प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

Jemsbond
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Re: प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

Post by Jemsbond » 28 Aug 2017 09:45



शून्य में खोया समय अचानक हमारे बीच घुस पड़ा । वनमाला की नजरें घड़ी पर पड़ गई थी । ''बस, अब आज और नहीं, परे हटो ।'' उसने मुझे झटके से अलग कर दिया । मैं तृप्त था, मैं अतृप्त था । अचानक पैदा हुई रूकावट से सारा तनाव ठंडा तो पड़ गया, लेकिन वह एक अफसोसजनक उदासी भी भर गया था ।
विदाई के शब्द थे- ''आपको मैंने बहुत तरसाया था न । औरत की मजबूरी आप नहीं समझते इसीलिए रूठ जाते थे । आप क्या समझते हैं ? मेरे अंदर भी वही चाहत, वही आग, वही प्यास, तृप्ति की वही कामना थी । आपकी तड़प मुझे भी तड़पा कर रख देती थी ।''
वनमाला की आंखों से उमड़ते आंसुओं ने उसके स्वर को अवरुद्ध कर दिया था । रुंधे गले से उसने उस बेला के अंतिम शब्द कहे- ''आज मैंने अपना सब कुछ आपको सौंप दिया है । आपको भारमुक्त करते आज मैंने भी मजबूरियों का सारा भार खत्म कर डाली है । आज हम दोनों तृप्त हुए । इस अवस्था में आकर अब तक बचती, वनमाला आपसे बंध चली है । स्त्री याद रखती है, पुरुष तृप्त होकर भूल जाता है । देखूं आप मुझे याद रखते हैं या नहीं ।''
यह कैसी मजबूरी थी कि वनमाला से मिलन की चिर-इच्छित बेला ने मिलने की प्यास बुझाकर प्यास की आग और भड़का दी थी । मैं सोच रहा था-'' क्या वनमाला के साथ मेरा मिलन यूं फिर कभी होगा ?''
दरवाजे से बाहर निकलती सड़क तक वह मुझे छोड़ने आई । श ाम का धुंधलका हो चला था । वृक्ष के नीचे अंधेरा गहराया हुआ था । मुझे बिदा करती वनमाला की चाहत से भरी आंखें मेरी आंखों में झांक रही थी । वे भर आई थीं । आंसू के दो बूंदें गालों पर ढुलक पड़ी थीं ।
मैं तृप्त था मैं अतृप्त था. मेरी आँखें उसके चहरे में डूबी मुग्ध हैं . बाहर आँगन में उसके रंग-बिरंगे फूलों की छटा के साथ उसकी वाटिका की हरीतिमा वासंती धूप-छाहीं छटा में मनमोहक लग रही है. उस तरह सलाजता में ठिठकी वनमाला में भी मुझे वही छटा नज़र आ रही है. आँखों,पलकों,भौहों,होठों, गालों,लटों,नासिका – सब पर टिकती मेरी आँखें वनमाला को लील रही हैं. मुझे याद आ रहा है – “सर्वे नवा इवाभान्ति मधुमास इव द्रुमा:”.


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कालोनी की आठवीं सड़क :
ठंड की गुनगुनी धूप का मौसम और दोपहर बाद का समय


उस दिन प्रियहरि लौट तो आया, लेकिन मन उसका वनमाला की कैद में ही रहा आया था । वह दिन-रात बेचैन रहता कि कैसे फिर वनमाला से उसका वैसा ही मिलन हो ? कैसे उससे मिलने की तरकीब वह करे ?, लेकिन सामाजिक मर्यादाएं, संकोच, उसके घर की पीड़ाएं, वनमाला के घर वाले का खयाल, उसके दूर के उस नए कालेज में जाने लौटने और मिलने का माकूल समय-ये सब के सब प्रियहरि का मन बांध देते थे । बहुत सोचकर उसने एक तरकीब निकाल ही ली । प्रियहरि को मालूम हुआ कि वनमाला की कालोनी की आठवीं सड़क में उसके एक परिचित गजानन रहते थे । उसने सोचा कि सहपरिवार गजानन के यहां जाने के बहाने वनमाला के यहां भी पहुंचा जा सकता है। इसे आप बेशर्म, दीवानगी की हद कह सकते हैं कि प्रियहरि ने वैसा किया भी। एक-सवा महीने के अंदर ही छुट्‌टी के किसी रोज अपने इरादे को पारिवारिक जामा पहनाते उसने सपत्नीक वनमाला के दरवाजे पर दस्तक दी ।
वह दिसम्बर का महीना था । ठंड की गुनगुनी धूप का मौसम और दोपहर बाद का समय । वनमाला प्रकट हुई । खोले गए किवाड़ के पल्लों पर टिकी उसकी कलाइयां और उनींदी आंखें लिए थके चेहरे की यादें प्रियहरि की आंखों में अब भी अटकी हैं । उसकी ही तरह सादगी में लापरवाही से पुराना स्लीपिंग गाउन उसके उन जिस्मों को ढके था जिनके पार झांकती प्रियहरि की पारदर्शी आंखें अपने तन को उससे चिपकाए रखना चाहती थी । उन ढलती गोलाईयों को उसने देखा जिन्हें मांज-मांज कर वह सख्ती और ताजगी से भर देना चाहता था । उसकी यही साधारणता मोहक थी। वह उस पुल का काम करती थी, जिससे दोनों के मन एक-दूसरे के साथ जुड़े थे । उस रोज घर बाधा रहित था । वनमाला और प्रियहरि की आंखें और दिल उनके बीच यादों भरे अतीत को देखते मौन संवाद कर रहे थे । लेकिन तब बीच में प्रियहरि की पत्नी थी, जिसकी मौजूदगी में व्यक्तिगत संभव नहीं था ।
कुछ ही देर में उनके बीच एक और मेहमान आ टपका था। वह उसकी पारिवारिक मित्र थी । पढ़ी-लिखी, जर्मन भाषा की अनुवादक एक ब्राम्हणी सम-वयस्का जो वनमाला के पति के बंगाली मित्र के साथ प्यार में ब्याह रचा वनमाला की मनःस्थिति लिए दिन काटती दिखाई पड़ रही थी । शादीशुदा जिंदगी की ढर्रे भरी नीरसता को उसकी बातों के अंदाज से प्रियहरि ने पढ़ लिया। नवागंतुका रमणी ने जिज्ञासा भरी दिलचस्पी से उन सब को देखा था और फिर बातों के सिलसिले चल पड़े थे । वनमाला को देखने की इच्छा उस दिन पूरी तो जरूर हुई लेकिन इस पूरी इच्छा ने दिलों की उस आस को अधूरा छोड़ दिया, उस प्यास को और अधिक बढ़ा दिया जिसकी तृप्ति के लिए प्रियहरि का मन छटपटा रहा था ।
भले ही वनमाला प्रियहरि की आंखों से ओझल हो चली थी। प्रियहरि के मन पर कब्जा उसी का रहा आया। घर-बाहर, सोते-जागते उसे वनमाला का प्यार, उसकी विवशता, उसका पशोपेश सालते रहे। हर पल बेकरारी में बीतता। कभी यह इच्छा होती कि भाग कर वह वनमाला के नए कालेज जा पहुंचे और कभी मन करता कि वनमाला के घर चला जाए। जी करता कि वनमाला से जा लिपटे और कहे कि प्रिये और परीक्षा ने लो। इस जन्म में अगर मिलना इस कदर मुश्किल है तो मेरे प्राण ले लो। तुम्हारी गोद में सर रखकर, तुम्हारे सांवले मुखड़े को निहारते लाचार उदासी में डूबी आंखों में आंखे डाले अपने प्यार में अंतिम स्वास लेना भी मेरे लिए परममुक्ति का क्षण होगा।
वे दिन ही ऐसे थे। चाहे वह बनारस विश्वविद्यालय में महीने भर रिसर्च के काम से रहा आया हो चाहे अपने संस्थान में सर खपाता बैठा होए या कहीं और व्यस्तताओं में रहा हो हर वक्त प्रियहरि को वनमाला की याद सताती रही थी। उन दिनों न जाने क्या-क्या और कितना वनमाला की स्मृतियों में उसने लिख डाला था।
साल भर बाद जब वनमाला फिर लौटकर आई तब प्रियहरि ने जुदाई के उन दिनों के एक-एक पल की गाथा उससे कह डाली थी। प्रियहरि के प्रेम में अभिभूत वनमाला ने वह सब सुना था। उसे अखबार के बहाने भेजे प्रियहरि के संदेश याद थे।
'हाय रे' की अदा में वनमाला प्रियहरि की इस दीवानगी से सराबोर कहती - ''आप भी तो बस ..........।'' बिछड़ने का दर्द और पुर्नमिलन की दीवानगी ने एक बार फिर वनमाला और प्रियहरि के ताल्लुकातों में बहार लौटा दी थी।


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औरत भला क्यों चाहेगी
कि उसका चहेता उसके किसी और रकीब के दर का ठिकाना उससे पूछे ?


वे दिन नवरात्रि और दशहरे की छुटि्‌टयों के थे । दिनचर्या से हटे इन दिनों में उस रोमांस का अभाव खटक रहा था, जो प्रियहरि को वनमाला के साहचर्य से मिलता था । वनमाला की याद बेतरह सताए जाती, लेकिन प्रियहरि पर अ-मिलन के ये पाँच-छः रोज ही भारी पड़ रहे थे । तीन-चार दिन बीतते न बीतते घर के उबाऊ अकेलेपन को भगाने प्रियहरि ने तरकीब निकाली । सामाजिक मेल-मुलाकात के बहाने अपनी बीबी को स्कूटर में बिठा वह पास ही के उस नगर को जाने वाली सड़क पर निकल गया जहां दूर-दूर बसे अंतरालों में उन ललनाओं का बसेरा था, जो उसका अतीत थीं । हालांकि सब से मिलने की आड़ में उसकी खास कसक उस वनमाला से मिलने की थी, जिसके यहां जाना संदेह को जन्म देता था । पहला डेरा सुंदरी जीनत के यहां पड़ा था, जो जहां भी होती अपनी सुंदरता और सलीके को अपनी जगह पर भी रच देती थी । उसकी सुंदर अभिरुचियों, कमनीयता और कोमलता की छाप उस घर में भी थी, जिसे विवाह के बाद उसने बसाया था। उस अंतिम छोर से लौटते एक पुराने सज्जन अधिकारी से मिलता वह विराग के यहां पहुंचा था । नीलांजना के घर का उसे ठीक-ठीक अनुमान न था । सीधी-सादी, विनयशीला नीलांजना को हालांकि प्रियहरि की बीबी ने एक-दो बार देखा था, वह उसे पसंद करती थी । जीनत और वनमाला से संबंधों और प्रियहरि के लगाव से वह परिचित थी । संबंधों के दौर में जब भी अपनी बीबी के संस्कारहीन विचित्र स्वभाव से बेरुख प्रियहरि अन्य मनस्क और उदास होता, जब भी प्रियाओं से बातचीत या लगाव के लक्षण या प्रमाण उसकी बीबी टोहती, अचानक उसमें एक गुनगुनाती गायिका प्रकट हो जाती । 'दीदी तेरा देवर दीवाना, हाय राम चिड़ियों को डाले दाना' या फिर 'भूला नहीं देना जी, भूला नहीं देना, जमाना खराब है, दगा नहीं देना' की गले में भी फंसी बेसुरी टेर से प्रियहरि वैसे मौकों पर बीबी की ईर्ष्या, उसके संदेह और तानों को खूब पढ़ सकता था ।
विराग के यहां से लौटते शाम ढल रही थी । चित्त में नीलांजना भी थी और वनमाला भी । वनमाला की राह पर संकोच में पड़ता भी वह खिंच चला था । उसका घर भी प्रियहरि के अपने घर की तरह अस्त-व्यस्त और झंझटों की छाया से घिरा हुआ करता था । प्रियहरि की बीबी के मन का गुबार जैसे प्रियहरि के मन तक धंसता समूचे वातारवण को खिझा जाता था, वैसे ही वनमाला के घर भी अजीब तरह के पशोपेश और संकोच की छाया उसकी अस्त-व्यस्तता में पसरी होती थी । बंगालियों के पूजा-पर्व का वह एक दिन भी वैसा ही था । नीम-अंधेरे में पति-पत्नी के अनमेल से उपजा उबाऊ उल्लासहीनता का वातावरण वहां प्रियहरि और उसकी पत्नी का स्वागत कर रहा था । आधी खुशी और आधे गम की मुस्कानें वहां थीं । जैसे उनके पहुंचने ने वनमाला और उसके पति को रोक लिया हो, वे संकोच में साथ बैठे । रसगुल्ले और नमकीन 'ना-ना' करते भी वे बाजार से ले आए गए थे । बीबी की उपस्थिति में सब कुछ पढ़ती भी आंखें उस सब को जुबान नहीं दे पा रही थी, जो प्रियहरि के दिल में था । अपने मिस्टर की छाया में वनमाला की हालत भी वैसी ही थी । औपचारिक बातें ही हुईं, सिवाय उन संवादों के जो प्रियहरि की बीबी और वनमाला के पतिदेव की मौजूदगी के बावजूद और उसकी आड़ में वनमाला और प्रियहरि के बीच एक-दूसरे की तारीफ में चले । वनमाला ऐसे उन पलों में खुश हुई जिनमें न जाने प्रियहरि की बीबी और रकीब के मनों में क्या चल रहा होगा । उन पलों में जैसे वे दोनों बातों में शरीक होकर भी अनुपस्थित थे ।
चलते-चलते प्रियहरि की बीबी बोली- ''नीलांजना के घर भी हो आते ना । यहीं-कहीं तो होगा ।'' प्रियहरि ने वनमाला की ओर देखा । उससे कहा- ''चलिए न आप भी साथ । हम लोगों ने तो घर देखा नहीं है ।''
वनमाला के कानों के लिए नीलांजना का नाम ज़हर था ।
वनमाला का मूड गड़बड़ा गया था । उसने तुरंत ने टाला- ''उसका घर तो बहुत दूर है । हम लोगों को भी ढूंढ़ना पड़ेगा । मैं तो वहां कभी गई नहीं । आप लोग चाहें तो हो आइए ।''
औरत भला क्यों चाहेगी कि उसका चहेता उसके किसी और रकीब के दर का ठिकाना उससे पूछे ? प्रियहरि बुद्धू था । सहज मन से वह वनमाला से तब पूछ तो गया था, लेकिन बाद में इस भूल का अहसास उसे हुआ कि वनमाला खुद उसे कितना और किस तरह चाहती थी यह वनमाला ही जाने, लेकिन यह तय था कि अपने चाहने वाले को किसी गैर की झोली में डालने वह तैयार न थी। प्रियहरि ने गौर किया तो पाया कि उसके मुआमले में सच भी वही था । उसकी प्रेमिका उसके घर आए और उसके रकीब का ठिकाना पूछती मिलने चली जाए - क्या प्रियहरि को वह भाता ? उस रोज नीलांजना रूट से बाहर हो गई थी, लेकिन इस चर्चा का जिक्र बाद में नीलांजना से प्रियहरि कर बैठा था । उधर वनमाला थी कि उस प्रसंग के बाद नीलांजना और प्रियहरि को साथ पा अपने आपको नाराज और प्रियहरि से कटी दिखने उतारू हो गई थी ।


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घर बनाम मकान


आदमी सारी दुनिया को जीत सकता है अपने घर को नहीं

Marriage is a romance in which the Hero dies in the first chapter. - Laurence J Peter


वनमाला घर में त्रस्त थी और प्रियहरि घर से बेजार। वनमाला को प्रियहरि हमेशा उसके अंदर छिपी प्रतीभा और गुणों की तारीफ करता प्रोत्साहित करता था। लिखने, रचने, पी.एच.डी. करने, संगीत सीखने कहता था। एक से एक योजनाएं प्रियहरि बनाता था लेकिन आंकाक्षा में उन सबको स्वप्नों की तरह समेटे वह कहा करती थी कि आप तो यह सब कहते है, लेकिन मेरे मिस्टर नहीं चाहते कि मैं कुछ करूं वे तो थोड़ी सी देर हो जाने पर जवाब-तलब करते है कि देर क्यों हुई ? वह प्रियहरि से कहती कि आप मेरे लिए व्यर्थ सोचते हैं। मैं पी.-एच.डी. नहीं कर सकती। मेरे मिस्टर को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं। मुझे लेकर हमेशा वे श क करते है। उनका बस चले तो कह दें कि घर से बाहर ही न निकलो। वह कह रही थी - ''मुझे कितनी तकलीफें है यह मैं जानती हूं। आप क्या समझते है ? आप जब मेरी तारीफ करते है तो क्या उन्हें अच्छा लगता होगा ? आपका खयाल गलत है आप के मुंह से मेरी तारीफ उन्हें बुरी लगती है। बंद कर दीजिए सोचना मेरे बारे में मैं कुछ नहीं कर सकती।
इधर प्रियहरि का हाल भी कुछ वैसा ही था। अपनी अर्धांगिनी से उसके लिए कोई प्रेरणा नहीं थी। दोनों के व्यक्तित्व, रुचियां और संस्कार जमीन और आसमान की तरह की दूरी के थे। प्रियहरि अक्सर सोचता उलझकर रह जाता कि वह महज संयोग था या नियति का कर्ज जिसे चुकाने वह इस स्त्री से जुड़ा था। इस तरह वनमाला और प्रियहरि का मिलन त्रास और बेजारी के दो दिलों का मिलन था। प्रियहरि वनमाला में अपनी राहत ढूढंता था और वनमाला प्रियहरि में अपनी आकांक्षों के स्वप्न देखती तरसती थी। प्रियहरि अक्सर सोचा करता कि स्वप्न उसने भी घर बनाने के ही कभी देखे थे, लेकिन वे महज चिन्ताओं की उदास चहारदीवारी में कैद होकर रह गए थे।
किस्मत का लेखा भी अजीब होता है। चाहते आप कुछ और हैं और होता कुछ और है। न जाने कितनी जगह भटक कर प्रियहरि ने कितनी लड़कियां देखी थीं लेकिन जाकर टकराया वह सोमा से, जो उसकी पत्नी बनी। जल्द ही प्रियहरि को यह आभास हो गया था कि सुंदर शरीर में वह एक प्राणहीन मन थी। निबाहने के तब भी बहुत प्रयास उसने किये लेकिन वह असफल रहा। घर और परिवार के उसके सारे सपने चकनाचूर हो चले थे। जि़न्दगी उसके लिए यह अहसास बनकर रही आई कि वह अजनबियों के बीच एक ऐसे मकान का कैदी है, जिसने उसे केवल अपना कर्ज उतारने को बंधक बना कर रखा गया है। आदमी सारी दुनिया को जीत सकता है लेकिन अपने घर को कभी नहीं।
विवाह के बाद थेाड़े दिनों में ही यह उजागर हो गया था कि सोमा के पास महज कहने को स्नातकोत्तर की एक डिग्री तो है, मगर तीसरे दर्जे की वह डिग्री भी बराए नाम ही है। अपने विषय का न तो रत्ती भर ज्ञान उसे था ,और न उसमें उसकी कोई दिलचस्पी थी। आड़े–टेढ़े अक्षरों के साथ अपने दस्तखत भी वह प्रयत्नपूर्वक ही बना पाती थी। प्रियहरि का खयाल था कि सामान्य पृष्ठभूमि की घरेलू लड़की होने के लिहाज से वह घर को सजाने–संवारने में दिलचस्पी दिखाएगी, लेकिन वह भ्रम भी टूट चला था। निहायत बोझ की तरह घर की दिनचर्या के सामान्य काम सोमा निबटाती थी, और वैसा करते भी चेहरे पर वहखीझसे भरी होती।
प्रियहरि भी बेहद संघर्षों के बीच पला था। घर में झाड़ू लगाने, चूल्हा जलाने, रोज लालटेन की कांच को राख से मांजकर चमकाने, कपड़े धोने और खाना बनाने, मिट्टी खेादने और कुल्हाड़ी चलाते लकड़ी चीरने तक के संस्कार उसे बचपन से ही मिले थे। उसके लिये ये संस्कार अध्ययन औरशिक्षाके संस्कारों के अंग जैसे ही थे। उसे संघर्षों से भरा वह बचपन याद आता जब आठ–नौ साल की उमर से ही घर से बाहर रहते आश्रम की व्यवस्था में अपने हम-उम्र बच्चों के साथ पढ़ाई करते उसे नियत सारणी के दिनों मं। अपनी टीम के साथ दस–बारह साथियों की रसोई संभालनी होती। उसे आश्रम की हरे–भरे वृक्षों, पादपों और लताओं से सजी वह विषाल वाटिका याद आती जिसे संवारने में अपने सहपाठियों के साथ वह घंटों मिहनत किया करता था। उसे इन सब में भी उतना ही आनंद मिलता जितना उस नन्ही उमर में अखबारों, पत्र–पत्रिकाओं और साहित्य के अनुपम ग्रन्थों को पढ़ने और कपड़े की गेंद को हाकी या फुटबाल की गेंद बनाकर अपने साथियों के साथ मैच खेलने में मिलता था। तब अपना सामान लादे मन की मौज में सात–आठ मील का रास्ता तय करके आसपास के मौसमी मेलों या वनांचलों में पिकनिक मनाना उसके लिये मानों आमोद का भव्य आयोजन हुआ करता था। सामाजिक आयोजनों, सांस्कृतिक परंपराओं और देश–दुनिया की जटिलताओं को गहराई तक जाकर समझने में प्रियहरि की रुचि थी। सगे–संबंधियों, बुजुर्गों और विद्वानों का आदर करना उसके पारिवारिक संस्कारों में था। सामाजिक–पारिवारिक आयोजनों में उसके घर के सदस्य सश्रम सहभागी होते और इसके लिये उन्हेंप्रशंसाऔर सम्मान के साथ याद किया जाता था।
अपने सांस्कारिक अनुभवों पर प्रियहरि को गर्व था। वह उसका स्वाभिमान था। सुविधा–संपन्नता की संस्कृति से उसे बिचक नहीं थी, लेकिन श्रम और संघर्ष की संस्कृति के प्रति कथित भद्र–वर्ग की उपेक्षा और अलगाव की मनोवृत्ति उसे नापसंद थी। शायद यही कारण था कि वैसी संस्कृति के अभ्यस्त और पोषक सहचर और सहचरियों के निकट आने पर भी उनसे एक मानसिक दूरी उसमें प्राय: बनी रही। अपने इन्हीं संस्कारों में वह अपने घर को भी देखने के सपने देखता था।
सोचने और होने में बहुत फर्क होता है। बहुत जल्द उसने जान लिया कि सोमा घर के महज दैनन्दिन काम बसकिसी तरह निबटा जाने और शयन-सुख में मशीनकी तरह बिछाई जा सकने वाली मशीन जितनी ही अच्छी हो सकती थी। लगाव या अभिरूचि जैसी कोई चीज़ उसके स्वभाव में ही नहीं थी। यह मालूम हुआ कि तीसरे दर्जे की उसकी डिग्री थी और कागज–कलम से उसका नाता बस किसी तरह उस डिग्री को हासिल करने तक ही था। अपनी अनुरूपता में ढालने प्रियहरि ने उसे उत्साहित करना चाहा था कि वह आगे और पढ़ ले और विदुषी बने, लेकिन जबाब था कि वैसा करना अब उसके लिये संभव नहीं। उसे उसमें न रूचि है और न उसका कोई काम। जैसा साधारण लड़कियां अमूमन हुआ करती है शादी ही मकसद था। मकसद पूरा हो चला था और अब उसे करना ही क्या था? तीन के परिवार में पति और पत्नी के बीच प्रियहरि की मां बूढ़ी सदस्या थी। वह भोर हुए उठ जाती थी और दिन भर कुछ न कुछ करती अपने को व्यस्त और घर को व्यवस्थित रखा करती थी।
सोमा की जुबान उसके घुन्नेपन के कारण हिलने में आलस करती थी। दिन भर में प्रियहरि से ताल्लुकात में जुबान से रोबोट की तरह यंत्रचालित संक्षिप्त शब्दों का एक कंजूस समूह निकलता और संबंध की बस वही निशानीहुआ करती थी। प्रियहरि की अम्मा उस रोबो के लिए आरंभ से अवांछित तीसरा जीव रही आई। प्रियहरि के लिये यदि उसे शब्द होते –’’ खाना निकाल दूं क्या ? ’’, तो अम्मा के मुआमले में यह होता कि प्रियहरि के खा–चुकने के बाद एक संक्षिप्त सी थाली नि:शब्द लाकर सामने रख दी जाती थी। न तो दोबारा उससे जरूरत पूछने सोमा का सौजन्य होता और न तो मां की हिम्मत होती कि वह सोमा से कह सके। यह देखते प्रियहरि को बुरा लगता। वह चाहता था कि सोमा आत्मीयता से पेशआये, लेकिन जवाब में घूरती हुई उसकी उपेक्षा-भरी दृष्टि से वह टकराता। सोमा से कुछ कहना खीझ भरी बड़बड़ाहट को दावत देना होता था। गलती से कभी माँ को और ज़रूरत के लिए पूछ लेने की संकोच-भरी सलाह पत्नी को देने का दुस्साहस भी प्रियहरि को महँगा पड़ता था। चीखती हुई कड़वी जुबान फ़ौरन उलटकर हमला करती –
“ तुम चुपचाप अपनी थाली देखो। तुम्हारे कहे बिना वे भूखी मारी जा रही हैं क्या ?”
व्यवस्था पर सोमा का ऐसा आधिपत्य हो गया था कि सास की हैसियत बेचारी की हो चली थी। सोमा उससे यूं पेशआती जैसे दयावश ही प्रियहरि के यहां वह आश्रित रही आई हो। प्रियहरि को पहले वाकये से ही इसका आभास हो चला था कि सोमा पर लगाम लगाना कलह को दावत देना था।
वह दिन आज भी उसकी स्मृतियों में जीवित है। दोपहर बाद के करीब चार बजे का समय रहा होगा। मां ने प्रियहरि से इच्छा जताई कि एक कप चाय मिल जाती तो अच्छा था। मां चाहती तो खुद भी चाय बना सकती थी लेकिन बहू का व्यवहार उसे रोकता था। अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी भी चीज में दूसरे का हाथ लगाना पत्नी को पसंद न था। प्रियहरि ने सोमा को जगाया कि चार बज चले है। अब वह उठ जाए और चाय बना ले। बजाय वैसा करने के सोमा ने नाराजगी से बड़बड़ाना शुरूकर दिया था –
’’ इन माँ-बेटे के कारण सोना भी मुश्किल हो गया है। अभी तो कुछ देर पहले खाना खाया है और इतनी जल्दी चाय की पड़ गई। ’’
प्रियहरि ने डांटा तो वह लड़ने पर उतारू हो गई।
’’ क्या समझ रख है तुम मां–बेटे ने कि मुझे दबा लोगे ? भूल में मत रहना। बताए देती हूं कि मुझे कम न समझना। मुझसे उलझोगे तो ठीक न होगा। ’’

