्वारा भेंट किए ग़ए लड्‌डू उन्होंिने इस अवसर के लिए संभाल रखे थे. उस दिन सवेरे ही बच्चोंभ का पहुंचना आरंभ हो ग़या. बद्री काका ने उस दिन बस्ता लाने की छूट दी थी. सो अधिकांश बच्चेच खाली हाथ थे. काग़ज-कलम-बस्ता जैसे पाठशाला के तय उपकरणों से मुक्तिो का स्वाीभाविक एहसास उन सभी के उल्लाचस का कारण बना हुआ था.
‘मुझे उम्मीहद है कि पिछली बालसभा में दिया ग़या काम आप सभी ने पूरा कर लिया होगा?' बद्री काका ने शुरुआत करते हुए कहा. इसपर कई बच्चोंल के चेहरे चमक उठे. कुछ तनाव से ललियाने लगे.
‘जो पिछली बालसभा में दिया ग़या काम किसी कारणवश नहीं कर पाए हों, वे परेशान न हों, आज उन्हेंा भी अवसर मिलेगा कि वे आगे की प्रतियोगिता में खुद को साबित कर सकें. टोपीलाल, तुम हमें बताओ कि आज की बालसभा का विषय क्या है?'
‘समस्याव-पूर्ति, आपने हमें एक पंक्तिे दी थी, जिसपर पूरी कविता लिखकर लानी थी...'
‘तुमने कविता लिखी?'
‘जी हां!' टोपीलाल ने ग़र्व सहित बताया.
‘ठीक है, हम सब तुम्हानरी कविता सुनेंगे. लेकिन उससे पहले निराली हमें उस कविता-पंक्ति के बारे में याद दिलाएगी, क्योंम निराली?'
‘जी गुरुजी...पंक्तित है-नशा करे दुर्दशा घरों की.' निराली ने पिछली सभा की कार्रवाही अपनी कॉपी में लिख ली थी.
‘नशा करे दुर्दशा घरों की...इस पंक्तिु पर जो बच्चेक कविता लिखकर लाए हैं, वे अपने हाथ ऊपर कर लें.' केवल दो-तीन हाथ ही ऊपर उठे. इस बीच एक बच्चा् सिसकने लगा. बद्री काका चौंक ग़ए-
‘क्या- हुआ, कौन है?'
‘सदानंद है गुरुजी.' सदानंद के बराबर में बैठी कुक्कीप ने कहा.
‘रो क्यों रहा है?'
‘पिछले सप्ताहह जबसे आपने कविता की पंक्तिै दी थी, तभी से इसका जी बहुत उदास है. कहता है कि जैसे कविता की पंक्तिद की ओर ध्याान जाता है, उसको अपने घर की दुर्दशा याद आ जाती है.'
सभी को मालूम था कि सदानंद के पिता को शराब की बुरी लत है. इस कारण उसके घर में अक्सयर झग़ड़ा रहता है. यह याद आते ही बच्चोंर के उल्लातस को घनी उदासी ने ढक लिया. कुछ देर के लिए तो बद्री काका भी निरुत्तर हो ग़ए. लेकिन उन्हों ने जल्दीउ ही खुद को संभाल लिया-
‘सदानंद तो कविता पूरी कर चुका है, उसने हाथ उठाया था.' बद्री काका के स्वहर में आश्च्र्य था. फिर पल-भर शांत रहने के बाद बोले-‘धीरज रखो बेटे, यह समस्याउ सिर्फ तुम अकेले की नहीं है. कई बच्चोंर की, बल्किल पूरे समाज की और इस तरह हम सब की है. हम इसपर खुले मन से विचार करेंगे. संभव हुआ तो उसके निदान के लिए किसी नतीजे पर पहुंचेंगे भी. फिलहाल जो बच्चे कविता लिखकर लाए हैं, वे तैयार हो जाएं. क्योंर टोपीलाल, क्योंग न आज तुम्हीं से शुरुआत कर ली जाए?'
‘जी!' टोपीलाल खड़ा हो ग़या और जेब से काग़ज निकालकर सुनाने लगा-
छोटे मुंह से बात बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की.'
‘शाबाश!' कविता की प्रथम पंक्ति़ सुनते हुए बद्री काका ने मुंह से बरबस निकल पड़ा. टोपीलाल कविता पढ़ता ग़या-
छोटे मुंह से बात बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की
पान, सुपारी, गुटका, बीड़ी,
सुरा बिगाड़ें दशा घरों की
चरस, अफीम और गांजे से
हालत खस्ता़ हुई घरों की
बरतन-भांडे सब बिक जाते
इज्ज त बंटाधार घरों की
कविता समाप्ता हुई तो बच्चोंक ने तालियां बजाईं. बद्री काका भी पीछे नहीं रहे. बल्किव वे देर तक, उत्सा ह के साथ तालियां बजाते रहे. उसके बाद उन्होंतने दूसरे बच्चेर से कविता सुनाने को कहा. उसकी कविता भी पसंद की ग़ई. उसके बाद जो बच्चेत कविता लिखकर लाए थे, सभी की कविताओं को बारी-बारी से सुना ग़या. अंत में बद्री काका ने सदानंद से अपनी कविता सुनाने को कहा.
सदानंद के खड़े होते ही बच्चेो अपने आप तालियां बजाने लगे. इस बार तालियों में पहले से कहीं ज्या दा जोश था. बाद में गुरुजी से आज्ञा लेकर सदानंद ने अपनी कविता शुरू की-
न छोटे, न शर्म बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की
सदानंद के इतना कहते ही पूरी कक्षा तालियों की ग़ड़ग़ड़ाहट से गूंज उठी.
‘वाह-वाह!' बद्री काका के मुंह से निकला, ‘बहुत अच्छेउ! आगे पढ़ो बेटा. पढ़ते जाओ...शाबाश!'
सदानंद आगे सुनाने लगा-
न छोटे, न शर्म बड़ों की
नशा करे दुर्दशा घरों की
कंगाली आ पसरे घर में
नीयत बिग़ड़े बड़े-बड़ों की
घर बीमारी से भर जाए
खुशहाली मिट जाए घरों की
रिश्तों में आ जाएं दरारें
इज्जतत होवे खाक बड़ों की
बच्चेो रोते फिरें ग़ली में
औरत भूखी मरें घरों की
कविता पूरी होते ही बच्चोंी ने दुगुने जोश के साथ तालियां बजाना शुरू किया. उसके बाद तो देर तक तालियां बजती रहीं. खुद बद्री काका भी तालियों की ग़ड़ग़ड़ाहट के बीच. आंखों में नमी छिपाए. कहीं खो-से ग़ए. सुध लौटी तो सीधे सदानंद के पास पहुंचकर उसकी पीठ थपथपाने लगे-
‘वाह...वाह! तुमने तो कमाल कर दिया. जब मैंने इस कार्यक्रम की योजना बनाई थी, तो मुझे इसकी कामयाबी पर इतना भरोसा नहीं था. तुम सबने मेरी उम्मीाद से कहीं बढ़कर कर दिखाया है. अब मुझे विश्वा स है कि मैं अपने लक्ष्ये की ओर आसानी से बढ़ सकता हूं...शाबाश, बच्चोद शाबाश!'
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:09

बद्री काका भाव-विह्‌वल थे. इतने कि अपनी भावनाओं को व्येक्तप करने के लिए उनके पास शब्द भी नहीं थे. कुछ देर तक कक्षा में ऐसा ही माहौल बना रहा. अंत में बद्री काका ने बच्चों् को संबोधित किया-
‘पिछले सप्ताकह मैंने कहा था कि अच्छी कविता को पुरस्कृात किया जाएगा. अच्छीि कविता का फैसला आप सब की राय से होगा. जरा बताओ तो, यहां पर सुनाई ग़ई कविताओं में सबसे अच्छीअ रचना आपको किसकी लगी?'
‘सदानंद की...!' कक्षा में गूंजा. उनमें सबसे ऊंची आवाज टोपीलाल की थी.
‘कविता तो टोपीलाल की भी बुरी न थी.' बद्री काका ने मुस्कऊराते हुए कहा और अपनी निगाह टोपीलाल पर जमा दी.
‘पर सबसे अच्छी कविता का पुरस्कािर तो सदानंद को ही मिलना चाहिए.' टोपीलाल ने ऊंचे स्व र में कहा. बाकी बच्चोंि ने भी उसका साथ दिया.
‘क्यों ?'
‘सदानंद की कविता ही सर्वश्रेष्ठ है.'
‘कैसे?' इस सवाल पर सभी विद्यार्थी एक-दूसरे का मुंह देखने लगे. बद्री काका ने अनुभव किया कि बच्चों को सबसे अच्छी और अच्छी के बीच अंतर करने की समझ तो है, लेकिन वे उसको शब्दों में व्यिक्त‍ करने में असमर्थ हैं. तब बच्चों की मुश्कि ल को आसान करते हुए उन्होंहने कहा-
‘बच्चोी, अच्छी कविता के लिए जरूरी है कि वह कवि के अपने अनुभव से जन्म् ले. सदानंद की कविता उसकी निजी अनुभूतियों की उपज है. उसने अपने जीवन में जो देखा-भोगा, उसी को शब्दोंो में व्यकक्त किया है. इसलिए उसकी कविता हमारे दिलों को छू लेती है. आज की सर्वश्रेष्ठह कविता का सम्माकन सदानंद को ही मिलना चाहिए.' पूरी कक्षा एक बार पुनः तालियों से गूंज उठी.
सदानंद को पुरस्कृित करने के बाद बद्री काका एक बार फिर बच्चों की ओर मुड़े और बोले, ‘नशा हमारे जीवन को कैसे बरबाद कर रहा है, इससे हम सभी परिचित हैं. बल्किो उस त्रासदी को अपने जीवन में साक्षात भोग़ रहे हैं. नशा यूं तो पूरे परिवार को बरबादी की ओर ले जाता है, परंतु उसका सबसे ज्याेदा शिकार बच्चेग ही होते हैं. बहुत से बच्चोंक की तो शिक्षा भी पूरी नहीं हो पाती. बीमार हों तो समय पर इलाज से वंचित रह जाते हैं. प्याचर के स्था न पर नफरत और उपेक्षा मिलती है. जिससे उनका विकास अधूरा रह जाता है.
इन कविताओं में भी नशे से होने वाली बरबादियों की ओर संकेत किया ग़या है. हमें नशे की लत से बचना चाहिए. जो लोग़ नशे के शिकार हैं, उन्हें उससे उबारने की कोशिश भी करनी चाहिए. मुझे खुशी है कि निराली के कहने पर उसकी मां ने अपनी गुमटी से गुटका और पानमसाला बेचना बंद कर दिया है. लेकिन बस्तीं और उसके आसपास
ऐसे कई दुकानदार हैं, जो अपने मामूली लालच के लिए ये सब चीजें बेचते हैं. जब तक उनमें से एक भी दुकान बाकी है, समझ लो कि हमारी समस्या एं भी खत्मक नहीं हुई हैं. हमें इनके विरुद्ध आवाज उठानी चाहिए. जरूरत पड़े तो बड़े संघर्ष के लिए भी तैयार रहना चाहिए.'
‘सरकार को चाहिए कि नशे की चीजों पर पाबंदी लगाए...' किसी ने बीच ही में टोका.
