चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़) complete

Jemsbond
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Post by Jemsbond » 16 Oct 2016 18:01


स्क्रीन की मशीनरी पर प्रकाश डाल रहा था----अलफांसे । वतन ने मशीनरी के अन्दर लगा एक विशेष स्विच दबा दिया ।


परिणामस्वरुप उन छहों स्क्रीनों के बीच रखी घुमने बाली वह कुर्सी एकदम उल्ट हो गई ।



वतन तेजी से उसी तरफ़ बढा ।



"रोशरी इधर दो चचा !" वतन ने कहा ।



टॉर्च की रोशनी में वतन कुर्सी के निचले भाग को गौर से देखने लगा । फिर उसका नन्हा सा बटन, जो काफी बारीकी से देखने पर चमकता था,वतन ने दबा दिया 'घुर्र....घुर्र करती ऐसी हल्की आवाज होने लगी मानों कुर्सी के अम्दरूनी भाग में कोई छोटी-सी मशीन चल रही हो ।


कुर्सी के अन्दर फसा घास-फूस बाहर अाने लगा।



उसके साथ ही बाहर आया---एक डिब्बा । झट से वतन ने वह डिब्बा उठाकर देखा । खोला, अन्दर दो छोटी-सी फिल्में मौजूद थी ।


उन्हें देखकर वतन ने कहा…द्रेखो चचा, मैं कहता था न कि कोई भी आदमी इस फार्मूले तक नहीं पहुंच सकता । यह सुरक्षित है ।"



"'क्या इन्हीं फिल्मों में 'वेवज एम' का फार्मूला है !"



“एक फिल्म में 'वेवज एम' का, दूसरी में 'अणुनाशक' किरणों का ।" वतन ने कहा…"इसे नहीं ले जा सका वह ।" '



"ले तो तभी जाता जब पता होता कि फार्मूला यहां है ।" अलफांसे ने कहा…" उसेे पता ही नहीं था ।"




--""मैं कहता था न, किसी को पता नही लगेगा ।"



"मगर अब लग गया है ।" अलफपृसे का लहजा एकदम बदल गया----"अब तो ले ही जाऊगा ।"’



"क्या मतलब है" वतन अभी बूरी तरह चौंका ही था कि---


"ये धमाके टाइमबमों के हो रहे थे वतन बेटे ।" कहते हुए अलफासे ने उस पर जम्प लगा मैं ।


वतन अभी कुछ समझ भी ना पाया था कि डिब्बा उसके हाथ से निकल गया ।
धनुषटंकार और अपोलो मोखले से बाहर निकले तो विभिन्न दिशाओं में में दौड़ लिए ।


कक्ष का यह रास्ता एक हॉल में खुला था और हॉल से बाहर निकलने के लिए अनेक रास्ते खुले पड़े थे ।


अपनी-अपनी दिशा में उन्होंने किसी ऐसे संदिग्ध आदमी को तलाश किया जो वह मोखला बनाकर कक्ष के-बाहर निकला हो जिसके रास्ते से वे बाहर अाए थे ।



इसे संयोग ही कहा जाएगा कि अपनी-अपनी दिशाओं से निराश होकर वे आधे घण्टे बाद एक साथ हाँल में अाए ।



दोनों की नजरें मिली ।



आंखों ही आखों में वे समझ गए कि दोनों ही नाकाम लोटे हैं ।


एक साथ उस मोखले द्वारा कक्ष में प्रविष्ट हुए । वहां पहुंचते ही बुरी तरह चौक पड़े वे ।।

दृश्य ही सा था । चौंकने की बात ही थी ।




टार्च रोशन एक प्रयोग डेस्क पर रखी थी और उसकी रोशनी में अभी-अभी उन्होंने अलफांसे को गिरते देखा था । वह स्वय नहीं गिरा था बल्कि वतन ने उसकी कनपटी पर घुसा मारा था ।



उनकी आखों के सामने एक चीख के साथ अलफासे फर्श पर गिरा था ।



वे दोनों झटपट वतन और अलफांसे के करीब पहुंचे । देखा…अलफांसे फर्श पर गिरा तो फिर उठा नहीं । वह वेहोश गया था ।



उसके बेहोश जिस्म पर पैर रखे वतन बुरी तरह हांफ रहा था ।


दोनों के ही जिस्मों पर जगह-जगह घाव थे ।



दोनों के ही कपड़ों पर खून क दाग ।।



" देखने से ही पता लगता था कि दोनों में तुफानी जंग हुई है ।



इस जंग का नतीजा उनके समाने था । बेहोश अलफांसे और हांफता हुआ वतन । कई स्क्रीनें टूट गई थी । कई डैस्कों का सामान इधर-उधर बिखरा हुआ था ।
अपोलो और धनुषटंकार अ्वाक देखते रहे ।।।



-जो कुछ वे देख रहे थे, उस पर उन्हें यकीन नहीं हो रहा था ।



वे चमत्कृत से देर तक उन दोनों को देखते रहे । जब धनुषटकार से नहीं रहा गया तो वतन के सामने अा गया ।।



"'तुम कहां चेले गए थे मोण्टो ?" अपनी सांस पर काबू करने की चेष्टा करते हुए वतन ने पुछा ।।।
मगर…धनुषटंकार का दिमाग इतने नियन्त्रण में कहां था कि वह वतन द्वारा पूछे गए प्रशन पर गौर करके उसका उत्तर देता ।।। … वतन के प्रश्न का जवाब दिए बिना में धनुषटंकार ने किसी गूंगे की तरह सांकेतिक क्षाषा में प्रश्न क्रिया--" ये सब क्या चक्कर है ?"



उसका आशय समझकर वतन ने जवाब दिया----"फार्मूला अन्य कोई नहीं, चचा ही यहाँ से निकालकर ले जाना चाहते थे ।" धनुषटंकार तो चौंका ही, साथ ही बुरी तरह चौंके विना अपोलो भी न रह सका ।



चौंके हुए धनुषटंकार ने इस बार पूछा…क्या मतलब ?"'



"मतलब यह कि चचा चमन में इसलिए नहीं अाए थे कि जब मैंने 'वेवज एम' के बारे में घोषणा कर दी है तो महाशक्तियों के जासूस मुझसे मेरे यंत्र और फार्मुले को छीनना चाहेंगे अोर उन्हें परास्त करने में ये मेरी मदद करेंगे वल्कि ये यहाँ इसलिए अाये थे कि ये मेरे फार्मुले और यंत्र को चुरा सके और मुंहमांगे दामों में किसी भी देश बेच दें ।"

" ओह !” इस बार धनुषटंकार ने डायरी पर लिखा----" ये तो डबल गुरू की पुरानी आदत है और अपने इस बिजनेस में ये इस बात की परवाह नहीं करते कि इन्हें दोस्तों से टकराना पड़ा है या दुश्मनों से । कई वार ये ऐसी हरकत बिकास और स्वामी विजय केसाथ भी करचुकै हैं ।। कहते हैं की वे किसी भी सम्बन्थ से बढकर अपने सिद्धान्त और बिजनेस को मानते हैं ।"



पढ़ने के बाद वतन ने कहा…"यही हरकत इन्होंने मेरे साथ भी की । "



"’लेकिन यह सव कुछ हुआ कैसे ?" धनुषटंकार ने पुन: लिखकर पुछा -"ये तो हमारे साथ थे;-- फिर सर्चलाइटों का टूटना, चार आदमियों का खाई में कूदना, प्रयोगशाला के अन्दर धमाके, इस कक्ष में धमाका...यह सब क्या था ? किसने किया ?"
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Post by Jemsbond » 16 Oct 2016 18:02




-"ये सारा जाल इनका का ही बिछाया हुआ था ।" वतन ने बताया-"मानना पड़ेगा कि इनकी हर चाल, पूरी साजिश, एक स्वस्थ दिमाग से सोची हुई थी । इनके दिमाग को मान गया मैं । इतनी देर तक हम दुश्मन के साथ रहे और दुश्मन को पहचान न सके ।"



-"लेकिन हमें भी तो बताओ भैया, कि ये सव कुछ इन्होंने किया कैसे ? "
-"सुनो ।" वतन ने कहना शुरू किया-“आज दिन में जव ये हमारे साथ यहाँ अाए थे तो हमारी नजरों से छुपाकर इन्होंने एक टाइम बम दीवार कं सहारे इमरजेंसी लाइट के पास फिट कर दिया । तुम्हें याद होगा अपोलो कि दिन में ये तुम्हारे साथ लैट्रीन गए थे । इन्होंने हाथ उन्हीं तीन जनरेटरों के पास धोए होंगे जो बम-बिस्फोट से नष्ट हुए ।"



'अपोलो ने स्वीकृति में गर्दन हिलाई ।



-------"तुम्हारी स नजरों से छुपाकर इन्होंने एक टाइम बम उस जगह फिट कर दिया ।” वतन ने बताया---"इंसके बाद दोनों को याद होगा कि शाम को ये कुछ देरके लिए भवन से गायब हो गए थे है मेरे पूछने पर इन्होंने बताया था कि चमन की सैेर करने गए थे, परन्तु हकीकत यहीं थी कि उस समय में इन्होंने प्रयोगशाला के बाहर वाले मैदान में हमारे चार सैनिकों क्रो मार डाला । मारकर उनकी लाश को छोटी-छोटी कीलों और रेशम की डोरी की मदद से खाई में लटका दिया ।

उन चारों की मशीनगनें इन्होंने मैंदान के चारों कोनें पर जमीन में फिट कर दी-इस तरह कि उनका निशाना हर पल अपनी-अपनी तरफ वाली सचंलाइर्टों पर था । गनों के ट्रेगरों के साथ इन्होंने स्प्रिंग के छोटे-छोटे टुकडे बांध दिए । स्प्रिंग के दुकड्रो के दूसरे सिरों में लोहे की एक गेंद जैसी वस्तु थी जो असल में टाइम बम के सिद्धान्त पर तैयार की जाती है । लोहे की उस गेंद के अन्दर एक घडी होती है ।