प्रियहरि के भाई, बहन, या रिश्तेदारकभी भूले–भटके आ जाते या बाहर कहीं मिल जाते तो वह उन्हें चाहते हुए भी अपने यहां बुलाने से कतराता। सोमा में इतना भी सौजन्य न था कि वह आत्मीयता से उनसे पेशआती । अपनापे का आभास तो दूर रहा यदि प्रियहरि उनके लिये चाय–वाय का इंतजाम करने की बात भी करता तो अंदर जाकर उसपर मुह बनाती वह तुरन्त अपनी खीझ उतारती –
“ तुम क्यों फालतू टोकते रहते हो ? तुम अपना काम किया करो। मेरा काम मैं जानती हूं। अभी–अभी तो आए हैं। बैठने दो अभी। तुमको क्या जरूरत है बीच में आने की । तुम चुपचाप मुंह बंद किये बैठा करो। मैं जानती हूँ कि मुझको क्या करना है ? हमको भी क्या उस तरह कोई पूछता है जैसा तुम उनके लिए मरे जाते हो ? ’’
परिवार में एक–दूसरे के यहां आने–जाने, मिलने–बैठने, खाने–खिलाने की बात निकलती तो सुनने से पहले ही सोमा का मुंह बनाना शुरूहो जाता –
’’ रहने दो। दूसरों के पीछे हमें पैसे खर्च करने की जरूरत क्या है ? मेरे भरोसे मत रहना। करेगा कौन वह सब ?”
घर यानी ईंट–गारे की ऐसी प्रयोगशाला जहां परिणाम की महज बेउम्मीदी थी। बीबी महज ऐसा रोबोट, जिसमें अपनेपन और भवनात्मक लगाव की कल्पना भी व्यर्थ थी। मकान उससे घर तो बनता न था लेकिन घर का भ्रम देते उसे ढके रखने का यह रोबोट एक दुनियाबी यंत्र था। ज्यादा से ज्यादा यह था कि अपना मियादी बुखार उतारने बेमन फैली टांगों के बीच की कसरत के लिये जब–तब उसे काम में लाया जा सकता था। प्रियहरि के पास इसके अलावा कोई चारा न था कि वह इस जकड़नसे भागता फिरे। उसके लिये घर का सुख अब उन संबंधों और लम्हों में ही था जहां उसके समान ही भागती सपनीली आंखें प्रियहरि में अपनापा देखती टकरा जाया करती थीं।

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सारी चिटि्‌ठयां टुकड़े-टुकड़े जो टूटे हुए दिल की थीं

''लाइए, मेरे लिए जो भी लाए है, दे दीजिए। मैं बाद में देख लूंगी।
अंदर मुझे देख रहे होगें। सोचेंगे कि इतनी देर वह बाहर क्या कर रही है'' :



पश्चिम बंगाल के एक महत्वपूर्ण सम्मेलन में प्रियहरि को कलकत्ता जाना था। वनमाला उसके लिए आत्मीय, घर जैसी, घरनी जैसी थी। दोनों बात करते तो यूं सहज घुलकर जैसे बरसों का नाता हो। ऐसी अधिकार-भावना परस्पर थी कि जैसे पति और पत्नी के बीच हो। प्रियहरि ने वनमाला से पूछा था - ''तुम्हारे लिए क्या लाना है ?''
अगर मिल जाए तो खूबसूरत सा एक पर्स ले आने की बात वनमाला ने कही थी। सम्मेलन की बैठकों, जलसों के बाद बाजार घूम-घामकर चौरंगी से आगे न्यू मार्केट को छानते प्रियहरि ने वैसा ही एक पर्स अपनी प्रिया वनमाला के लिए खरीद लिया। कलकत्ते में भी दिन-रात हर पल दिल को चैन देने वाली वनमाला की मुखड़े की छवि, उसकी यादें प्रियहरि के साथ रहतीं। उन दिनों वहां विश्व पुस्तक मेला भी लगा था, लेकिन वहां जाने का मौका देखते खबर आई कि पंडालों में आग लगने की दुर्घटना घट गई थी।
प्रियहरि लौटा तो बेसब्री से वनमाला से मुलाकात की प्रतीक्षा में रहा। आमना-सामना होता भी तो ऐसी चहल-पहल रहती कि आलमारी में रखा बड़ा पर्स सब के रहते निकालना ही संभव न था। एक-दो रोज बाद एकांत के क्षणों में वनमाला से प्रियहरि की आंखें चार हुई। प्रियहरि ने बैग निकाला और वनमाला के सामने रख दिया।
' कैसा है ?' - प्रियहरि पूछ रहा था।
'खूबसूरत लग रहा है। खोल कर बताइए न' - वनमाला ने जवाब दिया।
प्रियहरि ने खोलने की कोशिश की फिर कहा कि मुझसे बनता नहीं, समझ नहीं आ रहा है, तुम ही देखो। वनमाला ने उसे खोला, अंदर-बाहर देखा और खुश हो गई बोली -
''सचमुच बहुत खुबसूरत है। धन्यवाद, आप मेरा कितना खयाल रखते है। मेरी इतनी फिक्र तो मेरे मिस्टर भी नहीं करते।''
प्रियहरि ने वनमाला को बताया कि किस तरह कलकत्ते में भी उसे आंखों में बसाए दिन-रात वह याद करता रहा था। इससे पहले कि उन दोनों के बीच कोई आता, प्रियहरि की हिदायत के मुताबिक अंदर का सारा कागज-पत्तर फेंक बैग को मोड़कर वनमाला ने अपने पुराने बैग में ठूंस दिया। फिर अचानक पशोपेश भरी आंखों से वह बोली -''ले तो जा रही हूं। मगर देखें ? मेरे मिस्टर पूछेंगे तो मैं क्या जवाब दूंगी ?'' प्रियहरि ने सुझाया - ''कह देना कि तुमने पैसे दिये थे, मंगाया तो मैं ले आया।''
चार दिन बाद जब फिर एकांत में दोनों आमने-सामने हुए तो प्रियहरि की प्रिया ने चुपचाप वही पर्स अपने कपबोर्ड से निकाला और उसके सामने रख दिया। वनमाला का चेहरा विषाद से मुरझाया हुआ था और आंखों में उदासी थी।

वह बोली - ''इसे आप रख लीजिए घर में काम आ जाएगा। मेरे मिस्टर को इस पर आपत्ति है कि मैं इसे रखूं।''
प्रियहरि ने वनमाला की मायूस आंखों में झांका और अपमान की उस पीड़ा को पढ़ लिया जो उसे घर से मिली थी। वनमाला ने कहा होगा तो मिस्टर ने संदेह किया होगा और फिर जमकर तकरार हुई होगी। प्रियहरि को बड़ा धक्का लगा। वनमाला की उदासी के सदमे से प्रियहरि का दिल भी मायूस और उदास हो गया। दोनों के दिल टूट गये थे। उदास, नजरें झुकाए वनमाला चुपचाप चली गई थी। ऐसी दुर्घटनाओं के संयोग वनमाला के चित्त को अवसाद से भर देते थे - इस कदर कि फिर चंद रोज उसकी दिनचर्या अन्यमस्य चुप्पी और घनघोर उदासी में बीतती। उसकी आंखों में शून्य भर जाता। मौन वह सामने रहती, देखती और चली जाती जैसे प्रियहरि से उसका कोई नाता न हो।
इधर वही अवसाद प्रियहरि में और अधिक बेसब्री और बेताबी भर देता था। उसकी इच्छा होती कि वह वनमाला के नजदीक जाए, उसकी पीड़ा को समझे, उससे बातें करे, उसके चित्त को बहलाए और उसे खुश करे। यह जानते हुए भी कि वनमाला के घर जाना मुसीबतों को और बढ़ाना है, यंत्रचालित प्रियहरि का मन उसके कदमों को वनमाला की घर की राह पर मोड़ देता था। बातों के दौरान संकेतों से ही वह अनुमान लगा लेता था कि वह मौका कब होगा जब वनमाला के घर दोनों के बीच बाधा न होगी। एक सप्ताह बाद उस दोपहर जब गया तो घर में ताला पड़ा था। दूसरे दिन जाना कि वनमाला बीमार हो गयी थी। उसके मिस्टर उसे अस्पताल ले गये थे।



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यूं एक सप्ताह और बीता। इस बार वनमाला के मिस्टर की रात की ड्‌यूटी यानी शाम छः से रात दो बजे तक की फुरसत का अनुमान लगाता प्रियहरि शाम को उसके घर जा पहुंचा। सचमुच वनमाला के पतिदेव नहीं थे। उसने दरवाजा खोला, उदास मुस्कुराहट से प्रियहरि को आंख भर निहारा और अंदर बिठाया। कोई मेहमान वहां पहले से मौजूद था। वनमाला ने ही परिचय कराया। वे उसके बड़े भाई साहब थे । इधर-उधर की बातें होती रहीं - घर की दफ्तर की, भविष्य की, उसके भाई साहब से परिचय की - लेकिन ढेर सी बातों के बावजूद वह नहीं, जो एक-दूसरे से टकराती लाचार बेताबी भरी आंखों और दिलों में छिपा था। हाय, यह कैसी लाचारी थी कि कालेज में शोधी दृष्टियों का भय हुआ करता और यहां ?- एक तो पहुंचना दुष्कर, और पहुंच भी गये तो उसके मिस्टर के होने और खीझने की आशंका। वे न हुए तो मेहमान। वे भी नहीं तो बड़े होते बच्चे प्रियहरि और वनमाला के बीच में आ पड़ते। अन्यमनस्क वनमाला भी, अन्यमनस्क प्रियहरि भी। बातों की कोई गुंजाइश न थी।
प्रियहरि का मन मसोस रहा था कि काश अपने दिल की बाtतें वह वनमाला से कह पाता। जब-तब कनखियों से वह उसे निहार लेता। छरहरी, सांवली, निचुड़ी हुई काया और कमजोर लग रही थी। रंग उड़ा हुआ जैसी थकी हुई हो। चेहरे से चमक गायब थी। वनमाला ने साड़ी नहीं पहनी थी जो उस पर ज्यादा फबती थी। सलवार-कुर्ती भी नहीं, महज उजड़े रंग का पुराना स्लीपिंग गाउन जिसके अंदर शायद चोली ही नहीं थी। हल्का ढीला उभार प्रियहरि को दिखाई पड़ रहा था। हां, यही तो वह छबि थी जिसे वह चाहता था। उसका मन वनमाला की उपस्थिति को यूं महसूस करता जैसे वह उसकी प्रिया नहीं अपितु सदियों से साथ गुजारती उसकी घरवाली हो। प्रियहरि वनमाला के उजड़े हुए रंग पर, उसकी कमजोर काया पर भी फिदा था। उसने चाहा कि वनमाला से लिपट जाए, उसे चूमे और पूछे कि बताओ, तुम इतनी कमजोर लग रही हो ? कहे कि चिन्ता न करो, मैं आ गया हूं। वह कमजोरी बेजार दिल से सहे गये बिस्तर की हो सकती थी। कितना अच्छा होता कि खुशनुमा दिल से एक-दूसरे की चाहत के साथ उस बिस्तर पर, उस तखत पर वनमाला और प्रियहरि दोनों की कामनाएं एक-दूसरे से गुंथी मचल रही होतीं, जो उनके सामने ही वहीं बिछा था । प्रियहरि को लगा कि तब शायद वनमाला की वह कमजोरी तुरंत दूर हो जाती। वनमाला की उड़ी हुई रंगत उसी क्षण लौटकर उसके चेहरे में गुलाबी हो जाती। तब उस तरह अवसाद की गुफा से निकल प्रियहरि और उसकी प्रिया वनमाला आसमान की सैर में होते। चाहत की बेताबी में आधा घंटा बीत गया लेकिन कहीं कोई मौका न था।
प्रियहरि चलने को हुआ तो भाई को अंदर बैठा ही छोड़ वनमाला बाहर सड़क तक उसे छोड़ने आई। रात हो चली थी। बाहर बिजली की रोशनी दूर थी। उसके घर के सामने झिटपुटा अंधेरा था जो पेड़ों की घनी छाया से और भी गहरा हो गया था। प्रियहरि ने कहा -
''वनमाला, तुमसे बातें करना भी शायद भाग्य में नहीं लिखा है। तुम्हें मालूम नहीं कि तुमने मुझे कितनी पीड़ा पहुंचाई है।''
वनमाला ने दबी आवाज में कहा - ''यहां ज्यादा बात करने का अवसर नहीं है। लाइए, मेरे लिए जो भी लाए है, दे दीजिए। मैं बाद में देख लूंगी। अंदर मुझे देख रहे होगें। सोचेंगे कि इतनी देर वह बाहर क्या कर रही है।''
प्रियहरि के अपने बैग में वही पर्स था। वही, जिसे मायूसी के कारण उसने काट कर पचासों टुकड़ों में बदल दिया था। ढेर सारी चिटि्‌ठयां थी। सारी चिटि्‌ठयां टुकड़े-टुकड़े जो टूटे हुए दिल की थीं। वनमाला का इशारा था कि वह उन्हें फुर्सत से पढ़ लेगी लेकिन प्रियहरि ने तो सारे पत्र फाड़ डाले थे। उसने वनमाला से कहा -
''अब क्या कहूं। तुमने पहले तो अस्वीकार कर दिया। मैंने भी सोचा कि अगर यह तुम्हारे लिए नहीं, तो किसी के लिए भी नहीं। वहीं टुकड़े तुम्हें सौंपने आया हूं।'' प्रियहरि ने सारे टुकड़े वहीं पेड़ के नीचे छाये कचरे और पत्तियों के ढेर पर बिखेर दिए।
वनमाला बोली - ''ऐसा आपने क्यों किया।'' एक-दूसरे से दिलासे की दो-चार बातें हुई। वनमाला से बिदा लेकर प्रियहरि लौट चला।
बाद के दिन यूं ही गुजरते रहे। वनमाला का मूड प्रियहरि की समझ में नहीं आता था। बहुत दिनों तक वह उससे खिंचीं -खिंचीं रही। आंखों में पथराई उदासी और शायद प्रियहरि को प्रश्नित करती शिकायत। वनमाला के मिस्टर चाहे उस दिन घर पर नहीं थे तब भी प्रियहरि के वहां जाने, बैठने, मिलने की बात तो मालूम हो ही गई होगी । वनमाला के इस रवैये के पीछे आकांक्षाओं और विवशताओं के संघर्ष का त्रास रहा होगा। प्रियहरि पढ़ रहा था कि दोनों के बीच विवशताओं के साथ बने रहने का पक्ष कानूनी था। उसकी नियति तो वही प्रियतमपुरा. के सेक्टर आठ तक जाने वाली सड़क और उसकी उन्नीसवीं स्ट्रीट में ईंट-गारों से चाक-चौबंद छः-ए की दीवारें थी। प्रियहरि की चाहत वनमाला की मुसीबत थी। वह इशा रों में कह भी जाती थी - ''कुछ नहीं हो सकता। भाग्य को स्वीकार लो।'' यह वही भाग्य था प्रियहरि ने चाहा था कि वह वनमाला से बातें करे लेकिन वह साफ मना कर उस एकांत से निकल भागती थी जो यदाकदा दोनों को मुहय्‌या होता था।
दोनों के बीच लाचारी, उदासी और बोलता हुआ अनबोलापन स्थायी रूप से बस चले थे। वनमाला खीझती, रूठती, झगड़ती, अनबोली रहती और अचानक आंखों में आंसू सारी लाचारियां तोड़ प्रियहरि के साथ, प्रियहरि के पास टूट कर बिखर जाया करती थी।


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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

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Re: प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

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Jemsbond
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Re: प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

Post by Jemsbond » 28 Aug 2017 09:46






फिर भी औरत की जात में ही वनमाला भी थी


प्रियहरि को ऐसा संदेह था कि वनमाला का त्रस्त मन शायद खीझ में कभी-कभी दूसरी संगिनियों पर खुल जाता हो । ऐसा नहीं कि इन दूसरों से उसका अपनापा हो । अपनापा तो जो प्रियहरि से था वह कभी टूट न सकता था । वह खुद इसे महसूस करती, स्वीकारती थी । वह भी प्रियहरि की तरह गर्विता और एकांतिक स्वभाव की थी । कहा करती- ''मैं इन सब जैसी नहीं हो सकती, इनसे मुझे नफरत है । मेरी इनसे नहीं पटती'' ......... वगैरह । फिर भी औरत की जात में ही वनमाला भी थी । मर्दों की तुलना में औरतों के साथ का सहारा लेना उसकी भी स्वाभाविक मजबूरी थी ।
प्रियहरि और वनमाला की निकटता इस दरम्यान लोगों की निगाहों में चढ़ गयी थी । साल बीतते जब फिर परीक्षा का दौर आया, तो जान-बूझकर इस बार वनमाला को सुबह और प्रियहरि को शाम के वक्त तैनात किया गया था ताकि इनके बीच मिलने तो क्या देखा-देखी की भी संभावना न रहे । ऐसे ही माहौल में किसी दिन वनमाला गमगीन चेहरा लिए परीक्षा की तैयारियों में अपने कागज-पत्तर लिए काम कर रही थी । उसी की तरह खिन्न प्रियहरि पास ही बैठा था । तभी कहीं से अनुराधा नमूदार हुई।
गोरी चिट्‌टी, सुंदर और हमेशा अपनी भव्यता के लिए जानी जाने वाली अंगरेजी की प्रवक्ता अनुराधा को वनमाला से दबी आवाज में प्रियहरि ने कहता सुना - ''चलो । हम लोगों के पास बैठना । यहां अकेली मत बैठो, नहीं तो वो फिर अपनी बातें शुरू कर देंगे ।''
वनमाला अनमनी थी, लेकिन शायद उस दिन उसे प्रियहरि के साथ के एकांत की चाहत थी । यह टका सा जवाब दिया- ''मुझे परीक्षाओं का अपना काम यहां करना है, मैं रुकूंगी, आप चली जाइये ।'' उसने अनुराधा को चलता कर दिया था ।
प्रियहरि की हरकतों को लेकर वनमाला की चुहलनुमा चुगली पर भरोसा कर उस दिन वनमाला की मदद करने चली अनुराधा को मायूसी का सामना करना पड़ा । अनुराधा ने विस्मय भरी खीझ से वनमाला और प्रियहरि को देखा, होंठ बिचकाए और चली गयी ।
आंखों की गहरी उदासी, चेहरे के अवसाद और गहरी गंभीर अन्य-मनस्कता से वनमाला को न जाने क्यों कभी बाहर आते प्रियहरि ने नहीं देखा । उस दिन अनुराधा के जाने के बाद सहज और सामान्य बातें दोनों के बीच हुई । अपनी उदासी के बीच भी प्रियहरि के अवसाद को ठंडा करने की चाहत में ही शायद वनमाला भीड़ के छंटने की प्रतीक्षा करती उस दिन दोपहर बाद तक रुकी थी । उसकी यही अदाएं तो प्रियहरि के बिदकते मन को फिर से बाँध लेती थीं । वनमाला की बेरुखी से खिन्न प्रियहरि उससे बातें करने की कोशिश अक्सर मौके आने पर भी बंद कर देता था । तब वनमाला की उदास आंखें प्रियहरि को देखती जैसे समझाया करती थीं कि मजबूरियों को समझा करो, नाराज क्यों होते हो ?
दो ही दिन बाद वनमाला को फिर न जाने क्या हुआ कि सामने होकर भी मुंह फुलाए उसने अपनी कुर्सी इस तरह मोड़ ली कि न प्रियहरि उसके चेहरे को देख सके और न वनमाला की नजरों के प्रियहरि की नजरों से मिलने की गुंजाइश हो । प्रियहरि और वनमाला के बीच यह एक अनिवार्य हादसा था, जो घटता ही रहता था ।
भले ही व्यक्तित्वों के अंतर, प्रियहरि की काबिलियत,वरिष्ठता और गंभीर स्वभाव के कारण कोई कहता उससे न हो, स्टॉफ में नीचे से ऊपर सब को इस बात का एहसास था कि वनमाला और प्रियहरि के बीच कुछ-कुछ है । औरतों में ही प्रियहरि के निकट की कुछ ललनाएं अपवाद थीं जो प्रियहरि से नजदीकी के कारण कभी-कभी चुपचाप चुहल से उसे छेड़ जाती थीं । इसे विचित्र संयोग कहा जाए कि पुरुषों से प्रियहरि का ताल्लुक ज्ञान-विज्ञान और गरिमा की गुरु-गंभीर चर्चाओं तक सीमित था, लेकिन ललनाएं लगभग सबकी सब प्रियहरि के निकट आकर, बातें करके उसे प्रभावित करतीं गर्व का अनुभव करती थीं । सांवली, गंभीर, एकांतिक स्वभाव की वनमाला इन सब की निगाह में नकचढ़ी और बदतमीज थी । अक्सर वनमाला से प्रियहरि की संगत पर वे सब संकेतों ही संकेतों में मलाल जाहिर करतीं और वनमाला को कोसती थीं । औरतों से प्रियहरि की बातें आत्मीय, निजी और छेड़छाड़ भरी होती थीं । उनमें अभद्रता नहीं होती थी । केवल आंखों ही आंखों के बीच हुए संवादों और एक ऐसी निजता का स्पर्श होता था कि पल भर के लिए सामने वाला सम्मोहित हो यह महसूस करता कि प्रियहरि की आंखों में उसके लिए वह चाहत है जिसकी दरकार स्त्रियां मन ही मन किया करती हैं ।
परीक्षाओं का दौर पूरी गहमा-गहमी से चल रहा था। वनमाला को देखने उससे मिलने प्रियहरि का मन मसोस कर रह जाता था । ऐसे में परीक्षाओं के बीच ही उसे किसी काम से भोपाल जाना पड़ा था । कल ही वह लौटा था । शाम की परीक्षाएं तकरीबन तीन बजे शुरूहोती थीं, लेकिन उस खास दिन प्रियहरि दो बजे से पहले ही पहुँच गया था । उसे पता लगा कि अगले दो दिन अधिकतर महिलाएं छुट्‌टी पर रहेंगी । प्रियहरि के सहायक अधिकारी को भी संभवतः छुट्‌टी पर रहना था । ऐसी हालत में शाम को निरीक्षकों की कमी होती । प्रियहरि ने ड्‌यूटी का चार्ट देखा और गौर किया कि वनमाला उन दो दिनों में सुबह की परीक्षाएं न होने से बिल्कुल मुक्त है । उसे सुबह के लिए सहायक अधिकारी बनाया गया । प्रियहरि ने सुझाया कि क्यों न उन दिनों वनमाला को शाम को रख दिया जाए ।
सत्यजित और भोला दादा ने एक-दूसरे की तरह अर्थ भरी निगाहों से देखा और कहा कि- वनमाला तो नहीं आ सकती, क्योंकि सुबह की ड्‌यूटी के बाद वह चली जा चुकी है और उसे खबर भला कौन करेगा । वे दोनों दूसरे-दूसरे विकल्प सुझाने में लगे थे और प्रियहरि उनकी टाल-मटोल पर गौर कर रहा था । प्रियहरि को तब इसका बिल्कुल अंदेशा न था कि अब तक उपेक्षा में अलग-थलग पड़ी वनमाला की खूबियाँ और उसके प्रति प्रियहरि का खुद का चाहत भरा लगाव इन सज्जन दीखते लोगों की निगाहों में भी खटकने लगा है । उसे नहीं मालूम था कि ईर्ष्या इनमें से एक की निगाह में ऐसा लालच भर रही है, जो आगे चलकर वनमाला से उसे इस तरह जुदा कर देने वाला है, ऐसी दरार पैदा करने वाला हो रहा है, जो वनमाला के साथ प्रियहरि के संबंधों, प्रियहरि की चाहत को ही ग्रसने जा रहा था ।
उन दिनों प्रियहरि के साथी नलिन जी ही अफसर की खुर्सी पर थे । उनके आने पर प्रियहरि ने उन्हें राजी कर अगली दो शामों के लिए वनमाला की ड्‌यूटी अपने साथ शाम के लिए दर्ज करा ली और उसके करीबी मुहल्ले के एक सहायक के हाथों वनमाला को खबर भी भिजवा दी ।
वनमाला और प्रियहरि के ताल्लुकात गहरे थे लेकिन ऐसे कि प्रियहरि को वनमाला के मूड का खयाल ही अधिक रखना होता था। इसके विपरीत वनमाला प्रियहरि के तरफ से निश्चिन्त थी कि वह तो उसका हो ही चुका है। औरत-जात होने के कारण उसकी अनेक-विध समस्याएं थी। खासकर तब जबकि प्रियहरि से लगाव वनमाला की घरू और सामाजिक जिन्दगी के लिए भारी पड़ रहा था। प्रियहरि का मन आशंका-ग्रस्त था। वनमाला से मिलते उसकी धकड़नें तेज हो जातीं। उसका मन भयभीत होता कि न जाने वनमाला की स्थिति, परिस्थिति, मनःस्थिति क्या है और उसका मूड कैसा होगा। बाधाओं के कारण इस तरह कई दिन गुजर जाते और प्रियहरि को वनमाला से आमने-सामने की अंतरंगता के मौकों के लिए तरस जाना होता था।