‘तुम ठीक कहते हो. उन सभी वस्तु.ओं पर जो नाग़रिकों के लिए किसी भी प्रकार से नुकसानदेह हैं, रोक लगाना सरकार की जिम्मेहदारी है. इसके लिए कानून भी हैं. लेकिन हमारे देश में लोकतंत्र है. जनता द्वारा चुनी ग़ई सरकारों की अनेक मजबूरियां होती हैं. उदार कानूनों का लाभ उठाते हुए कई बार स्वाैर्थी व्य वसायी बच निकल जाते हैं. इसलिए सरकार से बहुत अधिक उम्मीाद करना उचित न होगा.'
‘हमें चाहिए कि हम शराब के ठेकों और उन सभी दुकानदारों पर धावा बोल दें, जो नशे की चीजों की बिक्री करते हैं.' एक बच्चेो ने जोर देकर कहा.
‘उस हालत में वे कानून-व्यऔवस्‍था के नाम पर पुलिस की मदद लेने में कामयाब हो जाएंगे. और हम सब जो समाज और कानून के भले की भावना से आगे बढ़ेंगे, उनके दुश्म न माने जाएंगे. झग़ड़ा ज्यामदा बढ़ा तो खून-खराबा भी हो सकता है. पूरे शहर की शांति छिन सकती है. इसलिए हमें कोई और उपाय सोचना होगा. ऐसा उपाय जिससे कि हम अपनी बात सीधे आम जनता तक पहुंचा सकें, उन लोगों तक पहुंचा सकें, जिन्हेंो उनकी जरूरत है. इस बारे में आप में से किसी के पास क्यास कोई सुझाव है?' बद्री काका ने बच्चों का उत्सा हवर्धन करने के लिए पूछा.
इस प्रश्ने पर बच्चोंम के बीच चुप्पीी पसर ग़ई. सभी गंभीर चिंता में डूबे हुए थे. कुछ देर बाद टोपीलाल खड़ा हो ग़या तो सारे बच्चेो उसी की ओर देखने लगे-
‘गुरुजी! आपने कहा है कि हमें अपनी बात लोगों तक सीधे पहुंचानी चाहिए.'
‘बिलकुल, लोकतंत्र में जनता की ताकत ही सबसे बड़ी होती है.' बद्री काका बोले.
‘तब तो समझिए रास्तां मिल ग़या.' टोपीलाल ने उत्साीह दिखाया.
‘कैसे?'
‘हम छुट्‌टी के बाद रोज घर-घर, ग़ली-ग़ली जाकर लोगों को समझाएंगे. उन्हेंर नशे से होने वाले नुकसान के बारे में बताएंगे. उससे भी असर नहीं पड़ा तो ग़ली-मुहल्लों में उस ठिकानों पर धरना देंगे, जहां लोग़ नशे के शिकार हैं. वहां हम तब तक डटे रहेंगे, जब तक कि नशा करने वाले उससे दूर जाने का वचन नहीं दे देते.' टोपीलाल ने कहा तो कुक्की' सहमति में तालियां बजाने लगी. बाकी बच्चे भी उसका साथ देने लगे.
‘यह तुमने कहां से जाना.' बद्री काका ने खुश होकर पूछा.
‘भूल ग़ए, आपने ही ने तो बताया था कि विदेशी वस्त्रों के विरुद्ध लोगों को एकजुट
करने के लिए महात्माे गांधी ने ऐसा ही किया था.'
‘कुछ भी नहीं भूला.' बद्री काका ने जैसे यादों में गोते खाते हुए कहा, ‘पर यह काम आसान नहीं है.'
‘हम सब आपके साथ हैं.' सदानंद ने खडे़ होकर कहा.
‘मुझे पूरा भरोसा है!' बद्री काका बोले, जैसे खुद को तैयार कर रहे हों-
‘लोगों को नशे की लत के प्रति जाग़रूक बनाने के लिए इसके अलावा क्यात कोई और उपाय भी हो सकता है?'
कक्षा में कुछ देर के लिए सन्नािटा छाया रहा. सहसा निराली उठी और बोली-
‘हम बच्चेल टोली बना-बनाकर दुकानदारों के पास जाएंगे और उनसे प्रार्थना करेंगे कि वे नशे की चीजें सुपारी, बीड़ी, सिग़रेट, गुटका, पानमसाला वगैरह न बेचें.'
‘एकदम सही सुझाव है.'
‘वे हमारी बात क्योंि मानने लगे?' एक बच्चेा ने आशंका व्यरक्त. की.
‘हां यह भी ठीक है, लेकिन जब कोई अच्छाच काम सच्चे मन से किया जाता है तो एक न एक दिन कामयाबी मिल ही जाती है. हम एक दिन में यदि दस दुकानदारों के पास जाएंगे तो उनमें से एक-दो हमारी बात गंभीरता से अवश्यत सुनेंगे. धीरे-धीरे यह संख्याा बढ़ती ही जाएगी.'
‘यह तो बहुत परिश्रम का काम है.'
‘हम मेहनत करने को तैयार हैं.' कुक्की ने लड़के की बात बीच ही में काट दी.
‘तब ठीक है...इसके लिए विद्यार्थियों की चार टोलियों बनाई जाएंगी. सप्ताोह में एक दिन, बालसभा के बाद हम इसी अभियान पर चला करेंगे. इसके अलावा क्यार कोई और भी सुझाव है?' बद्री काका ने बच्चों को उत्सा,हित किया.
‘जिन्हेंप नशे की लत है वे इन चीजों का किसी न किसी तरह जुगाड़ कर ही लेंगे.इसीलिए हमें चाहिए कि कुछ ऐसे प्रयास भी करें, ताकि लोग़ इनसे अपने आप दूर होते जाएं. इसके बारे में मेरा सुझाव जरा हटकर है?' टोपीलाल ने बोला. राष्ट्रेपति महोदय को पत्र लिखने के बाद उसका शब्द़ की ताकत में भरोसा बढ़ा था. वह उसको आगे भी आजमाना चाहता था.
‘बताओ बेटा...' बद्री काका ने हौसला बढ़ाया.
‘हम सब अपने माता-पिता और उन संबंधियों के नाम जो नशे की लत के शिकार हैं, पत्र लिखें और उन्हें उससे होने वाले नुकसान के बारे में बताएं. अग़र वे लोग़ हमें सचमुच प्याखर करते हैं तो उनपर हमारी बात का असर जरूर होगा?'
‘वाह! कमाल का सुझाव है तुम्हा रा. जिन्हेंक तुम सचमुच बदलना चाहते हो, उनसे उनके दिल के करीब जाकर बात करो. महात्माल गांधी ने पूरे जीवन यही किया. अपने अखबार ‘हरिजन' के माध्यउम से उन्हों ने देश की जनता से सीधे संवाद स्था‍पित किया था.
और पत्र तो दिल को नजदीक से छूकर संवाद करने का अद्‌भुत माध्यपम है. इस सुझाव पर हम तत्काउल अमल करेंगे. क्योंे बच्चोे?' बद्री काका के आवाह्‌न पर अधिकांश बच्चोंत ने सहमति व्यकक्त. की. इससे उत्सा हित होकर बद्री काका ने आगे कहा-
‘इस सप्ताेह सभी बच्चेो अपने माता-पिता या उन संबंधियों के नाम पत्र लिखकर लाएंगे, जो नशे के शिकार हैं. उन पत्रों को अग़ली बालसभा में सुनाया जाएगा. हां, यदि कोई बच्चात नहीं चाहता कि उसके माता-पिता या सगे-संबंधी की नशे की आदत के बारे में खुले में, सबके सामने बातचीत हो तो इसका भी ध्यारन रखा जाएगा. उस विद्यार्थी के पत्र को कक्षा में पढ़ा जरूर जाएगा, लेकिन पत्र में दिए ग़ए नाम तथा उससे विद्यार्थी के रिश्तेे को पूरी तरह गुप्ती रखा जाएगा. यदि संभव हुआ तो पत्र को सीधे अथवा डाक के माध्य म से उस व्य क्तिे तक पहुंचाने की व्य वस्थार की जाएगी, जिसके नाम वह लिखा ग़या है. बोलो मंजूर?'
‘जी!' पूरी कक्षा ने साथ दिया. इसी के साथ उस दिन की पाठशाला संपन्नध कर दी ग़ई. बच्चेे अपने-अपने घर लौटने लगे.
हर बालक ऊर्जा का अज- भंडार है. जो इस सत्य को पहचानकर उसका सदुपयोग़ करने में सफल रहते हैं, इतिहास महानायक मानकर उनकी पूजा करता है.
महानायक अकेला आगे बढ़ता है. लेकिन थोड़े ही समय में पूरा कारवां उसके पीछे होता है; जो निरंतर बढ़ता ही जाता है.
बद्री काका खुश थे, बल्किे हैरान भी थे. बच्चोंछ को जिस दिशा में वे लाना चाहते थे, जिस उद्‌देश्यप के लिए संग़ठित करना चाहते थे, उस ओर वे स्व यंस्फूवर्त भाव से बढ़ रहे थे. उनमें एकता भी थी और उत्साहह भी. उनमें भरपूर ऊर्जा थी और काम करने की ललक भी. उनका संग़ठन कमाल का था. जिसमें न कोई लालच था, न राजनीति की दुरंगी चाल. न कोई छोटा था, न बड़ा. सभी अनुशासित थे; और अपनी विचारधारा में स्वातंत्र भी. इसलिए उनकी कामयाबी पर भरोसा किया जा सकता था. आवश्याकता थी उनके सही नेतृत्वथ की. उनकी संग़ठित ऊर्जा का रचनात्मबक उपयोग़ करने की.
पाठशाला के कुल बच्चों को चार दलों में बांटा ग़या था. एक दल का नेता टोपीलाल को बनाया ग़या. दूसरे का निराली को. कुक्की और सदानंद एक ही टोले में रहना चाहते थे. बद्री काका की इच्छाअ थी कि दोनों को स्वजतंत्र टोलियों की जिम्मे्दारी सौंपी जाए. आखिर कुक्कीे की बात ही मानी ग़ई. उसके अनुरोध पर उसे सदानंद के साथ एक ही टोली में रखा ग़या.
चौथे टोले का मुखिया अर्जुन को बनाया ग़या. वह दूसरे टोले का था. उसके माता-पिता मजदूरी करते थे. उनका टोला हाल ही में शहर के दूसरे क्षेत्र से यहां पहुंचा
था और बराबर में बन रही एक और बहुमंजिला इमारत के निर्माण में लगा था. अर्जुन को टोली का मुखिया बनाने के पीछे सोच यही था कि बच्चेइ जब उसके टोले में जाएं तो अर्जुन के कारण वहां के लोग़ उस आंदोलन से खुद को जुड़ा हुआ समझें.
नशा-मुक्तिड अभियान को कारग़र बनाने के बच्चोंम ने चित्र और पोस्टमर भी बनाए थे. चित्र बनाने का सुझाव निराली का था. उसको चित्र बनाने का शौक था. वह कक्षा में, घर पर, जब भी अवसर मिले, चित्र बनाती ही रहती. टोपीलाल के आग्रह पर पूरे टोले में प्रभात-फेरी का कार्यक्रम बनाया ग़या. उसके लिए कुछ भजन लिखे-लिखाए मिल ग़ए. बाकी बद्री काका ने स्वेयं लिखे. ढोलक और मजीरे का प्रबंध बस्ती से ही हो ग़या.
भजनों को संगीत की लय-ताल पर गाने का अभ्या‍स कराने में तीन दिन और गुजर ग़ए. टोपीलाल के उत्सा-ह को देखते हुए प्रभातफेरी के लिए कुछ नारे भी ग़ढ़े ग़ए थे. इस सब कार्यवाही में बच्चों ने जिस उल्ला स और मनोयोग़ से हिस्सा लिया. उसको देखकर बद्री काका भी दंग़ रह ग़ए.
