चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़) complete

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चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़) complete

Postby Jemsbond » 29 Jun 2016 22:44

चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़) by Ved prakash sharma


सम्पूर्ण चमन जैसे साज सज-संवरकर दुल्हन बन गया था ।

चमन के हर नागरिक में आज एक उल्लास था, खुशी थी । वतन के पूरे देश के किसी भी कोने में अाज जैसे कोई दुख ही नहीं था । आज चमन जैसे धरती का स्वर्ग बन गया था । बच्चे-बच्चे में उत्साह' था । चमन की हर सड़के, हर गली को खुद शीसे नाचते ए यहीं के नागरिकों ने सजाया था । जगह -जगह ,छोटे बंल्वों की झालरें! स्थान स्थान पर बजते बैंड।


दस ज़नवरी जैसे चमन का राष्टीय पर्व बन गया ।


बनता भी क्यों नही? आज़ करीब बीस साल बाद चमन के निवासियों ने आजादी की सांस ली थी ।



आज़ उनके देवता--उनके मसीहा का राजतिलक जो होना था ।


अाजाद तो चमन पांच जनवरी को ही हो चुका था । उस वक्त सारे विश्व में हलचल मच गई थी, जब अमेरिका ने सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा की कि अब चमन पर उनका कोई अधिकार नहीं रह गया है । चमन एक आजाद देश है और उसका राजा वतन है ।


इस घोषणा के साथ ही अमेरिका ने सबसे पहले चमन को आजाद देश के रूप में मान्यता दी ।

वतन ने अमेरिकी को चुनौती दी थी कि पांच जनवरी की दोपहर दो बजे तक अमेरिका चमन को आजाद देश के रूप में मान्यता देकर एक-एक अमेरिका को चमन से बाहर निकाल ले वरना अमेरिका का सारा गोल्ड नष्ट कर दिया जाएगा । अमेरिका के सारे मे गोल्ड को अपने कब्जे में करके वतन ने इस चौधरी राष्ट्र से समझौता किया था । यह सौदा कि अगर अमेरिका को सारा गोल्ड चाहिए तो चमन को आजाद कर दे । मजबूरन अमेरिका को अपना देश बचाने के लिये वतन का वह सौदा मजूर करना पड़ा है

मंजूर ना करने का मतलब था, दुनिया कै नक्शे पर से अमेरिका का नामो निशान मिट जाना ।

असल में तो पांच जनवरी को ही चमन आजाद हो चुका था किन्तु विधिवत् वतन को आज चमन की सबसे बड़ीं गद्दी पर बैठाया जाना था । आज उसका राजतिलक होना था और दस जनवरी का दिन चमन के इतिहास में स्वतन्त्रता-दिवस का रूप धारण कर गया । पूरा चमन तो सजा ही था, सबसे बेहतरीन ढंग से सजा था'--राष्ट्रपति भवन ।।


खुद चमन के नागरिकों ने उसे सजाने में अपना खून-पसीना एक कर दिया था । पांच जनवरी की रात से ही लोग उसे सजाने में व्यस्त थे । चमन ऐसे सजा था मानों किसी धनवान की पुत्री बडे अरमानों से दुल्हन वनी हो ।।


लेकिन वतन । वतन उस सजे…संवरे राष्ट्रपति भवन में नहीं था । रात को ज्रब वह सोया था तो राष्ट्रपति भवन में ही सोया था ।


विजय, विकास, पिशाचनाथ, अलफांसे, धनुषटंकार और बागारोफ के साथ । जी हां, इन सबको वतन ने अभी चमन में ही रोक रखा था ।

माइक, जैकी और हैरी तीन जलपोतों में भरकर अपने देश का सोना छ: जनवरी को ही ले गए थे ।

विजय इत्यादि भी उनके साथ ही लौटना चाहते थे कि वतन ने अनुरोध करके उन्हें रोक लिया। उसने कहा था…"चच्चा अपने बच्चे को चमन की गद्दी पर बैठाकर, माथे पर तिलक नहीं लगाओगे? विकास भाई...मैँनै बुरा तो नहीं किया है । कुछ, कोई जुर्म तो नहीं किया है, किसी आदमी को तो नहीं मारा है? मैंने जो किया, सिर्फ अपने इस छोटे-से देश को आजाद करने के लिये । विकास! क्या तुम मुझे मुजरिम समझते हो? जो कुछ मैंने किया, क्या वह तुम्हारी नजर' में गलत है ?"


" -नहीँ वतन, ठीक किया है । अगर हर छोटे देश में एक वतन हो जाए तो बड़ा राष्ट्र किसी छोटे देश को गुलाम न बना सके । तुम्हारी जगह मैं होता तो-शायद शायद तुम्हारी तरह अहिंसा से काम न ले पाता-हिंसक वन जाता, न जाने कितने आदमियों का खून बहा देता ।


" तो…तो फिर भारत जाने की जिद क्यों?" वतन ने कहा ।

" इसलिए किं अपने वतन तो पहुचना ही है हमें ।"


" ओंर यह किसका वतन है?" चमन` बोल उठा…चमन भी तो भारत की ही हिस्सा है ।। मैं भी तो भारतीय हूं ।

"लेकिन ।"

" लेकिन वेकिन कुछ नहीं विकास ने कुछ _कहना चाहा तो उसकी बात बीच में ही काटकर वतन बोला- सुना है विकास कि यारों के यार हो तुम! क्या गलत सुना है मैंने? नहीं, तो रूको यहीं-अपने यार को राजा बनाके जाओ वरना...वरना तुम्हारी
कसम..,मै राजा नहीं... ।"


मगर वतन की बात पूरी होने से पहले ही विकास ने उसे कलेजे से लगी लिया था ।


इस तरह जिद करके रोका वतन ने । के कैसा संयोग था ?" वतन के दुश्मन बनकर भारत से-निकले थे ये सब । यह सोचकर कि उस वक्त तक चेन से नहीं बैठेंगे जब तक वतन को जान से नहीं मार देगे । परन्तु हुआ बिल्कुल उल्ट । वतन के दोस्त बन गए वे ।