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''बाइ गाड, मैने आप के बारे में उससे कभी कुछ नहीं कहा है ।
यहां आजकल औरतों की भी बड़ी राजनीति चल रही है ।''


पिछली रात से ही प्रियहरि को डर था कि कहीं उस तरह बुलावे की व्याख्या उल्टी न हो। वनमाला के मिजाज के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता था। प्रियहरि को आशंका हुई कि वनमाला उस पर अपना प्रभुत्व दर्शाने, नीचा दिखाने, और परेशान करने का आरोप लगाए और छुट्‌टी न ले ले । दोपहर दो पैंतालीस पर उसने वनमाला को देखा तो आश्चर्य से भरपूर उल्लास से उसका मन थिरक उठा ! वनमाला आई । बिल्कुल अच्छा मूड । बहुत दिनों के बाद मिलने की प्रच्छन्न खुशी । पहले-पहल वनमाला के संभावित मूड के बारे में प्रियहरि ने जो-जो सोच रखा था, उसे हॅंसते हुए उसने बताया ।
वनमाला ने हंसकर कहा- ''मुझे कोई परेशानी नहीं । एक बार आना था, सो अभी आ गई । लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि नलिनजी ने ये वीक्षण की सूचना भेजी कैसे ? क्योंकि आप की शाम की पाली में ही तो बतौर अधिकार मैं आप के साथ सहायक अधीक्षक हूँ। अब आप बताइए कि सहायक अधीक्षक अपनी ही ड्‌यूटी में क्या वीक्षण करेगा ? तय कीजिये ?''
अब चौंकने की बारी प्रियहरि की थी । उसे यह बात मालूम नहीं थी । न कभी वनमाला ने इस वक्त उसके साथ सहायक अधिकारी की ड्‌यूटी की थी ।
उसने कहा-'' अरे ! यह बात तो मुझे भी नहीं मालूम तब तो आप को यहीं रखना था । ये तो गलत बात है । आइ विल रेज़ दिस मैटर विद नलिन जी।''
प्रियहरि के शब्दों के पीछे छिपी मंशा को वनमाला ने भली-भॉंति समझ लिया । वह सुबह की जगह शाम प्रियहरि के साथ रहना ही रहना चाहती थी ।
वनमाला ने कहा- ''आप को मालूम नहीं ?'' हंसकर ताना देती हुई वह बोली –
'' मैंने तो समझा था कि आपने ही मुझे अपनी जगह से टालने के लिए कहकर सुबह की पाली में भिजवाया है । आप तीसरी पाली के अधीक्षक हैं और आपको यह बात मालूम होनी चाहिए थी । ''
'' अरे ठीक इसके उल्टे मैं समझता रहा कि तुमने मुझे अवाइड करने सुबह की पाली मांगी है। मैने तो समझा कि प्रशासन के निकट रहकर मुझे जलाने के लिए ही खासतौर पर तुमने सुबह के साथ दोपहर की पाली भी चुनी है '' - प्रियहरि ने जवाब दिया ।
'' मुझसे पूछा किसने ? बस लगा दिया । मेरी मजबूरी थी । मैं करती भी क्या ? ''
वनमाला ने प्रियहरि से कहा- '' अब आप कहिए उनसे कि शाम की पाली में मेरा नाम है, तो सुबह-सुबह वे मुझे क्यों बुला रहे हैं ? वैसे भी सुबह की पाली में परेशानी है । पॉंच-पॉंच, छः-छः लोग आते नहीं । कार्यालय का आदमी भी ड्‌यूटी पर चला जाता है । मुझ पर ताने कसे जाते हैं कि इन्हीं में बड़ी योग्यता है, जो दो-दो पालियों में सहायक परीक्षधिकारी बनी बैठी हैं, वगैरह । ये सब महिलाओं की राजनीति है । ''
'' वनमाला तुम क्यों नहीं कहती हो उनसे ? तुम कहो उनसे और मैं भी कहूंगा । ''
जवाब में वनमाला बोली -'' मेरे कहने से कुछ होता नहीं । उल्टे गलत अर्थ निकाला जाएगा । ''
सारा माजरा प्रियहरि की समझ में आ गया था। यह शरारत ईर्ष्या में ग्रस्त भोलाराम की थी । अवश्य उसी ने बड़े साहब के कान फूंकते वनमाला को प्रियहरि से जुदा रखने की तरकीब निकाली थी।
प्रियहरि ने वनमाला को उम्मीद दिलाई।
''ठीक है मैं ही कोशिश करूंगा ''- उसने कहा।
साथ बैठे प्रियहरि और वनमाला का सारा वक्त प्यार में एक दूसरे से बेरुखाई की शिकायतों और मनुहारों में कटा । वनमाला को अपने अनेक श त्रु होने की शिकायत थी। वनमाला की शिकायत थी कि प्रियहरि भी उसका ध्यान नहीं रखता है। वैसी ही शिकायतें विपरीत ध्रुव पर वनमाला से प्रियहरि की भी थीं । इस मिलन से दोनों के बीच की गलतफहमियॉं दूर हुईं । वे दोनों ही बहुत प्रसन्न थे । तीन घण्टे का समय कैसे गुजरा इसका पता ही उस दिन न चल पाया था। प्रियहरि के टिफिन की दो पूरियां आज वनमाला और नीलांजना सहित तीन ने खायी । नाश्ता हुआ, चाय चली । प्रच्छन्न आरोप-प्रत्यारोप, उपालंभ चले । आज तीसरी नीलांजन थी, जो प्रियहरि और वनमाला के एक हो जाने पर संकोच में सहमी, सकुची रही और बाकायदा प्रियहरि की सहायक अधिकारी होने के बावजूद इन दोनों को वहां छोड़ निरीक्षण में भी जाती रही । आज अपनी-अपनी जगह से न प्रियहरि हिला और न वनमाला हिली । शाम होते-होते भोलाबाबू सौंपा गया अपना सरकारी काम पूरा कर लौटते हुए आ पहुंचे थे। वनमाला और भोलाबाबू एक ही इलाके के बासिन्दा थे। सुविधा की दृष्टिसे मैने वनमाला को समय से कुछ पहले ही भोला के साथ भेज दिया ।

कल से ही प्रियहरि को कुछ अंदेशा होने लगा था । अनुभव बताता है कि वनमाला के साथ संबंधों में एक दिन की उड़ान दूसरे दिन खाई बन जाती है । वही हुआ । सुबह फोन पर प्रियहरि ने भोलाबाबू से अनुरोध किया था कि परीक्षा-ड्‌यूटी संबंधी व्यक्तिगत बात प्राचार्य से करके वे आदेश ठीक कराएं और वनमाला को शाम उसके साथ रखें । बात बहुत औपचारिक ही थी । दोपहर पता लगा कि मौजूदा स्थिति को यथावत पुष्ट करके फिर उन्हें आदेश सौंप दिया जाएगा। बदकिस्मती कि प्रियहरि और वनमाला को वैसी ही दूरी पर रहना था ।
दूसरे दिन फिर साथ होने पर प्रियहरि ने वनमाला को सुझाया कि नलिनजी से अपने सुबह के झगड़ों की बात बताकर तुम्हीं प्रधानजी से आग्रह करो कि वे तुम्हें उनकी जगह मेरे साथ रखें।
वनमाला ने उदास भाव से कहा- '' मैं नहीं कह सकती । मुझे मालूम है कि होना-जाना कुछ नहीं है । फिर पारिवारिक सुविधा की दृष्टि से तो सुबह ही ठीक है । रहने दीजिये ।''

प्रियहरि ने वनमाला पर नजर डाली । आंखों और चेहरे के उदास भाव से पता लग रहा था कि बड़े साहब से न कहने का कारण पहला ही था दूसरा नहीं । मैंने बात समझी और कहा कि तुम ठीक कहती हो । होगा कुछ नहीं उल्टे अपनी हंसी उड़ेगी । वनमाला ने मेरी आशंका की पुष्टि की ।
कल का जो उल्लास था, वह आज केवल सामीप्य का हर्द्या था । चेहरे और आंखों पर विवश ता और उदासी वहां भी थी, और यहां भी । प्रियहरि ने उसकी ओर देखकर कहा-''वनमाला, आदमी सोचता कुछ और है, होता कुछ और है ।''
वनमाला के अंदर केवल एक लाचार शून्य था । दोनों का वह दिन उदासी में ही कटा ।
वनमाला ने कहा- '' मैंने कहा था न ! यहां कुछ न होगा । आप बेकार दुःखी होते हैं । मेरी सलाह मानिये, भोलाबाबू की तरह हो जाइए । सुखी रहेंगे ।''
नीलांजना से मुखतिब हाते प्रियहरि ने कहा और वनमाला को सुनाया ।
'' अपने बहुत करीबी मित्रों से भी जब मैं यह सुनता हूं, तो मुझे बड़ा धक्का लगा भी । क्या सचमुच वनमाला को भी यही सब प्रभावित करता है ? ऐसे सड़े विचार ?''
वनमाला ने फिर कहा- '' आप को लगता है कि केवल यहां ही ऐसा माहौल है ? ऐसे ही अफसर हो रहे हैं और ऐसे ही चाटुकार राज कर रहे हैं । '' प्रियहरि स्तब्ध और उदास हो आया । दोनों में से किसी ने कुछ न कहा । शाम ढलते वनमाला ने प्रियहरि से आज्ञा ली और वापस जाने तैयार हो गयी । इस वक्त कमरा बिल्कुल सूना था । नीलांजना भंडार के सामान की जांच के बहाने कहीं और चली गयी थी । बाबू और अन्य सेवक शायद जान-बूझकर ही बाहर कहीं चाय आदि को चले गये थे ।
प्रियहरि ने वनमाला को आवाज देकर टोका- ''सुनो, अपनी शिकायत कहने, मुझे ताना देने तुम्हे अनुराधा की जरूरत उस दिन क्यों पड़ी वनमाला ? क्या तुमने उसे अपना सलाहकार बना रखा है ?
वनमाला ने कहा- ''नहीं, आप को गलतफहमी है। मैंने कभी किसी से कुछ नहीं कहा है ।''
प्रियहरि ने उसे याद दिलाया- ''उस दिन सूने स्टाफ रूम में जब सारी महिलाएं साड़ी रंगने और देखने जा रही थीं, तब तुम्हें परीक्षा सामग्री के साथ और मुझे वहां अकेला पाकर अनुराधा ने फुसफुसाकर तुमसे क्या यह नहीं कहा था कि चलो यहां से, नहीं तो ये फिर से अपनी शुरूकर देंगे ।''
वनमाला ने अपना गला छूकर कहा- ''बाइ गाड, मैंने आप के बारे में उससे कभी कुछ नहीं कहा है । अनुराधा का संकेत शायद
महिलाओं की राजनीति की ओर रहा होगा । आप जानते नहीं यहां आजकल औरतों की भी बड़ी राजनीति चल रही है ।''
वनमाला के 'बाइ-गाड' कहने ने प्रियहरि में विश्वास अवश्य जगाया। पर तब भी वह तय न कर पाया कि उसकी बात कितनी विश्वसनीय है । प्रियहरि ने केवल इतना ही कहा- ''वनमाला, मैं तुम्हारा ऐसा ही हंसता हुआ चेहरा हमेशा देखना चाहता हूं । मेरी शिकायत तो तुम खुद मुझसे कर सकती हो । मुझ पर तुम्हारा पूरा अधिकार है । हमारे बीच तीसरे किसी को क्यों आना चाहिए ?''
वनमाला ने जवाब दिया- ''आप सच मानिये, मैंने कभी किसी से कुछ न कहा है। आप तो बस फिर वही शिकायत ले बैठे ।'' ऐसा कहती खिलखिलाती हुई वापस जाने अपना बैग उठाए वनमाला दरवाजे से बाहर हो गई ।
इस साथ के सुख ने वनमाला के लिये प्रियहरि की प्यास को और बढ़ा दिया था। जुदा होती वनमाला के पीछे दौड़ता उसका अधीर मन गुनगुना रहा था - '' अभी न जाओ छोड़कर अभी तो मन भरा नहीं -''।
एक हफ्ते बाद फिर वनमाला के साथ होने की युक्ति प्रियहरि ने निकाली । हुआ यूं कि परीक्षा में निरीक्षक कम पढ़ते थे और लगातार छः-छः घण्टे ड्‌यूटी लगने से दूसरे निरीक्षक शिकायत करते थे । प्रियहरि ने चतुराई से सुझाया था कि परीक्षा अधिकारी भी आखिर जरूरतों पर ऐसी ड्‌यूटी क्यों न करें । दो परीक्षधिकारियों सत्यजित और भोला बाबू ने वैसा करने में अनमनापन दिखाया । वैसा करना वे अपनी शान के खिलाफ मानते थे। उनसे अलग हो प्रियहरि ने अपने को हाजिर कर दिया था । वनमाला तो सहायक अधिकारी थी ही। उसे तो पहले से ऐसी ड्‌यूटियां करनी होती थीं । भोला दादा बड़े साहब के करीब हुआ करते थे। उनसे प्रियहरि ने आग्रहपूर्वक यह शर्त रखी थी कि उसको निरीक्षण में लगाते वे अधिकारी के साथ अधिकारी या सहायक अधिकारी की ड्‌यूटी ही वे लगाएं ताकि मातहतों के साथ काम करते अटपटा न लगे और वह अवमानित न महसूस करे । वनमाला की ड्‌यूटी भी उन तारीखों पर लगनी ही थी । उन आने वाले दो दिनों के लिए उसने वनमाला को अपने साथ रखने की पेसकश भोला दादा से की थी । देखने में यह उसकी चालाकी थी, लेकिन ऐसा लगता था कि उस चालाकी की मूर्खता औरों ने पकड़ ली थी । भोला दादा को तो आभास हो ही गया था । भोला दादा ने वैसा कर भी दिया लेकिन बहुत जल्द प्रियहरि को इसका अहसास हो गया कि वैसा कराना शायद उसकी खुद की मूर्खता थी । वह उन हालातों को लेकर सोच में था जिनसे गुजरता वह अनिर्दिष्ट की ओर बढ़ रहा था।



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वनमाला के होठों पर आधे इंच की मुस्कान को देखना दुर्लभ नजारा था,
जिसे सौभाग्य के वैसे ही दुर्लभ क्षणों में देखा जा सकता था ।



मैं सोचता हूं कि जिंदगी भी कितनी अजीब है । सरल और सीधी राह भी परिस्थितियों के वशीभूत हो, कितनी टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती है । मेरी बार-बार इच्छा होती थी कि वनमाला की एक झलक मैं देख लूं । बेताबी के चलते दो-तीन रोज बाद ही एक दिन अपने नियत समय से पहले यानी दोपहर को ही मैं दफ्तर चला गया । उसी दिन मैंने सुन लिया था कि बाबू के न रहने के कारण सुबह वनमाला तनखाह नहीं ले पाई है । मेरा मन कहता था कि शायद आज वह रुके और फिर आमना-सामना हो जाए । मेरी उम्मीद ठीक निकली । काली साड़ी वनमाला को खूब फबती थी । श्यामा तन्वंगी वनमाला की खूबसूरती उसमें और निखर आती थी । कमस्कम मुझे तो ऐसा लगता था । हमारी आंखें चार हुईं । वह प्रसन्न थी । बैठने की जगह तो परीक्षा के प्रशासन का कमरा ही था । उस दिन वह दो बजे तक रुकी रही और भीड़ से आंखें बचाते कुछ हिचकते और कुछ पशोपेश में हम दोनों इस-उस बारे में बतियाते रहे ।
ईश्वर जाने क्यों अंदरूनी खुशी की वे तरंगें जो हम दोनों में छिपी रहती थी, मौका मिलते ही एक-दूसरे के दिलों पर फैलकर एकाकार हो जाती थी । वनमाला और मेरे बीच जो चल रहा था उसे कमरे की भीड़ भी दबे-छिपे आश्चर्य और कौतुक से देख रही थी । इस बात का अंदाजा आज मुझे हो गया था कि चार रोज बाद हमारे एकांतिक सहमिलन का शुभ अवसर फिर आने वाला था। संभवतः वनमाला को भी वैसा आभास हो गया हो । पर तब इसका आभास मुझे नहीं हो सका था कि निरीक्षण की ताजा तालिका देखकर ही औरों को भी वनमाला और मेरी साझा ड्‌यूटी पर दाल मे काला नज़र आएगा।
उस तरह इंतिजार कराता वह पूरा सप्ताह अगले उस अवसर की कल्पना में बीता जिसमें उसकी प्रिया काम के बहाने और काम के बीच भी केवल उसके साथ होगी। उसका मन बार-बार वनमाला रानी के पीछे भागता था । वनमाला उसके अस्तित्व मे समा चली थी। आंखों में वनमाला की छबि समाई थी। हृदय का हर स्पंदन मंत्र की तरह जप रहा था - मैं और मेरी वनमाला। वनमाला रानी और उसका प्रियहरि यानी मैं।



वह दिन आया । लेकिन ठीक उस तरह नहीं जैसा उसे आना था । सुबह दस बजे ही मैंने पाया कि स्टाफ-रुम में हम लोगों को साथ पाकर और एक ही कमरे में दर्ज देख खुसर-पुसर शुरू हो गई है । खोजी निगाहें इशारों में बतिया रही थी । चित्रकार कानन कार्यालय के नारायण बाबू से पूछ रहा था- ''अच्छा तो आजकल कुछ लोग अपनी सुविधा के मुताबिक ड्‌यूटी लगवा रहे हैं ।''
वह कहना ऐसा था जिसे सुना जा सके या जिसे जानबूझकर सुनाया जा रहा हो । यह छैला, तुनक-मिजाज ,चंचल और बातचीत में लिहाज-विहीन था, गो कि उसकी यह वृत्ति समय-समय पर ही प्रकट होती थी । चिर-प्रतीक्षित उम्मीद पर पानी पड़ने ही जा रहा था । किसी कमरे में कोई एक तब-तक अनुपस्थित था ।
बाबू ने सुझाया कि प्रियहरि सर को बदलकर दूसरे कमरे में भेज दिया जाए तो कैसा रहे ? भोलाबाबू ने मना कर दिया -''नहीं-नहीं, उन्हें वहीं रहने दो ।''
यह सब देख-सुनकर वनमाला और मैं दोनों ही एक अनजान भय और संकोच से घिर गए थे। हमारे मन का चोर दूसरों ने पकड़ लिया था। प्रथमे ग्रासे मक्षिका पातः।
हम दोनों रहे तो तीन घण्टे के लिए एक ही कमरे में आए, लेकिन वनमाला का मूड बिगड़ गया था । जिस तरह से चीजें उजागर हुई, उससे वह अपने को फजीहत में पड़ा हुआ महसूस कर रही थी और रुष्ट थी । वनमाला ने शायद तय कर रखा था कि उस दिन मैं जो भी उससे कहूंगा या चाहूंगा, उसे वह नहीं मानेगी । मैंने उसे पास बिठाने, मनाने की चेष्टाएं कीं, लेकिन उसने यत्नपूर्वक दूरी बनाए रखी ताकि अपवादों से वह अपने को बचा सके । औरत चाहती वह सब कुछ है, जो मर्द चाहता है, लेकिन लोकापवादों से वह हर कीमत पर बचना चाहती है । औरतों की ईर्ष्या की उसे उतनी परवाह नहीं होती । वनमाला को भी नहीं थी। लेकिन आदमियों की दुनिया में औरत बदनामी से बहुत परहेज करती है । दूर-दूर भाग रही वनमाला रानी को अपने पास बिठा रखने में मुझे काफी दिक्कतें हुई । मेरे मनाने पर वनमाला राजी तो हुई, लेकिन रही वह अन्यमनस्क ही आई । मैने उससे पहले ही कह रखा था कि आज हम साथ रहेंगे और मैं उसके टिफिन से उसके साथ ही खाना खाऊंगा।
मैने पूछा-'' टिफिन लाई हो न ? ''
उसने कहा- ''आज मैं घर से ही खाकर आ गई हूं । ''
मैं उसे मनाता रहा।
''कल लेकर जरूर आना प्लीज़। क्या तुम मेरा इतना भी ध्यान न रखोगी ?''
वनमाला को मालूम था कि मैं शुद्ध शाकाहारी हूं ।
मुझे चिढ़ाती हुई वह बोली- ''कल मैं ब्रेड और आमलेट लेकर आऊँगी ।''
'' ठीक है।''
मैने कहा -'' मेरी परीक्षा ही ले रही तो यही-सही, मैं वही खाऊँगा ।''
अनमनी वनमाला ने मुझसे कहा - ''मुझे कानपुर सेमिनार में जाना है । अकाउन्ट्‌स के किसी टॉफिक पर एक पेपर तैयार कर दीजिए न । करेंगे न ?''
मैने कहा- ''करूंगा तो, लेकिन तुम साथ बैठोगी तब ।''
वनमाला नाराज़ हो गयी ।
''मुझे साथ ही बैठना होता तो क्या ? रहने दीजिए मैं खुद कर लूंगी ।''
मैं समझ तो रहा था कि हमारे संबंधों का उस तरह औरों पर प्रकट होना और फिर ताने उसे चुभ गए थे । वह अपने को सिकोड़ना चाहती थी । फिर भी मुझे उसका वैसा जवाब देना बुरा लगा । मैंने उसे समझाया कि विषय तुम्हारा है और वह भी तकनीकी। तुम साथ न बैठीं, तो मैं किससे बात करूंगा और क्या मेरा मन लगेगा ?
वह बोली ''रहने दीजिए मुझे मालूम है, आप सब कुछ कर सकते हैं । नहीं ही लिखना है तो बहाना मत कीजिए ।'' मुंह फुलाए वह टहलने लगी ।
अपने से खिन्न पा मैने उसे बिठाया । उससे कहा- ''प्यारी वन्या, मुझसे इतनी नफरत मत करो जिसे तुम खुद भी संभाल न पाओ । बताओ तो मेरा कसूर क्या है ?''
वनमाला मौन रही आई, उदास ।
उसे मुंह फुलाया पाकर मैंने कहा-''जानती हो कलकत्ते से तुम्हारे लिये संदेश लाया था । उस वक्त भी तुम्हारा मुंह फूला रहा था । इसलिए तुमसे तब कहा नहीं । तीन दिन रखा रहा, आखिर फेंकना पड़ा ।''
'सच' ? वनमाला के होठों पर आधे इंच की मुस्कान को देखना दुर्लभ नजारा था, जिसे सौभाग्य के वैसे ही दुर्लभ क्षणों में देखा जा सकता था ।
वह बोली- ''आपने कहा ही नहीं, तो मैं जानती कैसे ।'' उसने कहा- ''के. सी. दास का रसगुल्ला लाना था, मुझे बहुत पसंद है ।''
''वह ले आता तो रानीजी कुछ और लाने की बात कहतीं ।'' अपनी बात जारी रखते मैने कहा- ''यार तुम्हारा मूड इस तरह से उखड़ा हुआ क्यों रहता है ? मुझे बहुत डर लगता है कि तुम न जाने कब नाराज़ हो जाओ । हमारे बीच खटपट और तनाव पर लोग गौर करते हैं । आखिर तुम ऐसा करती क्यों हो ?''
बड़ी मासूमियत से उसने जवाब दिया- ''आप यूं ही सोचते हैं । मैंने तो ऐसा महसूस नहीं किया ।''
शरारत से मैने कहा- ''तुम्हारी कुंडली में मंगल है क्या ? हमेशा गरम रहती हो ।''
''मुझे नहीं मालूम । यह भी कि कुंडली बनी भी, या नहीं ।''
''शादी फिर कैसे तय हुई ?''
''मिस्टर की भी कुंडली भी नहीं है ।''
अतीत में कहीं देखती वनमाला ने यूं कहा मानो वह बहुत दूर से बोल रही हो
- ''गनीमत है शादी हो गई । यही क्या कम है ?''
''यार, तब तो तुम्हारा पति बहुत सौभाग्यशाली निकला । अगर कुंडली का चक्कर होता तो शायद वो तुम्हे नहीं पा सकता था ।''
जैसे वनमाला कहीं दूर खो गई थी ।
मैने कहा- ''काश मै तुम्हें पा सकता । तुम्हें नहीं लगता कि जैसे तुम मेरे लिए ही रची गई थीं ।''
वनमाला अनमनी हो गई थी । कुछ अस्तित्व उसका कमरे में चहलकदमी करता और बैठता मेरे पास था ; कुछ और कहीं शून्य में ; कुछ वहां जहां उसके माथे पर चिन्ता की लकीरें थीं कि लोग क्या कह रहे होंगे ? चिंता की उन लकीरों का फलित यह था कि अगले दिन हम जुदा कर दिए गए थे ।