अग़ले सप्तािह बालसभा के दिन सुबह ठीक छह बजे सभी बच्चे बिल्डिंाग़ के दूसरे तल पर, जहां पाठशाला चलाई जाती थी, जमा हुए. उनके हाथ में खुद के बनाए पोस्ट र थे, और झंडे भी. सबसे पहले प्रार्थना हुई. बद्री काका ने बच्चों् को गांधी जी के जीवन से संबंधित अनेक प्रेरक प्रसंग़ सुनाए. उनके जीवन से प्रेरणा लेने को कहा. प्रभात-फेरी का विचार टोपीलाल की ओर से आया था. अतः उसका नेतृत्व करने की जिम्मे.दारी भी उसी को सौंपी ग़ई.
तय समय पर प्रभात-फेरी के लिए बच्चों का समूह पंक्तिोबद्ध हो आगे बढ़ा. ढोलक और मजीरे की ताल पर भजन गाते हुए बच्चेा छोटी-छोटी झुग्गिायों के आगे से होकर गुजरने लगे. उनके स्वमर ने लोगों को जगाने का काम किया. भजन पूरा होते ही नारों की बारी आई. प्रभात-फेरी का नेतृत्व कर रहे टोपीलाल ने पहला नारा लगाया-
‘गुटका, पानमसाला, बीड़ी...'
‘...मौत की सीढ़ी-मौत की सीढ़ी.' पीछे चल रहे बच्चोंक ने साथ दिया.
‘गुटका, पानमसाला, बीड़ी...'
‘...मौत की सीढ़ी, मौत की सीढ़ी.'
‘प्यामर से जो आबाद हुए घर...'
‘...नशे ने वे बरबाद किए घर.'
‘अग़र तरक्कीक करनी है तो...'
‘...दूर नशे से रहना होगा.'
‘जीवन में कुछ बनना है तो...'
‘...नशे को ‘टा-टा' करना होगा.'
‘फंसा नशे के चंगुल में जो...'
‘...इंसां से हैवान बना वो.'
‘गुटका, पानमसाला, बीड़ी...'
‘...मौत की सीढ़ी, मौत की सीढ़ी.'
‘नशा जहर है...'
‘...महाकहर है...'
‘मौत का खतरा...'
‘...आठ पहर है.'
नारों के बाद फिर एक भजन गाया जाता. एक घंटे में प्रभात फेरी समेट ली जाती. उसके बाद बच्चे घर जाकर नाश्तात करते, फिर पाठशाला आते. शाम का समय लोगों को घर-घर जाकर समझाने के लिए तय था. टोपीलाल उस समय भी सबसे आगे होगा. बच्चेल चार टोलियों में बंट जाते. फिर वे घर-घर जाकर लोगों को शराब और नशे की बुराइयों के बारे में समझाते. कभी बद्री काका उनके साथ होते, कभी नहीं. लेकिन पाठशाला के प्रांग़ण में बैठे-बैठे, भविष्ये की योजना बनाते हुए भी वे बच्चोंक के अभियान के बारे में तिल-तिल की खबर रखते. समस्याल देखते तो पलक-झपकते वहां पहुंच जाते.
शाम का समय. टोपीलाल अपनी टोली का नेतृत्वर कर रहा था. अपने ही टोले में जाग़रूकता अभियान चलाते हुए टोपीलाल के कदम ठिठक ग़ए. उसके साथ चल रहे बच्चेर भी एक झटके के साथ रुक ग़ए. सामने उसका अपना घर था. ईंटों को कच्चेल गारे से खड़ा करके बनाई ग़ई झोपड़ीनुमा चारदीवारी. जिसमें दो चारपाई लायक जग़ह थी. छत का काम प्लाकस्टिचक की पन्नीड और तिरपाल से काम चलाया ग़या था. दरवाजा इतना छोटा था कि टोपीलाल जैसे बच्चोंट को भी ग़र्दन झुकाकर प्रवेश करना पड़ता था. दूसरों के लिए एक-एक ईंट करीने से सजाने वाले वे बेमिसाल कारीग़र-मजदूर अपना ठिकाने बनाते समय पूरी तरह लापरवाह हो जाते थे. यही उनके जीवन की विडंबना थी.
घर में से मां और बापू की आवाजें आ रही थीं. भीतर घुसते हुए टोपीलाल झिझक रहा था. पता नहीं मां और बापू से वे सब बातें कह पाएगा या नहीं, जो उसने दूसरे घरों में कही थीं.
‘तुम्हाारे घर में तो कोई नशा करता नहीं, फिर यहां समय खर्च करने की क्यां जरूरत है. आगे चलो टोपी.' साथ चल रहे एक बच्चेक ने कहा. टोपीलाल को एकाएक कोई जवाब न सूझा. लेकिन अग़ले ही पल वह दृढ़ निश्चपय के साथ भीतर घुसता चला ग़या. मां उस समय खाना बनाने की तैयारी कर रही थी.
‘इतनी जल्दीे आ ग़ए बेटा...लग़ता है आज के लिए कोई कार्यक्रम नहीं था?' बेटे को सामने देख टोपीलाल की मां की आंखों में चमक आ ग़ई. पिछले कई दिनों से वह बस्तीा में टोपीलाल के कारनामों के बारे में सुनती आ रही थी. हर खबर उसको सुख पहुंचाती. हर बार उसका सीना ग़र्व से फूल जाता था.
‘हम अपने काम के सिलसिले में ही यहां आए हैं!'
‘कैसा काम? अरे, तू तो अपने दोस्तोंन को भी साथ लाया है. अच्छा बैठ, मैं तुम सबके लिए कुछ खाने का प्रबंध करती हूं.'
‘रहने दो मां, हम आपको नशे की बुराइयों के बारे में बताने आए हैं.' टोपीलाल ने मां और बापू की ओर देखते हुए कहा.
‘तू जानता है कि तेरे बापू पान को भी हाथ नहीं लगाते, फिर यहां आने की क्याा जरूरत थी. समय ही तो बेकार हुआ.' टोपीलाल की मां के स्व र में विस्मनय था. बापू चुप, ग़र्दन झुकाए मन ही मन मुस्क रा रहे थे.
‘हमनेे हर घर में जाने का प्रण किया है मां.' टोपीलाल ने विनम्रतापूर्वक कहा.
‘सो तो ठीक है, लेकिन जिस घर के बारे में तुम्हेंम अच्छीच तरह मालूम कि वहां के लोग़ शराब या नशे की दूसरी चीजों के करीब तक नहीं जाते, उस घर में जाना तो अपना समय बरबाद करना ही हुआ.'
‘फिर तो हर दरवाजे से हमें यही सुनने को मिलेगा कि इस घर में कोई नशा नहीं करता. यहां समय बरबाद करने से अच्छाा है आगे बढ़ जाइए. औरतें भले ही हमें भीतर बुलाना चाहें, पर चलेगी उनके मर्दों की ही. नशाखोर मर्द घर की औरतों को हमें बाहर ही बाहर विदा करने के लिए आसानी से तैयार कर लेंगे. नतीजा यह होगा कि हम उन घरों में जा ही नहीं पाएंगे, जहां हमारा जाना जरूरी है. हमारे जाने से जो असर लोगों के दिलोदिमाग़ पर पड़ना चाहिए, उससे वे आसानी से बच जाएंगे.' टोपीलाल के तर्क ने उसकी मां को भी निरुत्तर कर दिया. कुछ देर बाद वह बोली-
‘कहता तो तू एकदम सही है बेटा...इतनी बड़ी-बड़ी बातें क्या तेरेे गुरुजी तुझे सिखाते हैं?'
‘उनका काम तो हमें जिम्मे दारी सौंपना है, स्थियति के अनुकूल बात कैसे करनी है, यह हमें खुद ही तय करना पड़ता है.' टोपीलाल ने कहा. उसके पिता जो अभी तक उसपर टकटकी लगाए थे, उसकी की मां की ओर मुड़कर बोले-
‘तेरा बेटा है, बातों में तो इसे कोई हरा ही नहीं सकता.'
‘माफ करना, हमें अभी और भी कई घरों में जाना है.' टोपीलाल को तेजी से भाग़ते हुए समय का बोध था. इसके बाद वह उन्हें नशे की बुराइयों के बारे में समझाने लगा. काम पूरा होने पर अपने साथियों के साथ वह भी बाहर निकल आया. पीछे से टोपीलाल के कान में बापू की आवाज पड़ी. वे कह रहे थे-
‘मुझे अपने बेटे पर ग़र्व है.'
‘और मुझे उसके पिता पर.' टोपीलाल के कान में मां का स्वडर पड़ा. उसने सिर को झटका दिया और अपने अभियान पर आगे बढ़ ग़या.
योग्यन संतान को सर्वत्र सराहना मिलती है.
बचपन को सही दिशा दो. सफलता उसकी मुट्‌ठी में होगी.
टोपीलाल और उसकी टोलियों ने शहर में वह कर दिखाया जो बड़े-बड़े उपदेशों, भारी-भरकम सरकारी प्रयासों द्वारा संभव ही नहीं था. सप्ताेहांत में बालसभा के लिए बच्चोंप ने इतनी मार्मिक चिटि्‌ठयां लिखीं कि बद्री काका दंग़ रह ग़ए. करीब तीस बच्चोंि में से ग्यांरह ने पत्र लिखे. कुछ ने छोटे तो कई ने लंबे-लंबे. पत्रों में उन्हों ने अपने माता-पिता, चाचा, ताऊ, मामा और दूसरे रिश्ते दारों को, जिनके बारे में उन्हेंे मालूम था कि उन्हेंह नशे की लत है, संबोधित किया था.
छह-सात पत्र तो इतने मार्मिक थे कि खुद को माया-मोह से परे मानने वाले बद्री काका भी अपने आंसू न रोक सके. उन पत्रों को उन्होंिने बार-बार पढ़ा. कुछ को कक्षा में भी पढ़वाया ग़या. कुछ अति मार्मिक पत्रों को पूरी कक्षा के सामने पढ़वाने का साहस बद्री काका भी न कर सके.
पत्र मौलिक और असरकारी भाषा में लिखे ग़ए थे. वे सीधे दिल पर असर डालते थे. इस कारण बद्री काका का मन न हुआ कि उन्हेंा खुद से अलग़ करें. इसलिए उन पत्रों की छायाप्रतियां ही संबंधित व्यसक्तिायों को भेजी ग़ईं. बद्री काका को इससे भी संतोष न हुआ. वे उन पत्रों का रचनात्मसक उपयोग़ करना चाहते थे. चाहते थे कि उनका प्रभाव सर्वव्यासपी हो. वे जन-जन की आत्माा को जाग्रत करने का काम करें. वे चाहते थे शब्दच की ताकत को सृजन से जोड़ना, उसे आंदोलन का रूप देना.
कई दिनों तक बद्री काका इसपर विचार करते रहे. सोचते रहे कि कैसे उन पत्रों को अपने अभियान का हिस्साव बनाया जाए! कैसे उनका अधिकतम उपयोग़ संभव हो! कैसे उनके माध्येम से समाज में नशाबंदी के पक्ष में बहस आरंभ कराई जाए! कैसे बच्चोंम की निजी पीड़ा को सार्वजनिक पीड़ा और आक्रोश में बदला जाए! परंतु क्याय यह उचित होगा? कहीं यह नैतिकता के विरुद्ध तो नहीें? बद्री काका अजीब-सी उलझन में फंसे थे. वे एक फैसला करते, अग़ले ही पल अचानक उनकी राय बदल जाती.