" वतन-'सिंगही का शिष्या ।।

मूल रूप से यह भारतीय था ।

मोण्टो (धनुषटंकार) के ताऊ का लड़का । भारतीय मुल्कराम पाण्डे का बड़ा लड़का देशपांडे व्यापार के सिलसिले में भारत से निकला तो वापस ही न अाया ।


किसी क्रो क्या मालूम था कि चमन में शिखा' की मुहब्बत ने उसे गिरफ्तार कर लिया है । चमन में ही देशपांडे का विवाह शिखा च से ही हुया । शिखा के पिता ने देशपांडे को अपनी फेक्टरी का मालिक बना था ।



हालात ऐसे बने कि न ही वह भारत'आ सका, न ही कोई सूचना भेज पाया ।


अमेरिकनों ने छोटे-से देश पर हमला करके उसे गुलाम बना लिया देशपांडे की फैक्टरी भी अमेरिक्नों ने छीन ली ।


उन्हीं देशपांडे और शिखा का लड़का था वतन ।।।।


एक बहन भी थी वतन की-छवि!


वतन बचपन से ही कहा करता था फि वह चमन का राजा बनेगा । एक फलवाली बूढी औरत से हमेशा उधार फल खाया करता था । जब आठ वर्षीय वतन से फल वाली, बूढी महिला ने कहा कि तुम राजा नहीं वन सकते, क्योंकि. तुम्हारे हाथ मैं लकीर ही नहीं है !

तब ---- चाकू से अपनी हथेली ही फाढ़कर उसने वह लकीर वना ली ।


बचपन से ही ऐसा महत्वाकांक्षी था वतन ।।।।


" उस वक्त यह सिर्फ आठ ही वर्ष का था, जब उसकी जिन्दगी में एक भयानक मोड़ अाया था । चमन के राजा मैंग्लीन का लड़का जिम जिम जबरदस्ती उसकी बहन से शादी करना चाहता था

बस---- वही दिन था, जिससे वतन की जिन्दगी में एक तूफान उठ खडा हुआ ।


घटना का प्रभाव था कि आठ वर्ष के वतन ने जिम का कत्ल कर दिया । फिर उसने देखे, अपने माता -- पिता और बहन पर होते जुल्म उसने देखी, अपनी मां और बहन की वे लाशें जिन पर किड़े रेंग रहे थे, जिनमें से उठती सड़ाध हमेशा के लिये उसके दिमाग
मेँ समा गई थी । फिर…एक बोरे में बन्द करके मैप्लीन ने उसके पिता को डूबने के लिए समुद्र में डाल दिया था ।



Last edited by Jemsbond on 16 Oct 2016 19:20, edited 1 time in total.
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 29 Jun 2016 22:47


समुद्र में अपने पिता की लाश को तलाश करता वतन सिंगही से टकरा गया । सिंगही ने वतन की कहानी सुनी तो जाना कि एक दिन वतन दुनिया के लिए गर्व की चीज बनेगा । बस---सिंगही ने अपना शिष्य वना लिया उसे ।


सिंगहीँ ने उसे इतना कुछ सिखाया, जितना यह स्वयं भी नहीं जानता था ।


विजय, विकास इत्यादि के विरूद्ध सिंगहीँ ने वतन के दिलो दिमाग मैं जहर भरा था ।


वड़े गर्व के साथ सिगहीँ नै विकास से कहा----"'बचकर रहना विकास मेरा शेर मैदान में आ रहा है ।"


और-वतन मैदान में अाया ।


सिगहीँ ने वतन को वैज्ञानिक भी तो बना दिया था । उसी वैज्ञानिक दिमाग से वतन ने समुंद्र से नकली सोना बना लिया । ऐसा सोना कि बड़े से बड़ा घुरन्धर भी असली और नकली के फर्क को नहीं पकड्र सकता था ।


बहुत ही शान्तिपूवंक ढंग से एक गहरी साजिश कै द्वारा वतन ने अमेरिका का सारा गोल्ड अपने कब्जे में कर लिया और अमेरिका के बाजार मैं फैला दिया अपना नकली सोना ।


इसके बाद----सारीं दुनिया के सामने वतन ने घोषणा कर दी कि अमेरिका के पास जितनी भी गोल्ड है सब नकली है । इस तरह वतन ने अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था, भंग कर दी । अन्य देशों ने अमेरिका से व्यापार बन्द कर दिया ।


विश्व के बाजार में डालर की कीमत गिर गई ।


उधर वतन और विजय के बीच चैलेंज हो गया था कि एक महीने के अंदर वतन चमन का राजा बन जाएगा या नहीं । वतन का कहना या कि वह एक महीने के अन्दर चमन का राजा वन जाएगा

विजय ने कहा था कि इस अवधि के अन्दर वह उसे तो क्या, उसके बाप को भी चमन का राजा नहीं बनने देगा । फिर अमेरिका से माइक ने वतन के खिलाफ विजय से मदद मांगी ।


विजय तैयार हो गया ।


इधर…अलफांसे , पिशाच, बिकास और धनुषटंकार ने मिलकर वतन को घेरने की योजना बनाई ।


दुनिया के महान जासूस ,चारों तरफ से वतन को घेरने के लिये निकल पडे़ । उधर सिंगही विशव-युद्ध कराने की योजना वना रहा था । सिंगही की उस हिंसात्मक योजना के विषय में वतन को कोई जानकारी नहीं थी ।



हिंसा से वेहद घृणा थी वतन को-- तभी तो तब जबकि उसे सिंगही की खतरनाक योजना के बारे में पता लगा तो गुरु के ही खिलाफ़ हो गया वह । उसने सिंगही का अडडा नष्ट कर डाला । जो काम विजय, विकास इत्यादि जासूसों का था, वह वतन ने क्रिया ।