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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Jemsbond
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Re: प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

Post by Jemsbond » 28 Aug 2017 09:47


मेरी हालत ऐसी है कि मैं कुछ न कर पाऊंगी।
मेरे मिस्टर नहीं चाहते कि मैं कुछ करूं।''


यह दूसरा दिन था। वनमाला के कमरे में जाकर मैं उससे मिला । बरामदों का चक्कर लगाते श्रीमान्‌ भोलाबाबू बीच में आ टपके । बातों-बातों के बीच वनमाला के लिए मेरा प्रशंसा-भाव पकड़कर उन्होने अनजाने में वह बात कह दी, जिससे मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ ।
वनमाला की तारीफ सुनते वे बोल उठे- ''हां, मैंने इन्हें पहले पहचाना नहीं । ये काबिल तो हैं । सोचता हूं कि इसे अपनी शिफ्ट में सहायक बनाकर रख लूं । लेकिन फिर लोग कहेंगे कि सारे बंगाली इकट्‌ठा कर लिए हैं ।'' विराग गांगुली पहले से ही भोला का एक सहायक अधिकारी था।
यकीनन भोला ने पशोपेश ग्रस्त वनमाला पर यह बात जाहिर कर दी थी कि मैंने वनमाला को अपने साथ ड्‌यूटी में रखने की बात उससे कह दी थी । बातों के दौरान ही वनमाला अचानक बोल उठी थी- ''आप तो इनके (यानी मेरे) कहने पर मेरी ड्‌यूटी न लगाया कीजिए, खास तौर पर इनके साथ । ये तो यूं ही मेरी तारीफ करते रहते हैं ।''
जाहिर है कि लोकापवाद के भय से वनमाला में और सदैव उसे उपेक्षिता रखने के बाद भोला के मन में लोभ के जागने का परिणाम ही दोनों के वे संवाद थे, जो मुझे संकोच में डाल गए थे । बाद में फिर एकांत पा मैने वनमाला से पूछा था- ''मेरी बात याद है, आज टिफिन लाई हो न ?''
उसके 'ना' करने पर मैंने कहा- ''ठीक है, मैं आज समझ गया । बात महज टिफिन की नही थी, टिफिन लाने वाले की भावना की थी और मैंने वह देख ली है ।''
उसने बात टालनी चाही- ''क्या बताऊँ, सुबह-सुबह हो नहीं पाता है ..... ''
मैने बीच में ही कहा- ''वनमाला, कुछ न कहो, परीक्षा हो गई ।''
तसल्ली की कोशिश में उसने कहा- ''आप तो बस यूं ही हर बात पकड़ बैठते हैं । मैने ऐसी कोई बात मन में सोची ही नहीं थी ।''
उस दिन मैंने उसे बताया कि उसकी पी.एच-डी. के पंजीयन के लिए मैंने डॉ. माथुर से बात कर ली है । वह पंजीयन के लिए तैयार रहे ।
वनमाला अनमनी और अपने आप मे गुम थी। सुनकर भी जैसे उसने कुछ न सुना हो । जैसे किसी दूर के लोक से क्षीण सी आवाज सुन पड़ी -''रहने दीजिए। मेरी हालत ऐसी है कि मैं कुछ न कर पाऊंगी। मेरे मिस्टर नहीं चाहते कि मैं कुछ करूं।''
उस दिन पहली बार मैंने अपनी गलती महसूस की । वनमाला और अपने बीच भोला की मदद लेना मेरी मूर्खता थी । घर से तो वनमाला त्रस्त थी ही। यहां भी उसपर निगाह रखते उसकी खुशी छीनने, उसे बदनाम करने लोग घुस आए थे।
किंकर्तव्य-विमूढ मैं सोचता रहा कि हम दोनों की नियति भी कैसी है ? आज सुबह ही मुझे इसका आभास होने लगा था कि जैसा माहौल बन चला था उसमें वनमाला का मूड शायदवैसा खिला न रह पाएगा जैसा हमारे साथ के पिछले संयोग में रहा आया था । यह निश्चय था कि भोला नहीं चाहता था कि वनमाला मेरे निकट रहे। बाद में मुझे यह मालूम हो चला था कि सुबह-सुबह वनमाला को अपने साथ रखे जाने की प्रियहरि की बात सुनकर भोलाबाबू अप्रसन्न था। इससे पहले कि उस दिन मैं पहुंचता, वनमाला पर अपनी खीझ भोला बाबू ने उतार दी थी। उस दिन वनमाला के बुझ चले चेहरे के पीछे यही रहस्य था। तब भी मुझ में इस बात का क्षोभ रहा आया कि प्रियहरि का साथ देती विरोधियों से खुले आम लड़ पड़ने की बजाय वनमाला क्यों परिस्थितियों के दबाव में आती मायूस हो जाती है ? क्यों तब अपनी रुखाई दिखा वह बदला प्रियहरि से लेती है ? वह सोच रहा था कि पल-पल बदलती उसकी प्रिया वनमाला का कौन सा रूप सही है ?

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अक्सर मुझे संदेह होता कि कहीं गहरे अतीत में उसका कोई भयानक अनुभव तो नहीं था ?

बाहर बर्फ की ठंडी, ठोस, लादी हुई चट्‌टान ; लेकिन अंदर बाहर निकलने को बेताब उद्‌दाम ज्वाला ।
वनमाला के अंदर भी वैसी ही उद्‌दाम ज्वाला तो नहीं छिपी थी ?



वनमाला अच्छी तरह जानती थी कि मैं उसे चाहता हूं पर उसके अंदर कुछ रहा होगा, जो प्रत्यक्ष को टालना चाहता था । वह क्या था ? शायद मध्यमवर्गीय नैतिकता का भय ? या उन उलझनों और परेशानियों का भय जो पेश आ रही थीं । या शायदघर में उसके पति की झंझटों और बच्चों की परवरिश आदि की चिंताएं और व्यस्तता । वह उन सारी स्थितियों से बचने की कोशिश करती थी, जो हमें एक दूसरे की ओर खींच रही थी । यह इसके बावजूद था कि दिली आकांक्षाएं मेरी तरह उसकी भी उन्हीं में बने रहने की थी ।
मुझे याद है । आरंभिक लग-लगाव के दिनों में रुठती-मानती वनमाला से यह पूछने पर कि क्या तुम्हें मेरा साथ पसंद नहीं, क्या तुम मुझे नहीं चाहती ? अगर ऐसा है, तो मैं तुमसे दूर चला जाऊँगा '', उसने जवाब दिया था- ''मैंने आप से ऐसा कब कहा ? आप तो फिर भी बहुत अच्छे हैं, कुछ लोग तो यहां ऐसे हैं, जो आप अपने को जैसा समझते हैं उससे कई गुना ज्यादा खराब हैं । अब मैं आपसे क्या बताऊँ ?''
वनमाला क्या कहना चाहती थी ? किसकी ओर इशा रा करना चाहती थी ? मैं समझ नहीं सका था । जहां तक मैने देखा था, उससे लोग चिढ़ते ही थे । मेरे ही ताल्लुकात उससे सबसे जुदा और खुले थे, जिसमें प्यार-मोहब्बत की बातें होती थीं । मुझे ऐसा लगता कि उस चित्रकार का ध्यान तो वनमाला की ओर कम था, पर वनमाला के मन में ही उसके लिये ललक ज्यादा थी । काम के प्रति लापरवाह और गैर-जिम्मेदार उस छैला ने एक बार परीक्षा की ड्‌यूटी के दौरान ही हमारे कमरे में आकर पूछा था । पूछा तो क्या, महज कहा ही था-
''मुझे चाय पीने की इच्छा है । जरा गुमटी से चाय पीकर आता हूँ।''
परीक्षा का कमरा अपने साथी के जिम्मे छोड़ टहलना-घूमना और अलस्सुबह चाय या नाश्ता ढूंढना उसकी आदत में शुमार था ।
वनमाला ने कहा था- ''चाय पीने की तो मेरी भी इच्छा हो रही है ।''
उस छैला ने कहा था- ''चलिए आप भी, पीकर आते हैं ।''
तब वनमाला शायद मेरा लिहाज कर चुप्पी साध गई थी । उसके बाहर निकलते ही वनमाला ने मुझसे पूछा था- ''मैं भी साथ हो आऊँ क्या ?''
मैंने इतना ही कहा- यह गैर-जिम्मेदारी है कि कोई परीक्षा के कमरे से इस तरह ठेले पर चाय पीने सड़क पर जाए । तुम परीक्षा-अधिकारी हो । तुम्हारा जाना क्या अच्छा लगेगा ?'' वनमाला के दोहरे मन को मैं पढ़ रहा था । आखिर चाहकर भी वह नहीं जा सकी थी ।
एक और बार मेरी मोहब्बत भरी बातों को टालती उसने बुदबुदाया था- ''नहीं, आप समझते नहीं । वे आ रहे होंगे ना ।''
जिस दिन की यह बात है, उस दिन उस छैले और आम लोगों के आने का समय हो रहा था । क्या वनमाला का इशारा इसी खास व्यक्ति की ओर था ?
मैने सोचा कि वनमाला के 'बुरे लोग' का क्या मतलब था ? क्या कोई उसे सीधे-सीधे संभोग के लिए प्रेरित कर रहा था । मुझे संदेह हुआ । कभी-कभी चीजें जैसी होती हैं, उसके ठीक उल्टे दिखाई पड़ती हैं । बाहर बर्फ की ठंडी, ठोस, लादी हुई चट्‌टान ; लेकिन अंदर बाहर निकलने को बेताब उद्‌दाम ज्वाला । वनमाला के अंदर भी वैसी ही उद्‌दाम ज्वाला तो नहीं छिपी थी ?
एक और रोज प्रशिक्षार्थियों की कापियां जांचती उसने मुझसे किसी और की शिकायत की । यह व्यक्ति तबादले पर उसके विभाग में साल-दो साल हुए आया था । वनमाला ने कहा- ''यह आदमी मेरी चापलूसी करता मिनमिना रहा था कि अगर उसके भतीजे की कापी आई हो, तो मैं जांच में नंबर बढ़ा दूं ।''
यह व्यक्ति और इसके विषय के बहुतेरे लोग ट्‌यूशन करके पैसा कमाने, शेयर का कारोबार घर में करने और किसकी कापी कहां गई है, यह जानकारी हासिल करके छात्रों के बीच दलाली करके नंबर बढ़वाने और पैसों के मोल-तोल के लिए बदनाम थे । वनमाला, मैं और दीगर लोग इनके विभाग की हरकतें जानते थे । वनमाला इस सब में लिप्त नहीं थी । उसे इन बातों से कोफ्त थी ।
मेरे यह कहने पर कि अपने विवेक से वह खुद ही सोचे, वनमाला ने कहा था- ''इसीलिए तो मैं आप से पूछ रही हूँ। क्या मुझे इसकी मदद करनी चाहिए ?'' आगे उसने खुद बताया - '' हालांकि उस परीक्षा और रोल नंबर की कापी मेरे पास आई है , मैने तो उससे कह दिया है कि मेरे पास उस परीक्षा की कापियां नही हैं । मैं इसका कहा क्यों मानूं ? ये धंधेबाज है, पैसा कमाता है और यहां चापलूसी कर रहा है । मैंने तो इससे झूठ बोल दिया है । मैने नंबर बढ़ाना भी नहीं है ।''
न जाने क्यों भोलाबाबू से भी वनमाला को चिढ़ थी । आखिर वनमाला कहना क्या चाहती थी ? उसके सब से ज्यादा निकट और चहेता मैं ही था, जिससे उसकी पटती थी । वनमाला का प्रशंसक शायद ही तब कोई रहा हो । तब क्या वनमाला का सोचना उसके अपने ही दिमाग की उपज थी, जो इसलिए सामने आ रही थी कि वह अपने को ज्यादा काबिल समझती थी ? क्या इसीलिए वह इन घटिया लोगों को तरजीह नहीं देना चाहती थी ? क्या वनमाला की इसी उपेक्षा और अकड़-भरे स्वभाव से लोग उसके आलोचक थे । वैसा था तो मैं भी, लेकिन तब क्यों सारी महिलाएं, लगभग सारा स्टॉफ मेरी इज्जत करता था । न जाने वे कौन से कारण रहे होंगे कि लोग वनमाला को नाकाबिल, उपेक्षणीय समझते थे और मेरा उसे तरजीह देना उन्हें नहीं भाता था । बहुतेरे मुझे इशारों में संकेत भी करते कि उस वनमाला में क्या है, जो में उसे देता तरजीह देता हूं ?
सारा कुछ देखते-बूझते भी वनमाला मुझे दिनों-दिन आकर्षित कर रही थी । मैं उसके प्यार में पागल हुआ जा रहा था । निश्चित ही बुद्धि और समझ दोनों में औरों से वह बहुत आगे और मेरे करीब थी । उससे हर विषय, हर पक्ष पर भावना और बुद्धि की इतनी बातें मेरी होती थी कि मैं हर बात में उसकी तारीफ करता था । वनमाला और मैं जैसे एक दूसरे का स्वप्न थे । हम दोनों एक-दूसरे को अपना पूरक मान अपने संबंधों पर गर्व करते थे । वह नहीं चाहती थी कि मैं कभी किसी और को अपने नजदीक रखूं या उसे छोड़ किसी की तारीफ करूं । यह एक स्वतः-स्फूर्त संबंध और दिलो-दिमाग का राजीनामा था कि हमारे समतुल्य खुद हमारे अलावा कोई और हो ही नहीं सकता था । इसीलिए मेरा या उसका एक-दूसरे से छीना जाना न उसे पसंद था, न मुझे । लेकिन तब भी यह रहस्यमय था कि वनमाला आखिर मेरी तरह साफ और बेझिझक किसी निष्कर्ष पर कभी क्यों नहीं पहुंच पाती थी । एक तरफ अपने घर की जिंदगी से मुक्ति की छटपटाहट और मुझ से दिल लगाने की चाहत वनमाला में थी । फिर दूसरी तरफ दैहिक संबंध और संभोग के नाम से चिड़चिड़ाहट, उदासी भरी अन्यमनस्कता भी थी । आखिर वह ठीक-ठीक क्या चाहती थी ? वनमाला को समझ पाना मुश्किल था । ठीक मौका आने पर वह सिकुड़न भरा माथे का पशोपेश , चेहरे पर उभर आई गंभीर उदासी, और अनमने भाव से भरी कहीं दूर अज्ञात में खोई जाती वनमाला की पीड़ा भरीदृष्टि- इन सब में क्या था ?
अक्सर मुझे संदेह होता कि कहीं गहरे अतीत में उसका कोई भयानक अनुभव तो नहीं था ? क्या ऐसा हो सकता है कि किशोरवय में ही घर या बाहर के किसी परिचित ने उससे अप्रत्याशित और बलात्‌ संभोग की चेष्टा की हो, जिससे वह अचानक दुचित्ता, मनोरोगी औरत में तब्दील हो जाती थी । मानो यह उसका वह रहस्य ही था, जिसका तिलस्म मुझे और अधिक उसकी ओर खींचता था । मैं उसे तोड़ना चाहता था, समझना चाहता था। वनमाला को मैं उसकी संपूर्णता में ,उसके मन और देह के साथ हासिल करना और भोगना चाहता था ।
हम दोनों के बीच यूं ही लुका-छिपी चलती रही । मैं आतुर था कि एकबारगी हम दोनों खुल जाएं । मैने ठान लिया था कि जो भी हो, सारी बातें दिल की कहकर वनमाला को मैं अपने पास खींच लाऊंगा । इधर संस्था का माहौल ऐसा था कि खोजी निगाहों और कामकाजी वातावरण में दिल की बातें बहुत फुरसत से हो न पाती थीं। उधर वनमाला का घर ऐसा कि हमेशा भय और आशंकाओं को दावत देता नजर आता । मुसीबत ही मुसीबत थी। राह निकालना कठिन था।

बाबा रे, इतना प्यार कि बूढ़ी हो जाने पर भी न छोड़ोगे

''बाबा रे, इतना प्यार कि बूढ़ी हो जाने पर भी न छोड़ोगे । मुझे मार डालोगे क्या ?''
सारा कुछ तो आप कह देते हैं और मैं जान लेती हूं ।
प्यार की चिठि्‌ठयों से क्या फायदा ?''


वे दिन नए वेतनमान के लिए आंदोलन के थे । धरनों और जुलूसों का माहौल था। इलाके के अलग-अलग हिस्सो में बारी-बारी सामूहिक धरने का कार्यक्रम तय हुआ था। उन दिनों मैं अपनी यूनियन का रसूखदार लीडर था । वनमाला को मैंने राजी कर लिया था कि इलाके के तयशुदा दूरस्थ संस्थान के बाहर पहले दिन ही वह, मैं और नीलांजना धरने पर बैठेंगे ।
वनमाला से उस सुबह फोन पर मैंने बात की थी- ''मैं तुम्हारे यहां पहुंचूंगा, तुम वहीं नीलांजना को भी बुला लो, साथ चलेंगे ।''
उसने पहले तो खुशी में 'हां' कह दी, लेकिन तुरंत बाद जैसे कुछ सोचा हो, कहा कि ''नहीं, मेरे घर आना ठीक न होगा । आप पहुंचियेगा, मैं भी सीधे पहुंच जाऊंगी । वनमाला को अवश्य यह अंदेशा था कि मेरे वहां पहुंचने और मेरे साथ उसके जाने से घर में बवाल मच सकता है ।
मैं खुश था कि बाहर हमें साथ रहने, पास आने और जी भर निर्भय बातें करने का अच्छा अवसर रहेगा । वनमाला मेरी खुशी में शामिल थी । ठीक समय पर किस्मत ने धोखा दिया । इच्छा के विपरीत मुझे प्रतिनिधि के रूप में इस बार दिल्ली जाना पड़ा । मैंने वनमाला को उसके घर फोन करके अपनी मजबूरी बता दी थी और कहा था कि लौटते ही हम मिलेंगे । मैंने कहा था कि उससे दूर रहकर मुझे उसकी याद बेचैन करती रहेगी ।
मैं चला तो गया था लेकिन वनमाला की यादें थीं कि चौबीसें घण्टे बेकरार करती थीं । चिटि्‌ठयां लिखता वनमाला के नाम और हर चिट्‌ठी अधूरी लगती ।ट्रेन में, प्रवास पर मैंने उसे याद कर अनेक चिटि्‌ठयां लिख डालीं । अब मेरे मन को रेल से उतरकर बोरिया-बिस्तर सहित वनमाला के पास पहुंचने की बेचैनी थी । तीन दिन बाहर रहकर लौटा तो बजाय अपने घर जाने के ठीक उस सब-स्टेशन पर उतर पड़ा, जहां से हमारा संस्थान करीब था । नजरों की यह चाहत लिये कि शायदवह मिल जाए, उसकी एक झलक देख लूं धड़कते दिल से मैं कॉलेज पहुंचा ।