कई दिनों तक उनके मन में संघर्ष चलता रहा. मन कभी इधर जाता, कभी उधर. काफी सोच-विचार के पश्चाफत उन्होंोने चुने हुए पत्रों को स्थातनीय समाचारपत्र में प्रकाशित कराने का निश्च य किया. इस निर्णय के साथ ही उनकी आंखों में चमक आ ग़ई. अंततः बच्चों एवं उनके अभिभावकों का नाम-पता छिपाकर उन पत्रों की छायाप्रतियां, शहर के एक प्रतिष्ठि्त दैनिक को सौंपी दी ग़ईर्ं.
सबसे पहले सदानंद का ही पत्र छपा. समाचारपत्र में हालांकि उसकी पहचान को सुरक्षित रखा ग़या था. लेकिन बद्री काका समेत उनके प्रत्ये क विद्यार्थी और उसके माता-पिता को मालूम था कि वह सदानंद का ही पत्र है. अपने पिता को संबोधित करते
हुए उसने लिखा था-
नमस्तेन बापू!
मैं जानता हूं कि आप मुझे बेहद प्या र करते हैं. उस क्षण भी अवश्य ही करते होंगे, जब आपने पहली बार शराब को हाथ लगाया था. पर यह शायद मेरा दुर्भाग्यह ही था. क्योंाकि ठीक उस समय जब आप शराब का पहला घूंंट भरने जा रहे थे, आपको मेरा जरा भी ध्याुन नहीं रहा. मुझे पूरा विश्वा‍स है कि उस समय अग़र मेरा चेहरा आपके ध्याहन में रहा होता, तो आप शराब के गिलास को जमीन पर पटककर वापस चले आते. फिर कभी शराबखाने का मुंह न देखते.
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

Jemsbond
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:10

बापू मैं भी आपको बहुत चाहता हूं. पर उससे शायद कम जितना कि आप मुझे चाहते हैं. आप पिता हैं, जब मैं आपका किसी भी क्षेत्र में मुकाबला नहीं कर सकता तो प्यारर करने में भी यह कैसे संभव है! इसलिए इसमें आपका तनिक भी दोष नहीं, सारा दोष मेरा ही है कि मैं अपने भीतर वह काबलियत नहीं जगा सका, जिससे कि आपको ठीक उस समय याद आ सकूं, जबकि आपको मेरी जरूरत है. मुझे क्षमा करें पिता. मैं स्वेयं को आपका नाकाबिल पुत्र ही सिद्ध कर सका.
बापू शराब की लत के पीछे आप शायद भूल चुके हैं कि आप कितने बड़े राजमिस्त्री हैं. मैंने शहर की वे इमारतें देखी हैं, जिन्हेंी आपने अपनी हुनरमंद उंग़लियों से तराशा है.मैंने उन बेमिसाल कंगूरों को भी देखा है, जो आपकी कला के स्पकर्श से सिर उठाए खड़े हैं. ऊंची-ऊची इमारतों के बीच जिनकी धाक है. लोग़ जिनकी खूबसूरती को देखकर दंग़ रह जाते हैं.
मैं शहर में बहुत अधिक तो नहीं जा पाता. मग़र जब कभी उन इमारतों के करीब से गुजरता हूं तो मेरा सीना ग़र्व से चौड़ा हो जाता है. उसके बाद कई दिनों तक दोस्तों के साथ मेरी बातचीत का एकमात्र विषय आपकी बेहतरीन कारीग़री की मिसाल वे आलीशान इमारतें ही होती हैं. मैं बच्चाक हूं, इसलिए आपकी कारीग़री को उन शब्दोंन में तो व्य क्तव नहीं कर पाता, जिसमें उसे होना चाहिए. पर अपने टूटे-फूटे शब्दों में किए ग़ए बयान से ही मुझे जो ग़र्वानुभूति होती है, उसको मैं शब्दों में प्रस्तुित कर पाने में असमर्थ हूं. बस समझिए कि वे मेरे जीवन के सर्वाधिक पवित्र एवं आनंददायक क्षण होते हैं.
बापू अपने इस पत्र में मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि आपकी बनाई जिन इमारतों के जिक्र से मेरा सीना ग़र्व से चौड़ा हो जाता है, वे आपने उन दिनों बनाई थीं, जब आप शराब और नशे की दूसरी चीजों को हाथ तक नहीं लगाते थे. शराब ने आपसे आपकी बेमिसाल कारीग़री को छीना है, मुझसे मेरे पिता को. यहां मैं मां का जिक्र जानबूझकर नहीं कर रहा हूं. क्योंिकि आपने जिस दिन से खुद को शराब के हवाले किया है, वह बेचारी तो अपनी सुध-बुध ही खो बैठी है. यह भी ध्यासन नहीं रख पाती कि इसमें क्याव अच्छा है और क्याअ बुरा. लग़ता ही नहीं कि वह इंसान भी है. बेजान मशीन की तरह काम में जुटी रहती है. उसके जीवन की सारी उमंगे, सारा उत्साअह और उम्मीसदें गायब हा
चुकी हैं.
इस सबके पीछे मेरा ही दोष है. मैंने अपने पिता को खुद से छिन जाने दिया. मैं अपनी मां का ख्याल नहीं रख पाया. अपनी उसी भूल का दंड मैं भुग़त रहा हूं, आप भी और मां भी. मैं आप दोनों का अपराधी हूं बापू. पर मैं यह समझ नहीं पा रहा कि क्याू करूं. कैसे अपने पिता को वापस लाऊं. आप तो मेरे पिता है, पालक हैं, आपने ही उंग़ली पकड़कर मुझे चलना सिखाया है. अब आप ही एक बार फिर मेरा मार्गदर्शन करें. मुझे बताएं कि मैं आपको कैसे समझाऊं? कैसे मैं मां की खुशी को वापस लौटाऊं?
बापू आप जब अपने पिता होने के धर्म को समझेंगे, तभी तो मैं एक अच्छाे बेटा बन पाऊंगा. इसलिए मेरे लिए, अपने बेटे और उसकी मां के लिए, शराब को छोड़कर वापस लौट आइए. आपकी इस लत ने अभी तक जितना नुकसान किया है, हम सब मिलकर उसकी भरपाई कर लेंगे बापू...
-आपका इकलौता और नादान बेटा
दिल की ग़हराइयों से निकली हर बात असरकारक होती है.
अखबार में छपने के साथ ही यह पत्र पूरे शहर में चर्चा का विषय बन ग़या. ग़लियों में, नुक्क ड़ पर, पान की दुकान और चाय के खोखों पर, बड़े रेस्त्रां और कॉफी हाउस में, घरों और पार्कों में, स्त्री-पुरुष, बच्चें-बूढ़े, बुद्धिजीवियों से लेकर आमआदमी तक, सदानंद के पत्र पर बहस होती रही.
बच्चोंज द्वारा चलाया जा रहा नशा-विरोधी कार्यक्रम शहर-भर में पहले ही चर्चा का विषय बना हुआ था. सदानंद का पत्र छपते ही सबका ध्या्न उसी ओर चला ग़या. बड़े-बड़े अखबारों के संवाददाता, सामाजिक कार्यकर्ता, समाजसेवी, विद्वान उस टोले की ओर आकर्षित होने लगे. इस हलचल को लंबी उड़ान देने वाला अग़ला पत्र कुक्कीव का छपा. पत्र को अपने असली नाम से छपवाने का साहस भी कुक्कील ने दिखाया था. अपने छोटे-छोटे हाथों से नन्ही‍ कुक्की बड़ी-बड़ी बातें लिखीं-
काका!
मां बताती है कि जब आप भग़वान के पास ग़ए मैं सिर्फ दो वर्ष की थी. मेरी आंखों ने आपको जरूर देखा होगा, मग़र अफसोस मेरे दिमाग़ पर आपकी जरा-सी भी तस्वीदर बाकी नहीं है. मां बताती है कि आपको नशे की लत थी. कमाई अधिक थी नहीं, पर लत तो लत ठहरी. नशे के लिए जो भी मिलता उसको खा लेते. चरस, भांग़, धतूरा, अफीम कुछ भी. शराब मिलती तो वह भी ग़ट्‌ट से ग़ले के नीचे. नतीजा यह हुआ कि आपकी आंतें ग़ल ग़ईं. एक दिन खून की उल्टीि हुई और आप मां को अकेला छोड़कर चले ग़ए. मेरी मां अकेली रह ग़ई. पूरी दुनिया में अकेली. सिर पर ईंट-गारा उठाने, लोगों की गालियां सुनने, ठोकरें खाने के लिए.
वैसे मां बताती है कि आप बहुत संकोची थे. इतने संकोची की मां थाली में अग़र दो रोटी रखकर भूल जाए तो आप भूखे ही उठ जाएं. मां से, अपनी पत्नीं से तीसरी रोटी तक न मांगे. आपकी मेहनत के भी कई किस्सेक मैंने मां के मुंह से सुने हैं. वह चाहती थी कि मेरा एक भाई भी हो, जो बड़ा होकर काम में आपका हाथ बंटा सके. जब उसने आपके सामने अपनी इच्छाि प्रकट की तो आप मुस्क रा दिए. उसके बाद याद है आपने क्याक कहा था? मां बताती है कि आपने उस समय कहा था-‘अपनी कुमुदिनी तो है?'
‘वह तो बेटी ठहरी. एक न एक दिन ससुराल चली जाएगी. हमें बुढ़ापे का सहारा भी तो चाहिए.'
‘बुढ़ापे के सहारे के लिए तुम्हेंन बेटा ही क्योंए चाहिए?'
‘सभी चाहते हैं.'
‘बेटा होगा तो तुम उसका ब्यामह भी करोगी? बहू भी आएगी, क्योंह?'
‘हां बेटा होगा तो ब्या ह भी करना ही होगा. ब्याएह होगा तो बहू आएगी ही.'
‘और बेटा अग़र बहू को लेकर अलग़ हो ग़या तो?' आपने कहा था. मां निरुत्तर. तब आपने मां को समझाते हुए कहा था, ‘बेटी को कम मत समझ, यह पढ़-लिख ग़ई तो दो परिवार संवारेगी. दुनिया में कितने आए, कितने ग़ए. यहां कौन अमर हुआ जो बेटे के बहाने तू अमर होना चाहती है.'
‘तुम बेटी के नाम के साथ अमर होने की कामना रखते हो तो मैं बेटे के साथ क्यों़ न रखूं?' तब आपने कहा था-
‘मैं तो बस बेटी के साथ जीना चाहता हूं. फिर चाहे जितनी भी सांसें मिलें.' और भग़वान ने आपको सिर्फ इतनी सांसें दीं कि मुझे बड़ा हुए दो वर्ष की बच्ची के रूप में देख सकें.
इस किस्सें को मेरी मां कितनी ही बार सुना चुकी है. कितने पिता हैं जो अपनी बेटियों को इतना मान देते हैं. मां चाहती थी कि मैं आपको पिता कहा करूं. वह मुझे वही सिखाना चाहती थी. तब आपने कहा था, ‘नहीं पिता नहीं?'
‘क्यों', क्याक आप इसके पिता नहीं हैं?' मां ने हैरान होकर पूछा था.
‘मुझे शर्म आती है?'
‘इसमें कैसी शर्म?'
‘काका ही ठीक रहेगा.'
‘काका ही क्योंह?'