-----उस घडी में जो टाइम फिट कर दिया-जाए-- उस वक्त तक तो वह आराम से चलती रहेगी मगर ठीक तब जबकि इसमें भरा टाइम समाप्त हो जाएगा बन्द हो जाएगी बन्द होते वक्त वह एक तेज झटके के साथ अपने स्थान से की तरफ उछलेगी । वैसी ही गेंदों के टाइमों में एक एक मिनट का अन्तराल करके इन्होंने गनों के ट्रेगरों में बन्धे स्पिंगों के दूसरे सिरों से फिक्स कर दी । टाइम समाप्त होते ही गेदों में झटके हुए और चारों गनों से एक-एक गोली निकलकर अपने-अपने लक्क्ष पर जा लगी ।



------- गनों को फिक्स करना और उन गनों के मालिक हमारे चार साथियों को मारकर खाई में लटका देने का काम इन्होंने उसी समय में किये थे जिसमें ये गायब रहे । ये सारे काम इन्होंने किए भी इतनी सावधनी से कि कोई उन्हें नोट भी नहीं कर सका ।"
सास लेने के बाद वतन ने पुन: कहा----" स्कीम इन्होंने अच्छी तरह सोच-समझकर बनाई थी । अपनी उसी स्कीम के मुताबिक इन्होंने विभिन्न स्थानों पर फिक्स टाइम बमों के टाइम बंमों के चलने इत्यादि के टाइम सैट किए थे । ठीक वक्त के अन्तराल से चारों गर्ने चली । वही हुआ जो ये चाहते थे ।

-------- चारों सर्चलाइटें फोड़कर इन्होंने अंधेरा कर दिया । स्वाभाविक था कि फायरों की आवाज को सुनकर मैं रात ही को यहाँ अाता । अपनी योजना के मुताबिक ये हमारे साथ अाए । जिस मकसद से इन्होंने यह अंधेरा किया था, उसका इन्होंने भरपूर लाभ उठाया । अंधेरे का लाभ उठाकर इन्होंने कील सहित लाशों को पानी में डाल दिया और मेरे दिमाग में यह बाल घुसेड़ने की कोशिश करने
लगे कि सैनिकों का लिबास पहने खाई में कुदने वाले वे ही दुश्मन है जिन्होंने सर्चलाइट तोड़ी हैं और जो लेग ' वेवज एम' का फामूला चुराने का मकसद लेकर यहां आऐ है । इसके बाद प्रयोगशाला के अन्दर धमाका-------


------फिर इस कक्ष ----- यह सब कुछ इनकी एक शातिराना चाल धी । इन्होंने कुछ ऐसे दुश्मनों का भ्रमजाल फैलाये जो कहीं थे ही नहीं । हम उस जाल में फंसे रहे, हम ही क्या सचमुच, आदमी चाहे जितना समझदार हो, ऐसे जाल में फंस जाना स्वाभाविक ही है ।

-इनका मकसद था-कल्पनिक दुश्मनों का पीछा कराते हुए हमे इस कक्ष तक लाना ये पहले ही जानते थे कि इस कक्ष में पहुंचकर इन्हें यह भी साबित करना पड़ेगा कि इस कक्ष में अन्दर दुश्मन जिस रास्ते से भाग गया । अत: कहानी बड़े स्वाभाविक बनाने के लिए इन्होंने पहले ही टाइम बम को इस तरह फिक्स क्रिया था कि दीवार में मोखला वन जाये ताकि उस मोखले को दिखाकर ये यह कह सकें कि दुश्मन इसमें से भाग गया है । "




-------" इस तरह इन्होंने एकं ऐसे काल्पनिक दुश्मन का नाटक रचा जो असल में था ही नहीं ।" वतन ने सांस लेने के बाद कहा----"सर्चलाइट का फूटना, चार का खाई में कूदना, प्रयोगशाला के अन्दर धमाके, कोई यह सोच भी नहीं सकता कि यह सब कुछ स्वय ही हो रहा होगा । हर आदमी उन परिस्थितियों में उसी कहानी पर चलेगा जो यह बनाना चाहते थे । अत: हर आदमी यहीं सोचेगा कि दुश्मनों ने पहले सर्चलाइर्टे फोडी, खतरनाक-जीवों से बचने का कोई इन्तजाम करके खाई में कूदे, किसी तरह अन्दर पहुच गए, इत्यादि ! इसी भ्रमजाल में फंसाकर ये हमें ऐसे दुश्मनों का पीछा कराते हुए, जो कभी थे ही नहीं, यहां तक ले जाए । इन्हें मालूम था कि यहा अाने पर हमारे दिमाग में प्रश्न उभरेगा कि बन्द कक्ष में से दुश्मन कंहा गए ? इसका जवाब इस मोखले के रूप में इन्होंने पहले ही तैयार कर लिया था ।
" उसी मोखले में से गुजरकर तुम दोनों उस काल्पनिक दुश्मन की तलाश में चले गए । दुश्मन जब इनके अलावा कोई था ही नहीं तो किसी के मिलने का सबाल ही नहीं उठता था । मैं भी तुम्हारे इस गोखले में झपटने बाला था कि इन्होंने मुझे रोक दिया ।



अब क्यों कि इन्हें यह नहीं मालूम था कि इस कक्ष में फार्मूला रखा कहां है, अत: इन्हें फार्मुले का पता लगाना था । अपने उसी मकसद को पूरा करने के लिये इन्होंने मुझसे कहा कि दुश्मन फार्मूला लेकर इस मोखले के माध्यम से भाग गया है ।



-------स्वाभाविक है कि ऐसी परिस्थितियों में हर आदमी सबसे पहले यह चैक करेगा कि उसकी वह महत्वपूर्ण चीज, जिसे उसने छुपाकर रखा है, अपनी जगह पर मौजूद है भी या नहीं ? मैंने भी चेक किया---- फिल्म देखते ही मेरे प्रति इनका लहजा बदल गया । इन्होंने पर जम्प लगा दी और मेरे हाथ से यह डिब्बा छीन लिया जिसमें फिल्म थी, मगर मेरे विचारनुसार, इनकी स्कीम यहाँ अाकर कमजोर हो गई ।"

"‘कैसे ??" धनुषटंकार ने इशारे से पूछा ।



----" मुझें आश्चर्य है इतनी चक्कदार और साफ सुथरी योजना बनाने और सफलतापूर्वक उस पर चलने के बाद अपनी मंजिल के चरम बिन्दू पर पहुंचकर इन्होंने इतनी बडी भूल कैसे कर दी कि जिसका परिणाम यह हुआ ?" कहते हुए वतन ने अलफांसे के बेहोश जिस्म की ओर इशारा क्रिया ।



'"आप कहना क्या चाहते हैं ?” धनुषटंकार ने लिखकर पूछा ।




" मैं यह कहना चाहता हूं के जिस स्कीम से ये हम सबको लेकर इस फिल्म तक पहुंचे, अगर वह स्कीम मैंने बनाई होती , यानी इनकी जगह मैं होता तो इनकी तरह फिल्म पर नजर पड़ते ही अपना असली रूप दिखाने की मूर्खता न करता, बल्कि उसी तरह वना रहता जिस तरह बना हुआ था । कहता कि अब इस फिल्म को यहां रखना खतरे से खाली नहीं है । इन्हें अपने साथ रखो ताकि दुश्मनोें के हाथ न लग सकें । स्वाभाविक-सी बात है कि अगर ये मुझसे यह बात कहते तो मैं फिल्म को कहीं अन्यत्र रखने के स्थान पर अपने पास ही रखना ज्यादा सुरक्षित समझता और मेरे साथ ये रहते ही, प्रयोगशाला से बाहर निकल कर ये धोखे से फिल्म छीनकर भाग जाते तो यह परिस्थिति न बनती जो इस वक्त इनके साथ बनी है, यानी ये बेहोश हैं और एक तरह से इस वक्त मेरी कैद में है"
इन्होंने क्या किया ?"



--'"तुम्हारे यंहा से जाते ही इन्होंने अपना असली रूप दिखा दिया ।" वतन ने वाताया'-"फिल्म देखते ही इन्होंने मुझ पर यह भेद खोल दिया कि यह सब कुछ चक्कर इंन्हीं का फैलाया हुअा है । इनके स्थान पर मैं होता, ऐसी कभी नहीं करता । यह फार्मुला इन्हें मुझसे प्रयोगशाला से बाहर निकलने पर छीनना चाहिए था । आश्चर्य है कि इतनी अच्छी स्कीम बनाने के बाद चचा इतनी सी बात पर धोखा क्यों खा गए हैं"

"मैं जानता हूँ इसका कारण... ।।" धनुषटंकार ने लिखा…"इसका असली कारण यह है कि इन्हें यकीन था कि ' हाथापाई में तुम इनके मुकाबले कहीं भी नहीं हो । इन्हें यकीन होगा कि मल्लयुद्ध में यह तुमसे जीत जायेंगे और तुम्हें यहीं बेहोश करके बड़े आराम के साथ न सिर्फ इस प्रयोगशाला बल्कि चमन से ही निकल जाएंगे । यह तो इन्हें उम्मीद भी नहीं होगी कि उल्टे तुम उन पर हावी ही जाओगे ।"



"यह तो-माना कि 'ओवर कॉफिंडेन्स' के कारण ये अपनी योजना के चरम विन्दु पर धोखा खा गये । " वतन ने कहा-“बल्कि यूं कहो कि 'ओवर
कॉफिंडेन्स भी नहीं, इनका' यह यकीन सहीं था कि मल्लयुद्ध में यह मुझ पर विजय प्राप्त कर लेंगें । नि:सन्देह इस कला में मैं अभी इनका बच्चा ही हूं । ये मल्लयुद्ध के बीच ज्यादातर मुझ पर हावी रहे और लडाई के बीच ही बीच में ये मुझे अपनी वे सब कारस्तानियां सुनाते रहे जो मैंने आपको बताई । यह तो मेरा नसीब ही अच्छा समझो कि मेरा दांव लग गया और मैंने एक वार इनकी कनपटी पर करके इन्हें बेहोश कर दिया । मगर मेरे ख्याल से तो मल्लयुद्ध में अगर ये मुझ पर विजय भी प्राप्त कर भी लेते तो भी ये इस प्रेयोगशाला से नहीं निकल सकते थे ।"



" क्या तुम्हें भी याद नहीं कि मैं कक्ष के बाहर खडे डैनी है और दरवाजा खोलने वाले सैनिक को यह हुक्म देकर अाया हूं कि जब तक मैं न आऊ, किसी को भी इस कक्ष और प्रयोगशाला कि से बाहर न निकलने दिया जाए !"