अन्त में अपनी जान बचाकर भागना पड़ा सिंगही को ।


विजय, विकास, अलफांसे, पिशाच के साथ माइक और हैरी को भी वतन ने कैद कर रखा था ।


फिर, वतन ने हैरी और माइक को माध्यम से अमेरिका से एक सौदा क्रिया । सौदा यह था कि या तो अमेरिका चमन" को अाजाद कर दे अन्यथा वह अमेरिका का सारा सोना नष्ट कर देगा । जैकी को मालूम था कि सिंगही के रूप में दुनिया के ऊपर मंडराते हुए एक भयानक खतरे को वतन ने किस तरह समाप्त किया है ।


जबकी यह यह भी …जानता था कि अगर ¸ उसके देश ने वतन की बात न मानी तो दुनिया के नक्शे पर अमेरिका नाम की कोई जगह नहीं होगी ।


फिर-वतन ने दुनिया पर एक वहुत बड़ा एहसान भी किया था ।


अमेरिका को वतन के समक्ष झुकना ही पडा । वतन के कब्जे से अमेरिका ने अपना सारा सोना लेकर चमन को आजाद कर दिया ।।।

सबसे पहले अमेरिका ले ही चमन को एक आजाद देश के रूप में मान्यता दी ।


और----- और आज उसी वतन का राजतिलक होने जा रहा था ।

नौ जनवरी की रात को विजय , विकास इत्यादि के साथ ही वतन राष्ट्रपति भवन में सोया था ।


मगर दस तारीख की सुबह जब वे सोकर उठे तो न राष्ट्रपति भवन में वतन था और न ही अपोलो ।


अपोलो वतन का वफादार बकरा ।


" अबे !" वतन के खाली बिस्तर को धूरता हुआ वागारोफ चहका ---" ये कहां चला गया चटनी का ?"
और----- और आज उसी वतन का राजतिलक होने जा रहा था ।

नौ जनवरी की रात को विजय , विकास इत्यादि के साथ ही वतन राष्ट्रपति भवन में सोया था ।


मगर दस तारीख की सुबह जब वे सोकर उठे तो न राष्ट्रपति भवन में वतन था और न ही अपोलो ।


अपोलो वतन का वफादार बकरा ।


" अबे !" वतन के खाली बिस्तर को धूरता हुआ वागारोफ चहका ---" ये कहां चला गया चटनी का ?"


चकरांए सभी थे ।


विजय ने कहा----"'मुझें लगता है चचा, कि शकरकन्दी खाने चला गया-----. ।”


"चुप वे चटनी के!" विजय 'की' बात पूरी होने से पहले ही बागरोफ गुर्राया---""चोंच बन्द रख, वरना चिड्री का पंजा बना दूंगा !"


इससे पहले कि विजय कुछ कहे, बिकास बोला-----"अपोलो भी नहीं है ।"


"अबे उस बकरे का क्या अचार डालेगा छिनाल के पूत" -- वागारोफ गुर्राया-;-"सोचना चाहिए, उस चटनी के बारे में ।"


"'देखो चचा" विकास ने कहा---"'मां को गाली..."


"अबे चुप हरामी के पिल्ले ।"


…"चचा!" अलफांसे ने कहा---" तुम इतनी तेजी से विना कोमा-विराम के बात करते हो कि कुछ समझने का तो मौका ही नहीं मिलता ।"


" देख वे 'अन्तर्राष्टीय लिफाफे ।" उस पर तो चढ़ ही दौड़ा बागारोफ---" तेरे टिकट पर मोहर लगा दी तो किसी पोस्ट बॉक्स में पड़ा सड़ता ही रहेगा ।"


और पिचास सोच रहा था कि कैसे विचित्र आदमियों में फंस गया वह वक्त पड़ने पर ये सब एक से एक खतरनाक नजर अाते हैं लेकिन...अगर इन्हें कोई इस वक्त देखे तो-तो कैसे बेवकूफ लगते हैं? वतन के गायब होने पर वे 'चर्चा तो का रहे थे किंतु पिचाशनाथ को उनकी किसी भी बात में कोई गम्भीरता नजर नहीं आई । वे यूं ही बातें करते रहे मगर...


धनुषटंकार' ने उनकी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं ती थी ।

वह तो चुपचाप कमरे'से निकल गया था ।

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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 29 Jun 2016 22:48


करीब पन्द्रह मिनट बाद जब वह वापस अाया तब भी सब उसी तरह उलझे हुए थे । न जाने किस बात पर उस समय बागारोफ बिकास को गालियां बक रहा था कि एक लिखा हुआ कागज धनुषटकार ने उंसे पकड़ा दिया ।


" अवे ये क्या मुर्गी चोर!" कहते हुये बागरोफ ने कागज ले लिया और जोर से पढा ।


--“वतन भैया पूरे भवन में नहीं हैं चचा, किसी ने उनको जाते नहीं देखा !"



सभी सतर्क हो गए ।

बागारोफ चिल्लाया---"अबे तो यहां क्यों बैठे हो चिडी़ मारो-----तलाश करो उस बकरे के बाप को ।"


इस तरह-सरगर्मी के साथ वतन की तलाश जारी हो गई ।



आश्चर्यजनक रुप से वतन गायब हो गया है । यह खबर पहले राष्ट्रपति भवन में फैल गई, उसके बाद पेट्रोल की अाग की तरह पूरे चमन में फैल गई । जिसने सुना, वही अवाक् ।



दिल धक् से रह गए ।


अभी एक ही पल पूर्व जिस चमन के नागरिक खुशी से झूम रहे थे, वे मुरझा-से गए । खिले हुए गुलिस्तां को जैसे ग्रहण लग गया ।



स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढे. जावान---सभी परेशान वेहाल, आतंकित-से घबराए-से!