मैंने कल्पना की थी कि ठीक उसके निकलने से पहले मैं पहुंचूंगा और उससे आंखें चार होंगी, लेकिन व्यर्थ । मैंने उसे ढूंढ़ा पर वह न मिली । हमारे पास साथ बैठने टाइम-टेबिल कमिटी के काम का बहाना भी था। पता लगा कि वनमाला नहीं आई थी या आकर चली गई है, वगैरह । अगले दिन सुबह-सुबह दोगुनी बेचैनी में भागता नौ बजे मैं कॉलेज पहुंचा । एकांत हो, इसलिए प्रिंसिपल के बड़े कमरे में जो अलग-थलग और खाली था, कोने की वर्क-टेबिल पर कागज फैलाए मैं जम गया था । सुबह-सुबह भीड़ न होने के बावजूद औरों के सामने वनमाला को चलकर साथ बैठने के लिए कहकर अपनी आतुरता व्यक्त करने की बजाय मैंने नीलांजना से संदेश भिजवाया कि फुरसत मिलते ही वनमाला मेरे पास आ जाए । टाइम-टेबिल को अंतिम रूप देना है ।
मैंने देखा दो कमरों के बीच के द्वार पर परदे से झांकती वनमाला प्रकट हुई । उसका चेहरा खिला था । उसने कहा कि नीलांजना से आपका संदेश मिल गया था । वह मेरे सामने बैठ गई । मैंने उलाहना दी।
''वनमाला कल दिल्ली से लौटकर बजाय अपने नगर पहुंचने मय सरो-सामान मैं बीच के अपने इस अपने उपनगरीय स्टेश न पर ही उतरा और सीधे यहां आया कि अपनी प्रिया की एक झलक देखॅूं, लेकिन तुम मिली नहीं ।''
उसने कहा ''कल तो मैं आई ही नहीं थी ।''
फिर अंदर ही अंदर खुश होती लेकिन चुलबुली शिकायत में वनमाला ने आगे कहा- ''आप यूं ही मुझे खुश करने कह रहे हैं । मुझे भला आप क्यों याद करने लगे ? अपनी ड्‌यूटी लगाने आप आ गए होंगे और बहाना मेरा बना रहे हैं ।''
मुझे बुरा लगा । उसकी आंखों में डूबता मैं बोला-
''प्यारी वनमाला यूं अविश्वास करके, मुझे दुःखी करके तुम्हें खुशी होती है ? फिर पूछा ''बताओ उस दिन 'हां' कहकर तुमने अपने घर आने से फिर मना क्यों कर दिया ?''
''जिस लिए आप घर आते वह तो रोज यहीं हो जाता है । मेरा चेहरा तो यहीं आप देख लेते हैं, घर आकर ही क्या करेंगे ? वहां इतनी सुविधा रहती ही कहां है ''
वनमाला ने आगे कहा- ''मेरे मिस्टर बीमार थे, तब आना था । तब क्यों नहीं आए ? बाद में आप के आने से वो क्या समझते ? यही कि मैं बीमार पड़ा तो याद नहीं आई और इसे देखने ये जब भी हो मेरे घर चले आते हैं । आप सोचते थोड़ा भी नहीं ।''
मैंने बताया कि मैं तो जाना चाहता था, लेकिन भोलाराम ने मेरी इच्छा जानते ही बड़े साहब के सामने टोक दिया कि क्या करोगे जाकर बिना बुलाये ? फालतू वहां क्यों जाते हो ? मैने वनमाला से पूछा- ''तुम्हीं बताओ मैं क्या करता ?''
मेरी कमअक्ली पर वनमाला का मन जरूर तरसा होगा । उसने मन ही मन कहा होगा- ''मेरे करीब रहना चाहते हो और, तरकीब भूल जाते हैं ।''
हम दोनों के बीच चंद बातें हुई । मैने उसे बताया कि किस तरह मैं उसे हर-पल याद करता रहा । हर-पल किस तरह वह मुझे बेचैन करती रही । हंसकर वह बोली ? ''रहने दीजिए, आप झूठ बोलते हैं ।''
वनमाला ने कहा- ''बताइये क्यों बुलाया है ? स्टाफ-रुम में अनुराधा मैडम बैठी हैं । सोचती होंगी कि न जाने आप के साथ मैं यहां क्या कर रही हूं सूने में ।''
हंसते हुए मैने भी जवाब दिया- ''क्या करूंगा तुम्हारी याद के सिवाय । टाइम-टेबिल तो बहाना था, दिन-रात बैठा तुम्हें प्रेम-पत्र लिखा करता हूं ।''
''झूठ'' उसने कहा। ''मुझे क्यों कोई प्रेम-पत्र लिखेगा । मैं अब प्रेम-पत्र लिखने लायक कहां रही ? दो बच्चों की मां, अधेड़ । मुझमें अब वो बात कहां कि आप प्रेम-पत्र लिखें ।''
''अच्छा ! कहां है दिखाइये।'' वनमाला के कहने पर मैंने वह खास खाकी सरकारी पुराना लिफाफा उठाया और उसे वे पांच पत्र दिखाए जो उसके लिए ही थे ।
उसने केवल एक झलक देखकर ही जान लिया कि मैने सच बात कही थी । उसका चेहरा सुर्ख हो चला था । झिझकते हुए मंद स्वरों में उसने कहा- ''रहने दीजिए न इन्हें । सारा कुछ तो आप कह देते हैं और मैं जान लेती हूं । प्यार की चिठि्‌ठयों से क्या फायदा ?''
उसने उठने की आज्ञा चाही और चल पड़ी । मैंने पीड़ा भरी शिकायत उससे की -''वनमाला तुमसे कुछ छिपा तो है नहीं । ये अदा तुम्हारी पुरानी है । ठीक है तुम्हारी मर्जी नहीं है तो रहने दो । मन तुम्हारा है । मेरा तुम पर क्या हक है कि तुम्हें मजबूर करूं ।''
वह ठिठकी, मेरी आंखों की उदासी को उसने पढ़ा और कहा- ''आप से मैं क्या कहूं ? मेरी मजबूरी तो आप समझते नहीं ।''
''वनमाला मैं सब समझता हूं, लेकिन तुम जैसी भी हो, जो भी हो, मेरा मन तुम पर मरता है । तुम अधेड़ हो, बूढ़ी हो जाओ, तब भी मैं तुम्हीं पर जान देता रहूंगा ।''
वनमाला हंसकर बोली- ''बाबा रे, इतना प्यार कि बूढ़ी हो जाने पर भी न छोड़ोगे । मुझे मार डालोगे क्या ?''
वनमाला ने मेरे हाथ से लिफाफा ले लिया । मैंने आग्रह किया कि वह यहीं पढ़ ले, लेकिन वह बोली- '' मैं फुरसत से पढ़ूंगी। यहां पढ़ने में देर हो जाएगी ।'' मैंने आगाह किया कि याद रखना, यह मेरे और तुम्हारे बीच की बात है, सार्वजनिक नहीं । संभालकर रखना ।''
''मैं जानती हूं । निश्चिन्त रहिए । कोई भी नहीं देखेगा । फिर यूं भी इस लिफाफे पर शासन के सचिव का पता लिखा है । पुराना है इसलिए कोई न पूछेगा ।''
कुछ देर बाद एकांत से रुखसत हो मैं स्टाफ-रुम में पहुंचा । मैंने देखा कि अनुराधा के बगल में ही कुछ दूरी लिए वनमाला बैठी थी । दूर से ही मुझे अपने अक्षर और कागज पहचान में आ रहे थे, जिन्हें वनमाला पढ़ रही थी । मुझे आया और देखता जान वनमाला ने झटपट कागज लिफाफे में डाले और थैलानुमा पर्स में उसे रखकर चल पड़ी ।
उसके जाने के बाद अनुराधा ने अर्थपूर्ण नेत्रों से मुझे देखते कहा- ''प्रियहरि, मुझे आप से कुछ कहना था। मैं बाद में कहूंगी ।''
उसका कहना ही काफी था । मैंने अनुमान लगा लिया कि माजरा क्या होगा ? जरूर वनमाला ने अपने गर्व में चुहल से अनुराधा को वे पत्र दिखाए होंगे या खूबसूरत अनुराधा को जलाने वाले अंदाज में अपने जादू की बात छेड़ते व्यंग्य के अंदाज में कोई संकेत किया होगा। मैं समझकर भी चुप रहा . औरत की आदत ही ऐसी होती है . ज़रा सी तारीफ आशिक के मुंह से निकली नहीं कि वह अपने को अखबार बनाए अपनी संगिनियों के बीच फ़ैल जाती है.



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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

Post by Jemsbond » 28 Aug 2017 09:48



संबंध क्या हैं ? स्मृतियां ही तो संबंध हैं।
वही पुल बनाती है - दो दिलों के बीच ।

रिश्तों और विश्वास का एक नाजुक धागा था, जो विपरीत परिस्थिति में भी हमें जोड़े रखता था।



अगले दिन वनमाला और मैं अकेले ही कमरे में थे । उसकी मुद्रा गंभीर थी । मैंने पूछा- ''वनमाला पत्र पढ़ लिए । उसने कहा- ''मैने एक ही पत्र पढ़ा, आगे हिम्मत न हुई । बाप रे ! मैं तो उसे ही पढ़कर बेचैन हो गई । न जाने कैसा-कैसा लगने लगा । आप ने क्या-क्या शिकायतें लिख दी हैं । मैने आप का क्या बिगाड़ा है, कब भला आप का अपमान किया है ?''
मेरे पत्र निहायत व्यक्तिगत और आत्मीय थे । वनमाला से वनमाला के मूड, अकल्पित व्यवहार अपनी दीवानगी और उसकी बेरुखी की जिन शब्दों में मैंने शिकायत की थी, वे बेचैन कर देने वाले ही थे । सच कहूँ तो यह कि आशिक की सफलता ही उस तरकीब में छिपी होती है जो मासूका को बेचैन करती पिघलाकर रख दे. यानी मैं सफल हो चुका था. ईमानदारी से सारे पत्र वनमाला ने मुझे लौटा दिए ।
अनुराधा से बाद में मैंने टोहना चाहा कि आखिर वह कौन सी बात है, जो वह कहना चाहती थी, लेकिन वह टाल गई । अपने मन का संदेह मौका देख काफी दिनों बाद एकांत पा वनमाला के सामने मैंने रख दिया । मैंने पूछा कि क्या मेरे वे पत्र तुमने अनुराधा को दिखाए थे या उस पर उसने कोई चर्चा की थी ?
मुझे वनमाला पर संदेह था, जो अकारण नहीं था । मैंने पूछा कि क्या तुमने आपस की बातें कभी भोला से भी कहीं थीं । परीक्षा के दौरान भोला का बीच में आना और वनमाला की सफाई कि 'इनके कहने पर तो खासतौर मुझे उनके साथ मत रखा कीजिये' मुझे याद थी ।
वनमाला ने आश्वस्त करते हुए गंभीरता से कहा- ''आप बेकार संदेह क्यों करते हैं ? मैं न अपनी बातें किसी से बताती हूँऔर न कभी बताऊँगी ।''
उस दिन मैंने फिर वनमाला को समझाया- अपने मन की पीड़ाएं उससे कही । हम दोनों के बीच उस दिन विश्वास में वादा हुआ कि एक-दूसरे पर हमारा विश्वास गोपनीय और सुरक्षित रहेगा । हमारे विश्वास के बीच कोई कभी नहीं आएगा । अकेलेपन की आत्मीयता में वनमाला सदैव की तरह अपनी उदासी, पशोपेश और चेहरे पर उभर आए तनाव के साथ इसी तरह पेश आती थी । उसकी विचित्र मुद्रा और गंभीर रहस्यमयता को समझना कठिन था ।
वनमाला के साथ मेरा संबंध विश्वास और अविश्वास, प्यार और विग्रह के बीच झूल रहा था । उसके बदलते स्किजोफ्रेनिक मूड से मैं अक्सर परेशान हो जाता । उसके होठों पर मुस्कुराहट ईद के चांद की तरह ही दुर्लभ थी । यह मेरे चित्त के लिए एक समस्या और शोध का विषय बन गया था कि हमेशा परेशान, गंभीर, उदास और चिड़चिड़ी वनमाला से मैं कैसे पेश आऊँ ? मन को मारता कई बार मैं सोचता कि जिस संबंध का भविष्य ही नहीं नजर आता उससे मैं दूर क्यों नहीं हो जाता । तब मेरा मन मुझे समझाता कि वनमाला की अपनी समस्याएं हैं । स्त्री की अपनी विवशताएं और जटिलताएं होती हैं । वह घर से उदास है - ठीक तुम्हारी ही तरह। उसमें मुक्ति की वह छटपटाहट भी है, जिसके पीछे स्वतंत्रता के स्वप्न हैं-ठीक तुम्हारी तरह । उसे समझाने और मनाने, साथ देने की जगह केवल इसीलिए छोड़ जाना कि तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं, क्या अन्याय नहीं होगा ? इसके अलावा यह भी कि जब-जब निराश मैं उससे दूर होने की कोशिश करता, अचानक एकांत के ऐसे पल आ जाते, जो वनमाला के साथ का मीठापन, विश्वास और आत्मीयता फिर से भर जाते थे । सच तो यह है कि परिस्थितियां ऐसी ही थीं, जिसमें न हम पास आ पा रहे थे और न दूर जा सकते थे । रिश्तों और विश्वास का एक नाजुक धागा था, जो विपरीत परिस्थिति में भी हमें जोड़े रखता था।
वनमाला से फुरसत में अपनी बात कहने या अपने दिल का शिकवा जाहिर करने की हरचंद कोशिश मेरी होती । वनमाला की यह खासियत थी कि घर के झंझटों और झगड़ों को वह कभी उजागर नहीं करती थी । पूछो तो यह कहकर टाल जाती कि छोड़िए न, जो होना है होता रहना है । घर के मामले मैं संभाल लेती हूं, कोई खास बात नहीं है । फिर भी ऐसे क्षण यदा-कदा आते जब वह अपनी मजबूरियों पर खीझती कहती- ''आप का क्या है । यहां थोड़ा सा काम है । आप मजे से लिखते-पढ़ते और मोहब्बत फरमाते हैं, मुझे तो पहर हुए उठना पड़ता है । फिर हर चीज में खोट निकालने वाले अपमानित करने वाले मिस्टर के लिए नाश्ता बनाना, बच्चों का टिफिन बनाना, उन्हें स्कूल भेजना होता है । यहां से जाकर मिस्टर के लिए खाना बनाना, बच्चों को देखना होता है । उनकी ड्‌यूटी सुबह होने पर कभी-कभी तो यह पाती हूं कि बच्चे बस्ता लिए ताला बंद घर के सामने सूखा सा मुंह लिए मेरे इंतजार में बैठे होते हैं ।''
वनमाला अक्सर कहा करती- ''छोड़िए न मुझे । भूल जाइए आप मुझे। मेरी किस्मत में वह सब नहीं लिखा है, जो आप चाहते हैं । क्यों आप मेरे पीछे अपनी प्रतिभा और समय बरबाद करते हैं ?''
यही तो वह साधारणताएं और जटिलताएं थीं जो आम स्त्री-पुरुष की विवशताएं होती है । मैं उस पर और ज्यादा मर मिटता । वह मुझे और निकट और घर की मालूम होती । मैं भूल ही जाता कि वनमाला किसी और की पत्नी है । रुठने-मनाने झगड़ने और एक-दूसरे पर अधिकार के संबंध इस प्रकार हो चले थे कि हम यूं व्यवहार करते जैसे लाचार विवशता के क्षणों में हम पति-पत्नी के रूप में करते होते । कभी-कभी वह कह भी जाती- ''अच्छा आप तो यूं कह रहे हैं, जैसे आप मेरे हसबैन्ड हों ।''
सच भी यही था कि एक स्त्री अपने पति से जिस आत्मीयता और उस पर जैसे मन भरे अधिकार की अपेक्षा रखती है वह उसे मुझसे ही सम्पूर्णता में मिला करती थी. ऐसे ही वे क्षण हुआ करते जो उससे दूर जाते निराश मन को और अधिक तेजी से खींचकर उसके पास जा फेंकते । उसे प्रसन्न करने और रखने का मौका ढूंढ़ता मैं अनेक फितरतें करता और सोचता कि मैं चालाक हूं । बाद में पता लगता कि मेरी चालाकी मेरा उतावलापन थी। वह ऐसी भूलें कर जाती कि बनते संबंधों को बिगाड़ जाती और वनमाला को परेशानी में डाल जाती थी । प्रायः बातों-बातों में मैं वनमाला से मालूम कर लिया करता कि उसके पति की ड्‌यूटी सुबह या शाम किस शिफ्ट में चल रही है, ड्‌यूटी की शिफ्ट किस दिन बदला करती है, छुट्‌टी कब रहती है वगैरह । इससे मैं अनुमान लगा लेता कि घर पर लाइन कब साफ है । यह जरुरी नहीं था कि उसके पति की ड्‌यूटी या शिफ्ट, उसकी छुट्‌टी का नियम हमेशा मेरे अनुमान के मुताबिक हो और यहीं हादसे के बीज पड़ा करते थे ।
उस दिन भी दोपहर वनमाला को फोन कर बैठा था । दूसरे दिन वनमाला आई तो मैंने देखा कि आंखें उदास और मुंह सूजा हुआ है । वह तनावग्रस्त और गंभीर थी । स्टॉफ रुम में मैने जब प्रवेश किया तो पाया कि वनमाला अकेली ही बैठी थी । मैने देखा कि ज्यों ही मेरा पहुंचना हुआ, इससे पहले कि मैं कुछ बात करता संशोधित समय-सारिणी बनाती वनमाला ने मुझे घूरकर तेज नजरों से देखा और उपेक्षापूर्वक सारे कागज-कलम छोड फौरन बाहर निकल गई । वह नाराज थी और मैं पशोपेश में था । कुछ देर बाद वह उसी मुद्रा में लौटी और कागज-कलम झटपट बैग में डाल घर के लिए निकल पड़ी ।
उदास मन मैंने उससे इतना ही कहा- ''वनमाला, तुम नाराज़ हो न ! केवल इसीलिए कमरा छोड़ कर चली गई कि कहीं मैं तुमसे बात न कर लूं ।''
वह निकल पड़ी झटके से । उसने कहा था- ''आप चाहे जो समझ लें ।''
मैं समझ गया कि मेरे फोन के वक्त उसके पति घर पर थे । जरूर उसने शंकालु पति के दुर्व्यवहार की ज़िल्लत उठाई है । सिवाय मुंह लटकाए अफसोस करने कि मैं और क्या करता ।
संबंध चाहे अच्छे हों या बिगड़ जाएं, वे संबंध ही होते हैं । हर हालत में एक टीस तो होती ही है । संबंध क्या हैं ? स्मृतियां ही तो संबंध हैं। वही पुल बनाती है-दो दिलों के बीच । वनमाला अब मुझसे बचने लगी थी । बात या तो करती न थी, या फिर टाल जाती थी । एकांत को टाल वह स्टॉफ रुम से बाहर यहां-वहां बैठ समय गुजार लेती थी । एक जगह होते और एकांत मिलता भी तो एकाध बार अनमने मन से नाराज, शिकायत भरी आंखों से देखती और विमुख हो जाती । और कुछ न मिला तो अखबार हाथ में फैला यूं बैठ जाती कि चेहरा उसमें गुम हो जाये और मेरी आंखें उसे देख न सकें ।


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वनमाला जो बाहर है उसे न देखो,
अंदर उन पलों के एकांत में झांको और वनमाला के प्यार भरे मन को देखो ।



निराशा , उदासीनता और अवसाद से मेरा मन व्यथित था । मैं सोचता था कि ऐसे प्यार से क्या फायदा जिसका कोई अंजाम न हो और जो किसी को नाराजगी और नफरत से भर देता हो । अपना प्यार, अपनी पीड़ा मन में छिपाए मैं भी वनमाला से कटने लगा था । मन था कि दिन-रात उसकी यादों को उधेड़ता और बुनता लेकिन वह केवल वार्तालाप और उन रचनाओं, डायरीनुमा अनुभवों में होता जिन्हें वह किसी दिन किसी तरह उसके नाम कर मुझे दृश्य से हट जाना था । लेकिन कहां ऐसा हुआ ? वह तो केवल मेरे दुर्दिनों का मध्यांतर था । ऐसा कहां संभव था कि एक ही जगह, एक ही साथ हम रहें और एक-दूसरे के चित्त एक दूसरे में संक्रमित न हो । बहरहाल, उस समय मेरी स्थिति वैसी ही थी,। मन को मारे अपने निर्णय पर मैं भी कायम रहा आता । सब जानते थे, लेकिन दूसरों पर अपनी ओर से अपनी पीड़ा मैने कभी उजागर नहीं की । स्टॉफ में महिलाएं और भी थीं, वनमाला से सुंदर, सरल और खुले स्वभाव की-जिनसे मेरे सहज संबंध थे । मंजरी का जिक्र मैं कर चुका हूं, फिर नीलांजना, श्यामा, नेहा, अनुराधा, नंदिता, बाद में आई वल्लरी उर्फ गैरिकवसना, मंजूषा के बाद आई संध्या और भी आती-जाती अनेक । मेरा व्यक्तित्व, मेरी गंभीर भाव भरी खोई दृष्टि, मेरा सर्वतोन्मुखी व्यापक ज्ञान, सारगर्भित बातें, मेरी परिष कृत रुचियां, मेरा पठन-पाठन, रचनात्मक लेखन, कला-साहित्यिक-सांस्कृतिक की अपार रुचियां वैज्ञानिक सोच और कार्यप्रणाली-यह सब मिलकर ऐसी छबि बनाते थे कि मेरा साथ सबके लिए सहज आकर्षक था । यहां तक कि वनमाला के प्रति मेरे प्रशंसा-भाव और उससे मेरी निकटता से ही वे दृष्टियां प्रायः मुझे प्रश्नित करती कहती कि कहां और किस सनकी औरत के पीछे आप समय बर्बाद कर रहे हैं । मेरा पुरुष हृदय भी जाहिरा तौर पर इन औरतों को कभी-कभी अधिक तरजीह देता और उन्हें बांधे रहता था । वनमाला से नफरत के कारण नहीं, उसे चिढ़ाने और जलाने के लिए मैं वैसा करता था । पुरुष सहयोगियों में भी मैं पुराना और जाहिर तौर पर सर्वाधिक प्रखयात था । इसीलिए मुझे इज्जत दी जाती थी । वनमाला के प्रायः सभी आलोचक थे । उससे दूर रहते और मुझे दूर पा खुश होते थे । वह प्रायः सब से कटी रही । मुझसे वह खुद कहा करती थी कि मैं ऐसी-वैसी नहीं हूं, इन साधारण औरतों के साथ बैठना, बात करना मैं पसंद नहीं करती ।
वनमाला की बेरुखी के बावजूद उसका आग्रह याद कर उसे खुश रखने उसके लिए मैने लेख तैयार कर दिया था । वैसा करने में मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी थी । लेख विश्व-व्यापार के तंत्र और उसमें भारत के संकट से संबंधित था । क्या दिन और क्या रात मैंने महीने-डेढ़ महीने खूब मेहनत की और लगभग चौबीस पृष्ठों का अपना लेख पूरा किया । वनमाला का चेहरा हर पल मेरी आंखों के सामने होता। उसकी यादें हर पल मेरे लिए प्रेरणा का काम करती । मैं इतने लगन से भिड़ा रहा जैसे लेख का हर शब्द मेरे लिए वनमाला, वन्या का साकार जाप था । मेरा चित्त उसमें तल्लीन था । वह मुझे समझाता था कि वनमाला मायूस है, पशोपेश में है। तुम उसकी लाचारी को समझो कि वह क्यों वैसा करती है, जो तुम्हें बुरा लगता है । उसके मन में तुम्हारे लिए कोई मैल नहीं है । वह तो लोगों की निगाहें हैं, घर की मजबूरियां हैं, जो उसे वैसा बना देते हैं । मेरा मन मुझे समझाता कि तुम्हारे तो सब प्रशंसक हैं । तुम पुरुष हो, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ता, लेकिन उन मानसिक पीड़ाओं, तनावों, घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारियों की याद करो, जो उसे झेलनी पड़ती है । वह कहता कि वनमाला जो बाहर है उसे न देखो, अंदर उन पलों के एकांत में झांको और वनमाला के प्यार भरे मन को देखो । तुम्हारी आंखों में झांकती कुछ कह रही उसकी उन गहरी उदास आंखों को याद करो, जो तुमसे कह रही होती है कि मुझे भी तुमसे इतना ही प्यार है, जितना तुम्हें मुझसे है। लेकिन तुम्हीं बताओ कि मैं क्या करूं ? जहां तक स्मरण है वह कानपुर गई थी उस पाठ्‌यक्रम के लिए जिसमें उसे अपने लेख के पढ़े जाने की उम्मीद थी । लौटी तो बोली कि इतनी मेहनत से उतना अच्छा लेख बना, लेकिन वहां तो लेख पढ़ने-पढ़ाने का कोई जिक्र ही नहीं था ।
शायद वह मई का महीना था, जब वह गई थी । उसकी बहुत याद मुझे आती थी । हर पल मैं उसकी कमी महसूस करता था । जी चाहता था कि उड़कर उससे जा मिलूं । लेकिन हाय, कि समाज और उसकी मजबूरी, पहचाने जाने और चर्चाओं का डर उसे भी था, और मुझे भी । कितनी लाचारी थी ? मैंने बीच में एक बार उसे फोन पर बात की थी । कहा था -'' मैं चाहता हूं इसी दौरान अखबार में छपे ताकि वहां लोग पढ़े, चौंके, और उसकी प्रतिभा की खूब तारीफ हो ।''
मैंने पूछा था कि क्या उसे यह पसंद आएगा कि उसके नाम के साथ मेरा भी नाम संयुक्त रूप से लेख में हो ताकि हम दोनों को यह एहसास रहे कि हमारा साथ कितना अच्छा, नाम-कमाऊ हो सकता है ।
वनमाला ने तब बड़ी सरलता से कह दिया था- ''भला मुझे क्यों आपत्ति होगी ? मैं तो आप की एहसानमंद हूं कि इतनी बड़ी प्रतिभा मेरे साथ है । मुझे कोई आपत्ति नहीं है । अपना नाम भी दे सकते हैं ।''
उसकी स्वीकृति के बावजूद मैंने वैसा नहीं किया, क्योंकि मैं जानता था कि मेरे नाम का वनमाला के साथ जुड़ना लोगों में शक पैदा करेगा और उसका नाम पीछे रह जाएगा । तब तो नहीं, एक सवा महीने बाद लेख एक-एक कर चार किस्तों में छपा था । हर किस्त पूरे दैनिक अखबारी पेज का आधा घेरती थी ।
मुझमें जैसे वनमाला का अस्तित्व ही समा गया था । पहली ही किस्त गयी तो उसका नाम देखकर मैं यूं प्रसन्न हुआ जैसे मेरा नाम हुआ हो । हां, ऐसा था तो । उसके लिए मेरी मिहनत रंग लाई थी । जी चाहता था कि उड़कर पहुचूं और उससे लिपटकर उसकी उदास, भूरी आंखों में झांकूं ताकि हमारी खुशियॉं घुल-मिल जाएं । लेकिन मजबूरी । मैं रोज की तरह सुबह साढ़े नौ बजे पहुंचा तो पाया कि वनमाला दक्षिण में दीवार से लगी अपनी जगह बैठी है । उसकी आंखों में उदास खुशी की चमक थी, लेकिन साथ बैठी उसकी साथियों या दीगर पुरुष-स्टाफ की आंखों में कोई प्रतिक्रिया नहीं थी । अनुराधा वहां बैठी थी । उसने खीझ और शिकायत भरी एक नजर मुझ पर डाली । मुझे उम्मीद थी कि वहां चहल-पहल होगी । वनमाला को बधाइयों का अंबार लगा होगा । प्रिंसिपल उसे बुलाकर तारीफ करेगा । कॉलेज के लड़के-लड़कियां उस पर प्रशंसा से झूमेंगे, लेकिन वैसा कुछ न था । था तो केवल स्टॉफ की आंखों में झांकता एक तटस्थ भाव, जो यह बता रहा था कि वे असलियत जानते हैं । तारीफ की जगह उन आंखों में वनमाला के लिये बेरुखी, वितृष णा और नफरत भरी थी । मुझे वैसी प्रतिक्रिया अच्छी न लगी । एकांत में हम मिले तो वनमाला ने बताया था कि स्टॉफ में तो एक ने भी उससे उस बारे में बात तक नहीं की । हां, सुबह-सुबह उसे जानने वाले पारिवारिक परिचितों की कुछ ताजगी भरी बधाइयां और शुभकामनाएं घर में फोन पर मिली थीं ।
मैने वनमाला से पहले ही कहा था कि कोई पूछे तो कहना कि लेख उसने खुद तैयार किया है । उस विषय में केवल चर्चाएं मुझसे होती थीं, बहसें होती थीं। उस तरह प्रेरणा और मार्गदर्शन मात्र में मेरा सहयोग था । लेख मैंने जब उसे विस्मित करने मई में उसके जाने से पहले ही लिख और उसी के अनुरोध पर बाकायदा टाइप भी कराके तैयार सौंपा था, तभी उसने स्टॉफ में अनेक को दिखाया था । लेकिन तब भी 'अच्छा है' की ठंडी प्रतिक्रिया स्टॉफ से मिली थी, जिसमें वितृष्णा की वह मुस्कान शामिल थी जो कहती कि ''रहने दो, तुम क्या बता रही हो ? सारा रहस्य हमें मालूम है।''