"हां, याद है... ।" धनुषटकार ने लिखा-" लेकिन बाहर निकलने की कोइं - न कोई तरकीब इनके दिमाग में रही होगी ।"
"खैर...!” वतन ने कहा…“जो भी रही हो-लेकिन फिलहाल तो जो कुछ हुअा, अच्छा ही हुआ । अगर मैं जरा-सा और चुक गया होता इतनी हिफाजत के बाद भी 'वेवज एम' और 'अणुनाशक' किरणों का यह फार्मूला हमारे हाथ से निकल गया होता है"




कुछ देर तक आपस में इसी, तरह की बातें होती रही, फिर ------

-----वतन ने कहा-"खैर जरा वे फिल्में तो दूंढो । हमारी लड़ाई के बीच न जाने वे कहा गिर गई ।" कहने के साथ ही डेस्क से उसने रोशन टॉर्च उठा ली ।

फिर प्रयोगशाला के फर्श पर फिल्मों को तलाश करने लगे ।



कुछ ही देर बाद वे फिल्में धनुषटंकार को मिल गई । उसने उन्हें वतन-को पकड़ा दिया ।



वतन ने सावधानी के साथ अपनी दोनों फिल्में सफेद पैंट की जेब में रखीं । अलफांसे के, बेहोश जिस्म को अपने कंधे पर लादा और प्रयोगकक्ष से बाहर की की चल दिये ।।।




वतन ने वह सब कुछ डैनी को समझा दिया जो धनुषटंकार और अपोलो को समझाया था ।

डेनी और दूसरे सैनिकों को आश्चर्यचकित छोड़कर वे आगे बढ गए । दरवाजा खोलने वाले सैनिक से रास्ता खुलवाकर बाहर आए और मनजीत तथा प्रेयोगशाला के बाहर के, सभी सैनिकों को हकीकत बताकर अपनी कार में जा बैठे ।


हर सैनिक आश्चर्य चकित था ।



डैनी और मनजीत जैसे अधिकारी खुश भी थे, इसलिए कि यह सावित हो चुका था कि कोई दुश्मन था ही नहीं, तो वे पकड़ते किसे ।।




वतन, धनुषट'कार और अपोलो बापस राष्ट्रपति भवन में अा गए ।




वतन ने जब यह कहा कि अलफांसे चचा को होश में लाकर इनसे कुछ बाते की जाएं तो लिखकर धनुषटंकार ने सलाह दी-----" गुरु को इस तरह होश में लाना अाग में हाथ डालने से भी ज्यादा खतरनाक है । इन्हें ताव आ गया तो यकीनन ये सारे चमन में तहलका मचा देंगे ।"

"'तो फिर क्या करें ?”
'यह कि पहले इन्हें अच्छी तरह कसकर बांध दिया जाए ।" धनुषर्टकार ने सलाह दी----"सावधानी के साथ कि अपनी इच्छा से ये अपने जिस्म का एक अंग भी न हिला, सकें । तब इन्हें होश में लाया जाए ।"





" तुम्हारी सलाह पसंद आई मोंण्टो ।" वतन ने कहा---- "निस्सदेह ये हर किस्म के दुश्मन से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं । तुम दोनों मिलकर इन्हें बांधो ।। हर जेब की अच्छी तरह तलाशी लो-----कोई नन्हा-सा हथियार भी इनके पास न रह जाए ।"



"और अाप ?"



'"इनके होश मैं अाने पर फिल्म मेरी जेब में नहीं रहनी चाहिए !" वतन ने कहा-----"इन फिल्मों को किसी सुरक्षित जगह पर रखकर वापस लौटता हूँ । " कहने के साथ ही एकदम धूम गया वतन । लम्बे-लम्बे कदमों के साथ वह कक्ष से बाहर निकल गया ।




धनुषटंकार और अपोलो ने एक नजर एक दूसरे को देखा, फिर अपने काम में व्यस्त हो गए । धनुषटंकार अपने कोट की जेब से रेशम की एक मजबूत डोरी निकाली और दोनों ने मिलकर अलफांसे को एक थम्ब के सहारे बांध दिया । फिर धनुषटंकार उसकी तलाशी लेने लगा । तलाशी में कोई खास चीज नहीं, सिर्फ एक कागज मिला । तह खोलकर धनुषटंकार ने वह कागज पढा । उस कागज में लिखा पहला अक्षर पड़ते ही वह उछल पडा ।



फिर राइटिंग पहचानकर उछला ।

अन्त में उसने लिखने वाले का नाम पढ़ा तो खोपडी भिन्ना गई उसकी ।


लिखा था------

------"बेटे बन्दर !



जिसको तुमने बांध दिया है, वह अलफांसे नहीं, तुम्हारा चचेरा भाई है-वतन । और मैं जो फिल्में सुरक्षित रखने गया वतन नहीं, अलफांसे हूं ।


----समझ सकते हो कि अब मुझे राष्ट्रपति भबन में लौटने की कोई ज़रूरत नहीं है ऐसा इन्तजाम मैंने . कर लिया है कि जिस वक्त तुम यह पत्र पढ़ रहे होगे, उस वक्त तक मैं तुममेे से किसी की भी पकड़ से बहुत दूर निकल चुका होऊंगा ।



---सोच रहे होंगे कि यह सब कैसे होगया ?



मैं नहीं चाहता कि यही बात सोचते हुए तुम ज्यादा देर तक अपना दिमाग, खराब रखो । सब कुछ उसी ढंग से हुआ है जैसा कि वतन के भेष में मैं तुम्हें कक्ष में ही बता चुका हूं ।
उस-उसमें इतना परिवर्तन कर लो कि मल्लयुद्ध में तुम्हारा वतन नहीं, हम जीते थे मगर हम जानते थे कि कुछ ही देर बाद जब तुम और अपोलो वापस कक्ष में लौटोगे तो वतन के खिलाफ हमारी जीत पसन्द नहीं करोगे । अत: वतन हमेँ खुद बनना पड़ा और वतन को बनाना-पड़ा अलफांसे ।



प्यारे अन्दर, तुमने वतन को अलफांसे पर कक्ष में वह आखिरी बार करते हुए अपनी आंखों से देखा था जिसके कारण वह बेहोश हुआ, लेकिन नहीं, यह हकीकत नहीं थी । -----------

हकीकत यह थी कि वतन बेचारे को हमने इतना अवसर ही नहीँ दिया कि वह हमारा मुकाबला कर सके । हमने जो कुछ किया, तुम समझ सकते हो कि उस सबकी हमने योजना बना रखी थी । उस योजना के मुताबिक वतन को इतना मौका नहीं देना था कि यह हमारा मुकाबला कर सके ।




इससे पहले कि यह, बेचारा कुछ समझ सकता, उसे बेहोश कर दिया । अपनी योजना के मुताबिक हम पर दो फेसमास्क थे-अपना और वतन का । उन्हीं की मदद से हमने वतन को खुद बनाया और खुद बने वतन । आधे घण्टे में इतने काम हुए । जब हमने देखा कि तुम दोनों आ रहे हो तो अलफांसे बने बेहोश वतन को खड़ा करके एक घूसा मारा ।


-इसके बाद वह फर्श पर पड़ा-रह गया ।


अब यह भी कहोगे कि घूंसा लगते ही तुमने अलफांसे की चीख सुनी थी! हम यह नहीं चाहते कि यह चीख की आवाज तुम्हें ज्यादा देर तक परेशान करती रहे । सीधी-सी बात है कि यह चीख हमने अपने मुह से निकाली थी
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Post by Jemsbond » 16 Oct 2016 18:03




वतन को अलफांसे और हमें वतन बनना इसलिए तो जरूरी था ही कि तुम्हें धोखा दे सकें, इसलिए भी जरूरी था कक्ष और प्रयोगशाला से बाहर निकलना था ।

याद है ना ?


वतन ने डैनी, दरवाजे बाले सैनिक और मनजीत को क्या हुक्म दिया था ?
बाकीं तुम समझदार हो । यह तो समझ गये होगे कि इन फिल्मों को प्राप्त करने के लिए अपनी इतनी शक्ति और दिमाग खर्च किया है तो किस मकसद से ? अपना और वतन का फेसमास्क बनवाने में भी तो खर्चा अाया ही होगा ।। अब ये फिल्में मेरे कब्जे में हैं । जानता हूं विश्व के हर देश को इनकी ज़रूरत है । बोलियां लगेगी-जिसकी बोली सबसे बड़ी…,फिल्म उसी की न...न...न...थोड़ा गलत लिख गया मैं ।।।

आपसदारी की भी तो कोई लिहाज होनी चाहिए, वतन से कह देना तुम्हारा गुरु विकास भी तो अाने वाला है-तो उसे भी समझा देना कि तुम्हें ये फिल्में उस रेट से एक लाख कम में मिल सकती हैं, जो देश इनकी सबसे ज्यादा कीमत लगाएगा ।



माना कि रुस इन्हें एक करोड में खरीदने को तैयार होता है तो तुम्हें निन्यानवे लाख मैं मिल सकती है किसी को भी बेचने से पहले तुम्हें जरूर बताऊंगा कि कितने मैं विक
रही हैं । एक लाख कम में अाप लोग ख़रीदने के लिए तैयार होते हैं तो ठीक वरना मुझे तो एक लाख का फायदा और होगा । शायद आज तक किसी व्यापारी ने आपसदारी की
इतनी शर्म न की हो कि एक लाख का घाटा खाए।




तुम्हारे का गुरू का गुरू

अलफांसे दी ग्रेट ।



पढकर खोपडी भिन्ना गई धनुषटंकार की ।


कमाल तो यह था कि उनके बीच में रहकर ही अलफांसे फिल्म निकालने में कामयाब हो गया । अपोलो ने धनुषटकार के चेहरे पर उड़ती हवाइयां देखी, तो आंखों के संकेत से पूछा…"क्या बात है ? यह पत्र किसका है और इसमें क्या लिखा ?"