सारे चमन में किसी सूई की तरह वतन की खोज की जाने लगी ।



चमन के बच्चे-बच्चे सबसे बड़ी इच्छा जैसे सिर्फ यही हो गई कि उनका देवता एक पल के लिए उनके सामने अा जाए ।



एक जीप में बैठे विकास, विजय, अलफांसे, पिशाचनाथ, बागारोफ तौर धनुषटंकार भी वतन को तलाश कर रहे थे ।



बागारोफ़ पर तो अजीब बौखलाहट सवार थी । कभी वह वतन को गाली देता तो कभी अपने साथियों को वे जल्दी उसे तलाश क्यों नहीं करते ।



तब जबकि अलफांसे ने कहा---“वतन का इस तरह आज की रात गायब होना रहस्यमय है ।"



-"कहीं ऐसा तो नहीं लूमढ़ भाई कि इन साले अमेरिकनों ने उसे गायब कर दिया हो" विजय ने सम्भावना व्यक्त की ।



"गुरू!” गुर्रा उठा था विकास----" ऐसा हुआ तो तुम्हारे चरणों की कसम, सारे अमेरिका को जलाकर राख कर दूंगा ।" विकास का रौद्र रूप देखकर कांप उठे सब ।




पिशाचनाथ ने कहा…"यह काम सिंगहीँ का भी तो हो सकता ।"



" नहीं । " अलफांसै ने प्रतिरोध क्रिया------" विशेष रूप से तो यह आज के दिन वतन के लिए ऐसा नहीं कर सकता ।"



'“क्या बात का रहे हो लूमढ़ भाई!" विजय ने कहा----" सोचो तो सही, साला अपना नकली चचा भी कभी किसी का हुआ है क्या, जो अब होगा? माना कि वतन शागिर्द है उसका, लेक्रिन-इस वक्त सबसे ज्यादा खुन्दक तो वह वतन से ही खाया हुआ होगा?"

"अरे उल्लू की दुम फाख्ताओं ! सालों, लगता है, तुम्हारे दिमाग का दिवाला आउट हो गया है ।" बागारोफ दहाड़ा था---"'अवै अपने मैला भरे दिमागों से मैला हटाओ और यह सोचौ कि क्या वतन खुद गायब नहीं हो सकता?"




-"लगतो है, मैला तुम्हारे दिमाग में भरा है चचा ।" विजय ने कहा--'"आज़ के दिन का उसे इन्तजार था ।" फिर बोला …आज वह खुद अपनी इच्छा से नहीं गायब होगा?"




"साले लकड़बग्घे तू इण्डियन है न-तेरी बुद्धि हमेशा उधर" है ही लटकी रहेगी ।" बागारोफ दहाड़ा---"अबे तुमने ही तो बताया था कि बचपन में वतन एक बुढ़िया से उधार फल खाया करता था अौर उसने वादा किया था कि जिस दिन वह चमन का राजा बनेगा, उस दिन उस बुढिया का सारा उधार चुका देगा । क्या यह मुमकिन , नहीं कि आज के दिन का सबसे पहला अहम् काम उसने उधार चुकाना ही चुना हो?"




"‘हो सकता है चचा! तुम्हारी बात जमी । " कहने के साथ ही विकास धनुषटंकार से बोला…"मोण्टो जीप फलदबाली बुढ़िया की झोंपड़ी की तरफ ले चलो ।"



जीप चलाते धनुकांकार ने जीप का रुख मोड़ दिया ।



" लेकिन चचा ।" विजय कह रहा था---"अगर वह अपनी मर्जी से जाता, तो कहकर भी तो जा सकता था?”




" अवे चमारी के!" बागारोफ ने डांटा---'"आजकल की नई पौध को नहीं जानता क्या तू? बुजुर्गों को कुछ बताकर काम करने में तो अपनी तौहीन समझते हैं ये । अब इसी ईट के भट्ठे को लो न ।" उसका संकेत विकास की तरफ था…"क्या ये बताकर कोई काम करता है?"



उनके बीच इसी तरह की ऊटपटांग बाते होती रही । पिशाच इस तरह चुप बैठा था, जैसे उसके मुंह में जुबान ही न ही । इसी तरह उन सबकी बातों से बेखबर धनुषटंकार आंधी तूफान की तरह जीप को भगाए ले जा रहा था ।




जिन सड़कों पर कुछ देर पहले तक चमन के नागरिक खुशी से नाच रहे थे, इस वक्त उन पर एक उदासी सी छाई हुई थी । एक अजीब-सी मुर्दानिगी !



सड़कों पर जितने भी लोग नजर अाए सभी की आँखे जैसे कुछ खोज रही थी । किसे खोज सकती हैं-----------सिर्फ वतन को !!



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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 29 Jun 2016 22:49


तब--ज़वकि जीप ठीक उस बुढ़िया की झोंपडी के सामने जाकर रुकी ।
बुढिया बाहर दरवाजे पर ही खड़ी थी । एक साफ-सी धोती पहने, मानो अपने बेटे के राजा बनने की खुशी में वह भी झूम रही थी । जीप के रुकते ही बूढा जिस्म जीप की तरफ लपका ।




बागारोफ सहित सबने श्रद्धापूर्वक पांव छुए उसके ! बुढ़िया ने पूछा-"मिला मेरा बेटा ?"




"क्या वतन यहां नहीं अाया दादी मां?" अलफांसे ने पूछा-----"क्या आपसे मिलने नहीं आया?”




" कहां अाया मुआ, मेरा तो उधार भी नहीं चुकाया -उसने ।" कहकर रो पडी फ़लवाली बुढिया-"कितने दिन से इसी उम्मीद पर जी रही थी कि कब वह दिन अाएगा जब यह राजा बनेगा । सबको तो यह खुशी होगी कि वतन आज राजा बना है मगर मुझे उसके राजा बनने की खुशी थोड़े ही थी । मुझे क्या मतलब कि बो मुआ राजा बने या मरे । मैं तो बस यह चाहती हूँ कि एक बार सामने आकर पैसे दे दे मेरे । "





वतन के प्रति बुढ़िया का प्रेम देखकर आंखे छलछला गई । सबकी ।




विकास ने कहा---" तुम्हें देने के लिए पैसे तो उसने मुझे रात ही दे दिये थे दादी मां-लो अपने पैसे ।। ” कहते हुए विकास ने जेब में हाथ डाला ।





“चल...चल..मुए----तुझसे पैसे क्यों लूंगी में? मैं तो उसी राजा के बच्चे से लूंगी ।"




आंसू भरी आंखों के साथ मुस्करा उठा विकास, बोला---सीधे क्यों नहीं कहती दादी मां कि तुझे पैसे नहीं, वतन चाहिए । ”




"मैं पागल हूं क्या?" कहती कहती फफक पड़ी वुढ़िया---"जो अपने पैसों से ज्यादा उस मुए से प्यार करूंगी?"