वनमाला में मेरी आंखें अपार प्रतिभा देखती थीं । उसका साथ मेरे लिए प्रेरणा था और स्वप्न भी । उसके साथ मैं हमेशा चाहा करता कि काश सदैव के लिये हम साथ हों । मेरी रचनाओं में वह बसी रहे और वनमाला की रचनाएं उसके उस स्वप्न को साकार करें जो मेरी आंखें उसके लिए देखती थीं । हम दोनों इस मामले में हम-खयाल और हम-पसंद थे । तब भी वनमाला को जहां मैं प्रेरित करता कि वह निर्भय हो, खुलकर मेरे साथ आ जाए, लोगों की आलोचनाओं का जवाब दे और हमारा साथ निर्द्वन्द हो, वहां वनमाला खुद अपने को असहाय और लाचार पाती थी । उसमें आत्मविश्वास जगाने की मेरी कोशिश निष्फल हो जाती थी । वह सोचती, वैसा करने का भावुक निर्णय लेती, लेकिन घर और बाहर के दबावों से फिर टूट जाती थी ।
किस्तों पर किस्तें छपती गयीं । वनमाला मुझे देखती, लेकिन वही उदास नजरें उसमें मैं देखता । जिस लेख से उसे तारीफ और यश की उम्मीद थी, वह उसके लिए लोगों की ईर्ष्याऔर नफरत का कारण बन गया था । संदेह की आशंका को टालने उसने भय से पहले ही घर में कह दिया था कि मैं उसकी मदद कर रहा था, मैंने वह लेख उसके लिए तैयार किया था । तब भी विश्वास जीतने की उसकी आशा तब धूमिल हो जाती जब उसका पति अपनी खीझ और शिकायत से उसे प्रश्नित करता । लेखों के छपने के बाद एकाध बार कभी वनमाला के घर पर बैठा था। चर्चाओं के बीच वनमाला की तारीफ करते वक्त मैने वह सारा कुछ पढ़ लिया था, जो ऐसे मौकों पर मेरी उपस्थिति और प्रशंसा के दौरान मेरी प्रिया के पति की आंखों और उसकी भारी ऊबड़-खाबड़ आवाज में लिखा होता था ।
बाद में वनमाला ने स्पष्टत: खुलासा करते मुझसे कहा था कि- ''आप क्या समझते हैं कि मेरे मिस्टर आप से मेरी तारीफ सुनकर खुश होते हैं ? गलतफहमी छोड़ दीजिए । उस दिन जब आप मेरी तारीफ किए जा रहे थे, तब उन्हें बुरा लग रहा था और मन ही मन वे चिढ़ रहे थे । उन्हे ईर्ष्या हो रही थी। उनका बस चले तो पी-एच.डी. की बात दूर रही, नौकरी छुड़ा वे मुझे घर बिठा दें ।''




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सर्पयुग्मों की रचनात्मक रेखाकृति : मंगल-परिणय

'
'जब मैं और आप हैं तो तीसरे की जरूरत क्या ?”



वनमाला जैसी भी थी मुझे कुबूल थी । फिर भी कभी-कभी मेरा मन इस बात के लिए दुःखी होता, अफसोस करता कि अपने दबावों और दूसरों के खयालों के खयाल से मुझे अनदेखा क्यों कर जाती है । मुझे बहुत बुरा लगा जब पूरा लेख तैयार कर मैने उसे सौंपा था और वह थी कि अपने लेख पर, जाने की तैयारियों पर मेरे ही सामने चहकती हुई गैरों से बातें कर रही थी और मौन मैं उसे देखता रहा था । इतनी अवसादग्रस्त और कंजूस कि निहायत तटस्थ और सूखे धन्यवाद के कुछ शब्दों को छोड़कर, जो बड़ी जल्दी में मानों भय में परोसे गए थे, उसने कोई बात न की थी । काश, वह कभी समझ पाती कि उसके ऐसे उदास व्यवहार से मेरे मन पर क्या बीतती थी, जो उससे चौबीसों घण्टे बातें करने आतुर और उसकी एक झलक पाने आंखें बिछाए रहा करता था । मेरे मन को समझ पाने उसकी पर्वाह करने की जगह मुझसे निकटता के आभास को दूर रखने की चिंता उसे अधिक सताती थी । थोड़ी भी मुसीबत का भय उसे मुझसे दूर कर देता था । मैंने अनुभव से पाया था कि दो ही स्थितियां ऐसी होती थीं जब वनमाला मेरे साथ के मामले में सहज मूड में हुआ करती थीं । एक तो उन दिनों और क्षणों में जब उसके चित्त घर पर की अप्रिय स्थितियां और समस्याओं का दबाव न हो । दूसरे तब, जब पुरुषों खास तौर पर हमारे साथ पर गौर करने वाले मेरे और उसके वर्ग के समवयस्क कुछ पुरुष साथियों की निगाहों में वह मेरे साथ दिखाई पड़े । भोलाबाबू, उसके विभाग में चुटकुलेबाज कुटिलाक्ष, विभाग को लिफ्ट देने की बजाय औरों के साथ देखकर अप्रकट ईर्ष्या से भरा विपुल, समय-असमय स्थितियों को भाँपता और चुटकियां लेता चित्रकार वगैरह सारे इसी कोटि में थे । अन्य पुरुष साथी भी थे । वनमाला स्टॉफ में अपने को सब से अलग और काबिलतर समझती थी। इसीलिए मुझे छोड़ सारे उसके लिए प्रायः फालतू और सामान्य कोटि के लोग थे । वह मुझे मानती थी और मैं उसे। वह खुश थी कि उसके लिये मेरी चाहत और सद्‌भावनाओं ने उसकी काबिलियत पर मुहर लगा दी थी । औरतों की तो उसे खास तौर पर पर्वाह न थी । उनका मेरे इर्द-गिर्द फटकना भी नापसंद था, बात करने की बात तो दूर रही ।
कॉलेज में लिखने-पढ़ने गंभीर रचनात्मक क्रियाकलापों के प्रति प्रायः लोगों का रुझान नहीं था । दिया हुआ सरकारी काम सरकारी ढंग से ही निबटा दिया यही उनके लिए काफी था । मेरी दिलचस्पी एक ऐसी पत्रिका के प्रकाशन में थी जो कॉलेज के छात्रों और स्टॉफ की रचनात्मकता को प्रेरित और उजागर करे । प्राचार्य डॉ. नलिन जी मित्रवत और हमखयाल थे । उन्होंने मुझ पर विश्वास करके यह जिम्मा दे दिया था । मुझे पूरी छूट थी कि जिसे चाहे साथ रखूं । मुझे तो वनमाला पसंद थी । वनमाला से मैंने राय ली । मेरे साथ का हर काम उसे पसंद था । दिल-दिमाग, विचारों के तार ऐसे जुड़े थे कि किसी काम के करने ढंग, उसकी कल्पना पर बढ़-चढ़कर हम एक-दूसरे की तारीफ करते थे ।
मैने सुझाया- ''हम दोनों ही साथ रहे आए तो लोगों की निगाह में चुभेंगे । किसी तीसरे को साथ लें तो ?'' उसने दो टूक शब्दों में मुझसे कहा- ''आप चाहें तो वैसा कर सकते हैं, लेकिन मेरी शर्त यह है कि भोलाबाबू को आप ने रखा तो मैं आप के साथ नहीं काम करूंगी ।''
भोला से उसे न जाने क्या नफरत थी ? और-और नामों का खयाल मुझे आता रहा । एक-दो नाम मैंने सुझाए भी, लेकिन सहमति न मिली । वनमाला ने खीझकर कहा- ''जब मैं और आप हैं तो तीसरे की जरूरत क्या ? बेकार की बाधा ही रहेगी ।'' मैं उससे सहमत हुआ ।
जब-तब बैठते, बातें करते, रूप-रेखाएं बनाते हम दोनों ही काम करते रहे । किसी को कुछ भी लगता रहा हो, हमें पर्वाह नहीं थी । जाहिर है कि पत्रिका छपी और बढ़िया छपी । ठोक-पीटकर, सुधारकर, मनाकर हमने रचनाएं एकत्रित और संपादित की थीं । भोला का लेख मुझे ठीक-ठीक लगा था । मैंने कहा- ''इन्होंने तो उम्मीद से ज्यादा ही अच्छा लेख लिखा है ।''
वनमाला का मुंह बना- ''चोरी का काम है, तो अच्छा क्यों न होगा । खुद वे तीन लाइन नहीं लिख सकते । एक रोज आए थे । 'इंडिया टुडे' पत्रिका को मेरे यहाँ आकर मांग ले गए थे । उसी की नकल मार दी है । वह उसकी हंसी उड़ाती हुई बोली- ''ऐसे ही हैं, बौड़म टाइप के । एक रोज सुबह-सुबह डिब्बा ले पेट्रोल मांगने आ गए थे, गिड़गिड़ा रहे थे पेट्रोल के लिए ।''
मेरी समझ में भोलाबाबू के प्रति वनमाला की चिढ़ समझ से परे थी । चिढ़ का कारण यह भी शायद था कि भोला की समझ और बातें तर्क से परे, झूठी और गोलमाल होती थीं । वनमाला ही नहीं, सारे लोग उसका मजाक उड़ाते थे । दूसरे यह कि कुर्सी पर चाहे जो भी हो, भोला उसका पिठ्‌ठू हुआ करता था । उसकी ख्याति इसी रूप में थी । कई लोगों की शिकायत थी कि परीक्षाओं के कुछ रुपये उन्हें दिए नहीं गए थे । पहले ही करा लिए दस्तखत के साथ हिसाब भेजकर रुपये वह हजम कर गया था । एक रोज अपने मुंहफट स्वभाव के अनुसार मैंने वनमाला के सामने ही भोला को इसी वृत्ति के लिए फटकार दिया था । उसने वनमाला को नाराजगी से देखा था और झिड़की लगाई थी । वनमाला, नीलांजना और अन्य सभी को ऐसी शिकायतें थीं, पर मुंह खोलने से लोग संकोच करते थे ।
उस दौरान सब कुछ ठीक चला सिवाय इसके कि वनमाला की संगत और चाहत में जब-तब मैं सुबह, रात, दोपहर डरता-डरता भी घर या कॉलेज उसे फोन पर बैठता । कई बार मामला ठीक-ठीक रहता, लेकिन कभी-कभी यह फोन झगड़े का कारण बन जाता । उसका सूजा हुआ मुंह और बेरुखा गूंगापन उसका मूड मुझ पर जाहिर कर जाता था ।
पत्रिका में हमारी फोटो पृष्ठ के बीच में परस्पर आलिंगित सर्प-युग्मों की रचनात्मक रेखाकृति के साथ अगल-बगल छपी थी । जान-बूझकर मैंने वैसा नहीं किया था, बल्कि मुद्रक की वह अपनी समझ या शरारत थी । मुझसे तो किसी से ने कुछ नहीं कहा था, लेकिन जरूर उसके सामने लोगों ने इस पर चुहल की होगी । उसके घर भी उस पर तीर बरसे होंगे । पत्रिका की सफलता और उस पर गर्व तो पीछे रहे, वनमाला का उखड़ा मूड और सूजा चेहरा मेरे सामने आता था । मैंने कहीं एक रोज देखा था कि शरारत से किसी मनचले ने फोटो के ऊपर मंगल-परिणय लिखकर फाड़ फेंका था । यह अजीब सिलसिला था कि मेरे साथ से उभरती उसकी प्रतिभा मेरी छाया से ही वनमाला के लिए व्यंग्य और अपमान की वजह बनती जा रही थी । इससे पहले कि उसके होठ और उसका दिल खिले, वनमाला मुरझा जाती थी ।
रुठना और मनाना, प्यार और विग्रह हमारे बीच स्थायी नियम बन गए थे । एक रोज हम साथ बैठे काम कर रहे थे । वनमाला जानती थी कि मेरा उसके साथ बैठना काम के अलावा भी एक काम था । मैं उससे चुहल करता और मेरा मन उसे भी चंचल कर जाता । मेरी प्यार की बातों से विचलित वनमाला अपनी परिचित अदा से बोली- ''प्लीज़ नइॅं ना, ऐसे में काम कैसे होगा । मैं उठ कर चली जाती हूँ । अन्यथा न आप काम कर पायेंगे, न मैं ।''
वह जानती थी कि मैं किसी भी हालत में उससे दूर जाने वाला नहीं था । अधिकार का ऐसा आत्मविश्वास कि इस तरह मुझे दुःखी कर मजा लेना उसकी आदत बन गई थी । मैंने कहा- '' ठीक है मेरा साथ पसंद नहीं तो मैं ही चला जाता हूँ।''
मुझे उठता देख वह बोली- ''रहने दीजिए, मुझे मालूम है आप नहीं जाएंगे ।'' छेड़ की मुस्कुराहट उसके चेहरे पर थी । कहा- ''और फिर आप चले जाएंगे तो ये काम कौन कराएगा ?''
वनमाला की आंखों में झांकते मैने उदासी और क्षोभ से कहा- ''जाने क्यों मुझे चोट पहुंचा कर ही तुम्हें खुशी होती है । तुम अच्छी तरह जानती हो कि तुम्हारे बगैर में रह नहीं सकता । इसीलिये तुम ऐसा कहती हो । तुम अपनी जगह बनी रहो, मैं कभी न बदलूंगा । जो जगह मैंने चुन ली है, वहीं बना रहूंगा । मुझे ऐसा लगता है कि कुसूर मेरे प्रारब्ध के पूर्वजन्मों का है । याद रखना मेरी अंतिम सांस तुम्हारे नाम को साथ लेकर जाएगी । अगले जनम में भी ।'' वह मुझे चंचल नेत्रों और होठों की हल्की मुस्कान के साथ निहारती यूं देख रही थी जैसे उसके सामने मासूम बच्चा बैठा हो । मैं कह रहा था- ''याद रखो कि एक जनम तो क्या, अगले जनम में भी, जन्मों तक मैं तुम्हारा पीछा करता रहूंगा ।''
वह मजे लेती हंस रही थी ''अरे बाप रे ! तब तो आप मेरी मुसीबत हो जाएंगे ।''
इसी दौरान अनुराधा ने कमरे में कदम रखा । हम दोनों चुप हो गए थे । वनमाला का मुझे चिढ़ाने का मूड अभी बरकरार था । उस रोज वह खुश थी । उसके सामने प्रतियोगिता में छात्रों के लिखे निबंधों का बंडल खुला हुआ था ।
अनुराधा ने बातें करते फिर चुप होते हमें गौर कर लिया था । पूछा- ''क्या चल रहा है ?'' वनमाला ने चपल आंखों से मेरी आंखों में झांका और कहा- ''बता दूं, कह दूं अनुराधा मैडम से ?''
अनुराधा ने पूछा- ''क्या बात है ? कोई खास बात है क्या ?'' वनमाला ने शरारत से बात बदल दी । बोली- ''कुछ खास नहीं रे । ये निबंध देख रही हूँ। कितनी गलतियां करते हैं ? क्या लिखते हैं कुछ समझ में नहीं आता ।''



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क्यों-क्यों छिपाऊँ ? मैं तो इसे ऐसे ही ले जाऊँगी

तुम अपनी नाप की चप्पल छोड़कर बड़ी साइज के पीछे क्यों भागते हो ?''



नाजों और नखरों के बीच रूठने और मनाने के ढेर से प्रसंगों के बावजूद भी वनमाला उन दिनों मेरे साथ थी । जब हस्तक्षेपी और खोजी निगाहें न होती, लाईन क्लीयर होती तो यूं मौज होती जैसे सरल बच्चों की तरह हम साथ बैठ बजे कर रहे हों । परीक्षा शुरू होने के दिनों में खुद प्राचार्य नलिन जी हमारे ढाल थे । उन्हें वनमाला में कोई वैसी दिलचस्पी न थी, जैसी मेरी थी । उनकी उपस्थिति में उनके बहाने बातें करते हम एक-दूसरे की नाजुक अदाओं का जायजा लिया करते थे । कभी अखबार से चेहरा छिपाती और कभी उसके बीच से मुझे झांकती थी, कभी मजाक में आमलेट और मछली का जिक्र कर मेरे टिफिन लाने वाले प्रसंग पर चिढ़ाती वह जब भी समय निकलता मेरे साथ एकांत में पत्रिका के काम के बहाने बैठती । पत्रिका तो बहाना था बैठने का । काम तो मेरा ही था ।
परीक्षाओं के उस दौर में मैं और वनमाला प्राचार्य और भोला की अनुपस्थिति में प्राचार्य कक्ष में साथ-साथ बैठ जाते और घंटों काम करते । बीच-बीच में
'काम करना' दिखाई पड़ने के लिए इसे या उसे बुला भेजते कि एन.सी.सी. की रिपोर्ट आप ने दी नहीं है, बना कर दीजिए ,या खेलकूद की रिपोर्ट अभी तक नहीं आई वगैरह । वनमाला पर लिखी गई प्रेम कविताओं के बीच अपनी आम कविताएं मिला मैंने बाकायदा एक संग्रह बना लिया था । कम्प्यूटर से पुस्तकाकार रूप में बनी प्रतियों को मैं उस रोज बाकायदा चमकीली पन्नियों में फीते से लपेट साथ ले गया । संभवतः उस साल का वह दिन वनमाला का जन्मदिन ही था । मैंने कहा- ''आज तुम्हें मेरी पुस्तक का विमोचन करना है ।''
लजाती उसने कहा- ''मैं भला कहां इतनी योग्य कि आप की पुस्तक का विमोचन करूं ।''
''प्यारी वनमाला, मेरे लिए तुमसे बढ़कर कोई नहीं । और फिर यह पुस्तक तुम्हारी ही तो है । तुमने ही तो मुझमें समा इसे रचा है ।'' वह प्रसन्नता से दोहरी हो गई । उसने फीते खोले । एक प्रति मैंने उसे सौंपकर कहा- ''नाम लिखने से शायद गड़बड़ होगी अन्यथा मैं प्यार के लब्जों के साथ तुम्हारा नाम लिख होता । कहो तो लिख दूं ।''
''घर में देखेंगे तो मुसीबत होगी ।'' उसने कहा ।
मैने छिपाकर ले जाने की बात कही तो पूछा- ''क्यों-क्यों छिपाऊँ ? मैं तो इसे ऐसे ही ले जाऊंगी।'' संभवतः वनमाला में अपना गौरव उजागर करने की भी कामना रही होगी । फिर बोली- ''अभी रहने दीजिए मैं बाद में यहीं ले लूंगी और पढूंगी ।''
उसी दरम्यान परीक्षाओं में नकल के मामले जांच रही उड़नदस्ता की टीम आ गई थी । सभी मित्र थे । अनन्त ने हमें देख लिया था । वापस घर लौट चलने के उसके आग्रह पर मैंने हिचक दिखाई थी । अनंत ने जैसे मामला भाँपते हुए कहा था- ''अरे छोड़ो आज बहुत हो गया । अब मैडम के साथ कल बैठ लेना ।''
मैंने वनमाला से बात की और सामान समेट जीप की ओर बढ़ा । वनमाला भवन के मुख्य द्वार से बाहर निकल हाथ हिलाती मुझे विदा कर रही थी । उसने पूछा- ''कल फिर बैठना होगा । आप आएंगे ना ।'' मैंने कहा- '' हां, जरूर आऊँगा ।'' उसकी ओर निहारता उसे आंखों में कैद किए मैं चल पड़ा ।
दूसरे दिन प्राचार्य नलिनजी ने चुटकी ली ''आप दोनों कल काफी देर तक जमे रहे सुना है । लोग बता रहे थे । अब तो अच्छी पट रही है आप लोगों में लगता है ।''
उन्हीं दिनों खबर मिली, शायद उसी दिन कि भोला को परीक्षा के दौरान संस्था में उपस्थिति बताकर कहीं और कापियाँ जांचने के आरोप में निलंबित करने का आदेश हो गया है । सूचना जिज्ञासा की तरह डॉ. नलिनजी के प्रश्न के रूप में ही आई थी ।


वनमाला का मूड, उसका व्यवहार मेरे लिए रहस्यमय था । वह मुझसे मेरे एकांत में कहती कुछ थी और दिखाई कुछ और पड़ता था । सामने होने के सप्ताह के छः दिनों में से अमूनन पाँच दिन ऐसे होते जब वनमाला का चेहरा अवसाद से सूजा दिखाई पड़ता, आंखें उदासी के सूनेपन से भरीं और मूड अन्तस्थ उदासी और अदृश्य लाचारी की खीझ से भरा होता । सब से विचित्र तो यह कि अपनी ऐसी मुद्रा के साथ वह मुझी से नहीं, सारी भीड़ से कटी रहती । मैं समझ लेता कि घर में वह भूचालों से गुजर रही है । नाराजगी की छोटी सी बात हुई कि उसका आदमी मुझे लक्ष्य कर प्यार, मोहब्बत, आशिकाई के आरोपों से उसे नोच डालता होगा । जैसी वनमाला की हालत होती थी उससे मुझे संदेह होता कि उसका पति उसे मारता-पीटता भी रहा होगा । उसकी छबि मूडी, अज्ञात समस्याग्रस्त, रूखी और बेकार की अकड़ में जकड़ी औरत की हुई जा रही थी । प्रकटतः मैं ही ऐसा ग्राहक था जो सारे कुछ के बावजूद उसके पीछे भागता था । सब कुछ देखते और जानते हुए भी न जाने कौन सी अज्ञात प्रेरणा थी, जो उसे रहस्यमयता से और ज्यादा मुझे बॉंधती थी । वह मेरी नियति बन गई थी और मैं उसके पीछे भागता जा रहा था । कई दफा हमारे बीच घट रहे को लक्ष्य कर, विशेषत: मेरी मायूसी को लक्ष्य कर लोग आश्चर्यपूर्वक मुझे देखते और समझाते थे कि क्यों बेकार में मैं उसके पीछे अपना समय बर्बाद कर रहा हूं ।
एक बार स्टॉफ-रुम छोड़कर जाती मुंह फुलाई वनमाला को मैंने रोकना चाहा था- ''रुको, तुमसे कुछ बात करनी है ।'' वनमाला मुझे अनसुना कर बगैर रुके चली गई थी। तब वहां अनुराधा मौजूद थी। स्टाफ केऔर अनेक लोग भी साथ बैठे हुए थे। वनमाला का बेरुखा रवैया देख भोलाबाबू ने उन सब के बीच मजाक में टिप्पणी की थी- ''छोड़ो यार उसको । जब वो तुमसे बात नहीं करती, तो बेकार क्यों तुम पीछे पड़े हो उसके । तुम अपने साइज की ढूंढो न ?'' अनुराधा की ओर इंगित करते उसने कहा था- ''जो तुम्हारे लायक है, उससे तुम क्यों नहीं संबंध रखते । ये ठीक है तुम्हारे लिए।''
मुझे नहीं मालूम कि भोला का का आशय क्या रहा होगा ? उसकी बातों में कुछ-कुछ तो आपसी वृत्तियों और योग्यता की तालमेल की बात दिखाई पड़ती थी फिर कुछ-कुछ ऐसी भी, जिसमें कद-काठी और स्त्री-पुरुष जननांगों के तालमेल का संकेत था । उसने कहा था- ''तुम अपनी नाप की चप्पल छोड़कर बड़ी साइज के पीछे क्यों भागते हो ?''
कभी-कभी बहुत गंभीर और विवादजनक बातें भी भीड़ के वातावरण को अनछुई छोड़ जाती हैं । उस दिन वैसा ही हुआ अन्यथा बहुत बड़ा बवाल उठ खड़ा होता । मैंने अनुराधा पर गौर किया था । निश्चय तो उसने उसे सुना और समझा था, पर कहा कुछ नहीं । भोलाबाबू प्रायः विवादों से दूर रहता था, लेकिन दोस्ती में इस तरह की संबंधित टिप्पणी यदा-कदा फेंक दिया करता था । वनमाला से सभी की खुन्नस थी, इसलिए जाहिर है कि वह टिप्पणी मेरे पक्ष में और सद्‌भावनापूर्वक थी । उसमें यथार्थ का निश्चित संकेत तो था ही, जो बहुत समय के गोपन, गहरे निरीक्षण के बाद अचानक यूं व्यक्त हो उठा था ।



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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

Post by Jemsbond » 28 Aug 2017 09:49



न जाने किसी को इमोशनली एक्सप्लाइट करके उन्हें क्या मिलता है ?