धनुषटंकार की समझ में नहीं अाया कि अपोलो को यह कैसे समझाए . बोल यह सकता नहीं था और पड़ना अपोलो नहीं जानता ।



अचानक उसे एक तरकीब सूझी ।


कागज़ की तह करके उसने जेब में डाला । बधे हुए वतन की तरफ बढा करीब पहुंचकर उसने वतन के चेहरे पर अलफांसे का फेसमास्क नोंच लिया ।

अपोलो ने देखा-देखते ही पागल हो गया ------- जैसे
उसके चेहरे पर अभी तक वतन का फेसमास्क था और वतन की ही कार लेकर उड़ा चला जा रहा था वह ।



उसके चेहरे पर उत्तेजना का एक भी लक्षण नहीं था ।



हां…होंठों पर हल्की मुस्कान अवश्य थी ।


कदाचित्-अपनी सफ़लता की मुस्कान ।



कार की गति आश्चर्यजनक रूप से उसने तेज का रखी थी ।


सड़क खाली पड़ी थी, दूर--दूर तक उसके सामने फैली हुई साफ, चिकनी चौड़ी और सड़क । कार की गति से ही अनुमान होता था कि वह जल्दी--से--जल्दी अपने किसी निश्चित लक्ष्य पर पहुंच जाना चाहता था । वह मस्त होकर कार ड्राइव करता हुआ होंठ सिक्रोड़कर सीटी बजाने लगा ।।


पन्द्रह मिनट बाद ही वह चमन के ऐसे भाग में आ गया जहाँ से वस्ती काफी दूर थी । दोनों तरफ दूर-दूर तक खेत फैले हुए थे । कार की हैडलाइटों की बदौलत तो कुछ दुर तक प्रकाश था वरना हर तरफ अंधेरा था----धुप्प अंधेरा ।



मील के उस पत्थर के पास,जिस पर बारह लिखा था, उसने गाड्री रोक दी ।

आराम से बाहर अाया ।

वतन की सफेद पतलून की जैव में से टॉर्च निकाली । दाहिनी तरफ चेहरा करके उसने टार्च का प्रकाश चेहरे पर डाला । ठीक उसके सामने काफी दूर पर एक टॉर्च चमकी ।




ठीक उसी तरह से उधर से टॉर्च रोशन करने वाले ने प्रकाश अपने चेहरे पर डाला । अपने सामने वाले चेहरे को टॉर्च के प्रकाश में देखकर वह संतुष्ट हुआ और अपने हाथ में रोशन टॉर्च लिए वह उसी दिशा में बढ गया ।
उधर से भी हाथ में ,रोशन टॉर्च लिए वह व्यक्ति इसकी तरफ बढा ।



एक खेत के ठीक बीच में वे मिले । मिलते ही अलफासे ने नये आदमी के चरणस्पर्श कर लिए ।



नये आदमी ने उसे चरणों से उठाकर गले से लगाया । बोला…"जीते रहो बेटे । "




फिर… वे दोनों साथ बढ गए । अलफासे ने पूछा---" हैलीकॉप्टर कहां है ?।।



"'बस, यहां से थोडी ही दूर अंधेरे में खड़ा है ।" दूसरे व्यक्ति ने कहा ।



टॉर्च बुझाकर अंधेरे का सीना… चीरते वे आगे बढ़ने लगे ।


कुछ ही देर बाद एक खेत के बीच खड़े हेलीकॉप्टर के करीब पहुचे ।

हेलीकॉप्टर में अन्य कोई नहीं था । अलफांसे को लेने अाने वाला व्यक्ति ड्राइविंग सीट पर बैठा, अलफांसे उसके बराबर हैलीकॉप्टर स्टार्ट करके वह उसे हवा में उठाता चला गया । अपनी निश्चित ऊंचाई पर पहुंचने के बाद हैलीकॉप्टर के अन्दर की लाइट आंन हो गई ।


"अब तो अपने चेहरे -पर से यह फेसमास्क उतार दो !” हेलीकॉप्टर चलाने बाले ने अलफांसे से कहा ।



" जरूर डैडी ?" अलफांसे के मुंह से निकला-"वास्तव में अब इसकी कोई जरुरत नहीं है ।"' कहते हुए उसने अपने चेहरे से फेसमास्क उतार दिया और वतन के उस फेसमास्क के नीचे से जो चेहरा निकला था, वह अलफांसे का बिल्कुल नहीं था ।



वह चेहरा था-हैरौ का-----

हैरी आर्तरट्रांग ।।


अमेरिका सीक्रेट सर्बिस का जासूस ।।


जासूसों के देवता यानी जैकी आर्मस्ट्राग का बेटा ।


और-----हैलीकॉप्टर का चालक अन्य कोई नहीं जैकी ही था-हेरी का पिता ।।
किसी को तुम पर शक तो नहीं हुआ ?", जैकी ने पूछा ।



"नो डैडी…!" मस्ती में हैरी ने कहा-----"वतन बेचारा तो आखिरी पल तक मुझे अलफांसे ही समझता रहा था । धनुषन्टंकार और अ़ापोलो के लिये मैं जब तक अलफांसे बना हुया था, वे मुझे अलफासे ही समझते रहे । हां, अाखिरी वक्त तक वे मुझे वतन .. समझ रहे थे । अलफांसे बने वतन की जेब से जब मेरा पत्र उन्हें प्राप्त होगा तो वे अपने बाल नोंच लेंगे ।"

'क्या वह पत्र तुम अपने नाम से लिखकर अाए हो ?" जैकी ने चौंककर पूछा ।



अापने मुझे इतना बेवकूफ कैसे समझ लिया, डैडी ?" हेरी हल्की सी मुस्कान के साथ बोला-"सारा काम ही अलफांसे बनकर इसलिए करना पड़ा कि वतन को यह मालूम न हो कि अमेरिका ने पुनः उसके साथ कोई हरकत की है । पत्र मैंने ठीक अलफांसे के ढंग से लिखा है और यह तो अाप जानते ही हैं कि अलफांसे की राइटिंग की नकल करना भी मेरे लिए कोई मुश्किल काम नहीं है उस पत्र क्रो पढ़ने के बाद भी वे यही जानेंगे कि फिल्में अलफांसे ले गया ।"



"आज दिन में तुमने हमसे सम्बन्ध स्थापित किया ।" जैकी बोला-"तुमने सारी बातें नहीं बताई । सिर्फ यह कहा कि मैं हैलीकॉप्टर लेकर यहां पहुंच जाऊं और तुम यहीं वतन के भेष में पहुंचोगे । यह भी नहीँ बताया था कि वतन, अपोलो और धनुषटंकार के बीच फंसे तुमने ऐसा… मौका कैसे निकाला कि मुझसे बात कर सको ?"



"मैँने आपसे चमन की प्रयोगशाला की तैट्रीन में से सम्बन्ध स्थापित किया ।" हेरी ने बताया---" और ज्यादा बाते इसलिए नहीं की र्थी क्योंक्रि उस थोडे से मिले वक्त में ही मुझे वहुत-से काम करने थे ।"




"जैसे ? "



"मुझे अलंफासे समझकर वतन ने मुझे सारी प्रयोगशाला घुमाई ।" हैरी ने बताया…"क्रोई प्रयोगशाला के अन्दर न पहुंच सके, इसके लिए उसने-क्या सुरक्षाएं की हैं--यह भी बताया ।" कहते हुए हैरी ने प्रयोगशाला की पूरी स्थिति जैकी को बता दी । यह बताते हुए कि वतन के मुहसे प्रयोगशाला की सारी सुरक्षाएँ सुनने के बाद ही उसने दिमाग में यह स्कीम तैयार कर ली थी कि उसे 'वेवज एम' और 'अणुनाशक किरणों ' का फार्मूला कैसे प्राप्त करना है ।"
हैरी ने यह भी बता दिया कि उसने सारा काम किस तरह किया । अन्त में बोला-----"' वतन के बेहोश होते ही मैंने अलफांसै का फेसमास्क वतन को पहना दिया और वतन का खुद पहन लिया । कपडे इत्यादि भी बदल दिए । धनुषटंकार और अपोलो जब लोटे तो यहीं समझे कि वतन ने अलफासे को बेहोश कर दिया ।"

इस तरह पूरी कहानी सुनने के बाद जैकी का सीना गर्व से फूल गया । उसके होंठों पर ऐसी मुस्कान दौड़ गई मानो उसके जीवन की सबसे बड़ी मुराद पूरी गई हो, बोला, "हैरी, मेरे बच्चे ।। आज मुझे यकीन हो गया है कि जो कुछ तूझे बनना चाहता था, वह वन जाएगा । आज मैं बहुत खुश हूं । वतन की प्रयोगशाला की सुरक्षा के बारे में जो कुछ तुमने सुनाया उसे सुनकर मैं दंग रह गया । मैं सोचने लगा कि इस ज़बरदस्त सुरक्षित स्थान में से भला कोई कैसे कामयाबी के साथ अपनी इच्छित वस्तु निकाल सकता है मगर फिर तुमने मुझे यह बताया कि किस योजना के आधार पर तुमने वतन के उस सुरक्षित किले में छेद का दिया । उसे सुनकर हम दंग रह गए । सच, तुम्हारी जगह अगर हम भी होते शायद ऐसी तरक्रीब नहीं सोच पाते । बेशक तुममें दिमाग है और दिमाग से सोची हुई किसी स्कीम को स्वंय कार्यान्वित करने की ताकत भी ।"