‘इस संबोधन में दोस्ताकने की गुंजाइश ज्या दा है.' मां बेचारी मान ग़ई. वह कहती है कि आप मुझे बहुत प्यातर करते थे. अपने साथ थाली में बैठाकर खिलाते थे. मुझे जरा-सा भी कष्टो हो तो विचलित हो जाते. पर काका, आज आपको खोकर मुझे लग़ता है कि आपका प्यांर नकली था. अग़र आप मुझे सच्चील-मुच्चीा प्याकर करते तो नशे के चंगुल में हरगिज न फंसते. एक पिता के लिए अपनी संतान के प्याथर से बड़ा नशा और क्याच हा
सकता है.
काका आप हमेशा मां को धोखा देते रहे. पर मैं आपके झांसे में आने वाली नहीं हूं. मैं आपकी असलियत को जानती हूं. आपकी चालाकी से परिचित हूं. इसलिए आपको भुलाना चाहती हूं. नहीं चाहती कि आपकी यादें मेरी रातों की नींद हराम करें. पर क्याू करूं! भुला नहीं पाती. बच्चीच हूं ना. उतनी समर्थ नहीं हुई हूं कि सारा काम अकेली ही कर सकूं.
भूल भी जाऊं तो मां नहीं भूलने देती. रोज रात को चारपाई में मुंह धंसाए मां को सिसकते हुए देखती हूं तो आपकी याद आ ही जाती है. मां की आदत से तंग़ आकर कभी-कभी मैं कह देती हूं-
‘अब किसके लिए रोती है. बूढ़ी होने को है. बस कुछ साल और इंतजार कर...उसके बाद ऊपर जाकर उनसे जी-भर कर मिलना. मां पलटकर मुझे अपनी बांहों में भर लेती है-
‘मुझे अपनी नहीं तेरी चिंता है बेटी.' और मां जब यह कहती है तो मैं घबरा जाती हूं. अंधेरा मन को डराने लग़ता है. वह हालांकि छिप-छिपकर रोती है. नहीं चाहती कि उसके दुःख की छाया भी मुझपर पड़े. पर मैं तो उसका दुःख-दर्द उसकी धड़कनों से जान जाती हूं. हवा की उस नमी को महसूस कर सकती हूं मां की देह को छूने के बाद उसमें उतर आती है. यह भी जानती हूं कि मां के आंसू ही आपकी यादों को जिलाए रहते हैं. पर मैं आपसे नाराज हूं. सचमुच नाराज हूं.
अपने पत्र के माध्याम से मैं दुनिया के सभी पिताओं से कहना चाहती हूं कि यदि आप अपनी बेटियों को खुश देखना चाहते हैं, यदि आप उनको नाराज नहीं करना चाहते, यदि आपको मेरे आंसू असली लग़ते हैं. यदि आपको मेरी मां बदहाली, उसके चेहरे पर पड़ी झुर्रियों, हथेलियों में पड़ी मोटी-मोटी गांठों, कम उम्र में ही सफेद पड़ चुके बालों पर जरा-भी तरस आता है, तो कृपया खुद को नशे से दूर रखिए. तभी आप सच्चेख और अच्छे माता-पिता बन सकते हैं.
सिर्फ अपनी मां की
कुक्कीअ
एक बच्चे‍ के माता-पिता तो नशे से दूर थे. लेकिन उसके मामा को शराब की लत थी. उस बच्चे‍ का लिखा पत्र तीसरे दिन अखबार की सुर्खी बना-
प्याेरे मामा जी!
सादर प्रणाम,
अग़र आप मुझे अपना सबसे प्याशरा भांजा मानते हैं तो आज से ही शराब पीना छोड़ दीजिए. आप नहीं जानते कि आपके कारण मां कितनी परेशान रहती है. मामी को कितना कष्टो उठाना पड़ता है. मां बता रही थी कि आपकी शराब की गंदी लत से परेशान
होकर मामी तो आत्मेहत्याे ही करना चाहती थी. यह तो अच्छान हुआ कि मां की नजर उन गोलियों पर पड़ ग़ई, जिन्हेंम खाकर उन्हों्ने आपसे छुटकारा पाने की ठान ली थीं. बड़ी मुश्किहल से मां ने मामी को समझाया, जान देने से रोका. पर मां कहती है कि आप यदि नहीं सुधरे तो मामी कभी भी...
मां बताती है कि नाना जी जब मरे तब आपके पास सौ बीघा से भी अधिक जमीन थी. बाग़ था, जिसमें हर साल खूब फल आते थे. नाना जी उन्हें टोकरियों में भरकर अपने सभी रिश्ते़दारों के घर पहुंचा देते. वे आपको बहुत चाहते थे. उनकी एक ही अभिलाषा थी कि आप पढ़ें. उनकी इच्छाश मानकर आप पढ़े भी. बाद में ऊंची सरकारी नौकरी पर भी पहुंचे. उस पद तक पहुंचे जहां गांव में आप से पहले कोई नहीं पहुंच पाया था. नाना जी आपपर ग़र्व करते थे. कहते थे कि उनके जैसा भाग्य वान पिता इस धरती पर दूसरा नहीं है. लेकिन अनुभवी होकर भी वे अपने भविष्ये से कितने अनजान थे.
नौकरी के दौरान ही आपको नशे की लत ने घेर लिया. दिन में भी आप शराब के नशे में रहने लगे. नतीजा आपको अपनी नौकरी से ही हाथ धोना पड़ा. यह सदमा नानाजी सह न सके. उन्हेंन मौत ने जकड़ लिया. आप गांव लौट आए. मां बताती है कि उस समय गांव में सबसे बड़ी जायदाद के मालिक आप ही थे. अग़र आप तब भी संभल जाते तो आपके परिवार की हालत आज कुछ और ही होती. लेकिन इतनी ठोकरें खाने के बाद भी आप संभले नहीं. परिणाम यह हुआ कि जमीन बिकने लगी. पहले बाग़ बिका. फिर उपजाऊ खेत. बाद में पुश्तैतनी हवेली का भी नंबर आया. उस समय अग़र मामी जी अड़ नहीं जातीं तो आज आप और मामी जी बिना छत के रह रहे होते.
खैर, आपकी बरबादी और बदहाली के किस्सेा तो अनंत हैं. मैं तो सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि यदि आपको मामी से प्या र है, यदि आपके मन में अपनी बहन यानी मेरी मां के प्रति जरा-भी सम्माकन है, यदि आप अपने बच्चोंे को हंसता-खेलता और खुशहाल देखना चाहते है, यदि आप नहीं चाहते कि अपनी मां के मरने के बाद आपके बच्चेय अनाथों की भांति दर-दर की ठोकरें खाएं, लोग़ उनको शराबी का बेटा कहकर दुत्काारें, यदि आप नहीं चाहते कि मेरे स्वंर्गीय नानाजी की आत्मा कुछ और कष्टि भोगे, तो प्लीेज नशे को ‘ना' कह दीजिए. दूर रहिए उससे. तब आपका यह भांजा आपको इसी तरह प्या र करता रहेगा, जितना कि अब तक करता आया है. नहीं तो आपसे कट्‌टी करते मुझे देर नहीं लगेगी, हां...!
थोड़े लिखे को बहुत समझना. नशा छोड़ते ही मुझे पत्र अवश्य लिखना. मैं हर रोज आपकी डाक का इंतजार करूंगा...
आपका भांजा
कखग़
दुःख भले ही किसी एक का हो, मग़र उसका कारण आमतौर पर सार्वजनिक ही
होता है.
दुःख का सार्वजनिकीकरण लोगों को करीब लाता है. उससे घिरा आदमी समाज के साथ रहना, मिल-बांटकर जीना चाहता है. सुखी आदमी खुद को बाकी दुनिया से ऊपर समझता है, आत्ममकेंद्रित होकर दूसरों से कटने की कोशिश करता है.
एक के बाद एक पत्र, प्रभात-फेरियां, पोस्ट र, संध्याह अभियान में घर-घर जाकर लोगों को नशे से दूर रहने की सलाह देना, समझाना, मनाना, उनके बीच जाग़रूकता लाने की कोशिश करना-बच्चे इन कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्साे ले रहे थे. पूरे शहर में उनकी ग़तिविधियों की ही चर्चा थी. बुद्धिजीवी उनका गुणगान करते, समाचारपत्र उनकी प्रशस्तिायों से भरे होते. अखबार के संपादक के नाम पत्रों की निरंतर बढ़ती संख्याा बता रही थी कि उनके प्रति लोग़ कितने संवेदनशील हैं. इस दौरान अखबारों की बिक्री भी बढ़ी थी. प्रसार प्रबंधक हैरान थे कि जो काम वे लाखों-करोड़ों खर्च करके नहीं कर पाए, वह बच्चोंर की चिटि्‌ठयों ने कर दिखाया. अब हर कोई उन्हें छापना चाहता था.
संपादक के नाम लिखी चिटि्‌ठयों में उन बच्चों के नाम से लिखे सैकड़ों पत्र रोज आते. कोई चाहता कि बच्चेि उसके घर आकर उसके पिता को समझाएं. कोई बहन अपने भाई की बदचलनी से परेशान थी, वह चाहती थी कि उसकी ओर से एक पत्र उसके भाई को भी लिखा जाए. कुछ पाठकों की प्रार्थना थी कि उनकी बस्ती, में भी इसी प्रकार प्रभात-फेरियां निकाली जाएं, ताकि वहां बढ़ रहा नशे का प्रचलन कम हो सके.
ऐसे ही पत्र में एक दुखियारी स्त्री ने संपादक के माध्यहम से बच्चों को लिखा-
प्याहरे बच्चोक!
उम्र में तो मैं तुम्हाोरी मां जैसी हूं. आजकल मैं भी उसी तकलीफ से गुजर रही हूं जिससे तुम्हाीरी मां या बहन गुजर चुकी हैं या गुजर रही हैं. मग़र मेेरे पास तुम्हाीरे जैसा कोई बच्चाज नहीं है. इसलिए तुम्हींक से प्रार्थना करती हूं कि एक पत्र इनके नाम भी लिखो. मैं तो समझा-समझाकर हार ग़ई. संभव है तुम्हातरे शब्दा इन्हें सही रास्तें पर ले आएं. तब शायद तुम्हाररी यह अभाग़न मां भी नर्क से बाहर आ सके. मैं जीते जी तुम्हाबरा एहसान नहीं भूल पाऊंगी. भग़वान तुम्हेंस कामयाबी दे.'
एक पत्र में तो लड़के का गुस्सार ही फूट पड़ा. अपने टूटे-फूटे शब्दों में उसने लिखा-
‘नशेड़ी को मुझसे ज्याादा कौन जान सकता है. उसके सामने कोई लाख गिड़गिड़ाए, खुशामद करे, दया की भीख मांगे, उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. मेरा पिता रोज नशे में घर आता है. पहले मां की पिटाई करता है, जो उससे चूल्हाे जलाने के लिए रुपयों की मांग़ करती है. फिर मुझे मारता है, क्योंककि मैं भूख को सह नहीं पाता. ऐसे पिता के होन
या न होने से कोई लाभ नहीं है. जिस दिन मेरा बस चला, उसी दिन मैं उसका खून कर डालूंगा...'
एक बच्चीे ने संपादक के नाम भेजी ग़ई अपनी चिट्‌ठी में अपने दुःख का बयान लिखा-
भइया!
मैं आपके गुरुजी को प्रणाम करती हूं, जो आपको इतनी अच्छी -अच्छील बातें सिखाते हैं. जिन्हों ने आपको सच कहने की हिम्म त दी है. भग़वान करे कि सच कहने का आपको वैसा कोई दंड न मिले, जैसा कि मैं नादान भोग़ती आ रही हूं. मेरे पिता शराबी हैं. रोज रात को पीकर आते हैं. मां और मेरे घर के सभी छोटे-बड़ों के साथ मारपीट करते हैं.