''आजकल मैं देखती हूं कि कुछ औरतें आदमियों से भी आगे निकली जा रही हैं ।
न जाने किसी को इमोशनली एक्सप्लाइट करके उन्हें क्या मिलता है ? मुझे तो ये बिलकुल अच्छी नहीं लगता ।'' अनुराधा



मेरी आंखों के सामने दो छबियां थीं। कहां जीनत थी और कहां यह कहां वनमाला ? एक इतनी साफ और सरल कि जिसे समझने की उलझन ही न थी। दूसरी यह जिसे उलझनों के बीच से गुजरकर भी समझना मुश्किल है। अनुराधा मेरे करीब बाद में आई थी। उसको पहली बार मैंने वर्षों पूर्व तब देखा था, जब वह कहीं और हुआ करती थी । यूनिवर्सिटी के कला भवन के दरवाजे पर आंखों को चुंधियाती पहली झलक मेरी आंखों में अब भी बसी है । फिर ऊपर उस हाल के बाहर उसे मैंने पाया, जहां कापियां जांची जा रही थी । चुस्त एन.सी.सी. आफिसर की वेशभूषा में उसकी जवानी का सौंदर्य समाया न पड़ रहा था । जैसे मेरी निगाहों के सामने सुंदरता की देवी आ खड़ी हो । जिसकी ओर भोलाबाबू संकेत किया था, वह अनुराधा बहुत अधिक सुंदर थी । नैन, नक्श जैसे यत्नपूर्वक तराशे हुए, ललचाते गुलाबी होंठ और उनके बीच लहराते, मोती की आभा को मात देते दॉंतों की चमक । उसका पूरा बदन गुलाबी आभा से चमक रहा था । चेहरे पर ऐसी ताजगी जो निगाहों को तरोताजा कर दे । उभरे हुए नशीले उरोजों के साथ चपल मुद्रा और चंचलता की ऐसी तरंग जो मानों सारे वातावरण को अपनी सम्मोहता से भरता, उससे बचने की चुनौती दे रहा था । काया छरहरी, कद मुझसे दो इंच छोटा, पर्मिंग किये यत्न से संवारे सुंदर उसके सुनहरे कत्थई बाल जो देख-रेख की नियमित साज-संभाल से हमेशा आकर्षित करते थे ।
भाषा, साहित्यक और रचनात्मक कलाओं के प्रति उसकी बारीक रुझान, स्वभावजन्य सौजन्य और विनम्रता-सारा कुछ ऐसा कि अनुराधा सभी के लिए आकांक्षा और आकर्षण का केंद्र थी । ऐसा भी नहीं कि वह मेरे प्रशंसकों में नहीं थी । वनमाला की तरह उसमें भी यह अहसास था कि वह विशिष्ट थी । आलतू-फालतू आम स्टॉफ के लोग उसे नापसंद थे, जिन्हें तनखवाह के काम की खानापूरी और चालू पाठ्‌य-पुस्तकों के अलावा कुछ सरोकार न था । अनुराधा मुझसे यह बात कहा करती थी और मेरी बातें मेरा गहन अनुभव, बारीक बातें उसे लुभाती भी थीं । मैंने अनेक प्रसंगों में यह अनुभव किया था कि वनमाला पर मेरा झुकाव उसे अजीब और नापसंद लगता था । विस्मय और खीझ उसकी आंखों से झांकते थे । एक बार तो वनमाला के रवैये से मुझे किंचित परेशान देख वनमाला के सामने ही उसने व्यंग्य में एक जुमला फेंक दिया था -
''आजकल मैं देखती हूं कि कुछ औरतें आदमियों से भी आगे निकली जा रही हैं । न जाने किसी को इमोशनली एक्सप्लाइट करके उन्हें क्या मिलता है ? मुझे तो ये बिलकुल अच्छी नहीं लगता ।''
उसे सुनती मुंह भुलाए गंभीर वनमाला यह सुनती बाहर निकल गई थी । फिर वैसा क्यों न हुआ जैसा भोला कह गया था ? शायद इसलिए कि चित्त और भावना से अपार सुंदरता और कोमलता के बावजूद भव्य लोगों का साथ मुझमें कहीं निराशा पैदा करता था । शायद वह हीन भावना थी, जो यह अहसास पैदा करती थी कि भौतिक सुविधा-संपन्नता से भरी भव्य, नाजुक आकृतियां भला मुझ जैसे गंभीर किताबी कीड़े , भदेस रहन-सहन और वस्त्रों वाले मुझ गरीब को क्या घास डालेगी । शायद यही रहा होगा जो मेरे सारे प्रभावों व अनुकूल वातावरण देती परिस्थितियों और इस वर्ग की कामिनियों की मुझमें रुचि के बावजूद उनके ज्यादा अंदर पैठने की मेरी आकांक्षा को दबा देता था । जीनत के मामले में मेरे साथ ऐसा ही हुआ था ।

मुझे याद आता है जीनत के साथ एकांत में उठना-बैठना, कविताओं का पढ़ना-सुनना, कविताओं सी ही स्वप्नलोकीय बातें और परम आत्मीयता का अहसास, एक-दूसरे के अभावों को महसूसने की हाय, ठंड की गुनगुनी धूप में साथ बाहर बैठ जाने और समय को पंख लगा देने वाली निजी बातों का दौर, रूठना-मनाना और चुलबुली यदा-कदा की छेड़छाड़ । जैसे अभी-अभी घटा हो सब कुछ मेरी स्मृतियों में है। कॉलेज की पिकनिक पर लड़के-लड़कियों और जीनत, नीलांजना वगैरह के साथ टीम एक आरामदेह मिनी-बस में निकली थी । मेरी अपनी कोई योजना न थी, लेकिन मुझे वहां अनुभव और साथ में अनुकूल पाकर ये ढूंढते हुए मेरे घर आ पहुंचे थे । उस समय तो पत्नी भी युवा ही थी । मनाकर तैयार कर हमें भी साथ ले चलने का आग्रह था । और इस तरह हम धार और मांडू की यात्रा पर निकल पड़े थे । रास्ते में फिल्मी अंताक्षरी और फिल्मी गानों की धूम-धाम में मैं भी शामिल था । भीड़ में भी जीनत मेरी आंखों का चुंबक थी और मेरे मन से वह अपना दिल चस्पा किए हुए मुझे हर पल विशेष बनाए जा रही थी ।
मांडू में बिही के पेड़ों और पुरानी धर्मशाला-नुमा मंदिर के बीच हमारा डेरा था । रसोई की तैयारियॉं चल रही थी कि जीनत ने मुझे टोका । जैसे अन्य साथी, मेरी पत्नी उसके लिए अनुपस्थित थे, जीनत ने मुझसे कहा- ''चलिए न, यहां बैठे बोरियत होगी, अपन कहीं टहल कर आते हैं ।''
हम दोनों भीड़ से बाहर यूं टहलते रहे जैसे साथ टहलने के लिये ही बनाए गए हों । उजड़ा सा पुराना खंडहर सा धर्मशाला-नुमा मंदिर-परिसर देखा, सूखी झाड़ियों से भरे उजाड़ खेतनुमा पठारों में टहलते रहे, निर्मल बच्चों की तरह बतियाते रहे और यूं घूम-फिर कर हम साथ लौटे थे । खाना परोसने-खाने, घूमने और बतियाने के दौरान, और फिर धार के मंदिर के परिसरों में घूमते, भीड़ के बीच और भीड़ से अलग हम यूं साथ रहे जैसे भीड़ के साथ हम नहीं, बल्कि हमारे साथ भीड़ आई हो । पुरातात्विक मंदिर के अंदर प्रवेश करने में उसे झिझक थी । वह मुसलमान थी और शायद यह भय रहा हो कि गलती से भी अगर उसके मुसलमान होने की बात वहां उजागर हो जाती है, तो परेशानी हो सकती थी । उन दिनों वैसे भी भगवान या खुदा को लेकर नहीं बल्कि खंडहर हो चले मंदिरों की मिल्कियत को लेकर राजनीति चल रही थी। कभी-कभी तो ऐसा लगता जैसे महन्तों और मुल्लाओं के झगडों से भयभीत होकर वह एक अपनी जगह छोड़कर अंर्तधान हो गया है जिसे एक खुदा के और दूसरा भगवान के नाम से पुकारा करता था। जीनत का अस्तित्व मेरे साथ जुड़ा था । हम दोनों हिन्दू या मुसलमान होने से परे कहीं उतने ऊपर थे, जहां धर्मान्धता से धुंधलाई नज़रों की पहुँच नामुमकिन थी। जीनत का भय दूर करता मैं उसे मंदिर के शिल्प की बारीकियाँ दिखाता रहा, मिथुन-रत मूर्तियां दिखाता रहा। अंदर-बाहर मेरे साथ चिपकी जीनत निसंकोच उन पलों का आनंद उठाती जिज्ञासा से उन्हें देखती और समझती रही। उसे मैने समझाया था कि मंदिर के बाहरी आवरण में तराशा वह शिल्प इस सच को

दर्शाने वाला था कि यह संसार चाहे जितना बेमानी दीख पड़े लेकिन इसी से गुजरकर वहां जाया जा सकता है जो अदृश्य और लोकातीत है। वह सपने सा झूठ होगा भी तो उस जादूगर के लिये जिसने उसे रचा है। उसके सपने का हिस्सा बने इस जगत और उसके बासिन्दों के लिये तो यह संसार ही जमीनी सचाई है। बुदि्‌धमती जीनत बहुत उदार विचारों वाली और संकीर्णताओं से कोसों दूर थी । मुसलमान कही जाती भी सुरुचि-संपन्नता, स्वभाव और संस्कृति में हजारों-हज़ार हिन्दू स्त्रियों से वह बेहतर थी । इतनी कि उसे पाकर मुझ सा कोई भी हिन्दू अपने को गर्वोन्नत समझता । उस दिन पिकनिक की गाड़ी को लौटते बहुत रात हो गई थी । वह दिन मेरे लिए मादक बेहोशी का था । वह रात मेरे लिए और शायद जीनत के लिए भी गुदगुदाते स्वप्नों की थी ।
उस दिन नीलांजना भी साथ रही आई थी -सरल, सौम्य और विनीत । लंबी, छरहरी सुंदर काया जिसकी आंखों की घनी काली पुतलियॉं इतनी आकर्षक थीं कि कालिमा भी उससे फिसल कर छिटक पड़े । लेकिन नीलांजना से पारस्परिक अकृत्रिम-आकर्षण और संबंधों के बावजूद वह दिन और रात जीनत के थे । साथ के उन क्षणों में जीनत और मैं यूं जुड़े कि उसके बाद हम एक-दूसरे से जुड़ते ही चले गए थे। मेरी आंखों के सामने दो छबियां थीं। कहां जीनत थी और कहां यह कहां वनमाला ? एक इतनी साफ और सरल कि जिसे समझने की उलझन ही न थी। दूसरी यह जिसे उलझनों के बीच से गुजरकर भी समझना मुश्किल है।



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वह तसल्ली प्रियहरि का केवल भ्रम था

वितृष्णा और रोष से वह भीड के बीच चिल्लाये जा रही थी - ''जिस साली को धन्यवाद तक ज्ञापित करना नहीं आता, दो शब्द अपने मन से लिख नहीं सकती, उसे आप बीच में ले आए ?''



कुछ एक कमेटियों में खासकर अकादमिक, साहित्यिक कमेटियों में वनमाला का नाम दोनों की अघोषित रजामंदी से प्रियहरि के नाम के साथ जुड़ा था । वह खुद कला, विज्ञान और वाणिज्य की परिषदों का समन्वयक और परामर्शक था । रीमा, नीलांजना और वनमाला इन परिषदों की कार्यकारी प्रभारी थीं । औरों से प्रियहरि के संबंध व्यक्तिगत और ऊपर थे। बातें होती, विचार विमर्श होता। अदाओं के साथ सहज चुहल होती और वे मिलते बैठते थे लेकिन वनमाला की आदतों से तंग प्रियहरि उससे बात करने की अब कोशिश भी नहीं करता था। बैठकों की सूचना कागज से या फिर और किसी के जरिये भिजवा दी जाती थी।
उस एक दिन बॉस के खाली एकांत चैम्बर में सुबह साढ़े नौ बजे नीलांजना, रीमा और प्रियहरि एकत्रित थे। वनमाला को तो सुबह ही अपनी कक्षा के समय आ जाना था पर वह नहीं आई थी। वहां मौजूद सब के बीच सब-कुछ सहज चल रहा था। नीलांजना प्रियहरि के और प्रियहरि नीलांजना के साथ हमेशा सहज और प्रसन्न रहे हैं। दोनों की हर मुलाकात एक आत्मिक शांति के साथ खत्म होती थी। दोनों के कामकाजी संबंध, जो धीरे-धीरे निजी हो चले थे बगैर किसी तनाव का एहसास कराये मजे में बीतते थे। किसी भी कमेटी में नीलांजना को साथ रखा जाना वनमाला को सखत नापसंद था। इन दिनों भी वनमाला का मूड प्रियहरि की तरफ बेरुखी का इजहार करते यही दिखाने का था। वनमाला जैसे जानबूझकर देर से आई थी।
नीलांजना को कागज-कलम सौंप प्रियहरि रूपरेखा लिखवाने में व्यस्त था। बीच-बीच में आपसी बातें भी उनमे जारी थीं। दोनों की निगाहें जब-तब टकरा जाती थीं। सब कुछ ठीक चल रहा था। अचानक वनमाला प्रकट हुई। आदत के मुताबिक उसने देर से आने, बैठक की सूचना के बारे में, और इसी तरह कुछ एक बातों पर उसने आते ही टिप्पणी की थी। नीलांजना और रीमा दोनों की आंखों ने कौतुक से नाराज वनमाला की अदाएं देखीं। जैसे वे कह रही हों कि लीजिए, अब ये आ गई और अब शांति गई।
वनमाला के पूछने पर कि क्या चल रहा है, उसी की शैली में उसने जलाने निहायत तटस्थ भाव और कुछ बेरुखी लिए प्रियहरि ने उसे संक्षेप में समझा दिया। नीलांजना की ओर उसने देखा जिसकी आंखें उसे मिलीं। प्रियहरि ने कहा - ''नीला, चलो समय नष्ट न करो, आगे लिखो।''
वनमाला ने शिकायत भरी प्रश्न करती नाराज आंखों से पहले घूरकर प्रियहरि को देखा फिर वितृष्णा और उपेक्षा से नीलांजना के चेहरे पर नजर डालते उसके हाथ से रजिस्टर और कागज झटककर छीन लिए। वनमाला जैसे हुक्म दे रही हो प्रियहरि से बोली - ''आप बोलिए, मै लिखूंगी।'' उसकी वाणी में दृढ़ संकल्प था। उसकी मुद्रा अदभुत आत्मविश्वास से भरी थी। किसी में हिम्मत न हुई कि उसे चुनौती दे सके।
इस अचानक दखल से रीमा की आंखें आश्चर्य से फैल गई थीं। नीलांजना की आंखे जिनमे लाचारी भरी थी प्रियहरि की आंखों से पल भर को टकराईं। उसकी सुन्दर बड़ी-बड़ी आंखों की गहरी मायावी पुतलियों में शिकायत थी कि मेरे साथ ऐसा क्यों होता है। नीलांजना जानती थी कि उसके साथ होकर भी प्रियहरि वनमाला का था। इधर प्रियहरि नीलांजना को चाहता और उसका साथ देना चाह कर भी साथ न दे पा रहा था। वनमाला के अप्रत्याशित आतंक से सभी आतंकित और स्तब्ध थे। प्रियहरि कुछ न कह सका था क्योंकि उसके दिल ने वनमाला के दिल का गुस्सा पढ़ लिया था, जिसमें लिखा था - ''इस नीलांजना की यह हिम्मत कि हमारी अनबन में मौका देख यह बीच में सेंध मार जाये ? और प्रियहरि तुम! याद रखो, तुम पर अधिकार मेरा है। चार दिन बात क्या बंद हो गई, तुमने इसे लिफ्ट दे दी।'' जो कहना था वनमाला ने बगैर बोले प्रियहरि से कह दिया। वातावरण की असहजता के बावजूद प्रियहरि को दिली तसल्ली हुई। यानी यह कि वनमाला पर प्रियहरि ही नहीं जान देता, वह भी उस मरती है। इतना कि किसी और का उसके पास भटकना भी उसे नापसंद है।
उस बैठक के बाद फिर बैठकों की जरूरत ही न हुई। नीलांजना को वनमाला और प्रियहरि के बीच के रिश्तों का एहसास था। नीलांजना न जाने किस मिट्‌टी की बनी थी। कभी उसकी ईर्ष्या प्रगट हुई, न शिकायत। चुपचाप वह सारा कुछ देखती, सहती और अपने को पीछे खींच लेती थी। पीछे खीच लेने के बावजूद संबंध, वाणी की मधुरता, व्यवहार में कुछ बदलाव न होता हालांकि उसकी मासूम खूबसूरत आंखों में पास आने का वह पशोपेश प्रश्न की तरह अवश्य होता जो प्रियहरि को शर्मिन्दा कर जाता था। प्रियहरि के मन में कामना होती कि कभी नीलांजना भी विद्रोह कर मन में उसके प्रति छिपे उस अपनापे को प्रगट करे, जो उसके मन में था। लेकिन नहीं, वह नीलांजना के स्वभाव में भी नहीं था।
वनमाला के साथ फिर दो-तीन दिन तक बैठना-बतियाना चलता रहा और कार्यक्रमों की रूपरेखा बनती रही। प्रियहरि और वनमाला के बीच से अब रीमा और नीलांजना गायब पाई जा रही थीं। वनमाला चाहती थी कि समन्वित उद्‌घाटन होने पर भी चूंकि विभाग और विषय उसका था, वह ही मंच पर प्रियहरि के साथ रहे। शेष दोनों महिलाओं की भूमिका वहां न रहे। प्रियहरि उसे समझाता रहा कि चूंकि यह आयोजन समन्वित है, नीलांजना और रीमा की भी भागीदारी वहां रहने चाहिए। उसने समझाया कि या तो विषय का प्रतिपादन वनमाला करे और संचालन नीलांजना करे - या फिर संचालन खुद वनमाला करे, और विषय का प्रतिपादन नीलांजना को सौंप दे। वनमाला इससे रूष्ट और असहमत थी लेकिन प्रियहरि की खातिर वह मान गई थी। दोनों के बीच एक बार फिर आत्मीयता और विश्वास का रिश्ता जीवित हो चला था। उससे प्रियहरि को तसल्ली थी। लेकिन कहां ? वह तसल्ली प्रियहरि का केवल भ्रम था।