कहकर उनमें से किसी की भी बात सुने विना बुढ़िया रोती हुई झोंपड्री की तरफ भाग गई । अवाक् रह गए सब ।।।




आंखों में आंसू उमड अाए थे । खुद को संभालकर विजय ने कहा…"अब क्या करें दिलजले?"




विकास की विचार-श्रंखला टूटी । अासू-भरी आंखों से विजय की तरफ देखकर बोला ----" क्या वतन को मुजरिम समझकर हमने वहुत बडी भूल नहीं की थी? आपने देखा------ मुल्क के लोग उसे कितना प्यार करते हैं? क्या इतने सारे लोग कभी किसी मुजरिम को भी इतना प्यार कर सकते है?" कभी नहीं गुरु-कभी नहीं ।

सचमुच, अपने दिल पर हाथ रखकर कहता हूं मैं----वतन देवता है...सचमुच का देबता ।"




" अबे चिडीमार, सवाल यह नहीं कि यह देबता है या राक्षस ।" बागारोफ दहाड़ा'----"सबाल यह है कि वह गया कहा ?"





"अगर वह अपनी इच्छा से गया है चचा, तो सिर्फ एक जगह और ऐसी है, जहां वह जा सकता है ।" विकास ने कहा ।



"कहां ?"




"अपने -घर में " बिकास ने कहा---"उस घर में जहाँ उसने अपनी मां और बहन की सड़ी हुई लाशें देखी थी । अगर वह बहां भी नहीं है चचा, तो समझो, वह गायब नहीं हुआ है । उसे किसी ने गायब किया है और तुम्हारी कसम उसे गायब करने वाले की बोटी-बोटी नोंच डालूंगा । फाढ़कर सुखा दूंगा उसे ।"




कुछ देर बाद, जीप मैं बैठे हुए, वे सब वतन के मकान की तरफ उडे चले जा रहे थे ।




बेहद तीव्र वेग से चलाने के वावजूद धनुषटंकार तीस मिनट में वतन के मकान पर पहुच सका । सबने देखा-थक जर्जर सा, पुराना-टुटा-फूटा मकान । लॉन में जंगली घास उग अाई थी ।




लम्बी लम्बी कटीली झाड्रिर्यों ने रास्ता घेर रखा था ।



मकान का दरवाजा बन्द होने का छ
प्रशन ही नहीं था क्योंकि टूटे हुए दोनों किवाड़ दरवाजे के पास ही झाडियों में पड़े थे । झाड़ियों को पार करते हुए वे है पहले कमरे में पहुंच गए



देखा-दूसरे कमरे का दरवाजा बन्द था ।



सभी ठिठक गए । दूसरे कमरे के अन्दर से किसी के रोने की आवाज अा रही थी ।



फूट-फूटकर तड़प-तड़पकर रो रहा था वहां कोई ।




फिर, वतन की आवाज ने सबके रोंगटे खड़े कर दिए, सुबकता हुआ वह कह रहा था-"मां देख क्यों नहीं रही है तू? देख तेरा वतन आज चमन का राजा बन गया है तेरे लाल के राजा बनने पर तेरे देश की जनता कितनी खुश है ।। तूं कहां चली गई मां ।। तेरी लाश कहां गई? छवि वहन तू भी मां के साथ ही चली गई, पगली, तेरे भाई के -रहते भला वह कुत्ता तुझसे शादी कर सकता था, मैं तेरा..."




ज्यादा सुना नहीं गया विकास से, तो दरवाजा खटखटा दिया उसने ।




अन्दाज एकदम बन्द हो गई ।



सुबकने की आवाज भी बन्द ।




दर्दयुक्त स्वर में पूछा गया----"कौन है?"



"वतन, मैं हूं विकास । " उसने कहा-----"दरवाजा खोलो । "

फिर, कुछ देर सन्नाटा----फिर दरबाजे की तरफ़ अाती कदमों की आवाज । एक झटके से दरवाजा खुला ।



आखों के सामने था विकास के बराबर लम्बा वतन । दूध जैसे सफेद लिबास में वाकई देवता सा लता था वह । आंखों को ढके हुए वही सुनहरे फ्रेम का काला चश्मा, कुछ देर तक तो सारे के सारे देखते ही रह गए उसे । कपोल पर एक भी तो आंसु नहीं था ।




फिर, इस अजीव से सन्नाटे का तनाव बागारोफ ने समाप्त किया----"" चिड्री के पंजे, यहां है तू ? वहां चमन के हर कुएं में तुझे खोजने के लिए जाल डलवा दिए । सबकी जान निकाल दी तूने-खिला हुआ गुलिस्तां मुर्झा उठा ।"



" चचा !" वतन ने उसकी कोई बात सुनी ही नहीं-----"आओ मेरे साथ ।" बागारोफ की दोनों कलाइयां पकड़कर वह उसे अन्दर ले गया, कमरे के गन्दे फर्श की और संकेत करके बोला…"यहाँ चचा, अपनी मां और बहन की लाशों को यहां छोड़ गया था मैं । अब वे गायब हैं ।"




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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 29 Jun 2016 22:50

बागारोफ का दिल फूट-फूटकर रोने के लिए मचल उठा, पर स्वयं को संभालकर बौला---"अब यहाँ कहां से होंगी वे लाशें बारह साल हो गए उस बात को, अब तक यहां लाशें कहां होतीं ?"




.…"क्यों चचा ?" वतन ने पागलों की तरह कहा…"कहां गई होंगी वे लाशें ?"