"‘जो भी है डैडी ।" हैरी ने कहा----"आपसे प्राप्त किया है ।"






"गुड...!' जैकी बोला---" और हां, इसका मतलब यह हुआ कि अब हमारे वैज्ञानिक "अणुनाशक किरणे‘ भी वना सकेंगे ।"




"जी हां” हैरी ने कहा---" दोनों के फार्मूले की फिल्में प्राप्त का ली है मैंने ।"



"अच्छा तो वे फिल्में तो दिखाओ ।" जैकी ने कहा, "जरा हम भी तो देखें, महान वतन के उन दो आविष्कारों का नमुना ।" हैरी ने फिल्में जेब से निकालकर अपने डैडी को थमा दी ।



“जरा हैलीकॉप्टर सम्भालना ।" कहते हुए जैकी ड्राइविंग' सीट से उठ गया ।

कुछ ही देर बाद हैलीकॉप्टर ड्राइव कर रहा था हैरी और उसके बराबर में बैठा जैकी उन फिल्मों को उलट पुलटकर देख रहा था ।

उसकी आंखें इस तरह चमक रही थी मानो उसे दुनिया की सबसे बड़ी दौलत मिल गई हो ।
अपने कोट की जेब है उसने चमडे़ का एक पर्स निकाला, दोनों फिल्में उसमें डालकर उसने चेन बन्द कर दी और वापस एक झटके के साथ हैलीकॉप्टर से बाहऱ अंधेरे वातावरण में फेंक दिया ।।।


ऐसे उछला हैरी, जैस, विच्छू ने डंक मार दिया हो, मुंह से निकला…"ये आपने क्या क्रिया ?"



मगर तब तक तो न सिर्फ जैकी ने रिवॉल्वर निकालकर उसकी कनपटी से सटा दिया, बल्कि गुर्रा भी रहा था---" बेशक तुमने वतन की प्रयोगशाला में से से चोरी करके बड़ा काम क्रिया था हैरी बेटे, लेकिन बच्चे हो अभी यह भी नहीं समझते कि इतनी कीमती चीजे किसी के हाथ में यू ही नहीं दे देनी चाहिए । फिल्में तो अब वहां जाएंगी जहां पहुचनी चाहिए मगर तुम कोई हरकत नहीं करोगे । जिस गति से चला रहे हो , आराम के साथ उसी रफ्तार से चलाते रहो ।"



जैकी के मुंह से निकली इस आवाज को पहचानते ही हैरी का मस्तिष्क जैसे अन्तरिक्ष में तैरने लगा ।
पागल से हुए अपोलो ने यह समझते ही कि जिसे उन्होंने बांध रखा है, वह वतन है और -वतन के भेष में फिल्म लेकर निकल जाने वाला अलफांसे है-बाहर जम्प लगा दीं ।


धनुषटंकार भी जैसे खूनी हो उठा था-वह भी कक्ष से बाहर झपटा ।



गैलरी में तीव्र गति से बकरा भागा चला जा रहा था ।।




इसी तरह दोनों भागते राष्ट्रपति भवन से बाहर अा गए ।



अपोलो तो सड़क पर पागलों की तरह एक तरफ भागता ही चला गया।

राष्ट्रपति भवन के दरवाजे पर खड़े कई सैनियों ने उसे रोकना चाहा लेकिन वह नहीं रूका ।



हां----एक अधिकारी के पास हढ़बड़ाया सा धनुषटंकार रुक गया ।




"क्या बात है मोण्टो ? तुम दोनों इस तरह घबराए क्यों हो ?" अधिकारी ने जल्दी प्रश्न किया ।


धनुषटंकार का ध्यान उसके प्रश्न की तरफ कहाँ था ?


वह तो तेजी से घसीट मारता हुआ अपनी डायरी पर कुछ लिख रहा था ।


लिखकर उसने अधिकारी की तरफ बड़ा दिया ।



अधिकारी ने पढा और चौंक पड़ा, लिखा था…"जो वतन अमी-अभी राष्ट्रपति भवन से निकला है, वह वतन नहीं, उसके भेष में अलफांसे था । जल्दी बताओ कि यह वतन की कार को लेकर किधर गया है ?"



हड़बड़ाहट में धनुकांकार का मुंह ताकने के सिवा अधिकारी कुछ भी न कर सका ।



झुंझलाहट में धनुषटंकार ने जल्दी से बताने का इशारा क्रिया ।

"इधर... । बिना कुछ सोचे-समझे बौखलाए से अधिकारी ने एक तरफ को उंगली उठा दी ।


झपटकर धनुषटंकार ने उससे डायरी ली । बडी तेजी से घसीट मारकर उसने डायरी पुन: अधिकारी को पकड़ा दी ।



अधिकारी ने पढ़ा, लिखा था----




…जल्दी से किसी जीप का इन्तजाम करो ।"


बेचारा अधिकारी-उसका दिमाग तो जैसे एकदम शून्य हो गया था । परिस्थिति ऐसी थी कि यह ठीक से कुछ भी सौच-समझ नहीं पा रहा था । वह कुछ समझने की केशिश करता भी कैसे ? इऩ पलों में उसे तो ऐसों लग रहा था कि जैसे उसके पास दिमाग नाम की कोई चीज ही नहीं है ।


समझता भी कैसे ?

परिस्थिति ही ऐसी थी ।


उसके सामने थोडी ही देर पहले भवन से वतन निकला था । उसने चाहा भी था कि पूछ ले कि महाराज !

इतनी रात गए कहाँ जा रहे हैं ?


वतन से यह प्रश्न करने की हिम्मत नहीं जुटा सका था ।


उसके और अन्य सैनिकों के देखते-ही-देखते वह कार में बैठा और चला गया । सभी सैनिकॉ को मन-ही-मन इस बात पर भी आश्चर्य था कि इस वक्त वतन के साथ अपोलो नहीं था ।

अपोलो--जो वतन के अानमन का प्रतीक है । सारी दुनिया जानती है कि जहाँ वतन पहुचेगा , उससे एक सैर्किड पहले 'अपने गले की धण्टियां बजाता अपोलौ अपने अागमन की सूचना देगा ।


सैनिको की नजरों में यह पहला ही मौका था जब वतन अपोलो के बिना राष्ट्रपति भवन से बाहर निकला था ।


उस अधिकारी ने इसके लिए भी वतन को रोकना चाहा था पर हिम्मत न जुटा सका था ।



और अब बौखलाये से अपोलो और धनुषटंकार बाहर अाए थे ।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Post by Jemsbond » 16 Oct 2016 18:04



धनुषटंकार का कागज पढकर वह समझा, कुछ नहीं समझा लेकिन चीख पड़ा-"जीप लाओ ।"



उसके चीखने के दो मिनट बाद ही न जाने किधर से एक जीप दौड़कर आई और ब्रेर्कों की चरमराहट के साथ सैनिक अधिकारी और धनुषटंकार के करीब रुकी ।


धनुषटंकार ने एक भी पल नहीं गंवाया । उसने जल्दी से ड्राईविंग सीट से ड्राइवर को हटाया ।
न सिर्फ सैनिक अधिकारी बल्कि वहां मौजूद सभी सैनिकों पर बौखलाहट सवार थी । मगर कर कोई कुछ नही सकता था क्योंकि धनुषटंकार से सभी उसी परिचित थे । ड्राइविंग सीट पर बैठते धनुषटंकार ने सबको जीप में बैठने का इशारा क्रिया ।


तब जबकि अधिकारी सहित सात सेनिक जीप में बैठ गए, किसी धनुष से छूटे तीर की तरह जीप सडक पर दोड़ पडी ।



इतनी तेज गति से कि उसमें बैठे सैनिक बौखला गए । फिर किसी गोली क्री-सी रफ्तार से उनमें से कभी क्रिसी सेनिक ने जीप को चलाते नहीं देखा था । सब चुप ! जीप में मौत जैसा सन्नाटा !

कोई बोले भी तो क्या ? सभी के दिमाग बौखलाए हुए-से थे । पहली बात तो यह कि किसी की समझ में यह नहीं अा रहा था कि यह हो क्या रहा है ? दूसरी बात…जीप की रफ्तार ।।।


.कोई अच्छा चालक भी इस रफ्तार से जीप चलाए तो उसमें बैठने वाले अच्छे अच्छे कांप जाएँ---और-यहां-----यहां तो सभी सैनिकों के दिमाग में यह बात भी थी कि जीप एक बन्दर ड्राइव कर रहा ।



सभी को लग रहा था कि निश्चित रूपसे भयानक एक्सीडेंट होने वाला है ।



आखिर सैनिक अधिकारी ने कह ही दिया----"जीप जरा धीरे चलाओ, मोण्टो ।"



लेकिन-वह भला किसकी सुनने वाला था, कम होने के स्थान पर जीप की रफ्तार बढी । दुबारा किसी की हिम्मत न हुई कि कोई उससे रफ्तार कम करने लिए कह दे । सभी को लगा था कि उनके कहने पर रफ्तार और बढ जाएगी ।।
कुछ ही देर बाद सढ़क पर पागलों की तरह भागता हुआ अपोलो हैइलाइर्टों की सरहद में अा गया ।


अपने ऊपर लाइट पड़ते ही एक बार अपोलो ने पलटकर देखा ।


इतनी देर में ब्रेकों की चीख के साथ जीप उसके बराबर में रूकी ।




-'"अपोलो ।" इधर सैनिक अधिकारी के मुंह से निकला उधर---


हवा में लहराता हुआ अपोलो का जिस्म जीप में अा गया ।

जीप एक अटके साथ इस तरह अागे वड़ गई जैसे कभी रुकी ही नहीं थी ।


जबरदस्त तीव्र गति से जीप दौडती ही चली जा रही थी ।


चमन की विभिन्न सड़कों पर दौड़ने के अतिरिक्त जीप ने किया ही क्या ?