उन दिनों मैं आठ वर्ष की थी. नहीं जानती थी कि नशे में आदमी जानवर बन जाता है. अपना-पराया कुछ नहीं सूझता उसको. एक बार पिता जी घर आए तो उनको नशे से लड़खड़ाता देखकर मैं नादान हंसने लगी. मां पिताजी के गुस्सेो को जानती थी. वह मुझे उनसे दूर ले जाने को आगे आई. मग़र उससे पहले ही पिताजी ने गुस्सेस में कुर्सी का पिछला डंडा मेरी टांग़ में जोर से दे मारा. इतनी ताकत से कि मेरी टांग़ की हड्‌डी ही टूट ग़ई. चार वर्ष हो ग़ए. पिताजी इलाज तो क्याब कराते, दुगुना पीने लगे हैं.
आजकल बहाना है कि चार वर्ष पहले जो ग़लती की थी, उसके बोझ से उबरने के लिए पीता हूं. यह मजाक नहीं तो और क्यां है. धोखा दे रहे हैं वे खुद को, मुझको, हमारे पूरे परिवार को. चार साल से लंग़ड़ाकर चल रही हूं. तुम अग़र मेरे पिता को समझाकर सही रास्तेो पर ला सको तो इस लंग़ड़ी बहन पर बहुत उपकार होगा. नहीं तो मुझे अपना पता दो, मैं भी तुम्हाझरे अभियान में शामिल होना चाहती हूं. भरोसा रखो, बोझ नहीं बनूंगी तुमपर. जहां तक हो सकेगा मदद ही करूंगी. लंग़ड़े पर लोग़ जल्दीू तरस खाते हैं. हो सकता है मेरे बहाने ही कोई आदमी शराब और नशे से दूर चला जाए.
अग़र ऐसा हुआ तो तुम्हागरी यह लंग़ड़ी बहन जब तक जिएगी, तब तक तुम्हाोरा एहसान मानेगी. और यदि मर ग़ई तो ऊपर बैठी-बैठी तुम्हाहरी लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करेगी.
तुम्हाररी एक अभागिन बहन
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:12

पत्र घनी संवेदना के साथ लिखा ग़या था. जिसने भी पढ़ा, वही आंसुओं की बाढ़ से घिर ग़या. खुद को माया-मोह से परे मानने वाले बद्री काका भी भाव-विह्‌वल हुए बिना न रह सके. अग़ले दिन वही पत्र शहर-भर में चर्चा का विषय बना था. स्त्री-पुरुष, बच्चेए-बूढ़े सब उस लड़की के बारे में सोचकर दुःखी थे.
शब्द की ताकत से बद्री काका का बहुत पुराना परिचय था. महात्मा़ गांधी के सान्निरध्यह में रहकर वे उसे परख चुके थे. अब वर्षों बाद फिर उसी अनुभव को साकार
देख रहे थे. बच्चोंब द्वारा चलाए जा रहे अभियान की सफलता कल्पानातीत थी. बावजूद इसके उन्हेंर लग़ता था कि वे अपनी मंजिल से अब भी दूर हैं. असली परिणाम आना अभी बाकी है.
उससे अग़ले ही दिन एक पत्र ऐसा छपा, जिसकी उन्हें प्रतीक्षा थी. पत्र पढ़ते ही बद्री काका के चेहरे पर चमक आ ग़ई. देह प्रफुल्लिपत हो उठी. पत्र में किसी अधेड़ व्यतक्ति की आत्म्स्वीेकृति थी. उन्हेंस वह पत्र अपने जीवन की अमूल्यी उपलब्धिे जान पड़ा. टूटी-फूटी भाषा में लिखे ग़ए उस पत्र को संपादक ने प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया था. शीर्षक दिया था, मेरे पाप, जिसमें बिना किसी संबोधन के लिखा था-
‘सच कहूं तो अपने जीते जी किसी को ईश्वर नहीं माना. न स्व र्ग-नर्क, पाप-पुण्यर, आत्मा्-परमात्माव जैसी बातों पर ही कभी भरोसा किया. हमेशा वही किया जो मन को भाया, जैसा इस दिल को रुचा. इसके लिए न कभी माता-पिता की परवाह की, जो मेरे जन्मादाता थे. न भाई को भाई माना, जो मेरी हर अच्छीभ-बुरी जिद को पानी देता था और उसके लिए हर पल अपनी जान की बाजी लगाने को तत्पकर रहता था. न उस पत्नी की ही बात मानी, जिसके साथ अग्निह को साक्षी मानकर सप्त पदियां ली थीं; और सुख-दुःख में साथ निभाने का वचन दिया था. न कभी बच्चोंअ की ही सुनी, जिनके लालन-पालन की जिम्मेादारी मेरे ऊपर थी.
मन को अच्छाग लगा तो जुआ खेला, मन को भाया तो शराब, चरस, अफीम जैसे नशे की शरण में ग़या. मन को भाया तो दूसरों से लड़ा-झग़ड़ा, यहां तक की लोगों के साथ फिजूल मारपीट भी की. मेरी मनमानियां अनंत थीं. उन्हींो से दुःखी होकर माता-पिता चल बसे. पहली पत्नीि घर छोड़कर चली ग़ई. उस समय तक भी जिंदगी इतनी चोट खा चुकी थी कि मुझे संभल जाना चाहिए था. लेकिन मेरा अहं तो हमेशा सातवें आसमान पर रहा है. उसी के कारण मैं हमेशा अपने स्वांर्थ में डूबा रहा.
मैंने जिंदगी में सिर्फ अपना सुख चाहा, केवल अपनी सुविधाओं का ख्याल रखा. बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, शादी-विवाह हर ओर से मैं अपनी आंख मूंदे रहा. भूल ग़या कि जवान बेटी का असली घर उसकी ससुराल में होता है. भूल ग़या कि बेटों को पढ़ा-लिखाकर जिंदगी की पटरी पर लाना भी पिता का धर्म है. मेरा अहंकार और स्वा र्थ-लिप्साहएं अंतहीन थीं. बेटी से पीछा छुटाने के लिए मैंने उसे, उससे दुगुनी आयु के आदमी के साथ ब्या ह दिया. इस कदम से उसकी मां को ग़हरी चोट पहुंची और वह बीमार रहने लगी. सही देखभाल न होने के कारण लड़के आवारगी पर उतर आए. पुरखों की सारी जमीन-जायदाद शराब और जुए की भेंट चढ़ ग़ए. ग़हने-जेवर, बर्तन-भांडे कुछ भी बाकी नहीं रहा.
हालात यहां तक आ बने कि सप्ता ह में तीन दिन फाका रहने लगा. सब कुछ लुटाने, बरबाद कर देने के बाद मुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ. उस समय ग्ला निबोध में मैं घर से भाग़ जाना चाहता था. एक दिन यह ठानकर ही घर से निकला था कि अब वापस कभी नहीं आऊंगा. रास्तेे में एक दुकान पर अखबार में एक बच्चेब का पत्र पढ़ा.
फिर उस लड़की के पत्र ने तो मेरी आंखें ही खोलकर रख दीं. उसे पढ़कर तो मैं खुद को अपनी ही बेटी का हत्यामरा मानने लगा हूं.
नशाखोर आदमी कभी नहीं सोचता कि उसकी बुरी लतों के कारण उसके परिवार पर क्या बीतती है. उनके जीवन, उनके मान-सम्मािन पर कितना बुरा असर पड़ता है. उस बच्चीी ने मुझे आईना दिखाया है. मैं उसका बहुत शुक्रगुजार हूं. हालांकि मुझे अपनी ग़लती का एहसास तब हुआ, जब मेरा सबकुछ लुट-पिट चुका है. कहीं कोई उम्मीगद बाकी नहीं है. मैं उन सब बच्चों से मिलना चाहता हूं, जिन्होंुने वे पत्र लिखे हैं. उनमें से हरेक से माफी मांग़ना चाहता हूं, क्योंुकि मुझे लग़ता है कि उनकी दुर्दशा के पीछे कहीं न कहीं मेरा भी हाथ है. पर उनसे मिलने की हिम्मगत नहीं जुटा पाया हूं.
कल रात लेटे-लेटे मैंने यह फैसला किया है कि अपना बाकी जीवन में प्रायश्चिउत में ही बिताऊंगा. गांव-गांव जाऊंगा. वहां जाकर हर ग़ली-मुहल्लेि-चौपाल पर जाकर अपना किस्साे बयान करूंगा. सबके सामने अपने पापों का खुलासा करूंगा. उनसे सरेआम माफी मांगूगा. उस समय लोग़ यदि मुझे पत्थीर भी मारें तो सहूंगा. तब शायद मेरा पापबोध कुछ घटे. ऐसा हुआ तो मैं उन बच्चों से माफी मांग़ने जरूर पहुंचूंगा. संभव है उस समय तक वे बड़े हो चुके हों. उनके अपने भी बाल-बच्चें हों. तब मैं उनके बच्चोंं के आगे जाकर दंडवत करूंगा. कहूंगा कि मैं उनके पिता का बेहद एहसानमंद हूं. उन्हीं के कारण मेरे पापों पर लगाम लगी थी. मेरी पाप-कथा सुनकर अग़र उनमें से एक को भी मेरे ऊपर तरस आया तो मैं इसको अपनी उपलब्धिच मानूंगा. तब तक यह धरती, यह आसमान, इस चराचर जग़त के सभी प्राणी, चेतन-अचेतन मुझे क्षमा करें, मुझे इंसानियत की राह दिखाएं.
एक पापी

पत्रों की बाढ़ आ चुकी थी. उसी बाढ़ के बीच एक पत्र बद्री काका को भी प्राप्तम हुआ. उस समय वे कक्षा में पढ़ा रहे थे. पत्र पर भेजने वाले का नाम देखकर उन्हों ने उसको संभालकर जेब में रख लिया. पाठशाला से छुट्‌टी के बाद सावधानी से पत्र को निकाला, देखा, उल्टान-पुल्टाा और आंखों पर काला चश्माद लगाकर पढ़ने लगे. फिर उसमें डूबते चले ग़ए.
उस छोटे से पत्र का एक-एक शब्द जैसे जादुई था. मोती-माणिकों के समान अनमोल. गंगाजल-सा पवित्र. सुबह की ओस जैसा स्नि ग्धे और मनोरम. रोम-रोम को हर्षाने, तन-मन को पुलकित कर देने वाला. पत्र राष्ट्र पति भवन से भेजा ग़या था. लिखने वाले थे स्वलयं राष्ट्रापति महोदय. वह उनका निजी पत्र था. उनकी अपनी हस्तेलिपि में लिखा हुआ.
राष्ट्र पति महोदय ने लिखा था-
पूज्य् बद्रीनारायण जी!
देश के स्वानधीनता आंदोलन में आपके बहुमूल्य‍ योग़दान के बारे में पुस्तसकों में बहुत पढ़ चुका हूं. आप इस महान देश की महान विभूति हैं, इसमें मुझे पहले भी कोइ
संदेह नहीं था. लेकिन आपके जीवन की पुरानी गाथाएं, स्वा धीनता आंदोलन से जुड़ी होने के बावजूद मुझे उतनी आह्‌लादित नहीं करतीं, जितनी कि आपके वर्तमान अभियान से जुड़ी हुई खबरें कर रही हैं. महात्मा् गांधी ने जिस सामाजिक स्वितंत्रता की ओर संकेत किया था, आप अपने समाज को उसी ओर ले जा रहे हैं।
मैंने तो आपको एक जिम्मेयदारी मामूली समझकर सौंपी थी. परंतु अपनी निष्ठार एवं कर्मठता से आपने उसको एक महान कृत्यप में बदल दिया है. आपका यह प्रयास आजादी के आंदोलन में हमारे महान स्वरतंत्रता सेनानियों के योग़दान से किसी भी भांति कम नहीं है. इस बार आप व्येक्तिर के सामाजिक-मानसिक स्वितंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो उतनी ही अनिवार्य है जितनी कि राजनीति स्वआतंत्रता. अग़ली बार मिलेंगे तो दिखाऊंगा कि आपके अभियान से जुड़ी एक-एक खबर को मैंने सहेजकर रखा है. आप सचमुच बेमिसाल हैं. कामना है कि आपका मार्ग प्रशस्तस हो. आपकी सफलताएं लंबी हों.