…'"अबे भड़वे, अमेरिकनों ने दफना दी होंगी ।" अपने शब्दों में से रोने की आवाज को छुपा नहीं पाया बागारोफ ।



-"नहीं चचा, यह नहीं हो सकता ।" वतन जैसे वास्तव में पागल हो गया बा---" कुत्ते इन लाशों को उठाना तो दूर, इस स्थान में घुस भी नहीं सकते थे । जानते हो चचा…मेरी मां और वहन की लाशों में इतने लम्बे लम्बे कीड़े पड़े थे ।। ऐसी सड़ाघ उठ रही थी चचा कि मुझसे भी रहा नहीं गया यहां । फिर...फिर वे कुत्ते उस सड़ांघ में यहां क्यों अाते ? क्यों उन लाशों पर से कीडे हटाते ? "




बागारोफ ने संभाला खुद को बोसा----" अबे हरामजादे । उन्होंने न भी हटाया हो तो क्या इतने दिनों तक कोई लाश पडी़ रह सकती है ?”



" क्यों...क्यों चचा, जब उन्हें कोई उठाएगा नहीं तो वे चली कहाँ जाएंगी ?"

-"अबे उल्लू की दुम फाख्ता, इतने दिनों तक तो ताश वैसे भी नहीं टिकती ।" बागारोफ ने बताया-----"कुछ कीड़े खा गए होंगे, कुछ सढ़कर सूख गई होंगी । गिद्धों की नजर पड़ गई होगी तो गोश्त को वे नोच कर खा गए होंगे । बचे-खुचे को कुतों ने नोंचा होगा ।"



" ओह ! हां चचा -- हां यहीं तो हुआ होगा । जब कुत्तों ने मेरो मां के गोश्त को झझोड़ा होगा तो..."





" चुप !” बुरी तरह चीखकर रो पड़ा बागारोफ-चुप हो जा हरामजादे ! आखिर रुलाकर ही छोड़ा न तूने ! दिल पर जख्म किए ही चला गया ! कहां तक रोकता मैं ? चुप हो जा--- वरना मार-मारकर उड़नतश्तरी बना दूंगा ।"





फिर देखने बातों ने देखा---रोते हुए बागारोफ को । बच्चों की तरह फूट----फूटकर रो रहा था वह ।





कुछ पल, अवाक्-सा वतन उसे देखता रहा, बोला…"रो रहे हो चचा ! इस मे रोने-की क्या बात है ?"





" कुछ नहीं चमगादड़ की दूम--कुछ नहीं !" कहने के साथ ही बागरोफ ने वतन को अपने से लिपटा लिया । लिपटाकर रोने लगा वह । बागारोफ ही नहीं, सब रो रहे थे । धनुषर्टंकार और अपोलो की आंखो से भी आंसू टपक रहे थे ।




आंसू नहीं चमक रहे थे तो वतन के ।




बागरोफ के गले से लिपटे वतन की नज़र विकास पर पडी़ तो बोला--"विकास, मेरे यार ! वो सुरंग देखेगा जिसमें से जाकर मैंने जिम का कत्ल किया था ? आ तुझे दिखाता हूं मैं ।" कहने के साथ ही वह बागरोफ की बांहों से निकला, बिकास का हाथ पकडकर बाथरूम के दरवाजे तक पहुंचा और उस छोटी-सी सुंरग को दिखाता हुआ बोला---" देख ये है वो सुंरग -- कितनी छोटी है ! मैं पागल था न मैंने सुरग बड़ी नहीं बनाई । बडी बनाता तो सव वच जाते--- मैग्लीन के दरवाजा तोड़ने से पहले ही सब निकल जाते----मगर ,मैंने कितनी छोटी सुरंग बनाई ।। मैंने ही तो अपने मा , बहन और पिता को मारा है । सोच मेरे यार----सुरंग बड़ी होती तो निकल........

"वतन !" विकास ने उसे अपने सीने से लिपटा लिया---" तू घबराता क्यों है ? तेरी मा, बहन और पिता का हत्यारा तो मौजूद है --- मैग्लीन ......




" हां ।" वतन गुर्राया ---" वह कब्जे में है मेरे...उसे मैं जिन्दा न छोडूंगा विकास । उसे तडपा तडपाकर मारूगा ।"



"उसकी यही सजा है वतन-उसकी यही सजा है ।" विकास ने कहा --- " मैं तेरे साथ हूं। जैसा तु कहेगा ---उसे वेसे ही मारेंगे ।"


" बिकास ।" वतन ने पूछा…"जानवर अगर मेरी मां और बहन की लाशों का गोश्त खा गए होंगे तो हड़िडयां तो बचीं ही होगी ?"



" छोड़ वतन, इस बात को छोड़ मेरे दोस्त । " विकास ने कहा ।



लेकिन वतन नहीं माना । वह तो जैसे पागल हो गया था, बोला-----" मेरे साथ, माँ , बहन की हहिडयां दूढने में मेरी मदद कर ।"


विकास ने, विकास के साथ विजय, अलफांसे इत्यादि सभी ने उसे रोकने, उसे पकड़ने की बहुत कोशिश की, मगर सबकी गिरफ्त से खुद को निक्लता हुआ लह मकान से बाहर निकला । लॉन की लम्बी, कटीली, झाडियों से युक्त जंगली घास में कुछ तलाश करने लगा ।



ठीक पागल-सा लग रहा था वह ।




मकान के दरवाजे पर खडे़ सभी उसे देख रहे थे । सोच रहे थे-क्या इस वक्त पागल-सा नजर अाने बाला यह वतन-क्या वही वतन है जिसने समुद्र के पानी से सोना वना लिया ? जिसने विना हत्या किए अमेरिका जैसे राष्ट्र को झुका दिया ?