अगले दिन सुबह दस बजे प्रियहरि अपने मित्र व साथी लेकिन अफसर नलिनजी के पास कार्यक्रम की रूपरेखा और तैयारी के बारे में चर्चा करने बैठा था। वनमाला अपनी क्लास में थी लेकिन नीलांजना प्रियहरि के साथ बैठी थी। नलिनजी ने सब देखा - सुना फिर कागज पर एक जगह इशारा करते हुए कहा - ''इसे काटिए, संचालन वनमाला नहीं करेगी, आप करेंगे।''
प्रियहरि ने समझाया कि वनमाला की सहमति से यह रूपरेखा बनी है। वह अच्छी है, योग्य है इसलिए अवसर उसे ही दें और उसका ही नाम रहने दें। लेकिन नलिनजी माने नहीं। उन्होंने कहा - ''आपसे बेहतर यहां कोई नहीं है। आप नहीं काटते तो मैं ही अपनी कलम से काट देता हूँ।''
नलिनजी वनमाला के मिजाज से अच्छी तरह वाकिफ थे। बोले - ''वह कुछ न कहेगी, मैं उसे समझा दूंगा। वह कहे तो कह दीजिएगा कि नलिनजी ने ऐसा किया है।''
इस बीच वनमाला का नया शुभचिंतक यार विपुल भी आ पहुंचा था। उसकी ओर किसी ने तवज्जुह देने की जरूरत न समझी। अपने को उपेक्षित पा इधर-उधर झांकती अपनी जिज्ञासा लिए वह दो मिनट में ही वहां से चलता बना था। नलिनजी के कमरे से निकलकर प्रियहरि स्टॉफ-रूम में गया तो पाया कि तब-तक कला संकाय के लोगों की भीड़ वहां जम गई थी। वनमाला के बगल में कुर्सी जमाए विपुल बैठा हुआ था। प्रियहरि ने वनमाला से मुखातिब हो प्रशंसा के कुछ शब्द कहे थे। नलिनजी से चर्चा के दौरान वनमाला के न होने का उपालंभ प्रियहरि ने उससे किया। वनमाला को यह सूचना प्रियहरि ने दी कि खुद उसकी असहमति के बावजूद नलिनजी ने आग्रहपूर्वक संचालन से वनमाला का नाम काटकर उसका अपना नाम रख दिया है। वनमाला से उसने कहा कि - ''अब जाओ तुम ही बात कर लो और समझाओ ।''
वनमाला प्रतिक्रियाविहीन स्थिति में प्रियहरि की ओर घूरती देख रही थी। इससे पहले कि वनवाला जवाब दे, उसकी बगल में बैठा विपुल चिल्ला उठा - ''रहने दीजिए जनाब, यहां तो आप मैडम के तारीफों के आप पुल बांध रहे है, और वहां ? वहां मैं बैठा था। मेरे सामने आपने खुद इनका नाम कटवा दिया है और यहां आकर बातें बना रहे हैं।'' जाहिर था कि विपुल का मकसद प्रियहरि को झूठा और मक्कार सिद्ध करना था। विपुल के झूठ पर प्रियहरि नाराज हो उठा। उसकी चालाकियां वह समझता था। उसने विपुल को जोर से डांटा कि वह झूठ बोल रहा है। वनमाला की ओर मुखातिब हो उसने बताया कि नीलांजना वहां मौजूद थी। उससे वनमाला पूछ सकती है कि क्या बातें हुईं।
प्रियहरि की कुर्सी के पीछे नीलांजना आ खड़ी हुई थी। उसने मुंडी हिलाई और अपनी सहज विनम्रता मे कहा कि 'हां प्रियहरि ठीक कह रहे हैं।'
शायद नीलांजना की कक्षा रही होगी। वह बाहर चली गई थी। यह संयोग ही था कि बचाते-बचाते भी नीलांजना हर बार वनमाला और प्रियहरि के बीच उपस्थित हुई जा रही थी। वनमाला को अचानक गुस्से का दौरा पड़ा। नीला का होना तो क्या उसका नामोल्लेख तक वनमाला के तन-बदन को जलाकर रख देता था। हालांकि वह वनमाला का भ्रम था, लेकिन निश्चय ही ऐसा संदेह उसमें आग की तरह भड़क उठा था कि ज़रूर नीला और प्रियहरि के बीच कुछ ऐसा था जिसके चलते जानबूझकर उसके खिलाफ साज़िश रची गई थी । ऐसे में इस वक्त नीलांजना का जिक्र वनमाला के प्रति निष्ठा की भावना के साक्ष्य और सफाई के लिए प्रियहरि करे यह उसकी सहन-सीमा के बाहर था। वनमाला क्रोध से बेकाबू हो चली थी। पूरे उन्माद से वह चीख पड़ी - ''रहने दीजिए, मैं क्या कुछ नहीं समझती प्रियहरि। कार्यक्रम का सारा बोझ मुझ पर डाल रहे हैं और मेरा ही नाम आपने कटवा दिया? काम आप मुझसे कराते हैं, मीठी-मीठी तारीफ करते हैं और पक्ष दूसरों का लेते हैं। मैं सब समझती हूं अगर वे इतनी ही काबिल हैं तो इन्हीं से ही सारा काम क्यों नहीं करा लेते ?''
प्रियहरि स्तब्ध और लाचार दिखाई पड़ा। वह वनमाला को ही चाहता था, उसका पक्ष लेता था, लेकिन वनमाला की गलतफहमी उस वक्त वह दूर न कर सका। जाहिर था कि माकूल मौका देख वनमाला को किसी और ने भी खूब भड़का रखा था। उसके मन में यह धारणा बो दी गई थी कि प्रियहरि उसे बेवकूफ बनाता है - दरअसल चाहता वह वनमाला को नहीं, नीलांजना को है। ईर्ष्या से भरी वनमाला का स्वर बहुत ऊँचा था। उसे जैसे उन्माद का दौरा पड़ा हो। वितृष्णा और रोष से वह भीड़ के बीच चिल्लाये जा रही थी - ''जिस साली को धन्यवाद तक ज्ञापित करना नहीं आता, दो शब्द अपने मन से लिख नहीं सकती, उसे आप बीच में ले आए ?'' वनमाला आपे से बाहर थी बीच में आपसी संबंधों के क्षणों का संकेत करती वह चीख-चीखकर प्रियहरि की कमजोरियां उजागर करने उतारू थी। वैसा करने में कुछ क्षण संबंधों की सारी मर्यादाएं उसने दरकिनार कर दी। वह चिल्ला रही थी - ''अकेले में यही प्रियहरि मेरी तारीफ करते हैं, चापलूसी करते हैं और बाहर ? देख लो, यही मेरा ही पत्ता काटते हैं। उस साली नीलांजना में ऐसा क्या रखा है जो ये उसका पक्ष लेते है।''
वनमाला के ठंडा होने की आशा में अब तक प्रियहरि चुपचाप धीरज रखे था लेकिन न थम रही वनमाला की अनर्गल बातों, आरोपों से फिर वह भी उत्तेजित और आक्रामक हो उठा था। उसने समझाना चाहा था कि वनमाला समझने की कोशिश क्यों नहीं करती। विपुल झूठ बोल रहा है और उसे व्यर्थ ही भड़का रहा है। प्रियहरि ने उसे समझाना चाहा कि वह चीख क्यों रही है ? चीखती हुई औरों को गाली देती अपमानित क्यों कर रही है ? आखिर वे भी सह-योजकों में हैं। उन्हें गाली देना और कोसना ठीक नहीं है। रीमा वहां मौजूद थी। उसने प्रियहरि के कथन की तसदीक करते हुए कहा कि प्रियहरि ठीक तो कह रहे हैं। इन्होंने कुछ नहीं किया है। जिन्होंने किया है, जो कहना है उनसे जाकर कहा जाए।
वनमाला को न कुछ सुनना था और न उसने किसी की सुनी। गुस्से में उबलती वह प्रियहरि को ही कोसती, प्रताड़ित करती उससे झगड़ती रही। यह खयाल करके कि यह वही स्त्री है जिसे मैं चाहता हूँ, जिसका पक्ष लेता हूँ और तारीफ किया करता हूँ, प्रियहरि का मन पीड़ा से भर उठा। वनमाला का स्वभाव ऐसा ही था। उसे समझाने की कोशिश करता प्रियहरि वहीं अपने को अपमानित होता देख आत्मग्लानि से पीड़ित होता सुबककर रो उठा था। इस बीच नीलांजना फिर लौट आई थी। वनमाला के रोष और प्रियहरि की लाचार दयनीयता को वह मौन देख रही थी। प्रियहरि को वह सांत्वना देती ढाढस बंधा रही थी।
प्रियहरि को इस बात का भी अफसोस था कि ढेर से लोग मौजूद थे, लेकिन ऐसी अवस्था में उसका पक्ष ले वनमाला को समझाने कोई आगे न आया। यह ठीक है कि वनमाला से प्रियहरि के संबंध कुछ और थे लेकिन तब भी अपने ही उन साथी सदस्यों का अपमान, जो उसे बेहद चाहते थे। प्रियहरि को क्षोभ से भर रहा था। प्रियहरि नीला से, रीमा से और वहां मौजूद अन्य मित्रों से यह कहता सहानुभूति की उम्मीद था कि वे खुद सोचें कि वनमाला के लिए उस प्रकार की उग्रता, गाली देना, तथा अभ्रदता का व्यवहार क्या उचित था ? कुछ देर बाद यह देख कर कि सचमुच उसके व्यवहार ने प्रियहरि को दुखी और सभी को स्तब्ध कर दिया है, वनमाला का रुख अचानक पलट गया।
उसने सफाई दी - ''मैने कोई गलती नहीं की, वैसा कुछ नहीं कहा।''
अपने को झूठा ठहराया जाता देख प्रियहरि ने वनमाला को इस बात के लिए धिक्कारा कि एक तो वह झूठ कह रही है, दूसरे वह सच को ईमानदारी से स्वीकार करते हुए गलती मानने से कतरा रही है। उसने वनमाला की आराध्या काली माता की दुहाई देते हुए पूछा कि वह सच बताए कि क्या उसने नीलांजना के लिए 'जिस साली को' जैसे फूहड़ शब्द कहे या नहीं ? अब वनमाला सिकुड़ने लगी थी और बचाव चाहती थी। बजाय विनम्रता से सच को स्वीकारने और सुनने की बजाय वह इसी बात पर फिर झगड़ पड़ी। छोटी सी बात में प्रियहरि देवी देवताओं की तो साक्ष्य में क्यों लाना चाहता है ? उसने इसी बात पर फिर प्रियहरि की खूब लानत-मलामत कर डाली। अंदर की बात यह कि एक तो नीलांजना को साथ लेना ही वनमाला पर भारी था, दूसरे नीलांजना के चक्कर में वनमाला का महत्व घटना वनमाला के रोष का कारण था। इस पर भी यह कि प्रियहरि अब भी बजाय वनमाला को समझ पाने के नीलांजना का पक्ष लेता वनमाला से लड़ रहा था।
वनमाला का स्वभाव सभी जानते हैं। कोई उससे न उलझा। यह बात अलग है कि उसके जाने के बाद सभी ने उसकी आलोचना की। प्रियहरि क्षुब्ध था। वनमाला को अपने पर अधिकार देने का ही एक कुफल यह अपमान था। प्रियहरि से हमेशा की तरह लोगों ने कहा -''आप बेकार ही उसकी तारीफ करते हैं, महत्व देते है, अब देख लिया न ?''
उस दिन बाद में भयानक उदासी से घिरा प्रियहरि राहत पाने नीलांजना के कमरे में जाकर बैठा। वहां और कोई न था। नीलांजना की आंखों में झांकते प्रियहरि ने अपने आहत मन की पीड़ा उससे कही और वैसा करते-करते फिर रो पड़ा। नीलांजना ने उसे तसल्ली दी - ''छोड़िए न, भूल जाइए जो हुआ। उसका तो स्वभाव ही ऐसा है। सब जानते हैं उसे। आप भी तो समझते नहीं और मैं हूं कि शायद आपको समझाने लायक नहीं।''
प्रियहरि की उदासी से नीलांजना का मन भी उदास हो गया था। वह उसे प्रसन्न रखना चाहती थी लेकिन रखती तो रखती कैसे ? वह वनमाला नहीं थी। वह पूरा दिन प्रियहरि के लिए भयानक अवसाद का था। रह-रहकर उसके चित्त में वनमाला के साथ की स्मृतियां हरी हो उठती थीं। उसे अफसोस था कि वनमाला उसे क्यों नहीं समझ पाती ? उसका जी करता था कि वनमाला से संबंधों के प्रायश्चित में वह अपनी व्यथा को साथ लिए प्राण दे-दे। यह विचित्र था कि उस तरह अपमानित होने पर भी उसका मन वनमाला को ही याद कर रहा था। वह उसके सामने ही रो कर उसे पिघलाने की उम्मीद रखता था और उसे मनाना चाहता था। वह चाहता था कि नीलांजना को लेकर वनमाला के मन में जागी ईर्ष्या और संदेह को वह ठंडा कर सके। उसका मन बेचैन था, पीड़ा और छटपटाहट से भरा हुआ था।


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'' मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं है ।
बस इनसे इतना कह दीजिए कि फोन करें तो समय देखकर किया करें।''


जमा करते हो क्यों रकीबों को
ये तमाशा हुआ गिला न हुआ।
दर्द मिन्न्तकसे दुआ न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ॥ - ग़ालिब


उस रात इसी प्रयास में प्रियहरि ने फोन पर वनमाला से अपनी पीड़ा कहनी चाही। वह कुछ न सुनना चाहती थी। दोबारा फिर फोन पर कुछ बातें हुईं। वनमाला ने कहा था - ''ठीक है, आपने कहा मैंने सुन लिया। आपने सारा कुछ सुबह कह तो दिया था। अब क्यों बार-बार फोन कर रहे हैं ?'' वनमाला भयभीत थी कि बार-बार की घंटी कहीं उसके पति के जो संयोग से इस वक्त घर मे नहीं था और बच्चों के मन में संदेह न पैदा कर दे। फोन को लेकर उसके घर पहले भी बवाल हो चुका था। इधर प्रियहरि का मन अधीर था कि वह वनमाला से खूब लंबी बात करे। उतनी जब-तक उसकी बातें वनमाला के मन का मैल दूर न कर दें। बाहर जाकर उसने तीसरा फोन किया। कहा - ''वनमाला तुम्हें मेरी बात सुननी होगी। तुम नहीं जानतीं कि मेरे मन पर क्या बीत रही है । क्या मैं जान दे दूं तभी तुम्हें तसल्ली होगी ?'' उसने शिकायत की कि वनमाला ने उसकी बात पर विश्वास क्यों नहीं किया? उसने बताया कि वनमाला का नाम उसके विरोध के बावजूद नलिनजी ने अपनी कलम से काटा था। उसने समझाना चाहा कि विपुल ने झूठ बोलकर उसे भड़काया था ।
वनमाला भी शायद सुबह की घटना से तनावग्रस्त और क्षुब्ध थी। वनमाला के तसल्ली देने के बावजूद कि ''जो हुआ, वह हुआ। उसे भूल जाइए। आप कह रहे है तो मान लेती हूँ। मुझे कोई शिकायत नहीं है। अब फोन रख दीजिए।'' प्रियहरि उसे कह रहा था कि ''वनमाला, शायद कल मैं न आऊँ। शायद कभी तुम्हारे सामने न आऊँ। मुझे न जाने कैसा-कैसा लग रहा है। मैं अपनी आलमारी की चाबी भेज दूंगा। आगे की रूपरेखा अब तुम खुद बना लेना।''
वनमाला पर जो भी असर हुआ हो, प्रियहरि उस रात सो न सका था। उसका अवसाद-ग्रस्त चित्त रूठा रहा था। अगले दिन मन को संभालता न चाहते हुए भी वह अपने काम पर गया। जाने का कारण शायद काम उतना नहीं था, जितना उस स्त्री के चेहरे को देखना और उस चेहरे पर खुद के प्रति लौट आये कल्पित विश्वास की उम्मीद था। नलिनजी सुबह ही मिल गये प्रियहरि ने उन्हें बताया कि वनमाला का नाम काटना कितने अनर्थ बात कारण बन गया और उस पर क्या-क्या गुजरी। उसने आग्रहपूर्वक कहा कि अब बात तभी बन सकती है, जब वे खुद वनमाला को अकेले में बुलाएं और सच्चाई बताएं। प्रियहरि के बाहर जाते ही नलिनजी ने वनमाला को बुला भेजा होगा। कक्षा की ओर जाते हुए उसने गौर किया कि वनमाला ही नहीं, उसके साथ विपुल, अनुराधा, भोला, विराग वगैरह की टीम लिये नलिनजी के गिर्द उपस्थित थी। संभवतः नलिनजी द्वारा बुलाए जाने का मतलब भय में डूबी वनमाला ने यह लगाया होगा कि अवश्य प्रियहरि ने उसके कल के दुर्व्यवहार की शिकायत की होगी। यह केवल प्रियहरि जानता था कि वैसा नहीं था। वनमाला इसे नहीं जानती थी। इसीलिए वह स-संदेह अपना पक्ष मजबूत करने भीड़ के साथ गई थी। सहज रूप में प्रियहरि जा खड़ा हुआ था। उसे देखते ही वनमाला नाराज हो नलिनजी से बोली - ''देखिए, कल इतनी छोटी सी बात पर इन्होंने मुझसे झगड़ा किया। इतने बड़े विद्वान हैं, लेकिन जरा सी बात पर मुझसे काली माता के साक्ष्य पर उतर आए और मुझे लज्जित करना चाहा। आप ही बताइए कि क्या यह इन्हें शोभा देता है।''
वहां पर पहले से ही जमा भीड़ देखकर और अपने खिलाफ वातावरण की संभावना पाकर प्रियहरि उस समय उल्टे कदम लौट आया था। और-सबों के बाहर निकल जाने के बाद फिर से नलिनजी ने उसे बुलाया था। प्रियहरि को एहसास था कि भीड़ लेकर वनमाला ने जरूर अपने को बचाने प्रियहरि की उल्टी-सीधी शिकायत की होगी। उसके व्यवहार के चलते पहले से ही वह बेहद व्यथित और आहत था। इससे पहले कि नलिनजी कुछ कहते प्रियहरि ने अपना दुखी मन उनके सामने, बल्कि उनके बहाने वहां उस समय बैठी वनमाला के सामने खोल दिया। प्रियहरि ने कहा - ''मेरे पास कहने को अब कुछ नहीं है। वनमाला पर मेरा विश्वास है। ये जो भी कहती हैं, उसे मेरी तरफ से भी सच मान लिया जाय। इनकी सारी शिकायतें आप मान लें और मुझे जो चाहे सजा दें। मैं ही झूठा और दोषी हूँ।''
नलिनजी हंसे। बोले - ''अरे वैसी कोई बात नहीं। मैंने सब समझ लिया है और समझा दिया है। कोई गलतफहमी अब नहीं है। आप लोग निश्चिन्त रूप से मिल-जुलकर काम कीजिए।''
भीड़ में कुछ और नजर आती वनमाला प्रियहरि के पहुंचते ही तब मानो पच्च्याताप और लज्जाशील नारी के संकोच की मुद्रा में थी। उसके ठीक बगल वह बैठ गया था। वनमाला कुछ न बोली। दोनों संकोच में गड़े जा रहे चुप थे। दोनों को लग रहा था कि कहीं कुछ गलती उन्होंने खुद ही की है, जिसका पछतावा लिये इस तरह वे यहां बैठे हैं। बाद में नलिनजी से ही प्रियहरि को मालूम हुआ कि उस सुबह विपुल ने ही उनसे शिकायत की थी कि रात में प्रियहरि ने मैडम को फोन कर - करके परेशान कर डाला था। प्रियहरि समझ गया कि उसका दीवानगी से भरा क्षोभ, उसका अवसाद वनमाला को भयभीत कर गया होगा कि कहीं उसका प्रियहरि सचमुच कुछ कर न बैठे। इसीलिए वनमाला ने शायद विपुल को गवाह बनाने की गरज से रात या सुबह अपने भय और फोन की बात बता दी होगी।
नलिनजी ने बताया कि वनमाला को बुलाकर उन्होंने फोन के मामले में खुलासा करने कहा था। वनमाला ने जवाब दिया था कि उनके - मेरे बीच जब यहां की बात साफ हो गई थी तो प्रियहरि ने रात में उसे फोन क्यों किया? नलिनजी के अनुसार वनमाला को उससे कोई शिकायत नहीं थी। नलिनजी के यह पूछने पर कि क्या फोन पर कोई गलत या आपत्तिजनक बातें की गई थीं, वनमाला ने कहा था कि आपत्ति-जनक कुछ न था। केवल यह कि बार-बार अफसोस जाहिर कर रहे थे और नाम नहीं कटवाने पर अपनी सफाई दे रहे थे। रहस्य की बात जो नलिनजी ने उजागर की, वह यह थी कि वनमाला रो रही थी। उसका कहना था कि प्रियहरि जब फोन करते हैं तो मेरे घर में पति को संदेह होता है कि मेरा इनसे प्रेम है और फोन पर मैं इनसे प्यार की बातें करती हूँ। उसने बताया था कि - ''मेरे पति शक्की हैं और मुझ पर व्यंग्य करते है । इसीलिए घर में मेरी मुसीबत हो जाती है। नलिनजी के सामने अंततः वनमाला ने प्रियहरि की आंखों में झांक कर यह कबूल किया था कि - '' मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं है । बस इनसे इतना कह दीजिए कि फोन करें तो समय देखकर किया करें।''
नलिनजी वहां मौजूद जरूर थे लेकिन वनमाला जैसे यह बात उनसे नहीं प्रियहरि से कह रही हो। प्रियहरि को पास पाकर वह संकुचित थी लेकिन उसकी आंखें अफसोस भरी शिकायत से भरी हुई थीं। प्रियहरि का भी मन उस आत्मीय साथ में हल्का हो चला था। फिर भी मन ही मन वह सोच रहा था कि वनमाला दिल से चाहे जितनी साफ हो, संबंधों में विश्वसनीय नहीं है। घबराहट में वह आपा खो बैठती है और ''नहीं बताने की बातें'' उजागर कर जाती है। उसका मन बाद में निर्मल हो जाता है। वह अपने किये पर पछताती है। लेकिन उन दूसरे लोगों का क्या जो उसके गुस्से को नफरत में बदलने की चाहत रखते हैं ? वनमाला प्रियहरि की आंखों में यह सारा कुछ पढ़ रही थी। सारी पीड़ा के बावजूद प्रियहरि का मन वनमाला की वफादारी और तारीफ से भी भर उठा था।

यह क्या कम बात थी कि विघ्न-संतोषियों की कोशिशों के बावजूद उसके मन में शिकायतें जड़ नहीं जमा पा रही थीं। उसकी यही मासूम अदा प्रियहरि के लड़खड़ाते मन को फिर से सहारा देती वनमाला से बांध देती थी। ऐसे संकट में उसे हमेशा वनमाला का वह आग्रह याद आता जो कभी बेहद एकांत के आत्मीय क्षणों में इन शब्दों में किया गया था - ''न जाने क्यों मुझमें यह कमजोरी है कि गुस्से में मैं अपना आपा खो बैठती हूँ। तब मुझे होश नहीं रहता कि मैं क्या-क्या बक जाती हूँ।'' उसने कहा था - ''आप तो ऐसी बातों को बिल्कुल मन में न लिया कीजिए। मुझे खुद याद नहीं रहता कि मैं क्या-क्या कह गई थी। बाद में याद करके मैं पछताती हूँ। आप मुझे माफ कर दिया कीजिए।''
मजबूरियों के बीच गुस्से और पछतावे का खेल ही था, जिसने वनमाला और प्रियहरि को एक-दूसरे से दूर न जाने दिया और जो अन्त तक चलता रहा। प्रियहरि की उस दिन की भूमिका तयशुदा थी। वनमाला के साथ उसके संबंध बाहर चाहे जैसे भी दिखाई पड़ते हों अन्तरंग तौर पर बेहद आत्मीय और विश्वास के थे। पहले ही कई बार प्रियहरि ने वनमाला से कह रखा था कि उस पर उसका पूरा भरोसा है। अगर आत्मीय बातों को उजागर कर वह शिकायत भी करती है तो वह मान लेगा कि उसकी किस्मत खराब है। वह उसके नाम सरेआम कबूल कर लेगा कि जो भी वह कहती है, उसे बिना विरोध किये सच मान लिया जाये क्योंकि उसकी खुशी में ही प्रियहरि की अपनी खुशी है। उस दिन भी प्रियहरि ने फिर वैसा ही किया था। उसके समर्पण ने वनमाला की आत्मा को जगा दिया था। नलिनजी के सामने उस एकांत मुलाकात में वनमाला का सारा गुस्सा काफूर हो गया था। अफसोस कहीं उसके अंदर भी था। उसके मन का यह संदेह दूर हो चुका था कि शायद उसके पिछले दिन के खराब व्यवहार पर प्रियहरि ने शिकायत की होगी । मैल न वनमाला के मन में था, और न प्रियहरि के मन में ।
नलिनजी ने प्रियहरि के सामने ही वनमाला से पूछा था - ''बस, इतनी सी ही गलफहमी थी न !''
''कोई खास बात नहीं थी, मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं है'' - वनमाला ने जवाब दिया। चुहल भरी नजरों से प्रियहरि की ओर देखते उसने जोड़ा था कि ''बस इनसे इतना कह दीजिए कि मुझे बार-बार फोन न किया करें।'' नलिनजी ने हंसते हुए कहा था कि ''ठीक है, ये अब आपको फोन नहीं करेंगे।'' इस पर वनमाला ने झट सफाई फिर पेश की कि ''फोन के लिए मना मैं नहीं करती, लेकिन बस इतना ध्यान रखें कि गलत समय पर फोन न किया करें।''
वहां से वे दोनों उठे तो मन एकदम हल्का था उन दोनों की यह खुशकिस्मती थी कि सारी भीड़ के विरूद्ध उनकी जोड़ी नलिनजी को मान्य थी। उससे उन्हें न कोई शिकायत थी, न ईर्ष्या थी। यह बात वनमाला और प्रियहरि ही जानते थे। इसीलिए नलिनजी का सामने होना उनके लिए बाधा नहीं सुविधा ही थी। वे इनके संबंधों के लिए ढाल का काम भी करते थे। अपेक्षा के विपरीत औरों की मुहिम उस दिन धरी की धरी रह गई।


जो आयोजन प्रस्तावित था, वह हुआ। वही आयोजन था या वह कोई बाद का आयोजन यह याद नहीं। शायद कुछ बाद का रहा हो। उस दिन वनमाला संचालन कर रही थी। संभवतः समापन करती-करती वह नलिनजी को अंतिम उद्‌बोधन के लिए आमंत्रित करने जा ही रही थी कि नलिनजी ने प्रियहरि की ओर इंगित कर वनमाला को इशारा किया कि वह उसे आमंत्रित करे। वनमाला के मन में क्या था कहा नहीं जा सकता। उसने प्रियहरि की ओर नजर डाल घोषणा की कि ''प्रियहरि भी शायद कुछ कहना चाहते है। मैं अब उन्हें आमंत्रित करती हूँ कि वे आएं और अपने बात कहें।''
प्रियहरि को यह अटपटा लगा। सारे लोग एक अच्छे चिन्तक और प्रखर वक्ता के रूप में उसे जानते थे। उसे यह बात नागवार गुजरी कि नलिनजी के याद दिलाने पर उसे तसल्ली के लिए बुलाया जाये। उसने अपनी जगह पर उठकर साफ कह दिया कि उसने कभी यह नहीं चाहा कि उसे बुलाया जाय। शायद संयोजिका को कुछ गलतफहमी हुई है।
''मुझे कुछ नहीं कहना है'' कहकर वह अपनी जगह बैठ गया। नलिनजी और सारी सभा ने प्रियहरि के बात में छिपे क्षोभ को पकड़ लिया था। आयोजन खत्म हो जाने के बाद स्टॉफ के अनेक साथियों ने कहा कि वनमाला ने जानबूझकर प्रियहरि को अपमानित करने वैसा किया था, जो बहुत गलत था। सभी को उसके व्यवहार पर आश्चर्य और अफसोस था। प्रियहरि ने मन की पीड़ा छिपाकर बात टाल दी थी। वह समझ गया था कि उसके प्रति रोष जताने का वनमाला का वह एक तरीका था।
''बड़ी मूर्ख स्त्री है, उसे ऐसा नहीं करना था'' - नलिनजी ने प्रियहरि से कहा। अचानक गलियारे में ही बगल से गुजरती वनमाला प्रियहरि के समीप आती बोली - ''आप बुरा मान गये लगता है। बाई गॉड, न जाने कैसे मैं भूल गई थी। वह तो बस यूं ही मुंह से निकल गया था। मैंने जानबूझकर वैसा नहीं किया था। मुझे माफ कर दीजिए प्लीज़।'' प्रियहरि के लिए यह निर्णय करना कठिन था कि कौन सी वनमाला असली है ? वह, जो ऐन मौके पर उसे नीचा दिखाकर अपने मन का मैल निकालना चाहती है, या वह जो पछतावे से भरी उस पर तसल्ली का मरहम लगाती है ? उसके लिए अब वह अभेद्‌य रहस्य से भरा अजनबी व्यक्तित्व होती जा रही थी।


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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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