मैं आपकी योग्यीता, कर्तव्यंपारायणता और आपके संग़ठन के हर नन्हेज सिपाही और उनकी भावनाओं को सादर नमन करता हूं...
संघीय देश का प्रथम नाग़रिक
एक-दो नहीं, दसियों बार बद्री काका ने उस पत्र को पढ़ा. हर बार उनका मन अनिवर्चनीय आनंद से भर उठता. रोम-रोम से आह्‌लाद फूटने लग़ता. लेकिन हर बार उन्हें कुछ कचोटता. लग़ता कि उनपर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है. इसी ऊहापोह के बीच उस पत्र का उत्तर देना जरूरी लग़ने लगा. लगा कि इस समय चुप्पीक साध लेना, सारा श्रेय अकेले हड़प जाना पाप, अमानत में खयानत जैसा महापाप होगा. खूब सोचने-समझने के बाद उन्हों ने पत्रोत्तर देने का निश्चाय किया-
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:13


माननीय राष्ट्र्पति महोदय जी,
सादर प्रणाम! मान्योवर, मैं देश के उन सौभाग्यबशाली लोगों में से हूं जिन्हेंो आपका स्ने ह और मार्गदर्शन सदैव प्राप्तड हुआ है. आपने मेरे इस अकिंचन प्रयास को सराहा, मेरा जीवन धन्या हो ग़या. लेकिन मुझे विश्वाीस है कि जो श्रेय आप मुझे देना चाह रहे हैं, उसका मैं अकेला अधिकारी नहीं. आपके संघर्ष-भरे जीवन से प्रेरणा लेकर ही मैं इस रास्ते् पर आया था. और यह भी आपकी ही प्रेरणा और आदेश था, जो मुझे यहां आने का अवसर मिला, जिससे मैं इन बच्चोंा से मिल सका, जो दिखने में दुनिया के सबसे साधारण बच्चोंो में से हैं. जिन्हेंस न ढंग़ की शिक्षा मिल पाई है, न संस्कािर. न इनके तन पर पूरा कपड़ा है, न पेट-भर रोटी. पर अपनी भावनाओं, अपने संकल्पआ और अपनी अद्वितीय कर्तव्यापारायणता के दम पर ये मनुष्य ता की सबसे विलक्षण पौध बनने को उत्सुटक हैं.
जब मैं यहां आ रहा था तब मन के किसी कोने में कामयाबी का श्रेय लेने की लालसा जरूर थी. सोचता था कि मेरे प्रयासों के फलस्व रूप मजदूर बच्चों के जीवन म
यदि कुछ बदलाव आया तो उसका श्रेय मुझे ही मिलेगा. सच कहूं तो मैं यहां रेल का इंजन बनने का सपना लेकर पहुंचा था, जिसको छोटे-छोटे डिब्बेेनुमा बच्चोंच को उनकी मंजिल का रास्ताे दिखाने की जिम्मेीदारी सौंपी ग़ई थी. किंतु चमत्का,र देखिए, यहां रहने के मात्र कुछ महीने पश्चाउत स्थि ति एकदम उलट ग़ई है.
सच यह है कि अपने सत्तर वर्ष के जीवन में मैं कभी भी इतना अभिभूत नहीं हुआ, जितना कि इन दिनों इन बच्चों के कारनामों को देखकर हूं. सब मानते हैं कि इन्हेंी मैंने सिखाया है. लेकिन जिस अनुशासन, कर्तव्यानिष्ठाे, समर्पण एवं सद्‌व्यरवहार की सीख ये मुझे दे रहे हैं, उसके बारे मेरे और ई-वर के सिवाय और कोई नहीं जानता. इनका संकल्प् और उत्साूह दोनों ही वंदनीय हैं. भग़वान इन्हेंा बुरी नजर से बचाए.
यदि मैं खुद को आज भी रेल का इंजन माने रहूं तो ये बच्चेर अपनी आंतरिक ऊर्जा से भरपूर छोटे-छोटे डिब्बेन हैं, जो रेल के इंजन को उसकी मंजिल की ओर धकियाए जा रहे हैं. काश! आप यहां आकर इनकी ऊर्जा, इनके कारनामों को अपनी आंखों से देख सकें. तब आप जानेंगे कि दुनिया में आंखों देखे चमत्का र का होना असंभव नहीं है. और यहां जो हो रहा है वह ऐसी हकीकत है, जो किसी भी चमत्काेर से बढ़कर है.
पत्र लिखने के बाद बद्री काका ने उसको दो बार पढ़ा और फिर सिरहाने रख लिया.
मन में अच्छेे विचार हों तो नींद भी खिल उठती है.
जिज्ञासा से अच्छा कोई मार्गदर्शक नहीं है.
जिन दिनों अक्षर ज्ञान से वंचित था, उन दिनों भी टोपीलाल के मन में अखबार के प्रति अजीब-सा आकर्षण था. चाय की दुकान, ढाबों, बाजार, स्टेउशन यानी जहां भी वह अखबार देखता, ठिठक जाता. बड़ी ललक के साथ अखबार और उसे पढ़ने वालों को देखता. खुद को उस स्थिोति में रखकर कल्पअनाएं करता. सपने सजाता. सपनों में नए-नए रंग़ भरता. अनचीन्हेक शब्दोंि को मनमाने अर्थ देकर मन ही मन खुश होता.
जिस पाठशाला में वह कुछ महीने पढ़ा था, वहां छोटा-सा पुस्तोकालय था. कई समाचारपत्र नियमित आते. टोपीलाल की मजबूरी थी कि उन दिनों वह अक्षर पहचानना और उनको जोड़ना सीख ही रहा था. अखबार पढ़ ही नहीं पाता था. मग़र जब भी अवसर मिलता, वह वहां जाकर घंटों अखबारों और पुस्तीकों को देखता रहता. राह चलते यदि कोई पुराना अखबार या उसकी कतरन भी दिख जाए तो उसे फौरन सहेज लेता. घर आकर एकांत में उसे देखता. अक्षर जोड़ने का प्रयास करता. न जोड़ पाए तो उसके चित्रों से ही अपनी जिज्ञासा को बहलाने का प्रयास करता था.
पाठशाला में अखबार आना चाहिए, यह मांग़ करने वाला टोपीलाल ही था. उसकी मांग़ मान ली ग़ई. पाठशाला में नियमित रूप से दो समाचारपत्र आने लगे. समय मिलते
ही टोपीलाल उन समाचारपत्रों को चाट जाता. उसके अलावा एक-दो बच्चेा ही ऐसे थे, जो अखबार पढ़ने में रुचि दिखाते. प्रकाशित खबरों पर बातचीत करते. उन्हेंए बहस का मुद्‌दा बनाते थे.
जैसे ही बच्चोंर के पत्रों का छपना आरंभ हुआ, टोले में समाचारपत्रों की पाठक-संख्याञ अनायास बढ़ने लगी. अखबार आते ही बच्चे् उनपर टूट पड़ते. कभी-कभी हल्काा-फुल्कात झग़ड़ा भी हो जाता. उस स्थि ति से निपटने के लिए एक व्यचवस्था की ग़ई. प्रतिदिन एक विद्यार्थी खड़ा होकर प्रमुख समाचारों का वाचन करता. पाठशाला से संबंधित समाचारों पर खास ध्यायन दिया जाता. बाद में उनपर हल्कीद-फुल्कीख चर्चा होती. बच्चेा खुलकर हिस्साि लेते.
अखबार में संपादक ने नाम छपे पत्रों ने बच्चोंआ का उत्साउहवर्धन किया था. उन्हेंख शब्दों की ताकत से परचाया था. बच्चेि अखबार को बड़े प्या र से देखते. उसमें प्रकाशित शब्दोंी को सहलाते. मन ही मन उनसे संवाद करते. बाद में संपादक के नाम लिखी चिटि्‌ठयों को काट, सहेजकर रख लेते. कटिंग़ न मिलने पर उनकी नकल तैयार करते. अकेले में, दोस्तोंे के बीच उसको बार-बार पढ़ते, सराहते, बहस का मुद्‌दा बनाते.
पत्र-लेखकों में से अधिकांश अपने किसी परिजन की नशे की आदत के कारण परेशान होते. उसमें दर्ज ब्यौ रे से बच्चे उसके लेखक के बारे में अक्सचर अनुमान लगा लेते. कई बार इसी को लेकर बहस छिड़ जाती. व्य क्तिच को लेकर मतांतर होते रहते, लेकिन वह अपने ही टोले का है, ग़रीब और जरूरतमंद है, इस बात पर न तो कोई बहस होती, न संदेह ही व्यहक्ते किया जाता था.
कुछ पत्र ऐसे भी होते जिन्हेंक सुनकर पूरी कक्षा में सन्नाणटा व्याूप जाता. यहां तक कि बद्री काका भी बच्चोंय को कुछ देर के लिए कक्षा में अकेला छोड़ बाहर चले जाते. वहां अपनी नम आंखों को पोंछते. मन को समझाते. तसल्लीर देते. तब जाकर कक्षा में लौटने का साहस बटोर पाते थे.
बच्चों ही नहीं, बड़ों में भी अखबार के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा था. शाम होते ही दिन-भर की खबरों को जानने के लिए लोग़ खिंचे चले आते. दोपहर को भोजन के लिए जैसे ही बैठते, पिछले दिन छपे समाचार पर बहस आरंभ हो जाती. जिसको संबोधित कर वह पत्र लिखा ग़या होता, उसके बारे में कयास लगाए जाते. बातचीत होती. लोग़ उसके सुख-दुःख में अपनापा जताते. उस समय यदि कोई उसी दिन छपे समाचार के बारे में बताकर सभी को चौंकाता तो सब उसकी बुद्धि की दाद देने लग़ते.
कुछ दिनों तक ऐसे पत्रों के आने का क्रम बना रहा. परंतु अचानक पत्रों की भाषा एवं उनका स्वउर बदल ग़या. संपादक के नाम लिखे ग़ए ऐसे पत्र भारी तादाद में छपने लगे, जिनमें बद्री काका की आलोचना होती. उनपर बच्चों को बिगाड़ने का आरोप लगाया जाता. उन्हें देशद्रोही, विदेश का जासूस आदि न जाने क्या -क्याक लिखा जाता.
पत्रों के बदले हुए स्वार ने बच्चों को पहले तो हैरानी में डाला. जब ऐसे पत्रों की
संख्या बढ़ी तो बात चिंता में बदलने लगी. अपने अनुभव और वुद्धि के आधार पर वे ऐसे पत्रों के पीछे निहित सत्यय का अनुमान लगाने का प्रयास करते. लेकिन नाकाम रहते. असफलता उनकी चिंता को और भी घना कर देती.