यकीन नहीं होता था कि यही वतन है वह ।



एकाएक चीख पड़ा वतन…'विकास, मेरी मां या बहन में से किसी की एक हडडी मिल गई ।"




सभी ने देखा, वतन के हाथ में सचमुच एक हडडी दबी हुई थी । बोला---"इन्हीं झाडियों में सारी हडि्डयां होंगी । उन सभी को ठूंठ लुंगा ।" और वह पुन: झाडियों की खाक़ छानने लगा ।

जिस प्रचंड अाग की तरह सारे चमन में यह खबर फैली थी , कि वतन गायब हो गया है, उससे भी कहीं ज्यादा तेजी के साथ यह खबर फैली कि वतन मिल गया है ।



बह अपने उस मकान में है , जिसमें उसकी मां और वहन की लाशें सड़-सड़कर समाप्त हो गई थी ।



सारा चमन जैसे उस मकान पर ही उमड पड़ा ।



जिसने सुना, वही दौड़ पड़ा ।


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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 29 Jun 2016 22:51

कुछ ही देर बाद वतन के मकान से बाहर खड़ा अपार जन-समुदाय वतन की जय जयकार कर रहा था ।



इस वक्त वतन अन्दर था---विजय, विकास, अलफांसे, पिचासनाथ और बागारोफ के घेरे में । भावुकता के भंवर में डूबे वतन को सामान्य स्थिति तक लाने में काफी मेहनत का पड़ी ।



झाडियों में से वतन ने बहुत सारी हहिडयां ढूंढ ली थी ।। निदृसन्देह वे हडिडयां उसकी मां और बहन की थी ।



उन हडिडयों को विकास ने अपने कब्जे में कर लिया था ।



विजय, अलफांसे इत्यादि ने भावुकता के भंवर मे फंसे वतन को चमन के नागरिकों के सामने ले जाना उचित नहीं समझा था ।




वतन को नियंत्रित करने में उन्हें इतनी देर लगी कि चमन के निवासियों ने आज वतन के स्वागत करने के लिए जितने प्रबंध राष्ट्रपति भवन पर किए थे---सब उसके मकान पर पहुंच गए ।।


वतन के घर के बाहर बैण्ड बजने लगे ।।

।लोग खुशी से नाच रहे थे ।



वतन बाहर अाया तो उसकी जय-जयकार से सारा आकाश गूंज़ उठा ।



चारों तरफ हर्षोल्लास, खुशियों में झूमता चमन ।। खुशियों का शोर एकाएक उस वक्त बन्द हो गया, जव हाथ उठाकर वतन ने सबको शांत किया ।



वतन के इस संकेत पर ऐसा सन्नाटा छा गया कि सुई भी गिरे तो आवाज हो ।





"मेरे प्यारे देशवासियों !" वतन की आवाज गूंज उठी…"मेरी माताओं बहनो, भाइयो और मेरे प्यारे वतन के नन्हें मुन्ने बच्चों ।। बज करीब बीस साल बाद हम आजादी की सांस रहे हैं । संकल्प करो कि आजाद ही रहेंगे, कभी दूनिया की किसी भी ताकत के अागे सिर नहीं झुकाएँगे । आज खुशी का मौका हैे-जी भरकर खुशियां मनाएं । ये दूटा-फूटा मकान, जिसमें मेरा जन्म हुआ , अाप सब इस स्थान को जानते हैं । इस मकान में मां और बहन की लाशें सड़-सढ़कर समाप्त हो गयी । इसी मकान में मैंने संकल्प लिया था कि अपने देशवासियों पर होने वाले जुल्म का सीना चीर दूंगा । इस छोटे-से देश की बागडोर खुद संभालकर इसे स्वर्ग बनाऊंगा । मेरा सौभाग्य है किं अाज अाप सब मिलकर इस देश की बागडोर मेरे हाथ में दे रहे हैं । जिस तरह आज़ तक चमन के हर नागरिक का दर्द मेरा दर्द रहा---मैं वादा करता हूं हमेशा रहेगा । मेरी इच्छा है कि अाप सब स्वयं मुझे इस मकान से ऱाष्ट्रपति भवन तक पहुचाएं ।"


इस तरह बहुत थोड़े शब्दों में वतन ने अपनी अभिलाषा प्रकट की ।।


फिर खुशियों से भरा एक जलूस वतन के मकान से चला ।।।

खुशियों में झूमते लोग अपना अस्तित्व भूलकर नाच रहे थे ।

चमन के हर बाजार, हर सड़क से यह जुलूस गुजरता चला गया ।



विकास इत्यादि जुलूस में सबसे पीछे वतन के साथ थे । चमन के नागरिकों ने सजा-संवारकर उसके बैठने के लिए एक विक्टोरिया तैयार की थी, किन्तु वतन उसमें नहीं बैठा, वह पैदल ही चल रहा था ।



वतन पर असंख्य'पुष्पों की वर्षा हो रही थी ।




"विकास अपनी आखों से सब कुछ देख रहा था…चमन् के बच्चे, स्त्री, पुरुष, बूढे़ , जवान वतन ,इस तरह पूज रहे थे मानो वह उनका राजा नहीं भगवान हो ।



बिकास ने देखा था, कोई बूढी महिला वेहद श्रद्धा के साथ उसके पास अाती वतन झुक्क कर उसके चरण छू लेता ।




---"अरे .... अरे...... " बौखलाकर महिला हटना चाहती तो वतन कहता है-"मेरी मां मरी कंहा है ? तुम तो हो ?"




गदगद होकर महिला उसे अपने सीने से लिपटा लेती । विकास ने देखी थी--महिलाओं की छल-छलाती आंखें ।




कोई युवती श्रद्घा के साथ उसे माला पहनाना चाहतीं तो बीच में ही हाथ रोककर कहता वतन…"भाई को माला नहीं पहनाई जाती बहन ! तुम तो मेरी छवि की छवि हो ।।।। जब तू इसे अपने पति के गले में डालेगी तो तुझे सहारा 'दूगा मैं ।"





आखें भरकर चरणों में झुकती तो बीच में ही रोकर बोलती पगली, भाई के पैर छुकर क्या मुझे पाप लगाएगी ?"