वह वस दौडती रही, दौड़ती ही रही । जैसे कि सैनिको को सम्भावना थी, कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ ।



आधे घण्टे तक जीप सड़क्रो, पर दौड़ती रही । इस बीच

धनुषटंकार ने सभी सैनिकों को समझा दिया था कि हुआ क्या है ।


वास्तविकता का पता लगने पर उनकी स्थिति भी अपोलो और धनुषटंकार जैसी हो गईं ।



लगातार एक घण्टे तक सड़कों की खाक छानने के बाद भी जब वतन की कार कहीँ नज़र न अाई तो विवश होकर उन्हें राष्ट्रपति भवन की तरफ लौटना पड़ा ।



सभी सेनिक इस वक्त अपने महाराज के दर्शन करना चाहते थे । यह भी चाहते थे के उन्हें होश में लाकर उनसे पूछें कि ऐसी परिस्थितियों में हमारे लिए क्या हुक्म है ?



किन्तु तब, जबकि वे वहाँ पहुंचे जहाँ वे वतन को बंधा छोड़ गए थे ।

अपोलो और धनुषटंकार के पैरों तले से जैसे धरती खिसक गई । "



" महाराज़ कहां गए ? " बरबस ही एक सैनिक के मुँह से निकला ।



ओंर वास्तव में…वतन अपनी जगह से गायब था । रेशम की यह डोरी जिसकी मदद से धनुषटकार ने उसे वांधा था, खम्बे के करीब ही फर्श पर पडी थी ।


फर्श पर से अलफासे के चेहरे के फेसमास्क गायब था ।



धनुषटंकार ने ध्यान से देखा-डोरी उल्झी-पुल्झी जरूर थी, किन्तु कहीं से भी टूटी नहीं थी ।।
उसका सीधा सा मतलब था कि वतन के वन्धन खोले गए हैं । अगर यह सोचा जाए कि इस बीच वतन होश में आ गया होगा और उसने खुद ही स्वयं को रेशम की इस डोरी की कैेद से मुक्त किया होगा तो यह गलत होगा ।



धनुषटंकार जानत़ा था कि उसने बन्धन इतने सख्ती के साथ बाधे थे कि उनमें बधने वाला स्वयं किसी भी तरह से अपने 'वन्धन नहीं खोल सकता था ।



हां अगर ज्यादा बलशाली हो तो बंधनों को तोड़ जरूर सकता था ।



किन्तु रेशम की डोरी का साबुत होना इस बात का प्रमाण था कि वतन को किसी ने खोला था ।।।

" किसने ?"


यही एक सवाल हर दिमाग़ में चकरा उंठा ।।




पूरे राष्ट्रपति भवन में वतन को इस तरह खोजा गया जैसे सुई को खोजा जा रहा हो, परन्तु वह नहीं मिला ।


राष्ट्रपति भवन के अन्य पहरेदारों से पूछताछ गई तो पता लगा कि न तो किसी ने वतन को ही देखा है और न ही अन्य किसी संदिगध आदमी को ।।।


सुवह तक चमन का बच्चा-बच्चा जान गया कि वतन आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गया है । सारे चमन में जैसे मातम छा गया । जगह-जगह, तरह तरह के वार्तांलाप होने लगे । रात को गुजने वाली गोलियों की अावाजों और बम बिस्फोटों की चर्चाएं होने लगी ।



चमन की थल सेना के अध्यक्ष मिस्टर नादिर ने चमन कें रेडियों पर चमन के नागरिकों को सम्बोधित करके कहा कि महाराज के गायब होने से घबराने की कोई जरूरत नहीं है ।


वे चमन के दुश्मनों से बदला लेने के लिए खुद ही चले गए हैं । उनके बाद चमन जी रक्षा उनकी फौज बखूबी कर सकती है ।



नादिर द्वारा रेडियों पर राष्ट्र के नाम प्रसारित संदेश का तात्पर्य यह था कि चमन के सामान्य नागरिक आतंकित न हो सकें, धबराएं नहीं यह दूसरी बात थी कि नादिर स्वय घबरा रहा था ।।


स्वयं उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वतन कहां चला गया और उसे कहां ढूंढा जाए ?

वतन की खोज में कईं दिन गुजर गए, लेकिन वह किसी को न मिला ।।




फिर...एक दिन सुबह...!
सारे चमन में जैसे तूफान आ गया ।।



जिसने देखा वही दंग , आंतकित , भयभीत और डरा हुआ ।



सारा चमन जैसे आकाश की तरफ देख रहा था । बूढे, जवान, महिला, पुरुष इत्यादि सभी की निगाहें चमन के ऊपर चकराते उस हेलीकॉप्टर पर थी ।।


सभी के चेहरे पीले पड़े हुए है सारे चमन के साथ-साथ धनुषटंकार अौर अपोलो भी राष्टपति भवन की छत पर खड़े उस को देखरहे थे । उसके बराबर में ही खडा़ था, थलसेना अध्यक्ष नादिर ।



सबकी निगाह चमन के ऊपर चकराते उस हेलीकॉप्टर से नीचे लटक रहे इन्सानी जिस्म पर ज्यादा थी ।


वह जिस्म हेलीकॉप्टर के साथ बंघा एक लाश की तरह लटक रहा था ।


हैलीकॉप्टर के विपरीत दिशा में उड़ता-सा प्रतीत हो रहा था वह ।



नादिर ने तो कहा भी था कि इस हैलीकॉप्टर को किसी गोले से मार गिराया जाए किन्तु न जाने क्या सोचकर धनुषटंकार ने उसे ऐसा करने से रोक दिया था ।

हवा में चकराते हैलीकॉप्टर ने भी चमन के अनेक चक्कर लगाने के अलावा कुछ नहीं किया । हां…वह निर्जीव-सा जिस्म हैलीकॉप्टर के साथ जरूर लहरा रहा था ।




काफी देर तक उस हेलीकॉप्टर ने चमन के नागरिकों को आतंकित रखा । अन्त में…वह समुद्र की तरफ मुड़ा ।राष्ट्रपति भबन की छत पर खड़े घनुषटंकार, अपोलो और नादिर इस वक्त हैलीकॉप्टर को स्पष्ट देख रहे थे ।




वे राष्टपति भवन की छत पर थे और भवन का एक हिस्सा सागर की लहरों पर ही खडा था ।


किनारे से थोडी सागर के ऊपर एक सैकिंड के लिए हैलीकॉप्टर हबा में स्थिर हुआ ।



उसी सेकिड में हेलीकॉप्टर के नीचे बधा वह जिस्म सागर में अा पड़ा । "




बस-उस जिस्म को सागर में डालने के बाद हैलीकॉप्टर सागर के ऊपर से होता हुआ प्रतिपल दूर होता चला गया ।



धनुषटंकार और अपोलो राष्ट्रपति भवन की छत से नीचे की तरफ भागे, नादिर उनके साथ था ।




इस दृष्य को देखने वाले अन्य लोग भी सागर की तरफ जाने की सोच रहे वे, किन्तु सबसे पहले ये तीनों ही उस स्थान् पर पहुचे वह जिस्म सागर की लहरों के थपेड़े खा रहा था ।

धनुषटकार ने अाव देखा न ताव, समुद्र में जम्प लगा दी ।।


उसके पीछे नादिर भी झपटा था ।।



अपोलो किनारे पर ही खड़ा उनकी तरफ देख रहा था ।



तैरते हुए वे दोनों उस जिस्म के पास पहुंचे ।



जिस्म पानी पर मुंह के बल पड़ा लहरों के थपेड़े खा रहा था । यह देखते ही धनुषटंकार और नादिर के रोंगटे खडे हो गए कि उस जिस्म पर सफेद कपड़े थे, किन्तु जगह-जगह से जले हुए । सारा जिस्म जला हुआ-बूरी तरह !



मानो कम-से-कम दो मिनट किसी भंयकर जलती हुई अाग में पड़ा रहा हो वह ।।।



उन्हें लगा यह वतन है ---सफेद कपड़े लम्बाई इत्यादी तो यही साबित करती थी कि यह वतन है ।



नादिर औंर धनुषटंकार के दिल बुरी तरह धड़क रहे थे । मगर, उन्होंने उस जिस्म को पकड़ा और किनारे पर ले आये ।।



किनारे पर अभी मुंह के बल पड़ा था ।

अजीब सीं चीख के साथ बकरा रो पड़ा । कापंते हाथ और धड़कते दिल से नादिर ने उसे पलट दिया ।।


नजर चेहेरे पर पड़ी ।



उफ़, बुरी तरह जला हुआ चेहरा । काला ऐसा जैसे कोई गत्ता जलकर अपने आकार में रह गया हो । झुलसा -हुअा , बूरी तरह जला हुआ वीभत्स चेहरा ।।।


नादिर और धनुषटंकार ने बस ध्यान से देखा ।


सारा चेहरा इस कदर जल गया था कि ठीक से पहचान में भी नहीं आ रहा था है एकाएक उसकी निगाह मस्तक पर पडी़ ।


वहाँ एक बल पढ़ हुआ था ।


मस्तक पर वल प्रमाण था ------ यह वल प्रमाण था कि यह वतन है ।



चमन की मसीहा ही तो था वह ।



वतन----झुलसा हुआ----बुरी तरह


'"जला हुआ वतन ।"

उस समय विकास एक सरदार के मेकअप में था ।

हालांकि ऐसे काम पसन्द नहीं थे लड़के को ।।


वह तो खुला खेले खेलने का शौकीन था ।।


चाहता था कि दुश्मन उसे पहचाने और वह दुश्मन को । डटकर आमना सामना हो और पता लग जाये कि कौन कितने पानी में है ।

.