एक पाठक ने संपादक को संबोधित पत्र में तो हद ही कर दी-
‘जिस बद्री काका नाम के महानुभाव की प्रशंसा करते हुए हमारे समाचारपत्र और समाजसेवी रात-दिन नहीं अघाते, उनका अपना अतीत ही संदिग्धव है. नहीं तो कोई बता पाएगा कि ये सज्जचन अचानक कहां से प्रकट हुए हैं. पाठशाला आरंभ करने से पहले ये क्याध करते थे? रोज-रोज बद्री काका की शान में कसीदे पढ़ने वाले समाचारपत्र उनके अतीत में झांकने का प्रयास क्यों नहीं करते. यदि खोजबीन की जाए तो मुझे उम्मीकद है कि वहां जरूर कुछ कालापन नजर आएगा. वरना कोई आदमी इस तरह की गुमनाम जिंदगी क्योंर जिएगा.
दरअसल इन महाशय का उद्‌देश्यो नशा-विरोध और शिक्षा के प्रचार-प्रसार की आड़ में बच्चों और उनके अभिभावकों को धर्म-परिवर्तन के लिए राजी करना है. इस बात की भी संभावना है कि ये सज्ज न किसी विदेशी संस्थाक के दान के बूते धर्म-परिवर्तन जैसा निकृष्टी कार्य करने में जुटे हों. वरना शहर में दर्जनों सरकारी पाठशालाएं हैं, जो खाली पड़ी रहती हैं. उनके लिए विद्यार्थी ही उपलब्ध् नहीं हैं. अग़र इन महाशय का उद्‌देश्यल सिर्फ मजदूरों के बच्चोंे को शिक्षित करना है, जो कि सचमुच एक पवित्र कार्य है, तो उन्हें़ सरकारी पाठशालाओं में भर्ती करना चाहिए. छोटे बच्चोंन को भूखे-प्यामसे, सुबह-शाम नारेबाजी में उलझाए रखकर ये उनका कितना भला कर रहें, उसे या तो ये स्वछयं जान सकते हैं या फिर उनका पैगंबर!'
पत्र लेखक ने अपना असली पता नहीं लिखा था. बद्री काका ने पूरा पत्र पढ़ा. फिर मुस्क रा दिए. इस पत्र के प्रकाशित होने के बाद संपादक के नाम आने वाले पत्रों का रूप ही बदल ग़या. अधिकांश पत्र गाली-ग़लौंच वाली भाषा में आने लगे. कुछ में उन्हेंआ देशद्रोही लिखा होता. कुछ में विरोधी देश का चमचा, जासूस आदि. चूंकि बद्री काका के पिछले जीवन के बारे में शहर में किसी को पता नहीं था, इसलिए ऐसे लोग़ उसके बारे में मनमानी कल्प ना करते. आरोप लगाते. एक व्यनक्ति ने तो शालीनता की सीमा ही पार कर दी थी-
‘बड़ी हैरानी की बात है कि पुलिस और प्रशासन की नाक के ठीक नीचे एक व्यतक्तिश, जिसका अतीत ही संदिग्धी है, खुल्लडम-खुल्लाु सरकारी कानून की खिल्ली उड़ा रहा है. जिस उम्र में बच्चोंं को अपना अधिक से अधिक समय पढ़ने-लिखने में लगाना चाहिए, वे जुलूस और नारेबाजी में अपना जीवन बरबाद कर रहे हैं. क्षुद्र स्वाचर्थ के लिए वह मासूम बच्चोंन का भावनात्मवक शोषण कर रहा है. उनकी ग़रीबी का मजाक कर उन्हें् अपने लक्ष्यए से भटका रहा है. शिक्षा और समाजकल्यानण के नाम पर बच्चों का यह शोषण किसी को भी व्याथित कर सकता है.
यह बात भी ध्यांन में रखनी होगी कि वह पाठशाला एक निर्माणाधीन भवन में बिलकुल अवैध तरीके से चलाई जा रही है. इमारत की स्थिहति ऐसी है कि वहां कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है. पर उन महाशय को न तो बच्चों के स्वारस्य्ोग की चिंता है; और न उनके भविष्यै की. सोचने की बात है कि प्रशासन क्यों उसकी ओर से आंखें मूंदे हुए है. इसका कारण तो यही हो सकता है कि ऊपर से नीचे तक सभी बिके हुए हैं. और जो आदमी पूरे सरकारी-तंत्र को मुट्‌ठी में रख सकता है, उसकी पहुंच का अनुमान लगा पाना असंभव है. पूरा मामला किसी बड़े षड्‌यंत्र की ओर इशारा कर रहा है, जिसकी ग़हराई से जांच होनी चाहिए.
दुःख की बात यह है कि हमारे सरकारी-तंत्र को चेतने के लिए हमेशा बड़े हादसों की प्रतीक्षा रहती है. यानी जो लोग़ इस उम्मीाद में चुप्पीस साधे हुए हैं कि मामला कानून और प्रशासन का है, वही आवश्यमक कार्रवाही करेंगे, उन्हेंी किसी बड़े हादसे के लिए तैयार रहना चाहिए. जो हमारे आसपास कभी भी हो सकता है. सरकार को अवैध पाठशाला पर तत्काकल रोक लगाकर बद्री काका नाम के शख्स को गिरफ्ताार करके उसके अतीत के बारे में जानकारी जमा करनी चाहिए.'
विरोध में लिखे ग़ए पत्रों पर भी बच्चोंह की नजर जाती. पढ़कर उनका आक्रोश फूट पड़ता-‘हमें संपादक को लिखना चाहिए कि वह ऐसे पत्रों को अखबार में प्रकाशित न करे?'
‘समझ में नहीं आता कि गुरुजी इस मामले में चुप्पीर क्यों साधे हुए हैं. वे चाहें तो उनसे अकेले ही निपट सकते हैं.' अर्जुन बोला.
‘गुरुजी जो भी करेंगे, सोच-समझकर ही करेंगे.' टोपीलाल ने उनकी बात काटी.
‘इन हालात में बिल्डिं ग़ का मालिक पाठशाला बंद करने को कह सकता है. तब हम कहां जाएंगे. अब तो आसपास का मैदान भी खाली नहीं है.'
‘मालिक तो कह ही रहा था कि इस भवन मेें पाठशाला रोक देनी चाहिए. लेकिन बद्री काका तक बात पहुंचने से पहले ही मामला शांत पड़ ग़या.' टोपीलाल ने रहस्य उजाग़र किया.
‘कैसे?' बच्चोंह का कौतूहल जागा.
‘मां बता रही थी. कल मालिक की ओर से संदेश आया था कि मजदूर उस पाठशाला को बंद करें या हटाकर कहीं और ले जाएं. इसपर मजदूरों ने भी संग़ठित होकर धमकी दे दी. कहा कि वहां उनके बच्चे पढ़ते हैं. उनके भविष्यत के लिए वे उसको बंद हरगिज न होने देंगे. पाठशाला कहीं और ग़ई तो वे सब भी साथ-साथ जाएंगे. आजकल शहर में मिस्त्री और मजदूर आसानी से मिलते नहीं. मालिक भी बीच में व्यईवधान नहीं चाहता. इसलिए फिलहाल तो वह शांत है.'
‘क्यां यह बात बद्री काका को मालूम है?'
‘हां, उन्होंबने कहा कि यह तो होना ही था. यह भी बताया कि जो हमने सोचा था, वही हो रहा है. वे लोग़ खुद डर रहे हैं और हमें डराना चाहते हैं. यह समय धैर्य से उनकी बातों को सुनने, अपने मकसद पर दृढ़ बने रहने का है.'
‘वे किन लोगों की बात कर रहे थे?' कुक्की ने जानना चाहा. इसका टोपीलाल के पास कोई उत्तर न था-
‘यह तो उन्हों ने नहीं बताया था.'
‘हमें क्याह करना चाहिए?' अर्जुन ने कहा. जवाब टोपीलाल के बजाय सदानंद ने दिया, ‘गुरुजी ने कहा है कि अभियान रुकने वाला नहीं है. हमारे लिए तो साफ निर्देश है. हम उन्हींक का आदेश मानेंगे.'
उसी दोपहर बद्री काका पढ़ा रहे थे. तभी पुलिस के दो सिपाही वहां पहुंचे. वे पुलिस अधीक्षक की ओर से आए थे. उन्हेंप देखते ही बद्री काका कक्षा को छोड़कर आगे बढ़ ग़ए. वे कुछ पूछें, उससे पहले ही दोनोें सिपाहियों ने उन्हें अभिवादन करते हुए कहा-‘एसपी साहब ने बुलाया है. आज शाम को ठीक आठ बजे आप थाने पहुंच जाना. कहें तो जीप भिजवा दें.'
‘जीप की आवश्यभकता नहीं है...मैं पैदल ही आ जाऊंगा.' बद्री काका ने कहा और वापस जाकर पढ़ाने लगे. इस घटना के बाद बच्चोंज का मन पढ़ाई में न लगा. उनकी निगाह में वे दोनों सिपाही और पुलिस सुपरिंटेंडेंट का चेहरा घूमता रहा-
‘पुलिस आपको क्यों बुलाने आई थी?' जैसे ही पढ़ाई का काम पूरा हुआ, निराली ने बद्री काका से पूछा.
‘यह तो शाम ही को पता लगेगा. फिक्र मत करो, सब ठीक हो जाएगा.' बद्री काका ने समझाने का प्रयास किया.
‘हम भी आपके साथ जाएंगे?' टोपीलाल ने आग्रहपूर्वक कहा.
‘उन्होंआने तो केवल मुझे बुलवाया है?'
‘इस काम में हम सब साथ-साथ हैं.' बद्री काका बच्चों की ओर देखते रहे. पल-भर को वे निरुत्तर हो ग़ए. मुंह खोला तो प्या र से ग़ला भर्राने लगा.
‘ठीक है, शाम को देखा जाएगा.' उन्हेंक लग़ रहा कि आने वाले दिन उग्र घटनाक्रम से भरे हो सकते हैं. परंतु बिना संघर्ष के परिवर्तन के वांछित लक्ष्य तक पहुंच पाना असंभव है. उसी क्षण उन्होंवने एक बड़ा निर्णय ले लिया.
नेक मकसद में दमन की संभावना भी आदमी के हौसले को जवान बना देती है. -
बद्री काका पुलिस सुपरिंटेंडेंट से मिलने पहुंचे तो उनके साथ कुक्कीा और टोपीलाल भी थे. वे केवल टोपीलाल को अपने साथ चलने ले जाने को तैयार थे. किंतु जब चलने लगे
तो कुक्कीच भी अड़ ग़ई. सुपरिटेंडेंट ने देखते ही खड़े होकर बद्री काका का सम्मावन किया. उनके साथ आए बच्चोंत को देखकर उसकी आंखों में किंचित विस्म.य उमड़ आया. टोपीलाल और कुक्कीब ने जब हाथ जोड़कर अभिवादन किया तो पुलिस अधिकारी भी प्रभावित हुए बिना न रह सका. दोनों को बैठने के लिए कुर्सियां मंग़वाई ग़ईं.
‘मेरे विद्यार्थी हैं. इनसे कुछ भी छिपा नहीं है.' बद्री काका बोले। आत्मकविश्वाथस से भरी भाषा.
‘आज तो इन बच्चों की छुट्‌टी कर देते.' पुलिस अधिकारी ने संबोधित किया.
‘ये मुझे अपनी बात आपके सामने रखने में मदद करेंगे.'
‘आप जानते ही हैं कि हमारे ऊपर कितना दबाव रहता है...!'
‘सरकार की ओर से ही...?' बद्री काका ने प्रश्न. अधूरा छोड़ दिया.
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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