कोई बच्चा अाता तो वतन गोद में उठाकर उसे चूम लेता।।


"बिकास देख रहा था और साथ ही साथ सोच भी रहा था…क्या वतन के अतिरिक्त दुनिया के किसी अन्य आदमी को कभी इतने जन-समुदाय का इतना अधिक प्यार मिला है ? सम्भव है, मिला हो, किन्तु ऐसी श्रद्घा तो लोग भगवान के अलावा किसी को नहीं देते ।



और...और उन लोगों ने तो वतन को मुजरिम समझा था ।।



न जाने क्यों विकास स्वय को वतन के सामने बहुत बौना सा महसूस कर रहा था । बिकास वतन को मिलने वाली उस असीमित श्रद्धा को देखता रहा, उसके साथ चलता रहा । सारे चम्न की सड़कों से होता हुआ जुलूस शाम के चार बजे राष्ट्रपति भवन पर पहुचां ।।।

राष्ट्रपति भवन से अमेरिका का झण्डा उतारकर चमन का झण्डा -फहराया गया ।



अनेक प्रोग्रामों के बाद यह वक्त अाया जब वतन का राजतिलक होने वाला था । वतन ने कहा…"मेरी इच्छा है कि मेरे माथे पर सबसे पहला तिलक फलवाली दादी मां करें ।"



नागरिकों की तरफ से वतन की इच्छा का हर्षध्वनि से स्वागत किया गया ।




वतन ने पुन: कहा…"मैं दादी माँ को लेकर अा रहा हूं।" कहने के साथ ही, भीड़ के बीच से निकलता हुआ वतन राष्ट्रपति भवन से बाहर निकल गया ।



अपोलो घण्टियां बजाता उसके साथ था । अन्य की तो बात ही दूर, विकास इत्यादि में से भी किसीने उसके साथ चलने का उपक्रम नहीं किया ।




खुद ही कार ड्राइव करता हुआ वतन बूढि़या की झोंपडी पर पहूंचा ।




अन्दर से आव्ज अाई----" कौन है ?"



"यह मैं हूँ दादी मां-तुम्हारा वेटा, वतन ।"




"आ गया तू कलमुंहे ।" अंदर से आवाज आई…"राजा बनते ही भूल गया मुझे।"




दरवाजा खुला, सामने थी अात्यधिक बूढी महिला ।



बेहद श्रद्धा के साथ वतन ने उसके पांव छू लिए, बोला ---" माफ करना दादी मां ।"





"माफ ! " कहकर इस तरह पीछे हटी हटी जैसै वह वतन से बेहद नाराज़ हो'-"राजा बनते ही उन फलें को भूल गया, जो मुझसे उधार खाए थे ? मैं यहां बैठी हूं कि मेरा उधार चुकाने आएगा और तू...तू..कहां चला गया था रे ?"



" कहीं भी तो नहीं मां ।" वतन ने गम्भीर स्वर में कहा---"अपने घर में ही तो ग़या था । सोच रहा था कि आखिरी बार मैंने अपनी मां और बहन की लाशों को वहीं छोडा था-शयद मिल जाएं ।"




“पागल ।" कहकर उसने वतन र्को अपने गले से लिपटा लिया ।




" मैं भूला नहीं हूं दादी मां !" वतन ने कहा‘--"तुमसे उधार लेकर नौ सौ आठ सेर फल खाए हैं मैंने । आज...आज तुम्हारा सारा उधार चुकाऊंगा । दादी मां, हिसाब में तो गड़बड़ नहीं है ? तुम्हें भी याद होगा ।"

" बेटे चाहे याद रखें कि उनकी मां ने उन्हें कब क्या दिया है लेकिन मां याद नहीं रखती । इसलिए नहीं कि उसे याद नहीं रहता बल्कि इसलिए कि वह याद रखना नहीं चाहती । बेटे तो कपूत होते हैं न, लेकिन मां कुमाता नहीं ।"




" फिर भी दादी मां…हिसाब तो है ।"



" तो ला फिर, देता ,क्यों नहीं मेरे पैसे?" बूढिया ने उसे डाटा-" यूं ही बातों से पेट भर देगा क्या ?"



" दूंगा क्यों नहीं दादी मां !" वतन ने कहा…"तुम्हें साथ ले चलने के लिए ही तो अाया हूं।"



"कहा ?"




"राष्ट्रपति भवन में ।" वतन बोता-----" सब तुम्हारा ही तो इन्तजार कर रहे वहां"




"‘वहां मेरा क्या काम ?" बुढिया ने सुनकर कहा…"मेरे पैसे देने हैं, पैसे दे और जा यहां से ।"




"क्यों मां, क्या इस लकीर को भूल गयी तुम ?" अपने सीधे हाथ में चाकू द्वारा वनी लकीर के सूखे ज़ख्म को दिखाता हुआ वतन बौला---"तुम्हारे ही चाकू से तो यह लकीर बनाई थी । तुमने कहा था न कि जिसके हाथ में यहा लकीर नहीं होती, वह राजा नहीं बनता । अगर तुम उस दिन मुझे यह बात न बतातीं दादी मां, तो मुझे क्या पता लगता ? मैं भला अपने हाथ में लकीर क्यों बनाता । यह लकीर न बनाता तो सच दाद्री मां, मैं राजा तो की थोड़े ही ना बन सकताथा।"



" पगला ।" वतन को उसने और जोर से लिपटा लिया…"मैंने तो तुमसे झूठ बोला था ।"




"'मैने तो सच ही समझा था मां !" वतन बोला----"मैं अपने हाथ में यह लकीर न बनाता तो कभी राजा नहीं बनता । मेरा विश्वास है मा कि इस लकीर की वजह से ही राजा बना हूं मैं । क्या तुम मुझे अपनी आंखों से राजगद्दी पर बैठा हुआ न देखोगी ?"




"अच्छा चल, मैं चलती हुं--ज्यादा, बात मत वना ।।" इस तरह…फलवाली बुढ़िया को अपने साथ कार में बैठाकर वतनने कार दौड़ा दी।।



तब --जबकि ब्रेकों की चरमराहट करती हुई कार एक झटके के साथ रुकी सबसे पहले खुली हुई खिड़की से बाहर कूदा अपोलो । घंटियों की आबाज से वातावरण झनझन्नाया ।



अगले हीं पल-बैंड और शहनाई की आवाजों में घंटियों की टनटनाहट विलीन होकर रह गई ।।

सहारा देकर वतन ने बुढिया को कार से बाहर निकला । जोरदार स्वागत किया गया ।


बुढिया पर फूलों वर्षा हो रही थी । वे राष्ट्रपति भवन में प्रविष्ट हो गए ।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

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