किन्तु----अपना असली चेहरा छुपाकर काम करने के लिये उसे विजय ने मजबूर किया था ।



ऐसी बात नहीं कि जासूसी के दांव-पेचों को वह जानता नहीं था । विजय, प्रीसेज़ जैक्शन, जैकी और अलफांसे जैसे प्रशिक्षण पाने के पश्चात् वह इन चार महान हांस्तयों की विभिन्न शक्तियों का एक पुतला बन गया या किन्तु --


----उसका कहना था कि जासूसी के किसी भी पैंतरे से मंजिल की ओर बढ़ने की गति बहुत धीमी होती है ।।


अपनी गति वह धीमी नहीं रखना चाहता था ।। वह तो चाहता था कि जितने भी धुरन्धर हें मैदान में कूदें और मामला आरपार कर लें।



किन्तु बिजय ने कहा था----"तुम जैसा ही अभिमन्यु दुश्मन के चक्रव्यूह में ऐसा फंसा कि फिर निकल ही नहीं सका ।।।
उस चक्रव्यूह से भी अधिक सुदृढ व्यूह इस समय दुश्मन ने चमन में रचा है !!


उस चक्रव्यूह में अभिमन्यु बनाकर हम तुम्हें भेज रहे हैं विकास । सोच-----समझकर कदम उठाना ! कहीं अभिमन्यु की कहानी की पुनरावृति न हो जाये ।

तनी तो-विजय के निर्देशानुसार सरदार के मेकअप में था वह ।


उसी मेकअप में चमन के एयरपोर्ट पर उतरा ।


जो शक्ल-सूरत और नाम उसने रखा था, उसी से उसका पासपोर्ट और बीजा इत्यादि बने थे । कस्टम से बाहर आकर लड़के ने अपने चारों और तीक्ष्य दृष्टि से देखा । उसे कोई सन्दिग्ध व्यक्ति नजर न आया ।


साधारण चाल से चलता हुअा वह एक बाथरूम में घूस गया ।



अपनी योजनानुसार अब उसे एक मौलवी का रूप धारण करना था । चटखनी चढ़ाकर बाथरूम का द्वार उसने अन्दर से बन्द किया । अभी अपना इरादा पूर्ण करने हेतु वह सूटकेस खोलने ही वाला था कि…

----"वहआयेगा जरूर !" किसी शिकारी कुत्ते की भांति इस चीनी आवाज ने विकास के कान खडे़ कर दिये--"हमें धैर्य के साथ भारत से आने वाले हर विमान को, चैक करते रहना चाहिए चीफ ने हमें यही आदेश दिया है ।"


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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Post by Jemsbond » 16 Oct 2016 18:05


-"दो दिन तो हो गये भारत से आने वाले हर विमान को चैक करते ।" दूसरी आवाज----"अभी तक तो वह......!" "तुम में यही कमी है सूंगपी ।" बातें चीनी भाषा में ही हो रही थीं-" तुम जल्दी ही हताश हो जाते हो । यह तो तुम समझ ही सकते हो कि पिछले दिन वतन और विकास बहुत अच्छे दोस्त बन चुके हैं ।। वतन उस वंन्दर का सगा भाई है जिसे विकास बहुत प्यार करता है । वतन का जो स्टेटमेंट विश्व के अ१बारों में छपा है, उसे पढते ही विकास समझ जायेगा कि वह खतरे में है । वह यहां अवश्य आयेगा ।।। बंदर तो अकेला ही आ गया है उसे तो चीफ ने पकड़कर कैद में डाल ही रखा है । अब तो बस विकास की प्रतीक्षा है" ।



"यह तो मैं भी मानता हूं कि वह यहां अवश्य आयेगा, किन्तु ......

" -किन्तु क्या ?"



"कहीं ऐसा न हो कि हम उसे यहीं तलाश करते रहे अौर वह वतन तक पहुंच जाये ।"



" हालांकि ऐसा तो हौगा नहीं और अगर ऐसा हो भी गया तो कौन-सा तीर मार मार लेगा ?" चीनी भाषा में कहा गया ।"



"चीफ ने राष्ट्रपति भवन में ऐसा जाल बिछा रखा है कि वह बच नहीं सकेगा, वतन से मिलने से पूर्व ही वह उस वन्दर की तरह चीफ की कैद में होगा ।।"



-"मुझे दो डर लगता है ।"



धीरे से हंसा कोई, बोला----"तुम तो नाम से डरते हो उसके । खैर, चलो-कही वह बन्दर न निकल भागे ।"



एक-एक बात विकास कान लगाये सुन रहा था । बात चीत की यह आवाज उसके बराबर वाले दूसरे बाथरूम में से अा रही थी । इन बातों से स्पष्ट था कि चमन में चीनी पूर्ण तया अपना जाल फैला चुके हैं ।।


उनकी बातों से यह भी स्पष्ट था कि धनुषटंकार चमन में आते ही वतन को मिलने के जगह पर इन लोगों के हाथ पड़ गया है और इन्होंने उसे कैद कर लिया है । विकास भूल गया कि वह बाथरूम में किस मकसद से आया था ।



वह तो उन आवाजों को सुनने में व्यस्त था । दरवाजा खुलने की आवाज सुनी उसने ।।

फिर बन्द होने की ध्वनि ।



शीघ्रता से विकास ने अपने बाथरुम का दरवाजा खोलकर एक झिर्री सी बनाई । बाहर झांका-बाह्रर वाले बाथरूम से निकलकर दो चीनी बाहर जा रहे थे ।
मेकअप परिवर्तन का विचार त्यागकर विकास उनके -पीछे लपका ।



उन दोनों-की गति काफी तीव्र थी ।



अभी तक विकास उनमें से किसी का चेहरा नहीं देख पाया था ।।।



एयर पोर्ट की इमारते से बाहिर निकलकर उन्होंने एक टेक्सी ली ।



लिख़ने की आवश्यकता नही कि विकास ने भी एक अन्य टेक्सी की सहायता से उनका पीछा किया ।




चमन के बाजार और सड़कों से भलीभांति परिचित था विकास । करीब एक घण्टे पश्चात आगे वाली टेक्सी गोल बाजार की एक इमारत के सामने रुकी ।



अपनी टेक्सी को विकास आगे निकलवा ले गया । टेक्सी में बैठे ही वैठे विकास ने देख लिया था कि टेक्सी बाले का विल अदा करके वे दोनो उसी इमारत में प्रविष्ट हो गये है ।

विकास ने अपनी टेक्सी रुकवाई । विल देकर टेक्सी वाले को बिदा किया और स्वयं वापस उस इमारत की और बढ़ गया ।



इमारत की बगल में ही उसे एकं पतली-सी गली नजर आई, उसी में प्रविष्ट हो गया विकास ।



दिल तो उसका चाह रहा था कि वह धड़धड़ाता हुआ इमारत में घुस जाये । दो-दो हाथे हों और पता लग जाये कि चक्कर क्या है ? किन्तु-बार-बार विजय गुरु के निर्देश याद अाने पर वह स्वयं को रोकता ।



इतना तो वह समझ ही चुका था कि वास्तव में दुश्मनों ने-चमन में सबको फंसाने के लिये चक्रव्यूह का निर्माण कर रखा है ।।



अत: उसे सोच-समझकर के इस व्यूह में प्रबिष्ट होना चाहिये ।
उसने देखा--वह संकरी-सी गली आगे जाकर बन्द थी । गली के अन्दर किसी मकान इत्यादि का दरवाजा भी नहीं था ।।


गन्दगी से भरी पड़ी वह गली ।


दोनों तरह की इमारतों के पतनाले उसी में खुल रहे थे । उसने देखा-गन्दे पानी के पाइपं उस इमारत की दीवार के सहारे-सहारे नीचे पहुंच रहे थे जिसमें वे दोंनो चीनी गये थे ।



विकास को समझते देर ना लगी कि इस गलि में कोई आता जाता नहीं ।



फिर क्या था ?

गन्दे पानी के एक पाइप के सहारे वह ऊपर चढ़ने लगा है इस प्रकार के कार्य अब विकास के लिये उसी प्रकार आसान हो गये थे, जैसे किसी रसगुल्ले को खा जाना है उसने ऐसा पाइप चुना था, जो सीधा इमारत की छत तक पहुंचता था है वन्दर की सी फुर्ती के साथ वह पाइप पर चढता चला जा राह था है


--- उस समय वह इमारत की एक बन्द खिडकी के समीप से गुजर रहा था कि--



भड़ाक से खिडकी खुल गयी पाइप विकास के हाथ से छूटते-छूटते-बचा है वह एकदम इस प्रकार की अप्रत्याशित घटना थी कि जिसकी विकास ने कल्पना भी नहीं की थी ।



खिडकी पर उसे एक आदमी नजर आया है



परिस्थिति ऐसी थी कि विकास जैसे लडके के जिस्म में भी झुरझुरी सी दौड़ गयी ।




वह तो सम्पूर्ण फुर्ती के साथ पाइप पर चढता चला जा रहा था ।



उसका ध्यान तो सिर्फ अपने लक्ष्य अर्थात् छत की तरफ था । उसे तो यह कल्पना भी नहीं थी कि बीच में ही यह खिडकी इस अप्रत्याशित ढंग से खुल पडेगी ।



खिड़की पर चमकने वाले इस चीनी के हाथ में रिबॉल्वर देखकर तो उसके जिस्म का रोयां-रोंया खड़ा हो गया ।

रिर्वाल्लर का रुख बिकास की अोर ही था और उसकी तरफ देखता वह बहुत ही भयानक ढंग से मुस्करा रहा था । बिचित्र-सी स्थिती में फंस गया या विकासा ।



दोनों हाथों से उसने कसकर पाइप को पकड़ रखा था ।


दांतों में दबा था सुटकेस का हैंडिल ।
जमीन ये इतना ऊपर-अा चुका था कि वह कूद नहीं सकता था ।




"इसं तरह चारों को भाँति किसी के मकान में दाखिल होना बुरी बात है मिस्टर विकास । " चीनी ने आराम से अपनी भाषा में कहा ।।



मुंह से कोई जबाव देता विकास तो मुंह से बैग निकल जाना था । जिस ढंग वह फंसा या, उस ढंग से फंसने की उम्मीद कम-से-कम उसने तो की नहीं थी ।



चुपचाप मुर्खों की तरह उस व्यक्ति को देखते के अतिरिक्त विकास कर भी क्या क्या सकता था?



हां- उस चीनी का चेहरा उसे कुछ जाना पहचाना- सा लगा ।



अभी वह उसी स्थिति में था कि--------

वह बोला---"आओ इस खिडकी के रास्ते से कमरे में आ जाओ ! "

कहने के साथ ही चीनी ने एक हाथ उसककी तरफ बड़ा दिया । विकास उसके साहस पर आश्चर्यचकित था । वह अच्छी तरह जानता था कि चीन में उसके उसका कितना आतंक है ,, बच्चा-बच्चा उसके नाम से कांपता है, किन्तु--किन्तु यह व्यक्ति उसे अदम्य साहसी लगा । उसकी बातों से ही लगता था कि उसके दिलं पर विकास का कोई प्रभाव नहीं है ।



विकास ने हाथ बढा दिया ।।



उसने कसकर पकड़ लिया । एक पैर पाइप से हटाकर विकास ने खिड़की पर रखा और फिर---इतने तीव्र झटके के साथ वह खिड़की के अन्दर आया कि वह चीनी बौखला जाये।।


विकास ने विचित्र ढंग से भयानक फुर्ती के साथ उस पर जम्प लगाई थी । उसे आशा थी कि चीनी बौखला जायेगा,



किन्तु , बौखेलाना उसे ही पड़ा था । चीनी को जैसे मालुम था कि विकास यह हरकत करेगा ।।
विकास से अधिक फुर्ती का प्रदर्शन करता हुआ व ह विकास का हाथ छोड़कर अलग हट चुका था ।।



मुंह के बल विकास कमरे के अन्दर फर्श पर जा गिरा ।




बैग उसके मुंह से निकलकर पहले ही कमरे में गिर चुका था ।।



गिरते ही भयानक फुर्ती के साथ वह उठ कर खड़ा हो गया ।।

घूमा, सामने ही हाथ में रिबाँल्वर लिये खड़ा चीनी मुस्करा रहा था ।



विकास ने उसके चेहरे हो ध्यानपूर्वक देखा । विशेष रूप से उसकी आंखों को है विचित्र ढंग से विकास की आँखें सिकुड़ती चली गयी ।




अगले ही पल उसके मुंह से निकला----"तुम्हें पहचान गया हूँ गुरु ।"



" अ--अब पहचाने तो क्या पहचाने ?" चीनी के मुंह से अलफांसे--- की आवाज निकलि--"'हमारे जाल में फंसकर यहां तक तो पहुंच गये ।"



आगे बड़कर अलफांसे के चरणों में झुक गया विकास । श्रद्धापूर्वक चरम-स्पर्श किये, बोला------"फंस भी इसलिये गया गुरु क्योंकि ये जाल तुम्हारा था ।। रही पहचानने की बात, तो उसका जवाब यह है कि आपकी सूरत ही ध्यानपूर्वक देखने का मौका मुझे अब मिला है"



" खैर ।" अशफांसे ने कहा… "बैठो ।" कमरे में पडे़ सोफे पर बैठते हुंए विकास ने पुछा---" अापके साथ दूसरा कौन था गुरु ।'"



"आपकां खिदमतगार ।" दूसरा चीनी अपने मुंह सै पिशाचनाथ की आवाज निकालता हुआ कमरे में प्रविष्ट हुआ-----"क्षमा करें महाराज । यह सब कुछ मुझे महाराज शेरसिंह की आज्ञा पर करना पड़ा !" कहने के साथ ही पिशाचनाथ ने विकास के पैर छू लिये ।।

तीनों ही आराम से सोफे पर बैठ गये ।
"ये सब चक्कर क्या है गुरु ?" विकास है पूछा----"आप चमन में क्या कर रहे है ?"



------"'चक्कर अच्छे-खासे आदमी की खोपडी को घनचक्कर बना देने बाला है विकास प्यारे. ! "' अलफांसे ने बताया-----"तुम्हारा धनुषटकार हमारे चमन में पहुचनें से पूर्व ही वतन के पास पहुंच चुका है और मजेदार बात तो यह है कि एक अलफांसे भी वतन के पास पहुंच चुका है ।"




" क्या मतलब ?" चौका विकास ।



" मतलब एकदम साफ है ।" अलफांसे ने बताया ----" हैरी मेरे मेकअप में वतन से मिला है । वतन, धनुषटंकार और अपोलो उसे अलफांसे ही समझते हैं । तुम समझ सकते हो कि यह सब कुछ वह --वेवज एम-- का फर्मुला प्राप्त करने के लिये कररहा है ।"



“ओह ।" विकास का चेहरा गंभीर हो गया----" तो हैरी पहुंच चूका है यहां ।"



"उधर वह अपनी बात चाल रहा है और इधर हम अपनी अलफासे ने बताया ।



"कैसी चाल ?"

"वह्र सब कुछ बाद में संमझना ।" अलफांसे ने कहा--"पहले जरा यह समझ लो कि यहां कैसे क्या हो रहा है के अखबार में वतन का स्टेटमेंट पढकर ही मैं और पिशाचनाथ यहां पहुंचे हैं । पहुंचते ही चौके, क्योंकि पता लगा कि पहले ही एक अलफांसे यहां पहुंच चका है । यह पता लगाने की तरकीब सोच ही रहे थे कि वह कौन है कि अचानक हमारे गले में पड़ा ये लॉकेट रुपी ट्रासमीटर स्पार्क करने लगा । ओपिन करके बातें की तो पता लगा कि दूसरी ओर से विजय दी ग्रेट बोल रहे थे ।
उन्होंने पूछा कि, हम कहां से बोल रहे है ? हमने शराफत से बता दिया । दूसरों तरफ से कहा गया कि वतन के पास जो अलफासें पहुचा है वो हैरी है । हमने हमने पूछा कि यह चक्कर क्या है ? वह कहां से बोल रहा है ? जवाब आया--चीन से ।। हम चौकें । चौकने की वजह भी थी । चीन का बच्चा बच्चा विजय, का दुश्मन है और उसी, चीन से विजय बोल रहा था । साथ ही चीन में बैठे बैठे उसे यह भी मालूम था कि चमन में वतन के पास जो अलकांसे पहुँचा है, वह हैरी है । बहुत-से सवाल हमारे दिमाग में चकराने लगे जिनका जबाब हमने विजय से मांगा ।।


उत्तर में विजय से कहा कि 'जब तक सारा चक्कर हमें नहीं बतायेगा, हमारी समझ हैं … कुछ नहीं आयेगा । अत: विजय ने ट्रांसमीटर पर ही हमें पूरा चक्कर समझायां ।।
बताया कि किस-किस प्रकार विभिन्न राष्ट्र के जासूस 'वेवज एम' का फामू'ला प्राप्त करने के लिये चमन की ओर चले हैं । यह भी बताया कि सभी राष्ट्रों के जासूसों को नाकाम करने केलिये उसने भारतीय जासूसों का जाल किस प्रकार बिछाया है ।। उसने बताया कि अमेरिका में अशरफ ने सूचना भेजी है कि हैरी ने ट्रांसमीटर द्वारा अपने चीफ को रिपोर्ट भेजी है कि वह अलफांसे के मेकअप में वतन तक पहुंच चुकां है । यही खबर उसने मुझे दी ।। यह भी बताया कि आज किसी समय एक सरदार के भेष में तुम यहाँ पहुंचने बाले हो । बस-उसी सूचना पर हमने तुम्हें एयरपोर्ट पर पकड़ा और किस मजे से तुम्हें यहां तक ले आये ।"


" लेकिन गुरु, जब आपको मालूम है कि वह है तो ---?"



"तो क्या ?"



“क्यों नहीं राष्ट्रपति भवन में पहुंचकर, वतन से मिलकर उसकी असलियत खोल देते'"



"उससे क्या, होगा ?"

"होंना क्या है, 'वैवज एम' का फार्मुला प्राप्त करने के उसके इरादों पर पानी फिर जायेगा ।"' विकास ने कहा ----" इसके अतिरिक्त चमन में आने का हमारा मकसद भी क्या है ?"
"'मामला अगर सिंर्फ हैरी तक ही सीमित हो विकासं प्यारे, तो तुम्हारा बताया हुआ रास्ता सही था । अलफांसे ने कहा--"लेकिन यहाँ किस्सा सिर्फ हैरी का नहीं वल्कि बागरोफ, जेम्स बाण्ड तुगलक अली नुसरत खान, सांगपौक , हवानची और सिंगसी इत्यादि का है ।"



"क्याआपको मालूम है कि ये सब लोग कहां है और क्या कर रहे हैं ?"





" यही तो मालूम करना है ।" अलफासे ने कहा----"यह बातें तो स्पष्ट है कि ये सभी अलग अलग फार्मुला प्राप्त करने के लिये अपना-अपना मोर्चा जमा चूके है लेकिन कौन कहां किस ताक में है, यही पता लगाना है ।"'



" लेकिन यह पता कैसे लगेगा ?"


…"चुपचाप यहां बैठे तमाशा देखते रहो स्वयं ही पता ला जायेगा ।" अलफासे ने कंहा…अगऱ हम मैंदान में पहले कूद पड़े तो वे सभी हमारे प्रति सतर्क हो जायेंगे । अपने से पहले मैदान में कूदने को अवसर हमें उन्हें देना ।"



"'मैं समझ नही रहा हुं गुरु, कि आप कहना क्या चाहते हैं:' जै"



-"वह साला जासूस की दुम ठीक कहता है तुम्हारी खोपड़ी में अक्ल की बात नहीं घुस पाती है" अलफांसे ने कहा-"अबे हमारा सीधासा मतलब यह है कि हमें उस समय मैदान में कूदना है जब सब की स्थिति का, ज्ञान हो जाये ।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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